Jai Maa Dakshin kali

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#देवीदर्शन

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Neeta Trivedi Apr 8, 2021

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Jai Mata Di Apr 9, 2021

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Manoj manu Apr 9, 2021

🚩🏵🌿जय माता दी जय लक्ष्मी मैया 🌹🌺🙏 🌹🌹सुख ,शाँति ,समृद्धि और धन धान्य से परिपूर्ण करता है माँ लक्ष्मी का यह कनकधारा स्त्रोत :- महालक्ष्मी स्तोत्र की रचना श्री शंकराचार्य जी ने की थी।उनके इस स्तुति से प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी जी ने स्वर्ण के आँवलों की वर्षा कराई थी इसलिए इसे कनकधारा स्तोत्र कहते हैं।अगर हमारी जन्मपत्रिका में दारिद्र्य योग हैं या जीवन मे लक्ष्मी का अभाव जान पड़ता है तो जरूर इसका प्रयोग करना चाहिए।धन को आकृष्ट करने की इसमें अद्भुत क्षमता है। 🌹🌹कनकधारा स्त्रोत पाठ विधि :- एक चौकी पर लाल या पीले कपड़े पर माँ कनकधारा लक्ष्मी की बैठी हुई प्रतिमा या फोटो लगायें और साथ में एक कनकधारा यंत्र स्थापित करें। रोजाना नियमित रूप से कनकधारा यंत्र के सामने धुप-बत्ती जलाये,और माता का पूजन कर गोघृत के दीपक से करें। अब इस कनकधारा स्तोत्र का नियमित पाठ करें।वैसे 16 पाठ करने को कहा गया है किन्तु एक पाठ जरूर करें। इस यंत्र की विशेषता है कि यह किसी भी प्रकार की विशेष माला, जप, पूजन, विधि-विधान की मांँग नहीं करता बल्कि सिर्फ दिन में एक बार इसको पढ़ना पर्याप्त है। 🌹🌹स्तोत्रअङ्गं हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्तीभृंगांगनेव मुकुलाभरणं तमालम्अंगीकृताखिलविभूतिरपांगलीलामांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया: ।।1। 🌹🌹मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारे:प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि । माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले यासा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवाया:।।2।। 🌹🌹विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष –मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोsपि। ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध –मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिराया:।।3।। 🌹🌹आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द –मानन्दकन्दमनिमेषमनंगतन्त्रम्आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंभूत्यै भवेन्मम भुजंगशयांनाया:।।4।। 🌹🌹बाह्वन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभे याहारावलीव हरिनीलमयी विभाति। कामप्रदा भगवतोsपि कटाक्षमालाकल्याणमावहतु मे कमलालयाया:।।5।। 🌹🌹कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारे –र्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव । मातु: समस्तजगतां महनीयमूर्त्ति –र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।। 🌹🌹प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । 🌹🌹मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंमन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।। 🌹🌹दद्याद् दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा –मस्मिन्नकिंचनविहंगशिशौ विषण्णे। दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंनारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह:।।8।। 🌹🌹इष्टा विशिष्टमतयोsपि यया दयार्द्र –दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते। दृष्टि: प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांपुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया:।।9।। 🌹🌹गीर्देवतेति गरुड़ध्वजसुन्दरीतिशाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति। सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैतस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै।।10।। 🌹🌹श्रुत्यै नमोsस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैरत्यै नमोsस्तु रमणीयगुणार्णवायै। 🌹🌹शक्त्यै नमोsस्तु शतपत्रनिकेतनायैपुष्ट्यै नमोsस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै।।11।। नमोsस्तु नालीकनिभाननायैनमोsस्तु दुग्धोदधिजन्मभूत्यै। नमोsस्तु सोमामृतसोदरायैनमोsस्तु नारायणवल्लभायै।।12।। 🌹🌹नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायैनमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै । नमोऽस्तु देवादिदयापरायैनमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै।।13।। 🌹🌹नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायैनमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै । नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायैनमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै।।14।। 🌹🌹नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायैनमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै । नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायैनमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै।।15।। 🌹🌹सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिसाम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि। त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानिमामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये।।16।। 🌹🌹यत्कटाक्षसमुपासनाविधि:सेवकस्य सकलार्थसम्पद:। संतनोति वचनांगमानसै –स्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।17।। 🌹🌹सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे। भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेत्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।18।। 🌹🌹दिग्घस्तिभि: कनककुम्भमुखावसृष्ट –स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुतांगीम् । प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष –लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ।।19।। 🌹🌹कमले कमलाक्षवल्लभेत्वं करुणापूरतरंगितैरपांगै:। अवलोकय मामकिंचनानांप्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया:।।20।। 🌹🌹देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातःकल्याणगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे । दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं माम्आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः।।21। 🌹🌹स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहंत्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोभवन्ति ते भुवि बुधभाविताशया:।।22।।।। इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम्।। 🌹🌿🌹🌿माता लक्ष्मी जी सभी का सदा कल्याण करें सदा मंगल प्रदान करें जय माता दी 🌹🌿🌹🌿🙏

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🙏जय माता दी 🌹🙏 नमक के जैसा बनाइये अपना व्यक्तित्व,* *आपकी उपस्थिति* *भले ही पता न चले ...* *पर अनुपस्थिति का अवश्य* *अहेसास हो* ⛳⛳🙏माता वैष्णो देवी की कथा🙏⛳⛳ माता वैष्णो देवी से जुड़ी कई कथाएं हैं, पर जो कथा सबसे अधि‍क प्रचलित है. वैष्णो देवी ने अपने एक परम भक्त पंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई. माता ने पूरे जगत को अपनी महिमा का बोध कराया. तब से आज तक लोग इस तीर्थस्थल की यात्रा करते हैं और माता की कृपा पाते हैं. कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे. वे नि:संतान होने से दु:खी रहते थे. एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुंवारी कन्याओं को बुलवाया. मां वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं. पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गईं, पर मां वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं, ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ.’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गांवों में भंडारे का संदेश पहुंचा दिया. वहां से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया. भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है, जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए जमा हुए. तब कन्या रूपी मां वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया. भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई, तब उसने कहा कि मैं तो खीर- पूड़ी की जगह मांस खाऊंगा और मदिरापान करूंगा. तब कन्या रूपी मां ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता. किंतु भैरवनाथ ने जान-बूझकर अपनी बात पर अड़ा रहा. जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा, तब मां ने उसके कपट को जान लिया. मां वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं. भैरवनाथ भी उनके पीछे गया. माना जाता है कि मां की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे. हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए. आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है. इसके पवित्र जल को पीने या इसमें स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं. इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की. भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया. तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे. भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी. तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं. यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है. अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है. यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था. गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया. माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा. फिर भी वह नहीं माना. माता गुफा के भीतर चली गईं. तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी गुफा के बाहर थे और उन्होंने भैरवनाथ से युद्ध किया. भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी. जब वीर लंगूर निढाल होने लगा, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया. भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा. उस स्थान को भैंरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है. जिस स्थान पर मां वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा अथवा भवन के नाम से प्रसिद्ध है. इसी स्थान पर मां महाकाली (दाएं), मां महासरस्वती (मध्य) और मां महालक्ष्मी (बाएं) पिंडी के रूप में गुफा में विराजमान हैं. इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही मां वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है. कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी. माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी. उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा. उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद करीब पौने तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई करके भैरवनाथ के दर्शन करने जाते हैं. इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं. इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए. वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफा के द्वार पर पहुंचे. उन्होंने कई विधियों से पिंडों की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली. देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं. वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया. तब से श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं. आज भी बारहों मास वैष्णो देवी के दरबार में भक्तों का तांता लगा रहता है. सच्चे मन से याद करने पर माता सबका बेड़ा पार लगाती हैं. !! जय माता दी!! माता गंगा गोमती माता यमुना नीर माता पर्वत चोटिया मां मन की गंभीर ⛳⛳!!जय माता दी!!⛳⛳

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