नवरात्रि के तृतीय दिवस माँ चंद्रघंटा की उपासना विधि एवं फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।। माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन माँ के चंद्रघंटा विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है। माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं। माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है। मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है। माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं। माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं। माता चंद्रघंटा की कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला. असुरों का स्‍वामी महिषासुर था और देवाताओं के इंद्र. महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्‍त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्‍वर्गलोक पर राज करने लगा। इसे देखकर सभी देवतागण परेशान हो गए और इस समस्‍या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्र‍िदेव ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के पास गए। देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्‍हें बंधक बनाकर स्‍वयं स्‍वर्गलोक का राजा बन गया है। देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्‍याचार के कारण अब देवता पृथ्‍वी पर विचरण कर रहे हैं और स्‍वर्ग में उनके लिए स्‍थान नहीं है। यह सुनकर ब्रह्मा, विष्‍णु और भगवान शंकर को अत्‍यधिक क्रोध आया. क्रोध के कारण तीनों के मुख से ऊर्जा उत्‍पन्‍न हुई. देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई. यह दसों दिशाओं में व्‍याप्‍त होने लगी। तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ. भगवान शंकर ने देवी को त्र‍िशूल और भगवान विष्‍णु ने चक्र प्रदान किया. इसी प्रकार अन्‍य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्‍त्र शस्‍त्र सजा दिए. इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया. सूर्य ने अपना तेज और तलवार दिया और सवारी के लिए शेर दिया। देवी अब महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं. उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर यह समझ गया कि अब उसका काल आ गया है. महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा. अन्‍य देत्‍य और दानवों के दल भी युद्ध में कूद पड़े। देवी ने एक ही झटके में ही दानवों का संहार कर दिया. इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्‍य बड़े दानवों और राक्षसों का संहार मां ने कर दिया. इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से अभयदान दिलाया। उपासना मन्त्र एवं विधि 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें। हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में तृतीय दिन इसका जाप करना चाहिए। इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए। माँ चंद्रघंटा ध्यान मन्त्र 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्। सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥ मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥ प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्। कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ माँ चंद्रघंटा स्तोत्र पाठ 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्। अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥ चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्। धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥ नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्। सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥ माँ चंद्रघंटा कवच 〰️〰️🌼〰️〰️ रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने। श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥ बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं। स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥ कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥ कर्ज से मुक्ति के उपाय 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ कर्जें से मुक्ति के लिए क्या उपाय करें। संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी ऋण से पीछा नहीं छुट रहा हो तो 108 गुलाब के पुष्प ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चं फट् स्वाहा मंत्र बोलते हुए भगवती चंद्रघंटा के श्री चरणों में अर्पित करें। सवा किलो साबुत मसूर लाल कपड़ें में बांधकर अपने सामने रख दें। घी का दीपक जलाकर ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चंद्रघण्टे हुं फट् स्वाहा। इस मंत्र का जाप 108 बार करें। मसूर को अपने ऊपर से 7 बार उसार कर सफाई कर्मचारी को दान में दे दें। कर्जें से छुटकारा मिलने की संभावना बढ़ेगी। माँ चंद्रघंटा की आरती 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥ चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥ क्रोध को शांत बनाने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली॥ मन की मालक मन भाती हो। चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥ सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥ हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥ मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥ पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥ कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥ भक्त की रक्षा करो भवानी। माँ दुर्गा की आरती 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय… मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय… कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय… केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी । सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय… कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय… शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय… चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे । मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय… ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय… चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू । बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय… तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता । भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय… भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी । >मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय… कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय… श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय… 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

नवरात्रि के तृतीय दिवस माँ चंद्रघंटा की उपासना विधि एवं फल
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।।

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन माँ के चंद्रघंटा विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।

माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।

माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं।

माता चंद्रघंटा की कथा
〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️
देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला. असुरों का स्‍वामी महिषासुर था और देवाताओं के इंद्र. महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्‍त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्‍वर्गलोक पर राज करने लगा।
इसे देखकर सभी देवतागण परेशान हो गए और इस समस्‍या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्र‍िदेव ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के पास गए।
देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्‍हें बंधक बनाकर स्‍वयं स्‍वर्गलोक का राजा बन गया है।
देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्‍याचार के कारण अब देवता पृथ्‍वी पर विचरण कर रहे हैं और स्‍वर्ग में उनके लिए स्‍थान नहीं है।
यह सुनकर ब्रह्मा, विष्‍णु और भगवान शंकर को अत्‍यधिक क्रोध आया. क्रोध के कारण तीनों के मुख से ऊर्जा उत्‍पन्‍न हुई. देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई. यह दसों दिशाओं में व्‍याप्‍त होने लगी।
तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ. भगवान शंकर ने देवी को त्र‍िशूल और भगवान विष्‍णु ने चक्र प्रदान किया. इसी प्रकार अन्‍य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्‍त्र शस्‍त्र सजा दिए.
इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया. सूर्य ने अपना तेज और तलवार दिया और सवारी के लिए शेर दिया।
देवी अब महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं. उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर यह समझ गया कि अब उसका काल आ गया है. महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा. अन्‍य देत्‍य और दानवों के दल भी युद्ध में कूद पड़े।
देवी ने एक ही झटके में ही दानवों का संहार कर दिया. इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्‍य बड़े दानवों और राक्षसों का संहार मां ने कर दिया. इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से अभयदान दिलाया।

  उपासना	मन्त्र एवं विधि
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके माँ चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं। हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है।
प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में तृतीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।

माँ चंद्रघंटा ध्यान मन्त्र
〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

 माँ चंद्रघंटा स्तोत्र पाठ 
〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️
आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

माँ चंद्रघंटा कवच
〰️〰️🌼〰️〰️
रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥

कर्ज से मुक्ति के उपाय
〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️
कर्जें से मुक्ति के लिए क्या उपाय करें।
संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी ऋण से पीछा नहीं छुट रहा हो तो 108 गुलाब के पुष्प ॐ  
ऐं ह्रीं श्रीं चं फट् स्वाहा मंत्र बोलते हुए भगवती चंद्रघंटा के श्री चरणों में अर्पित करें। सवा किलो साबुत मसूर लाल कपड़ें में बांधकर अपने सामने रख दें। घी का दीपक जलाकर ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चंद्रघण्टे हुं फट् स्वाहा। इस मंत्र का जाप 108 बार करें। मसूर को अपने ऊपर से 7 बार उसार कर सफाई कर्मचारी को दान में दे दें। कर्जें से छुटकारा मिलने की संभावना बढ़ेगी।

  माँ चंद्रघंटा की आरती
〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️
जय माँ चन्द्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे काम॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती।
चन्द्र तेज किरणों में समाती॥
क्रोध को शांत बनाने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली॥
मन की मालक मन भाती हो।
चंद्रघंटा तुम वर दाती हो॥
सुन्दर भाव को लाने वाली।
हर संकट में बचाने वाली॥
हर बुधवार को तुझे ध्याये।
श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥
मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।
शीश झुका कहे मन की बाता॥
पूर्ण आस करो जगत दाता।
कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥
कर्नाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटू महारानी॥
भक्त की रक्षा करो भवानी।

   माँ दुर्गा की आरती
〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️
जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय…

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय…

कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय…

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय…

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय…

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय…

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय…

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय…

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू ।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय…

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता ।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय…

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी ।
>मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय…

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय…

श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय…
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+27 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 28 शेयर

गुरु शिष्य सम्बन्ध की आवश्यक बाते (पुनः प्रेषित) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गुरु दीक्षा क्या है..? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ​दीक्षा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द दक्ष से हुई है जिसका अर्थ है कुशल होना। समानार्थी अर्थ है - विस्तार। इसका दूसरा स्रोत दीक्ष शब्द है जिसका अर्थ है समर्पण ​अतः दीक्षा का सम्पूर्ण अर्थ हुआ - स्वयं का विस्तार। दीक्षा के द्वारा शिष्य में यह सामर्थ्य उत्पन्न होती है कि गुरु से प्राप्त ऊर्जा के द्वारा शिष्य के अंदर आतंरिक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है , जिसके प्रकाश में वह अपने अस्तित्व् के उद्देश्य को देख पाने में सक्षम होता है। ​​दीक्षा से अपूर्णता का नाश और आत्मा की शुद्धि होती है। गुरु का ईश्वर से साक्षात सम्बन्ध होता है। ऐसा गुरु जब अपनी आध्यात्मिक/प्राणिक ऊर्जा का कुछ अंश एक समर्पित शिष्य को हस्तांतरित करता है तो यह प्रक्रिया गुरु दीक्षा कहलाती है। यह आध्यात्मिक यात्रा की सबसे प्रारम्भिक सीढ़ी है। गुरु दीक्षा के उपरांत शिष्य गुरु की आध्यात्मिक सत्ता का उत्तराधिकारी बन जाता है। गुरु दीक्षा एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे गुरु और शिष्य के मध्य आत्मा के स्तर पर संबंद्ध बनता है जिससे गुरु और शिष्य दोनों के मध्य ऊर्जा का प्रवाह सहज होने लगता है। गुरु दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य दोनों का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। गुरु का उत्तरदायित्व समस्त बाधाओं को दूर करते हुए शिष्य को आध्यात्मिकता की चरम सीमा पर पहुचाना होता है। वहीं शिष्य का उत्तरदायित्व हर परिस्थिति में गुरु के द्वारा बताये गए नियमों का पालन करना होता है। दीक्षा कब मिलती है? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जब हमारा अंतःकरण (मन) शुद्ध हो जाता है तब दीक्षा मिलती है। शुद्ध का मतलब संछेप में समझिये जब अंतःकरण (मन) एक भोले भाले बच्चे की तरह हो जाता है, वह बच्चा न तो किसी के बारे में बुरा सोचता है न तो किसी के बारे में अच्छा सोचता है, अर्थात संसार से उस बच्चे का मन ना तो राग (प्रेम) करता है और ना तो द्वेष (दुश्मनी) करता है। जब किसी वक्ति का अंतःकरण भगवान में मन लगाकर, इस अवस्था पर पहुँच जाता है। तब वास्तविक गुरु आपके अंतःकरण को दिव्य बनायेगा। तब वास्तविक गुरु अथवा संत अथवा महापुरुष आपको गुरु मंत्र या दीक्षा देता है। अब दीक्षा का समय आया है, जब अंतःकरण शुद्ध हो गया। इससे पहले दीक्षा नहीं दी जा सकती। क्योंकि हमारा अंतःकरण उस अलौकिक शक्ति को सम्हाल (सहन)नहीं सकता। अगर कोई गुरु अथवा महापुरुष बिना अधिकारी बने किसी को जबरदस्ती दीक्षा देदें, तो उस व्यक्ति का शरीर फट के चूर-चूर हो जाये। वह अनाधिकारी व्यक्ति सहन नहीं सकता। हमारा (माया अधीन जिव) का अंतःकरण इतना कमजोर है की उस दीक्षा (अलौकिक शक्ति/ दिव्य आनंद, दिव्य प्रेम आनंद) को सहन नहीं कर सकता। हम लोग संसार के सुख और दुःख को ही नहीं सम्हाल (सहन) कर सकते है। जैसे एक गरीब को करोड़ की लॉटरी खुल जाये, तो वह बेहोश हो जाता है, किसी की प्रेमिका प्रेमी अथवा माता पिता संसार छोड़ देते है, तो उसका दुःख भी वह व्यक्ति नहीं सम्हाल पता है। तो यह जो अलौकिक शक्ति (दिव्य आनंद) है इसे कोई क्या सम्हाल पायेगा। ये दीक्षा अनेक प्रकार से दी जाती है। अगर वह दीक्षा बोल के दी जाये तो उसे हमलोग गुरु मंत्र कहते है। वास्तविक गुरुओं ने अनेक तरीकों से दीक्षा दिया है, कभी कान में बोल के, आँख से देख के, गले लगा के यहाँ तक फूक मर कर दिया है। दीक्षा देना है, किसी बहाने देदें, चाहे एक घुसा मार के देदें। दीक्षा देने में यह आवश्यक नहीं है की कान से दिया जाये। गौरांग महाप्रभु ने गले लगा के दीक्षा दिया है। दीक्षा के प्रकार 〰️〰️〰️〰️〰️ स्पर्श दीक्षा , दृग दीक्षा , मानस दीक्षा शक्ति , शाम्भवी , मांत्रिक दीक्षा स्पर्श दीक्षा 〰️〰️〰️〰️ जैसे पक्षी अपने सुंदर पंखों से धीरे-धीरे शिशुओं की वृद्धि करता है, इस प्रकार की दीक्षा को स्पर्श दीक्षा कहते हैं। अर्थात् शिष्य को छूने मात्र से शिष्य में शक्तिपात करते हैं। दृग दीक्षा 〰️〰️〰️ योग्य गुरु अपने कृपा पात्र शिष्य की निष्ठा से प्रसन्न होकर अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर संकल्प करके दृग दीक्षा देते है। उदाहरण के लिये जैसे मछली अपने बच्चों को देखने मात्र से पोषण करती है, इस प्रकार जो गुरु देखने मात्र से शक्तिपात करते हैं, उसे दृग-दीक्षा कहते हैं। मानस दीक्षा 〰️〰️〰️〰️ मानस दीक्षा को संकल्प दीक्षा भी कहते हैं। इसमें देशकाल का व्यवधान नहीं होता। सद्गुरु चाहे जहाँ हों और शिष्य उनसे चाहे कितनी ही दूर हो, सद्गुरु अपने संकल्प मात्र से शिष्य में शक्तिपात कर देते हैं। इसमें यह भी आवश्यक नहीं है कि शिष्य ने सद्गुरु के दर्शन किए हों या विधिवत् प्रार्थना की हो कि मुझे दीक्षित करें। शक्ती दीक्षा 〰️〰️〰️〰️ गुरु योगमार्ग से शिष्य के शरीर में प्रवेश करके उसके अंत:करण में ज्ञान उत्पन्न करके जो ज्ञानवती दीक्षा देते हैं, वह शक्ती दीक्षा कहलाती है। शाम्भवी दीक्षा 〰️〰️〰️〰️ गुरु के दृष्टिपात मात्र से, स्पर्ष से तथा बातचीत से भी जीव को पाश्बंधन को नष्ट करने वाली बुद्धि एवं ईश्वर के चरणों में अनन्य प्रेम की प्राप्ति होती है। प्रकृति (सत, रज, तम गुण), बुद्धि, त्रिगुणात्मक अहंकार एवं शब्द, रस, रूप, गंर्ध स्पशज़् (पांच तन्मात्राएं), इन्हें आठ पाश कहा गया है। इन्हीं से शरीरादी संसार उत्पन्न होता है। इन पाशों का समुदाय ही महाचक्र या संसारचक्र है और परमात्मा इन प्रकृति आदि आठ पाशों से परे है। गुरु द्वारा दी गई योग दीक्षा से यह पाश क्षीण होकर नष्ट हो जाता है। मान्त्री दीक्षा 〰️〰️〰️〰️ मान्त्री दीक्षा में पहले यज्ञमंडप और हवनकुंड बनाया जाता है। फिर गुरु बाहर से शिष्य का संस्कार (शुद्धि) करते हैं। शक्तिपात के अनुसार शिष्य को गुरु का अनुग्रह प्राप्त होता है। जिस शिष्य में गुरु की शक्ति का पात नहीं हुआ, उसमें शुद्धि नहीं आती, उसमें न तो विद्या, न मुक्ति और न सिद्धियां ही आती हैं। इसलिए शक्तिपात के द्वारा शिष्य में उत्पन्न होने वाले लक्षणों को देखकर गुरु ज्ञान अथवा क्रिया द्वारा शिष्य की शुद्धि करते हैं। उत्कृष्ट बोध और आनंद की प्राप्ति ही शक्तिपात का लक्षण (प्रतीक) है क्योंकि वह परमशक्ति प्रबोधानन्दरूपिणी ही है। गुरु दीक्षा कौन दे सकता है 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गुरु शब्द का अर्थ है जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाये। एक सम्पूर्ण जागृत गुरु, जो की सहस्त्र्सार चक्र में स्थित हो वही दीक्षा देने का अधिकारी होता है। ऐसे गुरु की पहचान उनके व्यवहार से होती है। ऐसे गुरु सबके लिए करुणामय होते है। उनका ज्ञान अभूतपूर्व होता है। जागृत गुरु अहंकार, काम, क्रोध, लोभ और मोह से दूर रहते है। वह शिष्य की किसी भी समस्या और परिस्थिति का समाधान निकालने में सक्षम होते है। ऐसे गुरु का ध्यान अत्यंत उच्च कोटि का होता है। गुरु दीक्षा किसको दी जाती है 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शिव पुराण में भगवान् शिव माता पार्वती को ​योग्य शिष्य को ​​​दीक्षा ​ देने ​के महत्त्व को इस प्रकार समझाते है - हे वरानने ! आज्ञा हीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन तथा विधि के पालनार्थ दक्षिणा हीन जो जप किया जाता है वह निष्फल होता है। इस वाक्य से गुरु दीक्षा का महत्त्व स्थापित होता है। दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य एक दुसरे के पाप और पुण्य कर्मों के भागी बन जाते है। शास्त्रो के अनुसार गुरु और शिष्य एक दूसरे के सभी कर्मों के छठे हिस्से के फल के भागीदार बन जाते है , यही कारण है कि दीक्षा सोच समझकर ही दी जाती है। अब प्रश्न यह उठता है कि दीक्षा के योग्य कौन होता है? धर्म अनुरागी, उत्तम संस्कार वाले और वैरागी व्यक्ति को दीक्षा दी जाती है। दीक्षा के उपरान्त आदान प्रदान की प्रक्रिया गुरु और शिष्य दोनों के सामर्थ्य पर निर्भर करती है। दीक्षा में गुरु के सम्पूर्ण होने का महत्व तो है ही किन्तु सबसे अधिक महत्व शिष्य के योग्य होने का है। क्योंकि दीक्षा की सफलता शिष्य की योग्यता पर ही निर्भर करती है। शिष्य यदि गुरु की ऊर्जा और ज्ञान को आत्मसात कर अपने जीवन में ना उतार पाये अर्थात क्रियान्वित ना करे तो श्रेष्ठ प्रक्रिया भी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए अधिकांशतः गुरु शिष्य के धैर्य, समर्पण और योग्यता का परीक्षण एक वर्ष तक ​या इससे भी अधिक अवधि तक विभिन्न विधियों से करने के उपरान्त ही विशेष दीक्षा देते है। ऐसी दीक्षा मन, वचन और कर्म जनित पापों का क्षय कर परम ज्ञान प्रदान करती है। शिष्य को किस प्रकार की दीक्षा दी जाए इसका निर्धारण गुरु शिष्य की योग्यता और प्रवृत्ति के अनुसार करता है। दीक्षा का प्रथम चरण है मंत्र द्वारा दीक्षा। जब शिष्य अपनी मनोभूमि​ को तैयार कर, सामर्थ्य, योग्यता, श्रद्धा, त्यागवृत्ति​ ​के द्वारा मंत्रो को सिद्ध कर लेता है तो​ ​दीक्षा के अगले चरण में पहुंच जाता है। अगला स्तर प्राण दीक्षा/ शाम्भवी दीक्षा का होता है। कभी कभी गुरु स्वयं ही अपने शिष्य का चुनाव करते है। शिष्य का गुरु से जब पिछले जन्म से ही सम्बन्ध होता है और जागृत गुरु को इसका ज्ञान होता है, ऐसी परिस्थिति में गुरु स्वयं शिष्य का चुनाव करते है। जब व्यक्ति की योग्यता अच्छी हो और गुरु पाने की तीव्र अभिलाषा हो तो योग्य गुरु को योग्य शिष्य से मिलाने में इश्वर स्वयं सहायता करते है। ऐसा श्री राम कृष्ण परमहंस के साथ हुआ था। उनके गुरु तोताराम को माँ काली ने स्वप्न में दर्शन देकर रामकृष्ण के गुरु बनने का आदेश दिया था। तीसरी परिस्थिति में शिष्य अपनी बुद्धिमत्ता से गुरु की योग्यता की पहचान कर दीक्षा को धारण करता है और गुरु शिष्य की योग्यता को समझकर दीक्षा के प्रकार का निर्धारण करता है। अच्छे शिष्य के लक्षण 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 गुरु के वचनों पर पूर्ण विश्वास करने वाला 👉 आज्ञाकारी। 👉 आस्तिक और सदाचारी। 👉 सत्य वाणी का प्रयोग करने वाला। 👉 चपलता , कुटिलता , क्रोध , मोह , लोभ​ , ईर्ष्या ​ इत्यादी अवगुणों से दूर रहने वाला। 👉 जितेन्द्रिय। 👉 पर निंदा , छिद्रान्वेषण , कटु भाषण और सिगरेट मद्य इत्यादि व्यसनों से दूर रहने वाला। 👉 गुरु के सदुपदेशों पर चिंतन मनन करने वाला। 👉 नियमों का पालन श्रद्धा और विश्वास से करने वाला। 👉 गुरु की सेवा में उत्साह रखने वाला। 👉 गुरु की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति दोनों परिस्थितियों में उनके आदेशों का पालन करना। चेतना के जागरण के लिए इन तीन पक्षों का सामंजस्य अनिवार्य है। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ १- शिष्य का पुरुषार्थ, श्रद्धा, विश्वास २- गुरु की सामर्थ्य ३- दैवीय कृपा गुरु की आवश्यकता क्यों 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गुरु की चेतना इश्वर से निरंतर संयुक्त रहने के कारण इश्वर तुल्य होती है , जबकि साधारण मनुष्य की चेतना संसार से जुडी रहने के कारण वाह्य्मुखी और अधोगामी होती है। चेतना के वाह्य मुखी और अधोगामी होने के कारण ईश्वर से हमारा संपर्क टूट जाता है जिसके कारण अविद्या का प्रभाव बढ़ जाता है। अविद्या के प्रभाव के कारण मनुष्य की प्रवृत्ति छोटी छोटी बातों में दुखी होने की, घृणा ,इर्ष्या ,क्रोध अनिर्णय और अविवेक की स्थिति से घिर जाता है। फलस्वरूप निम्न कर्मों की ओर प्रवृत होकर चेतना के स्तर से गिर कर मनुष्य योनी को छोड़कर निम्न योनियों को प्राप्त हो जाता है। गुरु को प्रकृति और ईश्वर के नियमों का ज्ञान होने के कारण उनमे अज्ञानता के भंवर से निकलने की क्षमता होती है। वह शिष्य को धीरे धीरे ज्ञान देकर, कर्मों की गति सही करवाकर और सामर्थ्य की वृद्धि करवाकर अज्ञान के इस भंवर से निकाल कर इश्वर से सम्बन्ध स्थापित करवा देते है। क्या हमारा विकास सृष्टि और हमारे परिवारजनों को प्रभावित करता है। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ हम सभी एक चेतना के अंश है , चाहे वह कोई भी वनस्पति हो , जीव हो, नदी हो , पहाड़ पर्वत हो अथवा पशु पक्षी हो इसका अर्थ यह है कि इश्वर सृष्टि के हर कण में विद्यमान है। यह एक अलग बात है की मनुष्य पौधों और जंतुओं में चेतना का प्रतिशत भिन्न भिन्न होता है। चेतना के प्रतिशत के अनुपात के अनुसार कार्य और विचार की क्षमता प्राप्त होती है। मनुष्यों में सृष्टि के अन्य व्यक्त रूपो से चेतना का प्रतिशत अधिक होता है। इसी कारण मनुष्य को इच्छा, कर्म और ज्ञान की सामर्थ्य प्राप्त है। चेतना का स्तर मनुष्य अपने प्रयासों के द्वारा बढ़ा कर परम चेतना को प्राप्त कर सकता है। जब एक चेतना अपना विकास कर परम चेतना को प्राप्त करती है तो सकारात्मक उर्जा की सृष्टि में वृद्धि हो जाती है और विभिन्न अनुपातों में अन्य प्राणियों के विकास में सहायक होती है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+14 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 12 शेयर

होमाहुति विशेष 🔸🔸🔹🔸🔸 १👉 अग्नि के "मुख" में आहुति देने से सर्व कार्य सिद्धि होते है। २👉 अग्नि के "कर्ण प्रदेश" में - व्याधि होती है। ३👉 अग्नि के "नेत्र" में - अन्धापन आ सकता है। ४👉 अग्नि के "नासिका" में - मानसिक कष्ट होंगे। ५👉 अग्नि के "मस्तक" में आहुति देने से - धन का क्षय होता है। अग्निदेव जानकारी 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 १👉 जिस भाग में काष्ठ हो - कर्ण २👉 कम जलने वाला भाग - नेत्र ३👉 धुआं वाला भाग - नासिका ४👉 अंगारों वाला भाग- मस्तक व ५👉 अग्नि शिखा वाला भाग - अग्नि का मुख (जिह्वा)कहलाता है। हवन आहुति फल 🔸🔸🔹🔸🔸 १👉 मधु के होम से - उपद्रव नष्ट २👉 घी-सम्पत्ति प्राप्ति ३👉 दही-आरोग्य प्राप्ति ४👉 दूध-गांव प्राप्ति ५👉 अंगूर-इष्ट सिद्धि ६👉 लाजा(खील)-राज्य प्राप्ति ७👉 कमल-धन प्राप्ति ८👉 अनार-राजा वश ९👉 बिजौरा-क्षत्रिय वश १०👉 नारंगी-वैश्य वश ११👉 पेठा-शूद्र वश १२👉 केला-मंत्री वश १३👉 चम्पा व गुलाब-विश्व वश १४👉 नारियल-सम्पत्ति प्राप्ति १५👉 गुग्गुल-दु:ख नष्ट १६👉 गुड़-मनोरथ सिद्धि १७👉 तिल-अभीष्ट सिद्धि १८👉 क्षीर-धन धान्य प्राप्ति १९👉 आम-जीव वश २०👉 बेल फल-अतुल लक्ष्मी प्राप्ति २१👉 ईख-सुख प्राप्ति २२👉 कपूर-कवित्व प्राप्ति २३👉 राई नमक-दु:ख नाश २४👉 घी,तिल,चावल-शांति प्राप्ति २५👉 केशर,कुमकुम,कपूर-रूप प्राप्ति। २६👉 मालती फूल-वागीशता की प्राप्ति होती है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

+16 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 21 शेयर
sn.vyas May 6, 2021

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *मानव जीवन विचित्रताओं से परिपूर्ण है | आज अक्सर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि - यह संसार बहुत ही बुरा हो गया है , लोग बहुत ही बुरे हो गये हैं | कभी कभी तो लोग यह भी कह देते हैं कि अब यह दुनिया भले लोगों के लायक बची ही नहीं हैं | क्योंकि यहाँ अच्छे लोगों के लिए जगह ही नहीं बची है आदि | जबसे सृष्टि चली तबसे ही इस धरा पर अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोग साथ साथ ही रहते आये हैं | इन विचारों के बीच एक महान आश्चर्य की बात यह है कि आज मनुष्य ने यह तो विचार कर लिया कि दुनिया एवं दुनिया के लोग बुरे हैं | अन्य लोगों के विषय में अपने विचार स्थापित कर लेने वाले मनुष्य ने आज तक यह विचार करना उचित नहीं समझा कि मैं कौन हूँ ? या मैं कैसा हूँ ? विचार कीजिए कि यदि आप किसी कुएँ में लटककर जोर की आवाज दें कि " तुम बुरे हो" तो वह कुआँ भी तुरन्त चिल्लाने लगता है कि तुम बुरे हो | अब आप कहें कि तुम सज्जन हो तो वह कुआँ भी आपको कहेगा कि तुम सज्जन हो | कहने का तात्पर्य यह है कि जैसा हम कहते हैं या सोंचते हैं वैसी ही प्रतिध्वनि या विचार हमें वापस मिलते हैं | इस प्रकार व्यक्ति में , परिवार में , समाज में , दुनिया में हमें सिर्फ वे ही चीजें नहीं दिखाई पड़ती जो सिर्फ दुनिया में हैं , बल्कि वे चीजें भी दिखाई पड़ती हैं जो स्वयं अपने ही अन्दर हैं | अर्थात :- यदि हमारा अपना ही चित्त अशांत है तो हमें सारा संसार ही अशांत दिखाई पड़ता है | हमारी अपनी ही दुनिया बाहरी दुनिया में अभिव्यक्ति होने लगती है | यदि किसी के हृदय में यदि करुणा , प्रेम व संवेदना की गंगोत्री बह रही हो तो वह सारे संसार में वही गंगोत्री देखता है | तब हमारी मूल समस्या कहाँ है ? वास्तव में यह समस्या बाहर किसी अन्य व्यक्ति में न होकर स्वयं अपने ही भीतर है |* *आज हम सारी दुनिया में अच्छाई ही देखना चाहते हैं परन्तु यह कभी भी विचार नहीं करना चाहते कि क्या हम अच्छे हैं ? आज हम दूसरों का सौन्दर्य दर्शन करना चाहते है ,पर क्या हमने अपना दर्शन करने का प्रयास किया ? हम दूसरों को सुधारने का सतत् प्रयास करते हैं , परंतु क्या हमने स्वयं को सुधारने का तनिक भी प्रयास किया ? हम बड़े - बड़े मंचों पर बैठकर उपदेश देकर उसको पालन करने का आवाहन तो कर रहे हैं , परंतु क्या कभी स्वयं उन उपदेशों को मानने या पालन करने का प्रयास किया ? शायद हम यह सब स्वयं नहीं कर पा रहे हैं | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मत है कि यही हमारी मूल समस्या है जो कि हमें दुनिया में अच्छाई नहीं देखने देती | हम स्वयं को कतई नहीं बदलना चाहते , और बदलाव चाहते हैं सारी दुनिया में ! यदि संसार को बदलना चाहते हैं तो पहले स्वयं को बदलना पड़ेगा | स्वामी विवेकानंद जी कहा करते थे "बनो और बनाओ" अर्थात --स्वयं बना हुआ , बदला , सुधरा हुआ व्यक्ति ही दूसरों को सुधार एवं बदल सकता है | इसलिए पहले स्वयं को बदलो तब संसार स्वत: बदला बदला दिखेगा | परंतु शायद स्वयं की कमी देखने एवं स्वयं को सुधारने की परिपाटी ही शायद अब नहीं रह गयी है | यही कारण है कि लोग आज "एको$हं द्वितीयोनास्ति" की भावना से ग्रसित होकर स्वयं में ही अच्छाई , सौन्दर्य , विद्वता आदि का दर्शन करते रहते हैं शेष संसार मूर्ख , बुरा एवं कुरुप ही दिखाई पड़ता है | यदि संसार को अच्छा देखने है तो अपने मन , नयन एवं हृदयं को अच्छा करना ही होगा |* *आवश्यकता है कि हम पहले अपने भीतर स्थित क्षुद्र ब्रह्माण्ड को सुधार लें , जो कि स्वयं हमारे हाथ में हैं | यदि हमने ऐसा कर लिया तो यह बाहरी वृहत्त ब्रह्माण्ड भी हमारे लिए स्वयं सुधरा दिखाई पड़ेगा |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

पूजा करते समय कमर और गर्दन सीधी क्यो रखनी चाहिए ? गीले सिर पूजा क्यो नहीं करनी चाहिए ? 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ जब हम पूजा करते है तो कमर और गर्दन को सीदा रखने को कहा जाता है । ऐसा क्यो कहा जाता है ? इसका मुख्य कारण है कि जब हम पूजा करते है तो ध्यान अंतिरक्ष मे जाता है । और ध्यान को ऊपर ले जाने मे सुषुम्णा नाड़ी का बहुत बड़ा योगदान होता है । यह नाड़ी रीड की हड्डी मे से होकर ब्रह्मरंध्र चक्र से जुड़ी होती है । अगर कमर और गर्दन झुक जाएंगी तो नाड़ी भी झुक जाएगी । अगर नाड़ी झुक जाएगी तो ब्रह्मरंध्र की नाड़ियाँ धुलोक से संपर्क बनाने मे असमर्थ हो जाती है । क्योकि तरंगो की दिशा नीचे की ओर हो जाती है । और जो ध्यान की तरंगे ऊपर को जानी चाहिए । वो नीचे को जाना शुरू कर देती है । ध्यान हमेशा ऊपर को सोचने से ही लगता है । इसलिए हवन यज्ञ ध्यान और पूज पाठ मे हमेशा कमर और गर्दन को सीदा रखना चाहिए । अगर आप जल्दी वाजी मे गीले सिर पूजा करते हो तो बहुत हानिकारक होता है । तथा जमीन पर बिना कुचालक आसन के बैठ जाते हो तो भी बहुत हानिकारक होता है । जब आप पूजा करते हो तो उस समय आपके शरीर से विधुत तरंगे निकलती है । और आपका सिर गीला होता है तो वो विधुत तरंगे गीले सिर के वालो मे ही विलय कर जाती है । जिसके कारण ध्यान क्रिया तो वाधित होती ही है इसके साथ साथ सिर मे भयंकर बीमारियो का जन्म हो जाता है । इसी प्रकार जब आप खाली जमीन पर बैठते हो तरंगे मूलाधार चक्र से भी गुदा के द्वार से बाहर निकलती है तथा वो प्रथवि के चुम्बकीय क्षेत्र मे संपर्क बना लेती है । जिसके कारण वो तरंगे जमीन मे चली जाती है । जो शरीर की पॉज़िटिव ऊर्जा को खीच लेती है । जो ध्यान से उत्पन्न होती है । क्योकि पृथ्वी सुचालक का काम करती है । इसलिए पूजा करते समय कुचालक आसन का प्रयोग करना चाहिए । जिससे उत्पन्न तरंगे सीदे ऊपर की ओर जाये तथा ध्यान और पूजा मे सहायक बन जाए। 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+7 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 25 शेयर
R b dubey May 6, 2021

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 23 शेयर
vibha May 4, 2021

+2 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 2 शेयर
sn.vyas May 4, 2021

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *इस संसार में अनादिकाल से जो धर्म स्थित है उसे सनातन धर्म कहा जाता है | सनातन का अर्थ है जो शाश्वत हो, सदा के लिए सत्य हो | जिन बातों का शाश्वत महत्व हो वही सनातन कही गई है | जैसे सत्य सनातन है , ईश्वर ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है , मोक्ष ही सत्य है और इस सत्य के मार्ग को बताने वाला धर्म ही सनातन धर्म भी सत्य है | वह सत्य जो अनादि काल से चला आ रहा है और जिसका कभी भी अंत नहीं होगा वह ही सनातन या शाश्वत है | जिनका न प्रारंभ है और जिनका न अंत है उस सत्य को ही सनातन कहते हैं | यही सनातन धर्म का सत्य है | अन्य धर्मों की अपेक्षा सनातन धर्म के मूल तत्व सत्य , अहिंसा , दया , क्षमा , दान , जप , तप , यम-नियम आदि हैं जिनका शाश्वत महत्व है | अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व वेदों में इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था | बृहदारण्य उपनिषद में लिखा है :- असतो मा सदगमय , तमसो मा ज्योर्तिगमय , मृत्योर्मा अमृतं गमय !" अर्थात :- हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो , अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो , मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो | सनातन इसलिए सनातन है कि सनातन में जड़ एवं चेतन की मान्यता है | जड़ पांच तत्व से दृश्यमान है - आकाश , वायु , जल , अग्नि और पृथ्वी | यह सभी शाश्वत सत्य की श्रेणी में आते हैं | यह अपना रूप बदलते रहते हैं किंतु समाप्त नहीं होते | प्राण की भी अपनी अवस्थाएं हैं: प्राण , अपान , समान और यम | उसी तरह आत्मा की अवस्थाएं हैं :- जाग्रत , स्वप्न , सुसुप्ति और तुरीय | ज्ञानी लोग ब्रह्म को निर्गुण और सगुण कहते हैं | उक्त सारे भेद तब तक विद्यमान रहते हैं जब तक ‍कि आत्मा मोक्ष प्राप्त न कर ले | यही सनातन धर्म का सत्य है |* *आज संसार में अनेकों प्रकार के धर्म देखने को मिलते हैंं , जिनकी मान्यताएं अलग-अलग है | प्रत्येक धर्म अपने धर्म के अतिरिक्त और किसी धर्म को ना तो मानना चाहता है और ना ही उनका ध्यान देना चाहता है , वही सनातन धर्म सदैव विश्व के कल्याण की भावना करता है | प्राय: अनेकों लोग पूछते हैं कि सनातन धर्म में सनातन क्या है ? ऐसे सभी लोगों को मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बता देना चाहता हूं कि सनातन धर्म में सनातन सत्य है | जहां अन्य धर्मों की आधारशिला रखने वाले महापुरुषों के विषय में पढ़ने को मिलता है कि अमुक धर्म को किसने प्रारंभ किया , वही सनातन धर्म इसलिए सनातन है क्योंकि उसका प्रतिपादक कोई नहीं है | सृष्टि के आदिकाल से ही सनातन धर्म स्थित है | सनातन धर्म की आधारशिला किसने रखी यह कोई नहीं जानता | जहां अन्य धर्म अपने धर्म को श्रेष्ठ और अन्य को छोटा बताते हैं वही सनातन धर्म सर्वधर्म समभाव की भावना का प्रचार करता है | समस्त प्राणियों में सद्भाव की कामना करता है वह प्राणी चाहे जिस धर्म का हो | सनातन इसीलिए सनातन है क्योंकि सनातन का अर्थ शास्वत होता है अर्थात इसका आदि - अंत नहीं है | अन्य धर्म कब प्रारंभ हुये , इन की आधारशिला कब रखी गई इसका वर्णन तो मिलता परंतु सनातन धर्म के विषय में यह जान पाना असंभव है | यही सनातन में सनातन है |* *सनातन धर्म के अतिरिक्त कहे जाने वाले धर्म धर्म नहीं बल्कि पंथ , सम्प्रदाय एवं मजहब हैं | सनातन ही सभी धर्मों की जड़ है शेष सभी सनातन की ही शाखायें हैं |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

+6 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Rani Kasturi May 6, 2021

+15 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 15 शेयर

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 11 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB