Good evening friendsss....

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#ज्ञानवर्षा
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Neeru Miglani Apr 19, 2019

*ना जाने क्यों यदा-कदा खयाल आता है...?* ● घर में सबसे पहले गाय की, कूकर की, पक्षियों की, खूब सारे मेहमानों की रोटी रोज़ बनती थी। फिर भी घर का बज़ट संतुलित रहता था। आज सिर्फ अपने परिवार की रोटी महंगी हो गई...जाने क्यों...? ● परिवार बहुत बड़ा होता था, उसमें खेलते बहुत सारे परिवार और पड़ोसियों के भी बच्चे। फिर भी घर में शांति होती थी...जाने क्यों...? ● महिलाओं के लिए कोई जिम या कसरत के विशेष साधन नही थे, लेकिन फिर भी महिलाएं पूर्णतः स्वस्थ रहती थी...जाने क्यों...? ● खाने को सादा दाल रोटी होती थी। लेकिन फिर भी किसी को खून की कमी नही होती थी...जाने क्यों...? ● भाई बहनों में खूब मार पिटाई होती थी, लेकिन मनमुटाव नही होते थे...जाने क्यों ? ● स्कूल में अध्यापक खूब कान खींचते थे। डंडों से पिटाई होती थी। लेकिन कोई बच्चा स्कूल में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या नही करता था...जाने क्यों...? ● महंगे खिलौने नही मिलते थे, लेकिन हर खेल बहुत आनंदित करता था...जाने क्यों...? ● माता पिता ज़रा सी बात पे थप्पड़ जड़ दिया करते थे, फिर भी उनका सम्मान कम नही होता था...जाने क्यों...? ● घर कच्चे होते थे, कमरे कम होते थे, लेकिन माँ-बाप कभी वृद्धाश्रम नही जाते थे...जाने क्यों...? *अगर आप इस क्यों के जवाब ढूँढ़ पाएं, तो कृपया अपने मित्रों और संबंधियों से साझा ज़रूर करें। यूँ ही एक से दो मिलने से कड़ी बनेगी, जो पहले जैसा सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने में अमुल्य योगदान देगी...!*🆎💐🙏💐

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Swami Lokeshanand Apr 19, 2019

इधर भरतजी ननिहाल में सो रहे हैं, उधर अयोध्या में कोहराम छाया है। गुरुजी ने भरतजी को बुलवाने के लिए दूत रवाना किए। भरतजी ने स्वप्न में देखा कि मैं अयोध्या के नभमंडल में चल रहा हूँ, नीचे देखता हूँ तो धुआँ ही धुआँ है, मानो हजारों चिताएँ एक साथ जल रही हों। अचानक धुएँ को चीरकर पिताजी का सिर विहीन धड़ बाहर निकला। पीछे से भैया राम दौड़ते आए, पर मुझे देखते ही वापिस मुड़ने लगे। मैंने पुकारा तो मेरी और पीठ कर, कहीं विलीन हो गए। "रामजी ने मुंह मोड़ लिया" बस, दुख असह्य हो गया, भरतजी की नींद टूट गई। भरतजी जाग गए॥ जाग गए॥ अब ध्यान दें!! आप कितना ही स्वप्न में खोए हों, दुख सहनशीलता से पार हो जाए तो स्वप्न टूटता ही है। वो अलग बात है कि लाख बार दुख आया, लाख स्वप्न टूटे, जो जागना चाहता ही नहीं, वह स्वप्न का अभ्यासी फिर फिर करवट बदल कर सो जाता और नया स्वप्न देखने लगता है। योंही मोह रूपी रात्रि में सोए, जाग्रत रूपी स्वप्न में खोए, जीव को, जगाने के लिए, करूणामय भगवान के अनुग्रह से, परम सौभाग्य रूप दुखजनक परिस्थिति उत्पन्न होती है। सावधान साधक जाग जाता है, मूढ़ पछाड़ खाकर गिरता है, दहाड़ मार मार कर रोता है, पर जागता नहीं, दस बीस दिन छाती पीटकर, पुनः नई वासना से युक्त हो, पुनः दृश्य जगत में खो जाता है। हाय! हाय! दुख की कौन कहे? वह तो इतना जड़ बुद्धि है कि कितने ही उसकी गोद में दम तोड़ गए, वह स्वयं लाख बार मरा, अग्नि में जलाया गया, कब्रों में दबाया गया, नालियों में गलाया गया, कीड़ों से खाया गया, पर नहीं ही जागा। मूर्ख तो दुख के पीछे ही छिप बैठा है, कहता है "यहाँ इतना दुख है, आपको जागने की पड़ी है? जब तक मैं इस दुख का उपाय न कर लूं, जागूं कैसे? यह दुख ही मुझे जागने नहीं देता। पहले मुझे सुखी कर दो, फिर जागने का प्रयास करूंगा।" आप विचार करें, जो दुख में नहीं जाग रहा, वह सुख में जागेगा? न मालूम इस सोने से उसका मन कब भरेगा? अब विडियो देखें- भरत जी जाग गए https://youtu.be/Prj5W1AsMl0

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Vijay Yadav Apr 19, 2019

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Naval Sharma Apr 19, 2019

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