***जय जय सियाराम****

***जय जय सियाराम****

ॐ जय श्री महाकाल 🔱🙏🏻
🍁 *अखण्ड भक्ति* 🍁

*श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे, इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था। जहाँ भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते, कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते।*

एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं। वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे। पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा की महाराज ! क्या सेवा करे ? संत ने कहा - पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है, हम तो फक्कड़ साधु है। माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।

पंडित जी ने कहा - ठीक है महाराज , संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे।

पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते।

जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा - पंडित जी, आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी। हम बहुत प्रसन्न है, हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो।

संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे, श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे। पंडित जी बोले - महाराज हम बहुत गरीब है, हमें बहुत सारा धन मिल जाये। संत बोले - संत ने प्रार्थना की की प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये। भगवान् ने मुस्कुरा दिया, संत बोले - तथास्तु। फिर संत ने पूछा - मांगो और क्या चाहते हो ? पंडित जी बोले - हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए। संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए। संत बोले - तथास्तु, तुम्हें बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा।

फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो । पंडित जी बोले - श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति, प्रेम हमें प्राप्त हो । संत बोले - *नहीं ! यह नहीं मिलेगा।*

पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए की महात्मा क्या बोल गए। पंडित जी ने पूछा - संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी। संत बोले - तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन, सम्मान, घर की है। दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् के भक्ति की है। जब तक हम संसार को, परिवार, धन, पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती।

भगवान् ने जब केवट से पूछा की तुम्हें क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा।

प्रभु ने पूछा - तुम्हें बहुत सा धन देते है, केवट बोला नहीं। प्रभु ने कहा - ध्रुव पद ले लो, केवट बोला - नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राजा, और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की।

हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए - बल, बुद्धि , सिद्धि, अमरत्व आदि परंतु उन्होंने कुछ प्रसन्नता नहीं दिखाई। अंत में जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया।

प्रह्लाद जी ने भी कहा की *हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की।*

जय श्रीराम.. 🌹🌻🌷💐🌸🌺
**** नवधा भक्ति ******

“ नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥“

भक्ति के प्रधान दो भेद हैं ---एक साधन रूप, जिसको वैध और नवधा के नाम से भी कहा गया है और दूसरा साध्यरूप, जिसको प्रेमा-प्रेमलक्षणा आदि नामों से कहा है | इनमें नवधा साधनरूप है और प्रेम साध्य है |

अब यह विचार करा चाहिए कि वैध-भक्ति किसका नाम है | इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि स्वामी जिससे संतुष्ट हो उस प्रकार के भाव से भावित होकर उसकी आज्ञा के अनुसार आचरण करने का नाम वैध-भक्ति है | शास्त्रों में उसके अनेक प्रकार के लक्षण बताए गये हैं |

तुलसीकृत रामायण में शबरी के प्रति भगवान् श्रीरामचंद्र जी कहते हैं:----

“ प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
आठवँ जथालाभ संतोषा । सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥
नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥“

( पहली भक्ति है संतों का सत्संग ।
दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम ॥
तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और
चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें॥
मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझपर दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है ।
छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना ॥ सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना ।
आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना ॥
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना ) |

श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद जी ने कहा है :-

“श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पाद सेवनम् |
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ||... (७.५.२३)

( भगवान विष्णु के नाम, रूप, गुण और प्रभावादि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण तथा भगवान् की चरणसेवा, पूजन और वंदन एवं भगवान् में दासभाव, सखाभाव और अपने को समर्पण कर देना—यह नौ प्रकार की भक्ति है )|

इस प्रकार शास्त्रों में भक्ति के भिन्न भिन्न प्रकार से अनेक लक्षण बतलाए गए हैं, किन्तु विचार करने पर सिद्धांत में कोई भेद नहीं है | तात्पर्य सबका प्राय: एक ही है कि स्वामी जिस भाव और आचरण से संतुष्ट हो,उसी प्रकार के भावों से भावित होकर उनकी आज्ञा के अनुकूल आचरण करना ही सेवा यानी भक्ति है ||

(गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित “नवधा भक्ति”--कोड:२९२, से उद्धृत)

Pranam Fruits Like +380 प्रतिक्रिया 22 कॉमेंट्स • 312 शेयर
जय माता दी सुविचार
pooja yadav
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ॐ गुरूदेव .आतमा मालीक...
SURAJ HANWATE
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Vedeo Bhajan
Rakesh Gupta 9810119671
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🌿🌿 GOOD AFTERNOON 🌿🌿 🌿🌿 VERY NICE MESSAGE 🌻🌹
Bina Aggarwal
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दुर्गा अष्टमी की शुभ कामनाएं
अजय राठोफ
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🌹🏵️💮🌺🌼🌲🌳🌷🌷🍁🍁good morning friends🌹🏵️💮🌺🌼🌲🌳🌷🌷🍁🍁
Nisha Singh Up
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bhajan sumadhur
बालासाहेब पाठक
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shri radhe
d.Sharma
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shubh prabhat hri om
Amit Kumar
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Jai Shree krisan
Pankaj Gupta
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कामेंट्स

Rajesh Tiwari Dec 3, 2017
जय श्रीराम बहुत सुंदर और सही वर्णन किया गया है

Raman Tiwari Dec 3, 2017
बहुत सुंदर वर्णन है

Ajnabi Dec 4, 2017
very nice good morning jay shree Radhe krishna veeruda

Yogesh Kumar Sharna Dec 4, 2017
भगवान भोलेनाथ आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें. ओम नमः शिवायः

prem Dec 4, 2017
JAI SITA RAM बहुत सुंदर जी V NICE

Ch: MANKCHAND Brala Dec 4, 2017
जय श्री राम जय श्री हनुमानजी सुप्रभात

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