जिस पात्र में वर्षों से तेल ही रखा जाता है , ऐसे बर्तन को पाँच दस बार धोने पर वह स्वच्छ तो होगा , किन्तु तेल की वास नहीं जायेगी । अब उस बर्तन में यदि चटनी अचार रखा जायेगा तो वह बिगड़ जायेगा । हमारा मस्तिष्क भी ठीक ऐसा ही है । जिसमें कई वर्षो से कामवासना रुपी तेल रखा गया है । इस बुद्धिरुपी पात्र में श्रीकृष्ण रुपी रस रखना है। मस्तिष्क रुपी बर्तन में काम का अंशमात्र भी होगा तो उसमें प्रेमरस , जमेगा ही नहीं। जब बुद्धि में परमात्मा का निवास होगा,तभी पूर्ण शान्ति मिलेगी । जब तक बुद्धि मे ईश्वर का अनुभव नहीं होगा तब तक आनन्द का अनुभव नहीं हो पायेगा । संसार के विषयों का ज्ञान बुद्धि में आने पर विषय सुखरुप बनते हैं, परमात्मा को बुद्धि में रखना है । मस्तिष्क में जब ईश्वर आ बसते हैं ,तभी ईश्वर स्वरुप का ज्ञान पूर्ण आनन्द देता है । जैसे तेल के अंश से चटनी अचार बिगड़ते है वैसे ही बुद्धि में वासना का अंश रह जाने पर वह अस्थिर ही रहेगी। बुद्धि को स्थिर और शुद्ध करने हेतु मन के स्वामी चंद्र और बुद्धि के स्वामी सूर्य की आराधना करनी है । त्रिकाल संध्या करने से बुद्धि विशुद्ध होगी । जब तक राम नहीं आते हैं, तब तक कृष्ण भी नहीं आते है । जिसके घर मे राम नही आते हैं , उसका रावण (काम) मरता नहीं और जब तक काम रुपी रावण नहीं मरता तब तक श्रीकृष्ण नहीं आते है। जब राम की मर्यादा का पालन किया जायेगा तभी काम मरेगा । चाहे जिस संप्रदाय में विश्वास हो , किन्तु जब तक रामचन्द्र की मर्यादा का पालन नहीं किया जायेगा तब तक आनन्द नहीं मिलेगा । रामचन्द्र की उत्तम सेवा यही है कि उनकी मर्यादा का पालन किया जाए, उनका सा ही वर्तन रखें। रामजी का भजन करना अर्थात् उनकी मर्यादा का पालन करना । उनका वर्तन हमें जीवन में उतारना चाहिए । राम जी को मन में बसाने,मर्यादा-पुरुषोत्तम रामचन्द्र का अनुकरण करने पर भगवान मिलेंगे । रामजी की लीलाएँ अनुकरणीय एवं श्रीकृष्ण की लीलाएँ चिंतनीय हैं । रामचन्द्र का मातृप्रेम, पितृप्रेम, बंधुप्रेम , एक पत्नी प्रेम आदि सब कुछ जीवन में उतारने योग्य है । श्रीकृष्ण के कृत्य हमारे लिए अशक्य है। उनका कालियानाग को वश मे करना , गोवर्धन उठाना आदि । रामचन्द्र ने अपना ऐश्वर्य छिपाकर मानव जीवन का नाटक किया साधक का वर्तन कैसा होना चाहिए यह रामचन्द्र जी ने बताया है । साधक का वर्तन रामचन्द्र जैसा होना चाहिए , सिद्ध पुरुष का वर्तन श्रीकृष्ण जैसा हो सकता है । रघुनाथ जी का अवतार राक्षसों की हत्या के हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव धर्म सिखाने के लिए हुआ था । वे जीवमात्र को उपदेश देते हैं। रामजी ने किसी भी मर्यादा को भंग नहीं किया । हमें भी मर्यादा का पालन करते हुए श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। स्वान्तःसुखाय ......... श्रीहरिशरणम् ...........

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नौ दिन कैसे करें कन्या-पूजन ================== नवरात्रि --बालिकाओं को प्रसन्न करने का पर्व। नवरात्रि यानी सौन्दर्य के मुखरित होने का पर्व। नवरात्रि यानी उमंग से खिल-खिल जाने का पर्व। नौ दिनों तक दैवीय शक्ति मनुष्य लोक के भ्रमण के लिए आती है। इन दिनों की गई उपासना-आराधना से देवी भक्तों पर प्रसन्न होती है। लेकिन पुराणों में वर्णित है कि मात्र श्लोक-मंत्र-उपवास और हवन से देवी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। इन दिनों २ से लेकर ५ वर्ष तक की नन्ही कन्याओं के पूजन का विशेष महत्व है। नौ दिनों तक इन नन्ही कन्याओं को सुंदर उपहार देकर इनका दिल जीता जा सकता है। इनके माध्यम से नवदुर्गा को भी प्रसन्न किया जा सकता है। पुराणों की दृष्टि से नौ दिनों तक कन्याओं को एक विशेष प्रकार की भेंट देना शुभ होता है। प्रथम दिन--- "फूल" की भेंट देना शुभ होता है। साथ में कोई एक श्रृंगार सामग्री अवश्य दें। अगर आप माँ "सरस्वती" को प्रसन्न करना चाहते है तो "श्वेत फूल" अर्पित करें। अगर आपके दिल में कोई "भौतिक कामना" है तो "लाल पुष्प"देकर इन्हें खुश करें। (उदाहरण के लिए : गुलाब, चंपा, मोगरा,गेंदा, गुड़हल) दूसरे दिन--- "फल" देकर इनका पूजन करें। यह फल भी सांसारिक कामना के लिए लाल अथवा पीला और वैराग्य की प्राप्ति के लिए केला या श्रीफल हो सकता है। याद रखें कि फल खट्टे ना हो। तीसरे दिन---- 'मिठाई" का महत्व होता है। इस दिन अगर हाथ की बनी खीर, हलवा या केशरिया चावल बना कर खिलाए जाएँ तो देवी प्रसन्न होती है। चौथे दिन----- "वस्त्र" देने का महत्व है लेकिन सामर्थ्य अनुसार रूमाल या रंग बिरंगे फीते दिए जा सकते हैं। पाँचवे दिन----- देवी से सौभाग्य और संतान प्राप्ति की मनोकामना की जाती है। अत: कन्याओं को पाँच प्रकार की श्रृंगार सामग्री देना अत्यंत शुभ होता है। इनमें बिंदिया, चूड़ी, मेहँदी, बालों के लिए कांटे सुगंधित साबुन, काजल, नाखूनी, पावडर इत्यादि हो सकते हैं। छठे दिन----- "खेल-सामग्री देना चाहिए"। आजकल बाजार में खेल सामग्री की अनेक प्रकार उपलब्ध है। पहले यह रिवाज पाँचे, रस्सी और छोटे-मोटे खिलौनों तक सीमित था। अब तो ढेर सारे विकल्प मौजूद है। सातवें दिन----- "माँ सरस्वती" के आह्वान का होता है। अत: इस दिन कन्याओं को "शिक्षण सामग्री" दी जानी चाहिए। आजकल बाजार में विभिन्न प्रकार के पेन, पेंसिल, कॉपी, ड्रॉईंग बुक्स, कंपास, वाटर बॉटल, लंच बॉक्स उपलब्ध है। आठवें दिन----- नवरात्रि का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन अगर कन्या का अपने हाथों से श्रृंगार किया जाए तो देवी विशेष आशीर्वाद देती है। इस दिन कन्या के पैर दूध से पूजने चाहिए। पैरों पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए। इस दिन कन्या को भोजन कराना चाहिए और यथासामर्थ्य कोई भी भेंट देनी चाहिए। हर दिन कन्या-पूजन में दक्षिणा अवश्य दें। नौवें यानी नवदुर्गा के अंतिम दिन---- खीर,ग्वारफली की सब्जी और दूध में गूँथी पूरियाँ कन्या को खिलानी चाहिए। उसके पैरों में महावर और हाथों में मेहँदी लगाने से देवी पूजा संपूर्ण होती है। अगर आपने घर पर हवन का आयोजन किया है तो उनके नन्हे हाथों से उसमें समिधा अवश्य डलवाएँ। उसे इलायची और पान का सेवन कराएँ। इस परम्परा के पीछे मान्यता है कि देवी जब अपने लोक जाती है तो उसे घर की कन्या की तरह ही बिदा किया जाना चाहिए। अगर सामर्थ्य हो तो नौवें दिन लाल चुनर कन्याओं को भेंट में दें। उन्हें दुर्गा चालीसा की छोटी पुस्तकें भेंट करें। गरबा के डाँडिए और चनिया-चोली भी दिए जा सकते हैं। बालिकाओं से घर में गरबे करवाने से भी देवी प्रसन्न होती है। इन सारी रीतियों के अनुसार पूजन करने से देवी प्रसन्न होकर वर्ष भर के लिए सुख, समृद्धि, यश, वैभव, कीर्ति और सौभाग्य का वरदान देती है। नवरात्र में किस आयु की कन्या के पूजन से मिलता है कैसा फल------ पूजन के लिए सबसे पहले 9 कन्याओं पर मां का पवित्र जल छिड़कें और उनका पूजन कर भोजन कराएं। भोजन के बाद चरण स्पर्श कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें। प्रथम दिवस------- दो वर्ष की कन्या के पूजन से दुखों का नाश होता है। द्वितीय दिवस---- तीन वर्ष की कन्या साक्षात त्रिमूर्ति का स्वरूप है। इससे अन्न-धन में बढ़ोतरी होती है। तृतीय दिवस---- चार वर्ष की कन्या का पूजन करने से परिवार का कल्याण होता है, जीवन में शुभ समाचार मिलते हैं। चतुर्थ दिवस----- पांच वर्ष की कन्या के पूजन से रोगों से मुक्ति मिलती है। पंचम दिवस---- छह वर्ष की कन्या का पूजन साक्षात मां काली का पूजन है। इससे विद्या और यश की प्राप्ति होती है। षष्ठम दिवस---- सात वर्ष की कन्या मां चंडिका का रूप है। इससे बाधाओं का निवारण होता है। सप्तम दिवस---- आठ वर्ष की कन्या का पूजन संकट से रक्षा करता है। अष्टम दिवस---- नौ वर्ष की कन्या के पूजन से असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी सफल हो जाते हैं। नवम दिवस---- दस वर्ष की कन्या का पूजन जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है। इससे मां अपने भक्त के समस्त मनोरथ पूर्ण करती है

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नौ दिन कैसे करें कन्या-पूजन ================== नवरात्रि --बालिकाओं को प्रसन्न करने का पर्व। नवरात्रि यानी सौन्दर्य के मुखरित होने का पर्व। नवरात्रि यानी उमंग से खिल-खिल जाने का पर्व। नौ दिनों तक दैवीय शक्ति मनुष्य लोक के भ्रमण के लिए आती है। इन दिनों की गई उपासना-आराधना से देवी भक्तों पर प्रसन्न होती है। लेकिन पुराणों में वर्णित है कि मात्र श्लोक-मंत्र-उपवास और हवन से देवी को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। इन दिनों २ से लेकर ५ वर्ष तक की नन्ही कन्याओं के पूजन का विशेष महत्व है। नौ दिनों तक इन नन्ही कन्याओं को सुंदर उपहार देकर इनका दिल जीता जा सकता है। इनके माध्यम से नवदुर्गा को भी प्रसन्न किया जा सकता है। पुराणों की दृष्टि से नौ दिनों तक कन्याओं को एक विशेष प्रकार की भेंट देना शुभ होता है। प्रथम दिन--- "फूल" की भेंट देना शुभ होता है। साथ में कोई एक श्रृंगार सामग्री अवश्य दें। अगर आप माँ "सरस्वती" को प्रसन्न करना चाहते है तो "श्वेत फूल" अर्पित करें। अगर आपके दिल में कोई "भौतिक कामना" है तो "लाल पुष्प"देकर इन्हें खुश करें। (उदाहरण के लिए : गुलाब, चंपा, मोगरा,गेंदा, गुड़हल) दूसरे दिन--- "फल" देकर इनका पूजन करें। यह फल भी सांसारिक कामना के लिए लाल अथवा पीला और वैराग्य की प्राप्ति के लिए केला या श्रीफल हो सकता है। याद रखें कि फल खट्टे ना हो। तीसरे दिन---- 'मिठाई" का महत्व होता है। इस दिन अगर हाथ की बनी खीर, हलवा या केशरिया चावल बना कर खिलाए जाएँ तो देवी प्रसन्न होती है। चौथे दिन----- "वस्त्र" देने का महत्व है लेकिन सामर्थ्य अनुसार रूमाल या रंग बिरंगे फीते दिए जा सकते हैं। पाँचवे दिन----- देवी से सौभाग्य और संतान प्राप्ति की मनोकामना की जाती है। अत: कन्याओं को पाँच प्रकार की श्रृंगार सामग्री देना अत्यंत शुभ होता है। इनमें बिंदिया, चूड़ी, मेहँदी, बालों के लिए कांटे सुगंधित साबुन, काजल, नाखूनी, पावडर इत्यादि हो सकते हैं। छठे दिन----- "खेल-सामग्री देना चाहिए"। आजकल बाजार में खेल सामग्री की अनेक प्रकार उपलब्ध है। पहले यह रिवाज पाँचे, रस्सी और छोटे-मोटे खिलौनों तक सीमित था। अब तो ढेर सारे विकल्प मौजूद है। सातवें दिन----- "माँ सरस्वती" के आह्वान का होता है। अत: इस दिन कन्याओं को "शिक्षण सामग्री" दी जानी चाहिए। आजकल बाजार में विभिन्न प्रकार के पेन, पेंसिल, कॉपी, ड्रॉईंग बुक्स, कंपास, वाटर बॉटल, लंच बॉक्स उपलब्ध है। आठवें दिन----- नवरात्रि का सबसे पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन अगर कन्या का अपने हाथों से श्रृंगार किया जाए तो देवी विशेष आशीर्वाद देती है। इस दिन कन्या के पैर दूध से पूजने चाहिए। पैरों पर अक्षत, फूल और कुंकुम लगाना चाहिए। इस दिन कन्या को भोजन कराना चाहिए और यथासामर्थ्य कोई भी भेंट देनी चाहिए। हर दिन कन्या-पूजन में दक्षिणा अवश्य दें। नौवें यानी नवदुर्गा के अंतिम दिन---- खीर,ग्वारफली की सब्जी और दूध में गूँथी पूरियाँ कन्या को खिलानी चाहिए। उसके पैरों में महावर और हाथों में मेहँदी लगाने से देवी पूजा संपूर्ण होती है। अगर आपने घर पर हवन का आयोजन किया है तो उनके नन्हे हाथों से उसमें समिधा अवश्य डलवाएँ। उसे इलायची और पान का सेवन कराएँ। इस परम्परा के पीछे मान्यता है कि देवी जब अपने लोक जाती है तो उसे घर की कन्या की तरह ही बिदा किया जाना चाहिए। अगर सामर्थ्य हो तो नौवें दिन लाल चुनर कन्याओं को भेंट में दें। उन्हें दुर्गा चालीसा की छोटी पुस्तकें भेंट करें। गरबा के डाँडिए और चनिया-चोली भी दिए जा सकते हैं। बालिकाओं से घर में गरबे करवाने से भी देवी प्रसन्न होती है। इन सारी रीतियों के अनुसार पूजन करने से देवी प्रसन्न होकर वर्ष भर के लिए सुख, समृद्धि, यश, वैभव, कीर्ति और सौभाग्य का वरदान देती है। नवरात्र में किस आयु की कन्या के पूजन से मिलता है कैसा फल------ पूजन के लिए सबसे पहले 9 कन्याओं पर मां का पवित्र जल छिड़कें और उनका पूजन कर भोजन कराएं। भोजन के बाद चरण स्पर्श कर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा दें। प्रथम दिवस------- दो वर्ष की कन्या के पूजन से दुखों का नाश होता है। द्वितीय दिवस---- तीन वर्ष की कन्या साक्षात त्रिमूर्ति का स्वरूप है। इससे अन्न-धन में बढ़ोतरी होती है। तृतीय दिवस---- चार वर्ष की कन्या का पूजन करने से परिवार का कल्याण होता है, जीवन में शुभ समाचार मिलते हैं। चतुर्थ दिवस----- पांच वर्ष की कन्या के पूजन से रोगों से मुक्ति मिलती है। पंचम दिवस---- छह वर्ष की कन्या का पूजन साक्षात मां काली का पूजन है। इससे विद्या और यश की प्राप्ति होती है। षष्ठम दिवस---- सात वर्ष की कन्या मां चंडिका का रूप है। इससे बाधाओं का निवारण होता है। सप्तम दिवस---- आठ वर्ष की कन्या का पूजन संकट से रक्षा करता है। अष्टम दिवस---- नौ वर्ष की कन्या के पूजन से असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी सफल हो जाते हैं। नवम दिवस---- दस वर्ष की कन्या का पूजन जीवन को पूर्णता की ओर ले जाता है। इससे मां अपने भक्त के समस्त मनोरथ पूर्ण करती है

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Manishi sharma Apr 11, 2021

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. देवी माहात्म्य अध्याय - 01 इस अध्याय में:- (मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वध का प्रसंग सुनाना) भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं। मार्कण्डेयजी बोले- 'सूर्य के पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ , सुनो। सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ। पूर्वकाल की बात है, स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्रवंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था। वे प्रजा का अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्म पूर्वक पालन करते थे; तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नामक कुल के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये। राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये। तब वे युद्धभूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे। (समूची पृथ्वी से अब उनका अधिकार जाता रहा), किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया। राजा का बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को हथिया लिया। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगल में चले गये। वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव [अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्त भाव से रहते थे। मुनि के बहुत-से शिष्य उस वन की शोभा बढ़़ा रहे थे। वहाँ जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक रहे। फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर वहाँ इस प्रकार चिन्ता करने लगे- 'पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्म पूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं का अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा सदा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा- 'भाई ! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है ? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने से दिखायी देते हो?' राजा सुरथ का यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा- वैश्य बोला- 'राजन्! मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है। मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:खी होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है ? वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं ?' राजा ने पूछा- 'जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह का बन्धन क्यों है ?' वैश्य बोला- 'आप मेरे विषय में जैसी बात कहते हैं, वह सब ठीक है। किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसे ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है। उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है; तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ?' मार्कण्डेयजी कहते हैं- 'ब्रह्मन् ! तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया। राजा ने कहा- 'भगवन् ! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये। मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है। मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है। यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसे छोड़ दिया है। स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी यह उनके प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखता है। इस प्रकार यह तथा मैं, दोनों ही बहुत दु:खी हैं। जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हमें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है। ऋषि बोले- 'महाभाग ! विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग अलग हैं, कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु, पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है। तथा जैसी मनुष्यों की होती है,वैसी ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनों में समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, ये स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये गये हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामायादेवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार-बन्धन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनीदेवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं। राजा ने पूछा- 'भगवन् ! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं ? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं ? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे ! उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ। ऋषि बोले- 'राजन्! वास्तव में तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्प के अन्त में जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे , उस समय उनके कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान् को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत् को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान् विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी ने कहा- 'देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार- इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि ! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि ! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत् की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्तर में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महासमृति, महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर-सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है ? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान् को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान् शंकर को तथा भगवान् विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है ? देवि ! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो। ऋषि कहते हैं- 'राजन्! जब ब्रह्माजी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान् विष्णु को जगाने के लिये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत् के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे।तब भगवान् श्रीहरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णु से कहने लगे- 'हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।' श्रीभगवान् बोले- 'यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।' ऋषि कहते हैं- 'इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा- 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो।' ऋषि कहते हैं- 'तब 'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सुनो। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥१॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" *****************************************

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काशी के रहस्य 🔸🔸🔹🔸🔸 काशी को भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी कहा जाता है। इस बात का वर्णन कई पुराणों और ग्रंथों में भी किया गया हैं। काशी में ही भगवान शिव का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग, काशी विश्वनाथ स्तिथ है। यहां वाम रूप में स्थापित बाबा विश्वनाथ शक्ति की देवी मां भगवती के साथ विराजते हैं। यह अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है। आइए जानते है काशी विश्वनाथ मंदिर से जुडी रोचक और अनसुनी बातें। काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े कुछ तथ्य 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 1👉 काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है। 2👉 देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। यहां मनुष्य को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता। 3👉 श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है। 4👉 विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है। तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान है। इसे श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है। 5👉 बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं :- 1. शांति द्वार। 2. कला द्वार। 3. प्रतिष्ठा द्वार। 4. निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो। 6👉 बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब होता है, संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार। तंत्र की 10 महा विद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है। 7👉 मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। 8👉 भौगोलिक दृष्टि से बाबा को त्रिकंटक विराजते यानि त्रिशूल पर विराजमान माना जाता है। मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा स्वयं विराजते हैं। मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता। 9👉 बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं। 10👉 बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं। 11👉 बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं। 12👉 मान्यता है कि जब औरंगजेब इस मंदिर का विनाश करने के लिए आया था, तब मंदिर में मौजूद लोगों ने यहां के शिवलिंग की रक्षा करने के लिए उसे मंदिर के पास ही बने एस कुएं में छुपा दिया था। कहा जाता है कि वह कुआं आज भी मंदिर के आस-पास कहीं मौजूद है। 13👉 कहानियों के अनुसार, काशी का मंदिर जो की आज मौजूद है, वह वास्तविक मंदिर नहीं है। काशी के प्राचीन मंदिर का इतिहास कई साल पुराना है, जिसे औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। बाद में फिर से मंदिर का निर्माण किया गया, जिसकी पूजा-अर्चना आज की जाती है। 14👉 काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण इन्दौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। मान्यता है कि 18वीं शताब्दी के दौरान स्वयं भगवान शिव ने अहिल्या बाई के सपने में आकर इस जगह उनका मंदिर बनवाने को कहा था। 15👉 रानी अहिल्या बाई के मंदिर निर्माण करवाने के कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने मंदिर में सोने का दान किया था। कहा जाता है कि महाराज रणजीत ने लगभग एक टन सोने का दान किया था, जिसका प्रयोग से मंदिर के छत्रों पर सोना चढाया गया था। 16👉 मंदिर के ऊपर एक सोने का बना छत्र लगा हुआ है। इस छत्र को चमत्कारी माना जाता है और इसे लेकर एक मान्यता प्रसिद्ध है। अगर कोई भी भक्त इस छत्र के दर्शन करने के बाद कोई भी प्रार्थना करता है तो उसकी वो मनोकामना जरूर पूरी होती है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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जब नारी का रूप धरकर राधाजी की परीक्षा लेने आए थे नंदलाल. 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 लीलाधारी भगवान कृष्ण की लीला अद्भुत हैएक बार तो श्रीराधाजी की प्रेम परीक्षा लेने के लिए नारी बन उनके महल में पहुंच गए. श्रीगर्ग संहिता से सुंदर कृष्ण कथाशाम को श्रीराधाजी अपने राजमंदिर के उपवन में सखियों संग टहल रही थीं तभी बागीचे के द्वार के पास मणिमंडप में एक अनजान पर बेहद सुंदर युवती को खड़े देखा.वह बेहद सुंदर थी. उसके चेहरे की चमक देख श्रीराधा की सभी सहेलियां अचरज से भर गईं. श्रीराधा ने गले लगाकर स्वागत किया और पूछा- सुंदरी सखी तुम कौन हो, कहां रहती हो और यहां कैसे आना हुआ?श्रीराधा ने कहा- तुम्हारा रूप तो दिव्यहै. तुम्हारे शरीर की आकृति मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण जैसी है. तुम तो मेरे ही यहां रह जाओ. मैं तुम्हारा वैसे ही ख्याल रखूंगी जैसे भौजाई, अपनी ननद का रखती है.यह सुनकर युवती ने कहा- मेरा घर गोकुल केनंदनगर में नंदभवन के उत्तर में थोड़ी ही दूरी पर है. मेरा नाम गोपादेवी है. मैंने ललिता सखी से तुम्हारे रूप-गुण के बारे में बहुत सुन रखा था इसलिए तुम्हें देखने के लोभ से चली आई. थोड़ी ही देर में गोपदेवी श्रीराधा और बाकी सखियों से साथ घुल-मिलकर गेंद खेलने और गीत गाने के बाद बोली- मैं दूर रहती हूं. रास्ते में रात न हो जाए इसलिए मैं अब जाती हूं.उसके जाने की बात सुन श्रीराधा की आंख सेआंसू बहने लगे. वह पसीने-पसीने हो वहीं बैठ गईं. सखियों ने तत्काल पंखा झलना शुरू किया और चंदन के फूलों का इत्र छिड़कने लगी.यह देख गोपदेवी बोली- सखि राधा मुझे जाना ही होगा. पर तुम चिंता मत करो सुबह मैं फिर आ जाउंगी. अगर ऐसा न हो तो मुझे गाय, गोरस और भाई की सौगंध है. यह कह वह सुंदरी चली गई.सुबह थोड़ी देर से गोपादेवी श्रीराधाजी के घर फिर आयी तो वह उसे भीतर ले गयीं और कहा- मैं तुम्हारे लिए रात भर दुखी रही. अब तुम्हारे आने से जो खुशी हो रही है उसकी तो पूछो नहीं.श्रीराधाजी की प्रेम भरी बातें सुनने केबावजूद जब गोपादेवी ने कोई जवाब नहीं दिया और अनमनी बनी रही तो श्री राधाजी नेगोपादेवी की इस खामोशी की वजह पूछा.गोपादेवी बोली- आज मैं दही बेचने निकली. संकरी गलियों के बीच नन्द के श्याम सुंदर ने मुझे रास्ते में रोक लिया और लाज शरम ताक पर रख मेरा हाथ पकड़ कर बोला कि मैं कर (टैक्स) लेने वाला हूं. मुझे कर के तौर पर दही का दान दो.मैंने डपट दिया. चलो हटो, अपने आप ही कर लेने वाला बन कर घूमने वाले लंपट मैं तो कतई तुम्हें कोई कर न दूंगी. उसने लपक कर मेरी मटकी उतारी और फोड़कर दही पीने के बाद मेरी चुनरी उतार कर गोवर्धन की ओर चलदिया. इसी से मैं क्षुब्ध हूं. श्रीराधेजी इस बात पर हंसने लगीं तो गोपदेवी बोली- सखी यह हंसने की बात नहीं है. वह कला कलूटा, ग्वाला, न धनवान, न वीर, आचरण भी अच्छे नहीं, मुझे तो वह निर्मोहीभी लगता है. सखी ऐसे लड़के से तुम कैसे प्रेम कर बैठी. मेरी मानो तो उसे दिल से निकाल दो.श्रीराधा जी बोलीं- तुम्हारा नाम गोपदेवी किसने रखा? वह ग्वाला है इसलिए सबसे पवित्र है. सारा दिन पवित्र पशु गायकी चरणों की धूल से नहाता है. तुम उन्हें निर्धन ग्वाला कहती हो? जिनको पाने को लक्ष्मी तरस रही हैं.ब्रह्माजी, शिवजी भी श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं. उनको काला कलूटा और उसे निर्बलबताती हो जिसने बकासुर, कालिया नाग, यमलार्जुन, पूतना जैसों का चुटकी में वध कर ड़ाला.जो अपने भक्तों के पीछे पीछे इसलिए घूमते हैं कि उनकी चरणों की धूल मिल जाये. उसे निर्दयी कहती है. गोपदेवी बोली- राधे तुम्हारा अनुभव अलग है और मेरा अलग. किसी अकेली युवती का हाथ पकड जबरन दही छीनकर पी लेना क्या सज्जनों के गुण हैं?श्रीराधे ने कहा- इतनी सुंदर होकर भी उनके प्रेम को नहीं समझ सकी! बड़ी अभागिनहै. यह तो तेरा सौभाग्य था पर तुमने उसको गलत समझ लिया. गोपदेवी बोली- अच्छा तो मैं अपना सौभाग्य समझ के सम्मान भंग कराती. अब बात बढ़ गई थी.आखिर में गोपदेवी बोली- अगर तुम्हारे बुलाने से श्रीकृष्ण यहां आ जाते हैं तो मैं मान लूंगी कि तुम्हारा प्रेम सच्चा है और वह निर्दयी नहीं है. और यदि नहीं आये तो…? इस पर राधा रानी बोलीं कि यदि नहीं आये तो मेरा सारा धन, भवन तेरा. शर्त लगाकर श्रीराधा आंख मूंद ध्यान मेंबैठ श्रीकृष्ण का एक-एक नाम लेकर पुकारने लगीं. जैसे जैसे श्रीराधा का ध्यान और दिल से की जाने वाली पुकार बढ रही थी सामने बैठी गोपदेवी का शरीर कांपता जा रहा था.श्रीराधा के चेहरे पर अब आंसुओं की झड़ी दिखने लगी. माया की सहायता से गोपदेवी कारूप लिए भगवान श्रीकृष्ण समझ गये कि प्रेम की ताकत के आगे अब यह माया नहीं चलने वाली, मेरा यह रूप छूटने वाला है.वे रूप बदलकर श्री राधे-राधे कहते प्रकटहो गए और बोले- राधारानी आपने बुलाया. मैं भागता चला आ गया. श्रीराधाजी चारों ओर देखने लगीं तो श्रीकृष्ण ने पूछा, अब किसको देख रही हैं.वे बोली- गोपदेवी को बुलाओ, वह कहाँ गई? श्री कृष्ण बोले- जब मैं आ रहा था तो कोई जा रही थी, कौन थी? राधा रानी ने उन्हें सारी बातें बतानी शुरू की और श्रीकृष्ण सुनने चले गए.मंद-मंद मुस्काते हुए श्रीकृष्ण ने कहा-आप बहुत भोली हैं. ऐसी नागिनों को पास मत आने दिया करें. (स्रोत: श्रीगर्ग संहिता से जय श्री राधाकृष्ण 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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भगवान की सृष्टि स्थिति प्रलय के एकमात्र कारण है ,सबके ना रहने पर भगवान ही रहते हैं ,वे सब में रहकर सबसे निराले हैं। सब मिथ्या है वही सत्य है ,इसी विश्वास को हृदय में धारण करके महात्मागण उनके चरणारविंद की उपासना करते हैं ,जो लोग उनके चरितामृत के समुद्र में डुबकी लगाते हैं उन्हें मोक्ष तक ही अभिलाषा नहीं होती भगवान सर्वदा सबके अनुकूल ही रहते हैं सच पूछो तो उनके लिए ऋषि मुनि शत्रु, स्त्री एवं श्रुति का कोई भेद नहीं है। वह समदर्शी हैं। कोई किसी भाव से स्मरण करे वे प्राप्त होते हैं, उनकी उपासना से बुद्धिमान पुरुष संसार चक्र को पार कर लेते हैं जो उनकी शरण लेते हैं, कालचक्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। भगवान की ओर चलने के लिए गुरुचरणारविंद के आश्रय की आवश्यकता है ,उसके बिना साधक की वही अवस्था हो जाती है जो समुद्र में कर्णधार के बिना नाव की हो जाती है। हृदय में काम की बहुत सी ग्रंथियां बद्ध मूल हो गई हैं। यदि उन्हें उखाड़ ना फेंका जाए तो हृदय बिहारी होने पर भी भगवान की उपलब्धि नहीं होती मानो अपने कंठ में पहनी हुई मणि का विस्मरण हो गया हो। यदि एक बार भगवान का अधिगम हो जाए तो शुभ अशुभ कर्मों के फल सुख-दुख स्पर्श नहीं करते। संपूर्ण वेद शास्त्र का तात्पर्य यही है कि परमात्मा के अतिरिक्त जो कुछ प्रतीत होता है जो कुछ सत्य मालूम पड़ता है उसका निराकरण कर दिया जाए फिर उपदेश और साधन की भी आवश्यकता नहीं रहती।

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राजा दिलीप की कथा 〰️〰️🔸〰️🔸〰️〰️ रघुवंश का आरम्भ राजा दिलीप से होता है । जिसका बड़ा ही सुन्दर और विशद वर्णन महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंशम में किया है । कालिदास ने राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि और बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथाओं का समायोजन अपने काव्य में किया है। राजा दिलीप की कथा भी उन्हीं में से एक है। राजा दिलीप बड़े ही धर्मपरायण, गुणवान, बुद्धिमान और धनवान थे । यदि कोई कमी थी तो वह यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी । सभी उपाय करने के बाद भी जब कोई सफलता नहीं मिली तो राजा दिलीप अपनी पत्नी सुदक्षिणा को लेकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे । महर्षि वशिष्ठ ने राजा का आथित्य सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा तो राजा ने अपने निसंतान होने की बात बताई । तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ हे राजन ! तुमसे एक अपराध हुआ है, इसलिए तुम्हारी अभी तक कोई संतान नहीं हुई है ।” तब राजा दिलीप ने आश्चर्य से पूछा – “ गुरुदेव ! मुझसे ऐसा कोनसा अपराध हुआ है कि मैं अब तक निसंतान हूँ। कृपा करके मुझे बताइए ?” महर्षि वशिष्ठ बोले – “ राजन ! एक बार की बात है, जब तुम देवताओं की एक युद्ध में सहायता करके लौट रहे थे । तब रास्ते में एक विशाल वटवृक्ष के नीचे देवताओं को भोग और मोक्ष देने वाली कामधेनु विश्राम कर रही थी और उनकी सहचरी गौ मातायें निकट ही चर रही थी। तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने शीघ्रतावश अपना विमान रोककर उन्हें प्रणाम नहीं किया । जबकि राजन ! यदि रास्ते में कहीं भी गौवंश दिखे तो दायीं ओर होकर राह देते हुयें उन्हें प्रणाम करना चाहिए । यह बात तुम्हे गुरुजनों द्वारा पूर्वकाल में ही बताई जा चुकी थी । लेकिन फिर भी तुमने गौवंश का अपमान और गुरु आज्ञा का उलंघन किया है । इसीलिए राजन ! तुम्हारे घर में अभी तक कोई संतान नहीं हुई ।” महर्षि वशिष्ठ की बात सुनकर राजा दिलीप बड़े दुखी हुए। आँखों में अश्रु लेकर और विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ से प्रार्थना करने लगे – “ गुरुदेव ! मैं मानता हूँ कि मुझसे अपराध हुआ है किन्तु अब इसका कोई तो उपाय होगा ?” तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ एक उपाय है राजन ! ये है मेरी गाय नंदिनी है जो कामधेनु की ही पुत्री है। इसे ले जाओ और इसके संतुष्ट होने तक दोनों पति – पत्नी इसकी सेवा करो और इसी के दुग्ध का सेवन करो । जब यह संतुष्ट होगी तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी ।” ऐसा आशीर्वाद देकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को विदा किया। अब राजा दिलीप प्राण – प्रण से नंदिनी की सेवा में लग गये । जब नंदिनी चलती तो वह भी उसी के साथ – साथ चलते, जब वह रुक जाती तो वह भी रुक जाते । दिनभर उसे चराकर संध्या को उसके दुग्ध का सेवन करके उसी पर निर्वाह करते थे। एक दिन संयोग से एक सिंह ने नंदिनी पर आक्रमण कर दिया और उसे दबोच लिया । उस समय राजा दिलीप कोई अस्त्र – शस्त्र चलाने में भी असमर्थ हो गया । कोई उपाय न देख राजा दिलीप सिंह से प्रार्थना करने लगे – “ हे वनराज ! कृपा करके नंदिनी को छोड़ दीजिये, यह मेरे गुरु वशिष्ठ की सबसे प्रिय गाय है । मैं आपके भोजन की अन्य व्यवस्था कर दूंगा ।” तो सिंह बोला – “नहीं राजन ! यह गाय मेरा भोजन है अतः मैं उसे नहीं छोडूंगा । इसके बदले तुम अपने गुरु को सहस्त्रो गायें दे सकते हो ।” बिलकुल निर्बल होते हुए राजा दिलीप बोले – “ हे वनराज ! आप इसके बदले मुझे खा लो, लेकिन मेरे गुरु की गाय नंदिनी को छोड़ दो ।” तब सिंह बोला – “यदि तुम्हें प्राणों का मोह नहीं है तो इसके बदले स्वयं को प्रस्तुत करो । मैं इसे अभी छोड़ दूंगा ।” कोई उपाय न देख राजा दिलीप ने सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और स्वयं सिंह का आहार बनने के लिए तैयार हो गया । सिंह ने नंदिनी गाय को छोड़ दिया और राजा को खाने के लिए उसकी ओर झपटा । लेकिन तत्क्षण हवा में गायब हो गया। तब नंदिनी गाय बोली – “ उठो राजन ! यह मायाजाल, मैंने ही आपकी परीक्षा लेने के लिए रचा था । जाओ राजन ! तुम दोनों दम्पति ने मेरे दुग्ध पर निर्वाह किया है अतः तुम्हें एक गुणवान, बलवान और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी ।” इतना कहकर नंदिनी अंतर्ध्यान हो गई। उसके कुछ दिन बाद नंदिनी के आशीर्वाद से महारानी सुदक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया जो रघु के नाम से विख्यात हुआ और उसके पराक्रम के कारण ही इस वंश को रघुवंश के नाम से जाना जाता है । महाकवि कालिदास ने भी इसी रघु के नाम पर अपने महाकाव्य का नाम “रघुवंशम” रखा । 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Rekha Apr 10, 2021

(((( श्री सावता माली तथा नागू जी )))) . यह चरित्र पूज्यपाद श्री पूर्णानंद स्वामी रामदासी, श्री संत महीपति जी के कृपाप्रसाद से एवं श्री वारकरी संप्रदाय के संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया गया है। . श्री पंढरिनाथ भगवान् विट्ठल के भक्तो में संत सावता माली एक महान भक्त हुए है। . अरणभेंडी (अरणगाव) नामक गाँव इनका निवास था, व्यवसाय से ये माली का काम करते थे। . संत सावता माली और इनकी पत्नी जनाबाई दोनों प्रभु की भक्ति में सदा मग्न रहते। नागू नाम की इनकी कन्या भी उच्च कोटि की भक्त थी। . मराठी भाषा में ‘साव’ का अर्थ चारित्र्य, सज्जनता। सावता यह भाववाचक शब्द है। सभ्यता, साधारण पन यह इसका अर्थ है। . श्री सावता माली - जन्म : इ .स १२५० वैकुण्ठ गमन :आषाढ़ वद्य चतुर्दशी, १२१७ (१२ जुलाई १२९५) अरणगांव. . संत जी हमेशा कहते और मानते थे की यह बाग भगवान् की है और भगवान् ने हमें इसकी देख रेख हेतु नियुक्त किया है। . बाग़ में तरह तरह के फल, सब्जियां एवं पुष्प लगे थे। बाग़ में वारकरी (वैष्णवो द्वारा पंढरपुर पैदल यात्रा) यात्रियों और बहुत से लोगो का आना जाना लगा रहता क्योंकि संत सवतामाली की बाग थी ही ऐसी। . एक दिन गाँव के एक व्यक्ति ने गाँव में बात फैला दी की सावता माली नास्तिक है। वो कभी भगवान् का दर्शन करने नहीं जाता और पंढरपुर यात्रा को भी नहीं आता, उसके बाग़ के फल सब्जी खाना पाप है! उस से बोलना भी पाप ही है। . धीरे धीरे संत जी की बाग में वारकरी भक्तो का आना जाना बंद हो गया, वे लोग बाग के सामने से निकलते परंतु बाग के अंदर अब नहीं जाते। . इस बात से सावता माली की पुत्री, भक्ता नागू बहुत दुखी रहने लगी। . एक दिन कुछ वारकरी पंढरपुर यात्रा पर निकले थे और बाग़ की सामने से निकलते समय नागू ने उनसे पूछा, आप बाग में क्यों नहीं आते है? . उन लोगो ने कहा.. सावता माली पंढरपुर के रास्ते पर ही पास में रहता है, परंतु फिर भी दर्शन को नहीं आता, वो पक्का प्रपंच में फस गया है, उसको पर्मार्थ नहीं चाहिए। . मुख से’ विट्ठल ‘राम कृष्ण हरी ‘ नाम तो लेता है परंतु प्रभु के दर्शन को नहीं जाता, हम क्यों आये उसकी बाग के अंदर? . भक्ता नागू ने अपने पिता से कहा, पिताजी हम लोग क्यों नहीं जाते इस वारी (पैदल यात्रा) के साथ पंढरपुर? जाते है ना हम भी? . संत सावता माली कहने लगे.. बेटी, प्रभु को ये पसंद नहीं आएगा, वह कहेंगे काम छोड़ कर यहाँ क्यों आये हो? . ये बाग भगवान् विट्ठल की है। काम छोड़ कर उनके पास गए तो वो कहेंगे, क्यों आये हो यहाँ पर, मेरी बाग वहाँ सुख गयी तो? . मेरी बाग़ सुख गयी तो मुझे नहीं चलेगा, तुमको मैंने जो काम दे रखा है वो छोड़ कर यहाँ क्यों आये हो? . सत्य बात ये थी की सावता माली इतनी ऊँची अवस्था को प्राप्त हो चुके थे की उनको सर्वत्र हरी दर्शन होता था, मुख से नाम निकलता रहता था परंतु अन्य लोग यह लीला नहीं समझते। . दूसरा उनका भाव था की यहाँ से होकर संत महात्मा पंढरपुर की यात्रा के लिए जाते है, थकान होती होगी अतः उनकी सेवा हम फल फूल आदि से करे। . यदि बाग़ छोड़ कर चले गए तो संत महात्माओ की सेवा नहीं होगी। संतो के चरणों में इनकी बहुत भक्ति थी। पर साधारण लोग यही समझते की सावता माली नाम तो जपता है पर मंदिर में कभी नहीं जाता। . नागू बहार खेलने निकल गयी। उसने कुछ सोच विचार किया और पुनः अंदर आकर बोली, पिताजी हम नहीं जाएंगे पंढरपुर पर विठू को तो यहाँ बुलवा लीजिये। . प्यार से नागू भगवान् को धन्या, विठू, विठुराय ऐसे नामो से संबोधित करती। . नागू निरंतर अपने पिता से पूछा करती, बाबा इस बाग का स्वामी वह विठू है न? तब वह बाग में कभी पधारता क्यों नहीं है? . सावता माली को अपनी कन्या के प्रति बड़ा कौतुक लगा। उन्होंने बेटी को प्यार से अपने पास बिठाया और कहा, बेटी, वो तो समस्त जगत के पालनकर्ता है। . उनको बहुत काम होता है ! परंतु जब उनको समय मिलेगा वह अवश्य आएंगे। . एक दिन की बात है, कुछ वारकरी संत और यात्री पंढरपूर यात्रा पर प्रभु से भेट करने निमित्त निकले। . नागू को जैसे इस बात का पता चला उसने एक टोकरी में कुछ गाजर और मूली भर दिए। . उसने उन वारकरी भक्तो से कहा, भैया, यह नैवेद्य मेरे विठुराय को ले जाकर दोगे क्या? उसको कहना की यह सब्जी, फल उसके ही बाग के है। . बहुत से वारकरी तो रुके ही नहीं, अनदेखा कर के चले गए। . आगे आने वाले कुछ वारकारियो ने उस भक्ता का मजाक उड़ाया और कहा छी !मूली और गाजर? ये लेकर जाएँ ? वह उस टोकरी को फेंक कर आगे चले गए। . परंतु एक बुढा वारकरी भक्त उस कोमल हृदया भक्ता के मन का भक्तिभाव जान गए। . उन भक्त ने वह टोकरी उसके हाथ से ले ली और कहने लगे.. मै दूंगा हां यह सब्जी और फल भगवान् विट्ठल को। . नागू को आनंद हुआ। उस कन्या भक्ता ने कहा.. भैया, विठू से कहना की बाग उसकी ही है। मेरे माता पिता दिनरात तुम्हारा ही नाम जपते रहते है और हां ,मै भी उन्ही का नाम लेती हूं। . विठुराय को कहना, नागू आपकी प्रतीक्षा कर रही है। आप मेरी प्रार्थना निवेदन दे कर शीघ्र लौटना। दोगे न मेरा संदेश ? . आहाहा ! उस भक्ता की वाणी सुनकर उस वारकरी भक्त का हृदय भर आया। निष्पाप, निस्वार्थ और अपार प्रेम। . इस कन्या का निमंत्रण सुनकर वह अवश्य आएगा । . उस वारकरी ने कहा.. बेटी मै तुम्हारी प्रार्थना अवश्य निवेदन करूँगा और भगवान् भी अवश्य आएंगे। उनका अपने भक्तो पर बहुत प्रेम है। . अरणभेंडी गाँव से पंढरपूर १८ मील की दूरी। वारकरी भक्त ने हाथ में टोकरी ली और चल पड़ा। मंदिर पहुँच कर उसने नागू का संदेश वैसा का वैसा भगवान् को सुनाया। . उस दिन शाम को बाग का काम पूर्ण कर के संत सावता माली अपनी बेटी नागू से बोले.. चलो बेटी, घर चले। तुम्हारी माता प्रतीक्षा करती होगी। . नागू ने कहा.. बाबा, आज तो वह पांडुरंग आने वाला है। मैंने वारकरी भैया के साथ सब्जी और फल नैवेद्य के रूप में भेजे है। . शीघ्र लौटना ऐसा भी कहा है। विठू आता होगा, मुझे प्रतीक्षा करनी चाहिए। मै यही ठहरूँगी। . संतो ने लिखा है ही सभी वैष्णवो के ह्रदय में जिस दिन नागू जैसा दृढ़ विश्वास आएगा उस दिन भगवान् से मिलान अवश्य होगा। . प्रह्लाद और नागू जैसा दृढ़ विश्वास भगवान् की प्राप्ति को सहज बना देता है। . बेटी का ऐसा भगवत्प्रेम देख कर संत सावता माली धन्य हो गए। उन्होंने बेटी को अपने पास बिठाया और कहा – मै भी रुकता हूं यहाँ पर। संत सावता माली विठुराय का स्मरण करने लगे। . बहुत समय बीत गया बेटी और पति घर नहीं आये ऐसा सोच कर सावता माली की पत्नी जनाबाई को चिंता होने लगी। . कुछ देर प्रतीक्षा करने के पश्चात जनाबाई भी बाग में आ गयी। बेटी की प्रेम अवस्था और प्रभु भक्ति देख जनाबाई भी अश्रुपात करने लगी। . सब परिवार सुध बुध खो कर प्रभु का स्मरण करने में मग्न हो गए। नाम जप करते करते पूरी रात बीत गयी किसी को पता न चला। . नागू ने भगवान् का दर्शन प्राप्त करने के लिए रट लगा दी, उसने अन्न जल त्याग दिया और भजन में लगी रही। . संत श्री नामदेव ने अपनी वाणी में कहा है.. संत श्री सावता माली जी की योग्यता क्या है इसका हमने संतो के साथ प्रत्यक्ष अनुभव किया है। . बूढा वारकरी भक्त ने जैसे ही भगवान् को नागू का संदेश सुना कर प्रणाम् किया उसी क्षण तत्काल प्रभु मंदिर से बहार चले गए और सीधे संत सावता की बाग में चले गए । . सावता माली के पास जब प्रभु आये तब प्रभु के दर्शन केवल सावता माली को ही हुए थे.. . उन्हें देख कर संत जी ने विचार किया- इस सुंदर विठू को कहा रखे और क्या करे ? . आहाहा ऐसी हलचल उनके मन में होने लगी। श्री कृष्ण तो नटवर है, उनकी लीला कौन समझ सके। . प्रभु ने विचित्र लीला की और भगवान् पांडुरंग कृष्ण बोले.. बाबा, मेरे पीछे लोग पड गए है, आप हमको कही छिपा लो। . संत जी ने यहाँ वह देखा की कहा छिपावे, परंतु बाग़ तो खुली खुली थी। छुपने कि जगह ही नहीं। . संत तो सरल ह्रदय और भोले होते है, बिना कुछ सोच विचार के संत सावता माली ने सब्जी काटने का खुरपा लेकर ह्रदय और पेट के बीच वाले हिस्से को चीर दिया। . भगवान् पांडुरंग ने अति लघुरूप धारण कर लिया और जाकर सीधे संत सावता माली के हृदय में जाकर बैठ गए। . भगवान् भी रंग बिरंगी लीलाये करते है। भगवान् को संत जी के हृदय में रहना बहुत अच्छा लगा। . प्रभु हृदय में विलीन हो गए, संत निरंतर अपने हृदय में उस दिव्य ज्योति का दर्शन करने लगे। . उनको दर्शन तो आत्मरूप से होता रहता परंतु संत जी सोचने लगे अब हमारी बेटी और पत्नी को दर्शन कैसे हो ? . भगवान का साकार रूप तो मेरे ह्रदय में विलीन होकर निराकार हो गया, अब उस कृष्ण के रस स्वरुप को प्रकट करके बेटी और पत्नी को दर्शन कैसे करावे ? . संतो का शरीर ही एक मंदिर है। उनके ह्रदय में भगवान और भक्ति देवी का निवास होता है, अंग अंग में तीर्थ विराजते है। . संत केवल मंदिर में ही नहीं अपितु कण कण में भगवान् का दर्शन करते है, इस बात की प्रतिष्ठा करने के लिए भगवान ने एक लीला की। . पंढरपुर में उस दिन बहुत से वारकरी भक्तो का समूह मंदिर में आया पर प्रभु वहाँ दिखे नहीं। . किसको कुछ समझ नहीं आ रहा था। बाद में श्री निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव, सोपानदेव, मुक्ताबाई आदि अनेक महान् संत भी उस दिन भगवान् विट्ठल के दर्शन के लिए पंढरपूर में मंदिर पधारे। . अंदर जाकर देखा तो भगवान् मंदिर में नहीं है। भगवान् को ढूंढे कैसे ? . संत श्री ज्ञानदेव जी ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और कहा.. चलो, भगवान् अरणगाव में कही गए है। . भगवान् के कंठ में तुलसी हार तो होता ही है, अंगो से भी सुंदर सुगंधि आती है। सुंगंध के पीछे पीछे चल कर पता लग जायेगा। . सब संत मंडली तुलसी की सुगंधि के पीछे चले जा रहे है। चलते चलते आ पहुचे श्री सावता माली जी की बाग में। . नागू उस समय सावता माली की गोद में सिर रख कर विरह में विट्ठल स्मरण कर रही थी। . संतो को देख कर सावता माली आनंद में भर गए और कहने लगे.. आज हमारा भाग्य बड़ा है। हम धन्य हो गए, संतो के चरण से हमारा घर पावन हो गया। . नामदेव जी ने कहा.. बाबा आपका भाग्य तो बड़ा ही है ! हमारे चरण यहाँ पधारे इसलिए नहीं ! .. भगवान् पांडुरंग यहाँ आये इसीलिए ! बताओ तो हमारे प्रभु कहा है ? . संत सावता माली कहने लगे.. मै स्वयं प्रभु की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। यह बालिका ४ दिनों से अन्न जल त्याग कर भगवान् के आने की आस लगाये बैठी है। . नामदेव ने कहा.. कुछ भी मत बोलो, ज्ञानदेव जी ने कहा हैं प्रभु यही पर है। असत्य कैसे होगा ? तुमने प्रभु को कहां छुपाया है वो बताओ ? . सावता माली ने कहा.. मै प्रभु को कहां छुपाऊ ? और प्रभु क्यों छुप के रहेंगे ? भगवान् यदि छुपे होंगे ही तो मेरे हृदय मे ही ! दूसरी जगह कहाँ ? . मुझे तो प्रभु सर्वत्र दीखते है, वे कण कण में व्याप्त है। ये फूल पौधे के सब उसके ही रूप। . ज्ञानदेव बोले.. वाह वाह यहाँ विट्ठल छुपे नहीं यहाँ तो विट्ठल सर्वत्र बिखरे है, सुगंध की तरह। . सावता माली बोले.. ज्ञानदेव जी भगवान् का निराकार सर्वव्यापक रूप मेरे और आपके लिए अच्छा है परंतु हमारी पुत्री नागू का समाधान कैसे हो ? . उसको तो सगुण साकार रूप ही प्रिय है, इसने विट्ठल दर्शन की रट लगा रखीं है, ४ दिन से अन्न जल कुछ लिया नहीं। इस बालिका का समाधान मै कैसे करू ? . नामदेव जी कहने लगे.. अभी तो आपने कहा, भगवान आपके हृदय में है। . सावता माली ने कहा.. ये भी सत्य है नामदेव जी, यहां वहां क्यों ढूंढना ? आपने अच्छी याद दिलायी। . सावता माली ने साग फल काटने वाला खुरपा उठाया और खच्च से छाती पर मारा और कहा.. पांडुरंग विट्ठल मेरे हृदय से बहार आओ और साकार रूप में दर्शन दो। . उनके ह्रदय से एक तेजस्वी प्रकाश निकला और सम्पूर्ण बाग में तुलसी की दिव्या सुगंधि व्याप्त हो गयी। . भगवान् प्रकट हुए और संत सावता माली मूर्छित हो गए। प्रभु ने अपनी कृपा दृष्टी से उनकी मूर्छा दूर की। . भगवान् प्रकट हुए तब नागू भाग कर प्रभु के पास गयी और उनसे लिपट गयी। उसने कहा.. विठु, विठु तुम आ गए ? . देखो पिता जी विठू आ गया, धनी आ गया। मुझे पता था वह अवश्य आएगा। . सब संत मंडली ने हरिनाम संकीर्तन किया, उसके बाद सावता माली ने संतो और प्रभु को भोजन प्रसाद पवाया। . भगवान् ने अपनी गोद में नागू को बिठाकर प्रसाद पवाया। . नागू ने कहा.. विठु ! अब कही जाना नहीं हां। . इस पर नामदेव जी बोले- बेटी यहाँ रहकर कैसे चलेगा, प्रभु को जगत के बहुत कार्य करने होते है। वे व्यस्त होते है। . नागू ने कहा यह भी ठीक ही है परंतु बीच बीच में आते रहना। ये बाग आपकी ही तो है और हम सब आपके सेवक, आओगे ना ? . भगवान् कहने लगे.. क्यों नहीं आऊंगा?तुमने याद किया तब आ जाऊंगा, तुम्हारे प्रेम में बंध आना ही पड़ेगा। . सावता माली, जनाबाई को प्रभु ने आशीर्वाद दिया और नागू को लाड़ लड़ा कर प्रभु अंतर्धान हो गए। . ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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sn.vyas Apr 12, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *श्रद्धा और विश्वास* °" "" "" "" "" "" "" "" "° कहा गया कि भगवान् शंकर विश्वास और पार्वती श्रद्धा हैं , परन्तु पूर्वजन्म में वे सती थीं। सती अर्थात् बुद्धि। बुद्धि और विश्वास - सती हैं बुद्धि और भगवान् शंकर हैं विश्वास। यदि बुद्धि है, तो उसके सामने प्रश्न उठेंगे, तर्क आयेंगे। भले ही लम्बे मार्ग से हो, परन्तु उस बुद्धि को श्रद्धा में परिणत होना पड़ेगा। कभी-कभी पूछा जाता है कि *श्रद्धा और विश्वास में क्या अन्तर है ? मान करके जान लेना - विश्वास है और जान करके मान लेना - श्रद्धा।* जिस व्यक्ति को सहज भाव से ह्रदय में अनुभव हो रहा है, उसे किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है, उसने जो स्वीकार कर लिया, वह विश्वास है। परन्तु जिसने बुद्धि के द्वारा निर्णय किया कि बिना-समझे हम स्वीकार नहीं करेंगे, तो यह बुद्धि का मार्ग है। यह मार्ग है तो लम्बा, पर चिन्ता की कोई बात नहीं। यदि आप बुद्धिमान है, तो छोटे मार्ग के फेर में पड़िये ही मत, चलिये, कठिनाई के मार्ग पर चलिये, जो समस्या आये, उसे सहिये। सतीजी के जीवन में यही हुआ। सती ही पार्वती के रुप में पुनः जन्म लेती हैं और यही है - बुद्धि का श्रद्धा के रुप में परिवर्तित होना। *जब बुद्धि श्रद्धा के रुप में परिवर्तित हो जाती है, तब वे स्वयं रामकथा सुनती हैं और तब भगवान् राम के विषय में उनके अन्तःकरण में कोई संशय नहीं रह जाता।* 👏🏻 🔱 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙇🏻‍♂️

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