Basu Bhandari
Basu Bhandari Apr 8, 2021

जय श्री विष्णु भगवान

जय श्री विष्णु भगवान

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जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा ? 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।* *संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥ भावार्थ:-श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया॥ राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फँसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर थी। उसने विचार किया कि गाय तो कुछ देर में मरने वाली ही है तथा कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएँगे, अतः उसने गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा गाय ने तुरन्त दम तोड़ दिया तथा शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा, यदि देखेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। वह व्यक्ति अपार दुविधा में फँस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। ससुराल पहुँचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार कर कि यदि पत्नी पर नजर पड़ी, तो अनिष्ट नहीं हो जाए। परिवार के अन्य सदस्यों ने घर के अन्दर चलने का काफी अनुरोध किया, किन्तु वह नहीं गया और न ही रास्ते में घटित घटना के बारे में किसी को बताया। उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही चलकर उन्हें घर के अन्दर लाती हूँ। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हो, तो भी चुप रहा। काफी अनुरोध करने के उपरान्त उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। पत्नी ने कहा कि मैं भी पतिव्रता स्त्री हूँ। ऐसा कैसे हो सकता है? आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही उसकी आँखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका। पत्नी पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और सारा कह सुनाया। राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति का सटीक उपाय पूछा। सभी विद्वानों ने आपस में मन्त्रणा करके एक उपाय सुझाया कि, यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी में गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आँखों पर लगाए, तो गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आँखों की रोशनी पुनः लौट सकती है। राजा ने पहले अपने महल के अन्दर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को सभी के पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक चिन्तित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए। जब यह सूचना राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उसने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहाँ तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणि की मानी जाती थी, से भी पूछेंगे, तो उसे भी पतिव्रता पाएँगे। राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर आश्चर्य हुआ और उसने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली को बुला भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। उस महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। तब राजा ने यह दिखाने कर लिए कि अयोध्या का राज्य सबसे उत्तम है, उस महिला को ही राज-सम्मान के साथ जनकपुर को भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे समस्या बताई। महिला ने कार्य करने की स्वीकृति दे दी। महिला छलनी लेकर गंगा किनारे गई और प्रार्थना की कि, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूँ, तो गंगाजल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।’ प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और पाया कि जल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरी छलनी को लेकर राजदरबार में चली आयी। राजा और दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देक आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उस व्यक्ति की आँखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया और पूर्ण राजसम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया। जब उस महिला ने अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति माँगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाशावश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। महिला द्वारा बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए। सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा? यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले, अयोध्या नरेश को राजा जनक ने निमन्त्रण नहीं भेजा, किन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है? अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुँच ही गए और धनुष तोड़कर राजकुमार राम ने सीता को वर लिया । 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भारतेऽपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्य आकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपशमो परमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्चरति ॥ ९ ॥ तं भगवान्नारदो वर्णाश्रमवतीभिर्भारतीभिः प्रजाभिर्भगवत्प्रोक्ताभ्यां सांख्ययोगाभ्यां भगवदनुभावोपवर्णनं सावर्णेरुपदेक्ष्यमाणः परमभक्तिभावेनोपसरति इदं चाभिगृणाति ॥ १० ॥ ॐ नमो भगवते उपशमशीलायोपरतानात्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नम इति ॥ ११॥ गायति चेदम् कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः। द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे ॥ १२ इदं हि योगेश्वर योगनैपुणं हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत् । यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो भक्त्या दधीतोज्झितदुष्कलेवरः ॥ १३ यथैहिकामुष्पिककामलम्पटः सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् । शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद् यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां त्वन्माययाहंममतामधोक्षज भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावमिति ॥ १५ भारतेऽप्यस्मिन् वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवो मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूट ऋषभः कूटकः कोल्लक:' सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो महेन्द्रो वारिधारो विन्ध्यः शुक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरिति चान्ये च शतसहस्त्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च सन्त्यसङ्ख्याताः ॥ १६ ॥ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ भारतवर्ष में भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये अव्यक्तरूप से कल्प के अन्त तक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरति की उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्त में आत्मस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है ॥ ९ ॥ वहाँ भगवान् नारदजी स्वयं श्रीभगवान् के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्र के सहित भगवन्महिमा को प्रकट करने वाले पाञ्चरात्रदर्शन का सावर्णि मुनि को उपदेश करने के लिये भारतवर्ष की वर्णाश्रमधर्मावलम्बिनी प्रजा के सहित अत्यन्त भक्तिभाव से भगवान् श्रीनर-नारायण की उपासना करते और इस मन्त्र का जप तथा स्तोत्र को गाकर उनकी स्तुति करते हैं ॥ १० ॥ 'ओङ्कारस्वरूप, अहङ्कार से रहित, निर्धनों के धन, शान्तस्वभाव ऋषिप्रवर भगवान् नर-नारायण को नमस्कार है। वे परमहंसों के परम गुरु और आत्मारामों के अधीश्वर हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है ॥ ११ ॥ यह गाते हैं 'जो विश्व की उत्पत्ति आदि में उनके कर्त्ता होकर भी कर्तृत्व के अभिमान से नहीं बँधते, शरीर में रहते हुए भी उसके धर्म भूख-प्यास आदि के वशीभूत नहीं होते तथा द्रष्टा होने पर भी जिनकी दृष्टि दृश्य के गुण-दोषों से दूषित नहीं होती उन असङ्ग एवं विशुद्ध साक्षिस्वरूप भगवान् नर-नारायण को नमस्कार है ॥ १२ ॥ योगेश्वर ! हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माजी ने योगसाधन की सबसे बड़ी कुशलता यही बतलायी है कि मनुष्य अन्तकाल में देहाभिमान को छोड़कर भक्तिपूर्वक आपके प्राकृत जैसे पुत्र, गुणरहित स्वरूप में अपना मन लगावे ॥ १३ ॥ लौकिक और पारलौकिक भोगों के लालची मूढ पुरुष स्त्री और धन की चिन्ता करके मौत से डरते हैं उसी प्रकार यदि विद्वान्‌ को भी इस निन्दनीय शरीर के छूटने का भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्ति के लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है ॥ १४ ॥ अतः अधोक्षज! आप हमें अपना स्वाभाविक प्रेमरूप भक्तियोग प्रदान कीजिये, जिससे कि प्रभो इस निन्दनीय शरीर में आपकी माया के कारण बद्धमूल हुई दुर्भेद्य अहंता-ममता को हम तुरन्त काट डालें ॥ १५॥ राजन् ! इस भारतवर्ष में भी बहुत-से पर्वत और नदियाँ हैं- जैसे मलय, मङ्गलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, कोल्लक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेङ्कट, महेन्द्र, वारिधार, विन्ध्य, शुक्तिमान् ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि आदि। इसी प्रकार और भी सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं। उनके तटप्रान्तों से निकलने वाले नद और नदियाँ भी अगणित हैं ॥ १६ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 8 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ प्रह्लाद का नैमिषारण्य-गमन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- प्रह्लाद नैमिषारण्य में तीर्थ के समुचित कार्यक्रम को पूर्ण कर रहे थे। उन्हें सामने एक वट का वृक्ष दिखायी पड़ा। उस वृक्ष की छाया बहुत दूरतक फैली हुई थी। दानवेश्वर ने वहाँ बहुत-से बाण देखे। वे बाण भिन्न-भिन्न प्रकार से बने हुए थे। उनमें गीध की पाँखें लगी हुई थीं। उन्हें शान पर चढ़ाकर तेज कर दिया गया था। वे अत्यन्त चमक रहे थे। उन बाणों को देखकर प्रह्लाद के मन में विचार उत्पन्न हुआ- जिसके ये बाण हैं, वह व्यक्ति ऋषियों के आश्रम पर इस परम पावन पुण्यतीर्थ में रहकर क्या करेगा ? प्रह्लाद के मन में इस प्रकार की कल्पना अभी शान्त नहीं हुई थी, इतने में ही धर्मनन्दन नर और नारायण सामने दृष्टिगोचर हुए। उन मुनियों ने काले मृग का चर्म धारण कर रखा था। सिर पर बड़ी विशाल जटाएँ सुशोभित हो रही थीं। नर और नारायण के सामने दो चमकीले धनुष पड़े थे। उत्तम चिह्नवाले वे धनुष शार्ङ्ग और आजगव नाम से प्रसिद्ध थे। वैसे ही दो तरकस थे, जिनमें बहुत-से बाण भरे थे। उधर महान् भाग्यशाली धर्मनन्दन नर और नारायण का मन ध्यान में मग्न था। उन ऋषियों को देखकर प्रह्लाद की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। वे ऋषियों को लक्ष्य बनाकर कहने लगे 'तुमलोग यह क्या ढकोसला कर रहे हो ? इसी से तो धर्म धूल में मिल रहा है। ऐसी व्यवस्था तो कभी इस संसार में देखने अथवा सुनने में नहीं आयी। कहाँ तो उत्कट तप करना और कहाँ धनुष हाथ में उठाना। इन दोनों कार्यों का सामंजस्य तो पूर्वयुग में भी नहीं था। ब्राह्मणों के लिये जहाँ तपस्या करने का विधान है, वहाँ उन्हें धनुष रखने की क्या आवश्यकता ? कहाँ तो मस्तक पर जटा धारण करना और कहाँ तरकस रखना – ये दोनों कार्य व्यर्थ आडम्बर सिद्ध कर रहे हैं। तुम दोनों दिव्य पुरुष हो। तुम्हें धर्माचरण ही शोभा देता है।' व्यासजी कहते हैं- भारत! प्रह्लाद के उपर्युक्त वचन सुनकर नारायण ने उत्तर दिया 'दैत्येन्द्र ! हमारे तथा हमारी तपस्या के विषय में तुम क्यों व्यर्थ चिन्तित हो रहे हो ? हम समर्थ हैं – इस बात को जगत् जानता है। युद्ध और तपस्या- दोनों में ही हमारी गति है। तुम इसमें क्या करोगे? इच्छानुसार अपने रास्ते चले जाओ। क्यों इस बकवाद में पड़ते हो ? ब्रह्मतेज बड़ी कठिनता से प्राप्त होता है। सुख की अभिलाषा रखने वाले प्राणियों का कर्तव्य है कि ब्राह्मणों की व्यर्थ चर्चा न छेड़ें।' प्रह्लाद ने कहा- तपस्वियो! तुम्हें व्यर्थ इतना अभिमान हो गया है। मैं दैत्यों का राजा हूँ। मुझपर ही धर्म टिका है। मेरे शासन करते हुए इस पवित्र तीर्थ में इस प्रकार का अधर्मपूर्ण आचरण करना सर्वथा अनुचित है। तपोधन! तुम्हारे पास ऐसी कौन-सी शक्ति है? यदि हो तो उसे अब समरांगण में मुझे दिखाओ। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (उन्यासीवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दशावतार व्रत कथा विधान और फल...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ महाराज युधिष्ठिर ने कहा- भगवन्! आप अपने दशावतार-व्रत का विधान कहिये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज ! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को संयतेन्द्रिय हो नदी आदि में स्नान कर तर्पण सम्पन्न करे तथा घर आकर तीन अञ्जलि धान्य का चूर्ण लेकर घृत में पकाये। इस प्रकार दस वर्षों तक प्रतिवर्ष करे। प्रतिवर्ष क्रमशः पूरी, घेवर, कसार, मोदक, सोहालक, खण्डवेष्टक, कोकरस, अपूप, कर्णवेष्ट तथा खण्डक ये पक्वान्न उस चूर्ण से बनाये और उसे भगवान् को नैवेद्य के रूप में समर्पित करे। प्रत्येक दशहरा को दस गौएँ दस ब्राह्मणों को दे । नैवेद्य का आधा भाग भगवान् के सामने रख दे, चौथाई ब्राह्मण को दे और चौथाई भाग पवित्र जलाशय पर जाकर बाद में स्वयं भी ग्रहण करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारों से मन्त्रपूर्वक दशावतारों का पूजन करे। भगवान्के दस अवतारों के नाम इस प्रकार हैं? – (१) मत्स्य, (२) कूर्म, (३) वराह, (४) नृसिंह, (५) त्रिविक्रम (वामन), (६) परशुराम, (७) श्रीराम, (८) श्रीकृष्ण, (९) बुद्ध तथा (१०) कल्कि। अनन्तर प्रार्थना करे गतोऽस्मि शरणं देवं हरिं नारायणं प्रभुम् । प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ छिनत्तु वैष्णवीं मायां भक्त्या प्रीतो जनार्दनः । श्वेतद्वीपं नयत्वस्मान्मयात्मा विनिवेदितः ॥ (उत्तरपर्व ६३ । २४-२५) 'दस अवतारों को धारण करने वाले सर्वव्यापी, सम्पूर्ण संसार के स्वामी हे नारायण हरि! मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे देव! आप मुझपर प्रसन्न हों। जनार्दन! आप भक्तिद्वारा प्रसन्न होते हैं। आप अपनी वैष्णवी माया को निवारित करें, मुझे आप अपने धाम में ले चलें। मैंने अपने को आपके लिये सौंप दिया है।' इस प्रकार जो इस व्रत को करता है, वह भगवान् के अनुग्रह से जन्म-मरण से छुटकारा प्राप्त कर लेता है और सदा विष्णुलोक में निवास करता है। जय श्री राम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (सैनतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः शरीर और संसार की अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपता का वर्णन...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीराम ! जिस प्रकार डरपोक मनुष्य भी अपने कल्पित मनोराज्य के हाथी, बाघ आदि को देखकर भयभीत नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि यह मेरी कल्पना के सिवा और कुछ नहीं है, वैसे ही यथार्थ ज्ञानी पुरुष इस संसार को कल्पित समझकर भयभीत नहीं होता; क्योंकि ये भूत, भविष्य, वर्तमान-- तीनों जगत् प्रतीतिमात्र ही हैं। वे वास्तव में नहीं हैं, इसलिये सत् नहीं है और उनकी प्रतीति होती है, इसलिये उनको सर्वथा असत् भी नहीं कह सकते; अतएव अन्य कल्पनाओं का अभाव ही परमात्मा का यथार्थ ज्ञान है । इस संसार में व्यवहार करने वाले सभी मनुष्यों को अनेक प्रकार की आपदाएँ स्वाभाविक ही प्राप्त हुआ करती हैं। क्योंकि यह जगत्-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्र में बुद्बुदों = का समूह; फिर इस विषय में शोक ही क्या । परमात्मा जो सत्य वस्तु है, वह सदा सत्य ही है और यह दृश्य जो असत्य वस्तु है, वह सदा असत्य ही है; इसलिये ■ मायारूप विकृति के वैचित्र्य से प्रतीयमान इस प्रपञ्च में ऐसी दूसरी कौन वस्तु है, जिसके विषय में शोक किया जाय ! इसलिये असत्यभूत इस संसार में तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि जैसे रज्जु से बैल दृढ़ बैंध जाता है, वैसे ही आसक्ति से यह मनुष्य दृढ़ बँध जाता है अतः निष्पाप श्रीराम ! 'यह सब ब्रह्मरूप ही है? इस प्रकार समझकर तुम आसक्तिरहित हुए इस संसार में विचरण करो । मनुष्य को विवेक-बुद्धि से आसक्ति और अनासक्ति का परित्याग करके अनायास ही शास्त्रविहित कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये, शास्त्रनिषिद्ध कर्मों का कभी नहीं । अर्थात् उनकी सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये । यह दृश्यमान प्रपश्च केवल प्रतीतिमात्र है, वास्तव में कुछ नहीं है—यों जिस मनुष्य को भलीभाँति अनुभव हो जाता है, वह अपने भीतर परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है । अथवा 'मैं और यह सारा प्रपञ्च चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है' – इस प्रकार अनुभव करने पर अनर्थकारी यह व्यर्थ जगद्रूपी आडम्बर प्रतीत नहीं होता । श्रीराम ! जो कुछ भी आकाश में या स्वर्ग में या इस संसार में सर्वोत्तम परमात्म-वस्तु है, वह एकमात्र राग-द्वेष आदि के विनाश से ही प्राप्त हो जाती है। किंतु राग-द्वेष आदि दोषों से आक्रान्त हुई बुद्धि के द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह सब कुछ मूढों के लिये तत्काल ही विपरीत रूप ( दुःखरूप ) हो जाता है। जो पुरुष शास्त्रों में निपुण, चतुर एवं बुद्धिमान् होकर भी राग-द्वेष आदि से परिपूर्ण हैं, वे संसार में शृगाल के तुल्य है। उन्हें धिक्कार है । धन, बन्धुवर्ग, मित्र- ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं; इसलिये उनमें बुद्धिमान् पुरुष क्या अनुराग करेगा । कभी नहीं, उत्पत्ति-विनाशशील भोग-पदार्थों से परिपूर्ण संसार की रचनारूप यह परमेश्वर की माया आसक्त पुरुषों को ही अनर्थ गर्तों में ढकेल देती है। राघव ! वास्तव में धन, जन और मन सत्य नहीं हैं, किंतु मिंध्या ही दीख पड़ते हैं। क्योंकि आदि और अन्त में सभी पदार्थ असत् हैं और बीच में भी क्षणिक एवं दुःखप्रद हैं; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आकाश-वृक्ष के सदृश कल्पित इस संसार से कैसे प्रेम करेगा । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीकृष्ण कथा 〰️〰️🌼〰️〰️ एक समय की बात है, जब किशोरी जी को यह पता चला कि कृष्ण पूरे गोकुल में माखन चोर कहलाता है तो उन्हें बहुत बुरा लगा उन्होंने कृष्ण को चोरी छोड़ देने का बहुत आग्रह किया। पर जब ठाकुर अपनी माँ की नहीं सुनते तो अपनी प्रियतमा की कहा से सुनते। उन्होंने माखन चोरी की अपनी लीला को जारी रखा। एक दिन राधा रानी ठाकुर को सबक सिखाने के लिए उनसे रूठ गयी। अनेक दिन बीत गए पर वो कृष्ण से मिलने नहीं आई। जब कृष्णा उन्हें मनाने गया तो वहां भी उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। तो अपनी राधा को मनाने के लिए इस लीलाधर को एक लीला सूझी।। ब्रज में लील्या गोदने वाली स्त्री को लालिहारण कहा जाता है। तो कृष्ण घूंघट ओढ़ कर एक लालिहारण का भेष बनाकर बरसाने की गलियों में पुकार करते हुए घूमने लगे। जब वो बरसाने, राधा रानी की ऊंची अटरिया के नीचे आये तो आवाज़ देने लगे। मै दूर गाँव से आई हूँ, देख तुम्हारी ऊंची अटारी, दीदार की मैं प्यासी, दर्शन दो वृषभानु दुलारी। हाथ जोड़ विनंती करूँ, अर्ज मान लो हमारी, आपकी गलिन गुहार करूँ, लील्या गुदवा लो प्यारी॥ जब किशोरी जी ने यह आवाज सुनी तो तुरंत विशाखा सखी को भेजा और उस लालिहारण को बुलाने के लिए कहा। घूंघट में अपने मुँह को छिपाते हुए कृष्ण किशोरी जी के सामने पहुंचे और उनका हाथ पकड़ कर बोले कि कहो सुकुमारी, तुम्हारे हाथ पे किसका नाम लिखूं। तो किशोरी जी ने उत्तर दिया कि केवल हाथ पर नहीं मुझे तो पूरे श्री अंग पर लील्या गुदवाना है और क्या लिखवाना है, किशोरी जी बता रही हैं। माथे पे मदन मोहन, पलकों पे पीताम्बर धारी, नासिका पे नटवर, कपोलों पे कृष्ण मुरारी, अधरों पे अच्युत, गर्दन पे गोवर्धन धारी, कानो में केशव, भृकुटी पे चार भुजा धारी, छाती पे छलिया, और कमर पे कन्हैया, जंघाओं पे जनार्दन, उदर पे ऊखल बंधैया, गालों पर ग्वाल, नाभि पे नाग नथैया, बाहों पे लिख बनवारी, हथेली पे हलधर के भैया, नखों पे लिख नारायण, पैरों पे जग पालनहारी, चरणों में चोर चित का, मन में मोर मुकुट धारी, नैनो में तू गोद दे, नंदनंदन की सूरत प्यारी, और रोम रोम पे लिख दे मेरे, रसिया रास बिहारी॥ जब ठाकुर जी ने सुना कि राधा अपने रोम रोम पर मेरा नाम लिखवाना चाहती है, तो ख़ुशी से बौरा गए प्रभू, उन्हें अपनी सुध न रही, वो भूल गए कि वो एक लालिहारण के वेश में बरसाने के महल में राधा के सामने ही बैठे हैं। वो खड़े होकर जोर जोर से नाचने लगे। उनके इस व्यवहार से किशोरी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ की इस लालिहारण को क्या हो गया। और तभी उनका घूंघट गिर गया और ललिता सखी को उनकी सांवरी सूरत का दर्शन हो गया और वो जोर से बोल उठी कि "अरे..... ये तो बांके बिहारी ही है।" अपने प्रेम के इज़हार पर किशोरी जी बहुत लज्जित हो गयी और अब उनके पास कन्हैया को क्षमा करने के आलावा कोई रास्ता न था। ठाकुरजी भी किशोरी का अपने प्रति अपार प्रेम जानकर गदगद् और भाव विभोर हो गए॥ 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरण संनिकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैरविरतभक्तिरुपास्ते ॥ १॥ आष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याण भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति ॥ २ ॥ ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्म उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति ॥ ३ ॥ यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥ ४ मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः। कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥५ न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः । न स्त्रीकृतं कश्मलमश्रुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥ ६ न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । न तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः ॥ ७ सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् । भजे रामं मनुजाकृतिं हरि य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥ ८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन् ! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्रीहनुमानजी अन्य किन्नरों के सहित अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥ वहाँ अन्य गन्धर्वो के सहित आष्र्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् राम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान् जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति कर हैं ॥ २ ॥ 'हम ॐकारस्वरूप पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीराम को नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधनतत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यन्त ब्राह्मणभक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः पुनः प्रणाम है' ॥ ३ ॥ 'भगवन् ! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम-रूप से रहित और अहङ्कारशून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ ॥ ४ ॥ प्रभो ! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है ! अन्यथा, अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीताजी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था ॥ ५॥ आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजी का त्याग ही कर सकते हैं ॥ ६ ॥ आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज ! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि– इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है ।। ७ ।। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य — कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसल वासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे' ॥ ८॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 8 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ च्यवन-प्रह्लाद का संवाद, प्रह्लाद का नैमिषारण्य-गमन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- च्यवन मुनि की वाणी बड़ी मधुर थी। उसे सुनकर अनेक तीर्थो के विषय में अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक प्रह्लाद उनसे प्रश्न करने लगे । प्रह्लाद ने पूछा- मुनिवर ! पृथ्वी पर कितने पावन तीर्थ हैं? उन्हें बतायें। साथ ही आकाश और पाताल में जो तीर्थ हों, उन्हें भी विशदरूप से बताने की कृपा करें। च्यवन जी बोले-राजन्! जिनके मन, वचन और तन शुद्ध हैं, उनके लिये पग-पग पर तीर्थ समझना चाहिये। दूषित विचारवालों के लिये गंगा भी कहीं मगध से अधिक अपवित्र हो जाती है। यदि मन पवित्र हो गया और इससे उसके सभी कलुषित विचार नष्ट हो गये तो उसके लिये सभी स्थान पावन तीर्थ बन जाते हैं। अन्यथा गंगा के तटपर सर्वत्र बहुत-से नगर बसे हुए हैं। इसके सिवा अन्य भी प्रायः सभी ग्राम, गोष्ठ और छोटे-छोटे टोले बसे हैं। दैत्येन्द्र ! निषादों, धीवरों, हूणों, वंगों एवं खस आदि म्लेच्छ जातियों की बस्ती वहाँ कायम है, परंतु निष्पाप राजन्! उनमें से किसी एक का भी अन्तःकरण पवित्र नहीं हो पाता। फिर जिसके चित्त में विविध विषय भरे हुए हैं, उसके लिये तीर्थ का क्या फल हो सकता है ? राजन्! इस विषय में मन को ही प्रधान कारण मानना चाहिये, इसके सिवा दूसरा कुछ नहीं। अतः शुद्धि की इच्छा रखने वाले पुरुष को चाहिये कि मन को परम पवित्र बना ले। यदि उसमें दूसरों को ठगने की प्रवृत्ति है। तो तीर्थवासी भी महान् पापी माना जा सकता है। तीर्थ में किये हुए पाप अनन्त कुफलरूप से सामने आते हैं। अतः कल्याणकामी पुरुष सबसे पूर्व मन को शुद्ध कर ले । मन के शुद्ध हो जाने पर द्रव्यशुद्धि स्वयं ही हो जाती है । इसमें कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार आचारशुद्धि भी आवश्यक है। फिर तो सभी पवित्र हैं- यह प्रसिद्ध बात है। अन्यथा जो कुछ किया जाता है, उसे उसी समय नष्टप्राय समझना चाहिये। तीर्थ में जाकर नीच का साथ कभी नहीं करना चाहिये। कर्म और बुद्धि से प्राणियों पर दया करनी चाहिये। राजेन्द्र! यदि पूछते हो तो और भी उत्तम तीर्थ बताऊँगा । प्रथम श्रेणी में पुण्यमय नैमिषारण्य है। चक्र तीर्थ, पुष्कर-तीर्थ तथा अन्य भी अनेकों तीर्थ धरातल पर हैं, जिनकी संख्या का निर्देश करना असम्भव है। नृपसत्तम! बहुत-से ऐसे पवित्र स्थान हैं । व्यासजी कहते हैं- च्यवन मुनि का यह वचन सुनकर राजा प्रह्लाद नैमिषारण्य जाने को तैयार हो गये। उन्होंने हर्ष के उल्लास में भरकर दैत्यों को आज्ञा दी। प्रह्लाद बोले- महाभाग दैत्यो! उठो, आज हम नैमिषारण्य चलेंगे। वहाँ कमललोचन भगवान् श्रीहरि के हमें दर्शन प्राप्त होंगे। पीताम्बर पहने हुए वे वहाँ विराजमान रहते हैं । व्यास जी कहते हैं- जब विष्णुभक्त प्रह्लादने यों कहा, तब वे सभी दानव उनके साथ अपार हर्ष मनाते हुए पाता लसे निकल पड़े, सम्पूर्ण महाबली दैत्यों और दानवों का झुंड एक साथ चला। नैमिषारण्य में पहुँचकर आनन्दपूर्वक सबने स्नान किया। फिर प्रह्लाद दैत्यों के साथ वहाँ के तीर्थों में भ्रमण करने लगे। महान् पुण्यमयी सरस्वती नदी पर उनकी दृष्टि पड़ी। उस नदी का जल बड़ा ही स्वच्छ था । राजेन्द्र ! उस पवित्र स्थान में पहुँचने पर महात्मा प्रह्लाद के मन में बड़ी प्रसन्नता उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने सरस्वती के विमल जल में स्नान किया और दान आदि क्रियाएँ सविधि सम्पन्न कीं। वह परम पावन तीर्थ प्रह्लाद की अपार प्रसन्नता का साधन बन गया था । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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एक मधुर बाल लीला..... 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 बहुत ही आनंद आएगा पढ़े जरूर ठाकुर जी ने एक बार 🌶"ताता" मिर्ची खायी, फिर बडो मजा आयो ! ब्रजरानी यशोदा भोजन कराते-कराते थोड़ी सी छुंकि हुई मिर्च लेकर आ गई क्योंकि नन्द बाबा को बड़ी प्रिय थी। लाकर थाली में एक और रख दई, तो अब ठाकुरजी बोले की बाबा हम आज और कछु नहीं खानो , ये खवाओ🌶 ये कहा है ? हम ये खाएंगे , तो नन्द बाबा डराने लगे की नाय-नाय लाला ये तो 'ताता' है , तेरो मुँह जल जावेगो , तो लाला बोलौे नाय बाबा अब तो ये ही 🌶खानो है मोय ये बात सुन कें बाबा ने खूब ब्रजरानी यशोदा कूं डाँटो , कि मेहर तुम ये क्यों लैंके आई ? तुमकूं मालूम है ये बड़ो जिद्दी है , ये मानवै वारो नाय , फिर भी तुम लैंके आ गई !!! अब मैया ते गलती तौ है गई , और इतकूं ठाकुर जी मचल गए बोले अब बाकी भोजन पीछे होयगो, पहले ये ताता 🌶 ही खानी है मोय, पहले ये खवाओ । बाबा पकड़ रहेैं , रोक रहे हते , पर इतने में तौ लाला उछल कें थाली के निकट पहुंचे और अपने हाथ से उठाकर मिर्च🌶 खा गये| और खाते ही 'ताता' है गयी; लग गई मिर्च, करवे लग गये सी~सी | वास्तव में ताता भी नहीं " ता था थई " है गई । अब लाला चारों तरफ भगौ डोले, रोतौ फिरे, ऑखन मे आँसू भर गये , लाला की रोवाराट सुन कें सखा आ गये , अपने सखा की ये दशा देख कें हंसवे लगे, और बोलें ---- लै और खा ले मिर्च !!! भातई मिरचई ही खावेगो , और कछू नाय पायौ तोय खावेकूं | मगर तुरत ही सबरे सखा गंभीर है गये , और अपने प्रान प्यारे कन्हैया की 'ताता' कूं दूर करिवे कौ उपाय ढूंढवे लगे | इतकूं लाला ततईया को सों खायो भगौ डोले फिरे , सारे नन्द भवन में - बाबा मेरो मौह जर गयो , बाबा मेरो मौह जर गयो , मौह में आग पजर रही है😝😝अरि मईया मर गयौ , बाबा कछु करो कहतौ फिरौ डोलै !!!!और पीछे-पीछे ब्रजरानी यशोदा , नन्द बाबा भाग रहे है हाय-हाय हमारे लाला कूं मिर्च लग गई , हमारे कन्हैया कूं मिर्च लग गई । महाराज बडी मुश्किल ते लाला कूं पकड़ौ ; (या लीला कूं आप पढ़ो मत बल्कि अनुभव करौ कि आपके सामने घटित है रही , फिर आवेगौ असली आनन्द 😀😀😀) लाला कूं गोदी में लैकें नन्द बाबा रो रहे है, और कह रहे है कि अरि महर अब तनिक बूरौ-खांड कछू तौ लैकें आ , मेरे लाला के मुख ते लगा | और इतनो ही नाय बालकृष्ण के मुख में नन्द बाबा फूँक मार रहे है । बडी देर बाद लाला की पीडा शान्त भई , तब कहीं जा कैं नन्दालय में सुकून परौ | आप सोचो क्या ये सौभाग्य किसी को मिलेगा ? जैसे बच्चे को कुछ लग जाती है तो हम फूँक मारते है बेटा ठीक हे जाएगी वैसे ही बाल कृष्ण के मुख में बाबा नन्द फूँक मार रहे है । देवता जब ऊपर से ये दृश्य देखते है तो देवता रो पड़ते है और कहते है की प्यारे ऐसा सुख तो कभी स्वपन में भी हमको नहीं मिला जो इन ब्रजवासियो को मिल रहा है | और कामना कर रहे हैं कि आगे यदि जन्म देना तो इन ब्रजवासियो के घर का नौकर बना देना , यदि इनकी सेवा भी हमको मिल गई तो हम धन्य हो जाएंगे। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (अठहत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दशावतार व्रत कथा विधान और फल...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन्! सत्ययुग के प्रारम्भ में भृगु नामक एक ऋषि हुए थे। उनकी भार्या दिव्या? अत्यन्त पतिव्रता थीं। वे आश्रम की शोभा थीं और निरन्तर गृहकार्य में संलग्न रहती थीं। वे महर्षि भृगु की आज्ञा का पालन करती थीं। भृगुजी भी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे। किसी समय देवासुर संग्राम में भगवान् विष्णु के द्वारा असुरों को महान् भय उपस्थित हुआ। तब वे सभी असुर महर्षि भृगु की शरण में आये। महर्षि भृगु अपना अग्निहोत्र आदि कार्य अपनी भार्या को सौंपकर स्वयं संजीवनी विद्या को प्राप्त करने के लिये हिमालय के उत्तर भाग में जाकर तपस्या करने लगे। वे भगवान् शंकर की आराधना कर संजीवनी-विद्या को प्राप्त कर दैत्यराज बलि को सदा विजयी करना चाहते थे। इसी समय गरुड़पर चढ़कर भगवान् विष्णु वहाँ आये और दैत्यों का वध करने लगे। क्षणभर में ही उन्होंने दैत्यों का संहार कर दिया। भृगु की पत्नी दिव्या भगवान्‌ को शाप देने के लिये उद्यत हो गयीं। उनके मुख से शाप निकलना ही चाहता था कि भगवान् विष्णु ने चक्र से उनका सिर काट दिया। इतने में भृगुमुनि भी संजीवनी-विद्या को प्राप्तकर वहाँ आ गये। उन्होंने देखा कि सभी दैत्य मारे गये हैं और ब्राह्मणी भी मार दी गयी है। क्रोधान्ध हो भृगुने भगवान् विष्णु को शाप दे दिया कि 'तुम दस बार मनुष्यलोक में जन्म लोगे।' भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- महाराज! भृगु के शाप से जगत्‌ की रक्षा के लिये मैं बार-बार अवार ग्रहण करता हूँ। जो लोग भक्तिपूर्वक मेरी अर्चना करते हैं, वे अवश्य स्वर्गगामी होते हैं। जय श्री राम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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