Asha Shrivastava
Asha Shrivastava Jan 20, 2021

एक छोटे बच्चे के जबाव सुनो बहुत सुंदर जबाव दिया है जय हो श्री राधे कृष्णा जी आप को कोटी कोटी प्रणाम राधे राधे

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कामेंट्स

Asha Shrivastava Jan 20, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शुभ प्रभात जी

Manoj Gupta AGRA Jan 20, 2021
jai shree radhe krishna ji 🙏🙏🌷🌸💐🌀 shubh prabhat vandan ji 🙏🙏🌷

आशुतोष Jan 20, 2021
🕉 श्री गणेशाय नमः 🙏 श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवाय... ༺꧁ Զเधॆ Զเधॆ꧂༻ 🙏 🌹 जय श्री कृष्णा 🌹🙏 मंगल दिवस की शुभकामनाएँ...

Seema Sharma. Himachal (chd) Jan 20, 2021
गोविंद सिंहजी का कला-साहित्‍य के प्रति अगाध प्रेम था। उन्‍होंने ही संगीत वाद्ययंत्र दिलरुबा का अविष्‍कार किया था। इसका इस्‍तेमाल कई संगीतकारों ने भी किया है। बताया जाता है कि गुरु गोविंद सिंह जी के दरबार में तकरीबन 52 कवि थे।😊🙏 शुभ प्रभात जी 🙏 गुरु गोविंद सिंह जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

संजीव शर्मा Jan 20, 2021
वैक्सीन की वर्तमान स्थिति: "मिलो ना तुम तो हम घबराए.................... मिलो तो आंख चुराए, हमे क्या हो गया है" 😂😂😂😂😂😂😂😂

नवरात्र व्रत की कथा 〰️〰️🔸🔸〰️〰️ प्राचीन काल में एक सुरथ नाम का राजा हुआ करता था । उसके राज्य पर एक बार शत्रुओं ने चढ़ाई कर दी । मंत्री गण भी राजा के साथ विश्वासघात करके शत्रु पक्ष के साथ जा मिले । मंत्जिसका परिणाम यह हुआ कि राजा परास्त हो गया, और वे दु:खी और निराश होकर तपस्वी वेष धारण करके वन में ही निवास करने लगा । उसी वन में उन्हें समाधि नाम का वैश्य मिला, जो अपनी स्त्री एवं पुत्रों के दुर्व्यवहार से अपमानित होकर वहां पर रहता था । दोनों में परस्पर परिचय हुआ । वे महर्षि मेधा के आश्रम में जा पहुंचे । महामुनि मेधा के द्वारा आने का कारण पूछने पर दोनों ने बताया कि, हम दोनों अपनों से ही अत्यंत अपमानित तथा तिरस्कृत है । फिर भी उनके प्रति मोह नहीं छूटता, इसका क्या कारण है ? उन दोनों ने मुनि से पूछा । महर्षि मेधा ने बताया कि मन शक्ति के अधीन होता है । आदिशक्ति भगवती के दो रूप हैं - विद्या और अविद्या । प्रथम ज्ञान स्वरूपा हैं तथा दूसरी अज्ञान स्वरूपा । जो अविद्या (अज्ञान) के आदिकारण रूप से उपासना करते हैं, उन्हें विद्या - स्वरूपा प्राप्त होकर मोक्ष प्रदान करती हैं । राजा सुरथ ने पूछा - देवी कौन हैं और उनका जन्म कैसे हुआ ? महामुनि ने कहा - हे राजन ! आप जिस देवी के विषय में प्रश्न कर रहे हैं, वह नित्य - स्वरूपा तथा विश्वव्यापिनी हैं । उसके प्रादुर्भाव के कई कारण हैं । ‘कल्पांत में महा प्रलय के समय जब विष्णु भगवान क्षीर सागर में अनंत शैय्या पर शयन कर रहे थे तभी उनके दोनों कर्ण कुहरों से दो दैत्य मधु तथा कैटभ उत्पन्न हुए । धरती पर चरण रखते ही दोनों विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न हुए । धरती पर चरण रखते ही दोनों विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा को मारने दौड़े । उनके इस विकराल रूप को देखकर ब्रह्मा जी ने अनुमान लगाया कि विष्णु के सिवा मेरा कोई शरण नहीं । किंतु भगवान इस अवसर पर सो रहे थे । तब विष्णु भगवान हेतु उनके नयनोंमें रहने वाली योगनिंद्रा की स्तुति करने लगे । परिणामस्वरूप तमोगुण अधिष्ठात्री देवी विष्णु भगवान के नेत्र, नासिका, मुख तथा हृदय से निकलकर आराधक (ब्रह्मा) के सामने खड़ी हो गई । योगनिद्रा के निकलते ही भगवान विष्णु जाग उठे । भगवान विष्णु तथा उन राक्षसों में पांच हजार वर्षों तक युद्ध चलता रहा । अंत में वे दोनों भगवान विष्णु के हाथों मारे गये ।’ ऋषि बोले - अब ब्रह्मा जी की स्तुति से उत्पन्न महामाया देवी की वीरता सुनो । एक बार देवलोक के राजा इंद्र और दैत्यों के स्वामी महिषासुर सैकड़ों वर्षों तक घनघोर संग्राम हुआ । इस युद्ध में देवराज इंद्र परास्त हुए और महिषासुर इंद्रलोक का राजा बन बैठे । तब हारे हुए देवगण ब्रह्मा जी को आगे करके भगवान शंकर तथा विष्णु के पास गये और उनसे अपनी व्यथा कथा कही । देवताओं की इस निराशापूर्ण वाणी को सुनकर भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर को अत्यधिक क्रोध आया । भगवान विष्णु के मुख तथा ब्रह्मा, शिव, इंद्र आदि के शरीर से एक पूंजीभूत तेज निकला, जिससे दिशाएं जलने लगीं । अंत में यहीं तेज एक देवी के रूप में परिणत हो गया । देवी ने देवताओं से आयुध, शक्ति तथा आभूषण प्राप्त कर उच्च स्वर से अट्टाहासयुक्त गगनभेदी गर्जना की जिससे तीनों लोकों में हलचल मच गई । क्रोधित महिषासुर दैत्य सेना का व्यूह बनाकर इस सिंहनाद की ओर दौड़ा । उसने देखा कि देवी की प्रभा में तीनों देव अंकित हैं । महिषासुर अपना समस्त बल, छल - छद्म लगाकर भी हार गया और देवी के हाथों मारा गया । इसके पश्चात् यहीं देवी आगे चलकर शुम्भ - निशुम्भ नामक असुरों का वध करने के लिए गौरी देवी के रूप में उत्पन्न हुई । इन सब गरिमाओं को सुनकर मेधा ऋषि ने राजा सुरथ तथा वणिक समाधि से देवी स्तवन की विधिवत् व्याख्या की । इसके प्रभाव से दोनों एक नदी तट पर जाकर तपस्या में लीन हो गये । तीन वर्ष बाद दुर्गा मां ने प्रकट होकर उन दोनों को आशिर्वाद दिया । जिससे वणिक सांसारिक मोह से मुक्त होकर आत्म चिंतन में लीन हो गया और राजा ने शत्रु जीतकर अपना खोया सारा राज्य और वैभव की पुन: प्राप्ति कर ली । 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चमः स्कन्धः अथैकादशोऽध्यायः राजा रहूगण को भरत जी का उपदेश...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ ब्राह्मण उवाच अकोविदः कोविदवादवादान् वदस्यथो नातिविदा वरिष्ठः । न सूरयो हि व्यवहारमेनं तत्त्वावमर्शेन सहामनन्ति ॥ १ तथैव राजन्नुरुगार्हमेध- वितानविद्योरुविजृम्भितेषु न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु: ॥ २ न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥३ यावन्मनो रजसा पूरुषस्य सत्त्वेन वा तमसा वानुरुद्धम् । चेतोभिराकूतिभिरातनोति निरङ्कुशं कुशलं चेतरं वा ॥४ स वासनात्मा विषयोपरक्तो गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । बिभ्रत्पृथङ्नामभि रूपभेद मन्तर्बहिष्वं च पुरैस्तनोति ॥ ५ दुःखं सुखं व्यतिरिक्तं च तीव्र कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति। आलिङ्गय मायारचितान्तरात्मा स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटः ॥ ६ तावानयं व्यवहारः , सदावि: क्षेत्रज्ञसाक्ष्यो भवति स्थूलसूक्ष्मः । तस्मान्मनो लिङ्गमदो वदन्ति गुणागुणत्वस्य परावरस्य ॥ ७ गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्न् पदं तथा गुणकर्मानुबद्ध शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् । वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ॥८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ जडभरत ने कहा-राजन् ! तुम अज्ञानी होने पर भी पण्डितों के समान ऊपर-ऊपर की तर्क-वितर्क युक्त बात कह रहे हो । इसलिये श्रेष्ठ ज्ञानियों में तुम्हारी गणना नहीं हो सकती। तत्त्वज्ञानी पुरुष इस अविचारसिद्ध स्वामी-सेवक आदि व्यवहार को तत्त्वविचार के समय सत्यरूप से स्वीकार नहीं करते॥ १ ॥ लौकिक व्यवहार के समान ही वैदिक व्यवहार भी सत्य नहीं है, क्योंकि वेदवाक्य भी अधिकतर गृहस्थजनोचित यज्ञविधि के विस्तार में ही व्यस्त हैं, राग द्वेषादि दोषों से रहित विशुद्ध तत्त्वज्ञान की पूरी-पूरी अभिव्यक्ति प्रायः उनमें भी नहीं हुई है । २ ॥ जिसे गृहस्थोचित यज्ञादि कर्म से प्राप्त होने वाला स्वर्गादि सुख स्वप्रके समान हेय नहीं जान पड़ता, उसे तत्त्वज्ञान कराने में साक्षात् उपनिषद्-वाक्य भी समर्थ नहीं है ॥ ३ ॥ जबतक मनुष्य का मन सत्त्व, रज अथवा तमोगुण के वशीभूत रहता है, तबतक वह बिना किसी अङ्कुश के उसकी ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों से शुभाशुभ कर्म कराता रहता है ॥ ४ ॥ यह मन वासनामय, विषयासक्त, गुणों से प्रेरित, विकारी और भूत एवं इन्द्रियरूप सोलह कलाओं में मुख्य है। यही भिन्न-भिन्न नामों से देवता और मनुष्यादिरूप धारण करके शरीररूप उपाधियों के भेद से जीव की उत्तमता और अधमता का कारण होता है। ५ ॥ यह मायामय मन संसारचक्र में छलने वाला है, यही अपनी देह के अभिमानी जीव से मिलकर उसे कालक्रम से प्राप्त हुए सुख-दुःख और इनसे व्यतिरिक्त मोहरूप अवश्यम्भावी फलों की अभिव्यक्ति करता है॥ ६ ॥ जबतक यह मन रहता है, तभीतक जाग्रत् और स्वप्नावस्था का व्यवहार प्रकाशित होकर जीवका दृश्य बनता है। इसलिये पण्डितजन मन को ही त्रिगुणमय अधम संसार का और गुणातीत परमोत्कृष्ट मोक्षपद का कारण बताते हैं ।। ७ ॥ विषयासक्त मन जीवको संसार-सङ्कट में डाल देता है, विषयहीन होने पर वही उसे शान्तिमय मोक्षपद प्राप्त करा देता है। जिस प्रकार घी से भीगी हुई बत्ती को खाने वाले दीपक से तो धुएँवाली शिखा निकलती रहती है और जब घी समाप्त हो जाता है तब वह अपने कारण अग्नितत्त्व में लीन हो जाता है उसी प्रकार विषय और कर्मो से आसक्त हुआ मन तरह-तरह की वृत्तियों का आश्रय लिये रहता है और इनसे मुक्त होने पर वह अपने तत्त्व में लीन हो जाता है।॥ ८॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 28 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नवरात्र-व्रत के प्रसंग में श्रीरामचरित्र का वर्णन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ तदनन्तर कैकेयी के कथनानुसार सीता और लक्ष्मण के सहित भगवान् राम दण्डकारण्य में पधार गये। वहाँ पर बहुत-से राक्षस रहते थे अमेयात्मा महाराज दशरथ को पुत्र के विरह से अपार दुःख हुआ। पूर्व शाप की बात उन्हें याद थी ही अतः उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। भरतजी ने देखा पिताजी स्वर्ग सिधार गये, इनकी मृत्यु में माता कारण हुई है। अतः भाई श्रीराम का प्रेम भाजन बनने की इच्छा से उन्होंने राज्य करना अस्वीकार कर दिया। भगवान् राम पंचवटी में निवास कर रहे थे। वहाँ रावण की छोटी बहन शूर्पणखा आयी। कामदेव उसे सता रहा था। उन्होंने उसे विरूप बना दिया। नाक-कान कटी हुई उस राक्षसी शूर्पणखा को देखकर खर-दूषण आदि दैत्यों ने अमित तेजस्वी भगवान् राम के साथ घोर संग्राम किया। वे खर प्रभृति राक्षस असीम बलशाली थे। फिर भी मुनियों के हित की इच्छा रखने वाले सत्यपराक्रमी श्रीराम के हाथ उन्हें प्राणों से हाथ धोना पड़ा। शूर्पणखा बड़ी दुष्टा थी। वह लंका गयी और राम के द्वारा खर-दूषण के मारे जाने का समाचार उसने रावण के पास पहुँचाया। रावण भी बड़ा नीच था। खर-दूषण की मृत्यु सुनकर क्रोध से तमतमा उठा। तुरंत रथ पर बैठा और मारीच के स्थान पर चला गया। मारीच बड़ा मायावी था। सीता को लुभाने के लिये सोने का मृग बनकर जाने के लिये रावण ने उसे आज्ञा दी। वह मायावी राक्षस तुरंत सुवर्णमय मृग बनकर सीता के सामने पहुँच गया। उसके सभी अंग अत्यन्त अद्भुत जान पड़ते थे। वह कुटी के पास जाकर चरने लगा। उसे देखकर दैव की प्रेरणा से विवश हो भगवती सीता ने राम से कहा-'स्वामिन्! इस मृग का चर्म लाने की कृपा कीजिये।' भगवान् राम ने भी कुछ विचार नहीं किया। वहाँ लक्ष्मण को रहने की आज्ञा देकर धनुष-बाण उठाया और वे उस मृग के पीछे चल पड़े। वह मृग भी करोड़ों मायाओं का पूर्ण जानकार था। भगवान् राम को देखकर वह कभी दीख पड़ता और कभी अदृश्य हो जाता था। यों वह एक वन से दूसरे वन में चला गया। अब यह मृग एक ही हाथ की दूरी पर रह गया है-यह मानकर भगवान् राम ने धनुष पर तीक्ष्ण बाण चढ़ाया और उससे उस मायामय मृग को मार डाला। मरते समय मायावी नीच मृग अत्यन्त दुःख के साथ बलपूर्वक बड़े जोर से चिल्लाया 'हा लक्ष्मण! अब मैं मारा गया।' वह चिल्ला रहा था, तभी उसका वह गगनभेदी शब्द सीता ने सुन लिया। 'यह राघवेन्द्र की करुण पुकार है'-यह मानकर वे घबरा गयीं। उन्होंने अपने देवर लक्ष्मण से कहा "लक्ष्मण! तुम अभी जाओ । देखो, तुम्हारे भाई रघुनन्दन को किसी ने मारा है। सौमित्रे! तुम्हें वे बुला रहे हैं। शीघ्र उनकी सहायता में जुट जाओ।' तब लक्ष्मण ने भगवती सीता से कहा 'माता जनक-नन्दिनी! राघवेन्द्र की यह आज्ञा है कि तुम यहीं रहना। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने से मैं डरता हूँ। अतः तुम्हारे पास से नहीं जा सकता। तुम धैर्य रखो। मेरी समझ से भगवान् राम को मारने में समर्थ पृथ्वी पर कोई भी नहीं है। अतः तुम्हें यहाँ अकेली छोड़कर राघवेन्द्र की आज्ञा का उल्लंघन करके मैं नहीं जाऊँगा। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (तरेपनवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आदित्य-मण्डल-दान विधि... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब मैं समस्त अशुभों के निवारण करने वाले श्रेयस्कर आदित्य-मण्डल के दान का वर्णन करता हूँ। जौ अथवा गोधूम के चूर्ण में गुड़ मिलाकर उसे गौ के घृत में भलीभाँति पकाकर सूर्यमण्डल के समान एक अति सुन्दर अपूप बनाये और फिर सूर्यभगवान् का पूजनकर उनके आगे रक्त चन्दन का मण्डप अंकितकर उसके ऊपर वह सूर्यमण्डलात्मक मण्डक (एक प्रकार का पिष्टक) रखे। ब्राह्मण को सादर आमन्त्रित कर रक्त वस्त्र तथा दक्षिणा सहित वह मण्डक इस मन्त्र को पढ़ते हुए ब्राह्मण को प्रदान करे आदित्यतेजसोत्पन्नं राजतं विधिनिर्मितम्। श्रेयसे मम विप्र त्वं प्रतिगृह्वेदमुत्तमम्॥ (उत्तरपर्व ४४। ५) ब्राह्मण भी उसे ग्रहणकर निम्नलिखित मन्त्र बोले कामदं धनदं धर्म्यं पुत्रदं सुखदं तव। आदित्यप्रीतये दत्तं प्रतिगृह्णामि मण्डलम्॥ (उत्तरपर्व ४४। ६) इस प्रकार विजयसप्तमी को मण्डक का दान करे और सामर्थ्य होने पर सूर्यभगवान् की प्रीति के लिये शुद्धभाव से नित्य ही मण्डक प्रदान करे। इस विधि से जो मण्डक का दान करता है, वह भगवान् सूर्य के अनुग्रह से राजा होता है और स्वर्गलोक में भगवान् सूर्य की तरह सुशोभित होता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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नवरात्रि द्वितीय दिवस माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप श्री ब्रह्मचारिणी जी की उपासना विधि एवं फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ माँ दुर्गा का द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है। देवी दुर्गा का यह दूसरा रूप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देने वाला है. देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है. माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है, तथा जीवन की अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का नाश होता है। देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है। मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली मां ब्रह्मचारिणी. यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं. मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है। देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है. देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं. इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित साधक मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है। माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें। प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारीभेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें। कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें। इनकी पूजा के पश्चात मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा” इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एकविशेष फूल) व कमल काफी पसंद है उनकी माला पहनायें. प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें. अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी।। माँ ब्रह्मचारिणी मंत्र 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। माँ ब्रह्मचारिणी ध्यान 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ ब्रह्मचारिणी स्तोत्र पाठ 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्। ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥ शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी। शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥ मां ब्रह्मचारिणी कवच 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी। अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥ पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥ षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो। अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी। नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं माँ ब्रह्मचारिणी कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री हैं। इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया। जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोले नाथ की वामिनी अर्थात पत्नी बनी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।  कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।  कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।  जो व्यक्ति अध्यात्म और आत्मिक आनंद की कामना रखते हैं उन्हें इस देवी की पूजा से सहज यह सब प्राप्त होता है. देवी का दूसरा स्वरूप योग साधक को साधना के केन्द्र के उस सूक्ष्मतम अंश से साक्षात्कार करा देता है जिसके पश्चात व्यक्ति की ऐन्द्रियां अपने नियंत्रण में रहती है और साधक मोक्ष का भागी बनता है। माँ ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान चक्र में मन को स्थापित करता है उसकी साधना सफल हो जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है। जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धादुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है। शिक्षा में सफलता हेतु उपाय 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यदि विद्यार्थी को शिक्षा में परेशानी आ रही हो, स्मरण शक्ति कमजोर हो, पाठ याद नहीं होते हो तो यह उपाय करके देंखे। गुरुवार के दिन 5 पीले पेड़े अपने ऊपर से 7 बार उसार कर और 7 बार ॐ ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं। मंत्र का जाप करके गाय को खिला दें। अपने अध्ययन कक्ष में पीले कपड़े में 9 हल्दी की गांठ ॐ ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं। मंत्र का जाप करते हुए बांध कर पोटली बना दें और अपने कक्ष में रख दें। शिक्षा में सफलता मिलेगी। आरती माँ ब्रह्माचारिणी जी की  〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।  जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।  ब्रह्मा जी के मन भाती हो।  ज्ञान सभी को सिखलाती हो।  ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।  जिसको जपे सकल संसारा।  जय गायत्री वेद की माता।  जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।  कमी कोई रहने न पाए।  कोई भी दुख सहने न पाए।  उसकी विरति रहे ठिकाने।  जो ​तेरी महिमा को जाने।  रुद्राक्ष की माला ले कर।  जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।  आलस छोड़ करे गुणगाना।  मां तुम उसको सुख पहुंचाना।  ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।  पूर्ण करो सब मेरे काम।  भक्त तेरे चरणों का पुजारी।  रखना लाज मेरी महतारी।  माँ दुर्गा की आरती 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय… मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय… कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय… केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी । सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय… कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय… शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय… चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे । मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय… ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय… चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू । बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय… तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता । भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय… भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी । >मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय… कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय… श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय… 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (तेरहवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः अविद्यामूलक स्थावरयोनि के जीवों के स्वरूप का तथा विवेक पूर्वक विचार से अविद्या के नाश का प्रतिपादन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठ जी बोले-श्रीराम ! बुद्धिपूर्वक विचारने पर यथार्थ वस्तुरूप परमात्मा के साक्षात्कार से चिन्मय सत्ता का जो सबमें समान भाव से अनुभव होता है, वही अविनाशी मोक्षपद है। परमात्मतत्त्व को यथार्थतः जान लेने पर वासनाओं का जो उत्तम यानी अशेषरूप से अभाव है, उसे ही सबमें समभाव से सत्तारूप मोक्षपद कहा गया है। ज्ञानी महात्मा पुरुषों के साथ विचार करके और अध्यात्मभावना से शास्त्रों को समझकर सत्ता-सामान्य में जो निष्ठा होती है, उसी निष्ठा को मुनिलोग परब्रह्म कहते हैं। यही परब्रह्म की प्राप्ति है। जिसके भीतर मानस व्यापाररूप मनन भलीभाँति लीन हो गया है। तथा चारों ओर से जिसमें वासनाएँ तिरोहित हो गयी हैं, वह जड़ धर्मवाली स्थावर जीवों की सुषुप्ति सैकड़ों जन्म रूपी दुःखों को देती है जड़ स्ववभाववा ले ये सभी वृक्ष पहाड़ आदि स्थावर योनि के जीव सुषु्ति अवस्था को प्राप्त हुए-से पुनः-पुनः जन्म के भागी होते हैं । श्रेष्ठ श्रीराम ! जिस तरह बीजों में अङ्कुर से लेकर पुष्प तक पदार्थ स्थित हैं एवं जिस तरह मिट्टी में घट स्थित है, उसी तरह स्थावरों के भीतर भी अपनी वासना स्थित है । वासना, अग्नि, ऋण, व्याधि, शत्रु, स्नेह, विरोध एवं विष- ये थोड़े-से भी शेष रहने पर हानि पहुँचाते हैं । जिसका वासना-बीज ज्ञानाग्नि से दग्ध हो गया है और जिसने सबमें समान सत्तारूप परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, वह महात्मा पुरुष, चाहे सदेह हो या देह से रहित पुनः कभी दुःख का भागी नहीं होता । श्रीराम ! आत्मदर्शन के विरोधी अज्ञान से आवृत हुई यह चेतनशक्ति संसाररूप भ्रम को जन्म देती है और अज्ञान से मुक्त होने पर सम्पूर्ण दुःखों का विनाश कर देती है । इस आत्मदृष्टि का जो अभाव है, उसी को विद्वान्लोग अविद्या कहते हैं । अविद्या जगत् की कारणभूत है, अतः उसी से सम्पूर्ण पदार्थों की उत्पत्ति होती है । रूपरहित इस अविद्या का जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब तुरंत यह उसी प्रकार विनष्ट हो जाती है, जैसे घाम में तुषार के परमाणु गल जाते हैं । दीपक को प्रज्वलित करने पर जिस प्रकार अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी तरह अच्छी प्रकार विचार करने पर यह अविद्या नष्ट हो जाती है । वास्तव में यह अविद्या कोई वस्तु न होने से असत् है और विचार न करने से ही दीख पड़ती है। रक्त, मांस तथा अस्थिमय इस देह-यन्त्र में मैं स्वयं कौन हूँ ?' इस प्रकार जब विवेकपूर्वक विचार किया जाता है, तब देह के किसी भी पदार्थ में मैं-पन सिद्ध नहीं होता, वरं शरीर का अभाव हो जाता है। अपने अन्तःकरण के विवेक-विचार से आदि-अन्त में असद्रूप इस शरीर और संसार का परिहार कर देने पर अविद्या का क्षय हो जाता है; फिर शेष में एक परमात्मा ही रह जाता है। वही वास्तव में शाश्वत ब्रह्म है । वही वास्तविक पदार्थ और उपादेय है; क्योंकि उसी से अविद्या निवृत्त हो जाती है। अविद्या' इस अपने नाम से ही इसके अभावस्वरूप को ज्ञान हो जाता है । वास्तव में अविद्या नाम की कोई वस्तु कहीं भी नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् अखण्ड ब्रह्मस्वरूप ही है, जिस ब्रह्म ने कार्य कारणरूप इस सम्पूर्ण जगत् का निर्माण किया है। यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप नहीं है इस प्रकार का निश्चय ही अविद्या का स्वरूप है और यह जगत् ब्रह्मरूप है। यह निश्चय ही उसका विनाश है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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शिव जो धारण करते हैं उनके अर्थ : ------ जटाएं : ------- शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं। चंद्र : ______ चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला,निर्मल,उज्ज्वल और जाग्रत है। त्रिनेत्र : ---- शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें ---- सत्व, रज,तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान,भविष्य तीन कालों, स्वर्ग,मृत्यु,पाताल तीनों लोकों के प्रतीक हैं। सर्पहार : ---- सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है। जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है। त्रिशूल :------ शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक,दैविक,आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है। डमरु :------- शिव के एक हाथ में डमरू है। जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है। मुंडमाला :---- शिव के गले में मुंडमाला है। जो इस बात का प्रतीक है , कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है। छाल : ----- शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि "शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।" भस्म : ---- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिव लिंङ्ग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है। वृषभ : ---- शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं। जो बताता है कि-- धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं। इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है। महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।

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श्री दुर्गासप्तशती पाठ (हिंदी अनुवाद सहित सम्पूर्ण) (प्रथम अध्याय) ।।ॐ नमश्चण्डिकायै।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ वध का प्रसंग सुनाना... विनियोगः ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नन्दा शक्ति:, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम् , ॠग्वेदः स्वरूपम् , श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थे प्रथम चरित्र जपे विनियोगः। प्रथम चरित्र के ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छन्द, नन्दा शक्ति, रक्त दन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व और ऋग्वेद स्वरूप है। श्रीमहाकाली देवता की प्रसन्नता के लिये प्रथम चरित्र के जप में विनियोग किया जाता है। ध्यानम् ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् । नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥ १ ॥ भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं । उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं। ॐ नमश्चण्डिकायै 'ॐ ऐं' मार्कण्डेय उवाच ॥ १ ॥ मार्कण्डेयजी बोले- ॥ १॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः । निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ २॥ सूर्य के पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥२॥ महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः । स बभूव महाभागः सावर्णिनयो रवेः ॥ ३॥ सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ॥ ३ ॥ स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्धवः । सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ॥ ४॥ पूर्वकालकी बात है, स्वारोचिष मन्वन्तरमें सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्रवंशमें उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डलपर अधिकार था॥ ४॥ तस्य पालयतः सम्यक् प्रजा: पुत्रा निवौरसान्। बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥ ५ ॥ वे प्रजा का अपने औरस पुत्रोंकी भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये॥ ५॥ 👉 'कोलाविध्वंसी' यह किसी विशेष कुलके क्षत्रियोंकी संज्ञा है। दक्षिणमें 'कोला' नगरी प्रसिद्ध है, वह प्राचीन काल में राजधानी थी। जिन क्षत्रियों ने उस पर आक्रमण करके उसका विध्वंस किया, वे 'कोलाविध्वंसी' कहलाये। तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ ६ ॥ राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये॥ ६॥ ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् । खैर आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभि: ॥ ७ ॥ तब वे युद्धभूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे अब उनका अधिकार जाता रहा), किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया॥ ७॥ अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दु्बलस्य दुरात्मभिः । कोशो बलं चापहतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥ ८ ॥ राजाका बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को हथिया लिया॥ ८॥ ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः । एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ ९ ॥ सुरथका प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगलमें चले गये॥ ९॥ स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः । प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ १० ॥ वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव [अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्तभाव से रहते थे। मुनि के बहुत-से शिष्य उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १० ॥ तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृत। इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥ ११॥ वहाँ जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठके आश्रम पर इधर उधर विचरते हुए कुछ काल तक रहे ॥ ११ ॥ सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वा कृष्टचेतन: । मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् ॥१२॥ मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा। न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ॥ १३॥ मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते। ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः ॥ १४॥ अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् । असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्धिः सततं व्ययम्॥ १५॥ संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति। एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ १६॥ तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः । स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः ॥ १७॥ फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर वहाँ इस प्रकार चिन्ता करने लगे -'पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है । पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्मपूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मदकी वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओंका अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा सदा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा ।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा-'भाई! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने- से दिखायी देते हो?' राजा सुरथ का यह प्रेमपूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा- ॥१२-१९॥ सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥ १८॥ प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥ १९॥ वैश्य उवाच ॥ २० ॥ वैश्य बोला-॥ २०॥ समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले ॥ २१॥ राजन्! मैं धनियों के कुलमें उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेंरा नाम समाधि है॥ २१ ॥ पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः । विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥ २२॥ वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः । सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशला कुशलात्मिकाम् ॥ २३॥ प्रवृत्ति स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः । किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् ॥ २४॥ मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:खी होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है? ॥ २२- २४॥ कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥ २५ ॥ वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं? ॥ २५ ॥ राजोवाच ॥ २६॥ राजाने पूछा-॥ २६॥ यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः ॥ २७ ॥ तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ २८॥ जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदिने धनके कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्तमें इतना स्नेह का बन्धन क्यों है॥ २७-२८॥ वैश्य उवाच ॥ २९ ॥ वैश्य बोला-॥ २९ ॥ एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः॥ ३० ॥ आप मेरे विषयमें जैसी बात कहते हैं, वह सब ठीक है॥ ३० ॥ किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मन: । यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः ॥ ३१ ॥ पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः । किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥ ३२ ॥ यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु। तेषां कृते मे नि:श्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥ ३३॥ किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हींके प्रति मेरे हृदयमें इतना स्नेह है । महामते ! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसें ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है ॥ ३१-३३ ॥ करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ ३४॥ उन लोगोंमें प्रेमका सर्वथा अभाव है; तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करू?॥ ३४॥ मार्कण्डेय उवाच ॥ ३५ ॥ मार्कण्डेयजी कहते हैं-॥ ३५ ॥ ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ ।॥ ३६॥ समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्ह तेन संविदम्॥ ३७॥ उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वेंश्यपार्थिवौ ॥ ३८ ॥ ब्रह्मन्! तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजाने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया॥ ३६ - ३८॥ राजोवाच ॥ ३९॥ राजाने कहा-॥३९॥ भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् ॥४०॥ भगवन् ! में आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये॥४० ॥ दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना। ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्केष्वखिलेष्वपि ॥ ४१ ॥ मेरा चित्त अपने अधीन न होनेके कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है॥ ४१ ॥ जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम। अयं च निकृत: पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः ॥ ४२ ॥ मुनिश्रेष्ठ ! यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानीकी भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है; यह क्या है? इधर यह वैश्य भी घरसे अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसे छोड़ दिया है॥ ४२ ॥ स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति। एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥ ४३ ॥ स्वजनोंने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी यह उनके प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखता है। इस प्रकार यह तथा में-दोनों ही बहुत दुःखी हैं ॥ ४३ ॥ दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ । तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥ ४४॥ ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥४५॥ जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषयके लिये भी हमारे मनमें ममताजनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हममें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है? विवेकशून्य पुरुषकी भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है॥ ४४-४५ ॥ ऋषिरुवाच ॥ ४६॥ ऋषि बोले-॥ ४६ ॥ ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे ॥ ४७॥ विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक् पृथक्। दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे ॥ ४८ ॥ महाभाग! विषयमार्गका ज्ञान सब जीवोंको है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग-अलग हैं, कुछ प्राणी दिनमें नहीं देखते और दूसरे रातमें ही नहीं देखते ॥ ४७ - ४८॥ केचिह्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः । ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥ ४९॥ तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रिमें भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते॥ ४९ ॥ यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः । ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम् ॥ ५०॥ पशु, पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्योंकी समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियोंकी होती है॥ ५०॥ मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः । ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु ॥ ५१ ॥ कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा। मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषा: सुतान् प्रति॥ ५२ ॥ लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतोन् किं न पश्यसि। तथापि ममतावर्त्ते मोहग्ते निपातिताः ॥ ५३ ॥ महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा। तन्नात्र विस्मयः कार्यों योगनिद्रा जगत्पतेः ॥ ५४॥ महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत् sलायची ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ॥ ५५॥ बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति । तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६॥ सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये । सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी ॥ ५७ ॥ संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ ५८॥ तथा जैसी मनुष्यों की होती है,वैसी ही उन मृग-पक्षी आदिकी होती है । यह तथा अन्य बातें भी प्राय: दोनोंमें समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, ये स्वयं भूखसे पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये गये हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामायादेवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार बन्धन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं ॥ ५१-५८॥ राजोवाच ॥ ५९॥ राजाने पूछा-॥५९ ॥ भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥६०॥ ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज । यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ॥ ६१ ॥ तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥६२॥ भगवन् ! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ॥ ६०-६२॥ ऋषिरुवाच ॥ ६३॥ ऋषि बोले-॥६३ ॥ नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् ॥ ६४॥ मे तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम। देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा ॥ ६५॥ उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते। योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥६६॥ आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः। तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ ॥ ६७ ॥ विष्णुकर्णमलोद्धूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ । स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः ॥ ६८॥ दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्। तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥ ६९॥ विबोधनार्थाय हरेहरिनेत्रकृतालयाम्। विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम् ॥ ७०॥ निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ ७१ ॥ राजन्! वास्तव में तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है । वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोकमें उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान् को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्वकी अधीश्वरी, जगत को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान् विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे ॥ ६४-७१ ॥ ब्रह्मोवाच ।।७२।। ब्रह्माजीने कहा-॥७२॥ त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वरषट्कारः स्वरात्मिका॥ ७३ ॥ सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता । अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः ॥ ७४॥ त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा। त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥ ७५॥ त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा। विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने ॥ ७६ ॥ तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये । महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः ॥ ७७॥ महामोहा च भवती महादेवी महासुरी" प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी ॥ ७८॥ कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा। त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं हरीस्त्वं बुद्धिर्बोध लक्षणा ॥ ७९॥ लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च । छी, मिळे खड़गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा ॥ ८० ॥ शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा। सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी ॥८१ ॥ परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी । यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वा खिलात्मिके ॥ ८२ ॥ तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा'। यया त्वया जगत्स्त्रष्टा जगत्पात्यक्ति यो जगत्॥ ८३॥ सोऽपि निद्रावशं नीत: कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः । विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च ॥ ८४॥ कारितास्ते यतोऽतस्त्वां क: स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्। सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता ॥ ८५ ॥ मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ। प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥ ८६ ॥ बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ।॥ ८७ ॥ देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वरषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणवमें अकार, उकार, मकार- इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो । तुमसे ही इस जगत्की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्त में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि ! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन-कालमें स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहार रूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो । तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, तुम्हीं ही और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्ग धारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करनेवाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं । तुम सौम्य और सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर- सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो । सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत्रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्थामें तुम्हारी स्तुति क्या होसकती है? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान् को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान् शंकर को तथा भगवान् विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है? देवि ! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोहमें डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो॥ ७३-८७॥ ऋषिरुवाच॥ ८८ ॥ ऋषि कहते हैं-॥८८॥ एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ॥ ८९ ॥ विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ । नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः।। ॥ ९०॥ निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥ ९१॥ एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ । मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ ९२ ॥ क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ । समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः ॥ ९३ ॥ पञ्चवर्षसहस्त्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।राई तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ ॥ ९४ ॥ उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥ ९५ ॥ राजन्! जब ब्रह्माजी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान् विष्णु को जगाने के लिये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत् के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णु से कहने लगे-'हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो' ॥ ८९-९५॥ श्रीभगवानुवाच॥ ९६॥ श्रीभगवान् बोले-॥९६॥ भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वर्यावुभावपि ॥ ९७ ॥ किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम ॥ ९८ ॥ यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ । बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है । यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है॥ ९७-९८॥ ऋषिरुवाच॥ ९९ ॥ ऋषि कहते हैं-॥९९॥ वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् ॥ १०० ॥ विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः। आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ।॥ १०१ ॥ इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा-'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो- जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो' ॥ १००-१०१ ॥ ऋषिरुवाच॥ १०२॥ ऋषि कहते हैं-॥ १०२॥ तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता । कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ १०३ ॥ एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् । प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः श्रृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥ १०४ ॥। तब 'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुन: तुमसे उनके प्रभावका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ १०३-१०४॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्मये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥ १ ॥ क्रमशः..... अगले लेख में द्वितीय अध्याय जय माता जी की। पं देवशर्मा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 28 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नवरात्र-व्रत के प्रसंग में श्रीरामचरित्र का वर्णन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जनमेजय ने पूछा-भगवान् राम ने देवी का सुखदायी नवरात्र-व्रत क्यों किया था? उनका राज्याधिकार छिन जाने में क्या कारण था तथा सीताजी का हरण हो जाने पर उनको प्राप्त करने के लिये क्या किया? व्यासजी कहते हैं-प्राचीन समय की बात है-श्रीमान् राजा दशरथ अयोध्या में राज्य करते थे। सूर्यवंशी राजाओं में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। उनके यहाँ देवता और ब्राह्मण सदा आदर पाते थे। उनके चार पुत्र हुए, जो राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के नाम से जगत् में प्रसिद्ध हैं। राजा को प्रसन्न रखने वाले वे बालक रूप और गुण में समान थे। राम की माता कौसल्या थीं। कैकेयी से भरत का जन्म हुआ था और सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न- ये दो सुन्दर बालक एक साथ उत्पन्न हुए थे। ये बाल-अवस्था में ही धनुष और बाण लेकर खेला करते थे। तदनन्तर इनका संस्कार किया गया। इनके कारण राजा के सुख की वृद्धि हो रही थी। इतने में विश्वामित्रजी आये और यज्ञ की रक्षा करने के लिये कुमार श्रीराम को उन्होंने महाराज दशरथ से माँगा। तब भगवान् श्रीराम की अवस्था केवल सोलह वर्ष की थी। राजा ने लक्ष्मणसहित श्रीराम को मुनि के साथ जाने की आज्ञा दे दी। प्रियदर्शन राम और लक्ष्मण मुनि के साथ चले गये उन्होंने रास्ते में ही भयंकर रूपवाली ताड़का नामक राक्षसी को मार डाला। वह राक्षसी मुनियों को सदा सताया करती थी। भगवान् राम के एक ही बाण से उसका काम तमाम हो गया। यज्ञ की रखवाली करते समय श्रीराम ने पापी सुबाहु के प्राण हर लिये। मारीच को भी मृतप्राय करके बाण के सहारे दूर फेंक दिया। इस प्रकार मुनि-यज्ञ की रक्षा के इस गुरुतर कार्य को उन्होंने सहज ही सम्पन्न किया। फिर श्रीराम, लक्ष्मण और विश्वामित्र ये सभी मिथिला के लिये प्रस्थित हुए। मार्ग में इन्होंने अहल्या का शाप से उद्धार किया। भगवान् श्रीराम की कृपा से वह परम पावन बन गयी। फिर श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजी के साथ जनकपुर में पहुँच गये। वहाँ भगवान् शंकर के धनुष को, जिसे तोड़ने के लिये जनक ने प्रतिज्ञा की थी, तोड़ दिया। तदनन्तर लक्ष्मी की अंशभूता जानकी का भगवान् श्रीराम के साथ विवाह हुआ। महाराज जनक की एक दूसरी पुत्री उर्मिला थी; उसे उन्होंने लक्ष्मण को सौंप दिया। उत्तम लक्षणों से सम्पन्न, सुशील भरत एवं शत्रुष्न-ये दोनों भाई कुशध्वज की कन्याओं के स्वामी बने। राजन्! इस प्रकार इन चारों भाइयों का विवाह-संस्कार उत्तम विधि के साथ जनकपुर में सम्पन्न हुआ। महाराज दशरथ ने देखा-मेरा पुत्र राम राज्य सँभालने के योग्य हो गया है। अत: उनके मन में भगवान् राम पर राज्य का भार डालने की इच्छा हो गयी। तैयारियाँ होने लगीं। उन्हें देखकर कैकेयी ने महाराज दशरथ से अपने पहले के दो वर माँगे। उसने अपने पतिदेव महाराज दशरथ को वश में कर लिया था। उसने एक वर से तो अपने पुत्र महाभाग भरत को राजा बनाया जाय-यह माँगा और दूसरा वर था कि श्रीराम चौदह वर्ष के लिये वनवास जाएं। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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