श्री ओम नमः शिवाय सुप्रभात भक्तो

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🍁*आज का सुविचार*🍁 🏯🌺✨👏🕉️👏✨🌺🏯 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, जो देश की एकता एवं अखंडता के लिए बहुत जरूरी है। प्राणी मात्र की सेवा करना ही विराट ब्रह्म की आराधना है। प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है - "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता: ..."। अर्थात्, जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवाभावी बनें। विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवाव्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा-कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवाव्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहयता बढ़ती जाती है। दीन-दु:खियों की सेवा, निर्बलों की रक्षा और रोगियों की सहायता ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब 'सत्' को अपनाना और 'शुद्ध संकल्पों' में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है। अहम् का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है। अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए केवल किसी को अपना मानकर सेवा न करें, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करें; क्योंकि परमात्मा के अंशभूत होने के कारण सभी प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है ...। 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Ritika Aug 9, 2020

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Sanjay Singh Aug 9, 2020

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दीन की सुन लो दीनानाथ | साधनहीन मलीन छीन हौं, सब विधि नाथ ! अनाथ | श्रद्धाबल - संबल नहिं नेकहुँ, नहिं संतन को साथ | बूड़त हौं भवसिंधु दयामय!, पकरि लेहु अब हाथ | सात स्वर्ग अपवर्ग न माँगत, रह तव पद मम माथ | दै निज प्रेम कृपालु ‘कृपालुहिं’, करिये नाथ सनाथ || भावार्थ - हे दीनों के नाथ श्यामसुन्दर ! मुझ दीन की टेर सुन लो | क्योंकि मैं समस्त साधनों से रहित, पापमय एवं दु:खिया हूँ | कहाँ तक कहूँ, हे नाथ ! मैं सब प्रकार से अनाथ हूँ | मेरे पास श्रद्धा का लवलेश भी बल नहीं एवं महापुरुषों का नित्य साथ भी नहीं | हे दयामय ! अब मैं इस अगाध भवसागर में डूब सा ही रहा हूँ | कृपा करके अब शीघ्र ही डूबते हुए को अपने हाथों का सहारा देकर बचा लो | मैं सातों स्वर्ग के सुखों को एवं मोक्ष के सुख को भी नहीं चाहता | मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि मेरा सिर सदा आपके युगल - चरणों में पड़ा रहे | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर ! अब तुम अपना निष्काम - प्रेम मुझे देकर सदा के लिए निष्काम कर दो | श्री राधे राधे 🙏🏻*‼️मोक्ष का द्वार‼️* *मोक्ष ...... दो अक्षर का शब्द है।* *“मो” का अर्थ मोह *क्ष"का अर्थ,क्षय या नाश हो जाना*। *हमारे जीवन में धीरे धीरे मोह का* *नाश हो जाए, कम हो जाए,* *उसी को मोक्ष कहते है।* *मोक्ष के लिये मरने की जरुरत नहीं,* *बहुत सावधानी से जीने की जरुरत है।* *पाँच चीजों की मात्रा कम होने लगे* *तो समझना मोक्ष आ रहा है।* *वस्तु – बहुत सी वस्तुओं से आसक्ति कम होने लगे।* *वसु – धन संग्रह की वृति, कम होने लगे।* *विषय – विषयों के प्रति, धीरे धीरे उदासीनता आए।* *व्यक्ति – एकान्त में सुख मिलने लगे।* *विचार – विचार कम होने लगे।* .👏👏👏👏👏👏👏👏👏🌹श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी🌹 🌹हे नाथ नारायण वासुदेवा 🌹 आपको एवम आपके पुरेपरिवार एवम ईष्ट मित्रो को भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाये । 🙏🌺जय श्रीकृष्ण🌺🙏*ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे* *प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी* *तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्* *पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च* *सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्* *नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः* *नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै* श्री गंगा गीता गायत्री हरिद्वार सेवक भरत व्यास बांगा हिसार

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