Vivek Singh
Vivek Singh Jul 16, 2017

Thomas Edison 💡

#ज्ञानवर्षा
Thomas Edison 💡

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Neha G Mar 4, 2021

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Manoj Prasadh Mar 4, 2021

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हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दुःख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि "जीव बार-बार अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनी और शरीर प्राप्त करता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक जीवात्मा परमात्मा से साक्षात्कार नहीं कर लेता। इसलिए जो कुछ भी संसार में होता है या व्यक्ति के साथ घटित होता है उसका जिम्मेदार जीव खुद होता है।" संसार में कुछ भी अपने आप नहीं होता है, हमें जो कुछ भी प्राप्त होता है वह कर्मों का फल है। ईश्वर तो कमल के फूल के समान है जो संसार में होते हुए भी संसार में लिप्त नहीं होता है। ईश्वर न तो किसी को दुःख देता है और न सुख। इस संदर्भ में एक कथा प्रस्तुत हैः- गौतमी नामक एक शाक्य वृद्धा थी, जिसका एक मात्र सहारा उसका पुत्र था। शक्या अपने पुत्र से अत्यंत स्नेह करती थी, एक दिन एक सर्प ने शक्या के पुत्र को डंस लिया। पुत्र की मृत्यु से शाक्य व्रद्धा व्याकुल होकर विलाप करने लगी। पुत्र को डंसने वाले सांप के ऊपर उसे बहुत क्रोध आ रहा था। सर्प को सजा देने के लिए शक्या ने एक सपेरे को बुलाया। सपेरे ने सांप को पकड़ कर शक्या के सामने लाकर कहा कि इसी सांप ने तुम्हारे पुत्र को डंसा है, इसे मार दो। शक्या ने संपरे से कहा कि इसे मारने से मेरा पुत्र जीवित नहीं होगा, सांप को तुम्ही ले जाओ और जो उचित समझो सो करो। सपेरा सांप को जंगल में ले आया, सांप को मारने के लिए सपेरे ने जैसे ही पत्थर उठाया, सांप ने कहा मुझे क्यों मारते हो, मैंने तो वही किया जो काल ने कहा था। सपेरे ने काल को ढूंढा और बोला तुमने सर्प को शक्या के बच्चे को डंसने के लिए क्यों कहा। काल ने कहा 'शक्या के पुत्र का कर्म फल यही था, मेरा कोई कसूर नहीं है। सपेरा कर्म के पहुंचा और पूछा तुमने ऐसा बुरा कर्म क्यों किया। कर्म ने कहा 'मुझ से क्यों पूछते हो, यह तो मरने वाले से पूछो' मैं तो जड़ हूं। इसके बाद संपेरा शक्या के पुत्र की आत्मा के पास पहुंचा। आत्मा ने कहा सभी ठीक कहते हैं, मैंने ही वह कर्म किया था जिसकी वजह से मुझे सर्प ने डंसा, इसके लिए कोई अन्य दोषी नहीं है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने भीष्म को बाणों से छलनी कर दिया और भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या पर सोना पड़ा। इसके पीछे भी भीष्म पितामह के कर्म का फल ही था। बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भीष्म ने जब श्री कृष्ण से पूछा, किस अपराध के कारण मुझे इसे तरह बाणों की शैय्या पर सोना पड़ रहा है। इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा था कि, आपने कई जन्म पहले एक सर्प को नागफनी के कांटों पर फेंक दिया था। इसी अपराध के कारण आपको बाणों की शैय्या मिली है। इसलिए हमे कभी भी जाने-अनजाने किसी भी जीव को नहीं सताना चाहिए। हम जैसा कर्म करते हैं उसका फल हमें कभी न कभी जरूर मिलता है।

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RAJ RATHOD Mar 5, 2021

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हर साल माता सीता का जन्म फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस साल 2021 में यह जानकी जयंती (Janaki Jayanti) 7 मार्च को है. इस दिन मिथिला के राजा जनक और रानी सुनयना की गोद में सीता आईं. अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र राम से सीता का विवाह हुआ. विवाह के बाद उन्होंने पति राम और देवर लक्ष्मण के साथ 14 साल का वनवास भी भोगा. इतना ही नहीं, इस वनवास के दौरान उनका लंका के राजा रावण ने अपहरण किया. वनवास के बाद भी वह हमेशा के लिए अयोध्या वापस नहीं जा सकीं. अपने पुत्रों के साथ उन्हें आश्रम में ही अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा और आखिर में उन्हें अपने सम्मान की रक्षा के लिए धरती में ही समाना पड़ा. अपने जीवन में इतने कष्टों को देखने वाली माता सीता आखिरकार थीं कौन? यहां जानें माता सीता का जन्म कैसे हुआ. कैसे हुआ जन्म? रामायण के अनुसार एक बार मिथिला के राजा जनक यज्ञ के लिए खेत को जोत रहे थे. उसी समय एक क्यारी में दरार हुई और उसमें से एक नन्ही बच्ची प्रकट हुईं. उस वक्त राजा जनक की कोई संतान नहीं थी. इसीलिए इस कन्या को देख वह मोहित हो गए और गोद ले लिया. आपको बता दें हल को मैथिली भाषा में सीता कहा जाता है और यह कन्या हल चलाते हुए ही मिलीं इसीलिए इनका नाम सीता रखा गया. कैसे मनाई जाती है जानकी जयंती? इस दिन माता सीता की पूजा की जाती है, लेकिन पूजा की शुरुआत गणेश जी और अंबिका जी से होती है. इसके बाद माता सीता को पीले फूल, कपड़े और सुहागिन के श्रृंगार का सामान चढ़ाया जाता है. बाद में 108 बार इस मंत्र का जाप किया जाता है. श्री जानकी रामाभ्यां नमः जय श्री सीता राम श्री सीताय नमः मान्यता है कि यह पूजा खासकर विवाहित महिलाओं के लिए लाभकारी होती है. इससे वैवाहिक जीवन की समस्याएं ठीक हो जाती हैं. नमस्कार 🙏 शुभ संध्या वंदन 🌹 👏 🚩 जय श्री राम 🌹 जय श्री लक्ष्मी नारायण 🙏 जय श्री सिता माता की 💐 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार 🙏 🚩

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Anita Sharma Mar 4, 2021

. "गुरु अवज्ञा" एक बार की बात है, एक भक्त के दिल में आया कि गुरु महाराज जी को रात में देखना चाहिए कि क्या वो भी भजन सिमरन करते हैं ? वो रात को गुरु महाराज जी के कमरे की खिड़की के पास खड़ा हो गया। गुरु महाराज जी रात 9:30 तक भोजन और बाकी काम करके अपने कमरे में आ गये। वो भक्त देखता है कि गुरु महाराज जी एक पैर पर खड़े हो कर भजन सिमरन करने लग गये। वो कितनी देर तक देखता रहा और फिर थक कर खिड़की के बाहर ही सो गया। 3 घंटे बाद जब उसकी आँख खुली तो वो देखता है कि गुरु महाराज जी अभी भी एक पैर पर खड़े भजन सिमरन कर रहे हैं, फिर थोड़ी देर बाद गुरु महाराज जी भजन सिमरन से उठ कर थोड़ी देर कमरे में ही इधर उधर घूमें और फिर दोनों पैरो पर खड़े होकर भजन सिमरन करने लगे। वो भक्त देखता रहा और देखते-देखते उसकी आँख लग गई और वो सो गया। जब फिर उसकी आँख खुली तो 4 घंटे बीत चुके थे और अब गुरु महाराज जी बैठ कर भजन सिमरन कर रहे थे। थोड़ी देर में सुबह हो गई और गुरु महाराज जी उठ कर तैयार हुए और सुबह की सैर पर चले गये। वो भक्त भी गुरु महाराज जी के पीछे ही चल गया और रास्ते में गुरु महाराज जी को रोक कर हाथ जोड़ कर बोलता है कि गुरु महाराज जी मैं सारी रात आपको खिड़की से देख रहा था कि आप रात में कितना भजन सिमरन करते हो। गुरु महाराज जी हंस पड़े और बोले:- बेटा देख लिया तुमने फिर ? वो भक्त शर्मिंदा हुआ और बोला कि गुरु महाराज जी देख लिया पर मुझे एक बात समझ नहीं आई कि आप पहले एक पैर पर खड़े होकर भजन सिमरन करते रहे फिर दोनों पैरों पर और आखिर में बैठ कर जैसे कि भजन सिमरन करने को आप बोलते हो, ऐसा क्यूँ ? गुरु महाराज जी बोले बेटा एक पैर पर खड़े होकर मुझे उन सत्संगियो के लिए खुद भजन सिमरन करना पड़ता है जिन्होंने नाम दान लिया है मगर बिलकुल भी भजन सिमरन नहीं करते। दोनों पैरो पर खड़े होकर मैं उन सत्संगियो के लिए भजन सिमरन करता हूँ जो भजन सिमरन में तो बैठते हैं मगर पूरा समय नहीं देते। बेटा जिनको नाम दान मिला है, उनका जवाब सतपुरख को मुझे देना पडता है, क्योंकि मैंने उनकी जिम्मेदारी ली है नाम दान देकर। और आखिर में मैं बैठ कर भजन सिमरन करता हूँ, वो मैं खुद के लिए करता हूँ, क्योंकि मेरे गुरु ने मुझे नाम दान दिया था और मैं नहीं चाहता की उनको मेरी जवाबदारी देनी पड़े। भक्त ये सब सुनकर एक दम सन्न खड़ा रह गया।

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