Devang S Bhatt
Devang S Bhatt Jul 20, 2017

🕉📿🏵🏵💮💮🏵🏵💮💮🏵🏵💮💮🏵🏵📿🕉 *💮VEDIC RAKHI💮* *📿वैदिक रक्षासू

#ज्ञानवर्षा
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*💮VEDIC RAKHI💮*
*📿वैदिक रक्षासूत्र📿*

*रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है । यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है

*📿कैसे बनायें वैदिक राखी ?📿*

*💮वैदिक राखी बनाने के लिए एक छोटा-सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें । उसमें💮*

*🍃(१) दूर्वा*

*🍃(२) अक्षत (साबूत चावल)*

*🍃(३) केसर या हल्दी*

*🍃(४) शुद्ध चंदन*

*🍃(५) सरसों के साबूत दाने*

*💮इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें । फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें । सामर्थ्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं ।💮*

*📿वैदिक राखी का महत्त्व📿*

*💮वैदिक राखी में डाली जानेवाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जानेवाले संकल्पों को पोषित करती हैं ।💮*

*🎋(१) दूर्वा*
*🏵जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन में लगाने पर वह हजारों की संख्या में फैल जाती है, वैसे ही ‘हमारे भाई या हितैषी के जीवन में भी सद्गुण फैलते जायें, बढ़ते जायें...’ इस भावना का द्योतक है दूर्वा । दूर्वा गणेशजी की प्रिय है अर्थात् हम जिनको राखी बाँध रहे हैं उनके जीवन में आनेवाले विघ्नों का नाश हो जाय ।*

*🎋(२) अक्षत (साबूत चावल)*
*🏵हमारी भक्ति और श्रद्धा भगवान के, गुरु के चरणों में अक्षत हो, अखंड और अटूट हो, कभी क्षत-विक्षत न हो - यह अक्षत का संकेत है । अक्षत पूर्णता की भावना के प्रतीक हैं । जो कुछ अर्पित किया जाय, पूरी भावना के साथ किया जाय ।*

*🎋(३) केसर या हल्दी*
*🏵केसरकेसर की प्रकृति तेज होती है अर्थात् हम जिनको यह रक्षासूत्र बाँध रहे हैं उनका जीवन तेजस्वी हो । उनका आध्यात्मिक तेज, भक्ति और ज्ञान का तेज बढ़ता जाय । केसर की जगह पिसी हल्दी का भी प्रयोग कर सकते हैं । हल्दी पवित्रता व शुभ का प्रतीक है । यह नजरदोष व नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है तथा उत्तम स्वास्थ्य व सम्पन्नता लाती है ।*

*🎋(४) चंदन*
*🏵चंदनचंदन दूसरों को शीतलता और सुगंध देता है । यह इस भावना का द्योतक है कि जिनको हम राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में सदैव शीतलता बनी रहे, कभी तनाव न हो । उनके द्वारा दूसरों को पवित्रता, सज्जनता व संयम आदि की सुगंध मिलती रहे । उनकी सेवा-सुवास दूर तक फैले ।*

*🎋(५) सरसों*
*🏵सरसोंसरसों तीक्ष्ण होती है । इसी प्रकार हम अपने दुर्गुणों का विनाश करने में, समाज-द्रोहियों को सबक सिखाने में तीक्ष्ण बनें ।*

*💮अतः यह वैदिक रक्षासूत्र वैदिक संकल्पों से परिपूर्ण होकर सर्व-मंगलकारी है । यह रक्षासूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता है :💮*

*🍃येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।*
*🍃तेन त्वां अभिबध्नामि१ रक्षे मा चल मा चल ।।*
*🍃इस मंत्रोच्चारण व शुभ संकल्प सहित वैदिक राखी बहन अपने भाई को, माँ अपने बेटे को, दादी अपने पोते को बाँध सकती है । यही नहीं, शिष्य भी यदि इस वैदिक राखी को अपने सद्गुरु को प्रेमसहित अर्पण करता है तो उसकी सब अमंगलों से रक्षा होती है भक्ति बढ़ती है

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*आप जहाँ-जहाँ जुड़े हो वहाँ-वहाँ पहुँचाये 🏻*🕉🕉🕉

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गोत्र क्या है? सनातन धर्म के अंतर्गत वर्ण के साथ-साथ गोत्र को भी बेहद महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है। जहां एक ओर समान वर्ण में विवाह करने को मान्यता प्रदान की गई है वहीं इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी बताया है कि वर-वधु का गोत्र समान ना हो.... ऐसी मानयता है कि अगर समान गोत्र वाले स्त्री-पुरुष विवाह बंधन में बंध जाते हैं तो उनकी होने वाली संतान को रक्त संबंधित समस्याएं आ सकती हैं। कई बार गोत्र के विषय में पढ़ा और सुना है..... लेकिन गोत्र क्या है ?इसके विषय में हम जानते हैं? शायद नहीं.... बहुत ही कमलोग इस बात से अवगत होंगे कि आखिर गोत्र है और इसका निर्धारण कैसे होता है। आज हम इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गोत्र का शाब्दिक अर्थ बेहद व्यापक है... जिसकी समय-समय पर व्याखाया भी की जाती रही है। गोत्र शब्द की संधि विच्छेद पर ध्यान दें तो यह ‘गो’ यानि इन्द्रियां और ‘त्र’ यानि रक्षा करना से मिलकर बना है... अर्थात इन्द्रियों पर आघात से रक्षा करने वाला....जिसे “ऋषि” कहा जाता है। सनातन धर्म से संबंधित दस्तावेजों पर नजर डालें तो प्राचीनकाल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परंपरा की शुरुआत हुई, जिनके नाम ऋषि अंगिरा, ऋषि कश्यप, ऋषि वशिष्ठ और ऋषि भृगु हैं... कुछ समय पश्चात इनमें ऋषि जमदग्नि, ऋषि अत्रि, ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अगस्त्य भी इसमें जुड़ गए। प्रैक्टिकल तौर पर देखा जाए तो गोत्र का आशय पहचान से है... यानि कौनसा व्यक्ति किस ऋषि का वंशज है। सामाजिक तौर पर देखा जाए तो 'गोत्र' की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ‘एकत्रीकरण’ से संबंध रखता है। ॐ गं गणपतये नमः 👏 ॐ नम :शिवाय ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री भोलेनाथ ॐ सूर्याय नमः 🌅 👏 🌹 🚩 फेब्रुवारी महिने का आखरी दिवस 28 शुभ 🌅 रविवार जय श्री सुर्य नारायण 🌅 👣 💐 👏 ॐ नमो नारायणाय नमस्कार 🙏 🚩

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Anita Sharma Feb 27, 2021

*अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी"* ... से एक भक्त ने पूछा कि... महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?.. तुलसीदास बोले :- " हां " भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ??? तुलसीदास :- " हां अवश्य " ....तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!! *तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""* *हर नाम के अंत में राम का ही नाम है.* इसे समझने के लिए तुम्हे एक *"सूत्रश्लोक "* बताता हूं . यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!! भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?" *तुलसीदास* :- यह सूत्र है ... *||"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || "* इस सूत्र के अनुसार ★ *अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें*... *१)उस गिनती को (चतुर्गुण) ४ से गुणाकार करें*. *२) उसमें (पंचतत्व मिलन) ५ मिला लें.* *३) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.* *४)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) ८ से विभाजित करें .* *"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!! ... *यह २ ही "राम" है। यह २ अंक ही " राम " अक्षर हैं*... ★विश्वास नहीं हों रहा है ना??? चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ... आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!! ★ उदा. ..निरंजन... ४ अक्षर १) ४ से गुणा करिए ४x४=१६ २)५ जोड़िए १६+५=२१ ३) दुगने करिए २१×२=४२ ४)८ से विभाजन करने पर ४२÷८= ५ पूर्ण अंक , शेष २ !!! *शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे २ अर्थात् - "राम" !!!* *विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है*!!! ★1) *चतुर्गुण* अर्थात् *४ पुरुषार्थ* :- *धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष* !!! ★2) *पंचतत्व* अर्थात् ५ *पंचमहाभौतिक* :- *पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश*!!! ★3) *द्विगुण प्रमाण* अर्थात् २ *माया व ब्रह्म* !!! ★4) *अष्ट सो भागे* अर्थात् ८ * *आठ प्रकार की लक्ष्मी* (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योग लक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति. ★अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष २ ही प्राप्त होगा ... इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!! 🙏🏻 *जय श्रीराम* 🙏🏻(साभार फेसबुक)

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RAJ RATHOD Feb 26, 2021

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*⛳सनातन-धर्म की जय,हिंदू ही सनातनी है✍🏻* *👉🏻लेख क्र.-सधस/२०७७/माघ/शु./१४-३२०६* 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *⛳🕉️जय श्री बद्रीनाथ जी🕉️⛳* *⛳हिंदू ★रीति★रिवाज ~भाग~५६⛳* 💦🍃💦🍃💦🍃💦🍃💦🍃💦🍃 *⚜️ॐ माँ नर्मदा की महिमा ॐ🚩* *🕉️🚩"त्वदीय पाद पंकजं नमामि देवी नर्मदे नर्मदा सरितां वरा नर्मदा को सरितां वरा"* क्यों माना जाता है? *🌸↪️नर्मदा माता की असंख्य विशेषताओ में श्री "नर्मदा की कृपा दृष्टि" से दिखे कुछ कारण यह है :-* *नर्मदा सरितां वरा -नर्मदा नदियों में सर्वश्रेष्ठ हैं !* *नर्मदा तट पर दाह संस्कार के बाद, गंगा तट पर इसलिए नहीं जाते हैं कि, नर्मदा जी से मिलने गंगा जी स्वयं आती है। नर्मदा नदी पर ही नर्मदा पुराण है ! अन्य नदियों का पुराण नहीं हैं ! नर्मदा अपने उदगम स्थान अमरकंटक में प्रकट होकर, नीचे से ऊपर की और प्रवाहित होती हैं, जबकि जल का स्वभाविक हैं ऊपर से नीचे बहना ।नर्मदा जल में प्रवाहित लकड़ी एवं अस्थियां कालांतर में पाषण रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। नर्मदा अपने उदगम स्थान से लेकर समुद्र पर्यन्त उतर एवं दक्षिण दोनों तटों में,दोनों और सात मील तक पृथ्वी के अंदर ही अंदर प्रवाहित होती हैं , पृथ्वी के उपर तो वे मात्र दर्शनार्थ प्रवाहित होती हैं | (उलेखनीय है कि भूकंप मापक यंत्रों ने भी पृथ्वी की इस दरार को स्वीकृत किया हैं ) नर्मदा से अधिक तीव्र जल प्रवाह वेग विश्व की किसी अन्य नदी का नहीं है।नर्मदा से प्रवाहित जल घर में लाकर प्रतिदिन जल चढाने से बढ़ता है।* *नर्मदा तट में जीवाश्म प्राप्त होते हैं।* *(अनेक क्षेत्रों के वृक्ष आज भी पाषाण रूप में परिवर्तित देखे जा सकते हैं)।नर्मदा से प्राप्त शिवलिंग ही देश के समस्त शिव मंदिरों में स्थापित हैं क्योकि ,शिवलिंग केवल नर्मदा में ही प्राप्त होते हैं अन्यत्र नहीं।* 🍃🌺नर्मदा में ही बाणलिंग, शिव एवं नर्मदेश्वर (शिव ) प्राप्त होते है, अन्यत्र नहीं।नर्मदा के किनारे ही नागमणि वाले मणि नागेश्वर सर्प रहते हैं अन्यत्र नहीं। नर्मदा का हर कंकड़ शंकर होता है ,उसकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती क्योकि , वह स्वयं ही प्रतिष्ठित रहता है। नर्मदा में वर्ष में एक बार गंगा आदि समस्त नदियाँ स्वयं ही नर्मदा जी से मिलने आती हैं। नर्मदा राज राजेश्वरी हैं वे कहीं नहीं जाती हैं।नर्मदा में समस्त तीर्थ वर्ष में एक बार नर्मदा के दर्शनार्थ स्वयं आते हैं। नर्मदा के किनारे तटों पर ,वे समस्त तीर्थ अदृश्य रूप में स्थापित है जिनका वर्णन किसी भी पुराण, धर्मशास्त्र या कथाओं में आया हैं | नर्मदा का प्रादुर्भाव स्रष्टि के प्रारम्भ में सोमप नामक पितरों ने श्राद्ध के लिए किया था। नर्मदा में ही श्राद्ध की उत्पति एवं पितरो द्वारा ब्रह्माण्ड का प्रथम श्राद्ध हुआ था अतः नर्मदा श्राद्ध जननी हैं | नर्मदा पुराण के अनुसार नर्मदा ही एक मात्र ऐसी देवी (नदी )हैं ,जो सदा हास्य मुद्रा में रहती है |नर्मदा तट पर ही सिद्धि प्राप्त होती है। ⚜️🌸ब्रम्हाण्ड के समस्त देव, ऋषि, मुनि, मानव (भले ही उनकी तपस्या का क्षेत्र कही भी रहा हो) सिद्धि प्राप्त करने के लिए नर्मदा तट पर अवश्य आये है। नर्मदा तट पर सिद्धि पाकर ही वे विश्व प्रसिद्ध हुए। नर्मदा (प्रवाहित ) जल में नियमित स्नान करने से असाध्य चर्मरोग मिट जाता है। नर्मदा (प्रवाहित ) जल में तीन वर्षों तक ,प्रत्येक रविवार को नियमित स्नान करने से श्वेत कुष्ठ रोग मिट जाता हैं। किन्तु ,कोई भी रविवार खंडित नहीं होना चाहिए। नर्मदा स्नान से समस्त क्रूर ग्रहों की शांति हो जाती है। नर्मदा तट पर ग्रहों की शांति हेतु किया गया जप पूजन, हवन,तत्काल फलदायी होता है। *🕉️⚜️नर्मदा अपने भक्तों को जीवन काल में दर्शन अवश्य देती हैं ,भले ही उस रूप में हम माता को पहचान न सके।माँ नर्मदा की कृपा से मानव अपने कार्य क्षेत्र में ,एक बार उन्नति के शिखर पर अवश्य जाता है।* *नर्मदा कभी भी मर्यादा भंग नहीं करती है ,वे वर्षा काल में पूर्व दिशा से प्रवाहित होकर , पश्चिम दिशा के ओर ही जाती हैं। अन्य नदियाँ ,वर्षा काल में अपने तट बंध तोडकर ,अन्य दिशा में भी प्रवाहित होने लगती हैं।नर्मदा पर्वतो का मान मर्दन करती हुई पर्वतीय क्षेत्रमें प्रवाहित होकर जन ,धन हानि नहीं करती हैं (मानव निर्मित बांधों को छोडकर )अन्य नदियाँ मैदानी , रितीले भूभाग में प्रवाहित होकर बाढ़ रूपी विनाशकारी तांडव करती हैं।नर्मदा ने प्रकट होते ही अपने अद्भुत आलौकिक सौन्दार्य से समस्त सुरों ,देवो को चमत्कृत करके खूब छकाया था। नर्मदा की चमत्कारी लीला को देखकर शिव पर्वती हसते -हसते हाफने लगे थे।नेत्रों से अविरल आनंदाश्रु प्रवाहित हो रहे थे। उन्होंने नर्मदा का वरदान पूर्वक नामकरण करते हुए कहा - देवी तुमने हमारे ह्रदय को अत्यंत हर्षित कर दिया, अब पृथ्वी पर इसी प्रकार नर्म (हास्य ,हर्ष ) दा(देती रहो ) अतः आज से तुम्हारा नाम नर्मदा होगा।नर्मदा के किनारे ही देश की प्राचीनतम -कोल ,किरात ,व्याध ,गौण ,भील, म्लेच आदि जन जातियों के लोग रहा करते थे ,वे बड़े शिव भक्त थे।* 🍁🌹नर्मदा ही विश्व में एक मात्र ऐसी नदी हैं जिनकी परिक्रमा का विधान हैं, अन्य नदियों की परिक्रमा नहीं होती हैं।नर्मदा का एक नाम दचिन गंगा है।नर्मदा मनुष्यों को देवत्व प्रदान कर अजर अमर बनाती हैं। नर्मदा में ६० करोड़, ६०हजार तीर्थ है, (कलियुग में यह प्रत्यक्ष द्रष्टिगोचर नहीं होते ) नर्मदा चाहे ग्राम हो या वन, सभी स्थानों में पवित्र हैं जबकि गंगा कनखल में एवं सरस्वती कुरुक्षेत्र में ही ,अधिक पवित्र मानी गई हैं।नर्मदा दर्शन मात्र से ही प्राणी को पवित्र कर देती हैं जबकि ,सरस्वती तीन दिनों तक स्नान से, यमुना सात दिनों तक स्नान से गंगा एक दिन के स्नान से प्राणी को पवित्र करती हैं। 🌺🥀नर्मदा पितरों की भी पुत्री हैं अतः नर्मदा में किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है।नर्मदा शिव की इला नामक शक्ति हैं।नर्मदा को नमस्कार कर नर्मदा का नामोच्चारण करने से सर्प दंश का भय नहीं रहता है।नर्मदा के इस मंत्र का जप करने से विषधर सर्प का जहर उतर जाता है.। *नर्मदाये नमः प्रातः, नर्मदाये नमो निशि।* *नमोस्तु नर्मदे तुम्यम, त्राहि माम विष सर्पतह ।।* (प्रातः काल नर्मदा को नमस्कार, रात्रि में नर्मदा को नमस्कार, हे नर्मदा तुम्हे नमस्कार है, मुझे विषधर सापों से बचाओं (साप के विष से मेरी रक्षा करो ) नर्मदा आनंद तत्व ,ज्ञान तत्व सिद्धि तत्व ,मोक्ष तत्व प्रदान कर , शास्वत सुख शांति प्रदान करती हैं। नर्मदा का रहस्य कोई भी ज्ञानी विज्ञानी नहीं जान सकता है। नर्मदा अपने भक्तो पर कृपा कर स्वयं ही दिव्य दृष्टि प्रदान करती है। नर्मदा का कोई भी दर्शन नहीं कर सकता है नर्मदा स्वयं भक्तों पर कृपा करके उन्हें बुलाती है। 🌷💐नर्मदा के दर्शन हेतु समस्त अवतारों में भगवान् स्वयं ही उनके निकट गए थे | नर्मदा सुख ,शांति , समृद्धि प्रदायनी देवी हैं। नर्मदा वह अम्र तत्व हैं ,जिसे पाकर मनुष्य पूर्ण तृप्त हो जाता है। नर्मदा देव एवं पितृ दोनो कार्यों के लिए अत्यंत पवित्र मानी गई हैं।नर्मदा का सारे देश में श्री सत्यनारायण व्रत कथा के रूप में इति श्री रेवा खंडे कहा जाता है।श्री सत्यनारायण की कथा अर्थात घर बैठे नर्मदा का स्मरण। नर्मदा में सदाशिव, शांति से वास करते हैं क्योंकि जहाँ नर्मदा हैं और जहां शिव हैं वहां नर्मदा हैं। ⚜️🌻नर्मदा शिव के साथ ही यदि अमरकंटक की युति भी हो तो साधक को लक्ष की प्राप्ति होती हैं। नर्मदा के किनारे सरसती के समस्त खनिज पदार्थ हैं नर्मदा तट पर ही भगवान धन्वन्तरी की समस्त औषधियाँ प्राप्त होती हैं। नर्मदा तट पर ही त्रेता युग में भगवान् श्री राम द्वारा प्रथम वार कुम्वेश्व तीर्थ की स्थापना हुई थी जिसमें सह्र्स्ती के समस्त तीर्थों का जल , ऋषि मुनियों द्वारा कुम्भो ,घंटों में लाया गया था। नर्मदा के त्रिपुरी तीर्थ देश का केंद्र बिंदु भी था नर्मदा नदी ब्रम्हांड के मध्य भाग में प्रवाहित होती हैं नर्मदा हमारे शरीर रूपी ब्रह्माण्ड के मध्य भाग (ह्रदय ) को पवित्र करें तो , अष्टदल कमल पर कल्याणकारी सदा शिव स्वयमेव आसीन हो जावेगें। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *जनजागृति हेतु लेख प्रसारण अवश्य करें*🙏🏻 ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।। *माता लक्ष्मी की जय🙏🏻🚩* समिति के सामाजिक माध्यमों से जुड़े👇🏻 :- https://bit.ly/3qKE1OS https://t.me/JagratiManch http://bit.ly/सनातनधर्मरक्षकसमिति _*⛳⚜️सनातन धर्मरक्षक समिति*_⚜⛳

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Garima Gahlot Rajput Feb 27, 2021

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M.S.Chauhan Feb 26, 2021

*शुभ रात्रि वंदन* *जय श्रीकृष्ण गोविंद* *जय श्री राधे राधे* *आपका हर पल शुभ हो* *बहुत सुन्दर पोस्ट है* *एक बार जरूर पढ़ें जी* *भागवत रहस्य- गोपी* *गोपियों के दो मुख्य भेद बताये हैं* - *(१) नित्यसिध्धा गोपियाँ और (२) साधनसिध्धा गोपियाँ।* 👉 *(१) नित्यसिध्धा गोपियाँ* वह हैं, जो श्रीकृष्ण के साथ गोलोक से आईं हैं... ललिता, विशाखा,चंपकलता,चित्रा,रंगदेवी, सुदेवी, इंदुलेखा, तुंगविद्या इत्यादि... 👉 *(२) साधनसिध्धा गोपियाँ* के कई भेद हैं - 💞 *(१) श्रुतिरूपा गोपियाँ -* वेद के मन्त्र गोपी बनकर आये हैं। वेदों ने ईश्वर का वर्णन तो बहुत किया है फिर भी उन्हें अनुभव नहीं हो पाया। ईश्वर केवल वाणी का नहीं... स्मरण,चिंतन का विषय है... संसार का विस्मरण हुए बिना ईश्वर से साक्षात्कार नहीं हो पाता । तभी तो वेदभिमानी रुचायें गोकुल में गोपी बनकर आईं हैं। 💞 *(२)ऋषिरूपा गोपियाँ -* जीव का सबसे बड़ा शत्रु काम है। काम से लोभ या क्रोध उत्पन्न होता है। ऋषियों ने वर्षो तक तपश्चर्या की - फिर भी मन में से काम नहीं गया। इस काम को श्रीकृष्ण को अर्पण करने के पश्चात गोपियों का रूप लेकर आये हैं। दंडकारण्य के ऋषियों ने गोपी बनकर आये... भगवान श्रीराम जी ने दंडकारण्य के ऋषियों को ये वरदान दिया था कि- त्रेतायुग में मैं एक पत्नीव्रत धारी हुं...द्वापर युग में हम सब मिलेंगें... तब मैं सबको प्रेमदान दुंगा... 💞 *(३)संकीर्णरूपा गोपियाँ -* ईश्वर के मनोहर स्वरुप को निहारने और उन्हें पाने की इच्छा वाली स्त्रियाँ गोपियाँ बनकर आई हैं। ये भी बहुत बडे भक्त हैं...जनकपुर के नारीयां जो श्रीराम जी को देखते ही सुधबुध खो बैठे...मन ही मन पाने की इच्छा रखने वाली नारीयां गोपी बनकर आयीं...कुछ देवकन्याएं भी गोपी बन कर आयीं... जो श्रीकृष्ण भक्ति किये थे... 💞 *(४)अन्यपूर्वा गोपियाँ -* संसार के सुख भुगतने के बाद जब संसार सुख से विरक्त हो गये और प्रभु को पाने की इच्छा जाग्रत हुआ,और श्रीकृष्ण का भक्ति निष्काम भाव से करने वाले भक्तगण गोपियाँ बनकर आई हैं। 💞 *(५) अनन्यपूर्वा गोपियाँ -* जन्म से ही प्रभु से प्रेम,पूर्ण वैरागी भक्त गोपियाँ बनकर आये हैं। अनेक भोग भुगतने के पश्चात भी श्रीकृष्ण निष्काम हैं - उन्हें भोगो में तनिक भी आसक्ति नहीं है। वो तो आसक्ति मिटाने वाले हैं। श्रीकृष्ण का ध्यान करने वाला व्यक्ति स्वयं निष्काम हो जाता है। कामभाव से भी जो श्रीकृष्ण का चिंतन करता है... भक्ति करता है... परिणाम स्वरूप वह भी निष्कामी बनता है। *चीरहरण लीला के समय श्रीकृष्ण ने गोपियों से प्रतिज्ञा किया था कि योग्य समय आने पर वे रासलीला में मिलेंगे*। *जिसे भगवान अपनाते हैं, अंगीकार करते हैं उसे ही रासलीला में प्रवेश मिलता है*। *गोकुल की सभी गोपियाँ रासलीला में गई नहीं हैं। जो अधिकारी थे, उनको रासलीला में प्रवेश मिला... शरदपूर्णिमा ही वो रात्रि थी,जब गोपीयों को महारास रस मिला...प्रेमदान मिला... इसमें भगवान शंकर जी... माता पार्वती जी भी गोपी बनकर महारास रस प्राप्त किये..*. *राधे राधे*🙏🚩 🌷💐🌿🙏🌿💐🌷

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*🕉️हिन्दू संस्कार🕉️* 💐 *शयन विधान*💐 *सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।* *🌻सोने की मुद्राऐं:* *उल्टा सोये भोगी,* *सीधा सोये योगी,* *दांऐं सोये रोगी,* *बाऐं सोये निरोगी।* *🌻शास्त्रीय विधान भी है।* *आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं,* *बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।* *शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।* *सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र गिने जाए :-* *"सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।* *"सात भय:-"* *इहलोक,परलोक,आदान,* *अकस्मात ,वेदना,मरण ,* *अश्लोक (भय)* *🌻दिशा घ्यान:-* *दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं चाहिए । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,व असंख्य बीमारियाँ होती है।* *✌यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।* *1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।* *2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।* *3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।* *4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से हानि मृत्यु कारक ksh होती है ।* *अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।* *विशेष शयन की सावधानियाँ:-* *1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।* *2:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी चाहिए।* *3:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी चाहिए।* *4:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।* *5:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।* *6:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं चाहिए।* *7:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं ।* *8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है।* *9:- सोते सोते पढना नहीं चाहिए।* *10,:-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है।* (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। ) 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 *🙏🏼 प्रत्येक व्यक्ति यह ज्ञान को प्राप्त कर सके इसलिए शेयर अवश्य करे |* *🙏🏻हिन्दू संस्कार🙏🏻*

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कालभैरव के बारे में आपने भी जरूर सुना होगा। इनकी पूजा भारत के साथ साथ नेपाल, श्रीलंका, तिब्बत आदि में की जाती है। लेकिन इन्हे अलग अलग जगहों पर अलग अलग नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र में खंडोबा के नाम से पूजा अर्चना होती है, वहीं दक्षिण भारत में भैरव का नाम शाश्ता है। ये काल के देवता है। माना जाता है कि भगवान शिव के तम गण हैं – भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि। विपत्ति, रोग और मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके सैनिक हैं और इन सभी गणों के अधिनायक है बाबा काल भैरव। काल भैरव के बारे में शिवपुराण में बताया गया है। एक एक बार तीनों देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश मे विवाद पैदा हो गया कि तीनों में श्रेष्ठ कौन है। तब ब्रह्मा ने शिव की निंदा कर दी। इससे क्रोधित हुए शिव ने रौद्र रूप धारण कर लिया और इसी रौद्र रूप से काल भैरव का जन्म हुआ। काल भैरव ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया। इससे भैरव पर ब्रह्म हत्या का दोष लग गया। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति हेतु काल भैरव ने प्रायश्चित स्वरूप त्रिलोक का भ्रमण किया। लेकिन काशी पहुंचने के बाद वे ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो सके। भैरव को दंड पाणी भी कहा जाता है जिसका अर्थ है पापियों को दंड देने वाले। इसीलिए उनका अस्त्र डंडा और त्रिशूल है। कालभैरव की पूजा करने से ये समस्याएं होती है दूर 1. काल भैरव की पूजा से बड़े से बड़े शत्रु शांत हो जाते हैं। 2. काल भैरव की उपासना का मंत्र ॐ काल भैरवाय नमः है। 3. यदि आप कर्ज में डूबे हैं तो हर बुधवार को कम या ज्यादा काली मिठाई गरीबों में बांटे। 4. यदि मानसिक परेशानियां समाप्त न हो रही हों, नींद न आती हो,डर लगता हो तो पुरोहित जी से भैरव के चरणों में रखा पानी वाला नारियल ले आएं और उसे सिरहाने रखकर सोएं। इस से मन शांत रहेगा। जय श्री कालभैरवाय नम :🌹 👏 नमस्कार शुभ प्रभात वंदन 🌅 👣 👏 शुभ शनिवार जय जय रघुवीर समर्थ जय श्रीराम 👏 🌹 🚩 ॐ गं गनपतये नमः 👏 ॐ नम :शिवाय ॐ निलांजन समाभासं रविपूत्रं यमाग्रजं छाया मार्तण्डं संभूतं तं नमामि शनैश्चरं नमस्कार शुभप्रभात 🌅 शुभ शनिवार जय जय बजरंग बली 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार 🙏 🚩

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