Asha Shrivastava
Asha Shrivastava Jan 20, 2021

एक छोटे बच्चे के जबाव सुनो बहुत सुंदर जबाव दिया है जय हो श्री राधे कृष्णा जी आप को कोटी कोटी प्रणाम राधे राधे

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कामेंट्स

Asha Shrivastava Jan 20, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शुभ प्रभात जी

Manoj Gupta AGRA Jan 20, 2021
jai shree radhe krishna ji 🙏🙏🌷🌸💐🌀 shubh prabhat vandan ji 🙏🙏🌷

आशुतोष Jan 20, 2021
🕉 श्री गणेशाय नमः 🙏 श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय... ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻ 🙏 🌹 जय श्री कृष्णा 🌹🙏 मंगल दिवस की शुभकामनाएँ...

Seema Sharma. Himachal (chd) Jan 20, 2021
गोविंद सिंहजी का कला-साहित्‍य के प्रति अगाध प्रेम था। उन्‍होंने ही संगीत वाद्ययंत्र दिलरुबा का अविष्‍कार किया था। इसका इस्‍तेमाल कई संगीतकारों ने भी किया है। बताया जाता है कि गुरु गोविंद सिंह जी के दरबार में तकरीबन 52 कवि थे।😊🙏 शुभ प्रभात जी 🙏 गुरु गोविंद सिंह जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

संजीव शर्मा Jan 20, 2021
वैक्सीन की वर्तमान स्थिति: "मिलो ना तुम तो हम घबराए.................... मिलो तो आंख चुराए, हमे क्या हो गया है" 😂😂😂😂😂😂😂😂

ramkumarverma Mar 1, 2021

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (उपशम-प्रकरण) (नवासीवा दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः चित्तके स्पन्दन से होने वाली जगत् की भ्रान्ति, चित्त और प्राण स्पन्दन का स्वरूप तथा उसके निरोधरूप योग की सिद्धि के अनेक उपाय...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं--श्रीराम ! जैसे रात्रि में जलती हुई लुकाठी को गोल घुमाने से अग्निमय चक्र असत् होते हुए भी सत्-सा दिखायी पड़ता है, वैसे ही चित्त के संकल्प से असत् जगत् सत्-सा दिखायी पड़ता है। जैसे जल के चारों ओर घूमने से जल से पृथक् गोल—नाभि के आकार का आवर्त (भँवर ) दिखायी पड़ता है, वैसे ही चित्त के संकल्प विकल्प से जगत् दिखायी पड़ता है । जैसे आकाश में नेत्रों के दोष से असत् मोर के पंख और मोती के समूह सत्य-से दिखायी पड़ते हैं, वैसे ही चित्त के संकल्प से असत् जगत् सत्य-सा दिखायी पड़ता है । रघुनन्दन ! जैसे शुक्लव और हिम, जैसे तिल और तेल, जैसे पुष्प और सुगन्ध तथा जैसे अग्नि और उष्णता एक दूसरे से मिले हुए और अभिन्नरूप हैं, वैसे ही चित्त और संकल्प एक दूसरे से मिले हुए और अभिन्न रूप हैं । उनके भेद की केवल मिथ्या कल्पना की गयी है । चित्त के विनाश के लिये दो उपाय शास्त्रों में दिखलाये गये हैं-एक योग और दूसरा ज्ञान । चित्तवृत्ति का निरोध योग और परमात्मा का यथार्थ अपरोक्ष साक्षात्कार ही ज्ञान है । श्रीरामजी ने पूछा--ब्रह्मन् ! प्राण और अपान के निरोधरूप योग नाम की किस युक्ति से और कब मन अनन्त सुख को देनेवाली परम शान्ति को प्राप्त करता है ! श्रीवसिष्ठजी ने कहा-श्रीराम ! जैसे जल पृथ्वी में चारों ओर से प्रवेश करके व्याप्त होता है, वैसे ही इस देह में विद्यमान असंख्य नाडियों में चारों ओर से जो वायु प्रवेश करके व्याप्त होता है, वह प्राणवायु है। स्पन्दन के कारण भीतर क्रिया के वैचित्र्य को प्राप्त हुए उसी प्राणवायु के अपान आदि नामों की योगी-विवेकी पुरुषों ने कल्पना की है। जैसे सुगंध पुष्प तथा जैसे शुक्ता का हिम आधार है, ने वैसे ही चित्त का यह प्राण आधार है । प्राण के स्पन्दन से चित्त का स्पन्दन होता है और चित्त के स्पन्दन से ही में पदार्थो की अनुभूतियाँ होती हैं, जिस प्रकार जल के स्पन्दन से - चक्र की तरह गोल आकार की रचना करने वाली लहरें में उत्पन्न होती है चित्त का स्पन्दन प्राण-स्पन्दन के अधीन है। अतः प्राण का निरोध करने पर मन अवश्य उपशान्त (निरुद्ध ) हो जाता है—यह बात वेद-शास्त्रों को जानने वाले विद्वान् कहते हैं । मन के संकल्प का अभाव हो जाने पर यह संसार विलीन हो जाता है। श्रीरामजी ने पूछा-महाराज ! देहरूपी घर में स्थित - हृदयादि स्थानों में विद्यमान नाडी रूपी छिद्रों में निरन्तर - संचरण करने वाले तथा मुख, नासिका आदि छिद्रों में निरन्तर गमनागमनशील प्राण आदि वायुओं का स्पन्दन कैसे रोका जा सकता है ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा--श्रीराम ! शास्त्रों के अभ्ययन, । सत्पुरुषों के सङ्ग, वैराग्य और अभ्यास से सांसारिक दृश्य पदार्थो में सत्ता का अभाव समझ लेने पर चिरकालपर्यन्त - एकतानता पूर्वक अपने इष्टदेव के ध्यान से और एक सच्चिदा- नन्दधन परमात्मा के स्वरूप में स्थिति के लिये तीन अभ्यास से न प्राणों का स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है । सुखपूर्वक रेचक, न पूरक और कुम्भक आदि प्राणायामों के दृढ़ अभ्यास से तथा एकान्त ध्यानयोग से प्राणवायु निरुद्र हो जाता है । ॐकार का उच्चारण और ॐकार के अर्थ का चिन्तन करने से बाह्य विषयों के ज्ञान का अभाव हो जाने पर प्राण वायु का स्पन्दन रुक जाता है । रेचक प्राणायाम का दृढ़ अभ्यास करने से विशाल प्राणवायु के बाह्य आकाश में स्थित हो जाने पर नासिका के छिद्रों को जब प्राणवायु स्पर्श नहीं करता, तब प्राणवायु का स्पन्दन रुक जाता है । इसी का नाम बाह्यकुम्भक प्राणायाम है । पूरक का दृढ़ अभ्यास करते-करते पर्वत पर मेघों की तरह हृदय में प्राणों के स्थित हो जाने पर जब प्राणों का संचार शान्त हो जाता है, तब प्राण-स्पन्दन रुक जाता है । इसी का नाम आभ्यन्तर कुम्भक प्राणायाम है । कुम्भ की तरह कुम्भक प्राणायाम के अनन्त काल तक स्थिर होने पर और अभ्यास से प्राण का निश्चल स्तम्भन हो जाने पर प्राणवायु के स्पन्दन का निरोध हो जाता है । इसी का नाम स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है । जिह्वा के द्वारा तालु के मध्यभाग में रहने वाली घण्टिका को प्रयत्नपूर्वक स्पर्श करने से जब प्राण ऊर्ष्वरन्ध्र में (ब्रह्रन्ध अर्थात् कपाल-कुहर में, जो सुषुम्णा के ऊपरी भाग का द्वार कहा जाता है) प्रविष्ट हो जाता है, तब प्राणवायु का स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है। समस्त संकल्प-विकल्पों से रहित होने पर कोई भी नाम-रूप नहीं रहता, तब अत्यन्त सूक्ष्म चिन्मय आकाश रूप परमात्मा के ध्यान से बाह्याभ्यन्तर सारे विषयों के विलीन हो जाने पर प्राणवायु का स्पन्दन निरुद्ध हो जाता है । नासिका के अग्रभाग से लेकर बारह अंगुल पर्यन्त निर्मल आकाशभाग में नेत्रों की लक्ष्यभूत संवित् ष्टि ( वृत्तिज्ञान )- के शान्त हो जाने पर अर्थात् नेत्र और मन की वृत्ति को रोकने से प्राण का स्पंदन निरुद्ध हो जाता है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 16 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्रभो! मैं एक प्राचीन इतिहास सुन चुकी हूँ-पाण्डव वन में रहते थे। मुनियों का पावन आश्रम ही उनका स्थान था। साथ में देवी द्रौपदी थी। पाँचों भाई पाण्डव एक दिन शिकार खेलने चले गये। केवल द्रौपदी मुनियों के उस पावन आश्रम पर रह गयी। वहाँ धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रि के वंशज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्रीत, यज्ञकृत् तथा इनके अतिरिक्त भी बहुत-से पुण्यात्मा मुनि उस पावन आश्रम पर विराजमान थे उन सबने वेदध्वनि आरम्भ कर दी थी। मुनिजी! वह आश्रम मुनियों से खचाखच भरा था। अपनी दासियों के साथ सुन्दरी द्रौपदी निर्भय होकर समय व्यतीत कर रही थी। उसी समय सिन्धुदेश का समृद्धिशाली नरेश राजा जयद्रथ अपनी सेना के सहित उसी मार्ग से कहीं जा रहा था। वेदध्वनि सुनकर वह मुनि के आश्रम के पास आ गया। पुण्यात्मा मुनियों की वेदध्वनि सुनते ही राजा जयद्रथ रथ से तुरंत उतरा और उनके दर्शन करने की अभिलाषा से वहाँ आ पहुँचा। जब राजा जयद्रथ आश्रम में आया तब उसके साथ दो नौकर थे। मुनियों को वेद पाठमें संलग्न देखकर वह वहीं बैठ गया। प्रभो! मुनिमण्डली से भरे-पूरे उस आश्रम में वह राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ समय तक बैठा रहा। इतने में वहाँ बैठे हुए उस नरेश को देखने के लिये बहुत-सी स्त्रियाँ तथा मुनिभार्याएँ भी चली आयीं। उनके मुंह से 'यह कौन है'- निकल रहा था। उन स्त्रियों के समाज में देवी द्रौपदी भी थी। वह सुन्दरता के कारण एक दूसरी लक्ष्मी के समान जान पड़ती थी। उस पर जयद्रथ की दृष्टि पड़ गयी। किसी देवकन्या की भाँति शोभा पानेवाली उस सुन्दरी द्रौपदी को देखकर जयद्रथ ने धौम्य मुनि से पूछा-'यह सुन्दर मुखवाली तथा श्यामवर्ण से सुशोभित कौन स्त्री है? यह सुकुमारी किसकी पत्नी है, इसके पिता कौन हैं और इसका क्या नाम है? द्विजदेव! यह राजरानी-जैसी जान पड़ती है; मुनि-पत्नी ऐसी नहीं हो सकती। धौम्य बोले-सिन्धुदेश पर शासन करने वाले महाराज! यह पाण्डवों की प्रेयसी भार्या देवी द्रौपदी है। इस पांचाल-राजकुमारी में सभी शुभ लक्षण विद्यमान हैं। इस समय यह इसी उत्तम आश्रम पर रहती है। जयद्रथ ने पूछा-विख्यात पराक्रमी वे शूरवीर पाँचों पाण्डव कहाँ गये हैं? क्या इस समय वे महाबली योद्धा निश्चिन्त होकर इसी वन में ठहरे हैं? धौम्यजी ने कहा-वे पाँचों पाण्डव वन में गये हैं। शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे। धौम्यमुनि की बात सुनकर राजा जयद्रथ उठा और द्रौपदी के पास जाकर उसे उसने प्रणाम किया और यह वचन बोला-'सुन्दरी! तुम्हारा कल्याण हो। इस समय वे तुम्हारे पतिदेव कहाँ गये? निश्चय ही आज तुम्हें वन में ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गये हैं।' तब द्रौपदी ने उत्तर दिया-'राजकुमार! आपका कल्याण हो। आश्रम के पास ठहरिये। अभी पाण्डव आ रहे हैं।' द्रौपदी के इस प्रकार कहने पर अत्यन्त लोभ से आक्रान्त उस पापी नरेश ने मुनियों का अपमान करके देवी द्रौपदी को हर लेना चाहा। अत: बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि सर्वथा किसी के विश्वास पर निर्भर न हो जाय। हर किसी पर विश्वास करने वाला जन दुःख पाता है। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ चतुर्थः स्कन्ध: अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः पुरञ्जनोपाख्यान का तात्पर्य...(भाग 3)〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः । शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत् ।। २५ यदाऽऽत्मानमविज्ञाय भगवन्तं परं गुरुम् । पुरुषस्तु विषज्जेत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥ २६ गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेऽवशः। शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथाकर्माभिजायते ।। २७ शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति कर्हिचित् । दुःखोदर्कान् क्रियायासांस्तमः शोकोत्कटान् क्वचित् ॥ २८ क्वचित्पुमान् क्ृचिच्च स्त्री, क्वचित्रोभयमन्धीः । देवो मनुष्यस्तिर्यगवा यथाकर्मगुणं भवः ॥ २९ क्षुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् । चरन् विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ।। ३० तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन्। उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥ ३१ दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु । जीवस्य न व्यवच्छेदः स्याच्े््तप्रतिक्रिया ॥ ३२ यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्वहन् । तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रियाः ॥ ३३ नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम्। द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ।। ३४ अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३५ अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा । संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ।॥ ३६ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ वस्तुतः तो वह निर्गुण है, किन्तु प्राण, इन्द्रिय और मन के धर्मो को अपने आरोपित कर मैं-मेरे पन के अभिमान से बँधकर क्षुद्र विषयों का चिन्तन करता हुआ तरह-तरह के कर्म करता रहता है ।। २५ ॥ यह यद्यपि स्वयंप्रकाश है, तथापि जबतक सबके परमगुरु आत्मस्वरूप श्रीभगवान् के स्वरूप को नहीं जानता, तबतक प्रकृति के गुणों में ही बँधा रहता है। २६ । उन गुणों का अभिमानी होने से वह विवश होकर सात्विक, राजस और तामस कर्म करता है तथा उन कर्म अनुसार भित्र-भित्र योनियों में जन्म लेता है ।। २७ ॥ वह कभी तो सात्विक कर्मकि द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्म के द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकों में जाता है जहाँ उसे तरह-तरह के कर्मो का क्लेश उठाना पड़ता है और कभी तमोगुणी कर्म के द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियों में जन्म लेता है। २८ ॥ इस प्रकार अपने कर्म और गुणों के अनुसार देवयोनि, मनुष्ययोनि अथवा पशु-पक्षीयोनि में जन्म लेकर वह अज्ञानान्ध जीव कभी पुरुष, कभी स्त्री और कभी नपुंसक होता है।। २९ ॥ जिस प्रकार बेचारा भूख से व्याकुल कुत्ता दर-दर भटकता हुआ अपने प्रारब्धानुसार कहीं डंडा खाता है और कहीं भात खाता है. उसी प्रकार यह जीव चित्त में नाना प्रकार की वासनाओं को लेकर ऊँचे-नीचे मार्ग से ऊपर, नीचे अथवा मध्य के लोकों में भटकता हुआ अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगता रहता है। ३० ३१।। आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक इन तीन प्रकार के दुखो में से किसी भी एक से जीवका सर्वथा छुटकारा नहीं दुः हो सकता। यदि कभी वैसा जान पड़ता है तो वह केवल तात्कालिक निवृत्ति ही है।। ३२ ॥ वह ऐसी ही है जैसे कोई सिरपर भारी बोझा ढोकर ले जाने वाला पुरुष उसे कंधे पर रख ले । इसी तरह सभी प्रतिक्रिया (दुःखनिवृत्ति) जाननी चाहिये-यदि किसी उपाय से मनुष्य एक प्रकार के दुःख से छुट्टी पाता है, तो दूसरा दुःख आकर उसके सिर पर सवार हो जाता है। ३३॥ शुद्धहदय नरेन्द्र ! जिस प्रकार स्वप्र में होने वाला स्वप्नान्तर उस स्वप्र से सर्वथा छूटने का उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफलभोग से सर्वथा छूटने का उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफल भोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं । ३४ ॥ जिस प्रकार स्वप्रावस्था में अपने मनोमय लिङ्गशरीर से विचरने वाले प्राणी के स्वप्र के पदार्थ न होने पर भी भासते हैं, उसी प्रकार ये दृश्यपदार्थ वस्तुतः न होने पर भी, जबतक अज्ञान-निद्रा नहीं टूटती, बने ही रहते हैं और जीव को जन्म-मरणरूप संसार से मुक्ति नहीं मिलती। (अतः इनकी आत्यन्तिक निवृत्ति का उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है) । ३५ ।। राजन् ! जिस अविद्या के कारण परमार्थ स्वरूप आत्मा को यह जन्म-मरणरूप अनर्थपरम्परा प्राप्त हुई है, उसकी निवृत्ति गुरुस्वरूप श्रीहरि में सुदृढ़ भक्ति होने पर हो सकती है ।। ३६ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (सोलहवां दिन) तिलकव्रत के माहात्म्य में चित्रलेखा का चरित्र... [संवत्सर-प्रतिपदा का कृत्य] 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ राजा युधिष्ठिर ने पूछा-भगवन्! ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गौरी, गणपति, दुर्गा, सोम, अग्नि तथा सूर्य आदि देवताओं के व्रत शास्त्रों में निर्दिष्ट हैं, उन व्रतों का वर्णन आप प्रतिपदादि क्रम से करें। जिस देवता की जो तिथि है तथा जिस तिथि में जो कर्तव्य है, उसे आप पूरी तरह बतलायें। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की जो प्रतिपदा होती है, उस दिन स्त्री अथवा पुरुष नदी, तालाब या घर पर स्नान कर देवता और पितरों का तर्पण करे। फिर घर आकर आटे की पुरुषाकार संवत्सर की मूर्ति बनाकर चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारों से उसकी पूजा करे। ऋतु तथा मासों का उच्चारण करते हुए पूजन तथा प्रणाम कर संवत्सर की प्रार्थना करे और संवत्सरोऽसि परिवर्सरोऽसीदावत्सरोऽसीद्वत्सरोऽसि वत्सरोऽसि। उषसस्ते कल्पन्तामहोरात्रास्ते कल्पन्तामर्धमासास्ते कल्पन्तां मासास्ते कल्पन्तामृतवस्ते कल्पन्तार्थं संवत्सरस्ते कल्पताम् । प्रेत्या एत्यै सं चाञ्च प्रच सारय । सुपर्णचिदसि तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवः सीद। ॥ (यजु० २७। ४५) यह मन्त्र पढ़कर वस्त्र से प्रतिमा को वेष्टित करे। तदनन्तर फल, पुष्प, मोदक आदि नैवेद्य चढ़ाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे-'भगवन्! आपके अनुग्रह से मेरा वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत हो ।' यह कहकर यथाशक्ति ब्राह्मण को दक्षिणा दे और उसी दिन से आरम्भ कर ललाट को नित्य चन्दन से अलंकृत करें। इस प्रकार स्त्री या पुरुष इस व्रत के प्रभाव से उत्तम फल प्राप्त करते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, डाकिनी और शत्रु उसके मस्तक में तिलक देखते ही भाग खड़े होते हैं। इस सम्बध में मैं एक इतिहास कहता हूँ-पूर्व काल में शत्रुञ्जय नाम के एक राजा थे और चित्रलेखा नाम की अत्यन्त सदाचारिणी उनकी पत्नी थी। उसी ने सर्वप्रथम ब्राह्मणों से संकल्पपूर्वक इस व्रत को ग्रहण किया था। इसके प्रभाव से बहुत अवस्था बीतने पर उनको एक पुत्र हुआ। उसके जन्म से उनको बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। वह रानी सदा संवत्सर व्रत किया करती और नित्य ही मस्तक में तिलक लगाती। जो उसको तिरस्कृत करने की इच्छा से उसके पास आता, वह उसके तिलक को देखकर पराभूत-सा हो जाता। कुछ समय के बाद राजा को उन्मत्त हाथी ने मार डाला और उनका बालक भी सिर की पीड़ा से मर गया। तब रानी अति शोकाकुल हुई। धर्मराज के किंकर (यमदूत) उन्हें लेने के लिये आये। उन्होंने देखा कि तिलक लगाये चित्रलेखा रानी समीप में बैठी है। उसको देखते ही वे उलटे लौट गये। यमदूतों के चले जाने पर राजा अपने पुत्र के साथ स्वस्थ हो गया और पूर्वकर्मानुसार शुभ भोगों का उपभोग करने लगा। महाराज! इस परम उत्तम व्रत का पूर्वकाल में भगवान् शंकर ने मुझे उपदेश किया था और हमने आपको सुनाया यह तिलकव्रत समस्त दु:खों को हरने वाला है। इस व्रत को जो भक्ति पूर्वक करता है, वह चिरकालपर्यन्त संसार का सुख भोगकर अन्त में ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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जिस पात्र में वर्षों से तेल ही रखा जाता है , ऐसे बर्तन को पाँच दस बार धोने पर वह स्वच्छ तो होगा , किन्तु तेल की वास नहीं जायेगी । अब उस बर्तन में यदि चटनी अचार रखा जायेगा तो वह बिगड़ जायेगा । हमारा मस्तिष्क भी ठीक ऐसा ही है । जिसमें कई वर्षो से कामवासना रुपी तेल रखा गया है । इस बुद्धिरुपी पात्र में श्रीकृष्ण रुपी रस रखना है। मस्तिष्क रुपी बर्तन में काम का अंशमात्र भी होगा तो उसमें प्रेमरस , जमेगा ही नहीं। जब बुद्धि में परमात्मा का निवास होगा,तभी पूर्ण शान्ति मिलेगी । जब तक बुद्धि मे ईश्वर का अनुभव नहीं होगा तब तक आनन्द का अनुभव नहीं हो पायेगा । संसार के विषयों का ज्ञान बुद्धि में आने पर विषय सुखरुप बनते हैं, परमात्मा को बुद्धि में रखना है । मस्तिष्क में जब ईश्वर आ बसते हैं ,तभी ईश्वर स्वरुप का ज्ञान पूर्ण आनन्द देता है । जैसे तेल के अंश से चटनी अचार बिगड़ते है वैसे ही बुद्धि में वासना का अंश रह जाने पर वह अस्थिर ही रहेगी। बुद्धि को स्थिर और शुद्ध करने हेतु मन के स्वामी चंद्र और बुद्धि के स्वामी सूर्य की आराधना करनी है । त्रिकाल संध्या करने से बुद्धि विशुद्ध होगी । जब तक राम नहीं आते हैं, तब तक कृष्ण भी नहीं आते है । जिसके घर मे राम नही आते हैं , उसका रावण (काम) मरता नहीं और जब तक काम रुपी रावण नहीं मरता तब तक श्रीकृष्ण नहीं आते है। जब राम की मर्यादा का पालन किया जायेगा तभी काम मरेगा । चाहे जिस संप्रदाय में विश्वास हो , किन्तु जब तक रामचन्द्र की मर्यादा का पालन नहीं किया जायेगा तब तक आनन्द नहीं मिलेगा । रामचन्द्र की उत्तम सेवा यही है कि उनकी मर्यादा का पालन किया जाए, उनका सा ही वर्तन रखें। रामजी का भजन करना अर्थात् उनकी मर्यादा का पालन करना । उनका वर्तन हमें जीवन में उतारना चाहिए । राम जी को मन में बसाने,मर्यादा-पुरुषोत्तम रामचन्द्र का अनुकरण करने पर भगवान मिलेंगे । रामजी की लीलाएँ अनुकरणीय एवं श्रीकृष्ण की लीलाएँ चिंतनीय हैं । रामचन्द्र का मातृप्रेम, पितृप्रेम, बंधुप्रेम , एक पत्नी प्रेम आदि सब कुछ जीवन में उतारने योग्य है । श्रीकृष्ण के कृत्य हमारे लिए अशक्य है। उनका कालियानाग को वश मे करना , गोवर्धन उठाना आदि । रामचन्द्र ने अपना ऐश्वर्य छिपाकर मानव जीवन का नाटक किया साधक का वर्तन कैसा होना चाहिए यह रामचन्द्र जी ने बताया है । साधक का वर्तन रामचन्द्र जैसा होना चाहिए , सिद्ध पुरुष का वर्तन श्रीकृष्ण जैसा हो सकता है । रघुनाथ जी का अवतार राक्षसों की हत्या के हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव धर्म सिखाने के लिए हुआ था । वे जीवमात्र को उपदेश देते हैं। रामजी ने किसी भी मर्यादा को भंग नहीं किया । हमें भी मर्यादा का पालन करते हुए श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। स्वान्तःसुखाय ......... श्रीहरिशरणम् ...........

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ramkumarverma Mar 1, 2021

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ramkumarverma Feb 28, 2021

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KISHAN Mar 1, 2021

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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 16 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं-युद्ध समाप्त हो जाने पर महाबली युधाजित् लड़ाई के मैदान से लौटकर अयोध्या पहुँचा। जाते ही वध कर डालने की इच्छा से मनोरमा और सुदर्शन को खोजने लगा। 'वह कहाँ चली गयी'–यों बार-बार कहते हुए उसने बहुत-से सेवक इधर-उधर दौड़ाये। फिर एक अच्छा दिन देखकर अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजगद्दी पर बैठाने की व्यवस्था की। अथर्ववेद के पावन मन्त्रों का उच्चारण करके जल से भरे हुए सम्पूर्ण कलशों से शत्रुजित् का अभिषेक हुआ। कुरुनन्दन! उस समय भेरी, शंख और तुरही आदि बाजों की ध्वनि से नगर में खूब उत्सव मनाया गया। ब्राह्मण वेद पढ़ते थे। वन्दीगण स्तुतिगान कर रहे थे और सर्वत्र जयध्वनि गूँज रही थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो अयोध्यापुरी हँस रही है। उस नये नरेश की राजगद्दी होने पर हृष्ट पुष्ट मनुष्यों से भरी-पूरी तथा स्तुति और बाजों की ध्वनि से निनादित वह अयोध्या एक नवीन पुरी-सी जान पड़ती थी। कुछ सज्जन पुरुष ही अपने घरों में रहकर शोक मनाते थे। वे सोचते थे-'ओह! आज राजकुमार सुदर्शन कहाँ भटक रहा होगा। वह परम साध्वी रानी मनोरमा अपने पुत्र के साथ कहाँ चली गयी। उसके महात्मा पिता वीरसेन तो राज्यलोभी वैरी युधाजित् के हाथ युद्ध में मारे ही गये ।' इस प्रकार चिन्तित रहकर सबमें समान बुद्धि रखने वाले वे सज्जन पुरुष बड़े कष्ट से समय व्यतीत करते थे। शत्रुजित् का शासन मानना उनके लिये अनिवार्य था। यों युधाजित् ने दौहित्र शत्रुजित् को विधिपूर्वक राजगद्दी पर बैठाकर मन्त्रियों को कार्यभार सौंप दिया और स्वयं उज्जयिनी नगरी को चला गया। वहाँ पहुँचने पर उसे समाचार मिला कि सुदर्शन मुनियों के आश्रम पर ठहरा है। फिर तो उसे मारने के लिये वह दुष्ट चित्रकूट के लिये चल पड़ा। उस समय शृंगवेरपुर में दुर्दर्श नामक एक निषाद राज्य करता था। वह बड़ा बली और शूरवीर था। युधाजित् उसे अपना अगुआ बनाकर शीघ्र ही चल दिया। 'युधाजित् सेना सहित आ रहा है'-यह सुनकर मनोरमा के मन में महान् क्लेश हुआ। छोटे-से कुमार की सँभाल करने वाली स्नेहमयी माता भय से घबरा उठी। आँखों से आँसू गिराती हुई अत्यन्त चिन्तित होकर उसने मुनिवर भरद्वाज से कहा - 'मुनिजी! अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? युधाजित् यहाँ भी पहुँच गया। इसने मेरे पिता को मारने के पश्चात् अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजा बना दिया और अब मेरे इस नन्हें से पुत्र का वध करने के लिये सेनासहित यहाँ आ रहा है। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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