Anuradha Tiwari
Anuradha Tiwari Mar 26, 2019

आज,मंगलवार है, हनुमानजी महाराज का दिन है, आज हम इन्हीं की महिमा का गुणगान करेगें!!!!!! पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। अभिप्राय यह है की वायु इस संसार को चलाने और मिटाने मे समर्थ है तथा पञ्च महाभूत जिनसे मिलकर इस मानव शरीर का निर्माण हुआ है उसके सांस के लिए प्राणवायु है । वानरराज सुग्रीव ने किष्किन्धा से रवाना होते समय कहा था की एक मास में माँ सीता की सुधि लेकर आनी है अन्यथा जीवन खत्म । इन वानरों के जीवन को बचाओ । हे पवन पुत्र आप बुद्धि, विवेक और विज्ञानं के अपार भण्डार हो । बुद्धि का अर्थ यहाँ बोद्धिक चेतना से है । आप जानते हो की जिस जगह आप जा रहे हो वह आप से सदा सर्वथा अनभिज्ञ है किन्तु आप स्वविवेक से उन आने वाली दुस्तर परिस्थितियों को भी अपने कार्य करने के विशिस्ट ज्ञान विज्ञान द्वारा संभव करना जानते हो । अब यहां तक जो जामवंत जी ने कहा वो उनको सावधान करने का तथा उनसे यह विनय का था की आर्तजनो के प्राण बचाओ । लेकिन अगली पंक्ति में उन्होंने श्री हनुमान जी को उनके भूले हुए बल की बहुत अद्भुत तरीके से याद दिला दी। जामवंत जी कहते है की इस जगत में ऐसा कौनसा कार्य है जो की आप ने किया नहीं और नहीं कर सकते । बहुत बड़ी बात एक छोटी सी लाइन में पवनपुत्र के विस्मर्त बल को जगाने हेतु । भावार्थ देखिये की जिसने पैदा होते ही सूर्य को लील्यो ताहि मधुर फल जानू वह सूर्य तक बालपन मे पहुँचने वाला वीर बजरग आज चुप है । आप तो भय से सदा सर्वाथ दूर हो और श्री हनुमान जी एकादश रूद्र के अवतार है और भगवान् राम के अनन्य भक्त यह बात जामवंत जी भलीभांति जानते थे सो उन्होंने यह बात कही । पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥ ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री रामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्‌जी पर्वत के आकार के (अत्यंत विशालकाय) हो गए॥ * कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥ सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥ भावार्थ:-उनका सोने का सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान्‌जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा- मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ॥ * सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥ जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥ भावार्थ:- और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्‌! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना (कि मुझे क्या करना चाहिए)॥ * एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥ तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥ भावार्थ:-(जाम्बवान्‌ ने कहा-) हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्री रामजी अपने बाहुबल से (ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आएँगे, केवल) खेल के लिए ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे॥ * कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं। त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥ जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई। रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥ भावार्थ:-वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्री रामजी सीताजी को ले आएँगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्‌ के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुंदर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्री रघुवीर के चरणकमल का मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है। * भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥ भावार्थ:-श्री रघुवीर का यश भव (जन्म-मरण) रूपी रोग की (अचूक) दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्री रामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे॥ * नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक। सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥ भावार्थ:-जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिए बधिक (व्याधा) के समान है, उन श्री राम के गुणों के समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिए॥ लंका को उखाड़कर, रावण को मारकर माता सीता को ले औन । जामवंत जी ने कहा नहीं तात आप सिर्फ पता लगाओ की माता सीता है कहाँ तो श्री हनुमान जी प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि जलधि लांघ गए अचरज नाही । तो बस अर्पण कीजिये इस आस्था के साथ की बेगी हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो । विश्वास रखिये श्री लक्ष्मण जी के लिए द्रोण गिरी पर्वत लाने वाले के लिए हमारे कष्टों का अंत करना दुरुह नहीं है ।

आज,मंगलवार है, हनुमानजी महाराज का दिन है, आज हम इन्हीं की महिमा का गुणगान करेगें!!!!!!

 पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। 

अभिप्राय यह है की वायु इस संसार को चलाने और मिटाने मे समर्थ है तथा पञ्च महाभूत जिनसे मिलकर इस मानव शरीर का निर्माण हुआ है उसके सांस के लिए प्राणवायु है । वानरराज सुग्रीव ने किष्किन्धा से रवाना होते समय कहा था की एक मास में माँ सीता की सुधि लेकर आनी है अन्यथा जीवन खत्म । इन वानरों के जीवन को बचाओ ।

हे पवन पुत्र आप बुद्धि, विवेक और विज्ञानं के अपार भण्डार हो । बुद्धि का अर्थ यहाँ बोद्धिक चेतना से है । आप जानते हो की जिस जगह आप जा रहे हो वह आप से सदा सर्वथा अनभिज्ञ है किन्तु आप स्वविवेक से उन आने वाली दुस्तर परिस्थितियों को भी अपने कार्य करने के विशिस्ट ज्ञान विज्ञान द्वारा संभव करना जानते हो । अब यहां तक जो जामवंत जी ने कहा वो उनको सावधान करने का तथा उनसे यह विनय का था की आर्तजनो के प्राण बचाओ । लेकिन अगली पंक्ति में उन्होंने श्री हनुमान जी को उनके भूले हुए बल की बहुत अद्भुत तरीके से याद दिला दी।

जामवंत जी कहते है की इस जगत में ऐसा कौनसा कार्य है जो की आप ने किया नहीं और नहीं कर सकते । बहुत बड़ी बात एक छोटी सी लाइन में पवनपुत्र के विस्मर्त बल को जगाने हेतु । भावार्थ देखिये की जिसने पैदा होते ही सूर्य को लील्यो ताहि मधुर फल जानू  वह सूर्य तक बालपन मे पहुँचने वाला वीर बजरग आज चुप है । आप तो भय से सदा सर्वाथ दूर हो और श्री हनुमान जी एकादश रूद्र के अवतार है और भगवान् राम के अनन्य भक्त यह बात जामवंत जी भलीभांति जानते थे सो उन्होंने यह बात कही ।

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री रामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्‌जी पर्वत के आकार के (अत्यंत विशालकाय) हो गए॥

* कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥

भावार्थ:-उनका सोने का सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान्‌जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा- मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ॥

* सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥

भावार्थ:- और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्‌! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना (कि मुझे क्या करना चाहिए)॥

* एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥

भावार्थ:-(जाम्बवान्‌ ने कहा-) हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्री रामजी अपने बाहुबल से (ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आएँगे, केवल) खेल के लिए ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे॥

* कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥
जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥

भावार्थ:-वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्री रामजी सीताजी को ले आएँगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्‌ के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुंदर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्री रघुवीर के चरणकमल का मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है।

* भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥

भावार्थ:-श्री रघुवीर का यश भव (जन्म-मरण) रूपी रोग की (अचूक) दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्री रामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे॥

* नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥

भावार्थ:-जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिए बधिक (व्याधा) के समान है, उन श्री राम के गुणों के समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिए॥

लंका को उखाड़कर, रावण को मारकर माता सीता को ले औन । जामवंत जी ने कहा नहीं तात आप सिर्फ पता लगाओ की माता सीता है कहाँ तो श्री हनुमान जी प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि जलधि लांघ गए अचरज नाही ।

तो बस अर्पण कीजिये इस आस्था के साथ की बेगी हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो । विश्वास रखिये श्री लक्ष्मण जी के लिए द्रोण गिरी पर्वत लाने वाले के लिए हमारे कष्टों का अंत करना दुरुह नहीं है ।

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कामेंट्स

mana Mar 26, 2019
jai siyaramji 🙏 jai Hanuman ji🙏

ATUL KUMAR PANDEY Mar 26, 2019
ओम श्री हनुमते नमः 🙏🏵️🌺🌹🙏🌹

Rameshanand Guruji Apr 18, 2019

हनुमान विवाह की कथा नहीं जानते होंगे ? 🙏जय श्री हनुमान जी🙏 ;-प्रेषित;-रमेशानंद गुरूजी हनुमान जी का विवाह हुआ था, हनुमान जी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर “तेलंगाना में है हनुमान जी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर, पाराशर संहिता में भी है हनुमान विवाह की कथा “ हनुमान जी को बाल ब्रह्मचारी माना जाता है इसलिए हनुमान जी लंगोट धारण किए हर मंदिर और तस्वीरों में अकेले दिखते हैं। कभी भी अन्य देवताओं की तरह हनुमान जी को पत्नी के साथ नहीं देखा होगा। लेकिन अगर आप हनुमान के साथ उनकी पत्नी को देखना चाहते हैं तो आपको आंध्रप्रदेश जाना होगा। हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर तेलंगाना के खम्मम जिले में है यह एक प्राचीन मंदिर है। यहां हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा विराजमान है। यहां की मान्यता है कि जो भी हनुमानजी और उनकी पत्नी के दर्शन करता है, उन भक्तों के वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और पति-पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है। तेलंगाना के खम्मम जिले में प्रचलित मान्यता का आधार पाराशर संहिता को माना गया है। पाराशर संहिता में उल्लेख मिलता है कि हनुमानजी अविवाहित नहीं, विवाहित हैं। उनका विवाह सूर्यदेव की पुत्री सुवर्चला से हुआ है। संहिता के अनुसार हनुमानजी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। सूर्य देव के पास 9 दिव्य विद्याएं थीं। इन सभी विद्याओं का ज्ञान बजरंग बली प्राप्त करना चाहते थे। सूर्य देव ने इन 9 में से 5 विद्याओं का ज्ञान तो हनुमानजी को दे दिया, लेकिन शेष 4 विद्याओं के लिए सूर्य के समक्ष एक संकट खड़ा हो गया। शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान सिर्फ उन्हीं शिष्यों को दिया जा सकता था जो विवाहित हों। हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे, इस कारण सूर्य देव उन्हें शेष चार विद्याओं का ज्ञान देने में असमर्थ हो गए। इस समस्या के निराकरण के लिए सूर्य देव ने हनुमानजी से विवाह करने की बात कही। पहले तो हनुमानजी विवाह के लिए राजी नहीं हुए, लेकिन उन्हें शेष 4 विद्याओं का ज्ञान पाना ही था। इस कारण अंतत: हनुमानजी ने विवाह के लिए हां कर दी। इस मंदिर में हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी के भी दर्शन प्राप्त होते हैं। यह मंदिर इकलौता गवाह है हनुमान जी के विवाह का। ऎसी मान्यता है कि हनुमान जी जब अपने गुरु सूर्य देव से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उस दौरान सूर्य देव ने हनुमान जी के सामने शर्त रख दी कि अब आगे कि शिक्षा तभी प्राप्त कर सकते हो जब तुम विवाह कर लो। ऎसे में आजीवन ब्रह्मचारी रहने का प्राण ले चुके हनुमान जी के लिए दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो गई। शिष्य को दुविधा में देखकर सूर्य देव ने हनुमान जी से कहा कि तुम मेरी पुत्री सुवर्चला से विवाह कर लो। सुवर्चला तपस्विनी थी। हनुमान जी से विवाह के बाद सुवर्चला वापस तपस्या में लीन हो गई। इस तरह हनुमान जी ने विवाह की शर्त पूरी कर ली और ब्रह्मचारी रहने का व्रत भी कायम रहा। हनुमान जी के विवाह का उल्लेख पराशर संहिता में भी किया गया है। जब हनुमानजी विवाह के लिए मान गए तब उनके योग्य कन्या की तलाश की गई और यह तलाश खत्म हुई सूर्य देव की पुत्री सुवर्चला पर। सूर्य देव ने हनुमानजी से कहा कि सुवर्चला परम तपस्वी और तेजस्वी है और इसका तेज तुम ही सहन कर सकते हो। सुवर्चला से विवाह के बाद तुम इस योग्य हो जाओगे कि शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर सको। सूर्य देव ने यह भी बताया कि सुवर्चला से विवाह के बाद भी तुम सदैव बाल ब्रह्मचारी ही रहोगे, क्योंकि विवाह के बाद सुवर्चला पुन: तपस्या में लीन हो जाएगी। यह सब बातें जानने के बाद हनुमानजी और सुवर्चला का विवाह सूर्य देव ने करवा दिया। विवाह के बाद सुवर्चला तपस्या में लीन हो गईं और हनुमानजी से अपने गुरु सूर्य देव से शेष 4 विद्याओं का ज्ञान भी प्राप्त कर लिया। इस प्रकार विवाह के बाद भी हनुमानजी ब्रह्मचारी बने हुए हैं। मान्यता है कि हनुमान जी के इस मंदिर में आकर जो दंपत्ति हनुमान और उनकी पत्नी के दर्शन करते हैं उनके वैवाहिक जीवन में प्रेम और आपसी तालमेल बना रहता है। वैवाहिक जीवन में चल रही परेशानियों से मुक्ति दिलाते हैं विवाहित हनुमान जी।

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jai shri krishna Apr 17, 2019

ब्रह्मा जी सहित इन 8 देवताओं ने हनुमान जी को दिए थे यह वरदान, पढ़ें यह रोचक खबर ..... हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक, हर साल चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष हनुमान जयंती का पर्व 19 अप्रैल दिन शुक्रवार को है। हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि हनुमान जी भगवान शिव के अवतार हैं। परमशक्तिशाली हनुमान जी को इतनी शक्तियां कहां से प्राप्त हुई, इस बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। तो देर किस बात की, आइए हम आपको बताते हैं कि हनुमान जी इतने शक्तिशाली कैसे बने? वाल्मीकि रामायण के अनुसार, बाल्यकाल में हनुमान जी जब सूर्यदेव को फल समझकर खाने को दौड़े तो देवराज इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र से प्रहार किया। इस वज्र प्रहार से हनुमान जी बेहोश हो गए। इसके बाद हनुमान जी के मानस पिता वायुदेव ने समस्त संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया। इस वजह से संसार में हाहाकार मच गया। इसके बाद परमपिता ब्रह्मा जी हनुमान को होश में ले आए। इसके बाद कई देवताओं ने हनुमान जी को वरदान दिए। 1- सूर्यदेव ने हनुमान जी को अपने तेज का सौवां भाग देते हुए कहा कि जब इसमें शास्त्र अध्ययन करने की शक्ति आ जाएगी, तब मैं इसे शास्त्रों का ज्ञान दूंगा। जिससे यह अच्छा वक्ता होगा और शास्त्रज्ञान में इसकी समानता करने वाला कोई नहीं होगा। 2- यमराज ने हनुमान जी को वरदान दिया कि यह मेरे दण्ड से अवध्य और निरोग होगा। 3- कुबेर ने हनुमान जी को यह वरदान किया कि इस बालक को युद्ध में कभी विषाद नहीं होगा। संग्राम में मेरी गदा भी इसका वध नहीं कर सकेगी। 4- भगवान शंकर ने भी हनुमान जी को वरदान किया कि यह मेरे शस्त्रों द्वारा अवध्य रहेगा। 5- भगवान विश्वकर्मा ने वरदान दिया कि मेरे द्वारा बनाए गए, जितने भी शस्त्र हैं उनसे यह अवध्य और चिंरजीवी होगा।

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Vijay Yadav Apr 17, 2019

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MAHESH MALHOTRA Apr 17, 2019

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Prince Trivedi Apr 17, 2019

🙏हनुमान जयन्ती 2019 - सम्पूर्ण बजरंग बाण प्राचीन पाण्डुलिपियों के आधार पर पाठ !! बाज़ार में उपलब्ध बजरंगबाण में २१ चौपाइयांछूटी हुई हैं!! 🙏 यह बजरंग बाण प्राचीन पाण्डुलिपियों के आधार पर पाठ संशोधनपूर्वक प्रस्तुत किया जा रहा है । साधकों में प्रसिद्ध गोकुलभवन अयोध्या के श्रीराममंगलदास जी महाराज के यहाँ से प्रकाशित पुस्तक तथा बीकानेर लाइब्रेरी की पाण्डुलिपियों का सहयोग इसके स्वरूप प्रस्तुति में मूल कारण है।  बाज़ार में उपलब्ध बजरंगबाण में २१चौपाइयां छूटी हुई हैं । जिनमें दैन्यभाव की झलक के साथ इसके अनुष्ठान का दिग्दर्शन होता है ।-- TulasiDas जी महlराज बजरंगबाण का यह पाठक्रम प्रामाणिकऔर अनुभूत है । बाज़ार में  उपलब्ध पुस्तकों में लगभग २१ चौपाइयाँ छूटी हुई हैं । 🙏 *श्री बजरंग बाण का पाठ* दोहा :  निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान । तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ।। चौपाई :    जय हनुमन्त सन्त हितकारी । सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ।। जन के काज विलम्ब न कीजै । आतुर दौरि महा सुख दीजै।।२।। जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा । सुरसा बदन पैठि विस्तारा ।। आगे जाय लंकिनी रोका । मारेहु लात गई सुर लोका।।४।। जाय विभीषण को सुख दीन्हा । सीता निरखि परम पद लीन्हा ।।बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा । अति आतुर यम कातर तोरा।।६।। अक्षय कुमार को मारिसंहारा । लूम लपेटि लंक को जारा ।। लाह समान लंक जरि गई । जै जै धुनि सुर पुर में भई ।।८।। अब विलंब केहि कारण स्वामी । कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी ।। जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता । आतुरहोई दुख करहु निपाता ।।१०।। जै गिरधर जै जै सुख सागर । सुर समूह समरथ भट नागर ।। ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले । बैिरहिं मारू बज्र के कीलै ।।१२।। गदा बज्र तै बैरिहीं मारो । महाराज निज दास उबारो ।। सुनि हंकार हुंकार दै धावो । बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो।।१४।। ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा । ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीशा ।। सत्य होहु हरि शपथ पायके । राम दुत धरू मारू धायके ।।१६।। जै हनुमन्त अनन्त अगाधा । दुःख पावत जन केहि अपराधा ।। पूजा जप तप नेम अचारा । नहिं जानत कछु दास तुम्हारा ।।१८।। वन उपवन मग गिरि गृह माहीं । तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं ।। पाँय परौं कर जोरि मनावौं ।  अपने काज लागि गुण गावौं ।।२०।। जय अंजनि कुमार बलवन्ता।  शंकर सुवन वीर हनुमन्ता ।। बदन कराल काल कुल घालक । राम सहाय सदा प्रतिपालक ।।२२।। भूत प्रेत पिशाच निशाचर।  अग्नि बैताल काल मारीमर ।। इन्हें मारु तोहि शपथ राम की । राखुनाथ मर्जाद नाम की ।।२४। ।जनकसुतापति-दास कहावौ । ताकी शपथ विलम्ब न लावौ ।। जय जय जय धुनि होत अकाशा । सुमिरत होत दुसहु दुःख नाशा ।।२६। ।चरन पकरि कर जोरि मनावौं | एहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।। उठु-उठु चलु तोहि राम दोहाई पाँय परौं कर जोरि मनाई ।।२८।। ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता । ॐ हनु हनुहनु हनु हनु हनुमंता ।। ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल । ॐ सं सं सहमि पराने खलदल ।।३०।। अपने जन को तुरत उबारौ । सुमिरत होतअनन्द हमारौ ।। ताते विनती करौं पुकारी । हरहु सकल प्रभु विपति हमारी ।।३२।। ऐसो प्रबल प्रभाव प्रभु तोरा । कस नहरहु दुःख संकट मोरा ।। हे बजरंग, बाण सम धावो । मेटि सकल दुःख दरस दिखावो ।।३४।। हे कपिराज काज कब ऐहौ । अवसर चूकि अन्त पछितैहौ ।। जन की लाज जात ऐहि बारा । धावहु हे कपि पवन कुमारा ।।३६।। जयति जयति जय जय हनुमाना । जयति जयति गुणज्ञान निधाना ।। जयति जयति जय जय कपिराई । जयति जयतिजय जय सुखदाई ।।३८।। जयति जयति जय राम पियारे । जयति जयति जय सिया दुलारे ।। जयति जयति मुद मंगलदाता । जयति जयति त्रिभुवन विख्याता ।।४०।। यहि प्रकार गावत गुण शेषा । पावत पार नहीं लवलेषा ।। राम रूप सर्वत्र समाना । देखत रहत सदा हर्षाना ।।४२।। विधि शारदा सहित दिनराती । गावत कपि के गुण गण पांती ।। तुम सम नही जगत् बलवाना । करि विचारदेखेउं विधि नाना ।।४४।। यह जिय जानि शरण तव आई । ताते विनय करौं चित लाई ।। सुनि कपि आरत वचन हमारे । मेटहु सकलदुःख भ्रम सारे ।।४६।। यहि प्रकार विनती कपि केरी । जो जन करै लहै सुख ढेरी ।। याके पढ़त वीर हनुमाना । धावत बाण तुल्य बलवाना ।।४८।। मेटत आय दुःख क्षण मांहीं । दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं ।। पाठ करै बजरंग बाण की । हनुमत रक्षाकरै प्राण की ।।५०।। डीठ, मूठ, टोनादिक नासै । परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे ।। भैरवादि सुर करै मिताई । आयसु मानि करैं सेवकाई ।।५२।। प्रण करि पाठ करैं मन लाई । अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई ।। आवृति ग्यारह प्रतिदिन जापै । ताकी छाँह काल नहिं चांपै ।।५४।। दै गूगल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेशा ।। यह बजरंग बाण जेहि मारै । ताहि कहौ फिर कौन उबारै ।।५६।। शत्रु समूह मिटै सब आपै । देखत ताहिसुरासुर काँपै ।। तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई । रहै सदा कपिराज सहाई ।।५८।। प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान ।। तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान ।। 🙏इति श्रीगोस्वामितुलसीदासविरचितः बजरंगबाणः🙏 श्री बजरंग बाण का पाठ 🌞🌞 *कलयुग में सबसे चर्चित, प्रभावशाली व शीघ्र फल प्रदान करने वाले हनुमान जी है। हनुमान जी की आराधना करने में नियम, संयम का पालन करना बहुत जरूरी होता है। नियम, संयम में त्रुटि होने पर हनुमान दण्ड अवश्य देते है, इसलिए हनुमान जी की अराधना करने में किसी भी प्रकार का दुव्र्यसन न करें। संकट को हरने वाले हनुमान जी के अनेक रूप है। उनमें से एक है वज्र रूप। वज्र रूप वाले हनुमान जी को बजरंगबली कहा जाता है।*  🔔 *गायत्री मंत्र को दुनिया का सबसे आसान मंत्र माना जाता है लेकिन गायत्री मंत्र से भी अधिक असरदार हनुमान चालिस और बजरंग बाण को माना जाता है. ऐसे तो हनुमान जी के कई मंत्र प्रचलित हैं लेकिन ऐसे कई मंत्र है जो कभी खाली नहीं जाते और उन्हीं मंत्रों में से एक है बजरंग बाण. जिस भी घर,परिवार में बजरंग बाण का नियमित पाठ,अनुष्ठान होता है वहां दुर्भाग्य, दारिद्रय,भूत-प्रेत का प्रकोप और असाध्य रोग,शारीरिक कष्ट कभी नहीं सताते।* 🎶💥 *पूजन विधि*💥🎶 ☺ *अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए मंगल अथवा शनिवार का दिन चुन लें। हनुमान जी का एक चित्र या मूर्ति जप करते समय सामने होनी चाहिए। बैठने के लिए कुशासन का प्रयोग करें। अनुष्ठान करने के लिए शुद्ध स्थान तथा शान्त वातावरण होना आवश्यक है। घर में यदि सुलभ न हो तो किसी मन्दिर में पाठ कर सकते है। हनुमान जी के अनुष्ठान में दीपदान का विशेष महत्व होता है।* *पांचों अनाजों (गेंहू, चावल, मूंग, उड़द व काले तिल) को अनुष्ठान से पूर्व एक-एक मुठठी मात्रा में लेकर शुद्ध गंगाजल में भिगो दें। अनुष्ठान वाले दिन इन अनाजों को पीसकर उनका दीपक बना लें। बत्ती के लिए अपनी लम्बाई के बराबर कलावे का एक धागा लेकर इसे पांच बार मोड़ लें।* इस प्रकार के धागे की बत्ती बनाकर उसे सुगन्धित तेल में डालकर प्रयोग करें। समस्त पूजन काल में यह दीपक जलता रहना चाहिए।  🌲हनुमान जी को गूगुल की धूनी सबसे प्रिय है। 💜 जप के प्रारम्भ में संकल्प अवश्य लेना चाहिए कि मनोकामना पूर्ण होने पर हम हनुमान जी के निमित्त कुछ न कुछ करते रहेंगे। अब शुद्ध उच्चारण से हनुमान जी की छवि पर ध्यान केन्द्रित करके बजरंग बाण जाप करें। बहुत से व्यक्ति अपने कार्य या व्यवहार से लोगों को रुष्ट कर देते हैं, इससे उनके शत्रु बढ़ जाते हैं। कुछ लोगों को स्पष्ट बोलने की आदत होती है जिसके कारण उनके गुप्त शत्रु भी होते हैं। यह भी हो सकता है कि आप सभी तरह से अच्छे हैं फिर भी आपकी तरक्की से लोग जलते हो और आपके विरुद्ध षड्‍यंत्र रचते हो। ऐसे समय में यदि आप सच्चे हैं तो श्री बजरंग बाण आपको बचाता है और शत्रुओं को दंड देता है। बजरंग बाण से शत्रु को उसके किए की सजा मिल जाती है, लेकिन इसका पाठ एक जगह बैठकर अनुष्ठानपूर्वक 21 दिन तक करना चाहिए और हमेशा सच्चाई के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए, क्योंकि हनुमानजी सिर्फ पवित्र लोगों का ही साथ देते हैं। 21 दिन में तुरंत फल मिलता है। *JAI SHREE RAM* *JAI SHREE MAHAKAL* हनुमानजयन्ती-2019-श्री हनुमान चालीसा + हनुमान जी के सिद्ध चमत्कारी मंत्र* Link👍👍https://www.mymandir.com/p/37jcLb?ref=share 🏆🌞हनुमान जयंती 2019 - संकटमोचन हनुमानाष्टक मंत्र जप, पाठ, पूजा एवं व्रत Link--👍https://www.mymandir.com/p/VHuwr?ref=share

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Pt Vinod Pandey 🚩 Apr 17, 2019

🌷 हनुमान जयंती विशेष 🌷 🙏🏻 धर्म ग्रंथों में हनुमानजी के 12 नाम बताए गए हैं, जिनके द्वारा उनकी स्तुति की जाती है। गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्रीहनुमान अंक के अनुसार हनुमानजी के इन 12 नामों का जो रात में सोने से पहले व सुबह उठने पर अथवा यात्रा प्रारंभ करने से पहले पाठ करता है, उसके सभी भय दूर हो जाते हैं और उसे अपने जीवन में सभी सुख प्राप्त होते हैं। वह अपने जीवन में अनेक उपलब्धियां प्राप्त करता है। हनुमानजी की 12 नामों वाली स्तुति इस प्रकार है- 🌷 *स्तुति* *हनुमानअंजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:।* *रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिंगाक्षोअमितविक्रम:।।* *उदधिक्रमणश्चेव सीताशोकविनाशन:।* *लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।* *एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:।* *स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।* *तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।* *राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।* 🙏🏻 *इन 12 नामो से होती है हनुमानजी की स्तुति, जानिए इनकी महिमा* 👉🏻https://www.vkjpandey.in 🙏🏻 *हनुमान* *हनुमानजी का यह नाम इसलिए पड़ा क्योकी एक बार क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने इनके ऊपर अपने वज्र प्रहार किया था यह वज्र सीधे इनकी ठोड़ी (हनु) पर लगा। हनु पर वज्र का प्रहार होने के कारण ही इनका नाम हनुमान पड़ा ।* 🙏🏻 *लक्ष्मणप्राणदाता* *जब रावण के पुत्र इंद्रजीत ने शक्ति का उपयोग कर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया था, तब हनुमानजी संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी बूटी के प्रभाव से लक्ष्मण को होश आया था।इस लिए हनुमानजी को लक्ष्मणप्राणदाता भी कहा जाता है ।* 🙏🏻 *दशग्रीवदर्पहा* *दशग्रीव यानी रावण और दर्पहा यानी धमंड तोड़ने वाला । हनुमानजी ने लंका जाकर सीता माता का पता लगाया, रावण के पुत्र अक्षयकुमार का वध किया साथ ही लंका में आग भी लगा दी ।इस प्रकार हनुमानजी ने कई बार रावण का धमंड तोड़ा था । इसलिए इनका एक नाम ये भी प्रसिद्ध है ।* 🙏🏻 *रामेष्ट* *हनुमान भगवान श्रीराम के परम भक्त हैं । धर्म ग्रंथों में अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है कि श्रीराम ने हनुमान को अपना प्रिय माना है । भगवान श्रीराम को प्रिय होने के कारण ही इनका एक नाम रामेष्ट भी है ।* 🙏🏻 *फाल्गुनसुख* *महाभारत के अनुसार, पांडु पुत्र अर्जुन का एक नाम फाल्गुन भी है । युद्ध के समय हनुमानजी अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजित थे । इस प्रकार उन्होंने अर्जुन की सहायता की । सहायता करने के कारण ही उन्हें अर्जुन का मित्र कहा गया है । फाल्गुन सुख का अर्थ है अर्जुन का मित्र ।* 🙏🏻 *पिंगाक्ष* *पिंगाक्ष का अर्थ है भूरी आंखों वाला ।अनेक धर्म ग्रंथों में हनुमानजी का वर्णन किया गया है । उसमें हनुमानजी को भूरी आंखों वाला बताया है । इसलिए इनका एक नाम पिंगाक्ष भी है ।* 🙏🏻 *अमितविक्रम* *विक्रम का अर्थ है पराक्रमी और अमित का अर्थ है बहुत अधिक । हनुमानजी ने अपने पराक्रम के बल पर ऐसे बहुत से कार्य किए, जिन्हें करना देवताओं के लिए भी कठिन था । इसलिए इन्हें अमितविक्रम भी कहा जाता हैं ।* 🙏🏻 *उदधिक्रमण* *उदधिक्रमण का अर्थ है समुद्र का अतिक्रमण करने वाले यानी लांधने वाला । सीता माता की खोज करते समय हनुमानजी ने समुद्र को लांधा था। इसलिए इनका एक नाम ये भी है ।* 🙏🏻 *अंजनीसूनु* *माता अंजनी के पुत्र होने के कारण ही हनुमानजी का एक नाम अंजनीसूनु भी प्रसिद्ध है ।* 🙏🏻 *वायुपुत्र* *हनुमानजी का एक नाम वायुपुत्र भी है । पवनदेव के पुत्र होने के कारण ही इन्हें वायुपुत्र भी कहा जाता है ।* 🙏🏻 *महाबल* *हनुमानजी के बल की कोई सीमा नहीं हैं । इसलिए इनका एक नाम महाबल भी है ।* 🙏🏻 *सीताशोकविनाशन* *माता सीता के शोक का निवारण करने के कारण हनुमानजी का ये नाम पड़ा ।* 👉🏻https://www.vkjpandey.in 📖🌷🌻🌹🍀🌺💐🌸🍁🙏🏻 *मित्रों, आज तारीख 17 अप्रैल 2019 दिन बुधवार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष कि आज त्रयोदशी तिथि है और आज बैंगन त्याज्य होता है ।।* *त्रयोदशी तिथि जयकारी और सर्वसिद्धिकारी तिथि मानी जाती है । इसके देवता मदन (कामदेव) हैं ।।* *यह तिथि जया नाम से विख्यात मानी जाती है । शास्त्रानुसार भगवान कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र हैं भगवान कामदेव ।।* *कामदेव प्रेम और आकर्षण के देवता माने जाते हैं । जिन पुरुषों अथवा स्त्रियों में काम जागृत नहीं होता...* *अथवा अपने जीवन साथी के प्रति आकर्षण कम हो गया है, उन्हें आज के दिन भगवान कामदेव का पूजन करना चाहिये ।।* *आज का यह उपाय आपका वर्षों का खोया हुआ प्रेम वापस दिला सकता है इस उपाय को वेबसाइट पर देखें और अवश्य करें ।।* हे आज की तिथि (तिथि के स्वामी), आज के वार, आज के नक्षत्र (नक्षत्र के देवता और नक्षत्र के ग्रह स्वामी), आज के योग और आज के करण ।। आप इस पंचांग को सुनने और पढ़ने वाले जातकों पर अपनी कृपा बनाए रखें ।। इनको जीवन के समस्त क्षेत्रो में सदैव ही सर्वश्रेष्ठ सफलता प्राप्त हो । ऐसी मेरी आप सभी आज के अधिष्ठात्री देवों/देवियों से हार्दिक प्रार्थना है ।। आज का पञ्चांग एवं इस प्रकार की और भी जानकारियों को विस्तृत डिटेल में जानने के लिये इस लिंक को क्लिक करें- Ƥt Viƞŏđ Ƥāƞđēƴ 🚩 👉🏻https://www.vkjpandey.in *।।। नमो नारायण ।।।*

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महर्षि विश्वामित्र और स्वर्ग की अप्सरा मेनका.. 🍒 ब्रह्मयोगी महर्षि विश्वामित्र व्याघ्रसर नैमिषारण्यों (बक्सर बिहार) की कंदराओं में एक जठर हठयोग तपस्या में वर्षों से लीन थे। तपस्या करते हुए उनके शरीर में किसी भी तरह की कोई हलचल नहीं हो रही थी। मस्तक पर एक तेज प्रकाश दिव्यमान सा और उन के चारों ओर कई तरह के जंतु जानवर विचर रहे थे। पशु-पक्षियों की चहक उस शांत नैमिषारण्य के परिदृश्यों को अपनी उपस्थिति का सुखद आभास भी करवा रहे थे लेकिन विश्वामित्र के तप को भंग करने का साहस और हिम्मत किसी के पास नहीं थी। जब महर्षा विश्वामित्र की इस घोर तपस्या की जानकारी भगवान इंद्र को हुई तो वो भी काफी हैरान हो गए। हैरानी के साथ-साथ इंद्र को यह भय भी सताने लगा कि इस उत्कट ब्रह्म तप से उनका इन्द्रत्व अस्तित्व ही कहीं ख़त्म ना हो जाए। इंद्र सोच रहे थे कि शायद विश्वामित्र कठोर तपस्या कर नए संसार कि साधना का प्रयास कर रहे हैं। इंद्रदेव यह सोच रहे थे कि यदि विश्वामित्र की तपस्या सफल हो गई तो विश्वामित्र ही संपूर्ण सृष्टि के देव बन जाएंगे। इधर विश्वामित्र ने अपनी तपस्या में मग्न थे लेकिन उनकी तपस्या को भंग करने का साहस किसी में भी नहीं था। पुनः अपने विचलित मन से इंद्रदेव ने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की एक योजना बनाई। देवराज इंद्र ने विश्वामित्र की तपस्या को भंग करने के लिए स्वर्ग की एक सुंदर अप्सरा मेनका को याद किया। उन्हें इंद्रसभा में आमंत्रित किया गया। जब मेनका देवराज इंद्र के सम्मुख आई तो देवराज इंद्र ने उन्हें नारी का अवतार लेकर मृत्यु लोक में रहने का एक आदेश दिया और उनसे कहा कि वह अपने सौंदर्य से विश्वामित्र की तपस्या भंग करें और उन्हें अपनी और आकर्षित करें। ऐसा कहकर देवराज इंद्र ने स्वर्ग की अप्सरा मेनका को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। देवराज इंद्र की आज्ञा पाकर; इंद्रलोक की सबसे सुंदर अप्सराओं में से एक मेनका; जो अपनी सुरीली आवाज से जानी जाती थी वह तत्क्षण मृत्यु लोक की और चल पड़ी। जब मेनका विश्वामित्र के सम्मुख गई तो वह विचार करने लगी कि आखिर किस तरह इस ऋषि को अपनी और आकर्षित किया जाए और उनकी तपस्या को भंग किया जाए। मेनका एक अप्सरा थी लेकिन विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए उन्होंने एक नारी का अवतार लिया था जिस में वह सभी गुण परिपूर्ण थे जो किसी नारी में होने चाहिए। इसके साथ ही मेनका अपने आप में ही आकर्षण का केंद्र भी थी क्योंकि उनकी सुंदरता इतनी अद्भुत थी कि कोई भी उन्हें देखकर उनकी ओर आकर्षित हो जाता था। भले ही मेनका सबसे गुणवान और सुंदरता में सबसे सुंदर थी लेकिन महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को भंग करना भी इतना आसान कार्य नहीं था। ये एक मुश्किल काम होने के बावजूद भी वो देवराज इंद्र की आज्ञा का पालन करने के लिए; इंद्रलोक में अपनी एक पहचान बनाने के लिए और अपना सिक्का चलाने के लिए वो ये अवसर खोना नहीं चाहती थी। मेनका ने ऋषि विश्वामित्र को अपनी ओर आकर्षित करने व रिझाने के लिए भरसक प्रयास किया। वो ऋषि विश्वामित्र को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हर संभव प्रयास कभी वो विश्वामित्र की आंखों का केंद्र बन जाती तो कभी मौन योगी शरीर से आलिंगन बद्ध सी हो जाती ताकि ऋषि की नजर अपने तप को छोड़ उस पर जम जाए और वो उसकी ओर आकर्षित हो जाए। लेकिन मेनका यह भूल गई थी कि तप करते-करते विश्वामित्र का शरीर कठोर बन चुका था और शरीर में किसी भी प्रकार की भावना नहीं थी लेकिन अप्सरा के निरंतर और भरसक प्रयास से विश्वामित्र के शरीर में धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा। मेनका के प्रयास से विश्वामित्र के शरीर में काम शक्ति का संचार होने लगा और देखते ही देखते एक समय ऐसा आया जब विश्वामित्र अपने तप निश्चय को भूलकर मेनका प्रेम में निछावर हो खड़े हो गए। सृष्टि के बदलाव को भूलकर वो एक स्त्री प्रेम में मगन हो गये जैसा अप्सरा मेनका ने सोचा था। सबकुछ बिल्कुल वैसा ही हुआ। महर्षि अप्सरा के प्यार में पड़ गए थे लेकिन वह यह नहीं जानते थे वह स्त्री एक अप्सरा है जिसके बनाए जाल में वे फंस चुके हैं। महर्षि यह भी नहीं जानते थे कि वह अप्सरा मेनका ही है जिसके चलते विश्वामित्र उस अप्सरा में उनकी अर्धांगिनी को देखने लग गए। महर्षि का तप तो मेनका ने तोड़ दिया था लेकिन फिर भी मेनका इंद्रलोक नहीं गई क्योंकि तप छोड़ने के बावजूद मेनका यदि वहां से चली जाती तो विश्वामित्र फिर से तप करना प्रारंभ कर देते हैं। इसीलिए उन्होंने विश्वामित्र के साथ ही कुछ वर्ष वही रहने का निर्णय किया कई वर्षों तक एक साथ रहने से विश्वामित्र और मेनका के दिल में एक दूसरे के प्रति प्यार जागृत हो गया देखते ही देखते एक दिन विश्वामित्र की संतान को अप्सरा ने जन्म दे दिया जो कि एक कन्या थी कन्या को जन्म देने के बाद ही मेनका वापस इंद्रलोक की ओर चली गई। मेनका और विश्वामित्र के गंधर्व योग से जन्मी एक कन्या को विश्वामित्र ने कण्व ऋषि के आश्रम में छोड़ दिया और यही आगे चलकर मेनका की पुत्री शकुंतला के नाम से जानी जाने लगी और सम्राट दुष्यंत से विवाह कर उन्हें भरत के रूप में एक पुत्र की प्राप्ति हुई भरत पुत्र के नाम से ही भारत देश का नाम प्रख्यात हुआ। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,

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