KKPATEL SIDDHESHWAR
KKPATEL SIDDHESHWAR Jun 10, 2018

🌄🌄my family my love ❤ Jay mataji ki have a nice day ❤ Jay ho🌇🌇

👌Good 💝morning💚 my 💙all 💜friends 💗and 💘family 👌

+14 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 33 शेयर

कामेंट्स

KKPATEL SIDDHESHWAR Jun 11, 2018
Jay shri ram Jay shri krishna vagaram malviya Patel ji ram ram sa kese ho ji

🔯ऊँ शं शनिश्चराय नमः🔯 सभी भक्तजनो को शुभ शनिवार की सुबह की राम राम शनिदेव अपनी कृपा दृष्टि आप पर सदा बनाए रखें शनिदेव 🌻🙏आपके हर कार्य को शुभ एवं मंगलमय बनाएं। 💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠 यह लेख ज्योतिष प्रयोग में शनि एवं शनि देवता के बारे में है। अन्य प्रयोग हेतु के लिए, शनि देखें। शनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं।शनिदेव को सूर्य पुत्र एवं कर्मफल दाता माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये वह शत्रु नही मित्र है।मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ उचित न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को दण्डिंत (प्रताडित) करते हैं। अनुराधा नक्षत्र के स्वामी शनि हैं। मंत्र ॐ शं शनैश्चराय नमः॥ ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:॥[1] Day शनिवार जीवनसाथी नीलादेवी अथवा धामिनी सवारी सात सवारियां: हाथी, घोड़ा, हिरण, गधा, कुत्ता, भैंसा , गिद्ध और कौआ[2] बण्णंजी, उडुपी में शनि महाराज की २३ फ़ीट ऊंची प्रतिमा वैदूर्य कांति रमल:, प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत:। अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद:॥ भावार्थ:-शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है, तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है, तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है, ऐसा ऋषि, महात्मा कहते हैं। शनि देव का जन्म [3] पौराणिक संदर्भ खगोलीय विवरण ज्योतिष में शनि अंकशास्त्र में शनि शनि के प्रति अन्य जानकारियां शनि की साढ़े साती शनि परमकल्याण की तरफ़ भेजता है संपादित करें शनिदेव परमकल्याण कर्ता न्यायाधीश और जीव का परमहितैषी ग्रह माने जाते हैं। ईश्वर पारायण प्राणी जो जन्म जन्मान्तर तपस्या करते हैं, तपस्या सफ़ल होने के समय अविद्या, माया से सम्मोहित होकर पतित हो जाते हैं, अर्थात तप पूर्ण नही कर पाते हैं, उन तपस्विओं की तपस्या को सफ़ल करने के लिये शनिदेव परम कृपालु होकर भावी जन्मों में पुन: तप करने की प्रेरणा देता है। द्रेष्काण कुन्डली मे जब शनि को चन्द्रमा देखता है, या चन्द्रमा शनि के द्वारा देखा जाता है, तो उच्च कोटि का संत बना देता है। और ऐसा व्यक्ति पारिवारिक मोह से विरक्त होकर कर महान संत बना कर बैराग्य देता है। शनि पूर्व जन्म के तप को पूर्ण करने के लिये प्राणी की समस्त मनोवृत्तियों को परमात्मा में लगाने के लिये मनुष्य को अन्त रहित भाव देकर उच्च स्तरीय महात्मा बना देता है। ताकि वर्तमान जन्म में उसकी तपस्या सफ़ल हो जावे, और वह परमानन्द का आनन्द लेकर प्रभु दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर सके.यह चन्द्रमा और शनि की उपासना से सुलभ हो पाता है। शनि तप करने की प्रेरणा देता है। और शनि उसके मन को परमात्मा में स्थित करता है। कारण शनि ही नवग्रहों में जातक के ज्ञान चक्षु खोलता है। ज्ञान चक्षुर्नमस्तेअस्तु कश्यपात्मज सूनवे.तुष्टो ददासि बैराज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात. तप से संभव को भी असंभव किया जा सकता है। ज्ञान, धन, कीर्ति, नेत्रबल, मनोबल, स्वर्ग मुक्ति, सुख शान्ति, यह सब कुच तप की अग्नि में पकाने के बाद ही सुलभ हो पाता है। जब तक अग्नि जलती है, तब तक उसमें उष्मा अर्थात गर्मी बनी रहती है। मनुष्य मात्र को जीवन के अंत तक अपनी शक्ति को स्थिर रखना चाहिये.जीवन में शिथिलता आना असफ़लता है। सफ़लता हेतु गतिशीलता आवश्यक है, अत: जीवन में तप करते रहना चाहिये.मनुष्य जीवन में सुख शान्ति और समृद्धि की वृद्धि तथा जीवन के अन्दर आये क्लेश, दुख, भय, कलह, द्वेष, आदि से त्राण पाने के लिये दान, मंत्रों का जाप, तप, उपासना आदि बहुत ही आवश्यक है। इस कारण जातक चाहे वह सिद्ध क्यों न हो ग्रह चाल को देख कर दान, जप, आदि द्वारा ग्रहों का अनुग्रह प्राप्त कर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करे.अर्थात ग्रहों का शोध अवश्य करे. जिस पर ग्रह परमकृपालु होता है, उसको भी इसी तरह से तपाता है। पदम पुराण में राजा दसरथ ने कहा है, शनि ने तप करने के लिये जातक को जंगल में पहुंचा दिया.यदि वह तप में ही रत रहता है, माया के लपेट में नहीं आता है, तप छोड कर अन्य कार्य नही करता है, तो उसके तप को शनि पूर्ण कर देता है, और इसी जन्म में ही परमात्मा के दर्शन भी करा देता है। यदि तप न करके और कुछ ही करने लगे यथा आये थे हरि भजन कों, ओटन लगे कपास, माया के वशीभूत होकर कुच और ही करने लगे, तो शनिदेव उन पर कुपित हो जाते हैं। विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत.इस त्रिगुण्मयी माया को जीतने हेतु तथा कंचन एव्म कामिनी के परित्याग हेतु आत्माओं को बारह चौदह घंटे नित्य प्रति उपासना, आराधना और प्रभु चिन्तन करना चाहिये.अपने ही अन्त:करण से पूम्छना चाहिये, कि जिसके लिये हमने संसार का त्याग किया, संकल्प करके चले, कि हम तुम्हें ध्यायेंगे, फ़िर भजन क्यों नही हो रहा है। यदि चित्त को एकाग्र करके शान्ति पूर्वक अपने मन से ही प्रश्न करेंगे, तो निश्चित ही उत्तर मिलेगा, मन को एकाग्र कर भजन पूजन में मन लगाने से एवं जप द्वारा इच्छित फ़ल प्राप्त करने का उपाय है। जातक को नवग्रहों के नौ करोड मंत्रों का सर्व प्रथम जाप कर ले या करवा ले. काशी में शनिदेव ने तपस्या करने के बाद ग्रहत्व प्राप्त किया था संपादित करें स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में वृतांत आता है, कि छाया सुत श्री शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य देव से प्रश्न किया कि हे पिता! मैं ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नही किया, हे पिता ! आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो, मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये, चाहे वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो.आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे.दूसरा वरदान मैं यह प्राप्त करना चाहता हूँ, कि मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों, तथा मै भक्ति ज्ञान और विज्ञान से पूर्ण हो सकूं.शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न तथा गदगद हुए, और कह, बेटा ! मै भी यही चाहता हूँ, के तू मेरे से सात गुना अधिक शक्ति वाला हो.मै भी तेरे प्रभाव को सहन नही कर सकूं, इसके लिये तुझे तप करना होगा, तप करने के लिये तू काशी चला जा, वहां जाकर भगवान शंकर का घनघोर तप कर, और शिवलिंग की स्थापना कर, तथा भगवान शंकर से मनवांछित फ़लों की प्राप्ति कर ले.शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया, और तप करने के बाद भगवान शंकर के वर्तमान में भी स्थित शिवलिंग की स्थापना की, जो आज भी काशी-विश्वनाथ के नाम से जाना जाता है, और कर्म के कारक शनि ने अपने मनोवांछित फ़लों की प्राप्ति भगवान शंकर से की, और ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया।

+204 प्रतिक्रिया 30 कॉमेंट्स • 131 शेयर
hba sagar Feb 22, 2020

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
hba sagar Feb 22, 2020

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Meenakshi Patel Feb 22, 2020

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

+62 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 8 शेयर
Vandana Singh Feb 22, 2020

+5 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Jagdish Rana Feb 22, 2020

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
S.P Sharma Feb 22, 2020

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB