Basu Bhandari
Basu Bhandari Apr 8, 2021

जय श्री विष्णु भगवान

जय श्री विष्णु भगवान

+1 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 1 शेयर

कामेंट्स

श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 29 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ सीताहरण और दैव के विषय में राम-लक्ष्मण की बातचीत, श्रीनारदजी द्वारा नवरात्र-व्रतोपदेश और श्रीराम का व्रत करना... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं-रावण के ये कुत्सित वचन सुनकर माता जानकी भय से व्याकुल हो उठीं। उनका सारा शरीर काँप गया। फिर मन को स्थिर करके उन्होंने कहा- 'पुलस्त्य- कुमार रावण! तू काम के चंगुल में फँसकर क्यों इस प्रकार की घृणित बातें बक रहा है? अरे, मैं हाटकी वेश्या नहीं हूँ। महाराज जनक के कुल में मेरा जन्म हुआ है। रावण! तू लंका चला जा। भगवान् राम तुझे अवश्य मारेंगे, मेरे लिये ही तेरी मृत्यु होगी-यह बिलकुल निश्चित बात है।' इस प्रकार कहकर भगवती जानकी पर्णशाला में, जहाँ अग्नि-स्थापन किया हुआ था, चली गयीं। उस समय जगत् को रुलाने वाले रावण के प्रति 'दूर हो, दूर हो'- यह आवाज उनके मुख से निकल रही थी। तत्पश्चात् राव असली रूप में आकर पर्णशाला के पास पहुँच गया और उसने जबर्दस्ती सीता को पकड़ लिया। सीता भय से घबराकर रोने लगीं। 'हा राम, हा राम, हा लक्ष्मण!' - इस प्रकार की करुण ध्वनि उनके मुख से निरन्तर निकल रही थी। उधर नीच रावण ने उन्हें पकड़ा और रथपर बैठाकर वह तुरंत चल पड़ा। जाते समय मार्ग में अरुणनन्दन जटायु ने उसे घेर लिया। फिर उस वन में ही रावण और जटायु का भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। तात! रावण के हाथों जटायु की सत्ता शिथिल हो गयी तब वह राक्षस सीता को लेकर लंका चला गया। बेचारी सीता कुरी पक्षी की भाँति विलाप कर रही थी। दुष्ट रावण ने अशोकवाटिका में सीता के रहने की व्यवस्था कर दी। उनके पास राक्षसियों का पहरा लगा दिया। साम, दान, दण्ड, भेद-सभी नीतियाँ बरतने पर भी रावण सीता को अपने सदाचार से न डिगा सका । उधर भगवान् राम भी सुवर्णमय मृग को तुरंत मारकर उसे ले आश्रम की ओर बढ़े। उनकी आँखें सामने आते हुए लक्ष्मण पर पड़ीं। तुरंत भगवान् राम ने कहा-'अरे भैया! तुमने यह विषम कार्य क्यों कर डाला? प्रेयसी सीता को असहाय छोड़कर तुम्हारे यहाँ आने का क्या कारण है? क्या तुम इस नीच की पुकार सुनकर चले आये?' उस समय सीता के वचनरूपी बाण से लक्ष्मण अत्यन्त दुःखी थे। उन्होंने भगवान् राम से कहा-'प्रभो! समय बलवान् है। उसी की प्रेरणा से मैं यहाँ आ गया। यही निश्चित वात है। फिर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों पर्णशाला में गये। उन्होंने वहाँ की स्थिति देखी। अब उनके दुःख की सीमा न रही। फिर तो जानकी को खोजने में दोनों भाई तत्पर हो गये। खोजते हुए वे उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ पक्षिराज जटायु गिरे पड़े थे। पृथ्वी ने पक्षिराज को गोद में लिटा लिया था। अभी शरीर में प्राण थे। जटायु ने -' थोड़ी देर की बात है-रावण द्वारा कहा- जनकनन्दिनी जानकी हरी गयी हैं। मैंने उस नीच राक्षस को रोक लिया था; परंतु अन्त में उसकी शक्ति सफल हो गयी, जिससे मुझे समरांगण में लेट जाना पड़ा। इस प्रकार कहने के पश्चात् जटायु के शरीर से प्राण प्रयाण कर गये भगवान् के स्पर्श से उनका शरीर पवित्र हो चुका था। राम और लक्ष्मण ने अपने हाथों पक्षिराज की पारलौकिक क्रिया सम्पन्न की। तदनन्तर व वहाँ से आगे बढ़े। फिर उन्होंने कबन्ध को मारकर उसका शाप से उद्धार किया। कबन्ध के प्रस्ताव पर ही सुग्रीव से राघवेन्द्र की मित्रता हुई। वीरवर वाली भगवान् के हाथ स्वर्ग सिधार गया। कार्य साधन कराने की आशा से श्रीराम ने किष्किन्धा का वह उत्तम राज्य सुग्रीव को सौंप दिया। वहीं लक्ष्मण सहित भगवान् राम बहुत समय तक ठहरे रहे। रावण द्वारा हरी गयी प्रेयसी सीता के विषय में उनका चित्त सदा चिन्तित रहता था। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+48 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 20 शेयर

श्री दुर्गासप्तशती पाठ (हिंदी अनुवाद सहित सम्पूर्ण) (षष्ठोध्याय) ।।ॐ नमश्चण्डिकायै।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ षष्ठोऽध्यायः धूम्रलोचन-वध ध्यानम् ॐ नागाधीश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्धासिताम्। मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥ मैं सर्वज्ञेश्वर भैरव के अंक में निवास करने वाली परमोत्कृष्ट पद्मावती देवी का चिन्तन करता हूँ। वे नागराज के आसन पर बैठी हैं, नागों के फणों में सुशोभित होने वाली मणियों की विशाल माला से उनकी देहलता उद्भासित हो रही है। सूर्य के समान उनका तेज है, तीन नेत्र उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे हाथों में माला, कुम्भ, कपाल और कमल लिये हुए हैं तथा उनके मस्तक में अर्धचन्द्र का मुकुट सुशोभित है। ॐ' ऋषिरुवाच॥ १ ॥ ऋषि कहते हैं-॥१ ॥ इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः । समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात् ॥ २॥ देवी का यह कथन सुनकर दूत को बड़ा अमर्ष हुआ और उसने दैत्यराज के पास जाकर सब समाचार विस्तारपूर्वक कह सुनाया॥ २ ॥ तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकण्य्यासुरराट् ततः । सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम् ॥ ३ ॥ दूत के उस वचन को सुनकर दैत्यराज कुपित हो उठा और दैत्यसेनापति धूम्रलोचनसे बोला- ॥ ३ ॥ हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः । तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम् ॥ ४ ॥ धूम्रलोचन! तुम शीघ्र अपनी सेना साथ लेकर जाओ और उस दुष्टा के केश पकड़कर घसीटते हुए उसे बलपूर्वक यहाँ ले आओ ॥ ४ ॥ तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः । स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा॥ ५ ॥ उसकी रक्षा करने के लिये यदि कोई दूसरा खड़ा हो तो वह देवता, यक्ष अथवा गरन्धर्व ही क्यों न हो, उसे अवश्य मार डालना'॥ ५ ॥ ऋषिरुवाच॥ ६॥ ऋषि कहते हैं-॥६॥ तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः । वृतः षष्ट्या सहस्त्राणामसुराणां द्रुतं ययौ॥ ७ ॥ शुम्भ के इस प्रकार आज्ञा देने पर वह धूम्रलोचन दैत्य साठ हजार असुरों की सेना को साथ लेकर वहाँसे तुरंत चल दिया॥ ७ ॥ स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्। जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ८ ॥ न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्धत्तरमुपैष्यति। ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम् ॥ ९ ॥ वहाँ पहुँचकर उसने हिमालय पर रहने वाली देवी को देखा और ललकारकर कहा- 'अरी ! तू शुम्भ-निशुम्भ के पास चल । यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामी के समीप नहीं चलेगी तो मैं बलपूर्वक झोंटा पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा'॥ ८-९॥ देव्युवाच॥ १० ॥ देवी बोलीं-॥ १०॥ दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः । बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ।॥ ११ ॥ तुम्हें दैत्यों के राजाने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान् हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है; ऐसी दशा में यदि मुझे बलपूर्वक ले चलोगे तो मैं तुम्हारा क्या कर सकती हूँ? ॥ ११ ॥ ऋषिरुवाच॥ १२॥ ऋषि कहते हैं-॥ १२॥ इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः ॥ १३ ॥ देवीके यों कहने पर असुर धूम्रलोचन उनकी ओर दौड़ा, तब अम्बिकाने 'हुं' शब्द के उच्चारणमात्र से उसे भस्म कर दिया॥ १३ ॥ अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका'। ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥ १४॥ फिर तो क्रोधमें भरी हुई दैत्यों की विशाल सेना और अम्बिका ने एक-दूसरे पर तीखे सायकों, शक्तियों तथा फरसों की वर्षा आरम्भ की ॥ १४॥ ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहन: ॥ १५ ॥। इतने में ही देवी का वाहन सिंह क्रोध में भरकर भयंकर गर्जना करके गर्दन के बालों को हिलाता हुआ असुरों की सेना में कूद पड़ा ॥ १५॥ कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान्। आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान* महासुरान् ॥ १६॥ उसने कुछ दैत्यों को पंजों की मार से, कितनों को अपने जबड़ों से और कितने ही महादैत्यों को पटककर ओठ की दाढ़ों से घायल करके मार डाला॥ १६ ॥ केषांचित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी"। तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक् ॥ १७॥ उस सिंह ने अपने नखों से कितनों के पेट फाड़ डाले और थप्पड़ मारकर कितनों के सिर धड़ से अलग कर दिये॥ १७॥ विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे। पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः ॥ १८॥ कितनों की भुजाएँ और मस्तक काट डाले तथा अपनी गर्दन के बाल हिलाते हुए उसने दूसरे दैत्यों के पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया॥ १८॥ क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ॥ १९॥ अत्यन्त क्रोध में भरे हुए देवी के वाहन उस महाबली सिंहने क्षणभर में ही असुरों की सारी सेना का संहार कर डाला॥ १९ ॥ श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम् । बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः॥ २०॥ चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः । आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥ २१ ॥ शुम्भने जब सुना कि देवी ने धूम्रलोचन असुर को मार डाला तथा उसके सिंह ने सारी सेना का सफाया कर डाला, तब उस दैत्यराज को बड़ा क्रोध हुआ। उसका ओठ कॉँपने लगा। उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो महादैत्यों को आज्ञा दी-॥ २०-२१ ॥ हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभि: परिवारितौ । तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु॥ २२ ॥ कैशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि। तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम् ॥ २३॥ 'हे चण्ड! और हे मुण्ड! तुमलोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ जाओ, उस देवी के झोंटे पकड़कर अथवा उसे बाँधकर शीघ्र यहाँ ले आओ। यदि इस प्रकार उसको लानेमें संदेह हो तो युद्धमें सब प्रकारके अस्त्र शस्त्रों तथा समस्त आसुरी सेना का प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना।॥ २२-२३॥ तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते। शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्। ॥ॐ ॥ २४॥ उस दुष्टाकी हत्या होने तथा सिंह के भी मारे जाने पर उस अम्बिका को बाँधकर साथ ले शीघ्र ही लौट आना' ॥ २४॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णि के मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भनिशुम्भ सेनानी धूम्रलोचन वधो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'धूम्रलोचन- वध' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ॥ ६ ॥ क्रमशः.... अगले लेख में सप्तम अध्याय जय माता जी की। पं देवशर्मा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+18 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 10 शेयर

संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (पचपनवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय कुक्कुट-मर्कटी-व्रत कथा (मुक्ताभरण सप्तमी व्रत-कथा)...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज युधिष्ठिर ! एक बार महर्षि लोमश मथुरा आये और वहाँ मेरे माता-पिता-देवकी-वसुदेव ने उनकी बड़ी श्रद्धा से आवभगत की। फिर वे प्रेम से बैठकर अनेक प्रकार की कथाएँ कहने लगे। उन्होंने उसी प्रसंग में मेरी माता से कहा-'देवकी! कंस ने तुम्हारे बहुत से पुत्रों को मार डाला है, अतः तुम मृतवत्सा एवं दु:खभागिनी बन गयी हो। इसी प्रकार से प्राचीन काल में चन्द्रमुखी नाम की एक सुलक्षणा रानी भी मृतवत्सा एवं दुःखी हो गयी थी। परंतु उसने एक ऐसे व्रत का अनुष्ठान किया, जिसके प्रभाव से वह जीवत्पुत्रा हो गयी। इसलिये देवकी ! तुम भी उस व्रत के अनुष्ठान के प्रभाव से वैसी हो जाओगी, इसमें संशय नहीं। माता देवकी ने उनसे पूछा-महाराज! वह चन्द्रमुखी रानी कौन थी? उसने सौभाग्य और आरोग्य की वृद्धि करने वाला कौन-सा व्रत किया था? जिसके कारण उसकी संतान जीवित हो गयी आप मुझे भी वह व्रत बतलाने की कृपा करें। लोमशमुनि बोले-प्राचीन काल में अयोध्या में नहुष नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे, उन्हीं की महारानी का नाम चन्द्रमुखी था। राजा के पुरोहित की पत्नी मानमानिका से रानी चन्द्रमुखी की बहुत प्रीति थी। एक दिन वे दोनों सखियाँ स्नान करने के लिये सरयू-तटपर गयीं। उस समय नगर की और बहुत-सी स्त्रियाँ वहाँ स्नान करने आयी हुई थीं। उन सब स्त्रियों ने स्नानकर एक मण्डल बनाया और उसमें शिव-पार्वती की प्रतिमा चित्रितकर गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से भक्तिपूर्वक यथाविधि उनकी पूजा की। अनन्तर उन्हें प्रणामकर जब वे सभी अपने घर जाने को उद्यत हुईं, तब महारानी चन्द्रमुखी तथा पुरोहित की स्त्री मानमानिका ने उनसे पूछा-'देवियो! तुमलोगों ने यह किसकी और किस उद्देश्य से पूजा की है?' इसपर वे कहने लगीं-'हमलोगों ने भगवान् शिव एवं भगवती पार्वती की पूजा की है और उनके प्रति आत्म समर्पण कर यह सुवर्णसूत्रमय धागा भी हाथ में धारण किया है। हम सब जबतक प्राण रहेंगे, तबतक इसे धारण किये रहेंगी और शिव-पार्वती का पूजन भी किया करेंगी।' यह सुनकर उन दोनों ने भी यह व्रत करने का निश्चय किया और वे अपने घर आ गयीं तथा नियम से व्रत करने लगीं परंतु कुछ समय बाद रानी चन्द्रमुखी प्रमादवश व्रत करना भूल गयीं और सूत्र भी न बाँध सकी। इस कारण मरने के अनन्तर वह वानरी हुईं, पुरोहित की स्त्री का भी व्रत भङ्ग हो गया, इसलिये मरकर वह कुक्कुटी हुई। उन योनियों में भी उनकी मित्रता और पूर्वजन्म की स्मृतियाँ बनी रहीं। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+18 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर

संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (पन्द्रहवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है-इसका प्रतिपादन एवं महात्मा पुरुषों के लक्षण तथा आत्मकल्याण के लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण-निरोधरूप योग का वर्णन ...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ जिस प्रकार सुवर्ण से आभूषण और जल से तरङ्ग भिन्न नहीं है, वैसे ही प्रकृति ब्रह्म में बिना हुए ही प्रतीत होती है, किंतु ब्रह्म से भिन्न नहीं है । यह जीवात्मा चेतन है और यह पदार्थ जड है-इस प्रकार का मोह अज्ञानी को ही होता है, ज्ञानी को कभी नहीं होता। जिस प्रकार अंधे मनुष्य को जगत् अन्धकार रूप और सुदृष्टिवाले को प्रकाशरूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार अज्ञानी को यह जगत् दुःखमय और ज्ञानी को सच्चिदानन्दमय प्रतीत होता है। सदा-सर्वदा सब ओर एकरस स्थित विज्ञानानन्दघन ब्रह्म में न कोई मरता है और न कोई जीता है। जिस प्रकार महान् सागर के उल्लसित होने पर भी उसमें तरङ्ग आदि न जन्मते हैं और न मरते हैं, उसी प्रकार वस्तुतः ब्रह्म में प्राणी न जन्मते हैं और न मरते हैं । जैसे जल में तरङ्गों के रूप में प्रचुर जल ही स्थित है, वैसे ही अपने आप में जगत की शक्ति के रूप में ब्रह्म ही स्थित है । जैसे जल में जो कण, कणिका, वीचि, तरङ्ग, फेन और लहरी हैं, वे सब जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्म में जो देह, मन का व्यापार, दृश्य,क्षय, क्षय का अभाव, भाव-रचना और अर्थ हैं, वे सब ब्रह्मस्वरूप ही हैं । जिस प्रकार सुवर्ण से बनी आभूषण की विभिन्न आकृति-रचनाएँ सुवर्ण से पृथक् नहीं होती, उसी प्रकार ब्रह्म से उत्पन्न हुई चित्र विचित्र देहादि की आकृति-रचनाएँ भी ब्रह्म से भिन्न नहीं हो सकतीं । अज्ञानियों को वृथा ही उसमें द्वित्वभावना होती है। मन, बुद्धि अहंकार, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ आदि सब ब्रह्म रूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं; अतः ब्रह्म से भिन्न सुख और दुःख की भी सत्ता नहीं है। ब्रह्म को ब्रह्म न जानने से अज्ञानी के लिये वह प्राप्त होते हुए भी अप्राप्त - है, जिस तरह, सुवर्ण का ज्ञान हुए बिना सुवर्ण प्राप्त हुआ भी अप्राप्त ही है । ब्रह्म को ब्रह्म जान लेने पर तत्क्षण ही ब्रह्म प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार सुवर्ण को सुवर्ण जान लेने पर तत्क्षण ही सुवर्ण प्राप्त हो जाता है । कर्म, कर्ता, करण, कारण और विकारों से रहित स्वयं समर्थ महान् आत्मा ही ब्रह्म है, यों ब्रह्मज्ञानी लोग कहते हैं । यह देह मैं नहीं हूँ! इस प्रकार जब ज्ञान हो जाता है, तो ब्रह्म भावना उत्पन्न होती है । इससे हमें अहं- भाव मिथ्या सिद्ध हो जाता है । उस समय पुरुष देह से विरक्त हो जाता है । मैं एकमात्र ब्रह्म स्वरूप हूँ? इस प्रकार यथार्थ ज्ञान होने पर ब्रह्मभावना प्रकट होती है । उस अपने वास्तविक रूप का यथार्थ ज्ञान होने पर अज्ञान विलीन हो जाता है । मुझे न दुःख है न कर्म हैं, न मोह है न कुछ अभिलषित है मैं एकरूप, अपने स्वरूप में स्थित, शोकशून्य तथा ब्रह्मस्वरूप हूँ-यह धुव सत्य है । मैं कल्पनाओं से शून्य मैं सर्वविध विकारों से रहित और सर्वात्मक हूँ; मैं न त्याग करता हूँ और न कुछ चाहता हूँ मैं परब्रह्मस्वरूप परमात्मा हूँ, यह ध्रुव सत्य है । जिसमें सब कुछ स्थित है, जिससे यह सब उत्पन्न हुआ है, जो यह सब है, जो सब ओर विद्यमान है एवं जो सबका अद्वितीय आत्मा है, वही परब्रह्म परमात्मा है । यह निश्चय है, वही चेतन आत्मा -वह व्यापक, दृश्यरहित सच्चिदानन्दघन ब्रह्मतत्त्व ही ब्रह्म, सत्, सत्य, ऋत, ज्ञ इत्यादि नामों से सर्वत्र कहा जाता है । विषय-संसर्गरहित, चेतनमात्र स्वरूप, विशुद्ध, समस्त भूत-प्राणियो को जानने वाला, सर्वव्यापक, परम शान्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म का ब्रह्मज्ञानी अनुभव करते हैं। सुषुप्ति के सदृश समस्त विकल्पों से रहित, परम शान्तरूप, विशुद्ध प्रकाश रूप, सांसारिक विषय-सुखों से अत्युत्तम तथा वासनाओं से रहित सच्चिदानन्द ब्रह्म ही मैं हूँ। सुख-दुःख आदि कल्पनाओं से रहित, निर्मल, सत्य अनुभवरूप जो शाश्वत सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूप है, वही मैं हूँ। पर्वत आदि पदार्थ-समुदाय के बाहर एवं भीतर सर्वदा समान सत्तारूप से व्यापक निर्लेप विज्ञानानन्दधन जो परमात्मा है, वही मैं हूँ। जो सम्पूर्ण संकल्पों का फल देनेवाला, अग्नि सूर्य-चन्द्र आदि सम्पूर्ण तेजों का प्रकाशक और प्राप्त करने योग्य सम्पूर्ण पदार्थो की अन्तिम सीमा है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा की हम उपासना करते हैं । वह चिन्मय परमात्मा बाहर-भीतर-सर्वत्र प्रकाश रूप से विद्यमान और अपने आप में स्थित है; सबके हृदय में स्थित होते हुए भी उसका अज्ञान के कारण अनुभव नहीं होता; अतः वह दूर न होते हुए भी दूर कहा गया है। उस परमात्मा की हम उपासना करते हैं । जो समस्त संकल्पों, कामनाओं तथा रोष आदि से रहित है, उस चिन्मय परमात्मा की हम उपासना करते हैं । उस परमात्मा में यह सारा जगत् प्रतीत होता है, किंतु वास्तव में इस जगत् का उसमें अत्यन्ताभाव है तथा वास्तव में वह है, इसीलिये वह सद्प है; किंतु वह मन-इन्द्रियों का विषय नहीं है, इसलिये असदरूप है । ऐसे उस एक अद्वितीय निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्द परमात्मा को मैं प्राप्त हूँ। जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि सारे विषय-पदार्थों का प्रकाशक है और वास्तव में जो उन सब विषय-पदार्थों से रहित है, उस परम शान्त चिन्मय परमात्मा मैं प्राप्त हूँ । जो समस्त विभूतियों और महिमाओं से युक्त प्रतीत होता है, किंतु जो वास्तव में समस्त विभूतियों एवं महिमाओं से रहित है तथा जो माया के सम्बन्ध से जगत् का कर्ता-सा प्रतीत होते हुए भी वास्तव में अकर्ता है, उस विज्ञानानन्दघन परमात्मा को मैं प्राप्त हूँ। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+12 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर

श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथ द्वादशोऽध्यायः रहूगण का प्रश्न और भरतजी का समाधान...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नमो नमः कारणविग्रहाय स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय नमोऽवधूत द्विजबन्धुलिङ्ग निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥ १ ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत् निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः । कुदेहमानाहिविदष्टदृष्ट ब्रह्मन् वचस्तेऽमृतमौषधं मे ॥ २ तस्माद्भवन्तं मम संशयार्थं प्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् । अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त- माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ॥३ यदाह योगेश्वर दृश्यमानं क्रियाफलं सदव्यवहारमूलम् । न हाञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय भवानमुष्पिन् भ्रमते मनो मे ॥४ ब्राह्मण उवाच अयं जनो नाम चलन् पृथिव्यां य: पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः । तस्यापि चाङ्घ्योरधि गुल्फजङ्का- जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः॥ ५ अंसेऽधि दार्वी शिबिका च यस्यां सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो राजास्मि सिन्धुष्टिति दुर्मदान्धः ।।६ शोच्यानिरमांस्वमधिकष्टदीनान् विष्ट्या निगृह्न्निरनुग्रहोऽसि । जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो न शोभसे वृद्धसभाषु धृष्टः' ॥ ७ यदा क्षितावेव चराचरस्य विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । तत्रामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं निरूप्यतां सत् क्रिययानुमेयम् ॥ ८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ राजा रहूगण ने कहा -भगवन् ! मैं आपको - नमस्कार करता हूँ। आपने जगत् का उद्धार करने के लिये ही यह देह धारण की है । योगेश्वर ! अपने परमानन्दमय स्वरूप का अनुभव करके आप इस स्थूलशरीर से उदासीन हो गये हैं तथा एक जड ब्राह्मण के वेष से अपने नित्यज्ञानमय स्वरूप को जनसाधारण की दृष्टि से ओझल किये हुए हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ ब्रह्मन् ! जिस प्रकार ज्वर से पीड़ित रोगी के लिये मीठी ओषधि और धूप से तपे हुए पुरुष के लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धि को देहाभिमानरूप विषैले सर्पने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधि के समान हैं॥ २ ॥ देव ! मैं आपसे अपने संशयों की निवृत्ति तो पीछे कराऊँगा। पहले तो इस समय आपने जो अध्यात्म योगमय उपदेश दिया है, उसी को सरल करके समझाइये, उसे समझने की मुझे बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ३ ॥ योगेश्वर ! आपने जो यह कहा कि भार उठाने की क्रिया तथा उससे जो श्रमरूप फल होता है, वे दोनों ही प्रत्यक्ष होने पर भी केवल व्यवहारमूल के ही हैं, वास्तव में सत्य नहीं है-वे तत्त्वविचार के सामने कुछ भी नहीं ठहरते-सो इस विषय में मेरा मन चक्कर खा रहा है, आपके इस कथन का मर्म मेरी समझ में नहीं आ रहा है॥४॥ जडभरत ने कहा-पृथ्वीपते ! यह देह पृथ्वी का विकार है, पाषाणादि से इसका क्या भेद है ? जब यह किसी कारण से पृथ्वी पर चलने लगता है, तब इसके भारवाही आदि नाम पड़ जाते हैं। इसके दो चरण हैं; उनके ऊपर क्रमशः टखने, पिंडली, घुटने, जाँघ, कमर, वक्षःस्थल, गर्दन और कंधे आदि अङ्ग ॥ ५ ॥ कंधों के ऊपर लकड़ी की पालकी रखी हुई है; उसमें भी सौवीरराज नाम का एक पार्थिव विकार ही है, जिसमें आत्मबुद्धि रूप अभिमान करने से तुम 'मैं सिन्धु देश का राजा हूँ इस प्रबल मद से अंधे हो रहे हो । ६ ॥ किन्तु इसी से तुम्हारी कोई श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, वास्तव में तो तुम बड़े क्रूर और धृष्ट ही हो। तुमने इन बेचारे दीन-दुखिया कहारों को बेगार में पकड़कर पालकी में जोत रखा है और फिर महापुरुषों की सभा में बढ़-बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकों की रक्षा करने वाला हूँ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥ ७ ॥ हम देखते हैं कि सम्पूर्ण चराचर भूत सर्वदा पृथ्वी से ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वी में ही लीन होते हैं; अतः उनके क्रियाभेद के कारण जो अलग-अलग नाम पड़ गये हैं-बताओ तो, उनके सिवा व्यवहार का और क्या मूल है ? ॥ ८ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+8 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

इक्यावन शक्तिपीठों में से एक माँदंतेश्‍वरी मंदिर 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की हसीन वादियों में स्तिथ है, दन्तेवाड़ा का प्रसिद्ध दंतेश्‍वरी मंदिर। देवी पुराण में शक्ति पीठों की संख्या 51 बताई गई है जबकि तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। जबकि कई अन्य ग्रंथों में यह संख्या 108 तक बताई गई है। दन्तेवाड़ा को हालांकि देवी पुराण के 51 शक्ति पीठों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन इसे देवी का 52 वा शक्ति पीठ माना जाता है। मान्यता है की यहाँ पर सती का दांत गिरा था इसलिए इस जगह का नाम दंतेवाड़ा और माता क़ा नाम दंतेश्वरी देवी पड़ा। 51 शक्ति पीठों की जानकारी और शक्ति पीठों के निर्माण कि कहानी आप हमारे पिछले लेख 51 शक्ति पीठ में पढ़ सकते है। दंतेश्‍वरी मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदीयों के संगम पर स्तिथ हैं। दंतेश्‍वरी देवी को बस्तर क्षेत्र की कुलदेवी का दर्ज़ा प्राप्त है। इस मंदिर की एक खासियत यह है की माता के दर्शन करने के लिए आपको लुंगी या धोति पहनकर ही मंदीर में जाना होगा। मंदिर में सिले हुए वस्त्र पहन कर जानें की मनाही है। मंदिर के निर्माण की कथा : दन्तेवाड़ा शक्ति पीठ में माँ दन्तेश्वरी के मंदीर का निर्माण कब व कैसे हूआ इसकि क़हानी कुछ इस तरह है। ऐसा माना जाता है कि बस्‍तर के पहले काकातिया राजा अन्‍नम देव वारंगल से यहां आए थे। उन्‍हें दंतेवश्‍वरी मैय्या का वरदान मिला था। कहा जाता है कि अन्‍नम देव को माता ने वर दिया था कि जहां तक वे जाएंगे, उनका राज वहां तक फैलेगा। शर्त ये थी कि राजा को पीछे मुड़कर नहीं देखना था और मैय्या उनके पीछे-पीछे जहां तक जाती, वहां तक की ज़मीन पर उनका राज हो जाता। अन्‍नम देव के रूकते ही मैय्या भी रूक जाने वाली थी। अन्‍नम देव ने चलना शुरू किया और वे कई दिन और रात चलते रहे। वे चलते-चलते शंखिनी और डंकिनी नंदियों के संगम पर पहुंचे। यहां उन्‍होंने नदी पार करने के बाद माता के पीछे आते समय उनकी पायल की आवाज़ महसूस नहीं की। सो वे वहीं रूक गए और माता के रूक जाने की आशंका से उन्‍होंने पीछे पलटकर देखा। माता तब नदी पार कर रही थी। राजा के रूकते ही मैय्या भी रूक गई और उन्‍होंने आगे जाने से इनकार कर दिया। दरअसल नदी के जल में डूबे पैरों में बंधी पायल की आवाज़ पानी के कारण नहीं आ रही थी और राजा इस भ्रम में कि पायल की आवाज़ नहीं आ रही है, शायद मैय्या नहीं आ रही है सोचकर पीछे पलट गए। वचन के अनुसार मैय्या के लिए राजा ने शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर एक सुंदर घर यानि मंदिर बनवा दिया। तब से मैय्या वहीं स्‍थापित है। दंतेश्वरी मंदिर के पास ही शंखिनी और डंकिन नदी के संगम पर माँ दंतेश्वरी के चरणों के चिन्ह मौजूद है और यहां सच्चे मन से की गई मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती है। अदभुत है मंदिर : दंतेवाड़ा में माँ दंतेश्वरी की षट्भुजी वाले काले ग्रेनाइट की मूर्ति अद्वितीय है। छह भुजाओं में दाएं हाथ में शंख, खड्ग, त्रिशुल और बाएं हाथ में घंटी, पद्य और राक्षस के बाल मांई धारण किए हुए है। यह मूर्ति नक्काशीयुक्त है और ऊपरी भाग में नरसिंह अवतार का स्वरुप है। माई के सिर के ऊपर छत्र है, जो चांदी से निर्मित है। वस्त्र आभूषण से अलंकृत है। द्वार पर दो द्वारपाल दाएं-बाएं खड़े हैं जो चार हाथ युक्त हैं। बाएं हाथ सर्प और दाएं हाथ गदा लिए द्वारपाल वरद मुद्रा में है। इक्कीस स्तम्भों से युक्त सिंह द्वार के पूर्व दिशा में दो सिंह विराजमान जो काले पत्थर के हैं। यहां भगवान गणेश, विष्णु, शिव आदि की प्रतिमाएं विभिन्न स्थानों में प्रस्थापित है। मंदिर के गर्भ गृह में सिले हुए वस्त्र पहनकर प्रवेश प्रतिबंधित है। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने पर्वतीयकालीन गरुड़ स्तम्भ से अड्ढवस्थित है। बत्तीस काष्ठड्ढ स्तम्भों और खपरैल की छत वाले महामण्डप मंदिर के प्रवेश के सिंह द्वार का यह मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। मांई जी का प्रतिदिन श्रृंगार के साथ ही मंगल आरती की जाती है। माँ भुनेश्वरी देवी : माँ दंतेश्वरी मंदिर के पास ही उनकी छोटी बहन माँ भुनेश्वरी का मंदिर है। माँ भुनेश्वरी को मावली माता, माणिकेश्वरी देवी के नाम से भी जाना जाता है। माँ भुनेश्वरी देवी आंध्रप्रदेश में माँ पेदाम्मा के नाम से विख्यात है और लाखो श्रद्धालु उनके भक्त हैं। छोटी माता भुवनेश्वरी देवी और मांई दंतेश्वरी की आरती एक साथ की जाती है और एक ही समय पर भोग लगाया जाता है। लगभग चार फीट ऊंची माँ भुवनेश्वरी की अष्टड्ढभुजी प्रतिमा अद्वितीय है। मंदिर के गर्भगृह में नौ ग्रहों की प्रतिमाएं है। वहीं भगवान विष्णु अवतार नरसिंह, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं प्रस्थापित हैं। कहा जाता है कि माणिकेश्वरी मंदिर का निर्माण दसवीं शताब्दी में हुआ। फाल्गुन में होता है मड़ई उत्सव क्या आयोज़न : होली से दस दिन पूर्व यहां फाल्गुन मड़ई का आयोजन होता है, जिसमें आदिवासी संस्कृति की विश्वास और परंपरा की झलक दिखाई पड़ती है। नौ दिनों तक चलने वाले फाल्गुन मड़ई में आदिवासी संस्कृति की अलग-अलग रस्मों की अदायगी होती है। मड़ई में ग्राम देवी-देवताओं की ध्वजा, छत्तर और ध्वजा दण्ड पुजारियों के साथ शामिल होते हैं। करीब 250 से भी ज्यादा देवी-देवताओं के साथ मांई की डोली प्रतिदिन नगर भ्रमण कर नारायण मंदिर तक जाती है और लौटकर पुनरू मंदिर आती है। इस दौरान नाच मंडली की रस्म होती है, जिसमें बंजारा समुदाय द्वारा किए जाने वाला लमान नाचा के साथ ही भतरी नाच और फाग गीत गाया जाता है। मांई जी की डोली के साथ ही फाल्गुन नवमीं, दशमी, एकादशी और द्वादशी को लमहा मार, कोड़ही मार, चीतल मार और गौर मार की रस्म होती है। मड़ई के अंतिम दिन सामूहिक नृत्य में सैकड़ों युवक-युवती शामिल होते हैं और रात भर इसका आनंद लेते हैं। फाल्गुन मड़ई में दंतेश्वरी मंदिर में बस्तर अंचल के लाखों लोगों की भागीदारी होती है। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

+89 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 42 शेयर

संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (नवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः अज्ञान की महिमा और विभूतियों का सविस्तर वर्णन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ संसाररूपी स्वल्प जलाशय में स्फुरित होने वाली सृष्टि रूपी क्षुद्र मछली को शठ कृतान्तरूपी वृद्ध गीव जो पकड़ लेता है, उसमें भी माया की ही महिमा है । परमपदरूप अचल ब्रह्मा संकल्प से उत्पन्न असंख्य जगदरूप जंगलों के जाल युगान्तरूपी अग्नी से जो दग्ध हो जाते हैं, उसमें भी अविद्या ही कारण है । निरन्तर उत्पत्ति और विनाश से तथा दुःख और सुख की सैकड़ों दशाओं से, इस प्रकार जगत्स्थिति जो पुनः पुन: बदलती रहती है, उसमें भी अविद्या ही कारण है । वासनारूपी जंजीरों से बँधी हुई अज्ञानियों की दृढ़ धारणा क्षुभित युगों के आवागमन तथा कठोर वज्रों के आघातों से भी जो विदीर्ण नहीं होती, इसमें उनकी अविद्या ही कारण है । राग-द्वेष से होने वाले उत्पत्ति-विनाश से तथा जरा मरण रूपी रोग से समस्त जंगम जाति जीर्ण-शीर्ण हो गयी है, इसमें उनका अज्ञान ही कारण है। कभी लक्ष्य में न आने वाले बिल में रहने के कारण अदृश्य और अपरिमिति भोजन करने वाला कालरूपी सर्प निर्भय होकर इस समस्त जगत् को जो क्षणभर में ही निगल जाता है, यह सब माया की ही महिमा है । प्रत्येक कल्परूप क्षण में क्षीण हो जाने- वाले ब्रह्माण्डरूप प्रस्फुट बुद्बुद, जो भयंकर कालरूपी महासमुद्र में उत्पन्न और विनष्ट हो जाते हैं, यह भी माया की महिमा है । उत्पन्न हो-होकर नष्ट हो जाने वाली प्रतप्त सृष्टिरूपी ये बिजलियाँ, जिन्हें चिन्मय परमात्मा के सकाश से प्रकाश-शक्ति प्राप्त हुई है, जो प्रकट होती हैं, वह भी माया की महिमा है । अनन्त संकल्पों वाली समस्त विकल्पों से शून्य विज्ञानानन्दधन ब्रह्मरूप पद में आश्चर्यों की पूर्ति करने वाली ऐसी कौन-सी शक्तियाँ नहीं हैं ! अर्थात् सभी शक्तियाँ उसमें विद्यमान हैं। उस प्रकार सुदृढ़ संकल्पों से प्राप्त अर्थसमूह से देदीप्यमान जगत् की ब्रह्म में जो यह कल्पना है, उसमें भी अज्ञान ही हेतु है। इसलिये श्रीराम ! जो कुछ बारंबार प्राप्त होने वाली सम्पत्तियाँ या आपत्तियाँ हैं, जो बाल्य यौचन-जरा-मरणरूपी महान् संताप हैं, जो सुख-दुःख की परम्परारूप संसार-सागर में गोता लगाना है, वह सब अज्ञानरूपी गाढ़ अन्धकार की विभूतियाँ हैं। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 28 (भाग 3) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नवरात्र-व्रत के प्रसंग में श्रीरामचरित्र का वर्णन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं-उस समय सीता की आँखों से आँसू गिर रहे थे। यद्यपि उनका स्वभाव बड़ा ही सौम्य था, फिर भी लीलावश सदाचारी लक्ष्मण के प्रति वे कुछ कठोर वचन कह गयीं। भगवती जानकी का कथन सुनकर लक्ष्मण का मन क्षुब्ध हो उठा। कुछ समय तक वे चुप रहे। फिर जनकनन्दिनी जानकी से कहा-'क्षितिजे! आपने मेरे प्रति कितने कठोर वचन कह डाले! इतनी अहितकर बात आपके मुख से क्यों निकल रही है? इसका अन्तिम परिणाम मेरी समझ में आ गया। राजन्! इस प्रकार कहने के पश्चात् वीरवर लक्ष्मण सीता को वहीं छोड़कर अपने बड़े भाई श्रीराम को खोजते हुए चल पड़े। उस समय लक्ष्मण की आँखों से आँसुओं की अजस्र धारा बह रही थी। वे बड़े दुःखी थे। उनके जाते ही उस आश्रम में रावण का प्रवेश हो गया। रावण ने माया से अपना भिक्षुक का वेष बना रखा था। जानकी ने उस दुरात्मा रावण को संन्यासी समझकर आदरपूर्वक अर्घ्य और फल निवेदन करने के उपरान्त उसके सामने भोजन-सामग्री उपस्थित की, तब उस नीच रावण ने नम्रता के साथ बड़े मधुर स्वर में सीता से पूछा-'कमल के समान सुन्दर नेत्र वाली! तुम अकेली ही इस वन में कौन हो? वामोरु! तुम किसकी पुत्री हो, कौन तुम्हारा भाई है और किससे तुम्हारा विवाह हुआ है? सुन्दरी! तुम क्यों एक गँवारिन स्त्री की भाँति बिना किसी को साथ लिये यहाँ ठहरी हुई हो ? प्रिये! तुम देवकन्या के समान श्रेष्ठ प्रतिभावाली हो? तुम्हें ऊँचे महलों में रहना चाहिये। मुनि पत्नी की भांति इस निर्जन वन में तुम्हारे रहने का क्या कारण है?' व्यासजी कहते हैं-रावण के उक्त कथन को सुनकर जनककुमारी जानकी उत्तर देने लगीं । दैववश उस समय भी उनको मन्दोदरीपति रावण दिव्य यति ही जान पड़ा। सीता ने कहा-"एक समृद्धिशाली राजा हैं। उनका नाम महाराज दशरथ है। उनके चार लड़के हैं। उनमें सबसे बड़े लड़के, जिनकी 'राम' नाम से प्रसिद्धि है, मेरे पतिदेव हैं। राजा ने मेरे स्वामी को चौदह वर्ष के लिये वनवास दे दिया। इसमें कैकेयी निमित्त हुई थीं। अतः लक्ष्मण के साथ वे यहाँ निवास करते हैं। मैं जनक की पुत्री हूँ। मुझे लोग जानकी कहते हैं। भगवान् शंकर का धनुष तोड़कर श्रीराम ने मुझे अपनी पत्नी बनाया है। उन्हीं के बाहुबल से सुरक्षित मैं इस निर्जन वन में रहती हूँ। सुवर्णमय मृग देखकर उसे मारने के लिये अभी मेरे पतिदेव गये हैं। फिर भाई की पुकार सुनकर लक्ष्मण का भी इसी क्षण उधर जाना हो गया है। उन राम और लक्ष्मण की भुजा के प्रताप से ही मैं यहाँ निर्भय रहती हूँ। मेरे वनवासी जीवन व्यतीत करने का यही सब वृत्तान्त है। मेरे पतिदेव और देवर दोनों महानुभाव अब आते ही होंगे। वे आकर आपकी विधिपूर्वक पूजा करेंगे। संन्यासी भगवान् विष्णु के स्वरूप हैं। अतः आप मेरे पूजा के पात्र बन चुके; किंतु इस भयंकर वन में बहुत-से राक्षस रहते हैं। यहीं पर यह आश्रम बना है। इसी से मैं आपसे पूछती हूँ, आप मेरे सामने सच्ची बात बताने की कृपा करें। आप संन्यासी के वेष में इस जंगल में पधारे हुए कौन हैं?" रावण ने कहा-मैं लंका का समृद्धिशाली राजा रावण हूँ। मेरी स्त्री का नाम मन्दोदरी है। सुन्दरी! तुम्हें पाने के लिये ही मैंने ऐसा रूप बना लिया है। वरारोहे! अभी बहन शूर्पणखा के प्रेरणा करने पर मैं यहाँ आया हूँ। खर और दूषण दोनों भाई जनस्थान में मारे गये, यह समाचार मुझे मिल गया था। अतः अब तुम उस मानव पति को छोड़कर मुझ नरेश को अपना स्वामी बनाओ। राम राज्य से च्युत हो गया है। उसके मुख पर सदा उदासी छायी रहती है। शक्तिहीन होकर वह वन में रहता है। सुन्दरी! तुम मेरी पटरानी बनो। मन्दोदरी तुमसे नीचे होकर रहेगी! मैं तुम्हारा दास हूँ। तुम मेरी स्वामिनी बनने की कृपा करो । सम्पूर्ण लोक पालों पर मुझे विजय मिल चुकी है। फिर भी मेरा मस्तक तुम्हारे चरणों को चूम रहा है। जानकी! अब तुम मेरा हाथ पकड़कर मुझे सनाथ बनाने की कृपा करो। अबले! तुम्हारे लिये पहले भी मैंने तुम्हारे पिता से याचना की थी। उस समय जनक ने क्यों कहा था कि 'मैंने धनुष तोड़ने की शर्त रखी है।" भगवान शंकर का धनुष मेरे हाथ टूट जायगा' इस भय से मैं स्वयंवर में गया ही नहीं । परंतु तभी से मेरा विरहातुर मन तुममें आसक्त होकर बार-बार गोते खा रहा है। तुम इस वन में रहती हो-यह सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। अब तुम मेरे परिश्रम को सफल बनाने की कृपा करो। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+15 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 14 शेयर

श्री हरि के मत्स्य जन्मोत्सव विशेष विस्मयकारिणी कथा मत्स्य अवतार की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️ मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया। एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया। एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया। कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया। यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है। तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुँचेगी। आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूँगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+24 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 29 शेयर

श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चमः स्कन्धः अथैकादशोऽध्यायः राजा रहूगण को भरत जी का उपदेश...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ एकादशासन्मनसो हि वृत्तय आकूतयः पञ्च धियोऽभिमानः । मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां वदन्ति हैकादश वीर भूमीः ॥९ गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि विसर्गरत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः एकादशं स्वीकरणं ममेति शय्यामहं द्वादशमेक आहुः ॥ १० द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- रेकादशामी मनसो विकाराः । सहस्रशः शतशः कोटिशश्च क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ ११ क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूती जीवस्य मायारचितस्य नित्याः। आविर्हिताः क्वापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः ॥ १२ क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात्स्वयंज्योतिरजः परेशः नारायणो भगवान् वासुदेवः स्वमाययाऽऽत्मन्यवधीयमानः।।१३ यथानिलः स्थावरजङ्गमाना मात्मस्वरूपेण निविष्ट ईशेत्। एवं परो भगवान् वासुदेवः क्षेत्रज्ञ आत्मेदमनुप्रविष्टः ॥ १४ न यावदेतां तनुभृन्नरेन्द्र विधूय मायां वयुनोदयेन । विमुक्तसङ्गो जितषट्सपत्नो वेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावत् ।। १५ न यावदेतन्मन आत्प्रलिङ्गं संसारतापावपनं जनस्य यच्छोकमोहामयरागलोभ- वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते ॥ १६ भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य- मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्तः गुरोहरेश्चरणोपासनास्त्रो जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम् ॥ १७ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ वीरवर ! पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक अहङ्कार-ये ग्यारह मन की वृत्तियाँ हैं तथा पाँच प्रकार के कर्म पाँच तन्मात्र और एक शरीर-ये ग्यारह उनके आधारभूत विषय कहे जाते हैं। ९॥ गन्ध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द-ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं; मलत्याग, सम्भोग, गमन, भाषण और लेना-देना आदि व्यापार-ये पाँच कर्मेन्द्रियों के विषय हैं तथा शरीर को 'यह मेरा है' इस प्रकार स्वीकार करना अहङ्कार का विषय है। कुछ लोग अहङ्कार को मन की बारहवीं वृत्ति और उसके आश्रय शरीर को बारहवाँ विषय मानते हैं ॥ १० ॥ ये मन की ग्यारह वृत्तियाँ द्रव्य (विषय), स्वभाव, आशय (संस्कार), कर्म और काल के द्वारा सैकड़ों, हजारों और करोड़ों भेदों में परिणत हो जाती हैं। किन्तु इनकी सत्ता क्षेत्रज्ञ आत्मा की सत्ता से ही है, स्वतः या परस्पर मिलकर नहीं है ॥ ११॥ ऐसा होने पर भी मन से क्षेत्रज्ञ का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो जीवकी ही मायानिर्मित उपाधि है। यह प्रायः संसार बन्धन में डालने वाले अविशुद्ध कर्मो में ही प्रवृत्त रहता है। इसकी उपर्युक्त वृत्तियाँ प्रवाहरूप से नित्य ही रहती हैं; जाग्रत् और स्वप्न के समय वे प्रकट हो जाती हैं और सुषुप्ति में छिप जाती हैं। इन दोनों ही अवस्थाओं में क्षेत्रज्ञ, जो विशुद्ध चिन्मात्र है, मनकी इन वृत्तियों को साक्षीरूप से देखता रहता है। १२ ॥ यह क्षेत्रज्ञ परमात्मा सर्वव्यापक, जगत् का आदि कारण, परिपूर्ण, अपरोक्ष, स्वयंप्रकाश, अजन्मा, ब्रह्मादि का भी नियन्ता और अपने अधीन रहने वाली माया के द्वारा सबके अन्तःकरणों में रहकर जीवों को प्रेरित करने वाला समस्त भूतों का आश्रयरूप भगवान् वासुदेव है॥ १३ ॥ जिस प्रकार वायु सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणियों में प्राणरूप से प्रविष्ट होकर उन्हें प्रेरित करती है, उसी प्रकार वह परमेश्वर भगवान् वासुदेव सर्वसाक्षी आत्मस्वरूप से इस सम्पूर्ण प्रपञ्च में ओतप्रोत है। १४ । राजन् ! जबतक मनुष्य ज्ञानोदय कें द्वारा इस माया का तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम क्रोधादि छः शत्रुओं को जीतकर आत्मतत्त्व को नहीं जान लेता और जबतक वह आत्मा के उपाधिरूप मन को संसार दुःख का क्षेत्र नहीं समझता, तबतक वह इस लोक में यों ही भटकता रहता है, क्योंकि यह चित्त उसके शोक, मोह, रोग, राग, लोभ और वैर आदिके संस्कार तथा ममता की वृद्धि करता रहता है ॥ १५-१६ ॥ यह मन ही तुम्हारा बड़ा बलवान् शत्रु है। तुम्हारे उपेक्षा करने से इसकी शक्ति और भी बढ़ गयी है। यह यद्यपि स्वयं तो सर्वथा मिथ्या है, तथापि इसने तुम्हारे आत्मस्वरूप को आच्छादित कर रखा है। इसलिये तुम सावधान होकर श्री गुरु और हरिके चरणों की उपासना के अस्त्र से इसे मार डालो ॥ १७ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ब्राह्मणरहूगणसंवादे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+16 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 6 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB