राधे राधे

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Shivsanker Shukla Mar 7, 2021

शुभ रविवार की शुभ दोपहर में मंदिर परिवार के सभी आदरणीय भगवत प्रेमी भाई बहन आप सभी को दोपहर की राम राम भगवान श्री कृष्ण पर और प्रभु श्री राम जी पर समस्त जीव साक्षात्कार होने पर आकर्षित होते थे भगवान श्री कृष्ण पर गोपियों का अत्यधिक प्रेम था गोपियों के प्रेम ने इतिहास लिख दिया है हम यूं कहें कि प्रेम परमात्मा की देन है इन संबंधों का प्रादुर्भाव प्रभु की लीला से ही प्रारंभ हुआ है आज भी हर विपरीत लिंगी के प्रति जी व का आकर्षण बना हुआ है आज के प्रेम में और प्रभु श्री कृष्ण जी के प्रेम में जमीन आसमान का फर्क है श्रीमद् भागवत कथा में गोपियों के जहां प्रेम का वर्णन आता है सुखदेव जी महाराज ने लिखा है एक आंख में काजल लगाती थी और दूसरी आंख में काजल लगाना प्रभु मिलन की आतुरता में भूल जाती थी कहने का तात्पर्य है प्रभु मिलन में स्वयं की सुध बुध खो बैठती थी लेकिन आज का प्रेमी प्रेमिका हजार बार दर्पण देखता है और ऐसी त्रुटि दर्पण न भी देखें तब भी नहीं हो सकती मेरे भाई बहन उन गोपियों को पागल प्रेमी की संज्ञा दी जाती है प्रेमी और पागल में कोई फर्क नहीं होता लेकिन आज के प्रेमियों को मैंने बुद्धिजीवी बड़ी बहनों के द्वारा उचक्का शब्द का संबोधन सुना है अपने जीवन में उस प्रेम को महत्व दें जिस में प्रभु का दर्शन हो आइए आप सभी देखें प्रेम विरह में व्याकुल गोपियों की मनोदशा का वर्णन भजन के माध्यम से दर्शन लाभ ले जिसके परिणाम स्वरूप हम आप सभी के जीवन में प्रेम रस सदा बना रहे जय-जय गोपी जय श्री कृष्ण

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Balaram lalawat Mar 7, 2021

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Dolly Rawal Mar 7, 2021

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A Meenakshi Mishra Mar 7, 2021

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A Meenakshi Mishra Mar 7, 2021

एक अदभुत होरीलीला होरी की एक लीला, तुमकौं आज सुनामैं । श्री हरिदास के चमत्कार तै, वाकीफ आज करामैं ।। एक दिना मुदैं नैंनन कौं, बैठै स्वामी प्यारे । दूर देस ते एक नरेस तब आयौ विनके द्वारे ।। लायौ एक इत्र की सीसी, मोल हो जाकौ भारी । स्वामी जू के बंद नैंन में, होरी है रही न्यारी ।। स्वामी जू तै बोलौ राजा, लीजै इत्र कमाल । केसर और कस्तूरी ते जो , है रह्यौ मालामाल ।। कही की बांकेबिहारी जू कैं, दीजो याए लगाय । विनकैं इत्र लगै ते मेरे, मन में आनंद आय ।। लै स्वामी नै वाकी सीसी , रज में दई उडे़ल । चकित भए सब लोग , समझ में आयौ ना ये खे़ल ।। है निरास बोलौ नरेस,मेरी भूल कौं देओ बताय । इतने मूल्यवान इत्र कौं, रज में दियौ ड़राय ।। खोल नैंन स्वामी नै तबही , बोलीे मन की बात । जा नरेस नैक दरसन करलै , क्यों मन ग्लानी लात ।। ज्यौं नरेस पहुँचौ कुटिया में, भयौ अचंभौ भारी । वाकै इत्र तै सराबोर, है रहे थे बाँकेबिहारी ।। बाहर आय पड़ौ चरणन में, मानी गलती भारी । कृपा करौ या भेद कौं खोलौ, अरजी सुनौ हमारी ।। बोले स्वामी सुन नरेस, जा पल तुम इत्र कौं लाये । वा पल श्यामा श्याम खेलवे होरी , सब संग आए ।। खेलत खेलत बीत गयौ रंग , जब श्यामा के पास । तेरे इत्र ते भर पिचकारी, दीन्हीं विनके हाथ ।। भर कैं इत्र जो श्यामा नैं , मारी ऐसी पिचकारी । देख नरेस इत्र ते तेरे, रंग दिये बाँकेबिहारी ।। तेरे इत्र के कारण राजा, जीत गयीं सुकुमारी । पिय प्यारी की लीला में, तेरी भी साझेदारी ।। नैंनन अश्रु ते भर आये, देख कृपा गुरूवर की । रंग रंगीले दोऊ खेलत, होरी आज बिरज की ।। गावत तान, बजावत वीणा, श्री हरिदास हमारे । बलिहारी है जाए "मनोहर", कर देओ वारे न्यारे ।।

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