स्वामीजी की पुस्तक "परम् प्रभु अपने ही महुँ पायो" पृष्ठ संख्या 146-147 - 1) जन्म लेने पर आप क्या साथ लाये थे और मरने पर क्या साथ ले जाएंगे - इन दो बातों पर आप स्वयं विचार करो 2) संसार पराया है और भगवान अपने हैं । आप भगवान के अंश हैं और संसार प्रकृति का अंश है । आपके भीतर जितना संसार का आदर है, उतना ही भगवान का अनादर है 3) पारमार्थिक उन्नति तो आपकी उन्नति है, पर सांसारिक उन्नति आपकी उन्नति नहीं है 4) भगवान के सम्मुख होना तभी माना जायेगा, जब संसार के सुख और दुख का असर कम पड़े भगवान का भजन छूटने का दुःख ज्यादा हो । तात्पर्य है कि जीवन में भगवान की मुख्यता हो जाय , संसार की मुख्यता न रहे ।

स्वामीजी की पुस्तक "परम् प्रभु अपने ही महुँ पायो" पृष्ठ संख्या 146-147 - 1) जन्म लेने पर आप क्या साथ लाये थे और मरने पर क्या साथ ले जाएंगे - इन दो बातों पर आप स्वयं विचार करो  2) संसार पराया है और भगवान अपने हैं । आप भगवान के अंश हैं और संसार प्रकृति का अंश है । आपके भीतर जितना संसार का आदर है, उतना ही भगवान का अनादर है  3) पारमार्थिक उन्नति तो आपकी उन्नति है, पर सांसारिक उन्नति आपकी उन्नति नहीं है 4) भगवान के सम्मुख होना तभी माना जायेगा, जब संसार के सुख और दुख का असर कम पड़े भगवान का भजन छूटने का दुःख ज्यादा हो । तात्पर्य है कि जीवन में भगवान की मुख्यता हो जाय , संसार की मुख्यता न रहे ।

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