Anand Singh Kanwar
Anand Singh Kanwar Dec 23, 2016

अमरकण्टक

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Ragni Dhiwar May 9, 2021

*मेरी, आपकी, हम सबकी मां को किसी दिवस विशेष में "समेटना" सम्भव नही क्योंकि माँ हमारी रग रग में रक्त बनकर प्रवाहित है. उसी के कारण हमारा अस्तित्व है.* *जिस दिन मां का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा उस दिन इस पृथ्वी पर दुर्लभ मानव जीवन हमेशा के लिये समाप्त हो जायेगा. इसीलिये "बेटियों" को बचाईये.* *मिलिन्द भिड़े,भिलाई नगर* मां को समर्पित एक कविता दोबारा पढ़ने मिली,रचयिता का पता नही, पर हृदयस्पर्शी लगी, इसीलिये शेयर कर रही हूँ. लेती नहीं दवाई "माँ", जोड़े पाई-पाई "माँ"। दुःख थे पर्वत, राई "माँ", हारी नहीं लड़ाई "माँ"। इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई "माँ"। दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमागर्म रजाई "माँ" । जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई "माँ" । बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई "माँ"। बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई "माँ"। बाबूजी के पाँव दबा कर सब तीरथ हो आई "माँ"। नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, "माँ" । सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मगर नहीं कह पाई "माँ" । घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई "माँ"। बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई "माँ" । रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई "माँ"। लड़ते-लड़ते, सहते-सहते, रह गई एक तिहाई "माँ" । बेटी रहे ससुराल में खुश, सब ज़ेवर दे आई "माँ"। "माँ" से घर, घर लगता है, घर में घुली, समाई "माँ" । बेटे की कुर्सी है ऊँची, पर उसकी ऊँचाई "माँ" । दर्द बड़ा हो या छोटा हो, याद हमेशा आई "माँ"। घर के शगुन सभी "माँ" से, है घर की शहनाई "माँ"। सभी पराये हो जाते हैं, होती नहीं पराई "माँ". ...👣🌺👏

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Vandana Singh May 9, 2021

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Surekha Sonar May 9, 2021

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