वेदो का महत्व

वेदो  का महत्व

वेद प्राचीन भारत के साहित्य हैं जो हिन्दुओं के प्राचीनतम और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं। भारतीय संस्कृति में सनातन धर्म के मूल और सब से प्राचीन ग्रन्थ हैं जिन्हें ईश्वर की वाणी समझा जाता है। ये विश्व के उन प्राचीनतम धार्मिक ग्रंथों में हैं जिनके मन्त्र आज भी इस्तेमाल किये जाते हैं।

'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के 'विद्' धातु से बना है, इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान के ग्रंथ' हैं, इसी धातु से 'विदित' (जाना हुआ), 'विद्या' (ज्ञान), 'विद्वान' (ज्ञानी) जैसे शब्द आए हैं। आज 'चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का विवरण इस प्रकार है -

    ऋग्वेद - सबसे प्राचीन वेद - ज्ञान हेतु लगभग १०हज़ार मंत्र । इसमें देवताओं के गुणों का वर्णन और प्रकाश के लिए मन्त्र हैं - सभी कविता-छन्द रूप में ।
    सामवेद - उपासना में गाने के लिये संगीतमय मन्त्र हैं - १९७५ मंत्र।
    यजुर्वेद - इसमें कार्य (क्रिया), यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये गद्यात्मक मन्त्र हैं - ३७५० मंत्र।
    अथर्ववेद - इसमें गुण, धर्म, आरोग्य, यज्ञ के लिये कवितामयी मन्त्र हैं - ७२६० मंत्र ।

वेदों को अपौरुषेय (जिसे कोई व्यक्ति न कर सकता हो, यानि ईश्वर कृत) माना जाता है तथा ब्रह्मा को इनका रचयिता माना जाता है। इन्हें श्रुति भी कहते हैं जिसका अर्थ है 'सुना हुआ'। अन्य हिन्दू ग्रंथों को स्मृति कहते हैं यानि मनुष्यों की बुद्धि या स्मृति पर आधारित। वेद के सबसे प्राचीन भाग को संहिता कहते हैं। वैदिक साहित्य के अन्तर्गत उपर लिखे सभी वेदों के कई आरण्यक, उपनिषद तथा उपवेद आदि भी आते जिनका विवरण नीचे दिया गया है। इनकी भाषा संस्कृत है जो वैदिक संस्कृत कहलाती है और लौकिक संस्कृत से कुछ अलग है। ऐतिहासिक रूप से प्राचीन भारत और हिन्द-आर्य जाति के बारे में वेदों को एक अच्छा सन्दर्भ माना जाता है। संस्कृत भाषा के प्राचीन रूप को लेकर भी इनका साहित्यिक महत्व बना हुआ है।

वेदों को समझना प्राचीन काल में भारतीय और बाद में विश्व भर में एक विवाद का विषय रहा है। इसको पढ़ाने के लिए छः उपांगों की व्यवस्था थी । प्राचीन काल के जैमिनी, व्यास, पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य इत्यादि ऋषियों को वेदों का अच्छा ज्ञाता माना जाता है। मध्यकाल में रचित व्याख्याओं में सायण का रचा भाष्य बहुत मान्य है। यूरोप के विद्वानों का वेदों के बारे में मत हिन्द-आर्य जाति के इतिहास की जिज्ञासा से प्रेरित रही है। अठारहवीं सदी उपरांत यूरोपियनों के वेदों और उपनिषदों में रूचि आने के बाद भी इनके अर्थों पर विद्वानों में असहमति बनी रही है।

प्राचीन काल से भारत में वेदों के अध्ययन और व्याख्या की परम्परा रही है। हिन्दू धर्म अनुसार आर्षयुग में ब्रह्मा से लेकर जैमिनि तक के ऋषि-मुनियों ने शब्दप्रमाण के रूप में इन्हीं को माने हैं और इनके आधार पर अपने ग्रन्थों का निर्माण भी किये हैं। पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, व्यास, पाणिनी आदि को प्राचीन काल के वेदवेत्ता कहते हैं। वेदों के विदित होने यानि चार ऋषियों के ध्यान में आने के बाद इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है । इसी के फलस्वरूप ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, इतिहास आदि महाग्रन्थ वेदों का व्याख्यान स्वरूप रचे गए। प्राचीन काल और मध्ययुग में शास्त्रार्थ इसी व्याख्या और अर्थांतर के कारण हुए हैं। मुख्य विषय - देव, अग्नि, रूद्र, विष्णु, मरुत, सरस्वती इत्यादि जैसे शब्दों को लेकर हुए। वेदवेत्ता महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय हैं। जीव, ईश्वर, प्रकृति इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता है।

कणाद ने "तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्" और "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का भी स्रोत माना है। हिन्दू धर्म अनुसार सबसे प्राचीन नियमविधाता महर्षि मनु ने कहा वेदोऽखिलो धर्ममूलम् - खिलरहित वेद अर्थात् मूल संहिता रूप वेद धर्मशास्त्र का आधार है।

न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यता जानने का एक साधन है। मानव-जाति और विशेषतः आर्यों ने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान वेदों से मिलता है। विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम पुस्तक माना जाता है।आर्य-भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है।

यूनेस्को ने ७ नवम्बर २००३ को वेदपाठ को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया ।

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बाल संस्कार : अपने बच्चों को अवश्य सिखाएं ये दिव्य श्लोक हमारे पुराणों में वर्णित मंत्र-श्लोक अपने बच्चों को जरूर सिखाएं,जीवन की विपरीत परिस्थिति में इनके स्मरण से शक्ति मिलती है.... 1.प्रात: कर-दर्शनम् कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ 2.पृथ्वी क्षमा प्रार्थना समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते। विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमस्व मे॥ 3.त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण ब्रह्मा मुरारी स्त्री पुरान्तकारी भानु: शशि भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनि राहु केतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ 4.स्नान मंत्र गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥ 5.सूर्य नमस्कार ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।। आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ 6.संध्या दीप दर्शन शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तु ते॥ दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥ 7.गणपति स्तोत्र गणपति: विघ्नराजो लम्बतुंडो गजानन:। द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥ विनायक: चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:। द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्॥ विश्वं तस्य भवेद् वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्। विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय। लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥ नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय। गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥ 8.आदिशक्ति वंदना सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ 9.शिव स्तुति कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेन्द्रहारं। सदा वसंतं हृदयारविन्दे, भवं भवानी सहितं नमामि॥ 10. विष्णु स्तुति शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥ 11. श्री कृष्ण स्तुति कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभं। नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले, वेणु करे कंकणम्॥ सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं, कंठे च मुक्तावलि। गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूडामणी॥ मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥ 12.श्रीराम वंदना लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ 13. एक श्लोकी रामायण आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्। वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥ बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद् श्री रामायणम्॥ 14.सरस्वती वंदना या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥ या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्याऽपहा॥ 15.हनुमंत वंदना अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्। दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्। रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥ 16.स्वस्ति-वाचन ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ 17.शांति पाठ ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:, पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॥ॐ शांति: शांति:शांति:॥

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Ajay Verma Aug 13, 2020

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Swami Lokeshanand Aug 12, 2020

कर्म तीन से होता है, इच्छा, अनिच्छा और हरि इच्छा। इच्छा से कर्म हो तो नया प्रारब्ध निर्मित होता है, अनिच्छा से कर्म करना पड़े तो प्रारब्ध कटता है, हरि इच्छा से कर्म होने लगे तो कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है। आएँ विचार करें- हनुमानजी को अभी तक तीन संकेत मिले हैं, जामवंतजी ने कहा- *एतना* करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥" सुरसा ने कहा- "राम काजु *सब* करिहहु" लंकिनी बोली- "प्रबिसि नगर किजे *सब* काजा" तो संशय है कि कितना करें? सीमित या संपूर्ण? यहाँ रावण की प्रताड़ना से त्रस्त सीता माँ आग माँगने लगीं। हनुमानजी को बड़ा रोष आया। विचार करने लगे, कि माँ! तूं आग माँग रही है, मैं ऐसी आग लाकर दूंगा कि लंका ही जल कर राख हो जाएगी। "अपनी जठर आग, बड़ आग सागर की, बन की दावाग्नि को, आग में मिलाई दूँ। यहरउँ से आग रहे, वहरउँ से आग रहे, आग बन अग्नि में, अग्नि लगाई दूँ। कहत पवनसुत आग जो मिली ना तो, सूरज को तोड़फोड़ लंका पे गिराई दूँ॥" सोचा "राम" में तीन अक्षर हैं, र-अ-म। र सूर्य है, अ अग्नि है, म चन्द्र है। माँ विरह में जल रही हैं, मैं चन्द्रमा माँ को दे दूंगा, उसकी शीतलता से उनके विरह की जलन मिट जाएगी। सूर्य भी माँ को दे दूंगा, निराशा का अंधेरा मिट जाएगा। अग्नि मैं रख लूंगा, लंका जलाने के काम आएगी। इस प्रकार रामनाम का संपूर्ण उपयोग हो जाएगा। विचार तो आ गया, पर जामवंतजी की आज्ञा नहीं है, तब क्या करें? प्रतीक्षा करें। सुबह त्रिजटा आई, कहती है- "सपनें वानर लंका जारी" हनुमानजी को लगा मानो अंतर्यामी रामजी ने, उनके मन का विचार जानकर, त्रिजटा के स्वप्न के माध्यम से, उन्हें संदेश दे दिया, कि हनुमानजी बहुत सुंदर विचार है, लगे हाथ यह कार्य भी करते ही आना। पर यह प्रसंग अभी अधूरा है, आगे सविस्तार इस पर चर्चा करेंगे, क्योंकि किसी भी इच्छित कार्य को, अपने मन की इच्छा को, हरि इच्छा के नाम पर लादकर नहीं करना चाहिए। कारण कि यह नियम है कि यदि हरि की ही इच्छा होती है, तो कार्य भी हरि ही कराते हैं। विडियो- हनुमानजी ने लंका नहीं जलाई https://youtu.be/mMri4UzHt-8

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Deepak Aug 12, 2020

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ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पे नाच नचावै,, कृष्ण जन्मोत्सव की अनेकानेक शुभकामनाएं.... अद्भुत है श्रीकृष्ण-चरित्र...... जिनको मुनियों के मनन में नहिं आते देखा। गोकुल में उन्हें गाय चराते देखा। हद नहीं पाते हैं अनहद में भी योगी जिनकी। तीर यमुना के उन्हें वंशी बजाते देखा। जिनकी माया ने चराचर को नचा रखा है गोपियों में उन्हें खुद नाचते गाते देखा। जो रमा के हैं रमण, विश्व के पति ‘राधेश्याम’। ब्रज में आके उन्हैं माखन को चुराते देखा। श्रीकृष्ण चरित्र में अद्भुत विरोधाभास:- भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला में विलक्षणता दिखाई देती है। वह अजन्मा होकर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, सर्वशक्तिमान होने पर भी कंस के कारागार में जन्म लेते हैं। माता पिता हैं देवकी और वसुदेव; किन्तु नन्दबाबा और यशोदा द्वारा पालन किए जाने के कारण उनके पुत्र ‘नंदनन्दन’ और ‘यशोदानन्दन’ कहलाते हैं। राक्षसी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से स्तनपान कराया किन्तु दयामय कृष्ण ने मातावेष धारण करने वाली पूतना को माता के समान सद्गति दे दी, ऐसा अद्भुत और दयालु चरित्र किसी और देवता का नहीं है। योगमाया के स्वामी होने से श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि को बंधन में रखने की क्षमता रखते हैं, फिर भी स्वयं माता के द्वारा ऊखल से बांधे जाते हैं और ‘दामोदर’ कहलाते हैं। तीन पग भूमि मांग कर जिसने राजा बलि को छला वे नन्दभवन की चौखट नहीं लांघ पाते:- तीन पैंड़ भूमि मांगि बलि लियौ छलि, चौखट न लांघी जाय रहयौ सो मचलि। नन्दरायजी नौ लाख गायों के स्वामी और व्रजराज हैं, फिर भी श्रीकृष्ण स्वयं गाय चराने जाते हैं। श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं:- मैया री! मैं गाय चरावन जैहों। तूं कहि, महरि! नंदबाबा सौं, बड़ौ भयौ, न डरैहों॥ जो ‘सहस्त्राक्ष’ हैं, सारे संसार पर जिनकी नजर रहती है, उन श्रीकृष्ण को यशोदामाता डिठौना लगाकर नजर उतारती हैं। आसुरीमाया से श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए रक्षामन्त्रों से जल अभिमन्त्रित कर उन्हें पिलाती हैं; इतना ही नहीं:- देखौ री जसुमति बौरानी, घर-घर हाथ दिखावति डोलति, गोद लियें गोपाल बिनानी।। जगत के पालनहार व पोषणकर्ता होने पर भी श्रीकृष्ण व्रजगोपिकाओं के यहां दधि-माखन की चोरी करते हैं। स्वयं के घर में दूध, दही माखन का भंडार होने पर भी गोपियों से एक छोटा पात्र छाछ की याचना करते हैं और उसके लिए गोपिकाओं के सामने नाचने को तैयार हो जाते हैं:- ब्रज में नाचत आज कन्हैया मैया तनक दही के कारण। तनक दही के कारण कान्हां नाचत नाच हजारन।। नन्दराय की गौशाला में बंधी हैं गैया लाखन। तुम्हें पराई मटुकी को ही लागत है प्रिय माखन।। गोपी टेरत कृष्ण ललाकूँ इतै आओ मेरे लालन। तनक नाच दे लाला मेरे, मैं तोय दऊँगी माखन।। (रसिया) प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है। सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है–‘ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं’ (रसखान) और श्रीकृष्ण एक होकर ही असंख्य गोपियों के साथ असंख्य रूपों में रासक्रीडा करते हैं। परब्रह्म श्रीकृष्ण की लीला से दुर्वासा ऋषि भी हुए भ्रमित:- दुर्वासा ऋषि गोकुल में परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के दर्शनों की अभिलाषा से आते हैं, किन्तु उन्होंने परब्रह्म को किस रूप में देखा–सारे अंग धूलधूसरित हो रहे हैं, केश बिखरे हुए, श्रीअंग पर कोई वस्त्र नहीं, दिगम्बर वेष है, और सखाओं के साथ दौड़े जा रहे हैं। मुनि ने सोचा–’क्या ये ईश्वर हैं? अगर भगवान हैं तो फिर बालकों की भांति पृथ्वी पर क्यों लोट रहे हैं? दुर्वासा ऋषि भगवान की योगमाया से भ्रमित होकर कहने लगे ’नहीं, ये ईश्वर नहीं ये तो नन्द का पुत्रमात्र है।’ प्रकृति की पाठशाला से पढ़ा जीवन का पाठ:- यह एक विलक्षण बात थी कि राज-परिवार के स्नेह-सत्कार को छोड़कर गोपों के बीच जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ने के लिए भगवान कृष्ण मथुरा से गोकुल आ गए। जिस व्यक्ति को आगे चलकर राजनीति की दृढ़ स्थापना और एक उच्च जीवनदर्शन स्थापित करना था; उन्होंने अपना आरम्भिक जीवन बिताने के लिए गो-पालकों का नैसर्गिक जीवन और प्रकृति का सुन्दर वातावरण चुना क्योंकि उन्हें पहले पृथ्वी से सहज रस लेना था। अत: वन उनकी पहली पाठशाला थी और उनके शिक्षक मुक्त और निर्भीक गो-पालक थे। सांदीपनि ऋषि की पाठशाला में दाखिल होने से पहले ही वे जीवन की पाठशाला से स्नातक हो चुके थे। वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। मुरली का माधुर्य और पांचजन्य-शंख का घोर निनाद:- श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में हृदय को विमुग्ध करने वाली बांसुरी और शौर्य के प्रतीक सुदर्शन चक्र का अद्भुत समन्वय हुआ है। कहां तो यमुनातट और निकुंज में मुरली के मधुरनाद से व्रजबालाओं को आकुल करना और कहां पांचजन्य-शंख के भीषण निनाद से युद्धक्षेत्र को प्रकम्पित करना। अपने मुरलीनाद से जहां उन्होंने धरती के सोये हुए भाव जगाये; वहीं पांचजन्य के शंखनाद से, कौमोदकी गदा के भीषण प्रहार से, शांर्गधनुष के बाणों के आघात से, धूमकेतु के समान कृपाण से और अनन्त शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से भारतभूमि को अत्याचारी, अधर्मी व लोलुप राजाओं से विहीन कर दिया। अतुल नेतृत्व-शक्ति रखते हुए भी दूत और सारथि का काम किया और युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजा के योग्य माने जाने पर भी जूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। चरित्र की ऐसी विलक्षणता और कहीं देखने को नहीं मिलती। श्रीकृष्ण का अद्भुत अनासक्ति योग:- श्रीकृष्ण की जीवन को तटस्थ (सम) भाव से देखने की प्रवृति की शुरुआत तो जन्मकाल से ही हो गयी थी। जन्म से ही माता-पिता की ममता छोड़ नन्द-यशोदा के घर रहे। सहज स्नेह रखने वाली गोपियों से नाता जोड़ा और उन्हें तड़पता छोड़ मथुरा चले गए। फिर मथुरा को छोड़ द्वारका चले आए परन्तु यदुकुल में कभी आसक्त नहीं रहे। कोई भी स्नेह उन्हें बांध न सका। पाण्डवों का साथ हुआ पर पाण्डवों को महाभारत का युद्ध जिताकर उन्हें छोड़कर चले गए। पृथ्वी का उद्धार किया और पृथ्वी पर प्रेमयोग व गीता द्वारा ज्ञानयोग की स्थापना की; पर पृथ्वी को भी चुपचाप, निर्मोही होकर छोड़कर चले गये। ममता के जितने भी प्रतीक हैं, उन सबको उन्होंने तोड़ा। गोरस (दूध, दही, माखन) की मटकी को फोड़ने से शुरु हुआ यह खेल, कौरवों की अठारह अक्षौहिणी सेना के विनाश से लेकर यदुकुल के सर्वनाश पर जाकर खत्म हुआ। द्वारकालीला में सोलह हजार एक सौ आठ रानियां, उनके एक-एक के दस-दस बेटे, असंख्य पुत्र-पौत्र और यदुवंशियों का लीला में एक ही दिन में संहार करवा दिया, हंसते रहे और यह सोचकर संतोष की सांस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया। क्या किसी ने ऐसा आज तक किया है? वही श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा उद्धवजी को व्रज में भेजते समय कहते हैं–’उद्धव! तुम व्रज में जाओ, मेरे विरह में गोपिकाएं मृतवत् पड़ी हुईं हैं, मेरी बात सुनाकर उन्हें सांन्त्वना दो।’ भगवान की सारी लीला में एक बात दिखती है कि उनकी कहीं पर भी आसक्ति नहीं है। इसीलिए महर्षि व्यास ने उन्हें प्रकृतिरूपी नटी को नचाने वाला सूत्रधार और ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ कहा है। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय माता अपनी गोद श्रीकृष्ण के बालरूप (गोपालजी) से ही भरना चाहती है और प्रत्येक स्त्री अपने प्रेम में उसी निर्मोही के मोहनरूप की कामना करती है। रम रहे विश्व में, फिर भी रहते हो न्यारे-न्यारे। पर सुना प्रेम के पीछे फिरते हो मारे-मारे,, जय श्री कृष्ण राधे राधे ( प्रेषक अज्ञात )

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Anita sharma Aug 11, 2020

*🌹जन्माष्टमी का शुभ मुहूर्त कब मनाएं* 🌹 भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि ,रोहिणी नक्षत्र ,चंद्र वृषभ राशि पर होने पर अति विशेष जयंती नाम शुभ मुहूर्त मैं हमारे तारणहार प्रभु कृष्ण का जन्म हुआ था। यह बहुत ही महत्वपूर्ण शुभ महा संयोग माना जाता है ।लेकिन इस साल जन्माष्टमी की तारीख को लेकर दो मत हैं। पंचांगों में 11 और 12 अगस्त को जन्माष्टमी बताई गई है। भारतवर्ष के अनेक विद्वानों ने परस्पर विचार विमर्श कर सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया है कि 12 अगस्त को ही जन्मोत्सव ,जन्माष्टमी मनाना उत्तम और श्रेष्ठ है। मथुरा- वृंदावन- गोकुल और द्वारिका में 12 अगस्त को जन्मोत्सव मनाया जाएगा। जबकि जगन्नाथ पुरी, काशी और उज्जैन में 11 अगस्त को ऋषिकेश हरिद्वार में रोहिणी नक्षत्र युक्त 13 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। *🌹जन्माष्टमी पूजन का समय व शुभ मुहूर्त*🌹 💐 11 अगस्त 2020 मंगलवार को प्रातः 9 बज के:07 पर अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी इस दिन कृतिका नक्षत्र, चंद्रमा मेष राशि में, सूर्य कर्क राशि में,और वृद्धि योग है। अत सभी ( स्मार्त) गृहस्थी कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत इसी दिन रखेंगे। रात्रि में पूजा का समय 11 अगस्त की रात्रि 12 अगस्त की सुबह 12:05 से लेकर 12:47 तक शुभ पूजा का समय है।राहुकाल दिन में 3:00 बजे से लेकर 4:30 बजे तक रहेगा।और 12 अगस्त 2020 बुधवार को उदय कालीन अष्टमी है 11 बज के 17 मिनट तक रहेगी कृतिका नक्षत्र, वृष राशि के चंद्रमा मैं नवमी युक्त वैष्णवों को जन्माष्टमी एवं जन्मोत्सव मनाना श्रेष्ठ एवं उत्तम रहेगा राहु कॉल 12:00 बजे से लेकर 1:30 बजे तक रहेगा। श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत तथा श्री कृष्ण जन्मोत्सव यह दोनों अलग-अलग स्थितियां है, अतः जन्मोत्सव 12 अगस्त बुधवार को ही मनाया जाएगा। *💐🌹स्मार्त और वैष्णव में भेद*🌹💐 स्मार्त — श्रुति- स्मृति, पुराण, वेद, आदि शास्त्रों को मानने वाले धर्मानुलम्बी, धर्मपरायण समस्त गृहस्थी लोग स्मार्त कहलाते हैं। वैष्णव— वह धर्म परायण जो वैष्णव संप्रदाय से दीक्षित हो गले में कंठी व चंदन धारण किया हो मस्तक पर ऊर्द्धपुण्ड त्रिपुंड चंदन लगाया हो किसी विशिष्ट संप्रदाय के साधु सन्यासी तथा विदुषी एवं विधवाओं ने सन्यास धारण कर लिया हो वह सभी भक्तजन वैष्णव कहलाते हैं। धर्म सिंधु के अनुसार– एकादशी एवं अष्टमी के व्रत- उपवास सभी स्मार्त एवं गृहस्ती जन तिथि के प्रारंभ को ग्रहण कर व्रता व्रतादि करते हैं। लेकिन विधवा एवं वैष्णव संप्रदाय से संबंधित परवर्ती तिथि को ग्रहण कर उपवास व्रत आदि कर्म करते हैं। "स्मार्तानां ग्रहाणां पूर्वो पोष्या। यतिर्भि : निष्काम गृहिभि:" वनस्थौ:विधवाभि वैष्णवैश्च परैवोपोष्या।। *💐🌹 जयंती नाम योग में प्रभु का जन्म*🌹💐 श्री कृष्ण जी का जन्म विष्णु जी के आठवें अवतार के रूप में हुआ, पापी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में अष्टमी तिथि रोहिणी नक्षत्र के महा सयोग से जयंती नाम योग में, आज से 5126 वर्ष पूर्व रात्रि के 12:00 बजे शून्यकाल में”अवतरण हुआ। *💐🌹 लड्डू गोपाल जी का श्रृंगार करें*🌹💐 लड्डू गोपाल जी के सिंगार में, सिर पर मुकुट ,उनके कानों में बाली, कलाई में कड़ा, हाथों में बांसुरी, पारिजात एवं वैजयंती के फूल अति प्रिय हैं,सुगंधित गोपी चंदन से तिलक करें पूजा में राखी रखें ,मोर पंख अवश्य होना चाहिए। *🌹 लड्डू गोपाल जी को भोग में प्रिय सामग्री*🌹 💐 कान्हा को माखन चोर के नाम से जाना जाता है इसलिए माखन, मिश्री, तुलसी, एवं धनिया की पंजीरी पंचमेवा मिश्रित , का भोग लगाएं। उससे पूर्व पंचामृत से स्नान कराकर , वह चरणामृत प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। *💐🌹व्रत परायण के बाद दान करें* 🌹💐 व्रत का पारण करने के पश्चात वस्तुओं का दान करने से दीर्घायु, सुख, शांति, समृद्धि,भगवान कृष्ण की कृपा से मनोकामना पूर्ति ,मन इच्छित वरदान,के साथ-साथ लक्ष्मी जी की अपार कृपा बरसती है। श्री कृष्ण जी पीतांबर धारी है अत: पीला वस्त्र,पीला अन्न स्वर्ण रजत, दान ब्राह्मण को करना श्रेयस्कर श्रेष्ठ उत्तम है।। *💐💥 मतभेद का कारण💥💐* इसका कारणः कृष्ण जन्म की तिथि और नक्षत्र का एक साथ नहीं मिल रहे। 11 अगस्त को अष्टमी तिथि सूर्योदय के बाद लगेगी, लेकिन पूरे दिन और रात में रहेगी। किंतु चंद्रमा वृष राशि पर एवं उदय कालीन अष्टमी तिथि 12 अगस्त को है किंतु रात्रि में अष्टमी नहीं है भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इस साल जन्माष्टमी पर्व पर श्रीकृष्ण की तिथि और जन्म नक्षत्र का संयोग नहीं बन रहा है। सभी धर्म प्रेमी एवं कृष्ण भक्त शास्त्र सम्मत मूर्धन्य विद्वानों के परामर्श अनुसार भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव श्रद्धा भक्ति पूर्वक 12 अगस्त को ही मनाएंगे जय श्री राधे 💐🌹*“हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की”💐🌹 💐 “नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की “💐

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