रेखा
रेखा Apr 10, 2021

(((( श्री सावता माली तथा नागू जी )))) . यह चरित्र पूज्यपाद श्री पूर्णानंद स्वामी रामदासी, श्री संत महीपति जी के कृपाप्रसाद से एवं श्री वारकरी संप्रदाय के संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया गया है। . श्री पंढरिनाथ भगवान् विट्ठल के भक्तो में संत सावता माली एक महान भक्त हुए है। . अरणभेंडी (अरणगाव) नामक गाँव इनका निवास था, व्यवसाय से ये माली का काम करते थे। . संत सावता माली और इनकी पत्नी जनाबाई दोनों प्रभु की भक्ति में सदा मग्न रहते। नागू नाम की इनकी कन्या भी उच्च कोटि की भक्त थी। . मराठी भाषा में ‘साव’ का अर्थ चारित्र्य, सज्जनता। सावता यह भाववाचक शब्द है। सभ्यता, साधारण पन यह इसका अर्थ है। . श्री सावता माली - जन्म : इ .स १२५० वैकुण्ठ गमन :आषाढ़ वद्य चतुर्दशी, १२१७ (१२ जुलाई १२९५) अरणगांव. . संत जी हमेशा कहते और मानते थे की यह बाग भगवान् की है और भगवान् ने हमें इसकी देख रेख हेतु नियुक्त किया है। . बाग़ में तरह तरह के फल, सब्जियां एवं पुष्प लगे थे। बाग़ में वारकरी (वैष्णवो द्वारा पंढरपुर पैदल यात्रा) यात्रियों और बहुत से लोगो का आना जाना लगा रहता क्योंकि संत सवतामाली की बाग थी ही ऐसी। . एक दिन गाँव के एक व्यक्ति ने गाँव में बात फैला दी की सावता माली नास्तिक है। वो कभी भगवान् का दर्शन करने नहीं जाता और पंढरपुर यात्रा को भी नहीं आता, उसके बाग़ के फल सब्जी खाना पाप है! उस से बोलना भी पाप ही है। . धीरे धीरे संत जी की बाग में वारकरी भक्तो का आना जाना बंद हो गया, वे लोग बाग के सामने से निकलते परंतु बाग के अंदर अब नहीं जाते। . इस बात से सावता माली की पुत्री, भक्ता नागू बहुत दुखी रहने लगी। . एक दिन कुछ वारकरी पंढरपुर यात्रा पर निकले थे और बाग़ की सामने से निकलते समय नागू ने उनसे पूछा, आप बाग में क्यों नहीं आते है? . उन लोगो ने कहा.. सावता माली पंढरपुर के रास्ते पर ही पास में रहता है, परंतु फिर भी दर्शन को नहीं आता, वो पक्का प्रपंच में फस गया है, उसको पर्मार्थ नहीं चाहिए। . मुख से’ विट्ठल ‘राम कृष्ण हरी ‘ नाम तो लेता है परंतु प्रभु के दर्शन को नहीं जाता, हम क्यों आये उसकी बाग के अंदर? . भक्ता नागू ने अपने पिता से कहा, पिताजी हम लोग क्यों नहीं जाते इस वारी (पैदल यात्रा) के साथ पंढरपुर? जाते है ना हम भी? . संत सावता माली कहने लगे.. बेटी, प्रभु को ये पसंद नहीं आएगा, वह कहेंगे काम छोड़ कर यहाँ क्यों आये हो? . ये बाग भगवान् विट्ठल की है। काम छोड़ कर उनके पास गए तो वो कहेंगे, क्यों आये हो यहाँ पर, मेरी बाग वहाँ सुख गयी तो? . मेरी बाग़ सुख गयी तो मुझे नहीं चलेगा, तुमको मैंने जो काम दे रखा है वो छोड़ कर यहाँ क्यों आये हो? . सत्य बात ये थी की सावता माली इतनी ऊँची अवस्था को प्राप्त हो चुके थे की उनको सर्वत्र हरी दर्शन होता था, मुख से नाम निकलता रहता था परंतु अन्य लोग यह लीला नहीं समझते। . दूसरा उनका भाव था की यहाँ से होकर संत महात्मा पंढरपुर की यात्रा के लिए जाते है, थकान होती होगी अतः उनकी सेवा हम फल फूल आदि से करे। . यदि बाग़ छोड़ कर चले गए तो संत महात्माओ की सेवा नहीं होगी। संतो के चरणों में इनकी बहुत भक्ति थी। पर साधारण लोग यही समझते की सावता माली नाम तो जपता है पर मंदिर में कभी नहीं जाता। . नागू बहार खेलने निकल गयी। उसने कुछ सोच विचार किया और पुनः अंदर आकर बोली, पिताजी हम नहीं जाएंगे पंढरपुर पर विठू को तो यहाँ बुलवा लीजिये। . प्यार से नागू भगवान् को धन्या, विठू, विठुराय ऐसे नामो से संबोधित करती। . नागू निरंतर अपने पिता से पूछा करती, बाबा इस बाग का स्वामी वह विठू है न? तब वह बाग में कभी पधारता क्यों नहीं है? . सावता माली को अपनी कन्या के प्रति बड़ा कौतुक लगा। उन्होंने बेटी को प्यार से अपने पास बिठाया और कहा, बेटी, वो तो समस्त जगत के पालनकर्ता है। . उनको बहुत काम होता है ! परंतु जब उनको समय मिलेगा वह अवश्य आएंगे। . एक दिन की बात है, कुछ वारकरी संत और यात्री पंढरपूर यात्रा पर प्रभु से भेट करने निमित्त निकले। . नागू को जैसे इस बात का पता चला उसने एक टोकरी में कुछ गाजर और मूली भर दिए। . उसने उन वारकरी भक्तो से कहा, भैया, यह नैवेद्य मेरे विठुराय को ले जाकर दोगे क्या? उसको कहना की यह सब्जी, फल उसके ही बाग के है। . बहुत से वारकरी तो रुके ही नहीं, अनदेखा कर के चले गए। . आगे आने वाले कुछ वारकारियो ने उस भक्ता का मजाक उड़ाया और कहा छी !मूली और गाजर? ये लेकर जाएँ ? वह उस टोकरी को फेंक कर आगे चले गए। . परंतु एक बुढा वारकरी भक्त उस कोमल हृदया भक्ता के मन का भक्तिभाव जान गए। . उन भक्त ने वह टोकरी उसके हाथ से ले ली और कहने लगे.. मै दूंगा हां यह सब्जी और फल भगवान् विट्ठल को। . नागू को आनंद हुआ। उस कन्या भक्ता ने कहा.. भैया, विठू से कहना की बाग उसकी ही है। मेरे माता पिता दिनरात तुम्हारा ही नाम जपते रहते है और हां ,मै भी उन्ही का नाम लेती हूं। . विठुराय को कहना, नागू आपकी प्रतीक्षा कर रही है। आप मेरी प्रार्थना निवेदन दे कर शीघ्र लौटना। दोगे न मेरा संदेश ? . आहाहा ! उस भक्ता की वाणी सुनकर उस वारकरी भक्त का हृदय भर आया। निष्पाप, निस्वार्थ और अपार प्रेम। . इस कन्या का निमंत्रण सुनकर वह अवश्य आएगा । . उस वारकरी ने कहा.. बेटी मै तुम्हारी प्रार्थना अवश्य निवेदन करूँगा और भगवान् भी अवश्य आएंगे। उनका अपने भक्तो पर बहुत प्रेम है। . अरणभेंडी गाँव से पंढरपूर १८ मील की दूरी। वारकरी भक्त ने हाथ में टोकरी ली और चल पड़ा। मंदिर पहुँच कर उसने नागू का संदेश वैसा का वैसा भगवान् को सुनाया। . उस दिन शाम को बाग का काम पूर्ण कर के संत सावता माली अपनी बेटी नागू से बोले.. चलो बेटी, घर चले। तुम्हारी माता प्रतीक्षा करती होगी। . नागू ने कहा.. बाबा, आज तो वह पांडुरंग आने वाला है। मैंने वारकरी भैया के साथ सब्जी और फल नैवेद्य के रूप में भेजे है। . शीघ्र लौटना ऐसा भी कहा है। विठू आता होगा, मुझे प्रतीक्षा करनी चाहिए। मै यही ठहरूँगी। . संतो ने लिखा है ही सभी वैष्णवो के ह्रदय में जिस दिन नागू जैसा दृढ़ विश्वास आएगा उस दिन भगवान् से मिलान अवश्य होगा। . प्रह्लाद और नागू जैसा दृढ़ विश्वास भगवान् की प्राप्ति को सहज बना देता है। . बेटी का ऐसा भगवत्प्रेम देख कर संत सावता माली धन्य हो गए। उन्होंने बेटी को अपने पास बिठाया और कहा – मै भी रुकता हूं यहाँ पर। संत सावता माली विठुराय का स्मरण करने लगे। . बहुत समय बीत गया बेटी और पति घर नहीं आये ऐसा सोच कर सावता माली की पत्नी जनाबाई को चिंता होने लगी। . कुछ देर प्रतीक्षा करने के पश्चात जनाबाई भी बाग में आ गयी। बेटी की प्रेम अवस्था और प्रभु भक्ति देख जनाबाई भी अश्रुपात करने लगी। . सब परिवार सुध बुध खो कर प्रभु का स्मरण करने में मग्न हो गए। नाम जप करते करते पूरी रात बीत गयी किसी को पता न चला। . नागू ने भगवान् का दर्शन प्राप्त करने के लिए रट लगा दी, उसने अन्न जल त्याग दिया और भजन में लगी रही। . संत श्री नामदेव ने अपनी वाणी में कहा है.. संत श्री सावता माली जी की योग्यता क्या है इसका हमने संतो के साथ प्रत्यक्ष अनुभव किया है। . बूढा वारकरी भक्त ने जैसे ही भगवान् को नागू का संदेश सुना कर प्रणाम् किया उसी क्षण तत्काल प्रभु मंदिर से बहार चले गए और सीधे संत सावता की बाग में चले गए । . सावता माली के पास जब प्रभु आये तब प्रभु के दर्शन केवल सावता माली को ही हुए थे.. . उन्हें देख कर संत जी ने विचार किया- इस सुंदर विठू को कहा रखे और क्या करे ? . आहाहा ऐसी हलचल उनके मन में होने लगी। श्री कृष्ण तो नटवर है, उनकी लीला कौन समझ सके। . प्रभु ने विचित्र लीला की और भगवान् पांडुरंग कृष्ण बोले.. बाबा, मेरे पीछे लोग पड गए है, आप हमको कही छिपा लो। . संत जी ने यहाँ वह देखा की कहा छिपावे, परंतु बाग़ तो खुली खुली थी। छुपने कि जगह ही नहीं। . संत तो सरल ह्रदय और भोले होते है, बिना कुछ सोच विचार के संत सावता माली ने सब्जी काटने का खुरपा लेकर ह्रदय और पेट के बीच वाले हिस्से को चीर दिया। . भगवान् पांडुरंग ने अति लघुरूप धारण कर लिया और जाकर सीधे संत सावता माली के हृदय में जाकर बैठ गए। . भगवान् भी रंग बिरंगी लीलाये करते है। भगवान् को संत जी के हृदय में रहना बहुत अच्छा लगा। . प्रभु हृदय में विलीन हो गए, संत निरंतर अपने हृदय में उस दिव्य ज्योति का दर्शन करने लगे। . उनको दर्शन तो आत्मरूप से होता रहता परंतु संत जी सोचने लगे अब हमारी बेटी और पत्नी को दर्शन कैसे हो ? . भगवान का साकार रूप तो मेरे ह्रदय में विलीन होकर निराकार हो गया, अब उस कृष्ण के रस स्वरुप को प्रकट करके बेटी और पत्नी को दर्शन कैसे करावे ? . संतो का शरीर ही एक मंदिर है। उनके ह्रदय में भगवान और भक्ति देवी का निवास होता है, अंग अंग में तीर्थ विराजते है। . संत केवल मंदिर में ही नहीं अपितु कण कण में भगवान् का दर्शन करते है, इस बात की प्रतिष्ठा करने के लिए भगवान ने एक लीला की। . पंढरपुर में उस दिन बहुत से वारकरी भक्तो का समूह मंदिर में आया पर प्रभु वहाँ दिखे नहीं। . किसको कुछ समझ नहीं आ रहा था। बाद में श्री निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव, सोपानदेव, मुक्ताबाई आदि अनेक महान् संत भी उस दिन भगवान् विट्ठल के दर्शन के लिए पंढरपूर में मंदिर पधारे। . अंदर जाकर देखा तो भगवान् मंदिर में नहीं है। भगवान् को ढूंढे कैसे ? . संत श्री ज्ञानदेव जी ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और कहा.. चलो, भगवान् अरणगाव में कही गए है। . भगवान् के कंठ में तुलसी हार तो होता ही है, अंगो से भी सुंदर सुगंधि आती है। सुंगंध के पीछे पीछे चल कर पता लग जायेगा। . सब संत मंडली तुलसी की सुगंधि के पीछे चले जा रहे है। चलते चलते आ पहुचे श्री सावता माली जी की बाग में। . नागू उस समय सावता माली की गोद में सिर रख कर विरह में विट्ठल स्मरण कर रही थी। . संतो को देख कर सावता माली आनंद में भर गए और कहने लगे.. आज हमारा भाग्य बड़ा है। हम धन्य हो गए, संतो के चरण से हमारा घर पावन हो गया। . नामदेव जी ने कहा.. बाबा आपका भाग्य तो बड़ा ही है ! हमारे चरण यहाँ पधारे इसलिए नहीं ! .. भगवान् पांडुरंग यहाँ आये इसीलिए ! बताओ तो हमारे प्रभु कहा है ? . संत सावता माली कहने लगे.. मै स्वयं प्रभु की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। यह बालिका ४ दिनों से अन्न जल त्याग कर भगवान् के आने की आस लगाये बैठी है। . नामदेव ने कहा.. कुछ भी मत बोलो, ज्ञानदेव जी ने कहा हैं प्रभु यही पर है। असत्य कैसे होगा ? तुमने प्रभु को कहां छुपाया है वो बताओ ? . सावता माली ने कहा.. मै प्रभु को कहां छुपाऊ ? और प्रभु क्यों छुप के रहेंगे ? भगवान् यदि छुपे होंगे ही तो मेरे हृदय मे ही ! दूसरी जगह कहाँ ? . मुझे तो प्रभु सर्वत्र दीखते है, वे कण कण में व्याप्त है। ये फूल पौधे के सब उसके ही रूप। . ज्ञानदेव बोले.. वाह वाह यहाँ विट्ठल छुपे नहीं यहाँ तो विट्ठल सर्वत्र बिखरे है, सुगंध की तरह। . सावता माली बोले.. ज्ञानदेव जी भगवान् का निराकार सर्वव्यापक रूप मेरे और आपके लिए अच्छा है परंतु हमारी पुत्री नागू का समाधान कैसे हो ? . उसको तो सगुण साकार रूप ही प्रिय है, इसने विट्ठल दर्शन की रट लगा रखीं है, ४ दिन से अन्न जल कुछ लिया नहीं। इस बालिका का समाधान मै कैसे करू ? . नामदेव जी कहने लगे.. अभी तो आपने कहा, भगवान आपके हृदय में है। . सावता माली ने कहा.. ये भी सत्य है नामदेव जी, यहां वहां क्यों ढूंढना ? आपने अच्छी याद दिलायी। . सावता माली ने साग फल काटने वाला खुरपा उठाया और खच्च से छाती पर मारा और कहा.. पांडुरंग विट्ठल मेरे हृदय से बहार आओ और साकार रूप में दर्शन दो। . उनके ह्रदय से एक तेजस्वी प्रकाश निकला और सम्पूर्ण बाग में तुलसी की दिव्या सुगंधि व्याप्त हो गयी। . भगवान् प्रकट हुए और संत सावता माली मूर्छित हो गए। प्रभु ने अपनी कृपा दृष्टी से उनकी मूर्छा दूर की। . भगवान् प्रकट हुए तब नागू भाग कर प्रभु के पास गयी और उनसे लिपट गयी। उसने कहा.. विठु, विठु तुम आ गए ? . देखो पिता जी विठू आ गया, धनी आ गया। मुझे पता था वह अवश्य आएगा। . सब संत मंडली ने हरिनाम संकीर्तन किया, उसके बाद सावता माली ने संतो और प्रभु को भोजन प्रसाद पवाया। . भगवान् ने अपनी गोद में नागू को बिठाकर प्रसाद पवाया। . नागू ने कहा.. विठु ! अब कही जाना नहीं हां। . इस पर नामदेव जी बोले- बेटी यहाँ रहकर कैसे चलेगा, प्रभु को जगत के बहुत कार्य करने होते है। वे व्यस्त होते है। . नागू ने कहा यह भी ठीक ही है परंतु बीच बीच में आते रहना। ये बाग आपकी ही तो है और हम सब आपके सेवक, आओगे ना ? . भगवान् कहने लगे.. क्यों नहीं आऊंगा?तुमने याद किया तब आ जाऊंगा, तुम्हारे प्रेम में बंध आना ही पड़ेगा। . सावता माली, जनाबाई को प्रभु ने आशीर्वाद दिया और नागू को लाड़ लड़ा कर प्रभु अंतर्धान हो गए। . ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

(((( श्री सावता माली तथा नागू जी ))))
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यह चरित्र पूज्यपाद श्री पूर्णानंद स्वामी रामदासी, श्री संत महीपति जी के कृपाप्रसाद से एवं श्री वारकरी संप्रदाय के संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया गया है।
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श्री पंढरिनाथ भगवान् विट्ठल के भक्तो में संत सावता माली एक महान भक्त हुए है। 
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अरणभेंडी (अरणगाव) नामक गाँव इनका निवास था, व्यवसाय से ये माली का काम करते थे। 
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संत सावता माली और इनकी पत्नी जनाबाई दोनों प्रभु की भक्ति में सदा मग्न रहते। नागू नाम की इनकी कन्या भी उच्च कोटि की भक्त थी।
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मराठी भाषा में ‘साव’ का अर्थ चारित्र्य, सज्जनता। सावता यह भाववाचक शब्द है। सभ्यता, साधारण पन यह इसका अर्थ है।
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श्री सावता माली - जन्म : इ .स १२५०
वैकुण्ठ गमन :आषाढ़ वद्य चतुर्दशी, १२१७ (१२ जुलाई १२९५) अरणगांव.
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संत जी हमेशा कहते और मानते थे की यह बाग भगवान् की है और भगवान् ने हमें इसकी देख रेख हेतु नियुक्त किया है।  
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बाग़ में तरह तरह के फल, सब्जियां एवं पुष्प लगे थे। बाग़ में वारकरी (वैष्णवो द्वारा पंढरपुर पैदल यात्रा) यात्रियों और बहुत से लोगो का आना जाना लगा रहता क्योंकि संत सवतामाली की बाग थी ही ऐसी।
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एक दिन गाँव के एक व्यक्ति ने गाँव में बात फैला दी की सावता माली नास्तिक है। वो कभी भगवान् का दर्शन करने नहीं जाता और पंढरपुर यात्रा को भी नहीं आता, उसके बाग़ के फल सब्जी खाना पाप है! उस से बोलना भी पाप ही है। 
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धीरे धीरे संत जी की बाग में वारकरी भक्तो का आना जाना बंद हो गया, वे लोग बाग के सामने से निकलते परंतु बाग के अंदर अब नहीं जाते।
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इस बात से सावता माली की पुत्री, भक्ता नागू बहुत दुखी रहने लगी। 
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एक दिन कुछ वारकरी पंढरपुर यात्रा पर निकले थे और बाग़ की सामने से निकलते समय नागू ने उनसे पूछा, आप बाग में क्यों नहीं आते है? 
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उन लोगो ने कहा.. सावता माली पंढरपुर के रास्ते पर ही पास में रहता है, परंतु फिर भी दर्शन को नहीं आता, वो पक्का प्रपंच में फस गया है, उसको पर्मार्थ नहीं चाहिए। 
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मुख से’ विट्ठल ‘राम कृष्ण हरी ‘ नाम तो लेता है परंतु प्रभु के दर्शन को नहीं जाता, हम क्यों आये उसकी बाग के अंदर?
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भक्ता नागू ने अपने पिता से कहा, पिताजी हम लोग क्यों नहीं जाते इस वारी (पैदल यात्रा) के साथ पंढरपुर? जाते है ना हम भी?
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संत सावता माली कहने लगे.. बेटी, प्रभु को ये पसंद नहीं आएगा, वह कहेंगे काम छोड़ कर यहाँ क्यों आये हो? 
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ये बाग भगवान् विट्ठल की है। काम छोड़ कर उनके पास गए तो वो कहेंगे, क्यों आये हो यहाँ पर, मेरी बाग वहाँ सुख गयी तो? 
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मेरी बाग़ सुख गयी तो मुझे नहीं चलेगा, तुमको मैंने जो काम दे रखा है वो छोड़ कर यहाँ क्यों आये हो?
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सत्य बात ये थी की सावता माली इतनी ऊँची अवस्था को प्राप्त हो चुके थे की उनको सर्वत्र हरी दर्शन होता था, मुख से नाम निकलता रहता था परंतु अन्य लोग यह लीला नहीं समझते। 
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दूसरा उनका भाव था की यहाँ से होकर संत महात्मा पंढरपुर की यात्रा के लिए जाते है, थकान होती होगी अतः उनकी सेवा हम फल फूल आदि से करे। 
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यदि बाग़ छोड़ कर चले गए तो संत महात्माओ की सेवा नहीं होगी। संतो के चरणों में इनकी बहुत भक्ति थी। पर साधारण लोग यही समझते की सावता माली नाम तो जपता है पर मंदिर में कभी नहीं जाता।
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नागू बहार खेलने निकल गयी। उसने कुछ सोच विचार किया और पुनः अंदर आकर बोली, पिताजी हम नहीं जाएंगे पंढरपुर पर विठू को तो यहाँ बुलवा लीजिये। 
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प्यार से नागू भगवान् को धन्या, विठू, विठुराय ऐसे नामो से संबोधित करती। 
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नागू निरंतर अपने पिता से पूछा करती, बाबा इस बाग का स्वामी वह विठू है न? तब वह बाग में कभी पधारता क्यों नहीं है? 
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सावता माली को अपनी कन्या के प्रति बड़ा कौतुक लगा। उन्होंने बेटी को प्यार से अपने पास बिठाया और कहा, बेटी, वो तो समस्त जगत के पालनकर्ता है। 
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उनको बहुत काम होता है ! परंतु जब उनको समय मिलेगा वह अवश्य आएंगे।
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एक दिन की बात है, कुछ वारकरी संत और यात्री पंढरपूर यात्रा पर प्रभु से भेट करने निमित्त निकले। 
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नागू को जैसे इस बात का पता चला उसने एक टोकरी में कुछ गाजर और मूली भर दिए। 
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उसने उन वारकरी भक्तो से कहा, भैया, यह नैवेद्य मेरे विठुराय को ले जाकर दोगे क्या? उसको कहना की यह सब्जी, फल उसके ही बाग के है। 
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बहुत से वारकरी तो रुके ही नहीं, अनदेखा कर के चले गए। 
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आगे आने वाले कुछ वारकारियो ने उस भक्ता का मजाक उड़ाया और कहा छी !मूली और गाजर? ये लेकर जाएँ ? वह उस टोकरी को फेंक कर आगे चले गए। 
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परंतु एक बुढा वारकरी भक्त उस कोमल हृदया भक्ता के मन का भक्तिभाव जान गए। 
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उन भक्त ने वह टोकरी उसके हाथ से ले ली और कहने लगे.. मै दूंगा हां यह सब्जी और फल भगवान् विट्ठल को।
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नागू को आनंद हुआ। उस कन्या भक्ता ने कहा.. भैया, विठू से कहना की बाग उसकी ही है। मेरे माता पिता दिनरात तुम्हारा ही नाम जपते रहते है और हां ,मै भी उन्ही का नाम लेती हूं। 
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विठुराय को कहना, नागू आपकी प्रतीक्षा कर रही है। आप मेरी प्रार्थना निवेदन दे कर शीघ्र लौटना। दोगे न मेरा संदेश ? 
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आहाहा ! उस भक्ता की वाणी सुनकर उस वारकरी भक्त का हृदय भर आया। निष्पाप, निस्वार्थ और अपार प्रेम। 
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इस कन्या का निमंत्रण सुनकर वह अवश्य आएगा ।
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उस वारकरी ने कहा.. बेटी मै तुम्हारी प्रार्थना अवश्य निवेदन करूँगा और भगवान् भी अवश्य आएंगे। उनका अपने भक्तो पर बहुत प्रेम है। 
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अरणभेंडी गाँव से पंढरपूर १८ मील की दूरी। वारकरी भक्त ने हाथ में टोकरी ली और चल पड़ा। मंदिर पहुँच कर उसने नागू का संदेश वैसा का वैसा भगवान् को सुनाया।
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उस दिन शाम को बाग का काम पूर्ण कर के संत सावता माली अपनी बेटी नागू से बोले.. चलो बेटी, घर चले। तुम्हारी माता प्रतीक्षा करती होगी। 
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नागू ने कहा.. बाबा, आज तो वह पांडुरंग आने वाला है। मैंने वारकरी भैया के साथ सब्जी और फल नैवेद्य के रूप में भेजे है। 
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शीघ्र लौटना ऐसा भी कहा है। विठू आता होगा, मुझे प्रतीक्षा करनी चाहिए। मै यही ठहरूँगी। 
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संतो ने लिखा है ही सभी वैष्णवो के ह्रदय में जिस दिन नागू जैसा दृढ़ विश्वास आएगा उस दिन भगवान् से मिलान अवश्य होगा। 
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प्रह्लाद और नागू जैसा दृढ़ विश्वास भगवान् की प्राप्ति को सहज बना देता है। 
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बेटी का ऐसा भगवत्प्रेम देख कर संत सावता माली धन्य हो गए। उन्होंने बेटी को अपने पास बिठाया और कहा – मै भी रुकता हूं यहाँ पर। संत सावता माली विठुराय का स्मरण करने लगे।
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बहुत समय बीत गया बेटी और पति घर नहीं आये ऐसा सोच कर सावता माली की पत्नी जनाबाई को चिंता होने लगी। 
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कुछ देर प्रतीक्षा करने के पश्चात जनाबाई भी बाग में आ गयी। बेटी की प्रेम अवस्था और प्रभु भक्ति देख जनाबाई भी अश्रुपात करने लगी। 
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सब परिवार सुध बुध खो कर प्रभु का स्मरण करने में मग्न हो गए। नाम जप करते करते पूरी रात बीत गयी किसी को पता न चला। 
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नागू ने भगवान् का दर्शन प्राप्त करने के लिए रट लगा दी, उसने अन्न जल त्याग दिया और भजन में लगी रही।
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संत श्री नामदेव ने अपनी वाणी में कहा है.. संत श्री सावता माली जी की योग्यता क्या है इसका हमने संतो के साथ प्रत्यक्ष अनुभव किया है।
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बूढा वारकरी भक्त ने जैसे ही भगवान् को नागू का संदेश सुना कर प्रणाम् किया उसी क्षण तत्काल प्रभु मंदिर से बहार चले गए और सीधे संत सावता की बाग में चले गए । 
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सावता माली के पास जब प्रभु आये तब प्रभु के दर्शन केवल सावता माली को ही हुए थे..
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उन्हें देख कर संत जी ने विचार किया- इस सुंदर विठू को कहा रखे और क्या करे ? 
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आहाहा ऐसी हलचल उनके मन में होने लगी। श्री कृष्ण तो नटवर है, उनकी लीला कौन समझ सके।  
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प्रभु ने विचित्र लीला की और भगवान् पांडुरंग कृष्ण बोले.. बाबा, मेरे पीछे लोग पड गए है, आप हमको कही छिपा लो। 
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संत जी ने यहाँ वह देखा की कहा छिपावे, परंतु बाग़ तो खुली खुली थी। छुपने कि जगह ही नहीं। 
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संत तो सरल ह्रदय और भोले होते है, बिना कुछ सोच विचार के संत सावता माली ने सब्जी काटने का खुरपा लेकर ह्रदय और पेट के बीच वाले हिस्से को चीर दिया।
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भगवान् पांडुरंग ने अति लघुरूप धारण कर लिया और जाकर सीधे संत सावता माली के हृदय में जाकर बैठ गए। 
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भगवान् भी रंग बिरंगी लीलाये करते है। भगवान् को संत जी के हृदय में रहना बहुत अच्छा लगा। 
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प्रभु हृदय में विलीन हो गए, संत निरंतर अपने हृदय में उस दिव्य ज्योति का दर्शन करने लगे। 
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उनको दर्शन तो आत्मरूप से होता रहता परंतु संत जी सोचने लगे अब हमारी बेटी और पत्नी को दर्शन कैसे हो ?
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भगवान का साकार रूप तो मेरे ह्रदय में विलीन होकर निराकार हो गया, अब उस कृष्ण के रस स्वरुप को प्रकट करके बेटी और पत्नी को दर्शन कैसे करावे ?
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संतो का शरीर ही एक मंदिर है। उनके ह्रदय में भगवान और भक्ति देवी का निवास होता है, अंग अंग में तीर्थ विराजते है।
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संत केवल मंदिर में ही नहीं अपितु कण कण में भगवान् का दर्शन करते है, इस बात की प्रतिष्ठा करने के लिए भगवान ने एक लीला की। 
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पंढरपुर में उस दिन बहुत से वारकरी भक्तो का समूह मंदिर में आया पर प्रभु वहाँ दिखे नहीं। 
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किसको कुछ समझ नहीं आ रहा था। बाद में श्री निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव, सोपानदेव, मुक्ताबाई आदि अनेक महान् संत भी उस दिन भगवान् विट्ठल के दर्शन के लिए पंढरपूर में मंदिर पधारे। 
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अंदर जाकर देखा तो भगवान् मंदिर में नहीं है। भगवान् को ढूंढे कैसे ? 
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संत श्री ज्ञानदेव जी ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और कहा.. चलो, भगवान् अरणगाव में कही गए है।
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भगवान् के कंठ में तुलसी हार तो होता ही है, अंगो से भी सुंदर सुगंधि आती है। सुंगंध के पीछे पीछे चल कर पता लग जायेगा। 
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सब संत मंडली तुलसी की सुगंधि के पीछे चले जा रहे है। चलते चलते आ पहुचे श्री सावता माली जी की बाग में।
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नागू उस समय सावता माली की गोद में सिर रख कर विरह में विट्ठल स्मरण कर रही थी। 
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संतो को देख कर सावता माली आनंद में भर गए और कहने लगे.. आज हमारा भाग्य बड़ा है। हम धन्य हो गए, संतो के चरण से हमारा घर पावन हो गया। 
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नामदेव जी ने कहा.. बाबा आपका भाग्य तो बड़ा ही है ! हमारे चरण यहाँ पधारे इसलिए नहीं ! .. भगवान् पांडुरंग यहाँ आये इसीलिए ! बताओ तो हमारे प्रभु कहा है ?
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संत सावता माली कहने लगे.. मै स्वयं प्रभु की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। यह बालिका ४ दिनों से अन्न जल त्याग कर भगवान् के आने की आस लगाये बैठी है।  
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नामदेव ने कहा.. कुछ भी मत बोलो, ज्ञानदेव जी ने कहा हैं प्रभु यही पर है। असत्य कैसे होगा ? तुमने प्रभु को कहां छुपाया है वो बताओ ?
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सावता माली ने कहा.. मै प्रभु को कहां छुपाऊ ? और प्रभु क्यों छुप के रहेंगे ? भगवान् यदि छुपे होंगे ही तो मेरे हृदय मे ही ! दूसरी जगह कहाँ ? 
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मुझे तो प्रभु सर्वत्र दीखते है, वे कण कण में व्याप्त है। ये फूल पौधे के सब उसके ही रूप।
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ज्ञानदेव बोले.. वाह वाह यहाँ विट्ठल छुपे नहीं यहाँ तो विट्ठल सर्वत्र बिखरे है, सुगंध की तरह। 
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सावता माली बोले.. ज्ञानदेव जी भगवान् का निराकार सर्वव्यापक रूप मेरे और आपके लिए अच्छा है परंतु हमारी पुत्री नागू का समाधान कैसे हो ? 
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उसको तो सगुण साकार रूप ही प्रिय है, इसने विट्ठल दर्शन की रट लगा रखीं है, ४ दिन से अन्न जल कुछ लिया नहीं। इस बालिका का समाधान मै कैसे करू ?
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नामदेव जी कहने लगे.. अभी तो आपने कहा, भगवान आपके हृदय में है। 
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सावता माली ने कहा.. ये भी सत्य है नामदेव जी, यहां वहां क्यों ढूंढना ? आपने अच्छी याद दिलायी। 
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सावता माली ने साग फल काटने वाला खुरपा उठाया और खच्च से छाती पर मारा और कहा.. पांडुरंग विट्ठल मेरे हृदय से बहार आओ और साकार रूप में दर्शन दो। 
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उनके ह्रदय से एक तेजस्वी प्रकाश निकला और सम्पूर्ण बाग में तुलसी की दिव्या सुगंधि व्याप्त हो गयी। 
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भगवान् प्रकट हुए और संत सावता माली मूर्छित हो गए। प्रभु ने अपनी कृपा दृष्टी से उनकी मूर्छा दूर की।
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भगवान् प्रकट हुए तब नागू भाग कर प्रभु के पास गयी और उनसे लिपट गयी। उसने कहा.. विठु, विठु तुम आ गए ? 
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देखो पिता जी विठू आ गया, धनी आ गया। मुझे पता था वह अवश्य आएगा।  
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सब संत मंडली ने हरिनाम संकीर्तन किया, उसके बाद सावता माली ने संतो और प्रभु को भोजन प्रसाद पवाया। 
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भगवान् ने अपनी गोद में नागू को बिठाकर प्रसाद पवाया। 
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नागू ने कहा.. विठु ! अब कही जाना नहीं हां। 
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इस पर नामदेव जी बोले- बेटी यहाँ रहकर कैसे चलेगा, प्रभु को जगत के बहुत कार्य करने होते है। वे व्यस्त होते है।
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नागू ने कहा यह भी ठीक ही है परंतु बीच बीच में आते रहना। ये बाग आपकी ही तो है और हम सब आपके सेवक, आओगे ना ? 
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भगवान् कहने लगे.. क्यों नहीं आऊंगा?तुमने याद किया तब आ जाऊंगा, तुम्हारे प्रेम में बंध आना ही पड़ेगा। 
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सावता माली, जनाबाई को प्रभु ने आशीर्वाद दिया और नागू को लाड़ लड़ा कर प्रभु अंतर्धान हो गए।
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  ((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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कामेंट्स

रेखा Apr 10, 2021
@vijaypandey51 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@govindchouhan 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@mavjibhaipatel 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@somduttsharma2 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@yogi96 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@bhagatram17 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@umashankarpandey3 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@sureshpatel 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@rameshsoni33 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@88152853 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@girishsareen 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

रेखा Apr 10, 2021
@girdharilal122 🍃🍂कुंजबिहारी श्री हरिदास🍂🍃 🌿🌷श्री राधे श्याम सब को मिले❀ वृंदावन धाम शुभ रात्रि वंदन जी🙏🥀 🌼➷➹✧༺♥༻✧➷➹🌼

Ravi Kumar Taneja Apr 10, 2021
💐 हनुमान जी आपको स्वस्थ, समृद्ध और सुखी बनाएँ रखे।💐 ✡प्रभु *बजरंग बली*और न्याय के देवता *शनिदेव* की कृपा आप के ऊपर हमेशा बनी रहे 🙏🌸🙏 श्री मंगलमुर्ती हनुमंतेय नमो नमः🙏 ओम श्री शं शनैश्चराय नमः 🙏🌹🙏 शुभ शनिवार सबका मंगलमय हो ऐसी प्रभु से प्रार्थना 🙏🌹🙏 🌹 *शुभ रात्रि वंदना*🌹 🎻 *राम राम जी*🎻

CG Sahu Apr 11, 2021
ati sunder tasber radhe Krishna nice sweet good morning suredev ki kripa bani reh app sabhi per 👌🏻🌻👌🏻🍵🌹🌷

arvind sharma Apr 11, 2021
जय श्रीराम हर हर महादेव 〽️ 🙏🌷🙏🌷🙏🌷🚩 *👉🏼बिन तूफान🚣🏻‍♂️ के भी डूब गई वो कश्ती जिसमें अहम सवार था*🏊‍♀️🚩 *और डूबते डूबते बच गयी वो कश्ती 🏄🏼‍♀️जिसमें सॉवरियॉ सेठ का प्यार था* 🙏🌷🚩 देवो के देव महादेव आप और आपके परिवार पर असीम, प्यार, आनंद ,मुस्कान , बरसती रहे ! आपका दिन मंगलम सुखद हो !🙏〽️ 💥जय मंगल नाथ 💥

Harpal bhanot Apr 11, 2021
jai Shree radhe Krishna ji 🌷🌷🌷 Beautiful good morning ji have a happy sunday ji

🙏🐅SOM DUTT SHARMA🐅🙏 Apr 11, 2021
🌄☀️🌄☀️🌄☀️🌄🌄 Om suray 🙏 namah g very very sweet good morning 🌄 ji have a nice day g nice 👍 🥪🧇☕🌄☀️🌄☀️🌄☀️🌄☀️🌄🌄🌄🌄🌄❤️🌄

🌷Dev... 🌷 May 6, 2021

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Radha Bansal May 6, 2021

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 3) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण के द्वारा उर्वशी आदि की उत्पत्ति और नारायण के साथ अप्सराओं का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- इस प्रकार अप्सराएँ नम्रतापूर्वक प्रणाम करती हुई अपनी बात कह रही थीं। उनके वचन सुनकर मुनिवर नर और नारायण उत्तर देने में उद्यत हो गये। उस समय उन मुनिश्रेष्ठ के मुखपर प्रसन्नता छायी हुई। थी। काम और लोभ पर वे विजय प्राप्त कर चुके थे। अपनी तपस्या के प्रभाव से उनके सर्वांग की अनुपम शोभा हो रही थी। भगवान् नारायण ने कहा- कहो, हम प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें अभीष्ट वर देने को तैयार हैं । तुम सब लोग सुन्दर नेत्रवाली इस उर्वशी को साथ लेकर स्वर्ग सिधारो। यह बाला तुम्हें भेंटस्वरूप समर्पित है। अतः मन को मुग्ध करने वाली यह अप्सरा अब जाने को तैयार हो जाय। जाँघ से उत्पन्न हुई उस उर्वशी को इन्द्र के प्रसन्नतार्थ हमने उनको दे दिया है। सभी देवताओं का कल्याण हो । अब सब लोग इच्छानुसार यहाँ से पधारने की कृपा करें। अप्सराएँ बोलीं-महाभाग ! आप देवाधिदेव भगवान् नारायण हैं। परमभक्ति के साथ प्रसन्नतापूर्वक हम आपके चरणकमल पर निछावर हो चुकी हैं। अब हम कहाँ जायँ? मधुसूदन! आपकी आँखें कमलपत्र के समान विशाल हैं। प्रभो! यदि आप प्रसन्न हैं और अभिलषित वर देना चाहते हैं तो हम अपना मनोरथ आपके सामने रखती हैं। उत्तम तप करने वाले देवेश! आप हमारे पति बनने की कृपा करें। बस, हमारा यही वर है, जिससे देवेश्वर! हम प्रसन्नतापूर्वक आपकी सेवा करने में संलग्न हो जायँ। और आपने सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी आदि जिन अन्य स्त्रियों को उत्पन्न किया है, वे आपकी आज्ञा मानकर स्वर्ग सिधारें। उत्तम तप करने वाले मुनियो! हम सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहाँ रहें। हम सब आपकी समुचित सेवा करेंगी। देवेश! आप हमारी अभिलाषा पूर्ण करके अपने सत्य व्रत का पालन कीजिये । हम भाग्यवश आपके प्रेम में पगकर स्वर्ग से यहाँ आ गयीं। देवेश! हमें त्याग देना आपको शोभा नहीं देता; जगत्प्रभो! आप सर्वसमर्थ पुरुष हैं। भगवान् नारायण ने कहा- पूरे एक हजार वर्ष तक हमने यहाँ तपस्या की है। सुन्दरियो ! हमारी इन्द्रियाँ वश में हैं। फिर हम उस तप को कैसे नष्ट कर सकते हैं? काम-सम्बन्धी सुख के लिये तो हमारी किंचिन्मात्र भी इच्छा नहीं है; क्योंकि उससे सात्त्विक सुख का सत्यानाश हो जाता है। पाशविक धर्म की तुलना करने वाले मिथुन-धर्म में बुद्धिमान् पुरुष कैसे अपने मन को रमा सकता है? शब्द आदि पाँच अप्सराएँ बोलीं- गुणों के बीच में स्पर्श आता है। इसीसे स्पर्शजनित सुखको सर्वोत्तम माना गया है। अतएव महाराज! हमें सब तरहसे स्पर्शसुख देने के लिये आप वचनबद्ध होने की कृपा करें । फिर निर्भरतापूर्वक सुख भोगकर गन्धमादन पर विचरें । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह अवतार की कथा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वराह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से तृतीय अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया को अवतरित हुए। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ने जब दिति के गर्भ से जुड़वां रूप में जन्म लिया, तो पृथ्वी कांप उठी। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों पैदा होते ही बड़े हो गए। और अपने अत्याचारों से धरती को कपांने लगते हैं। यद्यपि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों बलवान थे, किंतु फिर भी उन्हें संतोष नहीं था। वे संसार में अजेयता और अमरता प्राप्त करना चाहते थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु दोनों ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए बहुत बड़ा तप किया। उनके तप से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए ,ब्रह्मा जी से अजेयता और अमरता का वरदान पाकर हिरण्याक्ष उद्दंड और स्वेच्छाचारी बन गया। वह तीनों लोकों में अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगा। हिरण्याक्ष ने गर्वित होकर तीनों लोकों को जीतने का विचार किया। वह हाथ में गदा लेकर इन्द्रलोक में जा पहुंचा। देवताओं को जब उसके पहुंचने की ख़बर मिली, तो वे भयभीत होकर इन्द्रलोक से भाग गए। देखते ही देखते समस्त इन्द्रलोक पर हिरण्याक्ष का अधिकार स्थापित हो गया। जब इन्द्रलोक में युद्ध करने के लिए कोई नहीं मिला, तो हिरण्याक्ष वरुण की राजधानी विभावरी नगरी में जा पहुंचा। वरुण ने बड़े शांत भाव से कहा - तुम महान योद्धा और शूरवीर हो। तुमसे युद्ध करने के लिए मेरे पास शौर्य कहां? तीनों लोकों में भगवान विष्णु को छोड़कर कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे युद्ध कर सके। अतः उन्हीं के पास जाओ। वे ही तुम्हारी युद्ध पिपासा शांत करेंगे। वरुण का कथन सुनकर हिरण्याक्ष भगवान विष्णु की खोज में समुद्र के नीचे रसातल में जा पजुंचा। रसातल में पहुंचकर उसने एक विस्मयजनक दृश्य देखा। उसने देखा, एक वराह अपने दांतों के ऊपर धरती को उठाए हुए चला जा रहा है। हिरण्याक्ष वराह को लक्ष्य करके बोल उठा,तुम अवश्य ही भगवान विष्णु हो। धरती को रसातल से कहां लिए जा रहे हो? यह धरती तो दैत्यों के उपभोग की वस्तु है। इसे रख दो। तुम अनेक बार देवताओं के कल्याण के लिए दैत्यों को छल चुके हो। आज तुम मुझे छल नहीं सकोगे। फिर भी भगवान विष्णु शांत ही रहे। उनके मन में रंचमात्र भी क्रोध पैदा नहीं हुआ। वे वराह के रूप में अपने दांतों पर धरती को लिए हुए आगे बढ़ते रहे। हिरण्याक्ष भगवान वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया। उन्होंने रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया। हिरण्याक्ष उनके पीछे लगा हुआ था। अपने वचन-बाणों से उनके हृदय को बेध रहा था। भगवान विष्णु ने धरती को स्थापित करने के पश्चात हिरण्याक्ष की ओर ध्यान दिया। उन्होंने हिरण्याक्ष की ओर देखते हुए कहा,तुम तो बड़े बलवान हो। बलवान लोग कहते नहीं हैं, करके दिखाते हैं। तुम तो केवल प्रलाप कर रहे हो। मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं। तुम क्यों नहीं मुझ पर आक्रमण करते? बढ़ो आगे, मुझ पर आक्रमण करो। हिरण्याक्ष की रगों में बिजली दौड़ गई। वह हाथ में गदा लेकर भगवान विष्णु पर टूट पड़ा। भगवान के हाथों में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं था। उन्होंने दूसरे ही क्षण हिरण्याक्ष के हाथ से गदा छीनकर दूर फेंक दी। हिरण्याक्ष क्रोध से उन्मत्त हो उठा। वह हाथ में त्रिशूल लेकर भगवान विष्णु की ओर झपटा। भगवान विष्णु ने शीघ्र ही सुदर्शन का आह्वान किया, चक्र उनके हाथों में आ गया। उन्होंने अपने चक्र से हिरण्याक्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। भगवान विष्णु के हाथों मारे जाने के कारण हिरण्याक्ष बैकुंठ लोक में चला गया। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच तथा च भद्रश्रवा नाम धर्मसुतस्तत्कुल पतयः पुरुषा भद्राश्ववर्षे साक्षाद्भगवतो वासुदेवस्य प्रियां तनुं धर्ममयीं हयशीर्षाभिधानां परमेण समाधिना संनिधाप्येदमभिगृणन्त उपधावन्ति ॥ १ ॥ भद्रश्रवस ऊचुः ॐ नमो भगवते धर्मायात्मविशोधनाय नम इति ॥ २ ॥ अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं मन्तं जनोऽयं हि मिषन्न पश्यति । ध्यायन्नसद्यर्हि विकर्म सेवितुं निर्हत्य पुत्रं पितरं जिजीविषति ॥ ३ वदन्ति' विश्वं कवयः स्म नश्वरं पश्यन्ति चाध्यात्मविदो विपश्चितः । तथापि मुह्यन्ति तवाज मायया सुविस्मितं कृत्यमजं नतोऽस्मि तम् ॥ ४ विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतः युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुतः ॥ ५ वेदान् युगान्ते तमसा तिरस्कृतान् रसातलाद्यो नृतुरङ्गविग्रहः । प्रत्या वै कवयेऽभियाचते तस्मै नमस्तेऽवित थेहिताय इति ॥ ६ हरिवर्षे चापि भगवान्नरहरिरूपेणास्ते । तद्रूपग्रहणनिमित्तमुत्तरत्राभिधास्ये । तयितं रूपं महापुरुषगुणभा महाभागवतो दैत्यदानवकुलतीर्थीकरणशीलाचरितः प्रह्लादोऽ व्यवधानानन्यभक्तियोगेन सह तद्वर्षपुरुषैरुपास्ते इदं चोदाहरति ॥ ७ ॥ ॐ नमो भगवते नरसिंहाय नमस्तेजस्तेजसे आविराविर्भव वज्रनख वज्रदंष्ट्र कर्माशयान् रन्धय 'रन्धय तमो ग्रस ग्रस ॐ स्वाहा । अभयमभयमात्मनि भूयिष्ठा ॐ क्षौम् ॥ ८ ॥ स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी ॥ ९ मागारदारात्मजवित्तबन्धुषु सङ्गो यदि स्याद्भगवत्प्रियेषु नः । यः प्राणवृत्त्या परितुष्ट आत्मवान् सिद्ध्यत्यदूरान्न तथेन्द्रियप्रियः ॥ १० श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन् ! भद्राश्ववर्ष में धर्मपुत्र भद्रश्रवा और उनके मुख्य-मुख्य सेवक भगवान् वासुदेव की हयग्रीवसंज्ञक धर्ममयी प्रिय मूर्ति को अत्यन्त समाधिनिष्ठा के द्वारा हृदय में स्थापित कर इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार स्तुति करते हैं ॥ १ ॥ भद्रश्रवा और उनके सेवक कहते हैं— 'चित्त को विशुद्ध करने वाले ओङ्कार स्वरूप भगवान् धर्म को नमस्कार है' ॥ २ ॥ अहो ! भगवान्‌ की लीला बड़ी विचित्र है, जिसके कारण यह जीव सम्पूर्ण लोकों का संहार करने वाले काल को देखकर भी नहीं देखता और तुच्छ विषयों का सेवन करने के लिये पापमय विचारों की उधेड़-बुन में लगा हुआ अपने ही हाथों अपने पुत्र और पितादि की लाश को जलाकर भी स्वयं जीते रहने की इच्छा करता है ॥ ३ ॥ विद्वान् लोग जगत् को नश्वर बताते हैं और सूक्ष्मदर्शी आत्मज्ञानी ऐसा ही देखते भी हैं; तो भी जन्मरहित प्रभो! आपकी माया से लोग मोहित हो जाते हैं। आप अनादि हैं तथा आपके कृत्य बड़े विस्मयजनक हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥ परमात्मन् ! आप अकर्ता और माया के आवरण से रहित हैं तो भी जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय- ये आपके ही कर्म माने गये हैं। सो ठीक ही है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि सर्वात्मरूप से आप ही सम्पूर्ण कार्यों के कारण हैं और अपने शुद्धस्वरूप में इस कार्य कारणभाव से सर्वथा अतीत हैं ॥ ५ ॥ आपका विग्रह मनुष्य और घोड़े का संयुक्त रूप है। प्रलयकाल में जब तमः प्रधान दैत्यगण वेदों को चुरा ले गये थे, तब ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर आपने उन्हें रसातल से लाकर दिया। ऐसे अमोघ लीला करने वाले सत्यसङ्कल्प आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ६ ॥ हरिवर्षखण्ड में भगवान् नृसिंहरूप से रहते हैं। उन्होंने यह रूप जिस कारण से धारण किया था, उसका आगे (सप्तम (स्कन्ध में) वर्णन किया जायगा। भगवान्‌ के उस प्रिय रूप की महाभागवत प्रह्लाद जी उस वर्ष के अन्य पुरुषों के निष्काम एवं अनन्य भक्तिभाव से उपासना करते हैं। ये प्रह्लादजी महापुरुषोचित गुणों से सम्पन्न हैं तथा इन्होंने अपने शील और आचरण से दैत्य और दानवों के कुल को पवित्र कर दिया है। वे इस मन्त्र तथा स्तोत्र का जप-पाठ करते हैं ॥ ७ ॥ 'ओङ्कारस्वरूप भगवान् श्रीनृसिंहदेव को नमस्कार है। आप अग्नि आदि तेजों के भी तेज हैं, आपको नमस्कार है। हे वज्रनख! हे वज्रदंष्ट्र ! आप हमारे समीप प्रकट होइये, प्रकट होइये; हमारी कर्म-वासनाओं को जला डालिये, जला डालिये। हमारे अज्ञानरूप अन्धकार को नष्ट कीजिये, नष्ट कीजिये। ॐ स्वाहा। हमारे अन्तःकरण में अभयदान देते हुए प्रकाशित होइये। ॐ क्षौम्' ॥ ८ ॥ 'नाथ ! विश्व का कल्याण हो, दुष्टों की बुद्धि शुद्ध हो, सब प्राणियों में परस्पर सद्भावना हो, सभी एक-दूसरे का हितचिन्तन करें, हमारा मन शुभ मार्ग में प्रवृत्त हो और हम सबकी बुद्धि निष्कामभाव से भगवान् श्रीहरि में प्रवेश करे ॥ ९॥ प्रभो ! घर, स्त्री, पुत्र, धन और भाई-बन्धुओं में हमारी आसक्ति न हो; यदि हो तो केवल भगवान्‌ के प्रेमी भक्तों में ही । जो संयमी पुरुष केवल शरीर निर्वाह के योग्य अन्नादि से सन्तुष्ट रहता है, उसे जितना शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है, वैसी इन्द्रियलोलुप पुरुष को नहीं होती ।। १० ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (चौहत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सोमाष्टमी व्रत विधान...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! अब मैं एक दूसरा व्रत बतला रहा हूँ, जो सर्वसम्मत, कल्याणप्रद एवं शिवलोक-प्रापक है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन यदि सोमवार हो तो उस दिन उमासहित भगवान् चन्द्रचूड का पूजन करे। इसके लिये एक ऐसी प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये, जिसका दक्षिण भाग शिवस्वरूप और वाम भाग उमास्वरूप हो। अनन्तर विधिपूर्वक उसे पञ्चामृत से स्नान कराकर उसके दक्षिणभाग में कर्पूरयुक्त चन्दन का उपलेपन करे। श्वेत तथा रक्त पुष्प चढ़ाये और घृत में पकाये गये नैवेद्य का भोग लगाये। पचीस प्रज्वलित दीपकों से उमासहित भगवान् चन्द्रचूड की आरती करे। उस दिन निराहार रहकर दूसरे दिन प्रातः इसी प्रकार पूजन सम्पन्न कर तिल तथा घी से हवन कर ब्राह्मणों को भोजन कराये। यथाशक्ति सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करे और पितरों का भी अर्चन करे। एक वर्ष तक इस प्रकार व्रत करके एक त्रिकोण तथा दूसरा चतुष्कोण (चौकोर) मण्डल बनाये। त्रिकोण में भगवती पार्वती तथा चौकोर मण्डल में भगवान् शंकर को स्थापित करे। तदनन्तर पूर्वोक्त विधि के अनुसार पार्वती एवं शंकर की पूजा करके श्वेत एवं पीत वस्त्र के दो वितान, पताका, घण्टा, धूपदानी, दीपमाला आदि पूजन के उपकरण ब्राह्मण को समर्पित करे और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन भी कराये। ब्राह्मण-दम्पति का वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि से पूजनकर पचीस प्रज्वलित दीपकों से धीरे-धीरे नीराजन करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पाँच वर्षों तक या एक वर्ष ही व्रत करने से व्रती उमासहित शिवलोक में निवास कर अनामय पद प्राप्त करता है। जो पुरुष आजीवन इस व्रत को करता है, वह तो साक्षात् विष्णुरूप ही हो जाता है। उसके समीप आपत्ति, शोक, ज्वर आदि कभी नहीं आते। इतना विधान कहकर भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले – महाराज इसी प्रकार रविवारयुक्त अष्टमी का भी व्रत होता है। उस दिन एक प्रतिमा के दक्षिण भाग में शिव और वाम भाग में पार्वतीजी की पूजा करे। दिव्य पद्मराग से भगवान् शंकर को और सुवर्ण से पार्वती को अलंकृत करे यदि रत्नों की सुविधा न हो सके तो सुवर्ण ही चढ़ाये । चन्दन से भगवान् शिव को और कुंकुम से देवी पार्वती को अनुलिप्त करे। भगवती पार्वती को लाल वस्त्र और लाल माला तथा भगवान् शंकर को रुद्राक्ष निवेदित कर नैवेद्य में घृतपक्व पदार्थ निवेदित करे। शेष सारा विधान पूर्ववत् कर पारण गव्य-पदार्थों से करे । उद्यापन पूर्वरीत्या करना चाहिये। इस व्रत को एक वर्ष अथवा लगातार पाँच वर्ष करने वाला सूर्य आदि लोकों में उत्तम भोग को प्राप्तकर अन्त में परमपद को प्राप्त करता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (तेतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः भुशुण्ड की वास्तविक स्थिति का निरूपण, वसिष्ठजी द्वारा भुशुण्ड की प्रशंसा, भुशुण्ड द्वारा वसिष्ठ जी का पूजन तथा आकाशमार्ग से वसिष्ठजी की स्वलोक प्राप्ति...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भुशुण्ड ने कहा—महामुने ! मैंने प्राणसमाधि के द्वारा पूर्वोक रीति से विशुद्ध परमात्मा में यह चित्त- विश्रामरूप परम शान्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त की है। मैं इस प्राणायाम का अबलम्बन करके दृढ़ता पूर्वक स्थित हूँ । इसलिये सुमेरु पर्वत के विचलित होने पर भी मैं चलायमान नहीं होता । चलते-बैठते, जागते या सोते अथवा स्वप्न में भी मैं अखण्ड ब्रह्माकावृत्ति रूप समाधि से विचलित नहीं होता; क्योंकि तपस्वीयों में महान् वसिष्ठजी ! प्राण और अपान के संयमरूप प्राणायाम के अभ्यास से प्राप्त परमात्मा के साक्षात् अनुभव से मैं समस्त शोकों से रहित आदि कारण परमपद को प्राप्त हो गया हूँ । ब्रह्मन् ! महाप्रलय से लेकर प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश को देखता हुआ मैं ज्ञानवान् हुआ आज भी जी रहा हूँ । जो बात बीत चुकी और जो होने वाली है, उसका मैं कभी चिन्तन नहीं करता । उपर्युक्त प्राणायाविषयक दृष्टि का अपने मन से अवलम्बन करके इस कल्पवृक्ष पर स्थित हूँ । न्याय युक्त जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फलाभिलाषाओं से रहित होकर केवल सुषुप्ति के समान उपरत बुद्धि से अनुष्ठान करता रहता हूँ । प्राण और अपान के संयोगरूप कुम्भक काल में प्रकाशित होने वाले परमात्मतत्त्व का निरन्तर स्मरण करता हुआ मैं अपने आप में स्वयं ही नित्य संतुष्ट रहता हूँ इसलिये मैं दोषरहित होकर चिरकाल से जी रहा हूँ । मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्य में दूसरा सुन्दर पदार्थ प्राप्त करूँगा, इस प्रकार की चिन्ता मुझे कभी नहीं होती। मैं अपने या दूसरे किसी के कार्यों की किसी समय कहीं पर कभी स्तुति और निन्दा नहीं करता। शुभ की प्राप्ति होने पर मेरा मन हर्षित नहीं होता और अशुभ की प्राप्ति होने पर कभी खिन्न नहीं होता; क्योंकि मेरा मन नित्य सम ही रहता है । मुने ! मेरे मन की चञ्चलता शान्त हो गयी है । मेरा मन शोक से रहित, स्वस्थ, समाहित एवं शान्त हो चुका है। इसलिये मैं विकार-रहित हुआ चिरकाल से जी रहा हूँ । लकड़ी, रमणी, पर्वत, तृण, अग्नि, हिम आकाश — इन सबको मैं समभाव से देखता हूँ । जरा और मरण आदि से में भयभीत नहीं होता एवं राज्य प्राप्ति आदि से हर्षित नहीं होता । इसलिये मैं अनामय होकर जीवित हूँ । ब्रह्मन् ! यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरे का है इस प्रकार को भेद-बुद्धि से मैं रहित हूँ । ग्रहण और बिहार करने वाला, बैठने और खड़ा रहने वाला, श्वास तथा निद्रा लेने वाला यह शरीर ही है, आत्मा नहीं—यह मैं अनुभव करता हूँ । इसलिये मैं चिरजीवी हूँ। मैं जो कुछ क्रिया करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ, वह स अहंता-ममता से रहित हुआ ही करता हूँ । मैं दूसरों पर आक्रमण करने में समर्थ हुआ भी आक्रमण नहीं करता, दूसरों के द्वारा खेद पहुँचाये जाने पर भी दुःखित नहीं होता एवं दरिद्र होने पर भी कुछ नहीं चाहता; इसलिये मैं विकार-रहित हुआ बहुत काळ से जी रहा हूँ । मैं आपत्तिकाल में भी चलायमान नहीं होता, वरं पर्वत की तरह अचल रहता हूँ। जगत्-आकाश, देश-काल, परम्परा क्रिया-- इन सबमें चिन्मयरूप से मैं ही हूँ, इस प्रकार की मेरी बुद्धि है; इसलिये मैं विकार रहित हुआ बहुत काळ से स्थित हूँ। ज्ञान के पारंगत ब्रह्मन् ! एकमात्र आपकी आज्ञा का पालन करने के लिये ही धृष्टतापूर्वक मैंने, जो और जैसा हूँ, वह सब आपसे यथार्थरूपसे बता दिया है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Amit Kumar May 6, 2021

हिंदू धर्म में शस्त्र और शास्त्र में ज़्यादा अंतर नही है बल्कि शास्त्र में "आ" की मात्रा लगाकर शस्त्र से ज़्यादा बल दिया गया है| शास्त्र(ग्यान या कलम) सदैव शस्त्र(हथियार) की तुलना मे ज़्यादा आसान, स्थाई, निश्चित तथा प्रभावशाली रहते हैं| हमारे सभी देवी-देवता सदैव शस्त्र तथा शास्त्र दोनों से ही सज्जित रहते है, शायद ही कोई ईश्वर एसा हो जिसके पास अपने निजी किसी विशिष्ट तरह का शस्त्र और शास्त्र ना हो| दोनों साथ होने पर और भी प्रभावी हो जाते हैं, बगैर शस्त्र के शास्त्र का कोई महत्व नही भी रह सकता है, जिस प्रकार बिना भय के प्रीति नही होती उसी प्रकार बगैर शस्त्र के शास्त्रों पर भी कोई ध्यान नही देता है| हिंदू धर्म की योजना ही इस प्रकार की है कि इसमें कभी भी कोई भी हार नही सकता, ना ही हिंदू धर्म को किसी भी धर्म या दर्शन के द्वारा हराया जा सकता है, हिंदू धर्म या दर्शन को केवल स्वयं या अपने प्रतिनिधियों या यूँ कहें कि आलंबरदारों द्वारा ही नुकसान पहुचाया जा सकता है, गया भी है, या एसा रूप रखकर विरोधियों द्वारा किया गया है| फिलहाल तो अंतरराष्ट्रीय गुंडे की व्यवस्था के प्रमुख हथियार आईना और उसकी प्रस्तुत बकवास के उपयोग से कोई कमजोर व्यक्ति भी सभी तरह की काबिलियत को निश्चित रूप से अपने से कमजोर लोगों से हारने के लिए मजबूर कर सकेगा। अपने तथ्यों या तरीकों की स्थापना के लिए केवल विरोधियों की प्रत्याशा में। सादर,

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण के द्वारा उर्वशी आदि की उत्पत्ति और नारायण के साथ अप्सराओं का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ दिव्य अप्सराओं का संगीत, जिसे सुनते ही ध्यान टूट जाय, सुनायी पड़ रहा है। कहीं हमलोगों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र की तो यह करतूत नहीं है? अन्यथा, ऋतुराज वसन्त अकाल में कैसे प्रीति प्रकट कर सकता था ? जान पड़ता है, डरे हुए इन्द्र ने यह विघ्न उपस्थित किया है ! सुगन्ध, शीतल एवं मन को मुग्ध करने वाला पवन शरीर का स्पर्श कर रहा है। इन्द्र के षड्यन्त्र के अतिरिक्त दूसरा कोई कारण इसमें नहीं है। भगवान् नारायण व्यापक पुरुष हैं। वे यों कह ही रहे थे, इतने में ही सारी मण्डली सामने दिखायी दी। उस समय सबमें प्रमुख कामदेव था। नर और नारायण- दोनों ने आश्चर्य से सबको देखा। कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, घृताची, गीतज्ञा, चारुहासिनी, चन्द्रप्रभा, शोभा, विद्युन्माला, अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-सी अप्सराएँ नर-नारायण को दृष्टिगोचर होने लगीं। उन सबकी संख्या सोलह हजार पचास थी। कामदेव की यह विशाल सेना देखकर नर और नारायण बड़े आश्चर्य में पड़ गये । तदनन्तर वे सभी अप्सराएँ उन्हें प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं। वे अप्सराएँ दिव्य आभूषणों से अलंकृत थीं। दिव्य हार उनके गले की शोभा बढ़ा रहे थे। उन सभी के मुख से कपटपूर्ण ऐसे गीत निकल रहे थे, जिनका सुलभ होना धरातल पर असम्भव था। मुनिवर नारायण ने प्रसन्नता पूर्वक उन अप्सराओं से कहा 'सुमध्यमाओ! तुमलोग बड़े आनन्द से यहीं ठहरो। मैं तुम्हारा अद्भुत प्रकार से आतिथ्य सत्कार करने के लिये तैयार हूँ। तुम सभी अतिथि के रूप में स्वर्ग से यहाँ आयी हो।' व्यासजी कहते हैं- उस समय मुनिवर नारायण ने मन में अभिमानपूर्वक सोचा, इन्द्र ने हमारे तप में विघ्न उपस्थित करने के विचार से ही इन्हें यहाँ भेजा है। किंतु इन बेचारी नगण्य अप्सराओं से हमारा क्या बनना-बिगड़ना है। मैं अभी इन सबको आश्चर्य में डालने वाली नयी अप्सराओं की सृष्टि किये देता हूँ। इन अप्सराओं की अपेक्षा उन सबके रूप बड़े ही विलक्षण होंगे। इस समय तपस्या का बल दिखलाना परमावश्यक है। इस प्रकार मन में सोचकर नारायण ने अपना हाथ जंघा पर पटका और तुरंत एक सर्वांगसुन्दरी स्त्री को उत्पन्न कर दिया। नारायण के ऊरुभाग से निकली हुई | वह नारी 'उर्वशी' बड़ी सुन्दरी थी। वहाँ उपस्थित अप्सराओं ने उसे देखा तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उस समय मुनिवर नारायण का मन बिलकुल निश्चिन्त था । जितनी अप्सराएँ वहाँ थीं, उतनी ही अन्य अप्सराएँ सेवा करने के लिये उन्होंने तुरंत उत्पन्न कर दीं। वे सभी अप्सराएँ हाथों में तरह तरह की भेंट सामग्री लिये हँसती और गाती हुई आयीं। उन्होंने मुनिवर नर और नारायण के चरणों में मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। तब स्वर्ग से आयी हुई अप्सराओं ने नर और नारायण से कहा-'अहो! हम मूर्ख स्त्रियाँ आपके तप की महिमा और धीरता देखकर ही आश्चर्य में डूब गयी हैं। महाभाग मुनियो! हमें आपके स्वरूप के विषय में विदित हो गया। आप परम पुरुष भगवान् श्रीहरि के अंशावतार हैं। आप शम-दम आदि सद्गुणों से सदा परिपूर्ण रहते हैं। आपकी सेवा के लिये नहीं; परंतु शतक्रतु इन्द्र का कुछ कार्य था, उसे सिद्ध करने के विचार से ही हमारा यहाँ आना हुआ था। किस भाग्य से हमें आपके दर्शन सुलभ हो गये ? हमने कौन-सा पुण्य कार्य कर रखा था, उसे जानने में हम असमर्थ हैं। किंतु यह मानना तो अनिवार्य है। कि कोई संचित प्रारब्ध अवश्य था। हम निश्चय ही अपराधिनी हैं। फिर भी, हमें अपना जन समझकर आपने मन में शान्ति रखी और हमें तापमुक्त रखा। ठीक ही है, विवेकशील महानुभाव पुरुष तुच्छ शापरूपी फलदान के व्याज से अपनी तपस्या के बल का अपव्यय नहीं करते।' क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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