Ⓜ@Nisha
Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019

🏹🙏सभी भाई बहनों को प्रातःकालीन नमस्कार 🙏🏹 *🌷प्रातःनमनः🌷* *"अहम्" से ऊँचा कोई "आसमान" नहीं।* *किसी की "बुराई" करने जैसा "आसान" कोई काम नहीं।* *"स्वयं" को पहचानने से अधिक कोई "ज्ञान" नहीं।* *और "क्षमा" करने से बड़ा कोई "दान" नहीं।* 🙏🙏🙏🙏🙏 *🌅 शुभ प्रभात 🌅* *🌹आप का दिन मंगलमय हो🌹* ***🏹🙏🌷 आज का अमृत 🌷🙏🏹*** 🦚🦚जय श्री सीताराम जी 🦚🦚 💥💥🦋🦋💥💥🦋 देह का कोई ठिकाना नहीं। इसीलिए हमेशा याद रखो कि तुम वैदेही के पुत्र हो, और यह कहते-कहते माता बोलीं क्या? भूरि भाग भाजन भयउँ मोहि समेत वलि जाउँ। जौं तुम्हरे मन छांड़ि छल कीन्ह राम पद ठाउँ।। लक्ष्मण! मैं बड़भागिनी हूँ तुम्हारे जैसे पुत्र को पाकर। लक्ष्मण जी ने कहा कि माँ! अभी तो आप कह रहीं थीं कि वैदेही तुम्हारी माता हैं, अब आप कह रही हैं कि तुम्हारे जैसा बेटा पाकर मैं धन्य हो गई। तो हमें यही समझ में नहीं आता कि हमारी माता कौन हैं? वैदेही मेरी माता हैं या आप मेरी माता हैं? सुमित्रा जी ने कहा-- लक्ष्मण! इस बात को ऐसे समझो, जैसे -- एक ग्वाला दूध बेचता था। दूध खरीदने वाला आया। ग्वाला किसी कार्य में व्यस्त था। उसने अपने बेटे से कहा कि इन्हें दूध दे दो तौलकर। ••••ठीक है पिता जी, लेकिन वह पिता से पूछता है , कि पिता जी! इन्हें लोटे का दूध दूं कि बाल्टी का? दूध लोटे में भी रखा है और बाल्टी में भी रखा है। तो बालक पूछता है कि मैं बाल्टी का दूध दूं कि लोटे का? अब लक्ष्मण! तुम यह बताओ कि दूध बाल्टी का है कि लोटे का? दूध तो गौ माता का है, न बाल्टी का, न लोटे का, फिर बोलते क्यों हैं कि बाल्टी का दूध, लोटे का दूध? इसलिए; क्योंकि गौ माता का दूध बाल्टी में रख दिया है, लोटे में रख दिया है। इसलिए बाल्टी का दूध, लोटे का दूध, नाम जुड़ गया है। इसी तरह लक्ष्मण! पुत्र तो तुम वैदेही के हो, लेकिन इस पात्र में रख दिये गये हो, तो तुम्हारा नाम भी मेरे साथ जुड़ गया है। बोली माँ सुमित्रा, सुनौ लाड़ले लखनलाल। मुझसे तुम्हारा बस देह का ही नाता है।। जैसे जिस पात्र में रखते 'राजेश' वस्तु। वस्तु संग पात्र का भी नाम जुड़ जाता है।। करना मत याद मुझे मेरी सौगंध तुझे। कहते हुए माता का कंठ भर आता है। और एक ही बात कही -- जाओ जाओ मन में एक ही सद्भाव लिए। कैसी भी स्थिति में याद बस यही रहे। जानना श्री राम पिता जानकी जी माता हैं।। यह माता ने दीक्षा दी। अच्छा लक्ष्मण! एक बात बताओ। सीताराम जी वन क्यों जा रहे हैं? लक्ष्मण जी बोले -- कैकेई माता के कारण हुआ यह सब। सुमित्रा जी बोलीं -- लक्ष्मण! तुम्हें पता नहीं है, कैकेई जी के कारण राम जी वन को नहीं जा रहे हैं। ••• फिर? तुम्हरे ही भाग राम वन जाहीं। माता सुमित्रा कहती हैं -- लक्ष्मण! यह कभी मत सोचना कि कैकेई माता के कारण श्री राम वन जा रहे हैं। तुम तो यह सोचना कि तुम्हारे सौभाग्य से ही श्री राम वन जा रहे हैं, ताकि तुम उनकी सेवा कर सको, तुम्हें सेवा मिल सके, यही सोचना। मुझे तो कई बार लगता है कि अगर हमारी सोच बदल जाय, तो दुनिया बदल जाय। दो व्यक्तियों को आधा-आधा गिलास दूध मिला। शीशे के गिलास थे, एक ने गिलास को ऊपर से देखा।••• क्या होता इतने दूध में? आधा खाली है। बड़ा तनाव में, क्या होता है इसमें? और दूसरा आदमी दूध लेकर शीशे के गिलास को ऊपर उठा रहा है।••• आधा है, अरे बहुत है, बहुत है। क्या बात है, बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया। दोनों के पास ही आधा-आधा है। एक गिलास को नीचे से देख रहा है और एक गिलास को ऊपर से देख रहा है। अगर हम लोग की दृष्टि बदल सके, तो सृष्टि चाहे जैसी बनी रहे, हमें आनन्द देने वाली ही होगी। एक महात्मा के आश्रम में दो ब्राह्मण देवता ठहरे। श्राद्ध के दिन, ब्राह्मणों के निमंत्रण, ब्राह्मण बड़े आनन्द में जावें, शाम को लौट आवें, महात्मा बड़े प्रसन्न--- और पंडित जी?•••• अरे महाराज! सब आनन्द है। आपकी कृपा से सब ठीक चल रहा है। एक दिन दोनों गये निमंत्रण में। एक उदास, एक हंसता हुआ आया। जो उदास था वह कहे -- महाराज!(लम्बी सांस लेकर) हो आए। दूसरे से पूछा, तो कहा -- (खुश होकर)हाँ महाराज! हो आये। महात्मा जी को लगा, अलग-अलग जगह गये होंगे ये।सो पूछा -- क्या अलग-अलग जगह गये थे? •••••नहीं-नहीं , एक ही जगह।•••• अच्छा, तो उन्होंने स्वागत में अंतर किया होगा। तुम्हें नीचे बिठा दिया, उन्हें ऊपर। ••••••नहीं-नहीं, एक ही जगह पर। •••••तो खिलाने-पिलाने में अंतर किया होगा? इनको हलवा खिलाया हो, तुम्हें कुछ और?•••••नहीं-नहीं, जो इन्हें खिलाया, वही हमें। महात्मा बोले --- अब हम समझ गये, विदाई में अंतर हुआ होगा।••••नहीं-नहीं, पांच रुपए इन्हें मिले, पांच हमें। महात्मा बोले -- जब एक जगह गये, एक जैसा स्वागत, एक जैसा भोजन, एक जैसी दक्षिणा, फिर यह बात समझ में नहीं आ रही, कि एक उदास और एक प्रसन्न कैसे? तो जो दुखी था, उससे पूछा --- क्यों दुखी हो? कहने लगा-- महाराज! हम रास्ते भर कल्पना करते गये, कि बड़े आदमी के घर जा रहे हैं, बड़ा सम्पन्न धनी आदमी है। हम सोच रहे थे कम से कम ग्यारह रुपए तो देगा, और उसने पांच ही दिये।‌इसलिए हम परेशान हैं। दूसरे से पूछा -- तुम प्रसन्न क्यों हो? बोले -- महाराज! हम जानते थे, है तो बड़ा आदमी, पर बड़ा कंजूस है। हम पहले से जानते थे, दो रुपए से ज्यादा नहीं देगा, और उसने पांच दे दिए। अब बोलो, उसको उदास किया किसने, और इसको प्रसन्न किया किसने? तभी संत लोग कहते हैं --**जय श्री राम** ** 🌷🙏 जय सियाराम 🌷🙏**

🏹🙏सभी भाई बहनों को प्रातःकालीन नमस्कार 🙏🏹
*🌷प्रातःनमनः🌷*
*"अहम्" से ऊँचा कोई "आसमान" नहीं।*
*किसी की "बुराई" करने जैसा "आसान" कोई काम नहीं।*
*"स्वयं" को पहचानने से अधिक कोई "ज्ञान" नहीं।*
*और "क्षमा" करने से बड़ा कोई "दान" नहीं।*
            🙏🙏🙏🙏🙏
       *🌅  शुभ प्रभात  🌅*
*🌹आप का दिन मंगलमय हो🌹*

***🏹🙏🌷 आज का अमृत 🌷🙏🏹***
🦚🦚जय श्री सीताराम जी 🦚🦚
💥💥🦋🦋💥💥🦋

         देह का कोई ठिकाना नहीं। इसीलिए हमेशा याद रखो कि तुम वैदेही के पुत्र हो, और यह कहते-कहते माता बोलीं क्या?

भूरि भाग भाजन भयउँ
          मोहि समेत वलि जाउँ।
जौं तुम्हरे मन छांड़ि छल
          कीन्ह राम पद ठाउँ।।

          लक्ष्मण! मैं बड़भागिनी हूँ तुम्हारे जैसे पुत्र को पाकर। लक्ष्मण जी ने कहा कि माँ! अभी तो आप कह रहीं थीं कि वैदेही तुम्हारी माता हैं, अब आप कह रही हैं कि तुम्हारे जैसा बेटा पाकर मैं धन्य हो गई। तो हमें यही समझ में नहीं आता कि हमारी माता कौन हैं? वैदेही मेरी माता हैं या आप मेरी माता हैं? सुमित्रा जी ने कहा-- लक्ष्मण! इस बात को ऐसे समझो, जैसे -- एक ग्वाला दूध बेचता था।  दूध खरीदने वाला आया। ग्वाला किसी कार्य में व्यस्त था। उसने अपने बेटे से कहा कि इन्हें दूध दे दो तौलकर। ••••ठीक है पिता जी, लेकिन वह पिता से पूछता है , कि पिता जी! इन्हें लोटे का दूध दूं कि बाल्टी का? दूध लोटे में भी रखा है और बाल्टी में भी रखा है।

         तो बालक पूछता है कि मैं बाल्टी का दूध दूं कि लोटे का? अब लक्ष्मण! तुम यह बताओ कि दूध बाल्टी का है कि लोटे का? दूध तो गौ माता का है, न बाल्टी का, न लोटे का, फिर बोलते क्यों हैं कि बाल्टी का दूध, लोटे का दूध? 

          इसलिए; क्योंकि गौ माता का दूध बाल्टी में रख दिया है, लोटे में रख दिया है। इसलिए बाल्टी का दूध, लोटे का दूध, नाम जुड़ गया है।

          इसी तरह लक्ष्मण! पुत्र तो तुम वैदेही के हो, लेकिन इस पात्र में रख दिये गये हो, तो तुम्हारा नाम भी मेरे साथ जुड़ गया है।

बोली माँ सुमित्रा, सुनौ लाड़ले लखनलाल।
मुझसे तुम्हारा बस देह का ही नाता है।।
जैसे जिस पात्र में रखते 'राजेश' वस्तु।
वस्तु संग पात्र का भी नाम जुड़ जाता है।।
करना मत याद मुझे मेरी सौगंध तुझे।
कहते हुए माता का कंठ भर आता है।

          और एक ही बात कही --

जाओ जाओ मन में एक ही सद्भाव लिए।
कैसी भी स्थिति में याद बस यही रहे।
जानना श्री राम पिता जानकी जी माता हैं।।

          यह माता ने दीक्षा दी। अच्छा लक्ष्मण! एक बात बताओ। सीताराम जी वन क्यों जा रहे हैं? लक्ष्मण जी बोले -- कैकेई माता के कारण हुआ यह सब।  सुमित्रा जी बोलीं -- लक्ष्मण! तुम्हें पता नहीं है, कैकेई जी के कारण राम जी वन को नहीं जा रहे हैं। ••• फिर?

तुम्हरे ही भाग राम वन जाहीं।

           माता सुमित्रा कहती हैं -- लक्ष्मण! यह कभी मत सोचना कि कैकेई माता के कारण श्री राम वन जा रहे हैं। तुम तो यह सोचना कि तुम्हारे सौभाग्य से ही श्री राम वन जा रहे हैं, ताकि तुम उनकी सेवा कर सको, तुम्हें सेवा मिल सके, यही सोचना।

           मुझे तो कई बार लगता है कि अगर हमारी सोच बदल जाय, तो दुनिया बदल जाय। दो व्यक्तियों को आधा-आधा गिलास दूध मिला। शीशे के गिलास थे, एक ने गिलास को ऊपर से देखा।••• क्या होता इतने दूध में? आधा खाली है। बड़ा तनाव में, क्या होता है इसमें? और दूसरा आदमी दूध लेकर शीशे के गिलास को ऊपर उठा रहा है।••• आधा है, अरे बहुत है, बहुत है। क्या बात है, बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया।

         दोनों के पास ही आधा-आधा है। एक गिलास को नीचे से देख रहा है और एक गिलास को ऊपर से देख रहा है। अगर हम लोग की दृष्टि बदल सके, तो सृष्टि चाहे जैसी बनी रहे, हमें आनन्द देने वाली ही होगी।

         एक महात्मा के आश्रम में दो ब्राह्मण देवता ठहरे। श्राद्ध के दिन, ब्राह्मणों के निमंत्रण, ब्राह्मण बड़े आनन्द में जावें, शाम को लौट आवें, महात्मा बड़े प्रसन्न--- और पंडित जी?•••• अरे महाराज! सब आनन्द है। आपकी कृपा से सब ठीक चल रहा है।

          एक दिन दोनों गये निमंत्रण में। एक उदास, एक हंसता हुआ आया। जो उदास था वह कहे -- महाराज!(लम्बी सांस लेकर) हो आए। दूसरे से पूछा, तो कहा -- (खुश होकर)हाँ महाराज! हो आये।  महात्मा जी को लगा, अलग-अलग जगह गये होंगे ये।सो पूछा -- क्या अलग-अलग जगह गये थे? •••••नहीं-नहीं , एक ही जगह।•••• अच्छा, तो उन्होंने स्वागत में अंतर किया होगा। तुम्हें नीचे बिठा दिया, उन्हें ऊपर। ••••••नहीं-नहीं, एक ही जगह पर। •••••तो खिलाने-पिलाने में अंतर किया होगा? इनको हलवा खिलाया हो, तुम्हें कुछ और?•••••नहीं-नहीं, जो इन्हें खिलाया, वही हमें। महात्मा बोले --- अब हम समझ गये, विदाई में अंतर हुआ होगा।••••नहीं-नहीं, पांच रुपए इन्हें मिले, पांच हमें। महात्मा बोले -- जब एक जगह गये, एक जैसा स्वागत, एक जैसा भोजन, एक जैसी दक्षिणा, फिर यह बात समझ में नहीं आ रही, कि एक उदास और एक प्रसन्न कैसे? 

         तो जो दुखी था, उससे पूछा  --- क्यों दुखी हो? कहने लगा-- महाराज! हम रास्ते भर कल्पना करते गये, कि बड़े आदमी के घर जा रहे हैं, बड़ा सम्पन्न धनी आदमी है। हम सोच रहे थे कम से कम ग्यारह रुपए तो देगा, और उसने पांच ही दिये।‌इसलिए हम परेशान हैं। दूसरे से पूछा -- तुम प्रसन्न क्यों हो? बोले -- महाराज! हम जानते थे, है तो बड़ा आदमी, पर बड़ा कंजूस है। हम पहले से जानते थे, दो रुपए से ज्यादा नहीं देगा, और उसने पांच दे दिए। 

         अब बोलो, उसको उदास किया किसने, और इसको प्रसन्न किया किसने? तभी संत लोग कहते हैं --**जय श्री राम**
** 🌷🙏 जय सियाराम 🌷🙏**

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कामेंट्स

Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019
@राधारानीराधारानी 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *नेक इंसान बनने के लिए *🌷 *उतनी ही कोशिश करो।* *जितना खूबसूरत दिखने* *के लिए करते हो।।* 💜🌷💜🌷💜🌷💜🌷💜 🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 💜💜 शुभ रात्रि नमस्कार 💜💜

Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019
@anitamittal1 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *नेक इंसान बनने के लिए *🌷 *उतनी ही कोशिश करो।* *जितना खूबसूरत दिखने* *के लिए करते हो।।* 💜🌷💜🌷💜🌷💜🌷💜 🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 💜💜 शुभ रात्रि नमस्कार 💜💜

Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019
@rcgarg 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *नेक इंसान बनने के लिए *🌷 *उतनी ही कोशिश करो।* *जितना खूबसूरत दिखने* *के लिए करते हो।।* 💜🌷💜🌷💜🌷💜🌷💜 🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 💜💜 शुभ रात्रि नमस्कार 💜💜

Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019
@sushilkumarsharma29 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *नेक इंसान बनने के लिए *🌷 *उतनी ही कोशिश करो।* *जितना खूबसूरत दिखने* *के लिए करते हो।।* 💜🌷💜🌷💜🌷💜🌷💜 🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 💜💜 शुभ रात्रि नमस्कार 💜💜

Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019
@rajsingh1 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *नेक इंसान बनने के लिए *🌷 *उतनी ही कोशिश करो।* *जितना खूबसूरत दिखने* *के लिए करते हो।।* 💜🌷💜🌷💜🌷💜🌷💜 🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 💜💜 शुभ रात्रि नमस्कार 💜💜

Ⓜ@Nisha Dec 7, 2019
@sanjayawasthi7 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *नेक इंसान बनने के लिए *🌷 *उतनी ही कोशिश करो।* *जितना खूबसूरत दिखने* *के लिए करते हो।।* 💜🌷💜🌷💜🌷💜🌷💜 🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 💜💜 शुभ रात्रि नमस्कार 💜💜

Raghubir singh yadav Dec 8, 2019
good morning ji jai shri ram jai shri Krishna Radhey Radhey Radhey thank you Nisa ji ap ne bhaut sunder khani post ki

suman soni Dec 8, 2019
sandar post ek dam badiya 👍👍👍👍👍👍💐

suman soni Dec 8, 2019
sundar post ke liye meri taraf se🌷🌷

Ⓜ@Nisha Dec 8, 2019
@sumansoni आपका बहुत बहुत धन्यवाद बहना जय श्री कृष्ण राधे राधे शुभ रात्रि नमस्कार 🌷🌷🌷🙏🌷🌷🌷

Ⓜ@Nisha Dec 8, 2019
@raghubirsinghyadav ♣🌷 शुभ रात्रि नमस्कार 🌷♣ 🌷✍ जय श्री कृष्ण राधे राधे ✍ भगवद् गीता मे श्री कृष्णा ने बहुत बड़ी बात कही है , यदि आप धर्म करोगे तो भगवान से आपको माँगना पड़ेगा... लेकिन आप कर्म करोगे तो भगवान को आपको देना ही पड़ेगा... ♣✍♣ जय श्री कृष्ण ♣✍♣

Ⓜ@Nisha Dec 8, 2019
@sumansoni ♣🌷 शुभ रात्रि नमस्कार 🌷♣ 🌷✍ जय श्री कृष्ण राधे राधे ✍ भगवद् गीता मे श्री कृष्णा ने बहुत बड़ी बात कही है , यदि आप धर्म करोगे तो भगवान से आपको माँगना पड़ेगा... लेकिन आप कर्म करोगे तो भगवान को आपको देना ही पड़ेगा... ♣✍♣ जय श्री कृष्ण ♣✍♣

Ⓜ@Nisha Dec 8, 2019
@raghubirsinghyadav आपका बहुत बहुत धन्यवाद भाई जय श्री कृष्ण राधे राधे 🌼🌿🌼 श्री गीता जयंती की आप सभी इष्टजन सभी भाई बहनों को हार्दिक बधाई 🎂🌹🎂🌹🎂 🏵🌿🏵 श्री गीता गंगा गायत्री, सीता सत्या सरस्वती ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली, त्रिसंध्या मुक्तगेहिनी 🌼🌿🌼 🌺🌿🌺 अर्धमात्रा चिदानंदा, भवध्वनि भयनाशिनी वेदात्रयी परानंता, तत्वार्थ ज्ञानमञ्जरी 💐🌿💐 🌻🌿🌻 श्री कृष्णम् वन्दे जगद्गुरूम् 🌺🌿🌺

Ⓜ@Nisha Dec 9, 2019
@sumansoni 🌻*आज का विचार...*🌻 ** ✍♣✍♣✍♣✍♣✍** 🌻 *है छोटी सी ज़िन्दगी...*🌻 🌻 *तकरारें किस लिए,*🌻 🌻 *रहो एक दूसरे के*🌻 *दिलों में,* 🌻 *ये दीवारें किस लिये*🌻 *🙏 ओम नमः शिवाय🙏* **🌷👏 हर हर महादेव 👏🌷**

Ⓜ@Nisha Dec 9, 2019
@sumansoni *🙏🙏 हर हर महादेव🙏🙏* *सभी शब्दोंका अर्थ मिल सकता है* *परन्तु,,,,,* *जीवन का अर्थ जीवन जी कर* *और सबंध का अर्थ* *सबंध निभाकर ही मिल सकता है* *दर्द भी वही देते हैं* *जिन्हे हक दिया जाता है* *वर्ना अजनबी तो धक्का लगने पर भी* *माफी माँग लिया करते हैं* *कुछ ख्वाइशों का* *कत्ल करके मुस्कुरा दो* *जिंदगी खुद-ब-खुद* *बेहतर हो जायेगी..!* *एक दिया जरूर जलाना* *चाहे आपको ईश्वर मिले न मिले* *हो सकता है दीपक की रोशनी से* *किसी मुसाफिर को ठोकर न लगे* 🚩|| ओम नमः शिवाय ||🚩 🔮⌛🔮⌛⌛🔮⌛🔮⌛ ***आपका दिन मंगलमय हो ***

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PARSHOTAM YADAV Jan 26, 2020

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Mansingh Panwar Jan 26, 2020

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Durga Pawan Sharma Jan 26, 2020

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champalal m kadela Jan 26, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 27, 2020

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभ प्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 : आज भी हिमांचल क्षेत्र में कोई रहस्यमय अग्नि स्वरुप शक्ति है जो राक्षसों का संहार करती है...... इस रहस्यमयी शक्ति का वर्णन पहली बार महाभारत में हुआ है | महाभारत में आई कथा के अनुसार एक बार गन्धर्वराज चित्ररथ अर्जुन से कहते हैं “अर्जुन ! राजा इक्ष्वाकु के वंश में कल्माषपाद नाम का एक राजा हुआ था । एक दिन की बात है, वह शिकार खेलने के लिये वन में गया । लौटने के समय वह एक ऐसे मार्ग से आने लगा, जिससे केवल एक ही मनुष्य चल सकता था । वह थका-माँदा और भूखा-प्यासा तो था ही, उसी मार्ग पर सामने से शक्तिमुनि आते दीख पड़े । शक्तिमुनि, वसिष्ठ जी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे । राजा ने कहा, “तुम हट जाओ । मेरे लिये रास्ता छोड़ दो” । शक्ति ने कहा, “महाराज ! सनातन धर्म के अनुसार क्षत्रिय का यह कर्तव्य है कि वह ब्राह्मण के लिये मार्ग छोड़ दे” । इस प्रकार दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गयी । न ऋषि हटे और न राजा । राजा के हाथ में चाबुक था, उन्होंने बिना सोचे-विचारे ऋषि पर चला दिया । शक्ति मुनि ने इसे राजा का अन्याय समझ कर उन्हें शाप दिया कि “अरे नृपाधम ! तू राक्षस की तरह तपस्वी पर चाबुक चलाता है; इसलिये जा, राक्षस हो जा” । राजा राक्षसभावाक्रान्त हो गया । उसने कहा, “तुमने मुझे अयोग्य शाप दिया है; इसलिये लो, मैं तुमसे ही अपना राक्षसपना प्रारम्भ करता हूँ” । इसके बाद कल्माषपाद शक्ति मुनि को मारकर तुरंत खा गया । केवल शक्तिमुनि को ही नहीं; वसिष्ठ के जितने पुत्र थे, सभी को उसने खा लिया । शक्ति और वसिष्ठ के दूसरे पुत्रों के भक्षण में कल्माष का राक्षसपना तो कारण था ही, इसके अलावा विश्वामित्र ने भी पहले द्वेष का स्मरण करके किंकर नाम के राक्षस को आज्ञा दी थी कि वह कल्माषपाद में प्रवेश कर जाय, जिसके कारण वह ऐसे नीच कर्म में प्रवृत्त हुआ । वसिष्ठ जी को यह बात मालूम हुई । उन्होंने जाना कि इसमें विश्वामित्र की प्रेरणा है फिर भी उन्होंने अपने शोक के वेग को वैसे ही धारण कर लिया, जैसे पर्वतराज सुमेरु पृथ्वी को । उन्होंने प्रतीकार की सामर्थ्य होने पर भी उनसे किसी प्रकार का बदला नहीं लिया । एक बार महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रम पर लौट रहे थे । इसी समय ऐसा जान पड़ा, मानो उनके पीछे-पीछे कोई षडंग वेदों का अध्ययन करता हुआ चलता है । वसिष्ठ ने पूछा कि मेरे पीछे-पीछे कौन चल रहा है? आवाज आयी कि “मैं आपकी पुत्रवधू शक्ति पत्नी अदृश्यन्ती हूँ” । वसिष्ठ बोले, “बेटी ! मेरे पुत्र शक्ति के समान स्वर से सांग वेदों का अध्ययन कौन कर रहा है” ? अदृश्यन्ती ने कहा, “आपका पौत्र मेरे गर्भ में है । वह बारह वर्ष से गर्भ में ही वेदाध्ययन कर रहा है” । यह सुनकर वसिष्ठ मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने सोचा, “अच्छी बात है । मेरी वंश-परम्परा का उच्छेद नहीं हुआ” । यही सब सोचते हुए वे लौट ही रहे थे कि एक निर्जन वन में कल्माषपाद से उनकी भेंट हो गयी । कल्माषपाद विश्वामित्र के द्वारा प्रेरित उग्र राक्षस से आविष्ट होकर वसिष्ठ मुनि को खा जाने के लिये दौड़ा । उस क्रूरकर्मा राक्षस को देखकर अदृश्यन्ती डर गयी और कहने लगी, “भगवन् ! देखिये, देखिये; यह हाथ में सूखा काठ लिये भयंकर राक्षस दौड़ा आ रहा है । आप इससे मेरी रक्षा कीजिये” । वसिष्ठ ने कहा, “बेटी, डरो मत । यह राक्षस नहीं, कल्माषपाद है” । यह कहकर महर्षि वसिष्ठ ने हुंकार से ही उसे रोक दिया । इसके बाद उन्होंने जल को हाथ में लेकर मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और कल्माषपाद के ऊपर डाला । वह तुरंत शाप से मुक्त हो गया । बारह वर्ष के बाद आज वह शाप से छूटा । उसका तेज बढ़ गया, वह होश में आया और हाथ जोड़कर श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ से कहने लगा, “महाराज ! मैं सुदास का पुत्र कल्माषपाद आपका यजमान हूँ । आज्ञा कीजिये, मैं आपको क्या सेवा करूँ” ? वसिष्ठ जी ने कहा, “यह सब बात तो भैया ! समय-समय की है । अब जाओ, तुम अपने राज्य की देखभाल करो । हाँ, इतना ध्यान रखना कि कभी किसी ब्राह्मण का अपमान न हो” । राजा ने प्रतिज्ञा की, “महाभाग्यवान् ऋषिश्रेष्ठ ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा । कभी ब्राह्मणों का तिरस्कार नहीं करूँगा, उनका प्रेम से सत्कार करूँगा” । क्षमाशील महर्षि वसिष्ठ इसी पुत्रघाती राजा के साथ अयोध्या में आये और अपने कृपा प्रसाद से उसे पुत्रवान् बनाया । इधर वसिष्ठ के आश्रम पर अदृश्यन्ती के गर्भ से पराशर का जन्म हुआ । स्वयं भगवान् वसिष्ठ ने पराशर के जातकर्मादि संस्कार कराये । धर्मात्मा पराशर वसिष्ठमुनि को ही अपना पिता समझते थे और “पिताजी ! पिताजी !” कहकर पुकारते थे । एक दिन अदृश्यन्ती ने बतलाया कि ये तुम्हारे पिता नहीं, दादा हैं; इसी प्रसंग में पराशर जी को यह भी मालूम हुआ कि मेरे पिता को राक्षस ने खा डाला । यह सुनकर उनके चित्त में बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने सब राजाओं पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया । महर्षि वसिष्ठ ने प्राचीन कथाएँ कहकर उन्हें समझाया और आज्ञा की कि “तुम्हारा कल्याण इसी में है। तुम क्षमा करो, किसी को पराजित मत करो । तुम्हें मालूम ही है कि इन राजाओं की जगत में कितनी आवश्यकता है” । वसिष्ठ के समझाने-बुझाने से पराशर ने राजाओं को पराजित करने का निश्चय तो छोड़ दिया, परंतु राक्षसों के विनाश के लिये घोर यज्ञ प्रारम्भ किया । उस यज्ञ से जब राक्षसों का नाश होने लगा, तब महर्षि पुलस्त्य और वसिष्ठ ने उन्हें समझाया “पराशर ! क्षमा ही परम धर्म है । तुम्हारे सभी पूर्वज क्षमा की मूर्ति हैं । मनुष्य तो यों ही किसी की मृत्यु का निमित्त बन जाता है, तुम यह भयंकर क्रोध त्याग दो” । ऋषियों की आज्ञा से पराशर ने भी क्षमा स्वीकार की और अपने यज्ञाग्नि को हिमाचल में छोड़ दिया । वह आग अब भी राक्षस, वृक्ष और पत्थरों को जलाती फिरती है । बहुत से लोग तो जानते भी नहीं कि ऐसी कोई शक्ति आज भी है | यद्यपि वो शक्ति जो कोई भी है और हिमांचल क्षेत्र में जहाँ कहीं भी है, इस बात की प्रबल सम्भावना है कि वो अभी निष्क्रिय है | लेकिन भविष्य जब कभी भी, किसी कारण वश अगर सक्रीय हुई, तो राक्षसी मानसिकता वाली प्राणियों पर कहर बन कर बरसेगी |

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