गुरुवचनों का संकलन 🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶 1. भजन का उत्तम समय सुबह 3 से 6 होता है। 2. 24 घंटे में से 3 घंटों पर आप का हक नही, ये समय गुरु का है। 3. कमाए हुए धन का 10 वा अंश गुरु का है. इसे परमार्थ में लगा देना चाहिए। 4. गुरु आदेश को पालना ही गुरु भक्ति है। गुरु का पहला आदेश भजन का है जो नामदान के समय मिला था। 5. 24 घंटों के जो भी काम, सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक करो सब गुरु को समर्पित करके करोगे तो कर्म लागू नही होंगे | अपने उपर ले लोगे तो पांडवों की तरह नरक जाने पड़ेगा, जो हो रहा है उसे गुरु की मोज समझो। 6. 24 घंटे मन में सुमिरन करने से मन और अन्तःकरण साफ़ रहता है. और गुरु की याद भी हमेशा रहेगी. यही तो सुमिरन है। 7. भजन करने वालो को, भजन न करने वाले पागल कहते है मीरा को भी तो लोगो ने प्रेम दीवानी कहा। 8. कही कुछ खाओ तो सोच समझ कर खाओ, क्योंकि जिसका अन्न खाओगे तो मन भी वैसा ही हो जायेगा। मांसाहारी के यहाँ का खा लिए तो फिर मन भजन में नही लगेगा। “जैसा खाए अन्न वैसा होवे मन, जेसा पीवे पानी वैसी होवे वाणी.” 9. गुरु का आदेश, एक प्रार्थना रोज़ होनी चाहिए। 10. सामूहिक सत्संग ध्यान भजन से लाभ मिलता है. एक कक्षा में होंशियार विद्यार्थी के पास बेठ कर कमजोर विद्यार्थी भी कुछ सीख लेता है, और कक्षा में उतीर्ण हो जाता है। 11. गुरु का प्रसाद यानी “बरक्कत” रोज़ लेनी चाहिए। 12. भोजन दिन में 2 बार करते हो तो भजन भी दिन में २ बार करना चाहिए, जिस दिन भजन न पावो उस दिन भोजन भी करने का हक नही। 13. हर जीव में परमात्मा का अंश है इसलिए सब पर दया करो, सब के प्रति प्रेम भाव रखो, चाहे वो आपका दुश्मन ही क्यों न हो. इसे सोचोगे की मैं परमात्मा की हर रूह से प्रेम करता हूँ तो भजन भी बनने लगेगा। 14. परमार्थ का रास्ता प्रेम का है, दिमाग लगाने लगोगे तो दुनिया की बातो में फंस के रह जाओगे। 15. अगर 24 घंटो में भजन के लिए समय नही निकाल पाते हो तो इससे अच्छा है चुल्लू भर पानी में डूब मरो। 16. आज के समय में वही समझदार है जो घर गृहस्थी का काम करते हुए भजन करके यहाँ से निकल चले, वरना बाद में तो रोने के सिवाय कुछ नही मिलने वाला। 17. अपनी मौत को हमेशा याद रखो. मौत याद रहेगी तो मन कभी भजन में रुखा नही होगा. मौत समय बताके नही आएगी। 18. साथ तो भजन जायेगा और कुछ नही. इसलिए कर लेने में ही भलाई है, और जगत के काम झूंठे है। 19. नरकों की एक झलक अगर दिखा दी जाये तो मानसिक संतुलन खो बैठोगे. इसलिए तो महात्माओ ने बताया सब सही है. वो किसी का नुकसान नही चाहते बात तो बस विश्वास की है। 20. भोजन तो बस जीने के लिए खाओ. खाने के लिए मत जीवो. भोजन शरीर रक्षा के लिए करो। 21. परमार्थ में शरीर को सुखाना पड़ता है मन और इन्द्रियों को वश में करना पड़ता है जो ये करे वही परमार्थ के लायक है। 22. अपने भाग्य को सराहो कि आपको गुरु और नामदान मिल गये, जब दुनिया रोती नजर आएगी तब इसकी कीमत समझोगे। 23. किसी की निंदा मत करो वरना उसके कर्मो के भार तले दब जाओगे. क्यों किसी के कर्मों के लीद का पहाड़ अपने सर पर ले रहे हो। 24. भजन ना बनने का कारण है गुरु के वचनों का याद न रहना, गुरु वचनों को माला की तरह फेरते रहो जैसे एक कंगला अपनी झोली को बार बार टटोलता है। 25. इस कल युग में तीन बातो से जीव का कल्याण हो सकता है. एक सतगुरु की कृपा, दूसरा साधु की संगत और तीसरा “नाम” का सुमिरन, ध्यान और भजन,बाकी सब राग है। 🔹🔹🔶🔹🔹🔶🔹🔹🔶🔹🔹🔶🔹🔹🔶🔹🔹🔶🔹🔹

गुरुवचनों का संकलन
🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶
1. भजन का उत्तम समय सुबह 3 से 6 होता है।

2. 24 घंटे में से 3 घंटों पर आप का हक नही, ये समय गुरु का है।

3. कमाए हुए धन का 10 वा अंश गुरु का है. इसे परमार्थ में लगा देना चाहिए।

4. गुरु आदेश को पालना ही गुरु भक्ति है। गुरु का पहला आदेश भजन का है जो नामदान के समय मिला था।

5. 24 घंटों के जो भी काम, सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक करो सब गुरु को समर्पित करके करोगे तो कर्म लागू नही होंगे | अपने उपर ले लोगे तो पांडवों की तरह नरक जाने पड़ेगा, जो हो रहा है उसे गुरु की मोज समझो।

6. 24 घंटे मन में सुमिरन करने से मन और अन्तःकरण साफ़ रहता है. और गुरु की याद भी हमेशा रहेगी. यही तो सुमिरन है।

7. भजन करने वालो को, भजन न करने वाले पागल कहते है मीरा को भी तो लोगो ने प्रेम दीवानी कहा।

8. कही कुछ खाओ तो सोच समझ कर खाओ, क्योंकि जिसका अन्न खाओगे तो मन भी वैसा ही हो जायेगा।

मांसाहारी के यहाँ का खा लिए तो फिर मन भजन में नही लगेगा।

“जैसा खाए अन्न वैसा होवे मन, जेसा पीवे पानी वैसी होवे वाणी.”

9. गुरु का आदेश, एक प्रार्थना रोज़ होनी चाहिए।

10. सामूहिक सत्संग ध्यान भजन से लाभ मिलता है. एक कक्षा में होंशियार विद्यार्थी के पास बेठ कर कमजोर विद्यार्थी भी कुछ सीख लेता है, और कक्षा में उतीर्ण हो जाता है।

11. गुरु का प्रसाद यानी “बरक्कत” रोज़ लेनी चाहिए।

12. भोजन दिन में 2 बार करते हो तो भजन भी दिन में २ बार करना चाहिए, जिस दिन भजन न पावो उस दिन भोजन भी करने का हक नही।

13. हर जीव में परमात्मा का अंश है इसलिए सब पर दया करो, सब के प्रति प्रेम भाव रखो, चाहे वो आपका दुश्मन ही क्यों न हो. इसे सोचोगे की मैं परमात्मा की हर रूह से प्रेम करता हूँ तो भजन भी बनने लगेगा।

14. परमार्थ का रास्ता प्रेम का है, दिमाग लगाने लगोगे तो दुनिया की बातो में फंस के रह जाओगे।

15. अगर 24 घंटो में भजन के लिए समय नही निकाल पाते हो तो इससे अच्छा है चुल्लू भर पानी में डूब मरो।

16. आज के समय में वही समझदार है जो घर गृहस्थी का काम करते हुए भजन करके यहाँ से निकल चले, वरना बाद में तो रोने के सिवाय कुछ नही मिलने वाला।

17. अपनी मौत को हमेशा याद रखो. मौत याद रहेगी तो मन कभी भजन में रुखा नही होगा. मौत समय बताके नही आएगी।

18. साथ तो भजन जायेगा और कुछ नही. इसलिए कर लेने में ही भलाई है, और जगत के काम झूंठे है।

19. नरकों की एक झलक अगर दिखा दी जाये तो मानसिक संतुलन खो बैठोगे. इसलिए तो महात्माओ ने बताया सब सही है. वो किसी का नुकसान नही चाहते  बात तो बस विश्वास की है।

20. भोजन तो बस जीने के लिए खाओ. खाने के लिए मत जीवो. भोजन शरीर रक्षा के लिए करो।

21. परमार्थ में शरीर को सुखाना पड़ता है मन और इन्द्रियों को वश में करना पड़ता है जो ये करे वही परमार्थ के लायक है।

22. अपने भाग्य को सराहो कि आपको गुरु और नामदान मिल गये, जब दुनिया रोती नजर आएगी तब इसकी कीमत समझोगे।

23. किसी की निंदा मत करो वरना उसके कर्मो के भार तले दब जाओगे. क्यों किसी के कर्मों के लीद का पहाड़ अपने सर पर ले रहे हो।

24. भजन ना बनने का कारण है गुरु के वचनों का याद न रहना, गुरु वचनों को माला की तरह फेरते रहो जैसे एक कंगला अपनी झोली को बार बार टटोलता है।

25. इस कल युग में तीन बातो से जीव का कल्याण हो सकता है. एक सतगुरु की कृपा, दूसरा साधु की संगत और तीसरा “नाम” का सुमिरन, ध्यान और भजन,बाकी सब राग है।
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कामेंट्स

Sumer Singh Kirar Dec 19, 2019
जय श्री गुरुदेव के चरणो में सादर प्रणाम

SUMIT BANSAL Dec 19, 2019
19 NUMBER KYA IS DAR SA KI HUI BHAKTI SAHI HA IS SE ACHA TO KARAM HI BHAKTI HAI

urmila gupta Dec 19, 2019
जयश्री गुरु देव के चरणों में कोटि कोटि नमन

KAPIL DEV Dec 19, 2019
ओम श्री गुरुवे नमः

matalalratod Dec 19, 2019
ओम नमो नारायण ओम नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री गुरुदेव ओम साईं राम जय बाबा री सुप्रभात गुड मॉर्निंग

एक मार्मिक लघुकथा श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता . अस्सी पार चुके हैं*. अब बस सेवा कीजिये ." डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला . "डाक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा . साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है ." "शंकर बाबू ! मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ . बस आप इन्हें खुश रखिये . इस से बेहतर और कोई दवा नहीं है और इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये जो इन्हें पसंद है ." डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया . शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था . उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है . माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का बचा था . उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे . कैसे पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर घुसते थे . बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी . ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो . शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला - "सुशीला ! आज सबके लिए मूंग दाल के पकौड़े , हरी चटनी बनाओ . मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ ." पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी . वह भी अपने काम में लग गई . कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी पकौड़ों की . शंकर भी जलेबियाँ ले आया था . वह जलेबी रसोई में रख पिता के पास बैठ गया . उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला - "बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज लाया हूँ . थोड़ी जलेबी खायेंगे ." पिता ने आँखे झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए . वह अस्फुट आवाज में बोले - "पकौड़े बन रहे हैं क्या ?" "हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है . अरे! सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी तो लाओ ." शंकर ने आवाज लगाईं . "लीजिये बाबू जी एक और . " उसने पकौड़ा हाथ में देते हुए कहा . "बस ....अब पूरा हो गया . पेट भर गया . जरा सी जलेबी दे ." पिता बोले . शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया . पिता उसे प्यार से देखते रहे . "शंकर ! सदा खुश रहो . मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ ." पिता बोले . *बाबा ! आपको तो सेंचुरी लगानी है . आप मेरे तेंदुलकर हो .*" आँखों में आंसू बहने लगे थे . वह मुस्कुराए और बोले - "तेरी माँ पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है . अगला मैच खेलना है . तेरा पोता बनकर आऊंगा , तब खूब खाऊंगा बेटा ." पिता उसे देखते रहे . शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी . मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे . आँख भी नहीं झपक रही थी . शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई . तभी उसे ख्याल आया , पिता कहा करते थे "श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर, जो खिलाना है अभी खिला दे। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Manmoha Singh Jan 26, 2020

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क्षमादान से बडा कोई यज्ञ नहीं... 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 क्षमः यशः क्षमा दानं क्षमः यज्ञः क्षमः दमः । क्षमा हिंसा: क्षमा धर्मः क्षमा चेन्द्रियविग्रहः ॥ अर्थात् :- क्षमा ही यश है क्षमा ही यज्ञ और मनोनिग्रह है ,अहिंसा धर्म है। और इन्द्रियों का संयम क्षमा के ही स्वरूप है क्योंकि क्षमा ही दया है और क्षमा ही पुण्य है क्षमा से ही सारा जगत् टिका है अतः जो मनुष्य क्षमावान है वह देवता कहलाता है। वही सबसे श्रेष्ठ है। वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच श्रेष्ठता का निर्णय इसी गुण ने तो किया था। ब्रह्मा जी विश्वामित्र के घोर तप से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें राजर्षि कहकर संबोधित किया। विश्वामित्र इस वरदान से संतुष्ट न थे। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से जाहिर कर दिया कि ब्रह्मा उन्हें समुचित पुरस्कार नहीं दे रहे। ब्रह्माजी ने कहा- तुम्हें बहुत ज़ल्दी आभास हो जाएगा कि आखिर मैंने ऐसा क्यों कहा। जो चीज़ तुम्हें मैं नहीं दे सकता उसे तुम उससे प्राप्त करो जिससे द्वेष रखते हो। विश्वामित्र के लिए यह जले पर नमक छिड़कने की बात हो गयी। जिस वसिष्ठ से प्रतिशोध के लिए राजा से तपस्वी बने हैं उनसे वरदान लेंगे! ब्रह्मा अपने पुत्र को श्रेष्ठ बताने के लिए भूमिका बांध रहे हैं। विश्वामित्र सामान्य बात को भी आन पर ले लेते थे इसलिए राजर्षि ही रहे जबकि वशिष्ठ क्षमा की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने यह भूला दिया कि विश्वामित्र ही उनके पुत्र शक्ति की हत्या के लिए उत्तरदायी हैं। वह अपनी पत्नी अरुंधति से विश्वामित्र केे तप की प्रशंसा किया करते थे। एकदिन विश्वामित्र हाथ में तलवार लिए वशिष्ठ की हत्या करने चुपके से आश्रम में घुसे थे। उन्होंने वशिष्ठ और अरुंधति को बात करते देखा। वशिष्ठ कह रहे थे- अरुंधति! तपस्वी हो तो विश्वामित्र जैसा। हाथ से तलवार छूट गई। राजर्षि विश्वामित्र वशिष्ठ के चरणों में लोट गए- हा देव! क्षमा! हा देव क्षमा! इसके अलावा कुछ निकलता ही न था मुख से। वशिष्ठ ने कहा- उठिए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र! देवो ने पुष्पवर्षा करके वशिष्ठ का अनुमोदन कर दिया। क्षमा गुण धारण करने के कारण वशिष्ठ वह वरदान देने में समर्थ थे जो स्वयं ब्रह्मा न दे सके। बड़े दिल वाला व्यक्ति आरम्भ में मात खा सकता है परंतु अंतिम बाज़ी उसी के हाथ होती है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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🌹 *||श्री हरि:||* 🌹 दो चींटियों का दृष्टान्त दिया है संतों ने । एक नमक के ढेले पर रहने वाली चींटी की एक मिश्री के ढेलेपर रहने वाली चींटी से मित्रता हो गयी । मित्रता के नाते वह उसे अपने नमक के ढेले पर ले गयी और कहा–‘खाओ !’ वह बोली–‘क्या खायें,यह भी कोई मीठा पदार्थ है क्या ?’ नमक के ढेले पर रहने वाली ने उससे पूछा कि ‘मीठा क्या होता है, इससे भी मीठा कोई पदार्थ है क्या ?’ तब मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने कहा–‘यह तो मीठा है ही नहीं । मीठा तो इससे भिन्न ही जाति का होता है ।’ परीक्षा कराने के लिये मिश्री पर रहने वाली चींटी दूसरी चींटी को अपने साथ ले गयी । नमक पर रहने वाली चींटी ने यह सोचकर कि ‘मैं कहीं भूखी न रह जाऊँ’ छोटी-सी नमक की डली अपने मुँह में पकड़ ली । मिश्री पर पहुँचकर मिश्री मुँह में डालने पर भी उसे मीठी नहीं लगी । मिश्री पर रहनेवाली चींटी ने पूछा–‘मीठा लग रहा है न ?’ वह बोली–‘हाँ-में-हाँ तो कैसे मिला दूँ ?बुरा तो नहीं मानोगी ? मुझे तो कोई अन्तर नहीं प्रतीत होता है, वैसा ही स्वाद आ रहा है ।’ उस मिश्री पर रहने वाली चींटी ने विचार किया–‘बात क्या है ? इसे वैसा ही–नमक का स्वाद कैसे आ रहा है !’ उसने मिश्री स्वयं चखकर देखी, मीठी थी । वह सोचने लगी–‘बात क्या है !’ उसने पूछा–‘आते समय तुमने कुछ मुँह में रख तो नहीं लिया था ?’ इस पर वह बोली–‘भूखी न रह जाऊँ,इसलिये छोटा-सा नमक का टुकड़ा मुँह में डाल लिया था ।’ उसने कहा–‘निकालो उसे ।’ जब उसने नमक की डली मुँह में से निकाल दी, तब दूसरी ने कहा–‘अब चखो इसे ।’ अबकी बार उसने चखा तो वह चिपट गयी । पूछा–‘कैसा लगता है ?’ तो वह इशारे से बोली–‘बोलो मत,बस खाने दो ।’ इसी प्रकार सत्संगी भाई-बहन सत्संग की बातें तो सुनते हैं, पर धन, मान-बड़ाई, आदर-सत्कार आदि को पकड़े-पकड़े सुनते हैं । साधन करने वाला, उसमें रस लेने वाला उनसे पूछता है–‘क्यों ! कैसा आनन्द है ?’ तब हाँ-में-हाँ तो मिला देते हैं, पर उन्हें रस कैसे आये ? नमक की डली जो मुँह में पड़ी है । मन में उद्देश्य तो है धन आदि पदार्थों के संग्रह का, भोगों का और मान-पद आदि का । अत: इनका उद्देश्य न रखकर *केवल परमात्मा की प्राप्ति का उद्देश्य बनाना चाहिये। राधे राधे... 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Shama Malhotra Jan 26, 2020

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Mohinder Dhingra Jan 26, 2020

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SATISH Jan 26, 2020

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दुःख ईश्वर का प्रसाद है 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हे मृतुलोक जाना पड़ेगा,मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ. ये सुन जीव की आँखों मे आंसू आ गए.वो बोला प्रभु कुछ तो ऐसा करो की मे लौटकर आपके पास ही आऊ. भगवान को दया आ गई. उन्होंने दो बाते की जीव के लिए. पहला संसार की हर चीज़ मे अतृप्ति मिला दी, कि तुझे दुनिया मे कुछ भी मिल जाये तू तृप्त नहीं होगा. तृप्ति तुझे तभी मिलेगी जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से मे थोडा-थोडा दुःख मिला दिया कि हम लौट कर ईश्वर के पास ही पहुचे. इस तरह हर किसी के जीवन मे थोडा दुःख है. जीवन मे दुःख या विषाद हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए है, लेकिन हम चूक जाते है. हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता है, हम भागते है ज्योतिष के पास,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास. कुछ होने वाला नहीं. थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस. यदि दुखो से घबराये नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढे तो बात बन जाती है. यदि हम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती है और जीव दुखो से भी पार हो जाता है. दुःख तो ईश्वर का प्रसाद है. दुखो का मतलब है, ईश्वर का बुलावा है. वो हमें याद कर रहा है पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका है. हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार मे हर चीज़ मे अतृप्ति है और दुःख और विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन है. "जय जय श्री राधे " 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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