Anju Mishra
Anju Mishra Jan 5, 2018

रहस्यमयी और अलौकिक निधिवन से जुड़ी कुछ बातें

रहस्यमयी और अलौकिक निधिवन से जुड़ी कुछ बातें
रहस्यमयी और अलौकिक निधिवन से जुड़ी कुछ बातें
रहस्यमयी और अलौकिक निधिवन से जुड़ी कुछ बातें
रहस्यमयी और अलौकिक निधिवन से जुड़ी कुछ बातें

भारत में कई ऐसी जगह है जो अपने दामन में कई रहस्यों को समेटे हुए है ऐसी ही एक जगह है वृंदावन स्तिथ निधि वन जिसके बारे में मान्यता है की यहाँ आज भी हर रात कृष्ण गोपियों संग रास रचाते है। यही कारण है की सुबह खुलने वाले निधिवन को संध्या आरती के पश्चात बंद कर दिया जाता है। उसके बाद वहां कोई नहीं रहता है यहाँ तक की निधिवन में दिन में रहने वाले पशु-पक्षी भी संध्या होते ही निधि वन को छोड़कर चले जाते है।

जो भी देखता है रासलीला हो जाता है पागल :
वैसे तो शाम होते ही निधि वन बंद हो जाता है और सब लोग यहाँ से चले जाते है। लेकिन फिर भी यदि कोई छुपकर रासलीला देखने की कोशिश करता है तो पागल हो जाता है। ऐसा ही एक वाक़या करीब 10 वर्ष पूर्व हुआ था जब जयपुर से आया एक कृष्ण भक्त रास लीला देखने के लिए निधिवन में छुपकर बैठ गया। जब सुबह निधि वन के गेट खुले तो वो बेहोश अवस्था में मिला, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ चूका था। ऐसे  अनेकों किस्से यहाँ के लोग बताते है। ऐसे ही एक अन्य वयक्ति थे पागल बाबा जिनकी समाधि भी निधि वन में बनी हुई है। उनके बारे में भी कहा जाता है की उन्होंने भी एक बार निधि वन में छुपकर रास लीला देखने की कोशिश की थी। जिससे की वो पागल ही गए थे। चुकी वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे इसलिए उनकी मृत्यु के पश्चात मंदिर कमेटी ने निधि वन में ही उनकी समाधि बनवा दी।

रंगमहल में सज़ती है सेज़ :
निधि वन के अंदर ही है ‘रंग महल’ जिसके बारे में मान्यता है की रोज़ रात यहाँ पर राधा और कन्हैया आते है। रंग महल में राधा और कन्हैया के लिए रखे गए चंदन की पलंग को शाम सात बजे के पहले सजा दिया जाता है। पलंग के बगल में एक लोटा पानी, राधाजी के श्रृंगार का सामान और दातुन संग पान रख दिया जाता है। सुबह पांच बजे जब ‘रंग महल’ का पट खुलता है तो बिस्तर अस्त-व्यस्त, लोटे का पानी खाली, दातुन कुची हुई और पान खाया हुआ मिलता है। रंगमहल में भक्त केवल श्रृंगार का सामान ही चढ़ाते है और प्रसाद स्वरुप उन्हें भी श्रृंगार का सामान मिलता है।

पेड़ बढ़ते है जमीन की और :
निधि वन के पेड़ भी बड़े अजीब है जहाँ हर पेड़ की शाखाएं ऊपर की और बढ़ती है वही निधि वन के पेड़ो की शाखाएं नीचे की और बढ़ती है।  हालात यह है की रास्ता बनाने के लिए इन पेड़ों को डंडों के सहारे रोक गया है।

तुलसी के पेड़ बनते है गोपियाँ :
निधि वन की एक अन्य खासियत यहाँ के तुलसी के पेड़ है।  निधि वन में तुलसी का हर पेड़ जोड़े में है।  इसके पीछे यह मान्यता है कि जब राधा संग कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर तुलसी के पेड़ में बदल जाती हैं। साथ ही एक अन्य मान्यता यह भी है की इस वन में लगे जोड़े की वन तुलसी की कोई भी एक डंडी नहीं ले जा सकता है। लोग बताते हैं कि‍ जो लोग भी ले गए वो किसी न किसी आपदा का शिकार हो गए। इसलिए कोई भी इन्हें नहीं छूता।

विशाखा कुंड :
निधिवन में स्थित विशाखा कुंड के बारे में कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण सखियों के साथ रास रचा रहे थे, तभी एक सखी विशाखा को प्यास लगी। कोई व्यवस्था न देख कृष्ण ने अपनी वंशी से इस कुंड की खुदाई कर दी, जिसमें से निकले पानी को पीकर विशाखा सखी ने अपनी प्यास बुझायी। इस कुंड का नाम तभी से विशाखा कुंड पड़ गया।

बांकेबिहारी का प्राकट्य स्थल :
विशाखा कुंड के साथ ही ठा. बिहारी जी महाराज का प्राकट्य स्थल भी है। कहा जाता है कि संगीत सम्राट एवं धु्रपद के जनक स्वामी हरिदास जी महाराज ने अपने स्वरचित पदों का वीणा के माध्यम से मधुर गायन करते थे, जिसमें स्वामी जी इस प्रकार तन्मय हो जाते कि उन्हें तन-मन की सुध नहीं रहती थी। बांकेबिहारी जी ने उनके भक्ति संगीत से प्रसन्न होकर उन्हें एक दिन स्वप्न दिया और बताया कि मैं तो तुम्हारी साधना स्थली में ही विशाखा कुंड के समीप जमीन में छिपा हुआ हूं।

स्वप्न के आधार पर हरिदास जी ने अपने शिष्यों की सहायता से बिहारी जी को वहा से निकलवाया और उनकी सेवा पूजा करने लगे। ठा. बिहारी जी का प्राकट्य स्थल आज भी उसी स्थान पर बना हुआ है। जहा प्रतिवर्ष ठा. बिहारी जी का प्राकट्य समारोह बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कालान्तर में ठा. श्रीबांकेबिहारी जी महाराज के नवीन मंदिर की स्थापना की गयी और प्राकट्य मूर्ति को वहा स्थापित करके आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। जो आज बाकेबिहारी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी महाराज की समाधि :
संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी महाराज की भी समाधि निधि वन परिसर में ही है। स्वामी हरिदास जी श्री बिहारी जी के लिए  अपने स्वरचित पदों के द्वारा वीणा यंत्र पर मधुर गायन करते थे तथा गायन करते हुए ऐसे तन्मय हो जाते की उन्हें तन मन की सुध नहीं रहती।  प्रसिद्ध बैजूबावरा और तानसेन इन्ही के शिष्य थे।

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कामेंट्स

jiten Jan 5, 2018
jay ho Nidhi dham ki

Anita Sharma Apr 21, 2021

*रामायण को लाखों वर्ष हो गये लेकिन जनता के हृदयपटल से विलुप्त नहीं हुई, क्योंकि ‘रामायण’ में वर्णित आदर्श चरित्र विश्वसाहित्य में मिलना दुर्लभ है।* *भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो भगवान श्री राम की धर्मपत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मणजी कैसे रामजी से दूर हो जाते? माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की... परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु अपनी धर्म पत्नी उर्मिला को कैसे समझाऊंगा? क्या कहूंगा?* *यही सोच विचार करके लक्ष्मणजी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिलाजी आरती का थाल लेकर खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़िये, प्रभु श्री राम की सेवा में वन को जाइए। मैं आपको नहीं रोकूँगी। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"* *लक्ष्मणजी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिलाजी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया। वास्तव में यही पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही धर्मपत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!!* *लक्ष्मणजी चले गये, परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिलाजी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मणजी कभी सोये नहीं, परन्तु उर्मिलाजी ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग-जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया।* *मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मणजी को शक्ति लग जाती है और श्री हनुमानजी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरतजी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमानजी गिर जाते हैं। तब हनुमानजी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि माता सीताजी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं।* *यह सुनते ही कौशल्याजी कहती हैं कि श्री राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे। माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं। माताओं का प्रेम देखकर श्री हनुमानजी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिलाजी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं??* *हनुमानजी पूछते हैं- हे देवी, आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिलाजी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।* *उर्मिला बोलीं- "मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तब से सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे। और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो रामजी को लगी है। मेरे पतिदेव की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम-रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद-बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में सिर्फ राम ही हैं, तो शक्ति रामजी को ही लगी, दर्द रामजी को ही हो रहा है। इसलिये हनुमानजी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।"* *रामायण का दूसरा प्रसंग* ~~~~~~~~~~~~~~~ *भरतजी नंदिग्राम में रहते हैं, शत्रुघ्नजी उनके आदेश से राज्य संचालन करते हैं।* *एक रात की बात है, माता कौशिल्याजी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। नींद खुल गई । पूछा कौन है?* *मालूम पड़ा श्रुतिकीर्तिजी हैं। नीचे बुलाया गया।* *श्रुतिकीर्तिजी, जो सबसे छोटी हैं, आकर चरणों में प्रणाम कर खड़ी हो गईं।* *माता कौशिल्याजी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बिटिया? क्या नींद नहीं आ रही?* *शत्रुघ्न कहाँ है?* *श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, गोद में सिमट गईं; बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए।* *उफ ! कौशल्याजी का हृदय काँप गया।* *तुरंत आवाज लगी, सेवक दौड़े आए। आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्नजी की खोज होगी, माँ चली।* *आपको मालूम है, शत्रुघ्न जी कहाँ मिले?* *अयोध्याजी के जिस दरवाजे के बाहर भरतजी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले।* *माँ सिराहने बैठ गईं, बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी ने आँखें खोलीं, माँ ! उठे, चरणों में गिरे। माँ ! आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुलवा लिया होता।* *माँ ने कहा, शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?* *शत्रुघ्नजी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया श्री रामजी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, भैया लक्ष्मणजी उनके पीछे चले गए, भैया भरतजी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं?* *माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं।* *देखो यह रामकथा है।* ~~~~~~~~~~~~~~ *यह भोग की नहीं त्याग की कथा है, यहाँ त्याग की प्रतियोगिता चल रही है और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा!* *चारों भाइयों का प्रेम और त्याग एक-दूसरे के प्रति अद्भुत, अभिनव और अलौकिक है।* *रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती है।* *भगवान श्रीराम के वनवास का मुख्य कारण - मंथरा के लिए भी श्रीराम के हृदय में विशाल प्रेम है। रामायण का कोई भी पात्र तुच्छ नहीं है, हेय नहीं है। श्रीराम की दृष्टि में तो रीछ और बंदर भी तुच्छ नहीं हैं। जामवंत, हनुमान, सुग्रीव, अंगदादि सेवक भी उन्हें उतने ही प्रिय हैं जितने भरत, शत्रुघ्न, लखन और माँ सीता। माँ कौशल्या, कैकयी एवं सुमित्रा जितनी प्रिय हैं, उतनी ही शबरी श्रीराम को प्यारी लगती हैं।

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सोना एक दैन‍िक द‍िनचर्या है लेक‍िन क्‍या आप जानते हैं वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार अगर गलत द‍िशा में स‍िर रखकर सोएं तो यह आपके ल‍िए प्रॉब्‍लम बढ़ा सकता है। जी हां इससे ड‍िप्रेशन, अन‍िद्रा, उन्‍नत‍ि में रुकावटें, दांपत्‍य सुख में कमी, बुरे सपने और भारी धन हान‍ि की समस्‍या होती है। लेक‍िन सही द‍िशा में स‍िर रखकर सोने से लाइफ की सारी टेंशन खत्‍म हो जाती है और भगवान कुबेर के आशीर्वाद से धन वर्षा भी होती है। तो आइए जानते हैं कि किस दिशा में सिर रखकर सोना द‍िलाता है कुबरे का आशीर्वाद और बुरे सपनों से न‍िजात… तब नहीं आएंगे बुरे सपने, रखें ख्‍याल वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार उतर दिशा में सिर करके सोने से बुरे सपने आते है। इस दिशा में सिर रखकर सोने से ब्लड प्रेशर भी बढ़ता है और मन भी काबू में नहीं रहता है। वहीं जब आपका सिर उतर दिशा में और दक्षिण दिशा में होता है तो बुरे सपने ज्यादा आते है क्योंकि यह शवों को रखने की दिशा है और यमलोक की दिशा है। इसल‍िए इस द‍िशा में भूलकर भी नहीं सोना चाह‍िए। इस द‍िशा में तो कतई न सोएं, बहुत अशुभ वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार कभी भी पश्चिम दिशा में सिर रखके नहीं सोना चाहिए। क्योंकि अगर इस दिशा में सिर रखकर सोने से पैर पूर्व दिशा में होते हैं। ध्‍यान रखें पूर्व दिशा देवी-देवताओं की दिशा है। इस दिशा में सोना अशुभ माना जाता है। इस दिशा में सोने से बुरे सपने तो आते ही है और मन में भी बैचेनी रहती है। इस द‍िशा में सोने से म‍िलता है यह लाभ शास्‍त्रों के अनुसार जो व्यक्ति पूर्व दिशा में सोता है वह बुद्धिमान और ज्ञानी होता है। वह ज‍िस कार्यक्षेत्र में कार्यरत होता है वहां उसे सफलता म‍िलती है और वह धन प्राप्ति में भी सफल होता है। इसल‍िए इस द‍िशा में सोने को शुभ बताया गया है। जय श्री महाकाली जय श्री महाकाल जी ॐ नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री राम जय श्री कृष्ण राधे राधे नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 👣 🌹 👏 🌿 🚩 🐚

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Garima Gahlot Rajput Apr 20, 2021

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Neeraj Dongre Apr 21, 2021

शुभ दोपहर माय मंदिर। 🙏🙏🙏 ॐ राम रामाय नमः ॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमःॐ राम रामाय नमः ⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️🔱⚛️

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