Dr. Ratan Singh
Dr. Ratan Singh Aug 15, 2017

🇮🇳जन्माष्टमी🇮🇳 बाके बिहारी मंदिर>

#कृष्णजन्माष्टमी #स्वतंत्रतादिवस
🎎कृष्ण जन्माष्टमी🎎

🎈कृष्ण जन्माष्टमी 🎈एवं🇮🇳15अगस्त के शुभ

अवसर🇮🇳 पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं🇮🇳

🎎जय श्री कृष्ण🎎

🇮🇳जय भारत🇮🇳

🎭नमस्कार🎭

🇮🇳जय हिंद🇮🇳

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Rachna Jerath May 22, 2019

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श्रीकृष्ण-जन्म ========== ‘श्री गोपालचम्पू’ में श्रीकृष्ण के जन्म का बड़ा सुन्दर वर्णन मिलता है। श्रीकृष्णचन्द्र परमानन्दकन्द के बाल्य-सुख के उपभोक्ता श्रीमत् नन्दराय कौन थे? ‘गोप’ शब्द से भी उनका व्यवहार होता है। ‘सच्छूद्रौ गोपनापितौ’ इत्यादि वचनों के आधार पर कुछ लोग उन्हें शूद्र समझ सकते हैं। वैसे तो भगवान का जहाँ ही प्राकट्य हो, वही कुल धन्य है, फिर कोई भी क्यों न हो। परन्तु ‘श्री गोपालचम्पू’ के रचयिता ने तो उन्हें क्षत्रिय से वैश्यकन्या में उत्पन्न, वैश्य माना है। वृष्णिवंश में भूषणस्वरूप देवमीढ़ मथुरापुरी में निवास करते थे। उनकी दो स्त्रियाँ थीं, एक वैश्या-कन्या और दूसरी क्षत्रिय-कन्या। क्षत्रिय-कन्या से शूर हुए जिनके वसुदेवादि हुए और वैश्यकन्या से पर्ज्जन्य हुए। अनुलोम संकरों का वही वर्ण होता है, जो माता का होता है। इसी कारण पर्ज्जन्य ने वैश्यता का ही स्वीकार किया और गो-पालन में ही विशेष रूप से प्रवृत हुए, जो कि वैश्यजाति का प्रधान कर्म है, इसीलिए वे गोप भी कहे गये- “वृष्णिवंशावतंसः श्रीदेवमीढ़नामा परमगुणधामा मथुरामध्यास्यामास। तस्य भार्या द्वयमासीत। प्रथमा द्वितीयवर्णा द्वितीया तृतीयवर्णा। तयोंच क्रमेण शूरः पर्ज्जन्य इति पुत्रद्वयं बभूव। शूरस्य वसुदेवादयः समुदयन्ति स्म। श्रीमान् पर्ज्जन्यस्तु ‘मातृवर्णवद्वर्णसंकर’ इति न्यायेन वैश्यतामेवाविश्य गवामेवैश्यं वश्यं चकार।” पर्ज्जन्य बड़े धर्मात्मा और ब्रह्म हरिपूजनपरायण थे। उनका मातृवंश वैश्य सर्वत्र विस्तीर्ण और प्रशंसनीय था, उनमें भी वैश्यविशेष आभीर वंश था। वैश्य की पुत्री में ब्राह्मण से उत्पन्न पुत्र ‘अम्बष्ठ’ होता है और अम्बष्ठ-कन्या में ब्राह्मण से उत्पन्न ‘आभीर’ होता है। यह आभीर वैश्य ही होता है। ऐसे ही वैश्यकुल की कन्या में देवमीढ़ क्षत्रिय से उत्पन्न पर्ज्जन्य वैश्य थे। यही गोपवंशरूप से कृष्ण-लीला में प्रख्यात हैं, अत: इससे शूद्र गोप पृथक है। यह तो वैश्य ही गो-पालन कर्म से गोप कहे गये। ब्रह्मा ने भी आभीरापरपर्याय गोप-कन्या केा पत्नीत्वेन स्वीकार करके उसके साथ यज्ञ किया था। अत: ‘भागवत’ में भी गर्ग जी से नन्द जी ने कहा था कि इन दोनों पुत्रों का द्विजातिसंस्कार करो- ‘कुरु दि्वजातिसंस्कारम्।’’ कृष्ण ने भी “कृषिगोरक्षवाणिज्यं कुसीदं तुर्यमुच्यते। वात्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम्।।” इत्यादि से अपने को गोवृत वैश्य कहा है। पर्ज्जन्य के उपानन्द, अभिनन्द, नन्द, सन्नद और नन्दन ये पांच पुत्र हुए। उनमें भी श्रीमन्नारायण सबके ही प्रेमास्पद थे। किसी सुमुख नामक प्रमुख गोप ने श्रीमन्नन्दराय को परम धन्या, सुनने वालों, देखने वालों‚ भक्तिवालों को यश देने वाली यशोदा नाम्नी कन्या का प्रदान किया। पर्ज्जन्य ने मध्यम पुत्र नन्द को ही सर्वसम्मति से राज्य दिया और सम्पूर्ण भाई मन्त्री आदि का कार्य करते थे। पाँचों भाइयों में कोई सन्तति न थी। पुत्रेष्टि यज्ञादि किये गये, अनेक प्रकार की भगवदाराधना होती रही। एक दिन श्रीमन्नन्दराय ने नन्दरानी से कहा- “मानिनि, मैं तुम्हारे अंक में दुग्धोद्गारी पयोधर पर क्रीड़ा करने वाला श्यामवर्ण का चंचल, चारु, दीर्घ नेत्रों वाला बालक स्पष्ट रूप से देख रहा हूँ। क्या यह स्वप्न है या जागरण? सहधर्मिणी! ठीक कहो, क्या तुम्हें भी वैसा ही प्रतीत होता है?” “श्यामश्चचञ्चलचारुदीर्घनयनो बालस्तवांकस्थले। दुग्धोद्गारि पयोधरे स्फुटमसौ क्रीडन् मयालोक्यते।।” नन्दरानी ने कहा- “देव! मेरे भी मन में ऐसी ही बात आ रही है।” इसके अनन्तर दोनों ही ने अपनी मनोरथपूर्ति के लिये एकादशी-व्रत प्रारम्भ किया। वर्ष पूर्ण होने पर समान काल में ही दोनों के सामने देवदेव का प्राकट्य हुआ और कहा कि “अहो! तुम व्रत से क्यों खिन्न हो रहे हो? जो अतसीकुसुम के समान सुषमासम्पन्न सुकुमार तुम दोनों के अनुभव में आता है, वह तुम्हारे संकल्प का ही फल है।” ऐसा कहकर देव अन्तर्हित हुए। यथा समय दिव्य काल में, जिस समय जाति (जूही) के साथ माधवी, केतकी के साथ केतक, अम्बुजों के साथ कुमुद फूले थे, दिशाएँ प्रसन्न थीं, उसी समय सर्वाश्चर्यनिधि श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। ललित स्मित से नील कमलों के सम्राट के समान बालक का मुख था। वस्तुतः वह स्वरूप ऐसा विचित्र था कि औरों को तो कौन कहे, वह अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान भगवान को ही आश्चर्य-सिन्धु या विस्मय में डालने वाला था- “यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोगमायाबलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धे: परं पदं भूषणभूषणांगम।।” भूषणों को भी विभूषित करने वाले अंगों को मणिमय प्रांगण में प्रतिबिम्बित देखकर कृष्ण स्वयं मुग्ध होकर उससे मिलने के लिये उत्सुक हो उठते थे- “रत्नस्थले जानुचरः कुमारः संक्रान्तमात्मीयमुखारविन्दम्। आदातुकामस्तदलाभखेदान्निरीक्ष्य धात्रीवदनं रुरोद।।” कुछ महानुभावों का कहना है, श्रीभगवान का सम्बन्ध केवल प्रेम-निबन्धन ही है। तभी कहा है- “भक्त्याऽहमेकया ग्राह्यः” भगवान केवल भक्ति से ही ग्राह्य होते हैं। जो जिस भाव से प्रभु को भेजते हैं, प्रभु भी उन्हें वैसे ही प्राप्त होते हैं, अतः श्रीमन्नन्दराय एवं नन्दरानी के भावानुसार प्रभु वात्सल्य-प्रेमानुकूल उनकी पुत्रता को प्राप्त हुए। श्रीवसुदेव जी को भी वात्सल्य-रस प्राप्त था, परन्तु सूतिका-गृह में ही भगवान के ऐश्वर्यपूर्ण रूप को देखने से उनमें वात्सल्य-रस का उतना तारल्य नहीं रह गया था, किन्तु श्रीमन्नन्दराय में सर्वदा समुद्बुद्ध अत: सर्वदा ही शुद्ध वात्सल्य-रस रह गया था। वसुदेव और देवकी ने भगवान को मन से ही पुत्रत्वेन धारण किया था, यह बात अग्रिम वचनों से ज्ञात होती है। “आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः” अर्थात अंशभाग से भगवान आनकदुन्दुभि के मन में प्रविष्ट हुए। “दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः।" अर्थात जैसे पूर्वा दिक आनन्दकर चन्द्रमा को धारण करती है, वैसे ही देवती ने मन से ही सर्वान्तरात्मा कृष्ण को धारण किया। जैसे वसुदेव-देवकी ने मन से ही कृष्ण को धारण किया था, वैसे ही श्री व्रजराज और व्रजरानी ने भी पुत्रत्वेन उन्हें धारण किया था। इसीलिये कहा जाता है कि माघ शुक्ल प्रतिपद् की सर्व-सुखसम्पन्न रजनी में श्री व्रजराज की सेवा करती हुई, यशोदा ने तन्द्रा में स्वप्न के समान कुछ चमत्कार देखा। जिस कुमार को पहले देखा था, वही किसी सर्वावरणकारिणी दिव्य कुमारी से अपने को आवृत करके व्रजराज के हृदय से निकलकर उनके हृदय में प्रविष्ट हुए। बालक हृदय में विराजमान हुआ और कन्या उदर में। वह उसी समय से नन्दरानी में गर्भ-लक्षण दिखलायी देने लगी।व्रजरानी में प्रस्फुरित होने से ही कृष्ण का लोक में भी वैसे ही स्फुरण हुआ, जैसे स्फटिक-घटी में रहने वाला दीपक भीतर-बाहर सर्वत्र प्रकाश करता है- “व्रजराज्ञ्यां स्फुरितात्मा कृष्णः स्फुरति स्म लोकेऽपि। दीपः स्फटिकघटी भागन्तर्बहिरपि विभाति तत्तुल्यः।।” यद्यपि नन्दरानी रसना-रस के जीतने वाले धैर्य से युक्त और गाम्भीर्यादि गुणों में अत्यन्त प्रवीण थीं, फिर भी कृष्णावेश से तुलसी-संस्कृत घृत और सितायुक्त स्वच्छ परमान्नरूप दोहद की उन्हें इच्छा होने लगी। उधर योगमाया ने देवकी के साप्तमासिक गर्भ को आकर्षित करके रोहिणी में रख दिया। फिर रोहिणी ने श्रावण से पहले श्रवण नक्षत्र में गौर सुन्दर कुमार को उत्पन्न किया। जैसे पौर्णमासी पूर्ण चन्द्र को प्रकट करती हैं, सिंहवधू विक्रमी शावक को उत्पन्न करती है, वैसे ही रोहिणी ने बलराम को प्रकट किया। उस बालक के अंग की कान्ति सूर्य की कान्ति को लज्जित करती थी, मुखकान्ति चन्द्रमा की कान्ति को लजाने वाली थी। महाप्रभावशाली वह बालक अन्य समय में अत्यन्त जड़-सा ही दिखायी देता था, परन्तु कृष्ण को गर्भ में धारण करने वाली नन्दरानी जब उसको अपनी गोद में लेती थी, तभी बालक को विश्रान्ति और प्रसन्नता होती थी। अनन्तर, परम शुभ काल में कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ। ललितस्मित नील कमल के समान मुख, सूक्ष्म भ्रमर से चित्रित कैरव-कोश के समान नेत्र, मधुर श्यामल तिलप्रसून के समान नासिका, सिन्दूर-गिरि-समुद्भूत जवाकुसुम और बिम्बाफल के सदृश ओष्ठ और अधर थे। अंजनभूमि-समुद्भूत श्याम लता-पत्र के समान कान, नवपल्लवयुक्त नव तमाल-शाखा के समान दोनों ही श्रीहस्त, कोमल मृणालतन्तु सदृश रोमों की दक्षिणावर्तराजि से लांछित दक्षिण वक्षःस्थल और सुवर्णवर्ण रोमों की वामावर्त्तराजि से लांछित वाम वक्षःस्थल, विद्युत् से आश्लिष्ट श्यामल मेघ-खण्ड के समान सुशोभित होता था। वह बालकृष्ण अपने मुख से महापद्‌म को, नयनों से पद्‌म को, नासिका से मकर को, स्मित से कुन्द को, कण्ठ से शंख को, चरणपृष्ठों से कच्छप को और दीप्ति से इन्द्रनील को जीतने वाले थे।इनका आविर्भाव स्नेहमयी स्फूर्ति-परंम्परा के वशीकार से ही होता है, अन्यथा नहीं। पुत्र-रूप से आविर्भाव में पितृभावमय स्नेह ही बीज है। जहाँ भी कहीं पुत्रभाव से उनका प्रादुर्भाव होता है वहाँ तत्सम्बन्धमय स्नेह की स्फूर्ति ही मुख्य कारण है। व्रजराज आदि में शुद्ध समुद्बुद्ध वात्सल्य भाव था। श्रीदेवकी-वसुदेव के हृदय में वही चतुर्भुजरूप से थे, अत: बाहर भी उन्हें द्विभुज स्वरूप का ही उपलम्भ हुआ। जिस समय देवकी को कंस के भय से आविर्भूत चतुर्भुज रूप को आच्छादन करके द्विभुज रूप देखने की इच्छा हुई, उस समय श्रीयशोदा के यहाँ प्रकट द्विभुज स्वरूप ही वहाँ प्रकट होकर चतुर्भुज स्वरूप को अपने में लीन करके आविर्भूत हुआ। साकाररूप माता के गर्भ में स्थित रहकर भी निराकारतया योगमाया ऊर्ध्‍व गति से द्विभुज कृष्ण को देवकी के पास लायी। जैसे गन्धवाह नीलकमल-दल को लाये, वैसे ही सबसे अलक्षित होकर व माता को भी मोहित करके लायी और गर्भस्थ आकार से माता को प्रसूति का भ्रम ही पैदा करके अपने-आपको बाहर प्रकट करके शय्या पर स्थित रही। उसी ने संकर्षण हटाकर रोहिणी में प्रवेश कराया था। “अयाहमंशभागेन” का यही आशय है कि आकार भेद द्विभुजाकार नन्दनन्दन में मिल जायगा। अनन्तर वसुदेव जी योगमाया के प्रभाव से सबके प्रसुप्त हो जाने पर उस बालक को लेकर श्रीनन्दराय के भवन में पहुँचे और नन्दरानी की शय्या पर उस बालक को पधार कर वहाँ से कन्या को उठा लाये। ईश्वरता-प्रत्यायक चतुर्भुज रूप से और उपदेश से भगवान ने वसुदेव के यहाँ उत्पन्न होना तो व्यक्त कर दिया, परन्तु पुत्रता-सन्देह उत्पन्न किया, अत: उन्हें अनेकों बार उनकी पुत्रता में सन्देह होता था। श्रीमन्नन्दरानी और नन्द के यहाँ तो द्विभुज रूप से और वचनादि शक्ति को व्यक्त करने से निःसन्देह पुत्रता को व्यक्त किया। आनकदुन्दुभि (वसुदेव) को इन बातों का कुछ भी अनुसन्धान नहीं हुआ। फिर भी श्रीनन्द की कन्या को ले जाकर उसे खो दिया, उसके बदले में कोई प्रतिदान नहीं दिया। ऐसी स्थिति में वे छोड़े हुए कृष्ण में अपनापन कैसे मान सकते थे? आगमादिकों में भी नन्दनन्दन, नन्दात्मज आदि स्पष्ट पद आते हैं, जैसे “तस्मान्नन्दात्मजोऽयन्ते”, “पशुपांगजाय।” फिर माया के उपरत होने पर नन्दरानी ने जागकर प्रत्यक्ष नीलोत्पल-दल-श्याम पुत्र को देखा- “ददृशे च प्रबृद्धा सा यशोदा जातमात्मजम्। नीलोत्पलदलश्यामं ततोऽत्यर्थं मुदं ययौ।।” बालक का दिव्यातिदिव्य इन्द्रनीलमणि के समान वपु और चन्द्र को जीतने वाला परम मनोहर मुख था। लोकतीत कमल-दल के सदृश नेत्र और कल्पतरु-नव-पल्लव दलों के सदृश हाथ थे। हस्त-पादादि को कुछ चलाते हुए वह अपने मदु, मधुर क्रन्दन से विश्व को मोहित करता था। ‘क्या यह श्यामल प्रकाशों का साम्राज्य या रूप-रत्नाकरों की निधि है, लावण्यभागियों का भाग्य-किंवा तत्तत् अंगावलियों का विलसित सिद्धान्त है’ जब तक नन्दरानी यह विचार ही कर रही थीं, तब तक ‘ओमोम्’ इस तरह रोदन-व्याज से बालक ने उसकी विकल्पपरम्परा को स्वीकार किया। प्रजात पुत्र को देखकर नन्दरानी सखियों को भी न बुला सकीं, फिर और चेष्टित होना तो दूर रहा। प्रेमाश्रुओं से आँखें मिच गयीं, कण्ठ गद्गद हो उठा, वपु स्तब्ध हो उठा, लालन की लालसा से आत्मा व्यग्र हो उठा। जब माया चली गयी, तब लोगों का मोह गया। पुरुषोत्तम के प्राकट्य में व्यवहित नरनारियों के भी मन वैसे ही विकसित हो उठे, जैसे चन्द्रोदय होते ही व्यवहित कुमुदिनियों के भी सुमन खिल उठते हैं। वह बालक केवल नन्दरानी की शय्या पर ही नहीं, अपितु स्निग्धाओं के स्वच्छ चित्तों में भी प्रतिबिम्ब के समान प्रस्फुरित हुआ, अतः वे स्वच्छ शीघ्र ही रोहिणी आदि के संग आकर बालक को वैसे देखने लगीं, जैसे समुदित होते ही चन्द्र को चकोरीगण देखता है। यशोदा यद्यपि प्रेम में स्तब्ध थीं, तथापि स्नेह नेत्रों से बालक को देख रही थीं। व्रजपुर-पुरन्ध्रीगण कल्पना करती हैं- क्या यह नवीन इन्दीवर महान इन्द्रनील है किंवा वैदूर्य है? अहो! यह जो बाल का स्वरूप है, वह मानो मृगमदसौरभ और तमाल-दल से बना हुआ है, अद्भुत लावण्य से अभ्यक्त है, निज देह के तेज से उद्वर्तित है, निज मुखनिर्गत कान्तिसुधा से स्नात है, सौन्दर्य से अनुलिप्त है, त्रैलोक्य-लक्ष्मी से समसलंकृत है। चूर्णीभूत तम के समान इसके केश और चन्द्रबिम्ब के समान इसका मुख है। मानो सबका मन खींचने के लिये ही उसने मूँठी बाँध रखी है। यमुना-तरंग के समान चरण-कमल को चलाते हुए उस बालक को देखकर सब बहुत प्रसन्न हुईं और कहने लगीं- “अहो! इसे शिर पर रखें, नयन में रखें वा हृदय-मध्य में रखें।” बार-बार उस बालक को देखकर भी नहीं तृप्त होतीं। फिर धैर्य से किसी तरह उन्होंने स्नानादि कृत्य सम्पादित किया। श्रीमन्नन्दादि गोपों को कृष्ण के जन्म का समाचार जब प्राप्त हुआ, तब परमानन्द में सब विभोर हो गये। क्या भारत को वह शुभ दिन देखने का सौभाग्य पुनः प्राप्त होगा।?

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