Radhe Radhe *🔴"राधा जी के प्यारे ~ कान्हा जी हमारे"🔴* *वृन्दावन* का एक भक्त ठाकुर जी को बहुत प्रेम करता था, भाव विभोर हो कर नित्य प्रतिदिन उनका श्रृंगार करता था। आनंदमय हो कर कभी रोता तो कभी नाचता। एक दिन श्रृंगार करते हुए जैसे ही मुकट लगाने लगा, तभी मुकट ठाकुर गिरा देते। एक बार दो बार कितनी बार लगाया पर छलिया तो आज लीला करने में लगे थे। अब भक्त को गुस्सा आ गया, वो ठाकुर से कहने लगा तोह को तेरे बाबा की कसम मुकट लगाई ले पर ठाकुर तो ठाकुर है, वो किसी की कसम माने ही नही। जब नही लगाया तो भक्त बोला तो को तेरी मइया की कसम। ठाकुर जी माने नही। अब भक्त का गुस्सा और बढ़ गया। उसने सबकी कसम दे दी। तोहे मेरी कसम.. तोरी गायिओ की कसम.. तोरे सखाँ की कसम.. तोरी गोपियों की कसम.. तोरे ग्वालों की कसम.. सबकी कसम दे दी, पर ठाकुर तो टस से मस ना हुए। अब भक्त बहुत परेशान हो गया और दुखी भी। फिर खीज गया और गुस्से में बोला- ऐ गोपियन के रसिया.. ऐ छलिया, गोपियन के दीवाने, तो को तोरी राधा की कसम है, अब तो मुकुट लगाले। बस फिर क्या था.. ठाकुर जी ने झट से मुकट धारण कर लिया। अब भक्त भी चिढ़ गया। अपनी कसम दी, गोप-गोपियों की, माँ, बाबा, ग्वालन की दी। किसी की नही सुनी लेकिन राधा की दी तो मान गये। अगले दिन फिर जब भक्त श्रंगार करने लगा तो इस बार ठाकुर ने बाँसुरी गिरा दी। भक्त हल्के से मुस्करायाऔर बोला- इस बार तोह को अपनी नही मेरी राधा की कसम। तो भी ठाकुर ने झट से बांसुरी लगा ली। : अब भक्त आनंद में आकर कर झर-झर रोने लगा। भक्त कहता है- मै समझ गया मेरे ठाकुर, तो को राधा भाव समान निश्चल निर्मल प्रेम ही पसंद है। समर्पण पसंद है। इसलिये राधा से प्रेम करत है। अपने भाव को राधा भाव समान निर्मल बना कर रखे अपने प्रेम को पूर्ण-समर्पण रखे सरलता में ही प्रभु है। : हे मेरी राधे जू, सारी रौनक देख ली ज़माने की मगर, जो सुकून तेरे चरणों में है, वो कहीं नहीं !!" *"जय जय श्री राधे....!!"*🌸💐👏🏼 *"जय श्री कृष्ण जी.....!!"*🌸💐👏🏼

Radhe Radhe
    *🔴"राधा जी के प्यारे ~ कान्हा जी हमारे"🔴*

               *वृन्दावन* का एक भक्त ठाकुर जी को बहुत प्रेम करता था, भाव विभोर हो कर नित्य प्रतिदिन उनका श्रृंगार करता था। आनंदमय हो कर कभी रोता तो कभी नाचता। एक दिन श्रृंगार करते हुए जैसे ही मुकट लगाने लगा, तभी मुकट ठाकुर गिरा देते। एक बार दो बार कितनी बार लगाया पर छलिया तो आज लीला करने में लगे थे। अब भक्त को गुस्सा आ गया, वो ठाकुर से कहने लगा तोह को तेरे बाबा की कसम मुकट लगाई ले पर ठाकुर तो ठाकुर है, वो किसी की कसम माने ही नही। जब नही लगाया तो भक्त बोला तो को तेरी मइया की कसम। ठाकुर जी माने नही। अब भक्त का गुस्सा और बढ़ गया। उसने सबकी कसम दे दी।
तोहे मेरी कसम..
तोरी गायिओ की कसम..
तोरे सखाँ की कसम..
तोरी गोपियों की कसम..
तोरे ग्वालों की कसम..
सबकी कसम दे दी, 
पर ठाकुर तो टस से मस ना हुए।
अब भक्त बहुत परेशान हो गया और दुखी भी। फिर खीज गया और
 गुस्से में बोला- ऐ गोपियन के रसिया..
ऐ छलिया,
गोपियन  के दीवाने,
तो को तोरी राधा की कसम है, 
अब तो मुकुट लगाले।
बस फिर क्या था.. ठाकुर जी ने झट से मुकट  धारण कर लिया।
अब भक्त भी चिढ़ गया। अपनी कसम दी, गोप-गोपियों की, माँ, बाबा,
 ग्वालन की दी। किसी की नही सुनी लेकिन राधा की दी तो मान गये।
अगले दिन फिर जब भक्त श्रंगार करने लगा तो इस बार ठाकुर ने
 बाँसुरी गिरा दी।
भक्त हल्के से मुस्करायाऔर बोला- इस बार  तोह को अपनी नही मेरी
 राधा की कसम। तो भी ठाकुर ने झट से बांसुरी लगा ली।
:
अब भक्त आनंद में आकर कर झर-झर रोने लगा। भक्त कहता है- मै समझ गया मेरे ठाकुर, तो को राधा भाव समान निश्चल निर्मल प्रेम ही पसंद है। समर्पण पसंद है।
इसलिये राधा से प्रेम करत है।
अपने भाव को राधा भाव समान निर्मल बना कर रखे अपने प्रेम को पूर्ण-समर्पण रखे सरलता में ही प्रभु है।
:
हे मेरी राधे जू, सारी रौनक देख ली ज़माने की मगर, जो सुकून तेरे चरणों में है, वो कहीं नहीं !!"

*"जय जय श्री राधे....!!"*🌸💐👏🏼
*"जय श्री कृष्ण जी.....!!"*🌸💐👏🏼

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🙌🏻 आज श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी के तिरोभाव महा-महोत्सव पर विशेष ::: यस्मै दातुं चोरयन् क्षीरभाण्डं गोपीनाथ: क्षीरचोराभिधोsभूत। श्रीगोपाल: प्रादुरासीद वश: सन् यत्प्रेम्णा तं माधववेन्द्रं नतोsस्मि।। श्रीगोपीनाथ ठाकुर ने जिनको देने के लिए क्षीर के भरे पात्र की चोरी की, अपना नाम *"क्षीर-चोरा गोपीनाथ"* धराया और प्रेम के वशीभूत होकर श्रीगोपाल जिनके सामने गोप-बालक रुप में साक्षात् प्रकट हुए उन *श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामी पाद* को मैं प्रणाम करता हूं। लौकिक लीला में श्रीमाधवेन्द्रपुरी जी श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु के परम गुरु हैं अर्थात गुरु के गुरु हैं। श्रीमाधवेन्द्रपुरी जी के शिष्य हैं श्रीईश्वरपुरी जी तथा श्री ईश्वरपुरी जी के शिष्य हैं श्रीमन्महाप्रभु। एक बार श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी अपने सेवित विग्रह श्रीगोवर्धनधारी गोपाल के लिए चन्दन लेने पूर्व देश की ओर गये। चलते चलते आप ओड़िसा के रेमुणा नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ पर श्रीगोपीनाथ जी के दर्शन कर आप बहुत प्रसन्न हुये। कुछ ही समय में 'अमृतकेलि' नामक खीर का भोग श्रीगोपीनाथ जी को निवेदन किया गया। तब आप के मन में विचार आया कि बिना माँगे ही इस खीर का प्रसाद मिल जाता तो मैं उसका आस्वादन करके, ठीक उसी प्रकार का भोग अपने गोपाल जी को लगाता……किन्तु साथ-साथ ही आपने अपने आपको धिक्कार दिया कि मेरी खीर खाने की इच्छा हुई। ठाकुर जी की आरती दर्शन करके और उन्हें प्रणाम करके आप मन्दिर से चले गये व एक निर्जन स्थान पर बैठ कर हरिनाम करने लगे। इधर मन्दिर का पुजारी ठाकुर गोपीनाथ जी की सेवा कार्य समाप्त कर सो गया। उसे स्वप्न में ठाकुर जी ने दर्शन दिये व कहा -- 'पुजारी उठो ! मन्दिर के दरवाज़े खोलो। मैंने एक संन्यासी के लिये खीर रखी हुई है जो कि मेरे आंचल के कपड़े से ढकी हुई है। मेरी माया के कारण तुम उसे नहीं जान पाये। माधवेन्द्र पुरी नाम के संन्यासी कुछ ही दूर एक निर्जन स्थान पर बैठे हैं, शीघ्रता से ये खीर ले जाकर उनको दे दो।' पुजारी आश्चर्य से उठा स्नान कर मन्दिर का दरवाज़ा खोला और देखा कि ठाकुर जी के आंचल के वस्त्र के नीचे एक खीर से भरा बर्तन रखा है। उसके खीर से भरा बर्तन उठाया व श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी को खोजने लगा। कुछ दूर जाकर श्रीमाधवेन्द्र पुरी जी से उसका मिलन हो गया। पुजारी जी ने अपने स्वप्न में हुए आदेश की बात श्रील माधवेन्द्र जी को बताई। श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी सारी बात सुन कर प्रेमाविष्ट हो गये। बड़े ही सम्मान के साथ आपने खीर से भरा बर्तन लिया व भगवान के आदेश के अनुसार प्रसाद पाया। श्री पुरीपाद ने अन्त समय जिस श्लोक का उच्चारण करते हुए नित्यलीला में प्रवेश किया उसके सम्बन्ध मे श्रीकृष्णदास कविराज ने कहा है, रत्नों मे जैसे कौस्तभमणि सर्वोतम है, उसी प्रकार वह श्लोक समस्त रसकाव्य में सर्वोतम है। *उस श्लोक को श्रीराधाजी ने रचा और उनकी कृपा से उसकी स्फूर्ति हुई श्रीपुरी की वाणी में फिर उसका आस्वादन किया श्रीमन्महाप्रभु ने।इन तीनों को छोड़कर चौथा व्यक्ति कोई नहीं जो इन भावों का आस्वादन कर सके-(श्रीचैतन्यचरितामृत २-४-२)* एइ श्लोक कहियाछेन राधा-ठकुरानी। तारं कृपाय स्फुरियाछे माधवेन्द्र वाणी।। किवा गौरचन्द्र इहा करे आस्वादन। इहा आस्वादिते आर नाहि चौथजन।। वह श्लोकरत्न इस प्रकार है- *अयि दीनदयार्द्-नाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे।* *हृदयं त्वदलोक कातरं दयति भ्राम्यति किं करोम्यहम्।।* हे दीनजन प्रति परम दयालु प्रभो ! हे मथुरानाथ ! मुझे आपके दर्शन कब होगें? हे प्राणनाथ ! आपको देखे बिना मेरा हृदय अति व्याकुल हो रहा है, मैं क्या करूँ?' इस श्लोक-रत्न का आस्वादन करते हुए श्रीपुरीपाद ने संवत् १५७० आज ही के दिन नित्यलीला में प्रवेश किया। 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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🌹🌹भक्तों का संसार🌹🌹 राजा हरिश्चंद्र एक बहुत बड़े दानवीर थे। उनकी ये एक खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए✊ 🙏🙏🙏🙏🙏हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी 😞नज़रें नीचे झुका लेते थे।* *ये बात सभी को अजीब लगती थी कि ये राजा कैसे दानवीर हैं। ये दान भी देते हैं और इन्हें शर्म भी आती है।* *ये बात जब तुलसीदासजी तक पहुँची तो उन्होंने राजा को चार पंक्तियाँ लिख भेजीं जिसमें लिखा था* - *ऐसी देनी देन जु* *कित सीखे हो सेन।* *ज्यों ज्यों कर ऊँचौ करौ* *त्यों त्यों नीचे नैन।।* *इसका मतलब था कि राजा तुम ऐसा दान देना कहाँ से सीखे हो? जैसे जैसे तुम्हारे हाथ ऊपर उठते हैं वैसे वैसे तुम्हारी नज़रें तुम्हारे नैन नीचे क्यूँ झुक जाते हैं?* *राजा ने इसके बदले में जो जवाब दिया वो जवाब इतना गजब का था कि जिसने भी सुना वो राजा का कायल हो गया।* *इतना प्यारा जवाब आज तक किसी ने किसी को नहीं दिया।* *राजा ने जवाब में लिखा* - *देनहार कोई और है* *भेजत जो दिन रैन।* *लोग भरम हम पर करैं* *तासौं नीचे नैन।।* *मतलब, देने वाला तो कोई और है वो मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती हैं।* *वो ही करता और वो ही करवाता है, क्यों बंदे तू इतराता है,* *एक साँस भी नही है तेरे बस की, वो ही सुलाता और वो ही जगाता है........* जय जय श्री राधे🙏🙏🙏

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🙌🏻 आज सिद्ध श्रील जयकृष्ण दास बाबा (काम्यवन)के तिरोभाव महा-महोत्सव पर विशेष :: सिद्ध श्री जयकृष्णदास बाबा का जन्म बंगाल राज्य के किसी छोटे से ग्राम में हुआ। बचपन से ही हृदय में गौर चरणों के प्रति सहज प्रीति थी। महाप्रभु जी की असीम कृपा के कारण जगत से वैराग्य हुआ और वृंदावन की ओर पैदल चल पड़े। रात्रि में एक दिन श्री वृंदा देवी ने स्वपन में कहा - तुम काम्यवन के विमलकुण्ड पर जाकर भजन करो। बाबा आज्ञा मानकर विमलकुण्ड पर भजन करने लगे। बाबा को वहां के गोप बालक परेशान करने लगे। बाबा ने विचार किया कहीं अन्य जगह जाकर एकांत में भजन करेंगे। गांव वासियों ने बाबा के लिए एक पक्की कुटिया बनवा दी जिसमें बाबा निरंतर भजन में डूबे रहते। रात भर श्यामा श्याम के ही याद में अश्रु विसर्जन करते रहते। कभी -कभी विरह में इतने व्यथित हो जाते कि प्रेम वेश में ऐसी हुंकार भरते दिशाएं विकम्पित हो जाती है। एक बार उनकी विरह हूँकार से कुटिया की छत ही फट गई जो आज भी दर्शनीय है। एक दिन मध्याह् में बाबा मानसिक लीला चितवन कर रहे थे कि विमलकुंड के चारों और असंख्य गाय और गोप बालक आ गए। गोप बालक कुटिया के बाहर से चिल्लाने लगे - बाबा ओ बाबा! प्यास लगी है। नेक जल पिवाय दे। बाबा तो पहले से ही गांव की गवारिया बालकों से परेशान थे। बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया। परंतु बालक भी कौन से कम थे ? अनेक प्रकार के उत्पात करने लगे । कुछ बालक दरवाजे के पास आकर बोले - बाबा ओ बंगाली बाबा! हम सब जाने कि तू कहां भजन करे है। अरे! कुटिया ते निकल के जल पिवाय दें। हम सबकूँ बड़ी प्यास लगी है। बाबा एक लकड़ी हाथ में लेकर क्रोधित होकर बाहर आ गए। सामने क्या देखें असंख्य गाय और गोप बालक। सब एक से एक सुंदर। एक से एक अद्भुत। उनको देखते ही बाबा का क्रोध शांत हो गया। एक बालक जो सबसे सुंदर था उससे बाबा ने पूछा - लाला तुम कौन से गांव से आए हो? बालक बोला -नंदगांव ते। बाबा बोले- आपका नाम क्या है? कन्हैया ! बालक ने उत्तर दिया। दूसरे बालक से पूछा- तुम्हारा नाम क्या है? बालक ने कहा - बलदाऊ! कहै मोते। सभी बालक एक साथ बोल पड़े। देख बाबा पहले जल पिवाय दै। बात पीछे करियो। बाबा ने स्नेहवश करुवे से सब को जल पिला दिया। बालक बोले- देख बाबा ! हम इतेक दूर ते आमें है, प्यासे ही चले जाएं। तू कछू जल और बाल भोग राख्यो कर। बाबा बोले -नहीं नहीं। रोज -रोज परेशान मत करना। बाबा कुटिया में चले गये। अब बाबा सोचने लगे - ऐसा अद्भुत बालक और ऐसी सुंदर गाय तो मैंने कभी नहीं देखी। और ना ही मधुर हृदय को आनंद प्रदान करने वाली वाणी सुनी। ये सभी यहां के थे या दिव्य थे। बाबा ने विचार किया अभी तो बाहर ही हैं एक बार और देख लूँ। जैसे ही बाबा बाहर आए तो देखा न तो वहां गाय थी न गोप बालक। बाबा दुखित: हो उन बालकों के वचन को याद करने लगे। तभी बाबा को तंद्रा आ गई। श्री कृष्ण बोले - बाबा दुखी मत हो! कल तेरे पास में फिर आऊंगो। बाबा की तंद्रा टूटी और धैर्य धारण किया। दूसरे दिन एक वृद्धा मैया में एक गोपाल जी का वि्ग्रह लेकर बाबा के पास आई। बोली- बाबा!मोते अब जाकी सेवा नॉय होय। लै तू जाकी सेवा कियौ कर। बाबा बोले -मैं इनकी सेवा कैसे करूंगा ? सेवा की सामग्री कहां से लाऊंगा? वृद्धा मैया बोली -तू चिंता मत कर मैं रोज सेवा की सामग्री दै जायो करूंगी। ऐसा कह कर वृद्धा मैया चली गई। बाबा प्रेम से गोपाल जी को निहारने लगे। अति सुंदर छवि को देखकर बाबा मुग्ध हो गये। उसी रात्रि वृद्धा मैया ने बाबा को स्वप्न में कहा -बाबा! मैं वृंदा देवी हूं।श्यामसुंदर की आज्ञा से वृद्धा के रूप में गोपाल जी देने मैं ही आई थी। अब तू प्रेम से गोपाल की सेवा कियौ कर। बाबा प्रेम से गोपाल जी की सेवा करने लगे। इस प्रकार एक दिन बाबा मानसी लीला में डूबे हुए थे। अचानक बाबा पुकारने लगे - मेरे लहंगा कहां है, मेरी फरिया कहां हैं ? अपने दिव्य मंजरी स्वरुप को प्राप्त कर बाबा चैत्र शुक्ल द्वादशी अर्थात आज ही के दिन भौतिक देह छोड़कर निकुंज लीला में प्रवेश कर गए। एक संत बलरामदास जी कहते है- "जहां मर कै जाना है 'बलि' तहाँ जिन्दा क्यों नही जाइये।।" 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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आदिकवि संस्कृतज्ञ कालिदास..🍃🍃🍃 #कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की और उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं। कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं और कुछ विद्वान उन्हें राष्ट्रीय #कवि का स्थान तक देते हैं। #अभिज्ञानशाकुंतलम् कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना है। यह नाटक कुछ उन भारतीय साहित्यिक कृतियों में से है जिनका सबसे पहले यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ था। यह पूरे विश्व साहित्य में अग्रगण्य रचना मानी जाती है। #मेघदूतम् कालिदास की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसमें कवि की कल्पनाशक्ति और अभिव्यंजनावादभावाभिव्यन्जना शक्ति अपने सर्वोत्कृष्ट स्तर पर है और प्रकृति के मानवीकरण का अद्भुत रखंडकाव्ये से खंडकाव्य में दिखता है। कालिदास #वैदर्भी रीति के कवि हैं और तदनुरूप वे अपनी अलंकारयुक्त किन्तु सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके प्रकृति वर्णन अद्वितीय हैं और विशेष रूप से अपनी उपमाओं के लिये जाने जाते हैं। साहित्य में औदार्य गुण के प्रति कालिदास का विशेष प्रेम है और उन्होंने अपने शृंगार रस प्रधान साहित्य में भी आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है। कालिदास के परवर्ती कवि #बाणभट्ट ने उनकी सूक्तियों की विशेष रूप से प्रशंसा की है। समय: कालिदास किस काल में हुए और वे मूलतः किस स्थान के थे इसमें काफ़ी विवाद है। चूँकि, कालिदास ने द्वितीय शुंग शासक #अग्निमित्र को नायक बनाकर #मालविकाग्निमित्रम् नाटक लिखा और अग्निमित्र ने १७० ईसापू्र्व में शासन किया था, अतः कालिदास के समय की एक सीमा निर्धारित हो जाती है कि वे इससे पहले नहीं हुए हो सकते। छठीं सदी ईसवी में बाणभट्ट ने अपनी रचना #हर्षचरितम् में कालिदास का उल्लेख किया है तथा इसी काल के पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में कालिदास का जिक्र है अतः वे इनके बाद के नहीं हो सकते। इस प्रकार कालिदास के प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईसवी के मध्य होना तय है। दुर्भाग्यवश इस समय सीमा के अन्दर वे कब हुए इस पर काफ़ी मतभेद हैं। विद्वानों में (i) द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व का मत (ii) प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत (iii) तृतीय शताब्दी ईसवी का मत (iv) चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत (v) पाँचवी शताब्दी ईसवी का मत, तथा (vi) छठीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध का मत; प्रचलित थे। इनमें ज्यादातर खण्डित हो चुके हैं या उन्हें मानने वाले इक्के दुक्के लोग हैं किन्तु मुख्य संघर्ष 'प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत और 'चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत' में है। प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व का मत - परम्परा के अनुसार कालिदास #उज्जयिनी के उन राजा #विक्रमादित्य के समकालीन हैं जिन्होंने ईसा से 57 वर्ष पूर्व विक्रम संवत् चलाया। #विक्रमोर्वशीय के नायक #पुरुरवा के नाम का विक्रम में परिवर्तन से इस तर्क को बल मिलता है कि कालिदास उज्जयनी के राजा विक्रमादित्य के राजदरबारी कवि थे। इन्हें विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक माना जाता है। चतुर्थ शताब्दी ईसवी का मत - अन्य इतिहासकार कालिदास को गुप्त शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और उनके उत्तराधिकारी कुमारगुप्त से जोड़ते हैं, जिनका शासनकाल चौथी शताब्दी में था। ऐसा माना जाता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि ली और उनके शासनकाल को स्वर्णयुग माना जाता है। विवाद और पक्ष-प्रतिपक्ष - कालिदास ने शुंग राजाओं के छोड़कर अपनी रचनाओं में अपने आश्रयदाता या किसी साम्राज्य का उल्लेख नहीं किया। सच्चाई तो यह है कि उन्होंने #पुरुरवा और #उर्वशी पर आधारित अपने नाटक का नाम विक्रमोर्वशीयम् रखा। कालिदास ने किसी गुप्त शासक का उल्लेख नहीं किया। विक्रमादित्य नाम के कई शासक हुए, संभव है कि कालिदास इनमें से किसी एक के दरबार में कवि रहे हों। अधिकांश विद्वानों का मानना है कि कालिदास शुंग वंश के शासनकाल में थे, जिनका शासनकाल 100 सदी ईसापू्र्व था। अग्निमित्र, जो मालविकाग्निमित्र नाटक का नायक है, कोई सुविख्यता राजा नहीं था, इसीलिए कालिदास ने उसे विशिष्टता प्रदान नहीं की। उनका काल ईसा से दो शताब्दी पूर्व का है और #विदिशा उसकी राजधानी थी। कालिदास के द्वारा इस कथा के चुनाव और मेघदूत में एक प्रसिद्ध राजा की राजधानी के रूप में उसके उल्लेख से यह निष्कर्ष निकलता है कि कालिदास अग्निमित्र के समकालीन थे। यह स्पष्ट है कि कालिदास का उत्कर्ष अग्निमित्र के बाद (150 ई॰ पू॰) और 634 ई॰ पूर्व तक रहा है, जो कि प्रसिद्ध ऐहोल के शिलालेख की तिथि है, जिसमें कालिदास का महान कवि के रूप में उल्लेख है। यदि इस मान्यता को स्वीकार कर लिया जाए कि माण्डा की कविताओं या 473 ई॰ के शिलालेख में कालिदास के लेखन की जानकारी का उल्लेख है, तो उनका काल चौथी शताब्दी के अन्त के बाद का नहीं हो सकता। #अश्वघोष के बुद्धचरित और कालिदास की कृतियों में समानताएं हैं। यदि अश्वघोष कालिदास के ऋणी हैं तो कालिदास का काल प्रथम शताब्दी ई॰ से पूर्व का है और यदि कालिदास अश्वघोष के ऋणी हैं तो कालिदास का काल ईसा की प्रथम शताब्दी के बाद ठहरेगा। जन्म स्थान: कालिदास के जन्मस्थान के बारे में भी विवाद है। मेघदूतम् में उज्जैन के प्रति उनकी विशेष प्रेम को देखते हुए कुछ लोग उन्हें #उज्जैन का निवासी मानते हैं। साहित्यकारों ने ये भी सिद्ध करने का प्रयास किया है कि कालिदास का जन्म उत्तराखंड के #रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांव में हुआ था। कालिदास ने यहीं अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी औऱ यहीं पर उन्होंने मेघदूत, #कुमारसंभव औऱ #रघुवंशम जैसे महाकाव्यों की रचना की थी। कविल्ठा चारधाम यात्रा मार्ग में गुप्तकाशी में स्थित है। #गुप्तकाशी से कालीमठ सिद्धपीठ वाले रास्ते में कालीमठ मंदिर से चार किलोमीटर आगे कविल्ठा गांव स्थित है। कविल्ठा में सरकार ने कालिदास की प्रतिमा स्थापित कर एक सभागार की भी निर्माण करवाया है। जहां पर हर साल जून माह में तीन दिनों तक गोष्ठी का आयोजन होता है, जिसमें देशभर के विद्वान भाग लेते हैं। जीवन: कथाओं और किम्वादंतियों के अनुसार कालिदास शक्लो-सूरत से सुंदर थे और विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में एक थे। कहा जाता है कि प्रारंभिक जीवन में कालिदास अनपढ़ और मूर्ख थे। कालिदास का विवाह #विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी से हुआ। ऐसा कहा जाता है कि विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे शास्त्रार्थ में हरा देगा, वह उसी के साथ विवाह करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दिया तो हार को अपमान समझकर कुछ विद्वानों ने बदला लेने के लिए विद्योत्तमा का विवाह महामूर्ख व्यक्ति के साथ कराने का निश्चय किया। चलते चलते उन्हें एक वृक्ष दिखाई दिया जहां पर एक व्यक्ति जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। उन्होंने सोचा कि इससे बड़ा मूर्ख तो कोई मिलेगा ही नहीं। उन्होंने उसे राजकुमारी से विवाह का प्रलोभन देकर नीचे उतारा और कहा- "मौन धारण कर लो और जो हम कहेंगे बस वही करना"। उन लोगों ने स्वांग भेष दिलाकर विद्योत्तमा के सामने प्रस्तुत किया कि हमारे गुरु आप से शास्त्रार्थ करने के लिए आए है, परंतु अभी मौनव्रती हैं, इसलिए ये हाथों के संकेत से उत्तर देंगे। इनके संकेतों को समझ कर हम वाणी में उसका उत्तर आपको देंगे। शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। विद्योत्तमा मौन शब्दावली में गूढ़ प्रश्न पूछती थी, जिसे कालिदास अपनी बुद्धि से मौन संकेतों से ही जवाब दे देते थे। प्रथम प्रश्न विद्योत्तमा ने किया संकेत में एक उंगली दिखा कर कि ब्रह्म एक है। परन्तु कालिदास ने समझा कि ये राजकुमारी मेरी एक आंख फोड़ना चाहती है। क्रोध में उन्होंने दो अंगुलियों का संकेत किया इस भाव से कि तू मेरी एक आंख फोड़ेगी तो मैं तेरी दोनों फोड़ दूंगा। लेकिन कपटियों ने उनके संकेत को कुछ इस तरह समझाया कि आप कह रही हैं कि ब्रह्म एक है लेकिन हमारे गुरु कहना चाहते हैं कि उस एक ब्रह्म को सिद्ध करने के लिए दूसरे (जगत्) की सहायता लेनी होती है। अकेला ब्रह्म स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकता। राज कुमारी ने दूसरे प्रश्न के रूप में खुला हाथ दिखाया कि तत्व पांच है। तो कालिदास को लगा कि यह थप्पड़ मारने की धमकी दे रही है। उसके जवाब में कालिदास ने घूंसा दिखाया कि तू यदि मुझे गाल पर थप्पड़ मारेगी, मैं घूंसा मार कर तेरा चेहरा बिगाड़ दूंगा। पुनः कपटियों ने समझाया कि गुरु कहना चाह रहे हैं कि भले ही आप कह रही हो कि पांच तत्व अलग-अलग हैं पृथ्वी जल आकाश वायु अग्नि। परंतु यह तत्व प्रथक्-प्रथक् रूप में कोई विशिष्ट कार्य संपन्न नहीं कर सकते। परन्तु आपस में मिलकर एक होकर उत्तम मनुष्य शरीर का रूप ले लेते है जो जो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इस प्रकार प्रश्न उत्तर से अंत में विद्युत तमा अपनी हार स्वीकार कर लेती है। फिर शर्त के अनुसार कालिदास और विद्योत्तमा का विवाह होता है। विवाह के पश्चात कालिदास के दो तमा को लेकर अपनी कुटिया में आ जाते हैं और प्रथम रात्रि को ही जब दोनों एक साथ होते हैं उसी समय ऊंट की आवाज आती है तो संस्कृत में विद्योत्तमा में पूछती है "किमेतत्" परंतु कालिदास संस्कृत जानते नहीं थे, इसीलिए उनके मुंह से निकल गया "ऊट्र" उस समय विद्योत्तमा को पता चला कि कालिदास अनपढ़ है। उसने कालिदास को धिक्कारा और यह कह कर घर से निकाल दिया कि सच्चे विद्वान् बने बिना घर वापिस नहीं आना। कालिदास ने सच्चे मन से काली देवी की आराधना की और उनके आशीर्वाद से वे ज्ञानी और धनवान बन गए। ज्ञान प्राप्ति के बाद जब वे घर लौटे तो उन्होंने दरवाजा खड़का कर कहा - कपाटम् उद्घाट्य सुन्दरि! (दरवाजा खोलो, सुन्दरी)। विद्योत्तमा ने चकित होकर कहा -- अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः (कोई विद्वान लगता है)। इस प्रकार, इस किम्वदन्ती के अनुसार, कालिदास ने विद्योत्तमा को अपना पथप्रदर्शक गुरु माना और उसके इस वाक्य को उन्होंने अपने काव्यों में जगह दी। कुमारसंभवम् का प्रारंभ होता है- अस्त्युत्तरस्याम् दिशि… से, मेघदूतम् का पहला शब्द है- कश्चित्कांता… और रघुवंशम्की शुरुआत होती है- वागार्थविव… से। रचनाएं: छोटी-बड़ी कुल लगभग चालीस रचनाएँ हैं जिन्हें अलग-अलग विद्वानों ने कालिदास द्वारा रचित सिद्ध करने का प्रयास किया है। इनमें से मात्र सात ही ऐसी हैं जो निर्विवाद रूप से कालिदासकृत मानि जाती हैं: तीन नाटक(रूपक): अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम्; दो महाकाव्य: रघुवंशम् और कुमारसंभवम्; और दो खण्डकाव्य: मेघदूतम् और #ऋतुसंहार। नाटक: मालविकाग्निमित्रम् कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा #दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री #शकुन्तला (#विश्वामित्र और #मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है। कहा जाता है काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला (कविता के अनेक रूपों में अगर सबसे सुन्दर नाटक है तो नाटकों में सबसे अनुपम शकुन्तला है।) विक्रमोर्वशीयम् एक रहस्यों भरा नाटक है। इसमें पुरूरवा इंद्रलोक की अप्सरा उर्वशी से प्रेम करने लगते हैं। पुरूरवा के प्रेम को देखकर उर्वशी भी उनसे प्रेम करने लगती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने जाती है तो पुरूरवा से प्रेम के कारण वह वहां अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती है। इससे इंद्र गुस्से में उसे शापित कर धरती पर भेज देते हैं। हालांकि, उसका प्रेमी अगर उससे होने वाले पुत्र को देख ले तो वह फिर स्वर्ग लौट सकेगी। विक्रमोर्वशीयम् काव्यगत सौंदर्य और शिल्प से भरपूर है। महाकाव्य व खण्डकाव्य: कुमारसंभवम् उनके महाकाव्यों के नाम है। रघुवंशम् में सम्पूर्ण रघुवंशके राजाओं की गाथाएँ हैं, तो कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और कार्तिकेय के जन्म की कहानी है। रघुवंशम् में कालिदास ने रघुकुल के राजाओं का वर्णन किया है। मेघदूतम् एक गीतिकाव्य है जिसमें यक्ष द्वारा मेघ से सन्देश ले जाने की प्रार्थना और उसे दूत बना कर अपनी प्रिय के पास भेजने का वर्णन है। मेघदूत के दो भाग हैं - पूर्वमेघ एवं उत्तरमेघ। ऋतुसंहारम् में सभी ऋतुओं में प्रकृति के विभिन्न रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके अलावा कई छिटपुट रचनाओं का श्रेय कालिदास को दिया जाता है, लेकिन विद्वानों का मत है कि ये रचनाएं अन्य कवियों ने कालिदास के नाम से की। नाटककार और कवि के अलावा कालिदास ज्योतिष के भी विशेषज्ञ माने जाते हैं। उत्तर कालामृतम् नामक ज्योतिष पुस्तिका की रचना का श्रेय कालिदास को दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि काली देवी की पूजा से उन्हें ज्योतिष का ज्ञान मिला। इस पुस्तिका में की गई भविष्यवाणी सत्य साबित हुईं। कालिदास की अन्यतम रचनाओं में श्रुतबोधम्, शृंगार तिलकम्, शृंगार रसाशतम्, सेतुकाव्यम्, पुष्पबाण विलासम्, श्यामा दंडकम्, ज्योतिर्विद्याभरणम् आदि प्रसिद्ध हैं। काव्य सौन्दर्य: कालिदास को कविकुलगुरु, कनिष्ठिकाधिष्ठित और कविताकामिनीविलास जैसी प्रशंशात्मक उपाधियाँ प्रदान की गयी हैं जो उनके काव्यगत विशिष्टताओं से अभिभूत होकर ही दी गयी हैं। कालिदास के काव्य की विशिष्टताओं का वर्णन निम्नवत किया जा सकता है: कालिदास अपनी विषय-वस्तु देश की सांस्कृतिक विरासत से लेते हैं और उसे वे अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप ढाल देते हैं। उदाहरणार्थ, अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा में शकुन्तला चतुर, सांसारिक युवा नारी है और दुष्यन्त स्वार्थी प्रेमी है। इसमें कवि तपोवन की कन्या में प्रेमभावना के प्रथम प्रस्फुटन से लेकर वियोग, कुण्ठा आदि की अवस्थाओं में से होकर उसे उसकी समग्रता तक दिखाना चाहता है। उन्हीं के शब्दों में नाटक में जीवन की विविधता होनी चाहिए और उसमें विभिन्न रुचियों के व्यक्तियों के लिए सौंदर्य और माधुर्य होना चाहिए। त्रैगुण्योद्भवम् अत्र लोक-चरितम् नानृतम् दृश्यते। नाट्यम् भिन्न-रुचेर जनस्य बहुधापि एकम् समाराधनम्।। कालिदास के जीवन के बारे में हमें विशेष जानकारी नहीं है। उनके नाम के बारे में अनेक किवदन्तियां प्रचलित हैं जिनका कोई ऐतिहासिक मूल्य नहीं है। उनकी कृतियों से यह विदित होता है कि वे ऐसे युग में रहे जिसमें वैभव और सुख-सुविधाएं थीं। संगीत तथा नृत्य और चित्र-कला से उन्हें विशेष प्रेम था। तत्कालीन ज्ञान-विज्ञान, विधि और दर्शन-तंत्र तथा संस्कारों का उन्हें विशेष ज्ञान था। उन्होंने भारत की व्यापक यात्राएं कीं और वे हिमालय से कन्याकुमारी तक देश की भौगोलिक स्थिति से पूर्णतः परिचित प्रतीत होते हैं। हिमालय के अनेक चित्रांकन जैसे विवरण और #केसर की क्यारियों के चित्रण (जो कश्मीर में पैदा होती है) ऐसे हैं जैसे उनसे उनका बहुत निकट का परिचय है। जो बात यह महान कलाकार अपनी लेखिनी के स्पर्श मात्र से कह जाता है, अन्य अपने विशद वर्णन के उपरांत भी नहीं कह पाते। कम शब्दों में अधिक भाव प्रकट कर देने और कथन की स्वाभाविकता के लिए कालिदास प्रसिद्ध हैं। उनकी उक्तियों में ध्वनि और अर्थ का तादात्मय मिलता है। उनके शब्द-चित्र सौन्दर्यमय और सर्वांगीण सम्पूर्ण हैं, जैसे – एक पूर्ण गतिमान राजसी रथ (विक्रमोर्वशीय, 1.4), दौड़ते हुए मृग-शावक (अभिज्ञान-शाकुन्तल, 1.7), उर्वशी का फूट-फूटकर आंसू बहाना (विक्रमोर्वशीय, छन्द 15), चलायमान कल्पवृक्ष की भांति अन्तरिक्ष में नारद का प्रकट होना (विक्रमोर्वशीय, छन्द 19)। उपमा और रूपकों के प्रयोग में वे सर्वोपरि हैं। सरसिजमनुविद्धं शैवालेनापि रम्यंमलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति। इयमिधकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वीकिमिह मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्।। ‘कमल यद्यपि शिवाल में लिपटा है, फिर भी सुन्दर है। चन्द्रमा का कलंक, यद्यपि काला है, किन्तु उसकी सुन्दरता बढ़ाता है। ये जो सुकुमार कन्या है, इसने यद्यपि वल्कल-वस्त्र धारण किए हुए हैं तथापि वह और सुन्दर दिखाई दे रही है। क्योंकि सुन्दर रूपों को क्या सुशोभित नहीं कर सकता ?’ कालिदास की रचनाओं में सीधी उपदेशात्मक शैली नहीं है अपितु प्रीतमा पत्नी के विनम्र निवेदन सा मनुहार है। मम्मट कहते हैं : ‘कान्तासम्मिततयोपदेशायुजे।’ उच्च आदर्शों के कलात्मक प्रस्तुतीकरण से कलाकार हमें उन्हें अपनाने को विवश करता है। हमारे समक्ष जो पात्र आते हैं हम उन्हीं के अनुरूप जीवन में आचरण करने लगते हैं और इससे हमें व्यापक रूप में मानवता को समझने में सहायता मिलती है। संस्कृतिक एवं सामाजिक तत्त्व: एक महान सांस्कृतिक विरासत पर कालिदास के समृद्ध एवं उज्जवल व्यक्तित्व की छाप है और उन्होंने अपनी रचनाओं में मोक्ष, व्यवस्था और प्रेम के आदर्शों को अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने व्यक्ति को संसार के दु:ख-दर्द और संघर्षों से अवगत कराने के लिए, प्रेम-वासना, इच्छा-आकांक्षा, आशा-स्वप्न, सफलता विफलता आदि को अभिव्यक्ति दी है। भारत ने जीवन को अपनी समग्रता में देखा है और उसमें किसी भी विखण्डन का विरोध किया है। कवि ने उन मानसिक द्वन्द्वों का वर्णन किया है जो आत्मा को विभक्त करते हैं और इस तरह उन्होंने इसे समग्रता में देखने में हमारी सहायता की है। कालिदास की रचनाओं में हमारे लिए सौंदर्य के क्षण, साहसिक घटनाएं, त्याग के दृश्य और मानव मन की नित-नित बदलती मनः स्थितियों के रूप संरक्षित हैं। उनकी कृतियां मानव प्रारब्ध के वर्णनातीत चित्रण के लिए सदैव पढ़ी जाती रहेंगी क्योंकि कोई महान कवि ही ऐसी प्रस्तुतियां दे सकता है। उनकी अनेक पंक्तियां संस्कृत में सूक्तियां बन गई हैं। उनकी मान्यता है कि हिमालय क्षेत्र में विकसित संस्कृति विश्व की संस्कृतियों की मापदण्ड हो सकती है। यह संस्कृति मूलतः आध्यात्मिक है। हम सभी सामान्यतः समय-चक्र में कैद हैं और इसीलिए हम अपने अस्तित्व की संकीर्ण सीमाओं में घिरे हैं। अतः हमारा उद्देश्य अपने मोहजालों से मुक्त होकर चेतना के उस सत्य को पाने का होना चाहिए जो देश-काल से परे है जो अजन्मा, चरम और कालातीत है। हम इसका चिंतन नहीं कर सकते, इसे वर्गों, आकारों और शब्दों में विभाजित नहीं कर सकते। इस चरम सत्य की अनुभूति का ज्ञान ही मानव का उद्देश्य है। रघुवंश के इन शब्दों को देखिए - ‘ब्रह्माभूयम् गतिम् अजागम्।’ ज्ञानीपुरुष कालातीत परम सत्य के जीवन को प्राप्त होते हैं। वह जो चरम सत्य है सभी अज्ञान से परे है और वह आत्मा और पदार्थ के विभाजन से ऊपर है। वह सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है। वह अपने को तीन रूपों में व्यक्त करता है (त्रिमूर्ति) ब्रह्मा, विष्णु और शिव – कर्त्ता, पालक तथा संहारक। ये देव समाज पद वाले हैं आम जीवन में कालिदास शिवतंत्र के उपासक हैं। तीनों नाटकों – अभिज्ञान शाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय, मालविकाग्निमित्र – की आरम्भिक प्रार्थनाओं से प्रकट होता है कि कालिदास शिव-उपासक थे। रघुवंश के आरम्भिक श्लोक में : जगतः पितरौ वन्दे पार्वती-परमेश्वरौ। यद्यपि कालिदास परमात्मा के शिव रूप के उपासक हैं तथापि उनका दृष्टिकोण किसी भी प्रकार संकीर्ण नहीं है। परम्परागत हिन्दू धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण उदार है। दूसरों के विश्वासों को उन्होंने सम्मान की दृष्टि से देखा। कालिदास की सभी धर्मों के प्रति सहानुभूति है और वे दुराग्रह और धर्मान्धता से मुक्त हैं। कोई भी व्यक्ति वह मार्ग चुन सकता है जो अच्छा लगता है क्योंकि अन्ततः ईश्वर के विभिन्न रूप एक ही ईश्वर के विभिन्न रूप हैं जो सभी रूपों में निराकार है। कालिदास पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानते हैं। यह जीवन में पूर्णता के मार्ग की एक अवस्था है। जैसे हमारा वर्तमान जीवन पूर्व कर्मों का फल है वैसे ही हम इस जन्म में प्रयासों से अपना भविष्य सुधार सकते हैं। विश्व पर सदाचार का शासन है। विजय अन्ततः अच्छाई की होगी। यदि कालिदास की रचनाएं दुखान्त नहीं हैं तो उसका कारण यह कि वे सामंजस्य और शालीनता के अन्तिम सत्य को स्वीकारते हैं। इस मान्यता के अन्तर्गत वे अधिकांश स्त्री-पुरुषों के दुःख-दर्दों के प्रति हमारी सहानुभूति को मोड़ देते हैं। कालिदास की रचनाओं से इस गलत धारणा का निराकरण हो जाता है कि हिन्दू मस्तिष्क ने ज्ञान-ध्यान पर अधिक ध्यान दिया और सांसारिक दुःख-दर्दों की उन्होंने अवहेलना की। कालिदास के अनुभव का क्षेत्र व्यापक था। उन्होंने जीवन, लोक, चित्रों और फूलों में समान आनन्द लिया। उन्होंने मानव को सृष्टि (ब्रह्माण्ड) और धर्म की शक्तियों से अलग करके नहीं देखा। उन्हें मानव के सभी प्रकार के दुःखों, आकांक्षाओं, क्षणिक खुशियों और अन्तहीन आशाओं का ज्ञान था। वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – मानव जीवन के चार पुरुषार्थों में सामंजस्य के पोषक थे। अर्थ पर, जिसमें राजनीति और कला भी सम्मिलित है धर्म का शासन रहना चाहिए। साध्य और साधन में परस्पर सह-संबंध है। जीवन वैध (मान्य) संबंधों से ही जीने योग्य रहता है। इन संबंधों को स्वच्छ और उज्जवल बनाना ही कवि का उद्देश्य था। इतिहास प्राकृतिक तथ्य न होकर नैतिक सत्य है। यह काल-क्रम का लेखा-जोखा मात्र नहीं है। इसका सार अध्यात्म में निहित है जो आगे की पीढ़ियों को ज्ञान प्रदान करता है। इतिहासकारों को अज्ञान को भेद कर उस आन्तरिक नैतिक गतिशीलता को आत्मसात करना चाहिए। इतिहास मानव की नैतिक इच्छा का फल है जिसकी अभिव्यक्तियां स्वतंत्रता और सृजन हैं। रधुवंश के राजा जन्म से ही निष्कलंक थे। धरती से लेकर समुद्र तक (आसमुद्रक्षितिसानाम्) इनका व्यापक क्षेत्र में शासन था। इन्होंने धन का संग्रह दान के लिए किया, सत्य के लिए चुने हुए शब्द कहे, विजय की आकांक्षा यश के लिए की और गृहस्थ जीवन पुत्रेष्णा के लिए रखा। बचपन में शिक्षा, युवावस्था में जीवन के सुखभोग, वृद्धावस्था में आध्यात्मिक जीवन और अन्त में योग या ध्यान द्वारा शरीर का त्याग किया। राजाओं ने राजस्व की वसूली जन-कल्याण के लिए की, ‘प्रजानाम् एवं भूत्यार्थम्’ जैसे सूर्य जल लेता है और उसे सहस्रगुणा करके लौटा देता है। राजाओं का लक्ष्य धर्म और न्याय होना चाहिए। राजा ही प्रजा का सच्चा पिता है, वह उन्हें शिक्षा देता है, उनकी रक्षा करता है और उन्हें जीविका प्रदान करता है जबकि उनके माता-पिता केवल उनके भौतिक जन्म के हेतु हैं। राजा अज के राज्य में प्रत्येक व्यक्ति यही मानता था कि राजा उनका व्यक्तिगत मित्र है। शाकुन्तलं में तपस्वी राजा से कहता है : ‘आपके शस्त्र त्रस्त और पीड़ितों की रक्षा के लिए हैं न कि निर्दोषों पर प्रहार के लिए।’ ‘आर्त त्राणाय वाह शस्त्रम् न प्रहारतुम् अनगसि।’ दुष्यन्त एवं शकुन्तला का पुत्र भरत, जिसके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है, सर्वदमन भी कहलाता है – यह केवल इसलिए नहीं कि उसने केवल भयानक वन्य पशुओं पर विजयी पायी अपितु उसमें आत्मसंयम भी था। राजा के लिए आत्मसंयम भी अनिवार्य है। रघुवंश में अग्निवर्ण दुराचारी हो जाता है। उसके अन्तःपुर में इतनी अधिक नारियां हैं कि वह उनका सही नाम तक नहीं जान पाता। उसे क्षय हो जाता है और उस अवस्था में भी भोग का आनन्द नहीं छोड़ पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है। शालीन मानव-जीवन के लिए संयम अनिवार्य है। कालिदास कहते है : ‘हे कल्याणी, खान से निकलने के उपरांत भी कोई भी रत्न स्वर्ण में नहीं जड़ा जाता, जब तक उसे तराशा नहीं जाता।’ यद्यपि कालिदास की कृतियों में तप को भव्यता प्रदान की गई है और साधु और तपस्वियों को पूजनीय रूप में प्रस्तुत किया गया है, तथापि कहीं भी भिक्षापात्र की सराहना नहीं की गई। धर्म के नियम जड़ एवं अपरिवर्तनीय नहीं हैं। परम्परा को अपनी अन्तर्दृष्टि और ज्ञान से सही अर्थ दिया जाना चाहिए। परम्परा और व्यक्तिगत अनुभव एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां हमें एक ओर अतीत विरासत में मिला है वहीं हम दूसरी ओर भविष्य के न्यासधारी (ट्रस्टी) हैं। अपने अन्तिम विश्लेषण में प्रत्येक को सही आचरण के लिए अपने अन्तःकरण में झांकना चाहिए। भगवतगीता के आरम्भिक अध्याय में जब अर्जुन क्षत्रिय होने के नाते समाज द्वारा आरोपित युद्ध करने के अपने दायित्व से मना करते हैं और जब सुकरात कहते हैं, ‘एथेंसवासियों ! मैं ईश्वर की आज्ञा का पालन करूंगा, तुम्हारी आज्ञा का नहीं।’ तो वे ऐसा अपनी अर्न्तात्मा के निर्देश पर कहते हैं न कि किसी बंधे-बंधाए नियमों के अनुपालन के कारण। आरम्भिक वैदिक साहित्य में जड़-चेतन की एकरूपता का निरूपण है और अनेक वैदिक देवी-देवता प्रकृति के प्रमुख पक्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आत्मज्ञान की खोज में प्रकृति की शरण में जाने, हिमश्रृंगों पर जाने या तपोवन में जाने का शिकार बहुत प्राचीन काल से हमारे यहां विद्यमान रहा है। मानव के रूप में हमारी जड़े प्रकृति में हैं और हम नाना रुपों में इसे जीवन में देखते हैं। रात और दिन, ऋतु-परिवर्तन – ये सब मानव-मन के परिवर्तन, विविधता और चंचलता के प्रतीक हैं। कालिदास के लिए प्रकृति यन्त्रवत और निर्जीव नहीं है। इसमें एक संगीत है। कालिदास के पात्र पेड़-पौधों, पर्वतों तथा नदियों के प्रति संवेदनशील हैं और पशुओं के प्रति उनमें भ्रात भावना है। हमें उनकी कृतियों में खिले हुए फूल, उड़ते पक्षी और उछलते-कूदते पशुओं के वर्मन दिखाई देते हैं। रघुवंश में हमें गाय के प्रेम का अनुपम वर्णन मिलता है। ऋतुसंहार में षट ऋतुओं का हृदयस्पर्शी विवरण है। ये विवरण केवल कालिदास के प्राकृतिक-सौन्दर्य के प्रति उनकी दृष्टि को नहीं अपितु मानव-मन के विविध रूपों और आकांक्षाओं की समझ को भी प्रकट करते हैं। कालिदास के लिए नदियों, पर्वतों, वन-वृक्षों में चेतन व्यक्तित्व है जैसा कि पशुओं और देवों में है। शाकुन्तला प्रकृति की कन्या है। जब उसे उसकी अमानुषी मां मेनका ने त्याग दिया तो आकाशगामी पक्षियों ने उसे उठाया और तब तक उसका पालन-पोषण किया जब तक कि कण्ठ ऋषि आश्रम में उसे नहीं ले गए। शकुन्तला ने पौधों को सींचा, उन्हें अपने साथ-साथ बढ़ते देखा और जब उनके ऊपर फल-फूल आए तो ऐसे अवसरों को उसने उत्सवों की भांति मनाया। शाकुन्तला के विवाह के अवसर पर वृक्षों ने उपहार दिए, वनदेवियों ने पुष्प-वर्षा की, कोयलों ने प्रसन्नता के गीत गाए। शकुंतला की विदाई के समय आश्रम दुःख से भर उठा। मृगों के मुख से चारा छूट कर गिर पड़ा, मयूरों का नृत्य रुक गया और लताओं ने अपने पत्रों के रूप में अश्रु गिराए। सीता के परित्याग के समय मयूरों ने अपना नृत्य एकदम बन्द कर दिया, वृक्षों ने अपने पुष्प झाड़ दिए और मृगियों ने आधे चबाए हुए दूर्वादलों को मुंह से गिरा दिया। कालिदास कोई विषय चुनते हैं और आँख में उसका एक सजीव चित्र उतार लेते हैं। मानस-चित्रों की रचना में वे बेजोड़ हैं। कालिदास का प्रकृति का ज्ञान यथार्थ ही नहीं था अपितु सहानुभूति भी था। उनकी दृष्टि कल्पना से संयुक्त है। कोई भी व्यक्ति तब तक पूर्णतः महिमामण्डित नहीं हो सकता जब तक कि वह मानव जीवन से इतर जीवन की महिमा और मूल्यों को नहीं जानता। हमें जीवन के समग्र रूपों के प्रति संवेदना विकसित करनी चाहिए। सृष्टि केवल मनुष्य के लिए नहीं रची गई है। पुरुष और नारी के प्रेम ने कालिदास को आकर्षित किया और प्रेम के विविध रूपों के चित्रण में उन्होंने अपनी समृद्ध कल्पना का खुलकर उपयोग किया है। इसमें उनकी कोई सीमाएं नहीं हैं। उनकी नारियों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक आकर्षण है क्योंकि उनमें कालातीत और सार्वभौम गुण हैं जबकि पुरुष पात्र संवेदना शून्य और अस्थिर बुद्धि हैं। उनकी संवेदना सतही है जबकि नारी का दुःख-दर्द अन्तरतम का है। पुरुष में स्पर्धा की भावना और स्वाभिमान उसके कार्यालय, कारखाने या रणक्षेत्र में उपयोगी हो सकते हैं पर उनकी तुलना नारी के सुसंस्कार, सौन्दर्य और शालीनता के गुणों से नहीं हो सकती। अपने व्यवस्था और सामंजस्य के प्रेम के कारण नारी परम्परा (संस्कृति) को जीवित रखती है। जब कालिदास नारी के सौन्दर्य का वर्णन करते हैं तो वे शास्त्रीय शैली को अपनाते हैं और ऐसा करते समय वे अपने विवरणों के वासनाजन्य होने या अतिविस्तृत हो जाने का खतरा मोल लेते हैं। मेघदूत में ‘मेघ’ को ‘यक्ष’ अपनी पत्नी का विवरण (हुलिया) इस प्रकार देता है : ‘नारियों में वह ऐसी है मानो विधाता ने उसका रचना सर्वप्रथम की है, पतली और गोरी है, दांत पतले और सुन्दर हैं। नीचे के ओष्ठ पके बिम्ब फल (कुंदरू) की भांति लाल है। कमर पतली है। आँखें उसकी चकित हिरणी जैसी हैं। नाभि गहरी है तथा चाल उसकी नितम्बभार से मन्द और स्तनभार से आगे की ओर झुकी हुई है।’ कालिदास द्वारा प्रस्तुत की गई नारियों में हमें अनेक रोचक प्रकार दिखाई देते हैं। उनमें से अनेक को समाज के परम्परागत बहानों और सफाई की आवश्यकता नहीं है। उनके द्वन्द्व और तनावों को सामंजस्य की आवश्यकता थी। पुरुष संदेहमुक्त अनुभव करते थे और वे पूर्ण सुरक्षित थे। बहुविवाह उनके लिए आम बात थी, परन्तु कालिदास की नारियां कल्पनाशील और चतुर हैं अतः वे संदेह और अनिश्चय के घेरे में आ जाती हैं। वे सामान्यतः अस्थिर नहीं हैं परन्तु वे विश्वसनीय, निष्ठावान तथा प्रेममय हैं। प्रेम के लिए झेली गई कठिनाइयां और यातनाएं प्रेम को और गहन बनाती हैं। मेघदूत में अजविलाप और रतिविलाप में वियोग की करुणामय मार्मिक अभिव्यक्ति है। प्रेम का संयोग रूप विक्रमोर्वशीय में है। मालविकाग्निमित्र में रानी को धरिणी कहा गया है क्योंकि वह सब कुछ सहती है। उसमें गरिमा और सहिष्णुता है। इरावती कामुक, अविवेकी, शंकालु, अतृप्त और मनमानी करने वाली है। जब राजा ने उसे छोड़कर मालविका को अपनाया तो वह कठोर शब्दों में शिकायत करती है और कटु शब्दों में राजा को फटकारती है। मालविका के प्रति अग्निमित्र का प्रेम इन्द्रिपरक है। राजा दासी की सुन्दरता और लावण्य पर मोहित है। विक्रमोर्वशीय में पात्रों में दैवी और मानवीय गुणों का मिश्रण है। उर्वशी का चरित्र सामान्य जीवन से हटकर है। उसमें इतनी शक्ति है कि अदृश्य रूप से वह अपने प्रेमी को देख सकती है तथा उसकी बातें सुन सकती है। उसमें मातृप्रेम नहीं है क्योंकि वह अपने पति को खोने के स्थान पर अपने बच्चे का परित्याग कर देती है। उसका प्रेम स्वार्थजन्य है। पुरुरवा भावविह्वल होकर प्रेम के गीत गाता है जिसका भावार्थ यह है कि विश्व की सत्ता उतनी आनन्ददायक नहीं जितना प्रेम आनन्ददायक है। विफल प्रेमी के लिए संसार दुःख और निराशा से भरा है और सफल प्रेमी के लिए वह सुख और आनन्द से भरा है। इस नाटक में हम प्रेम को फलीभूत होते देखते हैं। इसमें भूमि और आकाश एक होते हैं। भौतिक आकर्षण पर आधारित वासना नैतिक सौन्दर्य और आध्यात्मिक ज्ञान में परिवर्तित होती है। भाषागत विशिष्टताएँ: कालिदास वैदर्भी रीति के कवि हैं और उन्होंने प्रसाद गुण से पूर्ण ललित शब्दयोजना का प्रयोग किया है। प्रसाद गुण का लक्षण है - "जो गुण मन में वैसे ही व्याप्त हो जाय जैसे सूखी ईंधन की लकड़ी में अग्नि सहसा प्रज्वलित हो उठती है" और कालिदास की भाषा की यही विशेषता है। कालिदास की भाषा मधुर नाद सुन्दरी से युक्त है और समासों का अल्पप्रयोग, पदों का समुचित स्थान पर निवेश, शब्दालंकारों का स्वाभाविक प्रयोग इत्यादि गुणों के कारण उसमें प्रवाह और प्रांजलता विद्यमान है। अलंकार योजना: कालिदास ने शब्दालंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है और उन्हें उपमा अलंकार के प्रयोग में सिद्धहस्त और उनकी उपमाओं को श्रेष्ठ माना जाता है। उदहारण के लिये: संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा। नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।। अर्थात् स्वयंवर में बारी-बारी से प्रत्येक राजा के सामने गमन करती हुई इन्दुमती राजाओं के सामने से चलती हुई दीपशिखा की तरह लग रही थी जिसके आगे बढ़ जाने पर राजाओं का मुख विवर्ण (अस्वीकृत कर दिए जाने से अंधकारमय, मलिन) हो जाता था। अभिव्यंजना: कालिदास की कविता की प्रमुख विशेषता है कि वह चित्रों के निर्माण में सबकुछ न कहकर भी अभिव्यंजना द्वारा पूरा चित्र खींच देते हैं। जैसे: एवं वादिनि देवर्शौ पार्श्वे पितुरधोमुखी। लीला कमल पत्राणि गणयामास पार्वती।। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,

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💕हरि ॐ नमा शिवाय🙏#हरिनाम_संकीर्तन_सदैव_मंगलकारी 🌹 नाम संकीर्तन से बढ़कर कोई और दूसरी सेवा नहीं है, नाम संकीर्तन सब प्रकार से मंगल करने वाला होता है। यदि हम किसी अत्यावश्यक कार्य से बाहर जा रहे हैं और मार्ग में कहीं नाम संकीर्तन हो रहा हो तो हमें कुछ समय रूक उसमें शामिल होना चाहिए, अब प्रश्न यह कि यदि हम वहां रूक गये तो हमारे कार्य का क्या होगा, कुछ अमंगल हो गया तो...नही यह चिंता मन से तत्काल ही निकाल देनी चाहिए क्योंकि श्री ठाकुरजी का नाम सभी प्रकार अमंगल को हरने वाला है। "मंगल करण अमंगलहारी" इस विषय में एक दृष्टांत हैं... श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य रात्रि में श्रीवास पंडित जी के यहां नाम संकीर्तन कराते थे, बहुत से वैष्णव उसमें सम्मलित होते थे, श्रीवास पंडित जी का पुत्र कीर्तन में झांझ बजाया करता था और खुब प्रेम से नाम संकीर्तन करता था। एक सांयकाल के समय किसी भंयकर रोग के कारण उनके पुत्र की मृत्यु हो जाती है, यह देख श्रीवास पंडित जी की पत्नी की आंखों से आंसू बहने लगते हैं तो श्रीवास पंडित कहते हैं.. सावधान..!! बिल्कुल नहीं रोना, एक थोड़ी सी चित्कार भी नहीं करना। उनकी पत्नी कहती हैं मेरा पुत्र मर गया और आप ऐसा कह रहे हैं। श्रीवास पंडित कहते हैं यदि तुम्हारा पुत्र था तो मेरा भी तो कुछ लगता है। किन्तु यदि तुम रोई तो आस पास मे सबको खबर हो जायेगी कि हमारे घर में शौक हुआ है और यदि सब यहां एकत्रित हो गए तो रात्रि में महाप्रभु जी को कीर्तन कराने कही अन्यत्र जाना पड़ेगा उनको असुविधा होगी, तुम इस बालक को ले जाकर भीतर कक्ष में लेटा दो सुबह देखेंगे कि क्या करना है, उनकी पत्नी वैसा ही करती है। रात्रि में महाप्रभु जी पधारे, कीर्तन प्रारंभ हुआ, "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" तभी महाप्रभु जी पंडित जी से पुछते है, अरे! श्रीवास तेरा बालक किधर है आज दिखाई नही देता वह, श्रीवास पंडित जी झुठ नही कह सकते थे और यदि सत्य कह दिया तो महाप्रभु जी को पीङा होगी इसलिए वह केवल इतना ही बोले..भगवन् होगा " इतने में ही किसी वैष्णव का उस मृत बालक के कक्ष में जाना होता है वह तुरंत महाप्रभु जी को कहता है "महाप्रभु! पंडित जी का पुत्र कीर्तन मे कहां से आयेगा। उसकी तो संध्या को ही मृत्यु हो गई है। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं " ये हो ही नही सकता जिसके घर में नित्य प्रभु के नाम का ऐसा मंगलकीर्तन होता है वहाँ ऐसा अमंगल हो ही नहीं सकता। श्री महाप्रभु जी गंभीर वाणी में पुकारते हैं, अरे! ओ श्रीवास पंडित के बालक कहां है तू, इधर आ, आज कीर्तन में झांझ कौन बजायेगा... इधर महाप्रभु जी का बोलना हुआ उधर वह बालक कक्ष भीतर से दौड़ा दौङा बाहर आया और कीर्तन में झांझ बजाने लगा श्री वास पंडित जी और उनकी पत्नी के नेत्रों से आंसू बहने लगते हैं वे महाप्रभु जी को बारंबार प्रणाम करते हैं। इसलिए भाई, नाम संकीर्तन से बढ़कर कोई पूंजी नही और इसके समान किसी भी समस्या की कोई कुंजी नहीं हैं। भज गोविन्दं भज गोविन्दम गोविन्दं भज मूढ़मते "अरे बोधिक मूर्खो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो, केवल श्री गोविन्द का भजन करो। तुम्हारा व्याकरण का ज्ञान और शब्द चातूरी मृत्यु के वक्त तुम्हारी रक्षा नही कर पायेगी।। सदैव जपते रहिये...जपने का सामर्थ्य नहीं तो हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

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महेश्वर महिष्मति में हुआ था आदि गुरु शंकराचार्य, मंडन मिश्र व शारदा भारती देवी का शास्त्रार्थ..📚📚 #महेश्वर वही स्थल है, जहां कदंब वन में #आदिशंकराचार्य और #मंडनमिश्र के बीच ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था। महेश्वर शहर मध्य प्रदेश के खरगोन जिला में स्थित है जहाँ के कभी हैहयवंशी राजा #सहस्रार्जुन, जिसने लंकापति #रावण को पराजित किया था। पौराणिक काल में ये "पवित्र नगरी" #महिष्मती के नाम से प्रसिद्ध था, जिसका इतिहास कला, धार्मिक, संस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्वों को समेटे यह शहर लगभग 2500 वर्ष पुराना हैं | आज भी यहाँ आदि गुरु शंकराचार्य व मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ स्थल पर चरण पादुकाएं मौजूद हैं। दावा है कि आदि गुरु ने जिस स्थान पर अपना शरीर रखकर सूक्ष्म रूप धारण किया था, वह स्थान भी इसी नगर में है। आज के संदर्भों में भी इन धार्मिक स्थलों को संरक्षित और प्रचारित करने की जरूरत है। बताया जाता है कि फाल्गुन शुक्ल द्वितीय 2640 युधिष्ठिर संवत को आदि शंकराचार्य शिक्षा के लिए #नर्मदा तट #ओंकारेश्वर पहुंचे थे। वहाँ गुरु #गोविंदपाद से उन्होंने शिक्षा ली। शुक्ल दसवीं 2647 युधिष्ठिर संवत को #प्रयाग #काशी के संगम पर आदि शंकराचार्य पूर्व मिमांसा दर्शन के आचार्य कुमारिल भट्ट से मिलने के बाद शंकराचार्य बिहार #सहरसा #महिषी के मंडन मिश्र के निवास पर पहुंचे। आदि शंकराचार्य ने मंडन मिश्र से कहा कि वे विषाद रूप भिक्षा लेने के लिए उनके पास आए हैं। महर्षि #व्यास व #जैमिनी ऋषि की आज्ञा से दोनों के बीच शास्त्रार्थ के लिए समय नर्मदा तट महेश्वर में तय किया गया। मंडन मिश्र की पत्नी शारदा भारती देवी ने आदि शंकराचार्य और पति मंडन मिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ के दौरान मध्यस्थ पद को ग्रहण किया था। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच लगभग २१ दिनों तक शास्त्रार्थ चला था। दोनों ने अपने-अपने पक्षों की सिद्धि के लिए बहुत से तर्क व प्रमाण दिए, परंतु अंत में शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को निरुत्तर कर शास्त्रार्थ में परास्त कर दिया था। शास्त्रार्थ: आदि शंकराचार्य केरल से लंबी पदयात्रा करके नर्मदा नदी के तट पर स्थित #ओंकारनाथ पहुँचे। वहाँ उन्होंने गुरु #गोविंदपाद से योग शिक्षा तथा #अद्वैतब्रह्म ज्ञान को प्राप्त किया और तीन वर्षों तक आदि शंकराचार्य अद्वैत तत्व की साधना करते रहे। तत्पश्चात गुरु आज्ञा से वे काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए निकल पड़े। जब वे काशी जा रहे थे कि एक चांडाल उनकी राह में आ गया। उन्होंने क्रोधित हो चांडाल को वहाँ से हट जाने के लिए कहा तो चांडाल बोला- ‘हे मुनि! आप शरीरों में रहने वाले एक परमात्मा की उपेक्षा कर रहे हैं, इसलिए आप अब्राह्मण हैं। अतएव मेरे मार्ग से आप हट जायें।’ चांडाल की देववाणी सुन आचार्य शंकर ने अति प्रभावित होकर कहा-‘आपने मुझे ज्ञान दिया है, अत: आप मेरे गुरु हुए।’ यह कहकर आचार्य शंकर ने उन्हें प्रणाम किया तो चांडाल के स्थान पर शिव तथा चार देवों के उन्हें दर्शन हुए। काशी में कुछ दिन रहने के दौरान वे बिहार के सहरसा महिषी में आचार्य मंडन मिश्र से मिलने आ गए। आचार्य मंडन मिश्र का वेदज्ञ प्रभाव इतना प्रभावी था की उनके घर जो पालतू मैना थी वह भी वेद मंत्रों का उच्चारण करती थी। महर्षि व्यास व जैमिनी ऋषि की आज्ञा से दोनों के बीच शास्त्रार्थ के लिए समय नर्मदा तट महेश्वर में तय किया गया। जिसमें आदि शंकराचार्य ने आचार्य मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ में हरा दिया। अपने पति आचार्य मंडन मिश्र को हारता देख उनकी पत्नी शारदा भारती देवी आदि शंकराचार्य से बोलीं- ‘महात्मन! अभी तो आपने आधे ही अंग को जीता है। अपनी युक्तियों से मुझे पराजित करके ही आप विजयी कहला सकेंगे।’ तब मंडन मिश्र जी की पत्नी शारदा भारती ने कामशास्त्र पर प्रश्न करने प्रारम्भ किए। किंतु आदि शंकराचार्य तो बाल-ब्रह्मचारी थे, अत: कामशास्त्र से संबंधित उनके प्रश्नों के उत्तर देने में वे असहज से होने लगे? इस पर उन्होंने भारती देवी से कुछ दिनों का समय माँगा तथा पर-काया में प्रवेश कर उस विषय की सारी जानकारी प्राप्त की। इसके बाद आचार्य शंकराचार्य ने मंडन मिश्र की पत्नी शारदा भारती देवी को भी शास्त्रार्थ में हरा दिया। काशी प्रवास के दौरान उन्होंने और भी बड़े-बड़े ज्ञानी पंडितों को शास्त्रार्थ में परास्त किया और गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुए। अनेक शिष्यों ने उनसे दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे धर्म का प्रचार करने लगे। वेदांत प्रचार में संलग्न रहकर उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना भी की। अद्वैत ब्रह्मवादी आचार्य शंकर केवल निर्विशेष ब्रह्म को सत्य मानते थे और ब्रह्मज्ञान में ही निमग्न रहते थे। एक बार वे ब्रह्म मुहूर्त में अपने शिष्यों के साथ एक अति सँकरी गली से स्नान हेतु मणिकर्णिका घाट जा रहे थे। रास्ते में एक युवती अपने मृत पति का सिर गोद में लिए विलाप करती हुई बैठी थी। आचार्य शंकर के शिष्यों ने उस स्त्री से अपने पति के शव को हटाकर रास्ता देने की प्रार्थना की, लेकिन वह स्त्री उसे अनसुना कर रुदन करती रही। तब स्वयं आचार्य ने उससे वह शव हटाने का अनुरोध किया। उनका आग्रह सुनकर वह स्त्री कहने लगी- ‘हे संन्यासी! आप मुझसे बार-बार यह शव हटाने के लिए कह रहे हैं। आप इस शव को ही हट जाने के लिए क्यों नहीं कहते?’ यह सुनकर आचार्य बोले- ‘हे देवी! आप शोक में कदाचित यह भी भूल गई कि शव में स्वयं हटने की शक्ति ही नहीं है।’ स्त्री ने तुरंत उत्तर दिया- ‘महात्मन् आपकी दृष्टि में तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगत का कर्ता है। फिर शक्ति के बिना यह शव क्यों नहीं हट सकता?’ उस स्त्री का ऐसा गंभीर, ज्ञानमय, रहस्यपूर्ण वाक्य सुनकर आचार्य वहीं बैठ गए। उन्हें समाधि लग गई। अंत:चक्षु में उन्होंने देखा- सर्वत्र आद्याशक्ति महामाया लीला विलाप कर रही हैं। उनका हृदय अनिवर्चनीय आनंद से भर गया और मुख से मातृ वंदना की शब्दमयी धारा स्तोत्र बनकर फूट पड़ी। अब आचार्य शंकर ऐसे महासागर बन गए, जिसमें अद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टा द्वैतवाद, निर्गुण ब्रह्म ज्ञान के साथ सगुण साकार की भक्ति की धाराएँ एक साथ हिलोरें लेने लगीं। उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है। उन्होंने ‘ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या’ का उद्घोष भी किया और शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि के भक्तिरसपूर्ण स्तोत्र भी रचे, ‘सौन्दर्य लहरी’, ‘विवेक चूड़ामणि’ जैसे श्रेष्ठतम ग्रंथों की रचना की। प्रस्थान त्रयी के भष्य भी लिखे। अपने अकाट्य तर्कों से शैव-शाक्त-वैष्णवों का द्वंद्व समाप्त किया और पंचदेवोपासना का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने आसेतु हिमालय संपूर्ण भरत की यात्रा की और चार मठों की स्थापना करके पूरे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा भौगोलिक एकता के अविच्छिन्न सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने समस्त मानव जाति को जीवन्मुक्ति का एक सूत्र दिया- दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥ अर्थात दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें। अपना प्रयोजन पूरा होने बाद तैंतीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने इस नश्वर देह को छोड़ दिया। पति मंडन मिश्र की पराजय पर शारदा भारती देवी ने किया था शास्त्रार्थ: इसके बाद मंडन मिश्र की पत्नी भारती देवी ने शंकराचार्य से कहा कि उन्होंने अब तक पूरी जीत दर्ज नहीं की, क्योंकि वे मंडन मिश्र की अर्धांगिनी हैं, इसलिए भारती देवी से जीतने के बाद ही उन्होंने मंडन मिश्र को शिष्य बनाने की बात कही। इसके बाद शंकराचार्य व भारती देवी के बीच शास्त्रार्थ हुआ। इस दौरान भारती देवी ने शंकराचार्य से काम शास्त्र से संबंधित प्रश्न किया। चूंकि शंकराचार्य अविवाहित थे, इसलिए उन्होंने इस प्रश्न के उत्तर के लिए कुछ समय मांगा और वहां से चले गए। दावा है कि शंकराचार्य ने महेश्वर के पश्चिम दिशा स्थित एक गुफा में अपना शरीर छोड़ा और शिष्यों को वहां रुकने के लिए कहा। सूक्ष्म रूप धारण कर वे आकाश में भ्रमण करने लगे। इस दौरान उन्होंने राजा अमरूक के मृत शरीर को देखा, जिसके आसपास 100 से अधिक सुंदरियां विलाप कर रही थीं। तब शंकराचार्य ने सूक्ष्म रूप के साथ राजा के शरीर में प्रवेश किया। राजा को जीवित देख रानियां व मंत्री प्रसन्न् हो गए। राजा ने पुन: काम संभाला और इसी दौरान काम शास्त्र से संबंधित तथ्यों को जाना और पुन: राजा अमरूक के शरीर को छोड़कर गुफा में पहुंचे और अपने मूल शरीर में प्रवेश कर मंडन मिश्र के घर पहुंचे। वहां उभय भारती व शंकराचार्य के बीच पुन: शास्त्रार्थ हुआ। इसमें शंकराचार्य ने उभय भारती को पराजित किया। मंडलाखोर: शास्त्रार्थ पश्चात मंडन मिश्र व पत्नी शारदा भारती देवी का निवास क्षेत्र, तपोभूमि क्षेत्र और ब्रह्मलोक गमन क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से महेश्वर में है। नर्मदा नदी किनारे स्थित मंडन मिश्र के इस निवास स्थान क्षेत्र को मंडलाखोर के नाम से जाना जाता है जो शास्त्रार्थ क्षेत्र महिष्मति व नर्मदा नदी के संगम पर सातमाता मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित है। इसे कदंब वन क्षेत्र भी कहा जाता है। वर्तमान में वहाँ भगवान शिव मंदिर कदंबेश्वर शिवालय स्थित है। शास्त्रार्थ क्षेत्र तात्कालिक समय में कदंब वृक्षों से आच्छादित रहता था। वर्तमान में यहां एक कदंब का वृक्ष आज भी स्थित है। जिस गुफा में शंकराचार्य ने अपना शरीर छोड़कर सूक्ष्म रूप धारण किया, वह गुफा वर्तमान में दंडी स्वामी की गुफा के नाम से जानी जाती है। सन् 1872 में नगर के समाजसेवी व दानदाताओं ने देवी शारदा भारती की स्मृति में नगर के बाजार चौक में शारदा सदन ग्रंथालय की स्थापना की। शासन के सहयोग से शास्त्रार्थ भूमि क्षेत्र तथा ब्रह्मलोक गमन स्थान का जीर्णोद्धार कर चरण पादुकाओं का प्रतिष्ठापन किया गया है। संत समाज में शंकराचार्य का स्थान सर्वोपरि: संत समाज में शंकराचार्य का स्थान सर्वोपरि है। सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का श्रेय शंकराचार्यजी को ही जाता है। उन्होंने चार धाम की स्थापना की थी। शंकराचार्य और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ प्राचीन माहिष्मति वर्तमान में महेश्वर में ही हुआ था। जब बनारस काशी में कुमारिल भट्ट आत्मग्लानि के कारण आत्मदाह कर रहे थे, तब उन्होंने ही शंकराचार्य को महिषी (सहरसा बिहार) यात्रा का आदेश दिया था। मंडन मिश्र के निवास स्थान महिषी में वेद प्रभाव से तोता और मैना भी आपस में संस्कृत भाषा में ही शास्त्रार्थ करते थे और यही उनके निवास स्थान की पहचान भी थी। मंडन मिश्र: मंडन मिश्र, पूर्व मीमांसा दर्शन के बड़े प्रसिद्ध आचार्य थे। कुमारिल भट्ट के बाद इन्हीं को प्रमाण माना जाता है। अद्वैत वेदांत दर्शन में भी इनके मत का आदर है। ये भर्तृहरि के बाद कुमारिल के अंतिम समय में तथा आदि शंकराचार्य के समकालीन थे। मीमांसा और वेदांत दोनों दर्शनों पर इन्होंने मौलिक ग्रंथ लिखे। मीमांसानुक्रमाणिका, भावनाविवेक और विधिविवेक - ये तीन ग्रंथ मीमांसा पर; शब्द दर्शन पर स्फोटसिद्धि, प्रमाणाशास्त्र पर विवेक तथा अद्वैत वेदांत पर ब्रह्मसिद्धि - ये इनके ग्रंथ हैं। शालिकनाथ तथा जयंत भट्ट ने वेदांत का खंडन करते समय मंडन का ही उल्लेख किया। शांकर भाष्य के सुप्रसिद्ध व्याख्याता, भामती के निर्माता वाचस्पति मिश्र ने मंडन की ब्रह्मसिद्धि को ध्यान में रखकर अपनी कृति लिखी। मण्डन मिश्र व शंकराचार्य का शास्त्रार्थ स्थल , मण्डलेश्वर (जिला खरगोन , तहसील महेश्वर ) नर्मदा नदी पर स्थित पवित्र नगरी है ॥ छप्पन देव मन्दिर, शास्त्रार्थ स्थल प्राचीन है एवं जगद्गुरू आदि शंकराचार्य का परकाया प्रवेश स्थल गुप्तेश्वर महादेव मन्दिर बडे रमणीय स्थान है ॥ जिसके कारण मण्डलेश्वर अत्यंत प्रसिध्द है ll मंडन और सुरेश्वर: एक परंपरा के अनुसार मंडन कुमारिल भट्ट के शिष्य थे। यही बाद में शंकराचार्य द्वारा शास्त्रार्थ में पराजित होकर संन्यासी हो गए और उनका नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा। मंडन और सुरेश्वर एक ही हैं या अलग-अलग - इसको लेकर बड़ा विवाद हुआ है। अधिकांश प्रमाण दोनों की भिन्नता के पक्ष में ही मिलते हैं। मंडन ने शब्दाद्वैत का समर्थन किया है, पर सुरेश्वर इसके बारे में मौन हैं। मंडन ने अद्वैतप्रस्थान में अन्यथाख्यातिवाद का बहुत हद तक समर्थन किया, पर सुरेश्वर इसका खंडन करते हैं। मंडनके अनुसार जीव अविद्या का आश्रय है, सुरेश्वर ब्रह्म को ही अविद्या का आश्रय और विष मानते हैं। इसी मतभेद के आधार पर अद्वैत वेदांत के दो प्रस्थान चल पड़े। भामती प्रस्थान मंडन का अनुयायी बना, विवरण प्रस्थान सुरेश्वर के सिद्धांतों पर चला। सुरेश्वर शुद्धज्ञान को मोक्ष का मार्ग मानते हैं पर मंडन के अनुसार वेदांत के श्रवणमात्र से मोक्ष नहीं मिलता, जब तक अग्निहोत्र आदि कर्म ज्ञान के सहकारी न हो यही नहीं, किसी प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथ में मंडन और सुरेश्वर को एक नहीं माना गया है। मंडन मिश्र कुमारिल भट्ट के शिष्य थे, इस बात का कोई अकाट्य प्रमाण नहीँ मिलता। यह बात केवल 'शंकर-दिग्विजय' के आधार पर कही जाती है, जो कि एक नितान्त अप्रामाणिक कथा-पुस्तक है। मंडन और सुरेश्वर की भिन्नता के ही जब अधिकांश प्रमाण मिलते हैं तो यह कहा जाना किसी भी तरह से उचित नहीँ है कि मंडन ही शास्त्रार्थ में पराजित होकर सुरेश्वर बने थे। दरअसल इन दोनों महापुरुषों (मंडन और शंकर) के बीच शास्त्रार्थ होने की बात ही पूरी तरह काल्पनिक और रणनीतिक है, जो मध्यकाल में शंकर के मठ द्वारा प्रचारित किया गया। शब्दाद्वैत, अन्यथाख्यातिवाद, अविद्या, जीव, ब्रह्म आदि के बारे में सुरेश्वर के जो भी विचार हैं, वे शत-प्रतिशत शंकराचार्य के अनुगामी हैं। गुरु के चरणों की प्रीति ही उनका परम लक्ष्य है। वे असहिष्णुता की हद तक मंडन का विरोध करते हैं और उन्हें अलग प्रस्थान का अद्वैतवेदान्ती बताते हैं। फिर, वही सुरेश्वर स्वयं मंडन कैसे हो सकते हैं? 'विवरण-प्रस्थान' के प्रवर्तक सुरेश्वर नहीं, 'विवरण-कार' हैं, जबकि 'भामती-प्रस्थान' पूरी तरह मंडन का अनुगमन करता है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,

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कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन: हैहयवंशी चक्रवर्ती राजराजेश्वर यदुवंशी क्षत्रिय.. ⚓⚓ यदुपुत्र-सहस्त्रजित के कुल मे उत्पन्न हैहय वन्शीय 'सहस्त्रार्जुन' जिन्हें कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से भी जाना जाता है। वे सहस्त्र (हजार) भुजाओ से युक्त थे तथा संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर सातो द्वीपो के राजा हुए ऐसा कहा जाता है। यदु के पांच पुत्र हुए- सहस्त्रद या सहस्त्रजित,पयोद, क्रोष्टा, नील या नल व अंजिक। इनमे से सहस्त्रद और क्रोष्टा के वंशज पराक्रमी हुए तथा इस धरा पर ख्याति प्राप्त किया| क्रोष्टा कुल में भगवान् श्री #कृष्ण अवतरित हुए तथा सहस्त्रद या सहस्त्रजित के कुल मे सहस्त्रार्जुन, भोज, तालजंघ, मधु आदि हुए थे। सहस्त्रजित के तीन पुत्र हुये- हैहय,हय और वेणुहय। हैहय के पुत्र धर्मनेत्र हुए, धर्मनेत्र से कार्त, कार्त से सहजित, सहजित के पुत्र राजा महिष्मान हुए जिन्होने महिष्मतीपुरी बसायी। महिष्मान से भद्र्श्रेण्य हुए जो वाराणसी पुरी के अधिपति कहे गये है। भद्र्श्रेण्य के पुत्र का नाम दुर्दुम था। दुर्दुम से कनक हुए, जो बुद्धिमान और बलवान थे। कनक के चार पुत्र हुए-कृतवीर्य, कृतौजा, कृतवर्मा और कृताग्नि। कृतवीर्य के पुत्र अर्जुन थे। वह सातो द्वीपो के एकछत्र सम्राट थे। उन्होंने अकेले ही अपनी सहस्त्र भुजाओ के बल से संपूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन ने दस हजार वर्षो तक घोर तपस्या करके अत्रि पुत्र दत्तात्रेय की आराधना की। इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान दत्तात्रेय ने अर्जुन को वर मागने को कहा तो उन्होंने चार वर मागे थे:-" पहला- युद्धरत होने पर मेरी सहस्त्र भुजाए हो जाये", दूसरा -"यदि कभी मै अधर्म कार्य मे प्रवृत्त होऊ तो वहा साधु रूप में आकार रोक दे", तीसरा- "मै युद्ध के द्वारा पृथ्वी को जीतकर धर्म का पालन करते हुए प्रजा को प्रसन्न रखू" और चौथा वर इस प्रकार था - " मै बहुत से संग्राम करके सहस्त्रो शत्रुओ को मौत के घाट उतारकर संग्राम के मध्य अपने से अधिक शक्तिशाली द्वारा वध को प्राप्त होऊ"। इन चार वरदानो के फल्स्वरूप् युद्ध की कल्पना मात्र से अर्जुन के एक सहस्त्र भुजाएं प्रकट हो जाती थी। उनके बलपर उन्होंने सहस्त्रो शत्रुओ को मौत के घाट उतार कर द्वीप, समुद्र और नगरो सहित पृथ्वी को युद्ध के द्वारा जीत लिया था। संसार का कोई भी सम्राट पराक्रम, विजय, यज्ञ, दान, तपस्या , योग, शास्त्रज्ञान आदि गुणो मे कार्तवीर्य अर्जुन की बराबरी नही कर सकता था। वह योगी थे इसलिए ढाल-तलवार,धनुष-वाण और रथ लिए सातो द्वीपों में प्रजा की रक्षा हेतु सदा विचरता दिखाई देता थे। वह यज्ञो और खेतों की रक्षा करते थे। अपने योग-बल से मेघ बनकर अवश्यकतानुसार वर्षा कर लेते थे। उनके राज्य मे कभी कोइ चीज नष्ट नही होती थी । प्रजा सब प्रकार से खुशहाल थी। एक बार अर्जुन ने अभिमान से भरे हुए रावण को अपने पांच ही वाणो द्वारा सेना सहित मूर्छित करके बन्दी बना लिया था। यह सुनकर रावण के पितामह महर्षि #पुलत्स्य वहाँ गये और कार्तवीर्य अर्जुन से मिले। पुलस्त्य मुनि के प्रार्थना करने पर उसने रावण को मुक्त कर दिया था। कार्तवीर्य अर्जुन पचासी हजार वर्षो तक सब प्रकार के रत्नो से संपन्न चक्रवर्ती सम्राट रहे तथा अक्षय विषयो का भोग करते रहे। इस बीच न तो उसका बल क्षीण हुआ और न हि उसके धन का नाश हुआ। उनके धन के नाश की तो बात ही क्या, उनके जैसा प्रभाव था कि उसके स्मरण मात्र से ही दूसरो का खोया हुआ धन मिल जाता था। एक बार भूखे - प्यासे अग्निदेव ने राजा अर्जुन से भिक्षा माँगी। तब उस वीर ने अपना सारा राज्य अग्निदेव को भिक्षा मे दे दिया। भिक्षा पाकर अग्निदेव अर्जुन की सहायता से उसके सारे राज्य के पर्वतो, वनो आदि को जला दिया। उन्होने आपव नाम से विख्यात महर्षि #वसिष्ठ का सूना आश्रम भी जला दिया। महर्षि वसिष्ठ का सूना आश्रम जला दिया गया था, इसलिये उन्होने सहस्त्राजुन को शाप दे दिया- " हैहय! तुने मेरे इस आश्रम को भी जलाये बिना न छोडा, तुझे दूसरा वीर पराजित करके मौत के घाट उतार देगा"। दत्तात्रेय ने भी उसे इस प्रकार की मृत्यु का वरदान दिया था। वसिष्ठमुनि के शाप के कारण भगवान विष्णु के अन्शावतार परशुराम जी ने कार्तवीर्यकुमार अर्जुन का वध किया था। अर्जुन के हजारो पुत्र थे। उनमे से केवल पाच ही जीवित रहे। शेष सब परशुराम की क्रोधाग्नि मे नष्ट हो गये थे। बचे हुए पुत्रो मे जयेष्ठ पुत्र का नाम जय ध्वज था। जय्ध्वज के पुत्र का नाम तालजङ्घ था। तालजङ्घ का पुत्र वीतिहोत्र हुए वीतिहोत्र से मधु हुए। मधु के वंशज माधव कहलाये। राजराजेश्वर मंदिर, महेश्वर: श्री राजराजेश्वर भगवान कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन बहुत लोक प्रिय सम्राट थे विश्व भर के राजा महाराजा मांडलिक, मंडलेश्वर आदि सभी अनुचर की भाँति सम्राट सहस्त्रार्जुन के दरबार में उपस्थित रहते थे I उनकी अपर लोकप्रियता के कारण प्रजा उनको देवतुल्य मानती थी I आज भी उनकी समाधी स्थल "राजराजेश्वर मंदिर" में उनकी देवतुल्य पूजा होती है I उन्ही के जन्म कथा के महात्म्य के सम्बन्ध में मतस्य पुराण के 43 वें अध्याय के श्रलोक 52 की पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं : - यस्तस्य कीर्तेनाम कल्यमुत्थाय मानवः I न तस्य वित्तनाराः स्यन्नाष्ट च लभते पुनः I कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदित धीमतः II यथावत स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महितये II भावार्थ : - जो मनुष्य प्रातः उठकर श्री कार्तवीर्य अर्जुन का स्मरण करता है उसके धन का नाश नहीं होता है I यदि नष्ट हो भी जाय तो पुनः प्राप्त हो जाता है I जो मनुष्य श्री कार्तवीर्य अर्जुन के जन्म वृतांत को कहता है उसकी आत्मा यथार्थ रूप से पवित्र हो जाति है वह स्वर्गलोक में प्रशंसित होता है I राजराजेश्वर मंदिर में युगों-युगों से देसी घी के ग्यारह नंदा दीपक अखण्ड रूप से प्रज्वलित हैं, इतिहासकारों की दृष्टि में 11 दीपक अखण्ड ज्योति में और कहीं नहीं हैं I मंदिर के गर्भ गृह में दक्षिण पश्चिम कोने पर सात दीपक हैं और उत्तर-पूर्वी कोने पर चार हैं जिनका पश्चिम उत्तरी कोने पर लगे पाँच फुट लम्बे आयने (दर्पण) में स्पष्ट प्रतिबिम्ब दिखाई देता है I भारत के अन्य किसी मंदिर में बिरले ही इतनी अधिक संख्या में शताब्दियों से अखण्ड दीपक प्रज्वलित हों I मंदिर को बड़ा सिद्ध स्थल मन जाता है, यहाँ पर भक्तों की मनोकामना आज भी उसी तरह पूरी होती है जिस प्रकार उनके जीवन काल त्रेतायुग में होती थी I उनके महेश्वर स्थित समाधी स्थल पर बने मंदिर का नाम "राजराजेश्वर मंदिर" है I यह मंदिर महेश्वर में नर्मदा तट पर किले के अन्दर है I मंदिर के गृहस्थ महंत किरान गिरी उनकी सात पीढ़ी से हैं I मुख्य मंदिर की स्थापत्य कला से उसके कलचुरी एवं परमार काल 11 वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार के होने का आभास होता है I मंदिर मे नित्य पूजा पाठ महंत के मातहत ब्राह्मन कर्मचारी द्वारा की जाति है I यह मंदिर लगभग 150x100 फीट के प्रांगण के बीच पूर्वाभिमुखी है I मंदिर के बीच में शिवलिंग के रूप में राजराजेश्वर सहस्त्रार्जुन की समाधी है I शिवलिंग के पीछे अष्टधातु की शिव-पारवती की चालित मूर्ती है, इस मूर्ती का कपाल भाग दक्षिणात्य शैली के अनुसार पीछे की ओर थोडा दबा हुआ है I यह विशेषता इस प्रतिमा में है I इस मूर्ती के ऊपर श्री सहस्त्रार्जुन जी के गुरु भगवान दत्तात्रेय जी का चित्र है I घी के ग्यारह दीपक चाँदी के बने हुए हैं जिनकी क्षमता लगभग दो किलो घी की है I छोटी ऊँगली के बराबर मोटाई की रुई की लगभग एक फीट लम्बी बत्तियाँ बनाकर दीपकों में रखी जातीं हैं जो 3-4 दिन चलती हैं I प्रतिदिन कितना घी जलता है यह जानकारी महंत और पुजारी को भी नहीं है I वहाँ के ट्रस्ट द्वारा सीमित मात्रा में दीपकों के लिये घी दिया जाता है लेकिन दर्शनार्थियों द्वारा भारी मात्रा में घी चढ़ाया जाता है I घी का संग्रह रखने के लिये मंदिर में ही 1000 किलो की क्षमता वाले टैंक हैं, दर्शनार्थी द्वारा लाया गया घी उसी समय यथासंभव दीपकों में डाला जाता है, किंतु दीपकों के भरे होने पर घी टैंक में संगृहीत किया जाता है I चढ़ावे के घी का दुरूपयोग नहीं हो सकता, महंत जी से चर्चा के दौरान यह ज्ञात हुआ की दैनिक भोग में लगने वाला घी भी उस भंडार से न लेकर बाज़ार का ख़रीदा हुआ ही होता है I अखण्ड ज्योति की घी का दुरूपयोग कभी किसी ने किया था, परिणाम में उसे अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा I इसलिए एक बूँद भी घी का दुरूपयोग नहीं होता है, ऐसे हैं हमारे जाग्रत देव श्री राजराजेश्वर प्रभु I न्याय की देवी अहिल्या ने होलकर राज्य की राजधानी महेश्वर ही निश्चित की I देवी अहिल्या ने अपने जीवन काल में केवल तीन प्रणाम किये, प्रथम रिद्धी-सिद्धि दाता श्री गणेश, द्वितीय श्री राजराजेश्वर एवं तृतीय माँ नर्मदा को I देवी माँ अहिल्या के स्वर्गवास के बाद आज भी प्रति सोमवार सायं पाँच बजे देवी माँ अहिल्या की पालकी राजराजेश्वर पूजा एवं प्रसाद अर्पित करने हेतु आतीं हैं I देवी की पालकी इस मंदिर के अतिरिक्त अन्य कहीं नहीं जाति I होलकर राज्य शासन काल में श्री राज राजेश्वर की शोभा यात्रा को गार्ड आफ ऑनर (राजकीय सम्मान) प्रदान किया जाता था I जैसा कि उज्जैन महाकाल को आज भी श्रावण तथा भादों माह की अंतिम सवारी पर किया जाता है I पिछले 10-15 वर्षों में कलचुरी हैहयवंशियों में इतनी जागरूकता आई है की महेश्वर में श्री राजराजेश्वर के दर्शन करने की ललक जागी और दर्शन से जो लाभ हुआ उसमें लोगों ने 100 ग्राम घी चढ़ाया उसके बाद तो पीपों से घी चढ़ाया और लाभ अर्जित किया I आज उनके समाज की जागरूकता यह है कि राजराजेश्वर मंदिर परिसर में विशाल मंदिर का निर्माण हो रहा है I कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,

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"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों मे सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो...!" - धर्मसम्राट स्वामी #करपात्री जी महाराज भारतीय संस्कृति के प्रखर उपासक महान विद्वान स्वामी करपात्री जी महराज की लौकिक पढ़ाई बहुत कम थी उन्होने गंगा जी की परिक्रमा की और वे वेद, वेदांग, उपनिषद और पुराणों के महान ज्ञाता बनकर आ गए। वे भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी ही नहीं धर्म संघ स्थापना कर धर्म प्रचार मे लग गए। एक बार मध्य प्रदेश के एक गाँव मे प्रवास पर थे प्रवचन के पश्चात वे जो जय घोष लगाते वह संस्कृत मे होता था एक छोटी सी बालिका आई और करपात्री जी से कहा स्वामी जी यदि आप इस जय घोष को हिन्दी मे कहते तो हमारी भी समझ मे आता, करपात्री जी को यह बात ध्यान मे आ गयी और उन्होने उसी उद्घोष को हिन्दी मे कहा- ''धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों मे सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो..।" आज उनका दिया यह जय घोष भारतीय संस्कृति का उद्घोष बन गया। धर्म की जय हो..! भारतीय संस्कृति मे धर्म क्या है #नैतिकता, राष्ट्रीय चरित्र, कहते हैं की 'धृति क्षमा दमों अस्तेय.. दसकर्म धर्म लक्षणम' इत्यादि दस धर्म के लक्षण हैं जैसे धर्म शाला, धर्म पत्नी यानी जहां -जहां धर्म शब्द लगा है वहाँ समाज का विस्वास, पवित्रता, नैतिकता, सामाजिक बंधन, परिवार, काका-काकी, मामा-मामी ऐसे रिस्ते जो हमे व समाज को बांधे रखता है उसे भारत मे धर्म कहते हैं। भगवान #श्रीराम ने एक आदर्श कायम किया उनकी सादगी, सरलता, भाइयों के प्रति ऐसा अतुलित प्रेम की दोनों राज्य नहीं लेना चाहते, राम का जीवन संस्कृति की व्याख्या, परिभाषा जीवन मूल्य और सर्वसमावेशी है। वे एक दूसरे को गद्दी पर बिठाना चाहते हैं। जहां भगवान श्रीक़ृष्ण धर्म स्थापना हेतु महाभारत युद्ध कराते हैं, वास्तव मे यही हिन्दू धर्म है जो विश्व का सर्व श्रेष्ठ धर्म है। जहां केवल मानव मात्र ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी, जीव- जन्तु सबकी चिंता का विधान है। जहां प्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव है वहीं इसके सरक्षण, संवर्द्धन मे पुण्य माना जाता है इसी धर्म की जय हो। अधर्म का नाश हो...! अधर्म का नाश हो यानी क्या ? हमे विचार करना है की अधर्म क्या है जिसका नाश हो जो नैतिकता का विरोधी हो, जिसका ब्रम्हांड मे विश्वास नहीं। जिसमे पूर्णता मे विश्वास नहीं। जहां चरित्र का कोई महत्व नहीं, जहां सम्बन्धों पर विचार नहीं, जहां गोत्र का कोई संबंध नहीं, जो प्रकृति का संरक्षण नहीं करते, जो पीपल, तुलसी आदि औषधियों को नष्ट करते हैं, जिनका नदियों मे मातृत्व का भाव नहीं यानी जल का संरक्षण नहीं। जिनका भारत के प्रति माता का भाव नहीं। जिनका वेद व भारतीय वांग्मय मे विश्वास नहीं। भारतीय महापुरुषों मे विश्वास नहीं। यहाँ के तीर्थों मे आस्था नहीं वह अधर्म है। प्राणियों मे सद्भावना हो..! प्राणियों मे सद्भावना माने क्या ? हिन्दू समाज मे केवल मनुष्य का ही चिंतन नहीं किया गया तो प्राणी मात्र का चिंतन है कहा जाता है कि प्रत्येक मनुष्य को पाँच पेड़ लगाने चाहिए, पीपल का वृक्ष, तुलसी का पौधा नहीं काटना तो नीम का वृक्ष घर के बाहर लगाना यानी हमने पेड़-पौधों मे भी आत्मा का दर्शन किया, हिन्दू धर्म के अनुसार गाय को केवल गौ समान ही नहीं समझना यहाँ तो चींटी को भी चारा देना हाथी मे गणेश का दर्शन करना यहाँ तक 'सूकर' भी विष्णु का अवतार माना जाता है इतना ही नहीं सर्प की भी पूजा उसे दूध पिलाने की परंपरा गरुण भगवान विष्णु की सवारी है तो चूहा गणेश जी का हमारे पूर्वजों (ऋषियों-मुनियों ) ने लाखों करोणों वर्षों मे सम्पूर्ण समाज का चिंतन करते हुए सभी की चिंता, सभी मे सदभना बनी रहे ऐसा समाज खड़ा किया। विश्व का कल्याण हो...! विश्व का कल्याण हो यानी क्या यह हमे समझने की आवश्यकता है कल्याण क्या है..? एक बार धरती को भगवान ''सूकर'' ने बचाया था, भगवान श्रीरामचन्द्र ने रावण का वधकर विश्व कल्याण किया था तो हृण्यकश्यप का वध नरसिंह भगवान ने किया था। द्वापर और कलयुग के संधि काल मे भगवान कृष्ण ने कंस का वध किया था और धर्म स्थापना हेतु महाभारत करवाया था। भागवत गीता मे उन्होने कहा- ''यदा-यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:, अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम सृजान्यहम'' जब-जब धर्म की हानि होती है मै आता हूँ अधर्मियों का संहार करता हूँ, वर्तमान मे विश्व कल्याण करना यानी क्या करना जो मानवता का नुकसान कर रहे हैं जो गोवध कर रहे हैं जो विश्व मे हिंसा यानी धर्म के नाम पर अपने को स्वयंभु स्वामी सिद्ध कर हजारों लाखों की हत्या कर रहे हैं। जो यह कहते हैं की मेरी ही बात सत्य है मेरा ही धर्म मानने योग्य है मेरा ही पूजा स्थल साधना योग्य है शेष को न जिंदा रहने का अधिकार है न मठ, न मंदिर बनाने का सभी नष्ट करना, सभी ग्रंथागारों को नष्ट करना चाहते हैं। इन राक्षसों को समाप्त करना यानी इन्हे समाप्त करना, जिस मानवतावादी संस्कृति की रक्षा हेतु महाराणा प्रताप व क्षत्रपति शिवाजी महराज ने जीवन भर संग्राम किया। गुरु गोविंदसिंह ने पिता, पुत्र सहित अपने प्रिय शिष्यों के बलिदान का आवाहन किया, वीर बंदा बैरागी ने अपने बंद-बंद नुचवाया, भाई मतिदास ने आरे से शरीर को चिरवाया, जिस विश्व कल्याण कारी संस्कृति की सुरक्षा हेतु गुरु तेगबहादुर का बलिदान हुआ धर्म वीर संभाजी राजे ने अप्रितम आहुति दी इन महापुरुषों ने जो किया वही विश्व का कल्याण का मार्ग है। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री (१९०७ - १९८२) भारत के एक महान सन्त, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं राजनेता थे। उनका मूल नाम हरि नारायण ओझा था। वे हिन्दू दसनामी परम्परा के संन्यासी थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम " हरिहरानन्द सरस्वती" था किन्तु वे "करपात्री" नाम से ही प्रसिद्ध थे क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे। उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषदनामक राजनैतिक दल भी बनाया था। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें 'धर्मसम्राट' की उपाधि प्रदान की गई। जीवनी - स्वामी श्री का जन्म संवत् 1964 विक्रमी (सन् 1907 ईस्वी) में श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, द्वितीया को ग्राम भटनी, ज़िला प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश में सनातन धर्मी सरयूपारीण ब्राह्मण स्व. श्री रामनिधि ओझा एवं परमधार्मिक सुसंस्क्रिता स्व. श्रीमती शिवरानी जी के आँगन में हुआ। बचपन में उनका नाम 'हरि नारायण' रखा गया। स्वामी श्री 8-9 वर्ष की आयु से ही सत्य की खोज हेतु घर से पलायन करते रहे। वस्तुतः 9 वर्ष की आयु में सौभाग्यवती कुमारी महादेवी जी के साथ विवाह संपन्न होने के पश्चात 16 वर्ष की अल्पायु में गृहत्याग कर दिया। उसी वर्ष ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी श्री ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा ली। हरि नारायण से ' हरिहर चैतन्य ' बने। वेस्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति 'फोटोग्राफिक' थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रूप में लिखा हुआ है। सरस्वती जी का वरदान था कि स्वप्न में भी उनकी वाणी शास्त्र विरूद्ध नहीं होगी। उनके लिए शास्त्र सम्मत भगवान् का स्वरूप ही ग्राह्य था।स्वामी जी वैष्णव मतों के विरूद्ध नहीं थे, बल्कि जब काशी के विद्वत्परिषद् ने भागवत्पुराण के नवम् दशम् स्कन्ध को अश्लील एवं क्षेपक कहकर निकालने का निर्णय कर लिया तब करपात्रीजी ने पूरे दो माह पर्यन्त भागवत की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत कर सिद्ध कर दिया कि वह तो भागवत की आत्मा ही है, हाँ जब कुछ वैष्णवों ने करपात्रीजी के लिए अपने ग्रंथों में कटु शब्दों का प्रयोग किये तब उनके शास्त्रार्थ महारथी शिष्यों ने उसका उसी भाषा में उत्तर दिया। इससे उन्हें वैष्णव विरोधी समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। आज जो रामराज्य संबंधी विचार गांधी दर्शन तक में दिखाई देते हैं, धर्म संघ, रामराज्य परिषद्, राममंदिर अांदोलन, धर्म सापेक्ष राज्य, आदि सभी के मूल में स्वामी जी ही हैं। संतों के वैचारिक विरोधों के साथ ही उनमें आपसी प्रेम भी है हमें उसे नहीं भूलना चाहिए। शिक्षा- नैष्ठिक ब्रम्हचर्य श्री जीवन दत्त महाराज जी से संस्कृत अध्ययन षड्दर्शनाचार्य पंडित स्वामी श्री विश्वेश्वराश्रम जी महाराज से व्याकरण शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भागवत, न्यायशास्त्र, वेदांत अध्ययन, श्री अचुत्मुनी जी महाराज से अध्ययन ग्रहण किया। तपस्वी जीवन- 17 वर्ष की आयु से हिमालय गमन प्रारंभ कर अखंड साधना, आत्मदर्शन, धर्म सेवा का संकल्प लिया। काशी धाम में शिखासूत्र परित्याग के बाद विद्वत, सन्यास प्राप्त किया। एक ढाई गज़ कपड़ा एवं दो लंगोटी मात्र रखकर भयंकर शीतोष्ण वर्षा का सहन करना इनका 18 वर्ष की आयु में ही स्वभाव बन गया था। त्रिकाल स्नान, ध्यान, भजन, पूजन, तो चलता ही था। विद्याध्ययन की गति इतनी तीव्र थी कि संपूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम घंटों और दिनों में हृदयंगम कर लेते। गंगातट पर फूंस की झोंपड़ी में एकाकी निवास, घरों में भिक्षाग्रहण करनी, चौबीस घंटों में एक बार। भूमिशयन, निरावण चरण (पद) यात्रा। गंगातट नखर में प्रत्येक प्रतिपदा को धूप में एक लकड़ी की किल गाड कर एक टांग से खड़े होकर तपस्या रत रहते। चौबीस घंटे व्यतीत होने पर जब सूर्य की धूप से कील की छाया उसी स्थान पर पड़ती, जहाँ 24 घंटे पूर्व थी, तब दूसरे पैर का आसन बदलते। ऐसी कठोर साधना और घरों में भिक्षा के कारण "करपात्री" कहलाए। श्री विद्या में दीक्षित होने पर धर्मसम्राट का नाम षोडशानन्द नाथ पड़ा। दण्ड ग्रहण- 24 वर्ष की आयु में परम तपस्वी 1008 श्री स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दण्ड ग्रहण कर "अभिनवशंकर" के रूप में प्राकट्य हुआ। एक सुन्दर आश्रम की संरचना कर पूर्ण रूप से सन्यासी बन कर "परमहंस परिब्राजकाचार्य 1008 श्री स्वामी हरिहरानंद सरस्वती श्री करपात्री जी महाराज" कहलाए। ब्रह्मलीन- माघ शुक्ल चतुर्दशी संवत 2038 (7 फरवरी 1962) को केदारघाट वाराणसी में स्वेच्छा से उनके पंच प्राण महाप्राण में विलीन हो गए। उनके निर्देशानुसार उनके नश्वर पार्थिव शरीर का केदारघाट स्थित श्री गंगा महारानी को पावन गोद में जल समाधी दी गई| उन्होने वाराणसी में "धर्मसंघ" की स्थापना की। उनका अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता। वे अद्वैत दर्शन के अनुयायी एवं शिक्षक थे। सन् १९४८ में उन्होने अखिल भारतीय राम राज्य परिषद की स्थापना की जो परम्परावादी हिन्दू विचारों का राजनैतिक दल है। आपने हिन्दू धर्म की बहुत सेवा की। आपने अनेक अद्भुत ग्रन्थ लिखे जैसे :- वेदार्थ पारिजात, रामायण मीमांसा, विचार पीयूष, मार्क्सवाद और रामराज्य आदि। आपके ग्रंथो में भारतीय परंपरा का बड़ा ही अद्भुत व् प्रामाणिक अनुभव प्राप्त होता है। आप ने सदैव ही विशुद्ध भारतीय दर्शन को बड़ी दृढ़ता से प्रस्तुत किया है। धर्मसम्राट के कुछ महत्पूर्ण उपदेश - दुस्त्यज दुर्व्यसन एवं पाशविकी चेष्टाओं को दूर करने के लिए दुस्त्यज धर्मनिष्ठा की अपेक्षा होती है और फिर उस दुस्त्यज धर्मनिष्ठा के त्याग के लिये दुस्त्यज ब्रह्मनिष्ठा या भगवद् अनुराग की अपेक्षा होती है। हमें चमत्कार , सिद्धि या शान्ति आदि गुणों से मोहित नहीं होना है । हमें वेद- पुराणों के अनुसार चलना होगा चाहे उसमें कमियाँ ही क्यों न दीखें । यह वैदिकों का धर्म है । भावुक भक्तों और ब्रह्मवादियों को ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है । साधन भक्ति के प्रभाव से मनुष्य क्या नहीं कर सकता, अर्थात् सब कुछ कर सकता है। विशुद्ध भक्ति और भगवच्चरणारविन्द में उत्कट प्रेम होने पर मनुष्य में दैवी ऐश्वर्य प्रकट होने लगता है। जो व्यक्ति केवल परमेश्वर को ही अपना सर्वस्व (सर्वेसर्वा) समझता है, वह असम्भव से असम्भव कार्य को सम्भव कर देता है। यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः । नश्वरं गृह्यमाणं तं विद्धि मायामनोमयम् ।। (श्रीमद्भागवत 11.7.7) -- यह जगत् क्या है ? यह जगत् मन का विलास है , सारा विश्व-प्रपञ्च मनोमात्र है । " हे उद्धव ! इस जगत् में जो कुछ मन से सोचा जाता है , वाणी से कहा जाता है , नेत्रों से देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है वह सब नाशवान है । स्वप्न की तरह मन का विलास है , माया मात्र है , ऐसा समझो । " मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किञ्चित्सचराचरम् । मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ।। (माण्डूक्य कारिका , 3.31) सर्वं मन इति प्रतिज्ञा । तद्भावेभावात्तदभावेSभावात् , इति अन्वय-व्यतिरेकलक्षणमनुमानम् ।। ( शाङ्करभाष्य ) विमतं मनोमात्रं तद्भावे नियतभावत्वात् , यथा मृद्भावे नियतभावो मृन्मात्रो घटादिः ।। ( आनन्दगिरि ) " जाग्रत् अवस्था में , स्वप्नावस्था में प्रपञ्च का उपलम्भ ( उपलब्धि ) होता है । सुषुप्ति और समाधि मे प्रपञ्च का उपलम्भ नहीं होता । इसका कारण क्या है ? जाग्रत् - स्वप्न में मन स्पन्दित होता है , कलना युक्त होता है , ग्राह्य-ग्राहक भाव को प्राप्त होता है । जब कि सुषुप्ति-समाधि में कलना युक्त नहीं होता ,ग्राह्य ग्राहक भाव को प्राप्त नहीं होता । सुषुप्ति में मन सुप्त - विलीन हो जाता है और समाधि में विस्मृत । इससे सिद्ध होता है कि सारा जगत् मन का विलास है । "एक दूसरे पर अनन्य प्रीती करनेवाले दो मालिकों के नौकर यदि एक दूसरे के स्वामी की निंदा करें तो वह दोनों जैसे स्वामी द्रोही कहे जाते हैं । वैसे ही एक दूसरे के आत्मा और एक-दूसरे के ध्यान में निमग्न माधव श्री विष्णु और श्री शिव की निंदा करने वाले स्वामी द्रोही है ।" श्रीआद्यशंकराचार्यजी ने कहा है -- अस्ति न खलु कश्चिदुपापायः सर्वलोकपरितोषकरो यः | सबको संतुष्ट कर पाना संभव नहीं है अतः स्वयं के और सबके हित के अविरुद्ध तथा अनुरूप आचरण निःशंक होकर करते रहना चाहिए सबको संतुष्ट करने के व्यामोह में स्व - पर हित से विमुख नहीं होना चाहिए | स्व - पर हित के अविरुद्ध और अनुकूल प्रिय का ध्यान भी अवश्य रखना चाहिए . “ अग्नीषोमात्मकं जगत “ के अनुसार संसार अग्नि और सोम रूप है ! अग्नि ही सूर्य रूप में व्याप्त होता है और सोम चन्द्रमा के रूप में ! स्रष्टि में दोनों की अनिवार्य आवश्यकता है ! आध्यात्मिक भाषा में शिव – शक्ति या प्रकृति - पुरुष सम्पूर्ण विश्व के हेतु है ! विद्युत-प्रकाश में भी ठंडा-गरम दो तार का उपयोग आपेक्षित होता है ! इसी कोटि में अग्नि और सोम का प्रत्येक स्रष्टिकार्य में उपयोग होता है ! प्रश्नोपनिषद में कहा गया है कि “ प्रजा कामना से प्रजापति ने तप करके मिथुन (जोड़ा) उत्पन्न किया ! वह था रयि और प्राण ! प्राण का स्थूल रूप आदित्य है और रयि का चंद्रमा है ! प्रत्यक्ष ही सूर्य तथा चन्द्रमा का सम्बन्ध स्रष्टि से है ! अन्न फलादि के परिपाक तथा मनुष्य के स्वास्थ्य आदि पर भी सूर्य चन्द्र का प्रभव पड़ता है ! जैसे सूर्य मंडल से पृथक भी सूर्य मंडल का प्रभव पड़ता है वैसे ही चन्द्रमा का भी प्रभाव पड़ता है ! जैसे ईधन के बगैर अग्नि का प्रज्वलन नहीं होता , घी के बिना दीपक का प्रजव्लन नहीं होता उसी प्रकार सोम के धारापात के बिना सूर्य का भी प्रजवालन नहीं हो सकता है , इसलिए श्रीभागवत में सोम या चन्द्र को सूर्यमंडल के ऊपर बताया गया है; क्योकि सोम का महान अर्णव सर्वव्यापी है , परन्तु उसका विशुद्ध रूप सूर्यमंडल से ऊपर है ! फिर भी जिसकी पूर्णता में पूर्णमासी होती है , वह द्रश्य चंद्रमा उसी महान सोमार्णव का स्थूल रूप है ! उपनिषदों में रवि या सोम का ही रूपान्तर अन्न माना गया है ! भगवान् कहते है कि “मै रसात्मक सोमरुप से सब अन्नादि ओषधियो का पोषण करता हूँ !” छान्दोग्य के अनुसार मन का अन्नमय होना बताया गया है ! तभी अन्न के द्वारा उसका अप्यायन होता है ! शुद्ध अशुद्ध अन्न का मन पर शीघ्र असर पड़ता है ! मन पर भांग या सुरापान का असर सभी को विदित है ! वेदों में सोम – चन्द्र को परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुआ कहा गया है ! सभी जीवो के सभी मनो का वह वैसे ही अधिष्तात्रदेवता है , जैसे सूर्य प्राणियों के चक्षु का अधिष्त्रदेव है ! स्थूल चन्द्र >> शास्त्र स्वयं स्थूल चन्द्र को द्रश्य ही मानते है ! प्राचीन काल में भी रावण ने चन्द्र लोक में जाकर चन्द्रमा पर बाणों का प्रयोग किया था ! ब्रह्माजी की आज्ञा से लौट आया था ! सप्तशती का पाठ करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति पढता है महिषासुर ने सूर्य,अग्नि,इन्द्र,वायु और चंद्रमा का अधिकार स्वयं ले लिया था ! हां शास्त्र के अनुसार अग्निहोत्र आदि कर्म्कलाप के अनुष्ठानार्थी धार्मिक लोगो द्वारा प्राप्य चंद्रलोक एक दिव्यधाम या स्वर्ग माना जाता है ! वहा विविध प्रकार का सुख वैभव माना जाता है ! वह सत्कर्म के प्रभाव से ही प्राप्त होता है ! उसे सर्वसाधारण गम्य नहीं माना जाता ! इधर वर्तमान वैज्ञानिक चंद्रलोक पहुँच गए ! वहा से मिटटी , पत्थर भी लाए है ! यह विरोध अवश्य ही प्रतीत होता है ! परन्तु विचार करने से यह भी विरोध नहीं है , कारण कि वह दिव्य भोग या वैभव सुक्ष्म है , स्थूल नहीं: अतः उसकी प्राप्ति के लिए धर्म-कर्मानुष्ठान ही मार्ग है ! जैसे जो पदार्थ सूक्ष्म वीक्षणों से दिखाई देता है , वह मात्र नेत्रों से द्रष्ट नहीं होता ! जैसे भूलोक में काशी , वृन्दावन का दिव्य रूप सर्वसाधारण के लिए अगोचर है , वैसे ही चंद्रलोक की सूक्ष्म विशेषता भी बाह्य चक्षु आदि से अगम्य है ! कैलाश पर्वत पर रावण बिना उपासना के गया था तो उसे केवल बर्फ और पाषाण ही द्रष्टिगोचर हुए थे ! उपासना के पश्चात् जाने पर उसे रत्नमय पाषाण और कल्पवृक्ष का वन दिखाई दिया था ! हरिदास स्वामी जी की कृपा से अकबर को वृन्दावन का केशीघाट रत्नों से निर्मित दिखाई पड़ा था ! इस तरह महान सोमार्णव के स्थूल रूप द्रष्ट चन्द्र मण्डल में भी बहुत सी दिव्यताओ के होने पर भी वैज्ञानिको को उनका अनुभव नहीं हो सकता ! उन्हें वहा मिटटी और ज्वालामुखी का ही दर्शन हुआ है ! यही स्थिति अन्य लोको के सम्बन्ध में भी है ! कई लोक इतने शीत या उष्ण है या वायुहीन है की वहा जीवन तत्व का होना असंभव समझा जाता है ! परन्तु जीवन का तत्व तो अभी वैज्ञानिको के लिए अगम्य ही है ! शास्त्रों के अनुसार लोको के अनुरूप ही शरीर एवम जीवन होते है ! इसलिए जैसे पृथ्वी पर पार्थिव शरीर होता है , वैसे ही आदित्य मंडल में तेजस शरीर होते है , उनके लिए सूर्य का तेज असह्य नहीं है ! जैसे प्रेत , पिशाच, या दिव्य , सिद्ध या देवता सामने रहने पर भी परिलक्षित नहीं होते है , वैसे ही भूलोक-चन्द्र के दिव्य देवता या सिद्ध सामने होने पर भी सर्वसाधारण को द्रष्टिगोचर नहीं होते है ! बर्फ हजारो वर्ष का हो जाने पर नीलमणि बन जाता है , तब यह विश्वास करना और भी कठिन हो जाता है यह भी सूर्य की रश्मियों में रहा होगा ! इस द्रष्टि से तो चन्द्र लोक के मिटटी पत्थर ही नहीं , भूलोक के मिटटी पत्थर भी कभी जल ही थे ! वेदंतानुसार “ अदभ्यः पृथ्वी “ जल से ही पृथ्वी बनती है ! चंद्रोदय होने पर समुद्र में उत्ताल तरंगे उत्पन्न होती है , अतः समुद्र से भी चंद्रमा का विशेष सम्बन्ध जोड़ा गया है ! किन्ही पुराणों के अनुसार चन्द्रमा भी क्षीरसमुद्र-मंथन से ही इतर रत्नों के सामान प्रकट हुआ था ! कुछ भी हो वैज्ञानिको की चंद्रलोक यात्रा से और धर्मो के सामने कठनाई अवश्य आ गयी है. किन्तु वैदिक धर्म पर इससे कुछ भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ सकता है क्योकि अनेक बार लोकलोकांतरो में मनुष्य का गमन शास्त्रों में मान्य है ! रघुवंश के अनुसार वशिष्ठ के मान्त्रिक विधानों के बल पर राजा रघु का रथ समुद्र , पर्वत , आकाश में समान रूप से जा सकता था ! कर्दम ऋषि निर्मित पुष्पक विमान की सर्वत्र अव्याहत गति थी ! अर्जुन आदि का भी इन्द्रलोक का गमनागमन था ही ! हां इन लोगो को वहा की दिव्यता का भी अनुभव होता था , परन्तु अभी वैज्ञानिको को उन लोको की दिव्यता का अनुभव नहीं हुआ. क्योकि उसके लिए विशेष सदाचार एवम पवित्रता भी आपेक्षित है ! कुमार रौनक कश्यप,,,,,,

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सन्त सद्गुरू महर्षि मेहीं दास परमहंस जी महाराज..🚩🚩 भारत की संस्कृति ऋषियों और सनतों की संस्कृति रही है। यहाँ समय-समय पर व्यास, वाल्मीकि, शुकदेव, नारद, याज्ञवल्क्य, जनक, वशिष्ठ, दधीचि, बुद्ध, महावीर, शंकर रामानन्द, नानक, कबीर, सूर, तुलसी, विवेकानंद, रामतीर्थ आदि-जैसे सन्त-मनीषी अवतरित होते ही रहे हैं। इन्हीं ऋषियों और सन्तों की दीर्घकालीन अविच्छिन्न परम्परा की एक अद्भुत और गौरवमीय कड़ी के रूप में अवतरित हुए थे हमारे परम पूज्य आराध्यदेव सन्त सद्गुरू महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज। सद्गुरू महर्षि #मेहींदास परमहंस जी महाराज का अवतरण विक्रम संवत् 1642 के वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के #उदाकिशुनगंज थाने बिहर के खोखशी-श्याम (मझुआ) नामक ग्राम में अपने नाना के यहाँ हुआ था। जन्म से ही इनके सिर में सात जटाएँ थीं, इन्हें प्रतिदिन कंघी से सुलझाने पर भी दूसरे दिन प्रातः काल वे संतों जटाएँ यथावत् मिल जाती थीं। लोगों ने समझा कि अवश्य ही किसी योगी-महात्मा का प्रादुर्भाव हुआ हैं। ज्योतिषी ने इनका जन्म-राशि का नाम रामानुग्रहलाल दास रखा। बाद में इनके पिता के चाचा श्री भरतलाल दासजी ने इनका नाम बदलकर ‘मेँहीँ लाल’ रख दिया। कालान्तर में इनके अन्तिम सद्गुरूदेव परम सन्त बाबा देवी साहब ने भी इनके इस नाम की सार्थकता का सहर्ष समर्थन किया। महर्षिजी का पितृ गृह #पूर्णियाँ जिलान्तर्गत बनमखी थाने के #सिकलीगढ़ #धरहरा नामक ग्राम में अवस्थित है। मैथिली कर्ण कायस्थ कुलोत्पन्न इनके पिताश्री बबुजनलाल दास जी यद्यपि आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न थे, तथापि शौकसे वर्षों तक #बनैली राज के एक कर्मचारी रहे। जब महर्षि को इनके पिता और इनकी बड़ी बहन झूलन दायजी ने इतने स्नेह और सुख-सुविधापूर्ण वातावरण में पालित-पोषित किया कि इन्हें माता का अभाव कभी नहीं खटका। शिक्षा और आध्यात्मिक प्रवृत्ति - पाँच वर्ष की अवस्था में मुण्डन संस्कार होने के बाद अपने गाँव की ही पाठशाला में इनकी प्रारम्भिक शिक्षा शुरू हुई, जिसमें इन्होने कैथी लिपि के साथ-साथ देवनागरी लिपि भी सिखी। प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त करके इन्होने 11 वर्ष की अवस्था में पूर्णिया जिला स्कूल में पुराने अष्टम वर्ग में अपना नाम लिखवाया। यहाँ उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के कक्षा की पाठ्य पुस्तकें पढ़नें के साथ-साथ पूर्व आध्यात्मिक संस्कार से प्रेरित होकर रामचरितमानस, महाभारत, सुखसागर आदि धर्मग्रन्थों का भी अवलोकन करते और शिव को इष्ट मानकर उन्हें जल चढ़ाया करते। इसी अवधि सन् 1909 ई0 में इन्होने जोतरामराय (जिला पूर्णियाँ) के एक दरियापंथी साधु सन्त श्री रामानन्द जी से मानस जप, मानस ध्यान और खुले नेत्रों से किये जानेवाले त्राटक की दीक्षा ले ली और नियमित रूप से अभ्यास भी करने लगे। योग-साधना की और बढ़ती हुई अभिरूचि के कारण अब ये पाठ्य पुस्तकों की और से उदासीन होने लगे और मन-ही-मन साधु-सन्तों की संगति के अभिलाषी हो उठें। प्रबल वैराग्य: 1904 ई0 में 3 जुलाई से आरम्भ हुई मैट्रिक की परीक्षा के अँग्रेजी प्रश्न-पत्र में श्ठनपसकमतश् नामक कविता की जिन प्रारम्भिक चार पंक्तियों उद्धत करके उनकी व्याख्या करने का निर्देश किया गया था, वे इस प्रकार थीः 'For the structure that we raise Time with material's field Our today's and yeasterday's Are the blocks with which we build." इन चार पंक्तियों को उद्धत करके इनकी व्याख्या लिखते-लिखते इनमें वैराग्य की भावन इतनी प्रबल हो गई कि इन्होंने अन्त में रामचरितमानस की यह चैपाई ‘देह धरे कर यहि फल भाई। भजिय राम सब काम बिहाई।।’ लिखकर परीक्षा-भवन का परित्यागकर दिया और यहीं इनकी स्कूली शिक्षा का सदा के लिए अन्त हो गया। इनके वैराग्य-उद्दीपन का आधार बना अँग्रेजी का यह दूसरा वाक्य श्।सस उमद उनेज कपमण्श् जिसे इन्होने बचपन की प्रारंभिक पाठ्य पुस्तक में पढ़ा था और जो इनके मस्तिष्क में बिजली की तरह कौंधता रहता था। सच्चे गुरू की तलाशः इन्होने धर्मग्रन्थों में पढ़ा था कि मानव-जीवन में ही है। इसलिए इन्होने आजीवन ब्रह्मचारी रहकर ईश्वर-भक्ति में अपना समस्त जीवन बिता देने का संकल्प लिया। आरम्भ में इन्होने अपने गुरू स्वामी श्री रामानन्दजी की कुटिया पर रहकर निष्ठापूर्वक उनकी सेवा की, किन्तु जिज्ञासाएँ शान्त नहीं हुई। इसलिए एक सच्चे और पूर्ण गुरू की खोज में ये निकल पड़े। इसी क्रम में इन्होने भारत के अनेक तीर्थों की यात्राएं की, परन्तु कहीं भी इनके चित्त को समाधान नहीं मिला। अन्त में इन्हें जब जोतरामराय-निवासी बाबू श्रीधीरजलाल जी गुप्त द्वारा मुरादाबाद - निवासी परम संत बाबा देवी साहब और उनकी सन्तमत-साधना-सम्बन्धी जानकारी मिली, जब इनके हृदय में सच्चे गुरू के मिल जाने की आशा बँध गई। बड़ी आतुरता से इन्होने सन् 1909 ई0 में बाबा देवी साहब द्वारा निर्दिष्ट मार्ग, ‘दृष्टियोग’ की विधि भागलपुर नगर में मायागंज-निवासी बाबू श्री राजेन्द्रनाथ सिंह जी से प्राप्त की, तो इन्हे बड़ा सहारा मिला। उसी वर्ष विजयादशमी के शुभ अवसर पर श्री राजेन्द्रनाथ सिंह जी ने भागलपुर में ही बाबा देवी साहब से इनकी भेंट करवा दी और इनका हाथ सद्गुरू देव के हाथों में दे दिया और बोले की मैं आपका गुरू नहीं, बाबा साहबही आपके गुरू हैं। मैं तो उनका आदेशपालक हूँ। बाबा देवी साहब जैसे महान् सन्त सद्गुरू को पाकर ये निहाल हो गये। उनके दर्शन और प्रवचन से इन्हें बड़ी शान्ति मिली और तृप्ति का बोध हुआ। स्वावलम्बी जीवन: कमाने की झंझट से मुक्त रहकर एकमात्र मधुकरी वृत्ति से जीवन-निर्वाह करने वाले इन युवा संन्यासी को बाबा देवी साहब ने परिश्रमपूर्वक अपनी कमाई के जीवन-यापन का आदेश दिया और कहा कि यदि सौ वर्ष तक जीवित रहोगे तो क्या खाओगे? एक सच्चा शिष्य गुरू की आज्ञा की अवहेलना कैसे करता? लेकिन महर्षि जी का कथन है कि हमारे देश में बहुत तरह के सन्त हुए है, उनमें से बहुतों ने भिक्षा माँगी, बहुतों ने नहीं भी माँगी, किन्तु थे सभी सन्त। गौ का बच्चा अपने तईं दूध पीता है। उसी प्रकार पेट का धन्धा करना सभी जानते है, लेकिन स्वावलम्बी होने से निश्चिन्तता रहती है। मुख्य बात भजन है। जो भजन-ध्यान नहीं करता और केवल पेट के धन्धों में ही लगा रहता है, वह बैल की तरह जीवनयापन करता है। वह झूठी प्रतिष्ठा और मान-बड़ाई तथा माया के जाल में पड़कर जीवन बर्बाद करता है। बाबा देवी साहब का कथन है कि जवानी मंे अर्थात् 40 वर्ष की अवस्था में इतना ईमानदारी से धन संग्रह कर लो कि बुढ़ापे में कमाने की आवश्यकता न पड़े। भजन करने हेतु घर का परित्यागकर एकान्त साधना करो, जिससे जीवन का उद्देश्य पूरा हो। भगवान भिक्षा-वृत्ति को अपनी वंश-परम्परा बताते है (राजा शुद्धोदन की कथा)। संन्यासी लोग जितना लेते है, उससे कई गुणा अधिक देश और समाज का उपकार करते हैं। (पूर्णियाँ) और सिकलीगढ़ धरहरा में क्रमशः अध्यापन और कृषिकार्य किया। गंभीर साधना और साक्षात्कार - सन् 1912 ई0 में बाबा देवी साहब ने स्वेच्छा से इन्हें शब्दयोग की विधि बतलाते हुए कहा कि अभी तुम दस वर्ष तक केवल दृष्टियोग का ही अभ्यास करते रहना। दृष्टियोग में पूर्ण हो जाने पर ही शब्दयोग का अभ्यास करना। शब्दयोग की क्रिया अभी मैंने तुम्हे इसलिए बतला दी की यह तुम्हारी जानकारी में रहे। सन् 1918 ई0 में सिकलिगढ़-धरहरा में इन्होने जमीन के नीचे एक ध्यानकूप बनाया और उसमें लगातार तीन महीने तक एकान्त में रहकर तपस्यापूर्ण साधना की, जिसमें इनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया। सन् 1919 ई0 की 19 जनवरी को बाबा देवी साहब के परिनिवृत हो जाने के बाद इनके मन में इसी जीवन में मोक्ष प्राप्त कर लेने का प्रबल संवेग सतत् उठता रहा। सन् 1933-34 ई0 में इन्होने पूर्ण तत्परता के साथ 18 महीने तक भागलपुर के कुप्पाघाट की गुफा में शब्दयोग की अत्यन्त गंभीर साधना की, फलस्वरूप ये आत्म-साक्षात्कार में सफल हो गये। सन्तमत का प्रचार-प्रसार: अब इनका ध्यान सन्तमत-सत्संग के प्रचार-प्रसार की ओर विशेष रूप से गया। इन्होने सत्संग की एक विशेष नियमावली तैयार की। फिर क्या था? अखिल भारतीय स्तर पर तीन दिनों के लिए और जिला स्तर पर दो दिनों के लिए निर्धारित तिथियों पर जगह-जगह वार्षिक अधिवेशन होने लगे। इनके अतिरिक्त प्रखण्ड स्तर पर एक दिन के लिए मासिक सत्संग का आयोजन होने लगा। कहीं-कहीं यथावसर सत्संग के साथ-साथ सामूहिक मास - ध्यान-साधना भी होने लगी। पुस्तकों के प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम समझकर इन्होने लेखन की और ध्यान दिया। ये अपनी साहित्यिक रचनाओं और प्रवचनों द्वारा यह सिद्ध करने लगे की सभी सन्तों के विचार मूलतः एक है और सन्तमत वेद, उपनिषद, गीता आदि ग्रन्थों के विचारों पर ही आधारित है। इन्होने सन्तमत के सत्स्वरूप को उजागर किया। लोग इनके विचारों से अत्यन्त प्रभावित होते गये। आज भारत के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों (नेपाल, जापान, रूस, अमेरिका, स्वीडेन आदि) में फैले हुए इनके शिष्यों की संख्या अगणित है। सर्वविदित है कि धर्म-प्रचारकों को अपने जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। सद्गुरू महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज को भी सन्तमत-सत्संग के प्रचार-प्रसार में अनेक चुनौतियों-कठिनाईयों का सामना करना पड़ा था। इन पर मनगढ़न्त दोषारोपण हुए, अनेक अफवाहों की आँधियाँ चलीं, मीरा की तरह छल से विष दिया गया, रात में फूस की कुटिया मंे अग्नि प्रज्वलित कर इन्हें जिन्दा जला देने की कोशिश की गई, तलवार से सिर कलम कर देने के लिए क्रुर हाथ उठाया गया और इन्हें विचलित करने के लिए आश्रम में डाका डालाया गया; परन्तु धरती की क्षमाशीलता, आकाश की अनन्तहृदयता, सागर की गम्भीरता, हिमालय की अटलता को धारण किये महर्षि जी प्रचार-मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए। दिनों-दिन इनका व्यक्तित्व आग में तपाये गये सोने की तरह निखरता ही गया। इनके पवित्र यश की धवल चाँदनी फैलती ही गई। अन्ततः प्रबल विद्वेषी भी एक दिन इन्हीं की शरण में आये और सबों ने इनकी गुरूता स्वीकार की। इस प्रकार सारी आपदाओं को सहन करनते हुए इन्होंने सन्तमत का प्रचार-प्रसार किया। महर्षिजी की साहित्यिक रचनाएँ एवं आश्रम व शिष्यगण: अखिल भारतीय सन्तमत-सत्संग की ओर से प्रकाशित होने वाली हिन्दी मासिक पत्रिका ‘शान्ति-सन्देश लगभग 50 वर्ष से जन-जन में सन्तमत की सूक्ष्म विवेचना कर रही है, जिसके द्वारा ऋषियों, मुनियो, साधु-सन्तों, महात्माओं और विद्वानों के लोक हितकारी वचनों को जन-सुलभ कराने का महत्कार्य सम्पन्न हो रहा है। इसके अतिरिक्त महर्षि मेँहीँ विरचित व संगृहीत 14 सारगर्भित पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। उनके नाम हैंः- 1. सत्संग-योग (चारों भाग), 2. वेद-दर्शनयोग, 3. विनय-पत्रिका-सार सटीक, 4. रामचरितमानस-सार सटीक, 5. श्रीगीता-योग-प्रकाश, 6.महर्षि मेँहीँ - पदावली, 7. सन्तवाणी सटीक, 8. भावार्थ-सहित घटरामायण पदावली, 9. सत्संग-सुधा (प्रथम भाग), 10. सत्संग-सुधा (द्वितीय भाग) 11. महर्षि मेँहीँ-वचनामृत (प्रथम भाग), 12. मोक्ष-दर्शन, 13. ज्ञानयोगयुक्त ईश्वर-भक्ति, 14. ईश्वर का स्वरूप और उसकी प्राप्ति, 15. महर्षि मेँहीँ सत्संग सुधासागर। इन समस्त रचनाओं का गम्भीरता से अध्ययन करने पर अध्यात्म-ज्ञान की सही जानकारी प्राप्त हो जाती है। महर्षि मेँहीँ कभी-कभी अपने प्रवचनों में कहा करते थे कि ‘‘सन्तों का विचार मेरा प्राणधार है। मैं इस विचार में इतना दृढ़ हूँ की मुझे कोई डुला नहीं सकता। मेरी रचित पुस्तकें जो पढ़ेंगे, वे भी दृढ़ होंगे, ऐसा मेरा विचार है।’’ सम्पूर्ण भारत और विदेश मिलाकर आपके लाखों शिष्य होंगें, जो ईश्वर-भक्ति का भेद लेकर साधना कर रहे हैं। देश-भर में आपके द्वारा और आपके नाम पर संस्थापित लगभग 500 आश्रम होंगें। संन्यासी, वैरागी शिष्य भी हजारों की संख्या में होंगें, जिनमें आचार्यों की संख्या 100 होगी। इनमें महर्षि सन्तसेवी परमहंस जी महाराज प्रधान शिष्य हैं। जिनको गुरूदेव प्रायः अपना मस्तिष्क कहा करते थे। संत महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज 8 जून 1986 ई0 रविवार को जीवन के 101 वर्ष पूरे करके इस संसार से महाप्रयाण कर गये। गुरूदेव हमारी आंखों से ओझल हुए, किन्तु हमंे आश्वस्त कर गए कि ’’मैं मोक्ष नहीं चाहता हूँ, तुम लोगों के उद्धार के लिए पुनः आऊँगा।’’ कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,