मायमंदिर फ़्री कुंडली
डाउनलोड करें

मांस का मूल्य🌺🌿

मांस का मूल्य🌺🌿
मांस का मूल्य🌺🌿

🐮 *मांस का मूल्य* 💰

मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा :
देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए

*सबसे सस्ती वस्तु क्या है ?*

मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा :
राजन,

*सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है,*

इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे ।
तब सम्राट ने उनसे पूछा :
आपका इस बारे में क्या मत है ?

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा :
शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय 💓 का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और

*उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।*

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और

*सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।*

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दीं ।

सम्राट ने पूछा :
यह सब क्या है ? तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए

*इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला ।*

राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है। लेकिन वो अपना जान बचाने मे असमर्थ है।

और मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि ।

*पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं ।*

*तो क्या बस इसी कारण उनस जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।*

*शुद्ध आहार, शाकाहार !*
*मानव आहार, शाकाहार !*

🌾💥🌾💥🌾💥💥💥

+126 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 179 शेयर

कामेंट्स

pt bk upadhyay Nov 1, 2017
बधाई अनीता जी, सुंदर आख्यान के लिए।

Vijay Yadav Nov 1, 2017
so beautiful posted with Anita jee Radhey Krishna

नरेंद्र कुमार Nov 1, 2017
my man se acha laga.hamara bhojan hamko bhudhi,jiwan mine ki kala,manush se sambndh,jiwan ka udeshy ki road map deta hai.manaw kaisha manaw Jo pashu ko bhojan banata.Parbhu sadbhudi do

रमेश Nov 1, 2017
uttarakhand me sabse jada mans khaya jata h. to ska kya.

रमेश Nov 1, 2017
jitne log utni bate sameh ke anusar sab achha h.

+242 प्रतिक्रिया 33 कॉमेंट्स • 118 शेयर

+361 प्रतिक्रिया 51 कॉमेंट्स • 137 शेयर

+13 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 19 शेयर
Swami Lokeshanand Jun 17, 2019

आज मन बड़ी विचित्र परिस्थिति में फंसा है। चारों ओर दुख के घनघोर अंधकार ने डेरा जमा रखा है। यहाँ जब से सूर्यवंश के सूर्य पिताजी को वनवास हुआ, तब से आँसुओं की धारा सबकी आँखों से अनवरत बह रही है। दादाजी के देहावसान के बाद, बड़ी दादी खोई खोई रहती है, मुख पर तो है ही, आँखों में भी मौन उतर आया है। मंझोली दादी भी आवश्यकता अनुसार कम ही बोलती है, चुपचाप रनिवास की सब व्यवस्था संभालती है। छोटी दादी का तो पूछो ही मत, लाख बार सबने समझा कर देख लिया, पर मालूम नहीं सारी परिस्थिति का बोझ अपने सिर पर क्यूं रखे है? तीनों चाची साढ़े तेरह वर्षों से देह की सुधि भूलकर दिनरात माँ पिताजी की कुशलता की कामना करतीं हैं। बड़े चाचा को तो देखे हुए भी उतना ही समय हो गया, सुनते हैं कि नंदिग्राम में सूख कर अस्थिमात्र ही बचे हैं। छोटे चाचा जरूर कभी कभी राज्यावस्था संभालते दृष्टि में आ जाते हैं। इधर जब से आततायी पापाचारी अनाचारी दुराचारी अत्याचारी पापपुंज दुष्ट रावण, माँ को अपहृत कर ले गया, आनन्दस्वरूप पिताजी को भी वरवश, लीलावश दुख ने घेर लिया। मंझले चाचा अपने कष्ट को भुलाकर, दिन रात पिताजी को कष्ट न हो ऐसा असफल प्रयास करते हैं। उधर लंका में माँ का भी तन सूख गया है। भूख प्यास की कौन कहे, श्वास भी बमुश्किल आ जा रही है। वे तो अकेली ही नहीं हैं, अति अकेली हैं। इस परिस्थिति से उबरने का तो एक ही मार्ग है, बस एकबार किसी तरह से हमारे बड़े भैया आ जाएँ। उनके आने में देरी है, अंधेरा छंटने में देरी नहीं है। फिर तो प्रकाश हुआ ही समझो, दुख मिटा ही समझो, कष्ट कटा ही समझो। बस भैया आ जाएँ, हनुमानजी आ जाएँ। कल कथा में हनुमानजी का प्रवेश॥ अब विडियो देखें-हनुमानजी का जन्म- https://youtu.be/zMEUN8Gm0jY हनुमानजी की महिमा- https://youtu.be/iGGA-YmoUmE

+10 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 4 शेयर

+303 प्रतिक्रिया 31 कॉमेंट्स • 417 शेयर

+8 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 1 शेयर

सीख: 1.हमेशा अच्छे कर्म करें। 2. जीवन में हमेशा सही रास्ते का चयन करें जब पार्वती ने बनाया भोजन तो शिवजी ने उन्हें बताई ये अनोखी बात एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा की प्रभु मैंने पृथ्वी पर देखा है कि जो व्यक्ति पहले से ही अपने प्रारब्ध से दुःखी है आप उसे और ज्यादा दुःख प्रदान करते हैं और जो सुख में है आप उसे दुःख नहीं देते है। भगवान ने इस बात को समझाने के लिए माता पार्वती को धरती पर चलने के लिए कहा और दोनों ने इंसानी रूप में पति-पत्नी का रूप लिया और एक गावं के पास डेरा जमाया । शाम के समय भगवान ने माता पार्वती से कहा की हम मनुष्य रूप में यहां आए है इसलिए यहां के नियमों का पालन करते हुए हमें यहां भोजन करना होगा। इसलिए मैं भोजन कि सामग्री की व्यवस्था करता हूं, तब तक तुम भोजन बनाओ। जब भगवान के जाते ही माता पार्वती रसोई में चूल्हे को बनाने के लिए बाहर से ईंटें लेने गईं और गांव में कुछ जर्जर हो चुके मकानों से ईंटें लाकर चूल्हा तैयार कर दिया। चूल्हा तैयार होते ही भगवान वहां पर बिना कुछ लाए ही प्रकट हो गए। माता पार्वती ने उनसे कहा आप तो कुछ लेकर नहीं आए, भोजन कैसे बनेगा। भगवान बोले - पार्वती अब तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। भगवान ने माता पार्वती से पूछा की तुम चूल्हा बनाने के लिए इन ईटों को कहा से लेकर आई तो माता पार्वती ने कहा - प्रभु इस गावं में बहुत से ऐसे घर भी हैं जिनका रख रखाव सही ढंग से नहीं हो रहा है। उनकी जर्जर हो चुकी दीवारों से मैं ईंटें निकाल कर ले आई। भगवान ने फिर कहा - जो घर पहले से ख़राब थे तुमने उन्हें और खराब कर दिया। तुम ईंटें उन सही घरों की दीवार से भी तो ला सकती थीं।माता पार्वती बोली - प्रभु उन घरों में रहने वाले लोगों ने उनका रख रखाव बहुत सही तरीके से किया है और वो घर सुंदर भी लग रहे हैं ऐसे में उनकी सुंदरता को बिगाड़ना उचित नहीं होता।भगवान बोले - पार्वती यही तुम्हारे द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर है। जिन लोगो ने अपने घर का रख रखाव अच्छी तरह से किया है यानि सही कर्मों से अपने जीवन को सुंदर बना रखा है उन लोगों को दुःख कैसे हो सकता है।मनुष्य के जीवन में जो भी सुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा सुखी है, और जो दुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा दुखी है । इसलिए हर एक मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे ही कर्म करने चाहिए की, जिससे इतनी मजबूत व खूबसूरत इमारत खड़ी हो कि कभी भी कोई भी उसकी एक ईंट भी निकालने न पाए। प्रिय बंधुओ व मित्रो, यह काम जरा भी मुश्किल नहीं है। केवल सकरात्मक सोच और निः स्वार्थ भावना की आवश्यकता है । इसलिए जीवन में हमेशा सही रास्ते का ही चयन करें और उसी पर चलें। सीख: 1.हमेशा अच्छे कर्म करें। 2. जीवन में हमेशा सही रास्ते का चयन करें

+18 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 29 शेयर

+30 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 150 शेयर

+617 प्रतिक्रिया 98 कॉमेंट्स • 293 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB