sudanm
sudanm Sep 11, 2017

|| भक्त सदन कसाई की भक्ति ||

|| भक्त सदन कसाई की भक्ति ||

|साथियों बहुत समय पहले एक कसाई जाति के, "सदन नाम" के एक भक्त हुए थे। बचपन से ही इनको भगवान नाम और हरि कीर्तन में बहुत रुचि थी। भगवान का नाम तो इनकी जीभ पर हर समय रहता था। ये जाति से कसाई थे, फिर भी ये दयावान बहुत थे। इनका हृदय दया से परिपूर्ण था। जीव-वध तो इन से देख नहीं जाता था। जीव वध देख कर बहुत दुखी होजाते थे। इसीलिए वे स्वयं पशु वध कभी नहीं करते थे। आजीविका के लिये और कोई उपाय न होने से दूसरों के यहाँ से मांस लाकर बेचा करते थे, इस काम में भी इनका मन लगता नहीं था, पर मन मारकर जाति-व्‍यवसाय होने से करते थे। सदा नाम-जप, भगवान के गुण-गान और लीलामय पुरुषोत्तम के चिन्‍तन में लगे रहते थे। सदन का मन श्री हरि के चरणों में रम गया था। रात-दिन वे केवल ‘हरि-हरि’ करते रहते थे।

भगवान अपने भक्त से कभी दूर नहीं रह सकते। भक्त को जैसे उनके बिना चैन नहीं, वैसे ही उन्‍हें भी भक्त के बिना चैन नहीं। सदन के घर में भगवान शालग्राम रूप में विराजमान थे। सदन को इसका पता नहीं था। वे तो शालग्राम को पत्‍थर का एक बाट समझते थे और उनसे मांस तौला करते थे।

एक दिन एक साधु सदन की दुकान के सामने से जा रहे थे। दृष्टि पड़ते ही वे शालग्राम जी को पहचान गये। मांस-विक्रेता कसाई के यहाँ अपवित्र स्‍थल में शालग्राम जी को देखकर साधु को बड़ा क्‍लेश हुआ। सदन से माँगकर वे शालग्राम को ले गये। सदन ने भी प्रसन्नतापूर्वक साधु को अपना वह चमकीला बाट दे दिया। साधु बाबा कुटिया पर पहुँचे। उन्‍होंने विधिपूर्वक शालग्राम जी की पूजा की; परंतु भगवान को न तो पदार्थों की अपेक्षा है न मंत्र या विधि की। वे तो प्रेम के भूखे हैं, प्रेम से रीझते हैं। रात में उन साधु को स्‍वप्‍न में भगवान ने कहा- "तुम मुझे यहाँ क्‍यों ले आये? मुझे तो अपने भक्त सदन के घर में ही बड़ा सुख मिलता था। जब वह मांस तौलने के लिये मुझे उठाता था, तब उसके शीतल स्‍पर्श से मुझे अत्‍यन्‍त आनन्‍द मिलता था। मुझे उसके तराजू में झूले बिना नीद नहीं आती है। जब वह मेरा नाम लेकर कीर्तन करता, नाचने लगता था, तब आनन्‍द के मारे मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था। तुम मुझे वहीं पहुँचा दो। मुझे सदन के बिना एक क्षण चेंन नहीं पड़ता है।

साधु महराज जगे। उन्‍होंने शालग्राम जी को उठाया और सदन के घर जाकर उसे दे आये। साथ ही उसको भगवत्‍कृपा का महत्त्व भी बता आये। सदन को जब पता लगा कि उनका यह बटखरा तो भगवान शालग्राम हैं, तब उन्‍हें बड़ा पश्‍चात्ताप हुआ। वे मन-ही-मन कहने लगे- "देखो, मैं कितना बड़ा पापी हूँ। मैंने भगवान को निरादरपूर्वक अपवित्र मांस के तराजू का बाट बना रखा। प्रभो ! अब मुझे क्षमा करो।" अब सदन को अपने व्‍यवसाय से घृणा हो गयी।

सदन कसाई शालग्राम जी को लेकर पुरुषोत्तम क्षेत्र श्री जगन्नाथ पुरी को चल पड़े। मार्ग में सन्‍ध्‍या-समय सदन जी एक गाँव में एक गृहस्‍थ के घर ठहरे। उस घर में स्‍त्री-पुरुष दो ही व्‍यक्ति थे। स्‍त्री का आचरण अच्‍छा नहीं था। वह अपने घर ठहरे हुए इस स्‍वस्‍थ, सुन्‍दर, सबल पुरुष पर मोहित हो गयी। आधी रात के समय सदन जी के पास आकर वह अनेक प्रकार की अशिष्‍ट चेष्‍टाएं करने लगी। सदन जी तो भगवान के परम भक्त थे। उन पर काम की कोई चेष्‍टा सफल न हुई। वे उठकर, हाथ जोड़कर बोले- "तुम मेरी माता हो ! अपने बच्‍चे की परीक्षा मत लो, माँ ! मुझे तुम आशीर्वाद दो।"

भगवान के सच्‍चे भक्त पर-स्‍त्री को माता ही देखते हैं। स्‍त्री का मोहक रूप उनको भ्रम में नहीं डालता। वे हड्डी, मांस, चमड़ा, मल-मूत्र, थूक-पीब की पुतली को सुन्‍दर मानने की मूर्खता कर ही नहीं सकते; परंतु जो काम के वश हो जाता है, उसकी बुद्धि मारी जाती है। वह न सोच-समझ पता, न कुछ देख पाता। वह निर्लज्‍ज और निर्दय हो जाता है। उस कामातुरा स्‍त्री ने समझा कि मेरे पति के भय से ही यह मेरी बात नहीं मानता। वह गयी और तलवार लेकर सोते हुए अपने पति का सिर उसने काट दिया। कामान्‍ध कौन-सा पाप नहीं कर सकता। अब वह कहने लगी- "प्‍यारे ! अब डरो मत। मैंने अपने खूसट पति का सिर काट डाला है। हमारे सुख का कण्‍टक दूर हो गया। अब तुम मुझे स्‍वीकार करो।"

सदन भय से काँप उठे। स्‍त्री ने अनुनय-विनय करके जब देख लिया कि उसकी प्रार्थना स्‍वीकार नहीं हो सकती, तब द्वार पर आकर छाती पीट-पीटकर रोने लगी। लोग उसका रुदन सुनकर एकत्र हो गये। उसने कहा- "इस यात्री ने मेरे पति को मार डाला है और यह मेरे साथ बलात्‍कार करना चाहता था।" लोगों ने सदन को खूब भला बुरा कहा, कुछ ने मारा भी; पर सदन ने कोई सफाई नहीं दी। मामला न्‍यायाधीश के पास गया। सदन तो अपने प्रभु की लीला देखते हुए अन्‍त तक चुप ही बने रहे। अपराध सिद्ध हो गया। न्‍यायाधीश की आज्ञा से उनके दोनों हाथ काट लिये गये।

सदन के हाथ कट गये, रुधिर की धारा चलने लगी; उन्‍होंने इसे अपने प्रभु की कृपा ही माना। उनके मन में भगवान के प्रति तनिक भी रोष नहीं आया। भगवान के सच्‍चे भक्त इस प्रकार निरपराध कष्‍ट पाने पर भी अपने स्‍वामी की दया ही मानते हैं। भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए सदन जगन्नाथ पुरी चल पड़े। उधर पुरी में प्रभु ने पुजारी को स्‍वप्‍न में आदेश दिया- "मेरा भक्त सदन मेरे पास आ रहा है। उसके हाथ कट गये हैं। पालकी लेकर जाओ और उसे आदरपूर्वक ले आओ।" पुजारी पालकी लिवाकर गये और आग्रहपूर्वक सदन को उसमें बैठाकर ले आये।

सदन ने जैसे ही श्री जगन्नाथ जी को दण्‍डवत करके कीर्तन के लिये भुजाएँ उठायी, उनके दोनों हाथ पूर्ववत ठीक हो गये। प्रभु की कृपा से हाथ ठीक तो हुए, पर मन में शंका बनी ही रही कि वे क्‍यों काटे गये। भगवान के राज्‍य में कोई निरपराध तो दण्‍ड पाता नहीं। रात में स्‍वप्‍न में भगवान ने सदन जी को बताया- "तुम पूर्वजन्‍म में काशी में सदाचारी विद्वान ब्राह्मण थे। एक दिन एक गाय कसाई के घेरे से भागी जाती थी। उसने तुम्‍हें पुकारा। तुमने कसाई को जानते हुए भी गाय के गले में दोनों हाथ डालकर उसे भागने से रोक लिया। वही गाय वह स्‍त्री थी और कसाई उसका पति था। पूर्वजन्‍म का बदला लेने के लिये उसने उसका गला काटा। तुमने भयातुरा गाय को दोनों हाथों से पकड़कर कसाई को सौंपा था, इस पाप से तुम्‍हारे हाथ काटे गये। इस दण्‍ड से तुम्‍हारे पाप का नाश हो गया।"

सदन ने भगवान की असीम कृपा पाई । वे भगवत्‍प्रेम में विह्वल हो गये। बहुत काल तक नाम-कीर्तन, गुणगान तथा भगवान के ध्‍यान में तल्‍लीन रहते हुए समय व्यतीत किया। और अन्‍त में श्री जगन्‍नाथ जी के चरणों में देह त्‍यागकर वे परमधाम पधार गए।

जय श्री लक्ष्मी नारायण श्री हरि।।

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Vibhor Mittal May 23, 2019

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Vibhor Mittal May 23, 2019

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sumitra May 23, 2019

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Ritu Sen May 22, 2019

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Ritu Sen May 22, 2019

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Geeta Sharma May 23, 2019

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Rameshanand Guruji May 23, 2019

🌹🌻🌙🌝शुभरात्रि🌻🌹 🌹🙏ॐ नमो भगवते वासुदेवाय वैश्वानर: प्रविशत्यातिथिर्ब्राह्मणो ग्रहान। तस्यैतांशान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम।।7 आशाप्रतीक्षे संगतांसूनृतां च, इष्टापूर्ते पुत्रशूंश्च सर्वान। एतदवृंगक्ते पुरुषस्याल्पमेधसो, यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे।।8 आपके घर मे आने वाला अतिथि (मेहमान ,संबंधी ,रिस्तेदार ,मित्र आदि विशेष रूप से जो बाहर या दूर से आया हो) अग्नि स्वरूप तेज या तेजस्विता के साथ आपके गृह में प्रवेश करता है अतिथि यदि पूज्यनीय हो तो सर्व प्रथम प्रसन्नता से आगवानी कर उसके पैर धोकर शरीर की बाह्य अग्नि और तेज को शांत करें मधुर वाणी से अर्घ अर्थात पीने के लिए पानी सर्वत एवं स्वल्पाहार देकर शरीर की आंतरिक अग्नि और तेज को शांत करे भोजन कराकर पेट की अग्नि और तेज को शांत करे तथा धर्मानुकूल होने पर उसकी इच्छा जिज्ञासा को पूरा कर उसके मन की अग्नि और तेज को शांत करे अतिथि की विदाई यथायोग्य धन देकर करें इस प्रकार से अतिथि सत्कार करने पर अतिथि के साथ प्रविष्ट अग्नि अर्थात तेज जिसे अतिथि सत्कार के द्वारा शांत किया गया है वह अग्नि रूपी तेज आपके तेज और तेजस्विता की बृद्धि करता है पूण्य की प्राप्ति कराता है और शुभ भाग्य का सृजन करता है जिस घर मे अतिथि (मेहमान, संबंधी, रिस्तेदार या मित्र ) बिना भोजन किये(यथोचित सत्कार के बिना) रहता है या उसका तिरस्कार किया जाता है ऐसे घर मे रहने वाले लोगों की ज्ञात और अज्ञात समस्त बस्तुओं की प्राप्ति की इच्छाएं कभी पूरी नही होती है पूण्य और भाग्य क्षीण होता है धन संपत्ति एवं पुत्र पौत्रादि से प्राप्त होने वाले सुख और ऐश्वर्य नष्ट हो जाते है अतः अपने घर पधारने वाले अतिथि का अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार यथायोग्य सत्कार अवश्य करे इससे आपको तेज सुख ऐश्वर्य और पुण्य की प्राप्ति होगी साथ ही आपके हितैषी और शुभचिंतक मित्रो की बृद्धि होगी । श्री कठोपनिषद वल्ली-1, मंत्र-7,8 🌹🙏रमेशानन्द गुरूजी

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