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Malti Bansal Jan 26, 2021

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Ajit sinh Parmar Jan 26, 2021

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GOVIND CHOUHAN Jan 26, 2021

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🚩ईश्वर पर हमेशा भरोसा रखें🚩 एक अमीर व्यक्ति था। उसने समुद्र में अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई और छुट्टी के दिन वह नाव लेकर अकेले समुद्र की सैर करने निकल पड़ा। वह समुद्र में थोङा आगे पहुंचा ही था कि अचानक एक जोरदार तूफान आ गया। उसकी नांव पुरी तरह से तहस-नहस हो गइ लेकिन वह लाइफ जैकेट के साथ समुद्र में कूद गया। जब तूफान शान्त हुआ तब वह तैरता-तैरता एक टापु पर जा पहुंचा। मगर वहां भी कोई नहीं था। टापु के चारों ओर समुद्र के अलावा क़ुछ भी नजर नहीं आ रहा था। उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने पूरी जिंदगी में किसी का कभी बुरा नहीं किया तो मेरे साथ बुरा नहीं होगा। उसको लगा कि ईश्वर ने मौत से बचाया है तो आगे का रास्ता भी वही दिखाएगा। धीरे-धीरे वह वहां पर उगे झाङ-फल-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा। मगर अब धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि वह इस टापू पर फंस गया है। मगर अब भी ईश्वर पर उसका भरोसा कायम था। उसने सोचा इतने दिनों से मैं इस टापू पर मारा-मारा फिर रहा हूं, क्यों न यहां एक झोपड़ी बना लूं। पता नहीं अभी और कितने दिन यहां बिताने पड़ें। पूरे दिन लकडि़यां और पत्ते वगैरह इकट्ठा कर उसने झोंपड़ी बनानी शुरू की। रात होते-होते उसकी झोंपड़ी बनकर तैयार हो गई थी। अभी वह झोंपड़ी के बाहर खड़ा होकर उसे देखते हुए सोच रहा था कि आज से झोंपडी में सोने को मिलेगा। मगर अचानक से मौसम बदला और बिजली जोर-जोर से कड़कने लगी और एक बिजली उसकी झोंपड़ी पर गिर गई। उसके देखते ही देखते झोंपड़ी जलकर खाक हो गई। यह देखकर वह व्यक्ति टुट गया। उसने आसमान की तरफ देखकर बोला, हे ईश्वर ये तेरा कैसा इंसाफ है। तूने मुझ पर अपनी रहम की नजर क्यों नहीं की? मैंने हमेशा तुझ पर विश्वास बनाए रखा। फिर वह इंसान हताश और निराश होकर सर पर हाथ रखकर रोने लगा। अचानक ही एक नाव टापू के पास आई। नाव से उतर कर दो आदमी बाहर आए और बोले कि हम तुम्हें बचाने आए हैं। दुर से इस वीरान टापू में जलता हूआ झोंपड़ा देखा तो लगा की कोई उस टापू पर मुसीबत में है। अगर तुम अपनी झोंपडी नहीं जलाते तो हमें पता नहीं चलता कि टापू पर कोई हैं। उस आदमी की आंखों से आंसू गिरने लगे। उसने ईश्वर से माफी मांगी और बोला कि हे ईश्वर मुझे क्या पता था कि तूने मुझे बचाने के लिए मेरी झोंपडी जलाई थी। यकिनन तू अपने बंदों का हमेशा ख्याल रखता है। तूने मेरे सब्र का इम्तेहान लिया, लेकिन मैं उसमे फेल हो गया। मुझे माफ कर दे। इस कहानी से यही सीख मिलती है कि--दिन चाहे सुख के हों या दुःख के, भगवान अपने बन्दों के साथ हमेशा रहते हैं। हां हम एक बार ईश्वर से रूठ सकते हैं, लेकिन ईश्वर हमसे कभी नहीं रूठता। वह हमेशा अच्छा ही करता है। अक्सर हमारे साथ भी ऐसे हालत बन जाते हैं, हम पूरी तरह निराश हो जाते हैं और अपने ईश्वर या नियति से रूठ जाते हैं और विश्वास खो देते हैं जिससे हमारे यानी आत्म विश्वास में भी गिरावट होती है। लेकिन फिर बाद में हमें पता लगता है कि परमात्मा ने जो किया वह अच्छा ही किया था, नहीं तो आज मैं यहां न होता। इसलिए मुसीबत या दुःख के समय हार मानने की बजाय लगातार अपने कर्तव्य करते रहिए, और बाकी अपने परम पिता परमेश्वर छोड़ दीजिए,, क्योंकि वह जो करेंगे निश्चित अच्छा ही करेंगे....!

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मित्रो ये प्रस्तुति श्रीमद्भागवत का सार है, भाग 4 मित्रो, राजकुमारी देवहूती का विवाह कर्दमजी ऋषि के साथ सम्पन्न हो गया, अपनी पत्नी को लेकर ऋषि कर्दमजी अपनी प्रणकुटी में आये, एकदम नितांत जंगल में घास की छोटी सी प्रणकुटी, देवहूती ने जैसे ही अपने पति की कुटी में प्रवेश किया तो ऊपर की ओर देखने पर, वहां कम से कम पचास पक्षीयों के घोंसले बने हैं और उनमें सुन्दर-सुन्दर चिड़ियाँ कलरव कर रही हैं। देवहूति ने पूछा पतिदेव यह क्या है? कर्दम ऋषि बोले देवी ये पक्षी इसे अपनी ही कुटिया समझते है न, इसलिये सब यहीं रहते है, नीचे देखा तो पचासों बिल चूहों के बने है, देवहूति ने पूछा- ये क्या है ऋषिवर! कर्दमजी बोले- देवी ये ये सांप, चूहे, मेंढक सब इस कुटिया को अपना ही समझते है, इसलिये सपरिवार यहीं रहते हैं। देवहूति ने कहा- पतिदेव सात बाई सात फिट की कुटिया में पक्षी रहते है, चुहें भी रहते है, नीचे सैंकड़ों जीव भी इसी में रहते है तो फिर आप कहां रहते हैं? कर्दमजी बोले- वो कौने में डेढ बाई डेढ फुट का जो आसन लगा है, वो मेरी जगह हैं, देवहूति के नेत्र सजल हो उठे, इतना बड़ा त्यागी महापुरुष, इतना बड़ा संत मुझे पति रूप में मिला। देवहूति ने कुटिया की खिड़की से बाहर की ओर नजर डालकर देखा, आश्चर्य से उसकी आँखे खुली रह गयीं, सामने झरना बह रहा है, उसके नीचे गाय, हिरन और शेर तीनों एक साथ पानी पी रहे है, कर्दम ऋषि की तपस्या के प्रताप से वहां जीव-जंतुओं में हिंसा की भावना नहीं है, इधर बिल में सांप, मेंढक, चूहे सब एक साथ रह रहे हैं, ये संत की तपश्चर्या का प्रताप हैं। कर्दमजी ने अपनी पत्नी से कहा, तुम्हें अच्छा लगे वैसे कुटिया को संवारो, मैं थोड़ा भगवान् की याद कर लूँ, कर्दमजी जैसे ही समाधि में बैठे, उनको तो विचित्र समाधि लग गयी, चालीस वर्ष तक उनकी समाधि लगी रही, विवाह करने के बाद लोग काम विषय में डुबते है, पर धन्य है इन ऋषियों को जो राम के ध्यान में डूब गये। एक सद्धधर्मिणी के लक्षण देखिये, देवहूति ने सोचा, मेरे पति समाधि में बैठ गये, इनकी सेवा करना ही मेरा परम कर्तव्य है, बैठे हुये पति को गीले वस्त्र से पोंछ देती, आरती करती, कभी फल तोड़कर खा लेती, कभी पत्ते तोड़कर खा लेती, तो कभी कुछ नहीं खाती, दो-चार दिन भूखी ही रह जाती, पानी पीकर ही समय निकाल देती, ऐसे चालीस वर्ष तक देवहूति ने अपने पति की सेवा की। चालीस वर्षों में देवहूति का शरीर वृद्धा माताओं जैसा हो गया, झुर्रियां पड़ गयीं, सिर के केश जटा के रूप में परिणित हो गये, मन में एक आशा है, जिस दिन मेरे पति की तपश्चर्या पूरी होगी, उसी दिन से मेरा गृहस्थ जीवन आरम्भ होगा, चालीस वर्षों के बाद कर्दम ऋषि की समाधि जैसे ही टूटी, कर्दमजी ने अपनी कुटिया में किसी बुढ़िया को बैठे देखा और पूछा आपका परिचय? देवहूति ने सोचा- मेरे पतिदेव तो मुझसे मेरा परिचय पूछ रहे हैं, देवहूति ने कहा- ऋषिवर! याद कीजिये, चालीस वर्ष पहले एक राजा आये थे, अपनी बेटी का विवाह आपसे किया था, कर्दमजी ने कहा- हाँ, थोड़ा-थोड़ा याद आ रहा है, वो आप ही हो क्या? देवहूति बोली- जी, मैं ही आपकी धर्मपत्नी हूँ, ऋषि कर्दम बड़े प्रसन्न हुए। चालीस वर्ष का समय बीत गया, इतने वर्षों तक तुम रही कहाँ? इसी कुटिया में रही, तुमने भोजन कैसे करती थी देवी? कभी पत्ते खा लेती, कभी फल खा लेती, देवी! तुम अपने पिता के घर क्यों नहीं गयी? देवहूति बोली- पत्नि के लिये तो पति का घर ही स्वर्ग होता है, पिता का घर नहीं, महात्मा कर्दम का ह्रदय विदीर्ण होने लगा। तुषटोऽहमध तव मानवि मानदायाः। शुश्रूषया परमया परया च भक्तया।। मैं तुमसे बड़ा प्रसन्न हूंँ देवी! मेरे लिये तुमने इतने कष्ट सहे, तुम्हारा शरीर सूख गया, चालीस वर्षों तक सूखे पत्ते खा-खाखर तुमने मेरी सेवा की, तुम मन में सोच रही होगी कि कैसे पुरूष से शादी की, न रहने का ठिकाना, न खाने का ठिकाना, जरा, अपनी आँखे बंद करो, देवहूति ने नेत्र बंद कर लिये, कर्दमजी ने कहा- नेत्र खोलकर देखो, देवहूति ने देखा तो एक बहुत सुन्दर सरोवर हैं और उस सरोवर के बीच में नौ मंजिल का महल बनकर तैयार हो गया। हजारों आभूषण हो गये, सैकड़ों दास-दासियाँ हो गये, जो वैभव देवहूति ने पिता के घर नहीं देखा वो कर्दमजी के द्वार पर है, देखकर देवहूति बड़ी प्रसन्न हुई, कर्दमजी ने देवहूति का हाथ पकड़कर जैसे ही सरोवर में डुबकी लगायी, कर्दम हो गये बीस वर्ष के और देवहूति हो गयी सोलह वर्ष की, ये तपश्चर्या का दिव्य प्रताप हैं, मित्रो! आगे का प्रसंग आप पंचम प्रस्तुति में पढ़ेंगे। क्रमशः जय श्री कृष्ण!

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Neha Sharma, Haryana Jan 26, 2021

🌸*जय श्री राधेकृष्णा*🙏*शुभ संध्या नमन*🌸 ☀️*राजा अम्बरीष की कथा*☀️ (The Story Of King Ambarisha) राजा अम्बरीष भगवन श्रीहरि के परम भक्त थे। वे पृथ्वी के सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति और अतुल ऐश्वर्य के शासक होने पर भी इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर मनुष्य घोर नरक में जाता है, वह केवल चार दिन की चाँदनी है। ☀️राजा अम्बरीष का कृष्ण प्रेम☀️ (King Ambarisha Love For Krishna) राजा अम्बरीष का भगवान श्रीकृष्ण में और उनके प्रेमी साधुओं में परम प्रेम था। उन्होंने अपने मन को श्रीकृष्ण के चरणों में, वाणी को भगवान के गुणों का गान करने में, हाथों को श्रीहरि के मन्दिर मार्जन में और अपने कानों को भगवान् की मंगलमयी कथा के श्रवण में लगा रखा था। उन्होंने अपने नेत्रों को श्रीहरि के विग्रह व मन्दिरों के दर्शन में, नासिका को उनके चरणकमलों पर चढ़ी श्रीमती तुलसी की दिव्य गन्ध में और जिह्वा (रसना) को भगवान के प्रति अर्पित नैवेद्य प्रसाद में संलग्न कर दिया था। राजा अम्बरीष के पैर भगवान् के क्षेत्र आदि की पैदल यात्रा करने में ही लगे रहते और वे सिर से भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की वन्दना किया करते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने सारे कर्म यज्ञपुरुष, इन्द्रियातीत भगवान् के प्रति, उन्हें सर्वात्मा एवं सर्वरुप समझकर, समर्पित कर दिये थे और भगवद्भक्त ब्राह्मणों की आज्ञा के अनुसार वे इस पृथ्वी का शासन करते थे। उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले अनेकों अश्वमेध यज्ञ करके यज्ञाधिपति भगवान् की आराधना की थी। उनकी प्रजा महात्माओं के द्वारा गाये हुए भगवान् के उत्तम चरित्रों का बहुत सम्मान करती। किसी समय बड़े प्रेम से श्रवण करती और किसी समय उनका गान करती। इस प्रकार उनके राज्य के मनुष्य देवताओं के अत्यन्त प्यारे स्वर्ग की भी इच्छा नहीं करते। राजा अम्बरीष की अनन्य प्रेममयी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् ने उनकी रक्षा के लिये सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर दिया था, जो विरोधियों को भयभीत करनेवाला एवं भगवद्भक्तों की रक्षा करनेवाला है। राजा अम्बरीष का दिव्य एकादशी व्रत ☀️ (The Divine Ekadashi Fasting By King Ambarisha) एक बार उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना करने के लिए एक वर्ष तक द्वादशी प्रधान एकादशी-व्रत करने का नियम ग्रहण किया। व्रत की समाप्ति होने पर कार्तिक महीने में उन्होंने तीन रात का उपवास किया और एक दिन यमुनाजी में स्नान करके भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा की। तत्पश्चात् पहले ब्राह्मणों को स्वादिष्ट और अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लागों के घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। जब ब्राह्मणों को सबकुछ मिल चुका, तब राजा ने उन लोगों से आज्ञा लेकर व्रत का पारण करने की तैयारी की। उसी समय शाप और वरदान देने में समर्थ स्वयं दुर्वासाजी भी उनके यहाँ अतिथि के रूप में पधारे। Durvasa rishi created a raakshas and ordered him to kill King Ambarish राजा अम्बरीष उन्हें देखते ही उठकर खड़े हो गये, आसन देकर बैठाया और विविध सामग्रियों से उनके चरणों में प्रणाम करके भोजन के लिए प्रार्थना की। दुर्वासाजी ने राजा अम्बरीष की प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मों से निवृत होने के लिए वे नदीतट पर चले गये। वे ब्रह्म का ध्यान करते हुए यमुना के पवित्र जल में स्नान करने लगे। इधर द्वादशी केवल घड़ी भर शेष रह गयी थी। धर्मज्ञ अम्बरीष ने धर्म-संकट में पड़कर ब्राह्मणों के साथ परामर्श किया। उन्होंने कहा- ‘ब्राह्मण देवताओं! ब्राह्मण को बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना, दोनों ही दोष हैं। इसलिए इस समय जैसा करने से मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, ऐसा काम करना चाहिये। तब ब्राह्मणों के साथ विचार करके उन्होंने कहा- ‘ब्राह्मणों! श्रुतियों में ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है, नहीं भी करना है। इसलिए इस समय केवल जल से पारण किये लेता हूँ।‘ ऐसा निश्चय करके मन-ही-मन भगवान का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीष ने जल पी लिया और फिर दुर्वासाजी के आने की बाट देखने लगे। दुर्वासाजी आवश्यक कर्मों से निवृत होकर यमुनातट से लौट आये। जब राजा ने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमान से ही समझ लिया कि राजा ने पारण कर लिया है। उस समय दुर्वासाजी बहुत भूखे थे। वे क्रोध से थर-थर काँपने लगे। उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीष से डाँटकर कहा – ‘अहो! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है! यह धन के मद में मतवाला हो रहा है। भगवान् की भक्ति तो इसे छू तक नहीं गयी और यह अपने को बड़ा समर्थ मानता है। आज इसने धर्म का उल्लघंन करके बड़ा अन्याय किया है। मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही इसने खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ। यों कहते-कहते वे क्रोध से जल उठे। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और उससे अम्बरीष को मार डालने के लिए एक कृत्या (राक्षसी) उत्पन्न की। वह आग के समान जलती हुई, हाथ में तलवार लेकर राजा अम्बरीष पर टूट पड़ी। श्रीहरि द्वारा राजा अम्बरीष के प्राणों की रक्षा व दुर्वासा ऋषि को सबक सिखाना (Shri Hari Protects King Ambarisha & Teaches Rishi Durvasa A Lesson) परमपुरुष परमात्मा ने अपने सेवक की रक्षा के लिये पहले से ही सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था। जैसे आग क्रोध से गुर्राते हुए साँप को भस्म कर देती है, वैसे ही चक्र ने दूर्वासा जी की कृत्या को जलाकर ढ़ेर कर दिया। जब दुर्वासा जी ने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचाने के लिये जी छोड़कर एकाएक भाग निकले। Shri Hari Teaches Rishi Durvasa A Lesson जैसे ऊँची-ऊँची लपटों वाला दावानल साँप के पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान् का चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब दुर्वासा जी दिशा, आकाश पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचे के लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्गतक में गये, परन्तु जहाँ-जहाँ वे गये, वहीं-वहीं उन्होंने असह्य तेज-वाले सुदर्शन चक्र को अपने पीछे लगा देखा। जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और डर गये। अपने पगाण बचाने के लिये वे देवशिरोमणि ब्रह्माजी के पास गये और बोले ‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान् के इस तेजोमय चक्र से मेरी रक्षा कीजिये‘। ब्रह्माजी ने कहा- ‘दुर्वासा जी! मैं, शंकरजी, दक्ष-भृगु आदि प्रजापति, भूतेश्वर आदि सब जिनके बनाये नियमों में बंधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हमलोग संसार का हित करते हैं उनके भक्त के द्रोही को बचाने में हम समर्थ नहीं हैं।‘जब ब्रह्माजी ने इस प्रकार दुर्वासा को निराश कर दिया, तब भगवान के चक्र से संतप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शंकर की शरण में गये। शंकर जी ने कहा- ‘दुर्वासाजी! जिनसे पैदा हुए अनेकों ब्रह्माण्डों में हमारे जैसे हजारों चक्कर काटते हैं यह चक्र उन्हीं विश्वेश्वर का शस्त्र है। यह हमलोगों के लिए असह है। तुम उन्हीं की शरण में जाओ। वे भगवान ही तुम्हारा मंगल करेंगे।‘ निराश होकर दुर्वासाजी श्रीहरि भगवान के परमधाम वैकुण्ठ की तरफ भागेे। दुर्वासाजी भगवान के चक्र की आग से जल रहे थे। वे भगवान के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने कहा-‘हे अच्युत! हे अनन्त! आप सन्तों के एकमात्र इच्छित हैं। प्रभो! सम्पूर्ण जगत के जीवनदाता! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये। आपका परम प्रभाव न जानने के कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्त का अपराध किया है। प्रभो! आप मुझे बचाईये।‘ श्री भगवान ने कहा-‘दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतंन्त्रता नहीं है। जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण धन इहलोक और परलोक-सबको छोड़कर केवल मेरी शरण में आ गये हैं, उन्हें छोड़ने का संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ? इसमें सन्देह नहीं कि ब्रांह्मणों के लिये तपस्या और विद्या परम कल्याण के साधन हैं। परन्तु यदि ब्राह्मण उदृण्ड और अन्यायी हो जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं। दुर्वासाजी! सुनिए, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करने से आपको इस विपत्ति में आना पड़ा है, आप उसी के पास जाईये। उनसे क्षमा माँगिये तब आपको शान्ति मिलेगी।‘ राजा अम्बरीष द्वारा सुदर्शन चक्र की स्तुति और दुर्वासा ऋषि को माफ़ी (Praise Of Surdarshan Chakra By King Ambarisha And Granting Of Forgiveness To Rishi Durvasa) सुदर्शन चक्र की ज्वाला से जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीष के पास आये और उन्होंने अत्यन्त दुःखी होकर राजा के पैर पकड़ लिये। दुर्वासाजी की यह चेष्टा देखकर और उनके चरण पकड़ने से लज्जित होकर राजा अम्बरीष भगवान् के चक्र की स्तुति करने लगे। अम्बरीष ने कहा- प्रभो सुदर्शन! आप अग्निस्वरूप हैं। भगवान् के प्यारे, हजार दाँतवाले चक्र देव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। समस्त अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट कर देने वाले एवं पृथ्वी के रक्षक! आप इन ब्राह्मण की रक्षा कीजिये। आप कृपा करके हमारे कुल के भाग्योदय के लिये दुर्वासाजी का कल्याण कीजिये। हमारे ऊपर यह आपका महान अनुग्रह होगा। यदि मैंने कुछ भी दान किया हो, यज्ञ किया हो अथवा अपने धर्म का पालन किया हो, यदि हमारे वंश के लोग ब्राह्मणों को ही अपना आराध्य देव समझते रहे हों, तो दुर्वासाजी की जलन मिट जाय। भगवान् समस्त गुणों के एक मात्र आश्रय स्थल हैं यदि मैंने समस्त प्राणियों के आत्मा के रूप में उन्हें देखा हो और वे मुझ पर प्रसन्न हों तो दुर्वासा जी के हृदय की सारी जलन मिट जाय। Durvasa Rishi forgiven by Raja Ambarishaजब राजा अम्बरीष ने दुर्वासा जी को सब ओर से जलाने वाले भगवान् के सुदर्शन चक्र की इस प्रकार स्तुति की, तब उनकी प्रार्थना से चक्र शान्त हो गया। जब दुर्वासा चक्र की आग से मुक्त हो गये और उनका चित्त स्वस्थ हो गया, तब वे राजा अम्बरीष को अनेकानेक उत्तम आशीवाद देते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे। दुर्वासा जी ने कहा- धन्य है! आज मैंने भगवान् के प्रेमी भक्तों का महत्त्व देखा। राजन्! मैंने आपका अपराध किया, फिर भी आप मेरे लिये मंगल-कामना ही कर रहे हैं। महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणा भव से परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराध भुलाकर मेरी रक्षा की है! जबसे दुर्वासा जी चक्र से जीवन रक्षा के लिए भाग रहे थे तबसे राजा अम्बरीष ने भोजन नहीं किया था। वे दुर्वासाजी के लौटने की बाट देख रहे थे। अब उन्होंने दुर्वासाजी के चरण पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न करके विधिपूर्वक भोजन कराया। दुर्वासा जी ने बहुत ही सन्तुष्ट होकर राजा अम्बरीष के गुणों की प्रशंसा की और उसके बाद उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्ग से प्रस्थान किया। जब सुदर्शन चक्र से भयभीत होकर दुर्वासाजी भाग रहे थे, तबसे लेकर उनके लौटने तक एक वर्ष का समय बीत गया था। इतने दिनों तक राजा अम्बरीष उनके दर्शन की आकांक्षा से केवल जल पीकर रहे। दुर्वासा जी के जाने के बाद, उनके भोजन से बचे हुए अत्यन्त पवित्र अन्न को राजा ने सपरिवार ग्रहण किया। कुछ वर्ष बीतने पर राजा अम्बरीष ने अपने ही समान भक्त पुत्रों पर राज्य का भार छोड़ दिया और स्वयं वन में चले गये। वहाँ वे बड़ी धीरता के साथ आत्मस्वरूप भगवान् में अपना मन लगाकर गुणों के प्रवाहरूपी संसार से मुक्त हो गये। 🚩 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

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