Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 178*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 19*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना, बलि का वचन देना और शुक्राचार्य जी का उन्हें रोकना..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजा बलि के ये वचन धर्मभाव से भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान वामन ने बड़ी प्रसन्नता से उनका अभिननदन किया और कहा। *श्रीभगवान ने कहा- राजन! आपने जो कुछ कहा, वह आपकी कुल परम्परा के अनुरूप, धर्मभाव से परिपूर्ण, यश को बढ़ाने वाला और अत्यनत मधुर है। क्यों न हो, परलोकहितकारी धर्म के सम्बनध में आप भृगुपुत्र शुक्राचार्य को परम प्रमाण जो मानते हैं। साथ ही अपने कुलवृद्ध पितामह परमशान्त प्रह्लाद जी की आज्ञा भी तो आप वैसे ही मानते हैं। आपकी वंश परम्परा में कोई धैर्यहीन अथवा कृपण पुरुष कभी हुआ ही नहीं। ऐसा भी कोई नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मण को कभी दान न दिया हो अथवा जो एक बार किसी को कुछ देने की प्रतिज्ञा करके बाद में मुकर गया हो। दान के अवसर पर याचकों की याचना सुनकर और युद्ध के अवसर पर शत्रु के ललकारने पर उनकी ओर से मुँह मोड़ लेने वाला कायर आपके वंश में कोई भी नहीं हुआ। क्यों न हो, आपकी कुल परम्परा में प्रह्लाद अपने निर्मल यश से वैसे ही शोभायमान होते हैं, जैसे आकाश में चनद्रमा। *आपके कुल में ही हिरण्याक्ष जैसे वीर का जन्म हुआ था। वह वीर जब हाथ में गदा लेकर अकेला ही दिग्विजय के लिये निकला, तब सारी पृथ्वी में घूमने पर भी उसे अपनी जोड़ का कोई वीर न मिला। जब विष्णु भगवान जल में से पृथ्वी का उद्धार कर रहे थे, तब वह उनके सामने आया और बड़ी कठिनाई से उन्होंने उस पर विजय प्राप्त की। परन्तु उसके बहुत बाद भी उन्हें बार-बार हिरण्याक्ष की शक्ति और बल का स्मरण हो आया करता था और उसे जीत लेने पर भी वे अपने को विजयी नहीं समझते थे। जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु को उसके वध का वृत्तांत मालूम हुआ, तब वह अपने भाई का वध करने वाले को मार डालने के लिये क्रोध करके भगवान के निवास स्थान वैकुण्ठ धाम में पहुँचा। *विष्णु भगवान माया रचने वालों में सबसे बड़े हैं और समय को खूब पहचानते हैं। जब उन्होंने देखा कि हिरण्यकशिपु तो हाथ में शूल लेकर काल की भाँति मेरे ही ऊपर धावा कर रहा है, तब उन्होंने विचार किया। ‘जैसे संसार के प्राणियों के पीछे मृत्यु लगी रहती है-वैसे ही मैं जहाँ-जहाँ जाऊँगा, वहीं-वहीं यह मेरा पीछा करेगा। इसलिये मैं इसके हृदय में प्रवेश कर जाऊँ, जिससे यह मुझे देख न सके; क्योंकि यह तो बहिर्मुख है, बाहर की वस्तुएँ ही देखता है। *असुरशिरोमणे! जिस समय हिरण्यकशिपु उन पर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डर से काँपते हुए विष्णु भगवान ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणों के द्वारा नासिकों में से होकर हृदय में जा बैठे। हिरण्यकशिपु ने उनके लोक को भलीभाँति छान डाला, परन्तु उनका कहीं पता न चला। इस पर क्रोधित होकर वह सिंहनाद करने लगा। उस वीर ने पृथ्वी, स्वर्ग, दिशा, आकाश, पाताल और समुद्र-सब कहीं विष्णु भगवान को ढूँढा, परन्तु वे कहीं भी उसे दिखायी न दिये। *उनको कहीं न देखकर वह कहने लगा- मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोक में चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता। बस, अब उससे वैरभाव रखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैर तो देह के साथ ही समाप्त हो जाता है। क्रोध का कारण अज्ञान है और अहंकार से उसकी वृद्धि होती है। *राजन! आपके पिता प्रह्लादनन्दन विरोचन बड़े ही ब्राह्मण भक्त थे। यहाँ तक कि उनके शत्रु देवताओं ने ब्राह्मणों का वेष बनाकर उनसे उनकी आयु का दान माँगा और उन्होंने ब्राह्मणों के छल को जानते हुए भी अपनी आयु दे डाली। आप भी उसी धर्म का आचरण करते हैं, जिसका शुक्राचार्य आदि गृहस्थ ब्राह्मण, आपके पूर्वज प्रह्लाद और दूसरे यशस्वी वीरों ने पालन किया है। दैत्येनद्र! आप मुँहमाँगी वस्तु देने वालों में श्रेष्ठ हैं। इसी से मैं आपसे थोड़ी-सी पृथ्वी-केवल अपने पैरों से तीन डग माँगता हूँ। माना कि आप सारे जगत् के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान पुरुष को केवल अपनी आवश्यकता के अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पाप से बच जाता है। *राजा बलि ने कहा- 'ब्राह्मणकुमार! तुम्हारी बातें तो वृद्धों-जैसी हैं, परन्तु तुम्हारी बुद्धि अभी बच्चों की-सी ही है। अभी तुम हो भी तो बालक ही न, इसी से अपना हानि-लाभ नहीं समझ रहे हो। मैं तीनों लोकों का एकमात्र अधिपति हूँ और द्वीप-का-द्वीप दे सकता हूँ। जो मुझे अपनी वाणी से प्रसन्न कर ले और मुझसे केवल तीन डग भूमि माँगे-वह भी क्या बुद्धिमान कहा जा सकता है? ब्रह्मचारी जी! जो एक बार कुछ माँगने के लिये मेरे पास आ गया, उसे फिर कभी किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिये। अतः अपनी जीविका चलाने के लिये तुम्हें जितनी भूमि की आवश्यकता हो, उतनी मुझसे माँग लो।' *श्रीभगवान ने कहा- राजन! संसार के सब-के-सब प्यारे विषय एक मनुष्य की कामनाओं को भी पूर्ण करने में समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला-संतोषी न हो। जो तीन पग भूमि से संतोष नहीं कर लेता, उसे नौ वर्षों से युक्त एक द्वीप भी दे दिया जाये तो भी वह संतुष्ट नहीं हो सकता। क्योंकि उसके मन में सातों द्वीप पाने की इच्छा बनी ही रहेगी। *मैंने सुना है कि पृथु, गय आदि नरेश सातों द्वीपों के अधिपति थे; परन्तु उतने धन और भोग की सामग्रियों के मिलने पर भी वे तृष्णा का पार न पा सके। जो कुछ प्रारब्ध से मिल जाये, उसी से संतुष्ट हो रहने वाला पुरुष अपना जीवन सुख से व्यतीत करता है। परन्तु अपनी इन्द्रियों को वश में न रखने वाला तीनों लोकों का राज्य पाने पर भी दुःखी ही रहता है। क्योंकि उसके हृदय में असंतोष की आग धधकती रहती है। धन और भोगों से संतोष न होना ही जीव के जन्म-मृत्यु के चक्कर में गिरने का कारण है तथा जो कुछ प्राप्त हो जाये, उसी में संतोष कर लेना मुक्ति का कारण है। *जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तु से ही संतुष्ट हो रहता है, उसके तेज की वृद्धि होती है। उसके असंतोषी हो जाने पर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे जल से अग्नि। इसमें संदेह नहीं कि आप मुँहमाँगी वस्तु देने वालों में शिरोमणि हैं। इसलिये मैं आपसे केवल तीन पग भूमि ही माँगता हूँ। इतने से ही मेरा काम बन जायेगा। धन उतना ही संग्रह करना चाहिये, जितने की आवश्यकता हो। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- भगवान के इस प्रकार कहने पर राजा बलि हँस पड़े। उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है; जितनी तुम्हारी इच्छा हो, उतनी ही ले लो।’ यों कहकर वामन भगवान को तीन पग पृथ्वी का संकल्प करने के लिये उन्होंने जल पात्र उठाया। *शुक्राचार्य जी सब कुछ जानते थे। उनसे भगवान की यह लीला भी छिपी नहीं थी। उन्होंने राजा बलि को पृथ्वी देने के लिये तैयार देखकर उनसे कहा। *शुक्राचार्य जी ने कहा- 'विरोचनकुमार! ये स्वयं अविनाशी भगवान विष्णु हैं। देवताओं का काम बनाने के लिये कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से अवतीर्ण हुए हैं। तुमने यह अनर्थ न जानकर कि ये मेरा सब कुछ छीन लेंगे, इन्हें दान देने की प्रतिज्ञा ली है। यह तो दैत्यों पर बहुत बड़ा अन्याय होने जा रहा है। इसे मैं ठीक नहीं समझता। स्वयं भगवान ही अपनी योगमाया से यह ब्रह्मचारी बनकर बैठे हुए हैं। ये तुम्हारा राज्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, तेज और विश्वविख्यात कीर्ति-सब कुछ तुमसे छीनकर इन्द्र को दे देंगे। ये विश्वरूप हैं। तीन पग में ही तो ये सारे लोकों को नाप लेंगे। *मूर्ख! जब तुम अपना सर्वस्व ही विष्णु को दे डालोगे, तो तुम्हारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा। ये विश्वव्यापक भगवान एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लेंगे। इनके विशाल शरीर से आकाश भर जायेगा। तब इनका तीसरा पग कहाँ जायेगा? तुम उसे पूरा न कर सकोगे। ऐसी दशा में मैं समझता हूँ कि प्रतिज्ञा करके पूरा न कर पाने के कारण तुम्हें नरक में ही जाना पड़ेगा। क्योंकि तुम अपनी की हुई प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में सर्वथा असमर्थ होओगे। विद्वान पुरुष उस दान की प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन-निर्वाह के लिये कुछ बचे ही नहीं। जिसका जीवन-निर्वाह ठीक-ठीक चलता है-वही संसार में दान, यज्ञ, तप और परोपकार के कर्म कर सकता है। जो मनुष्य अपने धन को पाँच भागों में बाँट देता है-कुछ धर्म के लिये, कुछ यश के लिये, कुछ धन की अभिवृद्धि के लिये, कुछ भोगों के लिये और कुछ अपने स्वजनों के लिये-वही इस लोक और परलोक दोनों में ही सुख पाता है। *असुरशिरोमणे! यदि तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा टूट जाने की चिन्ता हो, तो मैं इस विषय में तुम्हें कुछ ऋग्वेद की श्रुतियों का आशय सुनाता हूँ, तुम सुनो। *श्रुति कहती है- ‘किसी को कुछ देने की बात स्वीकार कर लेना सत्य है और नकार जाना अर्थात् अस्वीकार कर देना असत्य है। यह शरीर एक वृक्ष है और सत्य इसका फल-फूल है। परन्तु यदि वृक्ष ही न रहे तो फल-फूल कैसे रह सकते हैं? क्योंकि नकार जाना, अपनी वस्तु दूसरे को न देना, दूसरे शब्दों में अपना संग्रह बचाये रखना-यही शरीररूप वृक्ष का मूल है। *जैसे जड़ न रहने पर वृक्ष सूखकर थोड़े ही दिनों में गिर जाता है, उसी प्रकार यदि धन देने से अस्वीकार न किया जाये तो यह जीवन सूख जाता है-इसमें सन्देह नहीं। ‘हाँ मैं दूँगा’-यह वाक्य ही धन को दूर हटा देता है। इसलिये इसका उच्चारण ही अपूर्ण अर्थात् धन से खाली कर देने वाला है। यही कारण है कि जो पुरुष ‘हाँ मैं दूँगा’-ऐसा कहता है, वह धन से खाली हो जाता है। *जो याचक को सब कुछ देना स्वीकार कर लेता है, वह अपने लिये भोग की कोई सामग्री नहीं रख सकता। इसके विपरीत ‘मैं नहीं दूँगा’-यह जो अस्वीकारात्मक असत्य है, वह अपने धन को सुरक्षित रखने तथा पूर्ण करने वाला है। परन्तु ऐसा सब समय नहीं करना चाहिये। *जो सबसे, सभी वस्तुओं के लिये नहीं करता रहता है, उसकी अपकीर्ति हो जाती है। वह तो जीवित रहने पर भी मृतक के समान ही है। स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिये, हास-परिहास में, विवाह में, कन्या आदि की प्रशंसा करते समय, अपनी जीविका की रक्षा के लिये, प्राण संकट उपस्थित होने पर, गौ और ब्राह्मण के हित के लिये तथा किसी को मृत्यु से बचाने के लिये असत्य-भाषण भी उतना निन्दनीय नहीं है। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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 🌸🙏*पोस्ट - 178*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸
                   🌸🙏*अध्याय - 19*🙏🌸
*इस अध्याय में भगवान वामन का बलि से तीन पग पृथ्वी माँगना, बलि का वचन देना और शुक्राचार्य जी का उन्हें रोकना.....

          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजा बलि के ये वचन धर्मभाव से भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान वामन ने बड़ी प्रसन्नता से उनका अभिननदन किया और कहा।
          *श्रीभगवान ने कहा- राजन! आपने जो कुछ कहा, वह आपकी कुल परम्परा के अनुरूप, धर्मभाव से परिपूर्ण, यश को बढ़ाने वाला और अत्यनत मधुर है। क्यों न हो, परलोकहितकारी धर्म के सम्बनध में आप भृगुपुत्र शुक्राचार्य को परम प्रमाण जो मानते हैं। साथ ही अपने कुलवृद्ध पितामह परमशान्त प्रह्लाद जी की आज्ञा भी तो आप वैसे ही मानते हैं। आपकी वंश परम्परा में कोई धैर्यहीन अथवा कृपण पुरुष कभी हुआ ही नहीं। ऐसा भी कोई नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मण को कभी दान न दिया हो अथवा जो एक बार किसी को कुछ देने की प्रतिज्ञा करके बाद में मुकर गया हो। दान के अवसर पर याचकों की याचना सुनकर और युद्ध के अवसर पर शत्रु के ललकारने पर उनकी ओर से मुँह मोड़ लेने वाला कायर आपके वंश में कोई भी नहीं हुआ। क्यों न हो, आपकी कुल परम्परा में प्रह्लाद अपने निर्मल यश से वैसे ही शोभायमान होते हैं, जैसे आकाश में चनद्रमा।
          *आपके कुल में ही हिरण्याक्ष जैसे वीर का जन्म हुआ था। वह वीर जब हाथ में गदा लेकर अकेला ही दिग्विजय के लिये निकला, तब सारी पृथ्वी में घूमने पर भी उसे अपनी जोड़ का कोई वीर न मिला। जब विष्णु भगवान जल में से पृथ्वी का उद्धार कर रहे थे, तब वह उनके सामने आया और बड़ी कठिनाई से उन्होंने उस पर विजय प्राप्त की। परन्तु उसके बहुत बाद भी उन्हें बार-बार हिरण्याक्ष की शक्ति और बल का स्मरण हो आया करता था और उसे जीत लेने पर भी वे अपने को विजयी नहीं समझते थे। जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु को उसके वध का वृत्तांत मालूम हुआ, तब वह अपने भाई का वध करने वाले को मार डालने के लिये क्रोध करके भगवान के निवास स्थान वैकुण्ठ धाम में पहुँचा।
          *विष्णु भगवान माया रचने वालों में सबसे बड़े हैं और समय को खूब पहचानते हैं। जब उन्होंने देखा कि हिरण्यकशिपु तो हाथ में शूल लेकर काल की भाँति मेरे ही ऊपर धावा कर रहा है, तब उन्होंने विचार किया। ‘जैसे संसार के प्राणियों के पीछे मृत्यु लगी रहती है-वैसे ही मैं जहाँ-जहाँ जाऊँगा, वहीं-वहीं यह मेरा पीछा करेगा। इसलिये मैं इसके हृदय में प्रवेश कर जाऊँ, जिससे यह मुझे देख न सके; क्योंकि यह तो बहिर्मुख है, बाहर की वस्तुएँ ही देखता है।
          *असुरशिरोमणे! जिस समय हिरण्यकशिपु उन पर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डर से काँपते हुए विष्णु भगवान ने अपने शरीर को सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणों के द्वारा नासिकों में से होकर हृदय में जा बैठे। हिरण्यकशिपु ने उनके लोक को भलीभाँति छान डाला, परन्तु उनका कहीं पता न चला। इस पर क्रोधित होकर वह सिंहनाद करने लगा। उस वीर ने पृथ्वी, स्वर्ग, दिशा, आकाश, पाताल और समुद्र-सब कहीं विष्णु भगवान को ढूँढा, परन्तु वे कहीं भी उसे दिखायी न दिये।
          *उनको कहीं न देखकर वह कहने लगा- मैंने सारा जगत् छान डाला, परन्तु वह मिला नहीं। अवश्य ही वह भ्रातृघाती उस लोक में चला गया, जहाँ जाकर फिर लौटना नहीं होता। बस, अब उससे वैरभाव रखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वैर तो देह के साथ ही समाप्त हो जाता है। क्रोध का कारण अज्ञान है और अहंकार से उसकी वृद्धि होती है।
          *राजन! आपके पिता प्रह्लादनन्दन विरोचन बड़े ही ब्राह्मण भक्त थे। यहाँ तक कि उनके शत्रु देवताओं ने ब्राह्मणों का वेष बनाकर उनसे उनकी आयु का दान माँगा और उन्होंने ब्राह्मणों के छल को जानते हुए भी अपनी आयु दे डाली। आप भी उसी धर्म का आचरण करते हैं, जिसका शुक्राचार्य आदि गृहस्थ ब्राह्मण, आपके पूर्वज प्रह्लाद और दूसरे यशस्वी वीरों ने पालन किया है। दैत्येनद्र! आप मुँहमाँगी वस्तु देने वालों में श्रेष्ठ हैं। इसी से मैं आपसे थोड़ी-सी पृथ्वी-केवल अपने पैरों से तीन डग माँगता हूँ। माना कि आप सारे जगत् के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान पुरुष को केवल अपनी आवश्यकता के अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पाप से बच जाता है।
          *राजा बलि ने कहा- 'ब्राह्मणकुमार! तुम्हारी बातें तो वृद्धों-जैसी हैं, परन्तु तुम्हारी बुद्धि अभी बच्चों की-सी ही है। अभी तुम हो भी तो बालक ही न, इसी से अपना हानि-लाभ नहीं समझ रहे हो। मैं तीनों लोकों का एकमात्र अधिपति हूँ और द्वीप-का-द्वीप दे सकता हूँ। जो मुझे अपनी वाणी से प्रसन्न कर ले और मुझसे केवल तीन डग भूमि माँगे-वह भी क्या बुद्धिमान कहा जा सकता है? ब्रह्मचारी जी! जो एक बार कुछ माँगने के लिये मेरे पास आ गया, उसे फिर कभी किसी से कुछ माँगने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिये। अतः अपनी जीविका चलाने के लिये तुम्हें जितनी भूमि की आवश्यकता हो, उतनी मुझसे माँग लो।'
          *श्रीभगवान ने कहा- राजन! संसार के सब-के-सब प्यारे विषय एक मनुष्य की कामनाओं को भी पूर्ण करने में समर्थ नहीं हैं, यदि वह अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला-संतोषी न हो। जो तीन पग भूमि से संतोष नहीं कर लेता, उसे नौ वर्षों से युक्त एक द्वीप भी दे दिया जाये तो भी वह संतुष्ट नहीं हो सकता। क्योंकि उसके मन में सातों द्वीप पाने की इच्छा बनी ही रहेगी।
          *मैंने सुना है कि पृथु, गय आदि नरेश सातों द्वीपों के अधिपति थे; परन्तु उतने धन और भोग की सामग्रियों के मिलने पर भी वे तृष्णा का पार न पा सके। जो कुछ प्रारब्ध से मिल जाये, उसी से संतुष्ट हो रहने वाला पुरुष अपना जीवन सुख से व्यतीत करता है। परन्तु अपनी इन्द्रियों को वश में न रखने वाला तीनों लोकों का राज्य पाने पर भी दुःखी ही रहता है। क्योंकि उसके हृदय में असंतोष की आग धधकती रहती है। धन और भोगों से संतोष न होना ही जीव के जन्म-मृत्यु के चक्कर में गिरने का कारण है तथा जो कुछ प्राप्त हो जाये, उसी में संतोष कर लेना मुक्ति का कारण है।
          *जो ब्राह्मण स्वयंप्राप्त वस्तु से ही संतुष्ट हो रहता है, उसके तेज की वृद्धि होती है। उसके असंतोषी हो जाने पर उसका तेज वैसे ही शान्त हो जाता है, जैसे जल से अग्नि। इसमें संदेह नहीं कि आप मुँहमाँगी वस्तु देने वालों में शिरोमणि हैं। इसलिये मैं आपसे केवल तीन पग भूमि ही माँगता हूँ। इतने से ही मेरा काम बन जायेगा। धन उतना ही संग्रह करना चाहिये, जितने की आवश्यकता हो। 
          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- भगवान के इस प्रकार कहने पर राजा बलि हँस पड़े। उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है; जितनी तुम्हारी इच्छा हो, उतनी ही ले लो।’ यों कहकर वामन भगवान को तीन पग पृथ्वी का संकल्प करने के लिये उन्होंने जल पात्र उठाया। 
          *शुक्राचार्य जी सब कुछ जानते थे। उनसे भगवान की यह लीला भी छिपी नहीं थी। उन्होंने राजा बलि को पृथ्वी देने के लिये तैयार देखकर उनसे कहा। 
          *शुक्राचार्य जी ने कहा- 'विरोचनकुमार! ये स्वयं अविनाशी भगवान विष्णु हैं। देवताओं का काम बनाने के लिये कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से अवतीर्ण हुए हैं। तुमने यह अनर्थ न जानकर कि ये मेरा सब कुछ छीन लेंगे, इन्हें दान देने की प्रतिज्ञा ली है। यह तो दैत्यों पर बहुत बड़ा अन्याय होने जा रहा है। इसे मैं ठीक नहीं समझता। स्वयं भगवान ही अपनी योगमाया से यह ब्रह्मचारी बनकर बैठे हुए हैं। ये तुम्हारा राज्य, ऐश्वर्य, लक्ष्मी, तेज और विश्वविख्यात कीर्ति-सब कुछ तुमसे छीनकर इन्द्र को दे देंगे। ये विश्वरूप हैं। तीन पग में ही तो ये सारे लोकों को नाप लेंगे। 
          *मूर्ख! जब तुम अपना सर्वस्व ही विष्णु को दे डालोगे, तो तुम्हारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा। ये विश्वव्यापक भगवान एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लेंगे। इनके विशाल शरीर से आकाश भर जायेगा। तब इनका तीसरा पग कहाँ जायेगा? तुम उसे पूरा न कर सकोगे। ऐसी दशा में मैं समझता हूँ कि प्रतिज्ञा करके पूरा न कर पाने के कारण तुम्हें नरक में ही जाना पड़ेगा। क्योंकि तुम अपनी की हुई प्रतिज्ञा को पूर्ण करने में सर्वथा असमर्थ होओगे। विद्वान पुरुष उस दान की प्रशंसा नहीं करते, जिसके बाद जीवन-निर्वाह के लिये कुछ बचे ही नहीं। जिसका जीवन-निर्वाह ठीक-ठीक चलता है-वही संसार में दान, यज्ञ, तप और परोपकार के कर्म कर सकता है। जो मनुष्य अपने धन को पाँच भागों में बाँट देता है-कुछ धर्म के लिये, कुछ यश के लिये, कुछ धन की अभिवृद्धि के लिये, कुछ भोगों के लिये और कुछ अपने स्वजनों के लिये-वही इस लोक और परलोक दोनों में ही सुख पाता है। 
          *असुरशिरोमणे! यदि तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा टूट जाने की चिन्ता हो, तो मैं इस विषय में तुम्हें कुछ ऋग्वेद की श्रुतियों का आशय सुनाता हूँ, तुम सुनो। 
          *श्रुति कहती है- ‘किसी को कुछ देने की बात स्वीकार कर लेना सत्य है और नकार जाना अर्थात् अस्वीकार कर देना असत्य है। यह शरीर एक वृक्ष है और सत्य इसका फल-फूल है। परन्तु यदि वृक्ष ही न रहे तो फल-फूल कैसे रह सकते हैं? क्योंकि नकार जाना, अपनी वस्तु दूसरे को न देना, दूसरे शब्दों में अपना संग्रह बचाये रखना-यही शरीररूप वृक्ष का मूल है।
          *जैसे जड़ न रहने पर वृक्ष सूखकर थोड़े ही दिनों में गिर जाता है, उसी प्रकार यदि धन देने से अस्वीकार न किया जाये तो यह जीवन सूख जाता है-इसमें सन्देह नहीं। ‘हाँ मैं दूँगा’-यह वाक्य ही धन को दूर हटा देता है। इसलिये इसका उच्चारण ही अपूर्ण अर्थात् धन से खाली कर देने वाला है। यही कारण है कि जो पुरुष ‘हाँ मैं दूँगा’-ऐसा कहता है, वह धन से खाली हो जाता है। 
          *जो याचक को सब कुछ देना स्वीकार कर लेता है, वह अपने लिये भोग की कोई सामग्री नहीं रख सकता। इसके विपरीत ‘मैं नहीं दूँगा’-यह जो अस्वीकारात्मक असत्य है, वह अपने धन को सुरक्षित रखने तथा पूर्ण करने वाला है। परन्तु ऐसा सब समय नहीं करना चाहिये। 
          *जो सबसे, सभी वस्तुओं के लिये नहीं करता रहता है, उसकी अपकीर्ति हो जाती है। वह तो जीवित रहने पर भी मृतक के समान ही है। स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिये, हास-परिहास में, विवाह में, कन्या आदि की प्रशंसा करते समय, अपनी जीविका की रक्षा के लिये, प्राण संकट उपस्थित होने पर, गौ और ब्राह्मण के हित के लिये तथा किसी को मृत्यु से बचाने के लिये असत्य-भाषण भी उतना निन्दनीय नहीं है।
                             ~~~०~~~
                   *श्रीकृष्ण  गोविन्द  हरे मुरारे।
                   *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥
                           "जय जय श्री हरि"
                          🌸🌸🙏🌸🌸
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कामेंट्स

जितेन्द्र दुबे Apr 15, 2021
🚩🌹🥀जय श्री मंगलमूर्ति गणेशाय नमः 🌺🌹💐🚩🌹🌺 शुभ रात्रि वंदन🌺🌹 राम राम जी 🌺🚩🌹मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱 🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम नमो नारायण हरि ऊँ तत्सत परब्रह्म परमात्मा नमः ॐ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमो नमःऊँ माँ ब्रम्हचारिणी नमः🌺🚩 ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः🌺 ऊँ राम रामाय नमः 🌻🌹ऊँ सीतारामचंद्राय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः🌹🌺🌹 ॐ हं हनुमते नमः 🌻ॐ हं हनुमते नमः🌹🥀🌻🌺🌹ॐ शं शनिश्चराय नमः 🚩🌹🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩🌻 जय श्री राधे कृष्णा जी🌹 श्री जगत पिता परम परमात्मा श्री हरि विष्णु जी माता लक्ष्मी माता चंद्रघंटा की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे 🌹 आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩🌺हर हर महादेव🚩राम राम जी 🥀शुभ रात्रि स्नेह वंदन💐शुभ गुरुवार🌺 हर हर महादेव 🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩 जय माता दी जय श्री राम 🚩 🚩हर हर नर्मदे हर हर नर्मदे 🌺🙏🌻🙏🌻🥀🌹🚩🚩🚩

RAJ RATHOD Apr 15, 2021
🚩🚩जय माता दी 🚩🚩 शुभ रात्रि वंदन जी 🙏🙏

Ranveer soni Apr 15, 2021
🌹🌹जय श्री कृष्णा🌹🌹

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 15, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शूभ प्रभात वंदन जी आपका हर पल शूभ मंगल हों जी 🌹🌹🌹👏👏👏👏👏🌷🌷🌷👌🏼👌🏼👌🏼

भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह अवतार की कथा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वराह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से तृतीय अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया को अवतरित हुए। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ने जब दिति के गर्भ से जुड़वां रूप में जन्म लिया, तो पृथ्वी कांप उठी। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों पैदा होते ही बड़े हो गए। और अपने अत्याचारों से धरती को कपांने लगते हैं। यद्यपि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों बलवान थे, किंतु फिर भी उन्हें संतोष नहीं था। वे संसार में अजेयता और अमरता प्राप्त करना चाहते थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए बहुत बड़ा तप किया। उनके तप से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए ,ब्रह्मा जी से अजेयता और अमरता का वरदान पाकर हिरण्याक्ष उद्दंड और स्वेच्छाचारी बन गया। वह तीनों लोकों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा। हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। वह हाथ में गदा लेकर इन्द्रलोक में जा पहुंचा। देवताओं को जब उसके पहुंचने की ख़बर मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। देखते ही देखते समस्त इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष वरुण की राजधानी विभावरी नगरी में जा पहुंचा। वरुण ने बड़े शांत भाव से कहा - तुम महान योद्धा और शूरवीर हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहां? तीनों लोकों में भगवान विष्णु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे युद्ध कर सके। अतः उन्हीं के पास जाओ। वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा शांत करेंगे। वरुण का कथन सुनकर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु की खोज में समुद्र के नीचे रसातल में जा पजुंचा। रसातल में पहुंचकर उसने एक विस्मयजनक दृश्य देखा। उसने देखा, एक वराह अपने दांतों के ऊपर धरती को उठाए हुए चला जा रहा है। हिरण्याक्ष वराह को लक्ष्य करके बोल उठा,तुम अवश्य ही भगवान विष्णु हो। धरती को रसातल से कहां लिए जा रहे हो? यह धरती तो दैत्यों के उपभोग की वस्तु है। इसे रख दो। तुम अनेक बार देवताओं के कल्याण के लिए दैत्यों को छल चुके हो। आज तुम मुझे छल नहीं सकोगे। फिर भी भगवान विष्णु शांत ही रहे। उनके मन में रंचमात्र भी क्रोध पैदा नहीं हुआ। वे वराह के रूप में अपने दांतों पर धरती को लिए हुए आगे बढ़ते रहे। हिरण्याक्ष भगवान वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया। उन्होंने रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया। हिरण्याक्ष उनके पीछे लगा हुआ था। अपने वचन-बाणों से उनके हृदय को बेध रहा था। भगवान विष्णु ने धरती को स्थापित करने के पश्चात हिरण्याक्ष की ओर ध्यान दिया। उन्होंने हिरण्याक्ष की ओर देखते हुए कहा,तुम तो बड़े बलवान हो। बलवान लोग कहते नहीं हैं, करके दिखाते हैं। तुम तो केवल प्रलाप कर रहे हो। मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। तुम क्यों नहीं मुझ पर आक्रमण करते? बढ़ो आगे, मुझ पर आक्रमण करो। हिरण्याक्ष की रगों में बिजली दौड़ गई। वह हाथ में गदा लेकर भगवान विष्णु पर टूट पड़ा। भगवान के हाथों में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं था। उन्होंने दूसरे ही क्षण हिरण्याक्ष के हाथ से गदा छीनकर दूर फेंक दी। हिरण्याक्ष क्रोध से उन्मत्त हो उठा। वह हाथ में त्रिशूल लेकर भगवान विष्णु की ओर झपटा। भगवान विष्णु ने शीघ्र ही सुदर्शन का आह्वान किया, चक्र उनके हाथों में आ गया। उन्होंने अपने चक्र से हिरण्याक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। भगवान विष्णु के हाथों मारे जाने के कारण हिरण्याक्ष बैकुंठ लोक में चला गया। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Vinay Mishra May 6, 2021

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Ramesh Agrawal May 7, 2021

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 07 राजा पुरुयशा को भगवान् का दर्शन, उनके द्वारा भगवत्स्तुति और भगवान् के वरदान से राजा की सायुज्य मुक्ति - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - श्रुतदेव कहते हैं- परमात्मा भगवान् नारायण चार भुजाओं से सुशोभित थे उन्होंने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। वे पीताम्बर धारण करके वनमाला से विभूषित थे। भगवती लक्ष्मी तथा एक पार्षद के साथ गरुड़ की पीठ पर विराजित थे। उनका दुःसह तेज देखकर राजा के नेत्र सहसा मुँद गये। उनके सब अंगों में रोमांच हो आया और नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। भगवद्दर्शन के आनन्द में उनका हृदय सर्वथा डूब गया। उन्होंने तत्काल आगे बढ़कर भगवान् को साप्टांग प्रणाम किया; फिर प्रेम-विह्वल नेत्रों से विश्वात्मदेव जगदीश्वर श्रीहरि को बहुत देर तक निहार कर उनके चरण धोये और उस जल को अपने मस्तक पर धारण किया। उन्हीं चरणों की धोवनरूपा श्रीगंगाजी ब्रह्माजी सहित तीनों लोकों को पवित्र करती हैं। तत्पश्चात् राजा ने महान् वैभव से, बहुमूल्य वस्त्र आभूषण और चन्दन से, हार, धूप, दीप तथा अमृत के समान नैवेद्य के निवेदन आदि से एवं अपने तन, मन, धन और आत्मा का समर्पण करके अद्वितीय पुराणपुरुष भगवान् विष्णु का पूजन किया पूजा के बाद इस प्रकार स्तुति की-'जो निर्गुण, निरंजन एवं प्रजापतियों के भी अधीश्वर हैं, ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता जिनकी वन्दना करते रहते हैं, उन परम पुरुष भगवान् श्रीहरि को मैं प्रणाम करता हूँ। शरणागतों की पापराशि का नाश करने वाले आपके चरणारविन्दों को परिपक्व योग वाले योगियों ने जो अपने हृदय में धारण किया है, यह उनके लिये बड़े सौभाग्य की बात है। बढ़ी हुई भक्ति के द्वारा अपने अन्त:करण तथा जीव भाव को भी आपके चरणों में ही चढ़ाकर वे योगीजन उन चरणों के चिन्तन मात्र से आपके धाम को प्राप्त हुए हैं। विचित्र कर्म करने वाले! आप स्वतन्त्र परमेश्वर को नमस्कार है। साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने वाले ! आप परमात्मा को प्रणाम है। प्रभो ! आपकी माया से मोहित होकर मैं स्त्री और धनरूपी विषयों में ही भटकता रहा हूँ, अनर्थ में ही मेरी अर्थदृष्टि हो गयी थी प्रभो ! विश्वमूर्ते ! जब जीव पर आप अनन्त शक्ति परमेश्वर की कृपा होती है, तभी उसे महापुरुषों का संग प्राप्त होता है, जिससे यह संसार समुद्र गोपद के समान हो जाता है। ईश्वर ! जब सत्संग मिलता है, तभी आप में मन तथा बुद्धि का अनुराग होता है। मेरा समस्त राज्य जो मुझसे छिन गया था, वह भी आपका मुझ पर महान् अनुग्रह हो हुआ था, ऐसा मैं मानता हूँ। मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न पुत्र आदि की इच्छा रखता हूँ और न कोष की ही अभिलाषा करता हूँ। अपितु मुनियों के द्वारा ध्यान करने योग्य जो आपके आराधनीय चरणारविन्द हैं, उन्हीं का नित्य सेवन करना चाहता हूँ। देवेश्वर जगन्निवास! मुझ पर प्रसन्न होइये, जिससे आपके चरण कमलों की स्मृति बराबर बनी रहे। तथा स्त्री, पुत्र, खजाना एवं आत्मीय कहे जाने वाले सब पदार्थो में जो मेरी आसक्ति है, वह सदा के लिये दूर हो जाय। भगवन् ! मेरा मन सदा आपके चरणारविन्दों के चिन्तन में लगा रहे, मेरी वाणी आपकी दिव्य कथा के निरन्तर वर्णन में तत्पर हो, मेरे ये दोनों नेत्र आपके श्रीविग्रह के दर्शन में, कान कथा श्रवण में तथा रसना आपके भोग लगाये हुए प्रसाद के आस्वादन में प्रवृत्त हो। प्रभो ! मेरी नासिका आपके चरणकमलों की तथा आपके भक्तजनों के गन्ध-विलेपन आदि की सुगन्ध लेने में, दोनों हाथ आपके मन्दिर में झाडू देने आदि की सेवा में, दोनों पैर आपके तीर्थ और कथास्थान की यात्रा करने में तथा मस्तक निरन्तर आपको प्रणाम करने में संलग्न रहें। मेरी कामना आपकी उत्तम कथा में और बुद्धि अहर्निश आपका चिन्तन करने में तत्पर हो। मेरे घर पर पधारे हुए मुनियों द्वारा आपकी उत्तम कथा का वर्णन तथा आपकी महिमा का गान होता रहे और इसी में मेरे दिन बीतें, विष्णो! एक क्षण तथा आधे पल के लिये भी ऐसा प्रसंग न उपस्थित हो, जो आपकी चर्चा से रहित हो। हरे! मैं परमेष्ठी ब्रह्मा का पद, भूतल का चक्रवर्ती राज्य और मोक्ष भी नहीं चाहता, केवल आपके चरणों की निरन्तर सेवा चाहता हूँ, जिसके लिये लक्ष्मीजी तथा ब्रह्मा, शंकर आदि देवता भी सदा प्रार्थना किया करते हैं। राजा के इस प्रकार स्तुति करने पर कमलनयन भगवान् विष्णु ने प्रसन्न हो मेघ के समान गम्भीर वाणी में इस प्रकार कहा-'राजन् ! मैं जानता हूँ-तुम मेरे श्रेष्ठ भक्त हो, कामना रहित और निष्पाप हो। नरेश्वर ! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो और अन्त में तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करो। तुम्हारे द्वारा किये हुए इस स्तोत्र से इस पृथ्वी पर जो लोग स्तुति करेंगे, उनके ऊपर सन्तुष्ट हो मैं उन्हें भोग और मोक्ष प्रदान करूँगा। यह अक्षय तृतीया इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध होगी, जिसमें भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हुआ। जो मनुष्य इस तिथि को किसी भी बहाने से अथवा स्वभाव से ही स्नान, दान आदि क्रियाएँ करते हैं, वे मेरे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य पितरों के उद्देश्य से अक्षय तृतीया को श्राद्ध करते हैं, उनका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होता है। इस तिथि में थोड़ा-सा भी जो पुण्य किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है। नृपश्रेष्ठ ! जो कुटुम्बी ब्राह्मण को गाय दान करता है, उसके हाथ में सब सम्पत्तियों की वर्षा करने वाली भुक्ति और मुक्ति भी आ जाती है। जो वैशाख मास में मेरा प्रिय करने वाले धर्मो का अनुष्ठान करता है उसके जन्म, मृत्यु, जरा, भय और पाप को मैं हर लेता हूँ। अनघ! यह वैशाख मास मेरे चरण-चिन्तन की ही भाँति ऐसे सहस्रों पापों को हर लेता है, जिनके लिये शास्त्रों में कोई प्रायश्चित्त नहीं मिलता है। राजा को यह वरदान देकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजा पुरुयशा सदा भगवान् में ही मन लगाये हुए उन्हीं की सेवा में तत्पर रहकर इस पृथ्वी का पालन करने लगे। देवदुर्लभ समस्त मनोरथों का उपभोग करके अन्त में उन्होंने चक्रधारी भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लिया। जो इस उत्तम उपाख्यान को सुनते और सुनाते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो भगवान् विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************

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