Deepak Shaw
Deepak Shaw Jun 6, 2018

Good morning friends

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Swami Lokeshanand Jun 1, 2020

दो भाई थे। पर दोनों के स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर था। एक संत सेवी था, दूसरा वेश्यागामी। एक रात वह संत सेवी भाई, संत की सेवा करके घर आ रहा था। रास्ते में उसके पैर में एक खूंटी गड़ गई। बड़ा गहरा जख्म हो गया और बहुत खून बह गया। वह बड़ी मुश्किल से घर पहुँचा। उसी रात वेश्यालय से लौट रहे, वेश्यागामी भाई को, रास्ते में लाखों रुपए का हीरों का हार पड़ा मिला। रात में वेश्यागामी भाई कहने लगा- मैं तो पहले से ही कहता था कि कुछ नहीं रखा इन संतों में। अब देख लिया? तुम यहाँ दर्द से कराह रहे हो, मैं ऐश कर रहा हूँ। दोनों ने विचार किया कि किसी जानकार के पास चलना चाहिए। और सुबह होते ही वे एक ज्योतिषी के पास गए। अपना परिचय दिए बिना ही दोनों की जन्मपत्रियाँ ज्योतिषी के आगे रख दी। ज्योतिषी ने पहले संतसेवी की पत्री उठाई। उसे पढ़कर पत्री एक तरफ रख दी, और बोले- ये पत्री मेरे पास क्यों ले आए हो? यह तो कल रात मर गया होगा। और वेश्यागामी की पत्री देखी तो बोले- यह किस देश के राजा की पत्री है? मेरा सौभाग्य है जो ऐसी पत्री मेरे पास आई। लोकेशानन्द कहता है कि यही सत्कर्म और दुष्कर्म का फल है। वर्तमान का सत्कर्म, पूर्वजन्म के पाप को काट कर, सूली का सूल बना देता है। और वर्तमान का दुष्कर्म, पूर्वजन्म के पुण्य को नष्ट कर, सम्राट को भी सामान्य मनुष्य बना देता है। हमें समझना होगा कि अपनी वर्तमान अवस्था के जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। आपकी परिस्थिति आपके कर्म का ही फल है। अपनी भूल दूसरे पर मत लादो, न तो ईश्वर पर, न ही भाग्य पर। आपका ही पाप चक्रवृद्धि ब्याज सहित आप पर आ गिरता है। तब कोई ताकत उसे रोक नहीं पाती। वायु तो निरंतर बहती है, जिस जहाज का पाल खुला हो, वह वायु का उपयोग कर आगे बढ़ जाए। पर जिसका पाल खुला नहीं है, वह वायु को दोष क्यों दे? योंही ईश्वर की कृपा तो निरंतर बरसती है, जिसके पास सत्कर्म हो, वह कृपा का उपयोग कर आगे बढ़ जाए। पर जिसके पास सत्कर्म नहीं है, वह ईश्वर को दोष क्यों दे? सदा भगवान और संत की सेवा करते रहो। यही एकमात्र सत्कर्म है।

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Swami Lokeshanand Jun 1, 2020

अब भरतजी ने माँ सीताजी के चरणों में प्रणाम किया, जैसे चरण वैसा माथा। आज भरतजी अयोध्या को अस्वीकार करके आए हैं, कल सीताजी लंका को ठोकर मार देंगी। कंठ अवरुद्ध होने से, सीताजी भरतजी को आशीर्वाद वाणी से तो नहीं दे पाईं, पर आँखों के पानी से दे दिया। आँसू भरतजी की पीठ पर पड़े। भरतजी ने सिर उठा कर देखा, सजल नेत्रों से सजल नेत्रों में करुणा देखी, तो भरतजी निश्चिंत हो गए। देखो, माँ का स्थान तो पिता से भी बड़ा है। पिता से मिलकर इतने निश्चिंत नहीं हुए थे जितने माँ से मिलकर हो गए। स्वामी राजेश्वरानंदजी का भाव है, कि माँ कहने भर से ही मुंह खुल जाता है, बाप कहें तो बंद होता है, तो बालक माँ के सामने जितना खुलकर बात कह पाता है, पिता के सामने नहीं ही कह पाता। हमारे यहाँ कितनी चर्चा चलती है, हम कहते ही हैं- "त्वमेव माता च पिता त्वमेव" "राम हैं मात पिता गुरु बंधु" "तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो" माँ सदा पहले है। सत्य भी है, अन्त:करण में भक्ति हो, तो भगवान भगवान हैं, भीतर भक्ति ही न हो तो सामने खड़ा परमात्मा भी परमात्मा नहीं। सूर्य तो सबके लिए एक समान है, पर लाख निकला रहे, उल्लू जिसके भीतर प्रकाश नहीं, उसके लिए तो अंधकार की ही सत्ता है। तो भक्ति पहले, भगवान बाद में। इसीलिए सबमें माँ पहले कहा है, पिता बाद में। तभी तो जब भक्तों की रक्षा की बात आती है, तब भगवान स्वयं भी माँ ही बनकर रक्षा करते हैं, पिता बनकर नहीं। "करहूँ सदा तिन्ह के रखवारी। जिमि बालक राखहि महतारी॥" गजब बात है, भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ "भारत माता" कहा जाता है। और सब जगह तो पितृभूमि कहते हैं, हमारे यहाँ ही "मातृभूमि" है। सीताजी हमारी माँ हैं, सीताजी वो शक्ति हैं जो इसी धरती से ही प्रकट होती हैं, और रामराज्य की स्थापना का लक्ष्य पूरा कर, पुनः इसी धरती में ही समा जाती हैं। लोकेशानन्द कहता है, ऐसी पावन धरती पर जन्म लेकर और सीताजी जैसी माँ पाकर हम धन्य हो गए।

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white beauty May 31, 2020

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Swami Lokeshanand May 31, 2020

दो मित्र गुरूजी से शिक्षा प्राप्त कर, राजा के दरबार में पहुँचे। राजा ने उन्हें कुछ ज्ञान की बात सुनाने के लिए कहा। उनमें से एक ने कहा- "देत भुवालम्, फरत लिलारम्। न विद्या, न च पौरूषम्॥" माने राजा देता है, तो भाग्य फलीभूत होता है, विद्या या पुरूषार्थ से जगत के सुख साधन नहीं प्राप्त हुआ करते। दूसरे ने कहा- "फरत लिलारम्, देत भुवालम्। न विद्या, न च पौरूषम्॥" माने भाग्य फलीभूत होता है, तो राजा देता है, विद्या या पुरूषार्थ से जगत के सुख साधन नहीं प्राप्त हुआ करते। राजा को पहले वाले की बात बहुत अच्छी लगी। अपनी प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती? तो उपहार के रूप में उसे हीरों से भरा एक कद्दू दे दिया। दूसरे ने तो राजा की प्रशंसा की नहीं थी जो उसे हीरे मिलते। उसे सत्तू दे कर विदा किया। अब देखें, हुआ यह कि पहले वाले को कद्दू खाना बिल्कुल पसंद नहीं था, और सत्तू बहुत पसंद था। रास्ते में उसने अपने उस मित्र से कहा- भाई! मुझे सत्तू बहुत अच्छा लगता है, तूं मेरा कद्दू ले ले, और मुझे अपना सत्तू दे दे। आप समझ ही गए होंगे कि किसे क्या प्राप्त हुआ? लोकेशानन्द कहता है कि भगवान और भगवत्स्वरूप संतों की सेवा से जो सत्कर्म एकत्र होता है, उसी से कालांतर में भाग्य का निर्माण होता है और सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। भाग्य में होता है तो मिलता है, नहीं होता तो नहीं ही मिलता। विद्या और पुरूषार्थ तो बहाना मात्र है। आप इसी एक विचार को लेकर, सदा उसी में विभोर रहो। सोते जागते सब समय, आपकी बुद्धि इसी एक विचार से परिपूर्ण रहे। व्यवहार तो निभता रहे, पर दूसरे सारे आश्रय छूट जाएँ। यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। साधारण मानव करोड़ों जन्मों के व्यवहार से जिन सब अवस्थाओं से मुक्त होता है, सावधान साधक एक ही जन्म में उन सभी अवस्थाओं को भोग लेता है। वह दूसरी चिन्ता ही नहीं लेता, दूसरी बात के लिए निभिषमात्र भी समय नहीं देता। तब मुक्ति में देरी नहीं होती।

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white beauty May 30, 2020

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white beauty May 31, 2020

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Swami Lokeshanand May 31, 2020

भूमि पर पड़े भरतजी ने, दौड़ कर आए रामजी के चरणों को, अपने पास अनुभव किया, तो हाथों से चरण पकड़ लिए। रामजी कहते हैं उठो, भरतजी उठते नहीं। क्योंकि लाठी अपनेआप गिर तो सकती है, उठे कैसे? बल लकड़ी में नहीं होता, उन हाथों में होता है, जिनमें लकड़ी होती है। मैं गिर तो सकता हूँ, पर अपने से उठ नहीं सकता। मैं गिरा हुआ हूँ, गिरे हुओं को उठाने का सामर्थ्य तो भगवान आपके ही हाथों में है। भगवान ने भरतजी को जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। अब एक शिकायत इधर है एक उधर। रामजी पूछ रहे हैं कि भरत! तुम भूमि पर ही क्यों पड़े रहे, चरणों में सिर क्यों नहीं रखा? भरतजी के भाव देखें- • मैं सदा ही आपके चरणों में सिर रखता रहा, आज तो आप मेरे सिर पर चरण रख दीजिए, उन पर बनी वज्र रेखा से मेरा दुर्भाग्य कट जाए। • आपका अवतार पृथ्वी का भार उतारने के लिए हुआ है ना, मैं पृथ्वी पर भार हूँ, मेरा सिर काट लीजिए, पृथ्वी का भार कम हो जाएगा। • मैं तो आपके चरणों की धूल हूँ, धूल धूल में मिल रही है, मैं आपके चरणों में सिर रखने का अधिकारी नहीं हूँ। • आपकी चरणरज से अहिल्या का पाप कट गया, मैं भी पापी हूँ, मेरे मस्तक पर आपका चरण पड़ जाए तो मेरा भी पाप कट जाए। • मैं तो आपका बालक हूँ, धरती पर लोटकर जिद्द कर रहा हूँ कि मुझे अपने साथ ले चलो। • मेरी नासिका से आपकी विरहाग्नि से तप्त, गर्म गर्म श्वास निकल रही है, मुझे भय था कि ये आपके कोमल अति कोमल चरण कमलों को छू जाती तो उनपर फफोले पड़ जाते। भरतजी कहते हैं- आपने मेरे साथ पक्षपात किया है, क्या मैं आपका कुछ नहीं? आपने मुझे क्यों त्याग दिया? क्या मैं दासों से भी गिर गया? राघव, वन आने से पहले एक बार मुझे बुलवा तो लिया होता। आप मुझे किसके भरोसे छोड़कर आ गए? पर अब मैं आपके पास आ गया हूँ, अब आपके चरणों के बिना नहीं रहूँगा। भैया! मैं आपके बिना जी नहीं पाऊँगा। भरतजी स्वयं दीपक बने हैं, रामजी का प्रेम घी है, वनवास काल बाती है, राम का विरह अग्नि है, भरतजी का हृदय इस आग से जल रहा है। लोकेशानन्द कहता है यह आग हमें भी लग जाए, हमारा भी हृदय जल जाए, तो बात बन जाए।

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white beauty May 30, 2020

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