जिस पात्र में वर्षों से तेल ही रखा जाता है , ऐसे बर्तन को पाँच दस बार धोने पर वह स्वच्छ तो होगा , किन्तु तेल की वास नहीं जायेगी । अब उस बर्तन में यदि चटनी अचार रखा जायेगा तो वह बिगड़ जायेगा । हमारा मस्तिष्क भी ठीक ऐसा ही है । जिसमें कई वर्षो से कामवासना रुपी तेल रखा गया है । इस बुद्धिरुपी पात्र में श्रीकृष्ण रुपी रस रखना है। मस्तिष्क रुपी बर्तन में काम का अंशमात्र भी होगा तो उसमें प्रेमरस , जमेगा ही नहीं। जब बुद्धि में परमात्मा का निवास होगा,तभी पूर्ण शान्ति मिलेगी । जब तक बुद्धि मे ईश्वर का अनुभव नहीं होगा तब तक आनन्द का अनुभव नहीं हो पायेगा । संसार के विषयों का ज्ञान बुद्धि में आने पर विषय सुखरुप बनते हैं, परमात्मा को बुद्धि में रखना है । मस्तिष्क में जब ईश्वर आ बसते हैं ,तभी ईश्वर स्वरुप का ज्ञान पूर्ण आनन्द देता है । जैसे तेल के अंश से चटनी अचार बिगड़ते है वैसे ही बुद्धि में वासना का अंश रह जाने पर वह अस्थिर ही रहेगी। बुद्धि को स्थिर और शुद्ध करने हेतु मन के स्वामी चंद्र और बुद्धि के स्वामी सूर्य की आराधना करनी है । त्रिकाल संध्या करने से बुद्धि विशुद्ध होगी । जब तक राम नहीं आते हैं, तब तक कृष्ण भी नहीं आते है । जिसके घर मे राम नही आते हैं , उसका रावण (काम) मरता नहीं और जब तक काम रुपी रावण नहीं मरता तब तक श्रीकृष्ण नहीं आते है। जब राम की मर्यादा का पालन किया जायेगा तभी काम मरेगा । चाहे जिस संप्रदाय में विश्वास हो , किन्तु जब तक रामचन्द्र की मर्यादा का पालन नहीं किया जायेगा तब तक आनन्द नहीं मिलेगा । रामचन्द्र की उत्तम सेवा यही है कि उनकी मर्यादा का पालन किया जाए, उनका सा ही वर्तन रखें। रामजी का भजन करना अर्थात् उनकी मर्यादा का पालन करना । उनका वर्तन हमें जीवन में उतारना चाहिए । राम जी को मन में बसाने,मर्यादा-पुरुषोत्तम रामचन्द्र का अनुकरण करने पर भगवान मिलेंगे । रामजी की लीलाएँ अनुकरणीय एवं श्रीकृष्ण की लीलाएँ चिंतनीय हैं । रामचन्द्र का मातृप्रेम, पितृप्रेम, बंधुप्रेम , एक पत्नी प्रेम आदि सब कुछ जीवन में उतारने योग्य है । श्रीकृष्ण के कृत्य हमारे लिए अशक्य है। उनका कालियानाग को वश मे करना , गोवर्धन उठाना आदि । रामचन्द्र ने अपना ऐश्वर्य छिपाकर मानव जीवन का नाटक किया साधक का वर्तन कैसा होना चाहिए यह रामचन्द्र जी ने बताया है । साधक का वर्तन रामचन्द्र जैसा होना चाहिए , सिद्ध पुरुष का वर्तन श्रीकृष्ण जैसा हो सकता है । रघुनाथ जी का अवतार राक्षसों की हत्या के हेतु नहीं , मनुष्यों को मानव धर्म सिखाने के लिए हुआ था । वे जीवमात्र को उपदेश देते हैं। रामजी ने किसी भी मर्यादा को भंग नहीं किया । हमें भी मर्यादा का पालन करते हुए श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। स्वान्तःसुखाय ......... श्रीहरिशरणम् ...........

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ब्रह्मवैवर्त पुराणान्तर्गत त्रैलोक्य विजय कवच महादेव उवाच – वत्सागच्छ महाभाग भृगुवंशसमुद्भव। पुत्राधिकोऽसि प्रेम्णा मे कवचं ग्रहणं कुरु।। महादेव जी ने कहा– भृगुवंशी महाभाग वत्स! तुम प्रेम के कारण मुझे पुत्र से भी अधिक प्रिय हो; अतः आओ कवच ग्रहण करो। श्रृणु राम प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डे परमाद्भुतम्। त्रैलोक्यविजयं नाम श्रीकृष्णस्य जयावहम्।। राम! जो ब्रह्माण्ड में परम अद्भुत तथा विजयप्रद है, श्रीकृष्ण के उस ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक कवच का वर्णन करता हूँ, सुनो। श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके राधिकाश्रये। रासमण्डलमध्ये च मह्यं वृन्दावने वने।। पूर्वकाल में श्रीकृष्ण ने गोलोक में स्थित वृन्दावन नामक वन में राधिकाश्रम में रासमण्डल के मध्य यह कवच मुझे दिया था। अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। पुण्यात् पुण्यतरं चैव परं स्नेहाद् वदामि ते।। यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व, सम्पूर्ण मन्त्रसमुदाय का विग्रहस्वरूप, पुण्य से भी बढ़कर पुण्यतर परमोत्कृष्ट है और इसे स्नेहवश मैं तुम्हें बता रहा हूँ। यद् धृत्वा पठनाद् देवी मूलप्रकृतिरीश्वरी। शुम्भं निशुम्भं महिषं रक्बीजं जघान ह।। जिसे पढ़कर एवं धारण करके मूलप्रकृति भगवती आद्याशक्ति ने शुम्भ, निशुम्भ, महिषासुर और रक्तबीज का वध किया था। यद् धृत्वाहं च जगतां संहर्ता सर्वतत्त्ववित्। अवध्यं त्रिपुरं पूर्वं दुरन्तमवलीलया।। जिसे धारण करके मैं लोकों का संहारक और सम्पूर्ण तत्त्वों का जानकार हुआ हूँ तथा पूर्वकाल में जो दुरन्त और अवध्य थे, उन त्रिपुरों को खेल-ही-खेल में दग्ध कर सकता हूँ। यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मा ससृजे सृष्टिमुत्तमाम्। यद् धृत्वा भगवान् शेषो विधत्ते विश्वमेव च।। जिसे पढ़कर और धारण करके ब्रह्मा ने इस उत्तम सृष्टि की रचना की है। जिसे धारण करके भगवान शेष सारे विश्व को धारण करते हैं। यद् धृत्वा कूर्मराजश्च शेषं धत्तेऽवलीलया। यद् धृत्वा भगवान् वायुर्विश्वाधारो विभुः स्वयम्।। जिसे धारण करके कूर्मराज शेष को लीलापूर्वक धारण किये रहते हैं। जिसे धारण करके स्वयं सर्वव्यापक भगवान वायु विश्व के आधार हैं। यद् धृत्वा वरुणः सिद्धः कुबेरश्च धनेश्वरः। यद् धृत्वा पठनादिन्द्रो देवानामधिपः स्वयम्।। जिसे धारण करके वरुण सिद्ध और कुबेर धन के स्वामी हुए हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके स्वयं इन्द्र देवताओं के राजा बने हैं। यद् धृत्वा भाति भुवने तेजोराशिः स्वयं रविः। यद् धृत्वा पठनाच्चन्द्रो महाबलपराक्रमः।। जिसे धारण करके तेजोराशि स्वयं सूर्य भुवन में प्रकाशित होते हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके चन्द्रमा महान बल और पराक्रम से सम्पन्न हुए हैं। अगस्त्यः सागरान् सप्त यद् धृत्वा पठनात् पपौ। चकार तेजसा जीर्ण दैत्यं वातापिसंज्ञकम्।। जिसे पढ़कर एवं धारण करके महर्षि अगस्त्य सातों समुद्रों को पी गये और उसके तेज से वातापि नामक दैत्य को पचा गये। यद् धृत्वा पठनाद् देवी सर्वाधारा वसुन्धरा। यद् धृत्वा पठनात् पूता गङ्गा भुवनपावनी।। जिसे पढ़कर एवं धारण करके पृथ्वी देवी सबको धारण करने में समर्थ हुई हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके गंगा स्वयं पवित्र होकर भुवनों को पावन करने वाली बनी हैं। यद् धृत्वा जगतां साक्षी धर्मो धर्मभृतां वरः। सर्वविद्याधिदेवी सा यच्च धृत्वा सरस्वती।। जिसे धारण करके धर्मात्माओं में श्रेष्ठ धर्म लोकों के साक्षी बने हैं। जिसे धारण करके सरस्वती देवी सम्पूर्ण विद्याओं की अधिष्ठात्री देवी हुई हैं। यद् धृत्वा जगतां लक्ष्मीरन्नदाती परात्परा। यद् धृत्वा पठनाद् वेदान् सावित्री प्रसुषाव च। जिसे धारण करके परात्परा लक्ष्मी लोकों को अन्न प्रदान करने वाली हुई हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके सावित्री ने वेदों को जन्म दिया है। वेदाश्च धर्मवक्तारो यद् धृत्वा पठनाद् भृगो। यद् धृत्वा पठनाच्छुद्धस्तेजस्वी हव्यवाहनः।। भृगुनन्दन! जिसे पढ़ एवं धारणकर वेद धर्म के वक्ता हुए हैं। जिसे पढ़कर एवं धारण करके अग्नि शुद्ध एवं तेजस्वी हुए हैं । सनत्कुमारो भगवान् यद् धृत्वा ज्ञानिनां वरः। दातव्यं कृष्णभक्ताय साधवे च महात्मने।। जिसे धारण करके भगवान सनत्कुमार को ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ स्थान मिला है। जो महात्मा, साधु एवं श्रीकृष्ण भक्त हो, उसी को यह कवच देना चाहिये। शठाय परशिष्याय दत्त्वा मृत्युमवाप्नुयात्। क्योंकि शठ एवं दूसरे के शिष्य को देने से दाता मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। त्रैलोक्यविजयस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।। ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवो रासेश्वरः स्वयम्। त्रैलोक्यविजयप्राप्तौ विनियोगः प्रकीर्तितः।। इस त्रैलोक्यविजय कवच के प्रजापति ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। स्वयं रासेश्वर देवता हैं और त्रैलोक्य की विजय प्राप्ति में इसका विनियोग कहा गया है। परात्परं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्। यह परात्पर कवच तीनों लोकों में दुर्लभ है। प्रणवो मे शिरः पातु श्रीकृष्णाय नमः सदा।। सदा पायात् कपालं कृष्णाय स्वाहेति पञ्चाक्षरः।। ‘ऊँ श्रीकृष्णाय नमः’ सदा मेरे सिर की रक्षा करे। ‘कृष्णाय स्वाहा’ यह पञ्चाक्षर सदा कपाल को सुरक्षित रखे। कृष्णेति पातु नेत्रे च कृष्णस्वाहेति तारकम्।। ‘कृष्ण’ नेत्रों की तथा ‘कृष्णाय स्वाहा’ पुतलियों की रक्षा करे। हरये नम इत्येवं भ्रूलतां पातु मे सदा। ऊँ गोविन्दाय स्वाहेति नासिकां पातु संततम्।। ‘हरये नमः’ सदा मेरी भृकुटियों को बचावे। ‘ऊँ गोविन्दाय स्वाहा’ मेरी नासिका की सदा रक्षा करे। गोपालाय नमो गण्डौ पातु मे सर्वतः सदा। ‘गोपालाय नमः’ मेरे गण्डस्थलों की सदा सब ओर से रक्षा करे। ऊँ नमो गोपाङ्गनेशाय कर्णौ पातु सदा मम।। ‘ऊँ गोपाङ्गनेशाय नमः’ सदा मेरे कानों की रक्षा करे। ऊँ कृष्णाय नमः शश्वत् पातु मेऽधरयुग्मकम्। ऊँ गोविन्दाय स्वाहेति दन्तावलिं मे सदावतु।। ‘ऊँ कृष्णाय नमः’ निरन्तर मेरे दोनों ओठों की रक्षा करे। ‘ऊँ गोविन्दाय स्वाहा’ सदा मेरी दंतपंक्तियों की रक्षा करे। ऊँ कृष्णाय दन्तरन्ध्रं दन्तोर्ध्वं क्लीं सदावतु। ऊँ श्रीकृष्णाय स्वाहेति जिह्विकां पातु सदा मम।। ‘ऊँ कृष्णाय नमः’ दाँतों के छिद्रों की तथा ‘क्लीं’ दाँतों के ऊर्ध्वभाग की रक्षा करे। ‘ऊँ श्रीकृष्णाय स्वाहा’ सदा मेरी जिह्वा की रक्षा करे। रासेश्वराय स्वाहेति तालुकं पातु मे सदा। राधिकेशाय स्वाहेति कण्ठं पातु सदा मम।। ‘रासेश्वराय स्वाहा’ सदा मेरे तालु की रक्षा करे। ‘राधिकेशाय स्वाहा’ सदा मेरे कण्ठ की रक्षा करे। नमो गोपाङ्गनेशाय वक्षः पातु सदा मम। ऊँ गोपेशाय स्वाहेति स्कन्धं पातु सदा मम।। ‘गोपाङ्गनेशाय नमः’ सदा मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करे। ‘ऊँ गोपेशाय स्वाहा’ सदा मेरे कंधों की रक्षा करे। नमः किशोरवेशाय स्वाहा पृष्ठं सदावतु। उदरं पातु मे नित्यं मुकुन्दाय नमः सदा।। ‘नमः किशोरवेशाय स्वाहा’ सदा पृष्ठभाग की रक्षा करे। ‘मुकुन्दाय नमः’ सदा मेरे उदर की । ऊँ ह्रीं क्लीं कृष्णाय स्वाहेति करौ पादौ सदा मम। ऊँ विष्णवे नमो बाहुयुग्मं पातु सदा मम।। तथा ‘ऊँ ह्रीं क्लीं कृष्णाय स्वाहा’ सदा मेरे हाथ-पैरों की रक्षा करे। ‘ऊँ विष्णवे नमः’ सदा मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करे। ऊँ ह्रीं भगवते स्वाहा नखरं पातु मे सदा। ऊँ नमो नारायणायेति नखरन्ध्रं सदावतु।। ‘ऊँ ह्रीं भगवते स्वाहा’ सदा मेरे नखों की रक्षा करे। ‘ऊँ नमो नारायणाय’ सदा नख-छिद्रों की रक्षा करे। ऊँ ह्रीं ह्रीं पद्मनाभाय नाभिं पातु सदा मम। ऊँ सर्वेशाय स्वाहेति कङ्कालं पातु मे सदा।। ‘ऊँ ह्रीं ह्रीं पद्मनाभाय नमः’ सदा मेरी नाभि की रक्षा करे। ‘ऊँ सर्वेशाय स्वाहा’ सदा मेरे कंकाल की रक्षा करे। ऊँ गोपीरमणाय स्वाहा नितम्बं पातु मे सदा। ऊँ गोपीरमनाथाय पादौ पातु सदा मम।। ‘ऊँ गोपीरमणाय स्वाहा’ सदा मेरे नितम्ब की रक्षा करे। ‘ऊँ गोपीरमणनाथाय स्वाहा’ सदा मेरे पैरों की रक्षा करे। ऊँ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा सर्वं सदावतु। ऊँ केशवाय स्वाहेति मम केशान् सदावतु।। ‘ऊँ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा’ सदा मेरे सर्वांगों की रक्षा करे। ‘ऊँ केशवाय स्वाहा’ सदा मेरे केशों की रक्षा करे। नमः कृष्णाय स्वाहेति ब्रह्मरन्ध्रं सदावतु। ऊँ माधवाय स्वाहेति लोमानि मे सदावतु।। ऊँ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा सर्वं सदावतु।। ‘नमः कृष्णाय स्वाहा’ सदा मेरे ब्रह्मरन्ध्र की रक्षा करे। ‘ऊँ माधवाय स्वाहा’ सदा मेरे रोमों की रक्षा करे। ‘ऊँ ह्रीं श्रीं रसिकेशाय स्वाहा’ मेरे सर्वस्व की सदा रक्षा करे। परिपूर्णतमः कृष्णः प्राच्यां मां सर्वदावतु। स्वयं गोलोकनाथो मामाग्नेय्यां दिशि रक्षतु।। परिपूर्णतम श्रीकृष्ण पूर्व दिशा में सर्वदा मेरी रक्षा करें। स्वयं गोलोकनाथ अग्निकोण में मेरी रक्षा करें। पूर्णब्रह्मस्वरूपश्च दक्षिणे मां सदावतु। नैर्ऋत्यां पातु मां कृष्णः पश्चिमे पातु मां हरिः।। पूर्ण ब्रह्मस्वरूप दक्षिण दिशा में सदा मेरी रक्षा करें। श्रीकृष्ण नैर्ऋत्यकोण में मेरी रक्षा करें। गोविन्दः पातु मां शश्वद् वायव्यां दिशि नित्यशः। उत्तरे मां सदा पातु रसिकानां शिरोमणिः।। श्रीहरि पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें। गोविन्द वायव्यकोण में नित्य-निरन्तर मेरी रक्षा करें।रसिक शिरोमणि उत्तर दिशा में सदा मेरी रक्षा करें। ऐशान्यां मां सदा पातु वृन्दावनविहारकृत्। वृन्दावनीप्राणनाथः पातु मामूर्ध्वदेशतः।। वृन्दावन विहारकृत सदा ईशानकोण में मेरी रक्षा करें। वृन्दावनी के प्राणनाथ ऊर्ध्वभाग में मेरी रक्षा करें। माधवः पातु बलिहारी महाबलः। जले स्थले चान्तरिक्षे नृसिंहः पातु मां सदा।। महाबली बलिहारी माधव सदैव मेरी रक्षा करें। नृसिंह जल, स्थल तथा अन्तरिक्ष में सदा मुझे सुरक्षित रखें। स्वप्ने जागरणे शश्वत् पातु मां माधवः सदा। सर्वान्तरात्मा निर्लिप्तो रक्ष मां सर्वतो विभुः।। माधव सोते समय तथा जाग्रत-काल में सदा मेरा पालन करें तथा जो सबके आन्तरात्मा, निर्लेप और सर्वव्यापक हैं, वे भगवान सब ओर से मेरी रक्षा करें। इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम्।। वत्स! इस प्रकार मैंने ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक कवच, जो परम अनोखा तथा समस्त मन्त्रसमुदाय का मूर्तमान् स्वरूप है, तुम्हें बतला दिया। मया श्रुतं कृष्णवक्त्रात् प्रवक्तव्यं न कस्यचित्। गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत् तु यः।। कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः। स च भक्तो वसेद् यत्र लक्ष्मीर्वाणी वसेत्ततः।। मैंने इसे श्रीकृष्ण के मुख से श्रवण किया था। इसे जिस-किसी को नहीं बतलाना चाहिये। जो विधिपूर्वक गुरु का पूजन करके इस कवच को गले में अथवा दाहिनी भुजा पर धारण करता है, वह भी विष्णुतुल्य हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। वह भक्त जहाँ रहता है, वहाँ लक्ष्मी और सरस्वती निवास करती हैं। यदि स्यात् सिद्धकवचो जीवन्मुक्तो भवेत्तु सः। निश्चितं कोटिवर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात्।। यदि उसे कवच सिद्ध हो जाता है तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है और उसे करोड़ों वर्षों की पूजा का फल प्राप्त हो जाता है। राजसूयसहस्राणि वाजपेयशतानि च। अश्वमेधायुतान्येव नरमेधायुतानि च।। महादानानि यान्येव प्रादक्षिण्यं भुवस्तथा। त्रैलोक्यविजयस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।। हजारों राजसूय, सैकड़ो वाजपेय, दस हजार अश्वमेध, सम्पूर्ण महादान तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा– ये सभी इस त्रैलोक्यविजय की सोलहवीं कला की भी समानता नहीं कर सकते। व्रतोपवासनियमं स्वाध्यायाध्ययनं तपः। स्नानं च सर्वतीर्थेषु नास्यार्हन्ति कलामपि।। व्रत-उपवास का नियम, स्वाध्याय, अध्ययन, तपस्या और समस्त तीर्थों में स्नान– ये सभी इसकी एक कला को भी नहीं पा सकते। सिद्धित्वममरत्वं च दास्यत्वं श्रीहरेरपि। यदि स्यात् सिद्धकवचः सर्वं प्राप्नोति निश्चितम्।। यदि मनुष्य इस कवच को सिद्ध कर ले तो निश्चय ही उसे सिद्धि, अमरता और श्रीहरि की दासता आदि सब कुछ मिल जाता है। स भवेत् सिद्धकवचो दशलक्षं जपेत्तु यः। यो भवेत् सिद्धकवचः सर्वज्ञः स भवेद् ध्रुवम्।। जो इसका दस लाख जप करता है, उसे यह कवच सिद्ध हो जाता है और जो सिद्ध कवच होता है, वह निश्चय ही सर्वज्ञ हो जाता है। इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कृष्णं सुमन्दधीः। कोटिकल्पप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः।। परंतु जो इस कवच को जाने बिना श्रीकृष्ण का भजन करता है, उसकी बुद्धि अत्यन्त मन्द है; उसे करोड़ों कल्पों तक जप करने पर भी मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता। गृहीत्वा कवचं वत्स महीं निःक्षत्रियां कुरु। त्रिःसप्तकृत्वो निःशङ्कः सदानन्दोऽवलीलया।। वत्स! इस कवच को धारण करके तुम आनन्दपूर्वक निःशंक होकर अनायास ही इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से शून्य कर डालो। राज्यं देयं शिरो देयं प्राणा देयाश्च पुत्रक। एवंभूतं च कवचं न देयं प्राणसंकटे।। बेटा! प्राणसंकट के समय राज्य दिया जा सकता है, सिर कटाया जा सकता है और प्राणों का परित्याग भी किया जा सकता है; परंतु ऐसे कवच का दान नहीं करना चाहिये।

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथाअष्टादशोऽध्यायः भिन्न-भिन्न वर्षो का वर्णन...(भाग 4) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ यद्रूपमेतन्निजमाययार्पित मर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् । संख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भनात् तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिदं चराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम् । द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र द्वीपग्रहक्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३२ यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् । संख्या यया तत्त्वदृशान तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय ते इति ॥ ३३ उत्तरेषु च कुरुषु भगवान् यज्ञपुरुषः कृतवराहरूप आस्ते तं तु देवी हैषा भूः सह कुरुभिरस्खलितभक्तियोगेनोपधावति इमां च परमामुपनिषदमावर्तयति ॥ ३४ ॥ ॐ नमो मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञवे महाध्वरावयवाय' महापुरुषाय नमः कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते ॥ ३५ ॥ यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो गुणेषु दारुष्विव जातवेदसम् । मनन्ति मना मनसा दिदृक्षवो गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने अन्वीक्षयाङ्गातिशयात्मबुद्धिभि निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७ करोति विश्वस्थितिसंयमोदयं यस्तं नेप्सितमीक्षितुर्गुणैः । माया यथायो भ्रमते तदाश्रयं ग्राव्णो नमस्ते गुणकर्मसाक्षिणे ॥ ३८ प्रमथ्य दैत्यं प्रतिवारणं मृधे यो मां रसाया' जगदादिसूकरः । कृत्वाग्रदंष्ट्रे निरगादुदन्वतः क्रीडन्निवेभः प्रणतास्मि तं विभुमिति ॥ ३९ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ भगवन्! अनेक रूपों में प्रतीत होने वाला यह दृश्यप्रपञ्च यद्यपि मिथ्या ही निश्चय होता है, इसलिये इसकी वस्तुतः कोई संख्या नहीं है; तथापि यह माया से प्रकाशित होने वाला आपका ही रूप है। ऐसे अनिर्वचनीयरूप आपको मेरा नमस्कार है ॥ ३१ ॥ एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जङ्गम, स्थावर, देवता, ऋषि, पितृगण, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और तारा आदि विभिन्न नामों से प्रसिद्ध हैं ॥ ३२ ॥ आप असंख्य नाम, रूप और आकृतियों से युक्त हैं; कपिलादि विद्वानों ने जो आपमें चौबीस तत्त्वों की संख्या निश्चित की है-वह जिस तत्त्वदृष्टि का उदय होने पर निवृत्त हो जाती है, वह भी वस्तुतः आपका ही स्वरूप है। ऐसे सांख्यसिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार है' ॥ ३३ ॥ उत्तर कुरुवर्ष में भगवान् यज्ञपुरुष वराहमूर्ति धारण करके विराजमान हैं। वहाँ के निवासियों के सहित साक्षात् पृथ्वी देवी उनकी अविचल भक्तिभाव से उपासना करती और इस परमोत्कृष्ट मन्त्र का जप करती हुई स्तुति करती हैं ॥ ३४ ॥– 'जिनका तत्त्व मन्त्रों से जाना जाता है, जो यज्ञ और क्रतुरूप हैं तथा बड़े-बड़े यज्ञ जिनके अङ्ग हैं-उन ओङ्कारस्वरूप शुक्लकर्ममय त्रियुगमूर्ति पुरुषोत्तम भगवान् वराह को बार-बार नमस्कार है' ॥ ३५ ॥ 'ऋत्विज्गण जिस प्रकार अरणिरूप काष्ठखण्डों में छिपी हुई अग्नि को मन्थन द्वारा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार कर्मासक्ति एवं कर्मफल की कामना से छिपे जिनके रूप को देखने की इच्छा से परमप्रवीण पण्डितजन अपने विवेकयुक्त मनरूप मन्थनकाष्ठ से शरीर एवं इन्द्रियादि को बिलो डालते । इस प्रकार मन्थन करने पर अपने स्वरूप को प्रकट करने वाले आपको नमस्कार है ॥ ३६ ॥ | विचार तथा यम-नियमादि योगाङ्गों के साधन से जिनकी बुद्धि निश्चयात्मि का हो गयी है— वे महापुरुष द्रव्य (विषय), क्रिया (इन्द्रियों के व्यापार), हेतु (इन्द्रियाधिष्ठाता देवता), अयन (शरीर), ईश, काल और कर्ता (अहङ्कार) आदि माया के कार्यों को देखकर वास्तविक स्वरूप का निश्चय करते हैं ऐसे मायिक आकृतियों से रहित आपको बार-बार नमस्कार है ।। ३७ ।। जिस प्रकार लोहा जड होने पर भी चुम्बक की सन्निधिमात्र से चलने-फिरने लगता है, उसी प्रकार जिन सर्वसाक्षी की इच्छामात्र से- जो अपने लिये नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के लिये होती है- प्रकृति अपने गुणों के द्वारा जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती रहती है, ऐसे सम्पूर्ण गुणों एवं कर्मों के साक्षी आपको नमस्कार है ॥ ३८ ॥ आप जगत् के कारणभूत आदिसूकर हैं। जिस प्रकार एक हाथी दूसरे हाथी को पछाड़ देता है, उसी प्रकार गजराज के समान क्रीडा करते हुए आप युद्ध में अपने प्रतिद्वन्द्वी हिरण्याक्ष दैत्य को दलित करके मुझे अपनी दाढ़ों की नोक पर रखकर रसातल से प्रलयपयोधि के बाहर निकले थे। मैं आप सर्वशक्तिमान् प्रभु को बार-बार नमस्कार करती हूँ ॥ ३९ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भुवनकोशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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धर्मशास्त्र के विद्वानों ने रुद्राष्टाध्यायी के छः अंग निश्चित किए हैं---- प्रथमाध्याय का शिवसंकल्प सूक्त हृदय है। द्वितीयाध्याय का पुरुषसूक्त सिर एवं उत्तरनारायण सूक्त शिखा है। तृतीयाध्याय का अप्रतिरथसूक्त कवच है। चतुर्थाध्याय का मैत्रसूक्त नेत्र है। पञ्चमाध्याय का शतरुद्रियसूक्त अस्त्र कहलाता है। रुद्राष्टाध्यायी के प्रत्येक अध्याय में ----- प्रथमाध्याय का प्रथम मन्त्र--- "गणानां त्वा गणपति हवामहे " बहुत ही प्रसिद्ध है। यह मन्त्र ब्रह्मणस्पति के लिए भी प्रयुक्त होता है । द्वितीय एवं तृतीय मन्त्र में--- गायत्री आदि वैदिक छन्दों तथा छन्दों में प्रयुक्त चरणो का उल्लेख है । पाँचवे मन्त्र---- "यज्जाग्रतो से सुषारथि" पर्यन्त का मन्त्रसमूह शिवसंकल्पसूक्त कहलाता है। इन मन्त्रों का देवता "मन"है इन मन्त्रों में मन की विशेषताएँ वर्णित हैं। परम्परानुसार यह अध्याय गणेश जी का है । द्वितीयाध्याय में--- "सहस्रशीर्षा पुरुषः से यज्ञेन यज्ञम" तक 16 मन्त्र पुरुषसूक्त से हैं ,इनके नारायण ऋषि एवं विराट पुरुष देवता हैं । 17वें मन्त्र---- "अद्भ्यः सम्भृतः से श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च" ये छः मन्त्र उत्तरनारायणसूक्त रुप मे प्रसिद्ध हैं। द्वितीयाध्याय भगवान विष्णु का माना गया है । तृतीयाध्याय के देवता---- देवराज इन्द्र हैं तथा अप्रतिरथ सूक्त के रुप में प्रसिद्ध है। कुछ विद्वान---- "आशुः शिशानः से अमीषाज्चित्तम् "पर्यन्त द्वादश मन्त्रो को स्वीकारते है। कुछ विद्वान---- "अवसृष्टा से मर्माणि ते" पर्यन्त 5मन्त्रों का भी समावेश करते हैं । इन मन्त्रों के ऋषि अप्रतिरथ हैं। इन मन्त्रों द्वारा इन्द्र की उपासना द्वारा शत्रुओं स्पर्शाधको का नाश होता है । प्रथम मन्त्र------ "आ॒शुः शिशा॑नो वृष॒भो न भी॒मो घ॑नाघ॒नः क्षोभ॑णश्चर्षणी॒नां। सं॒क्रंद॑नोऽनिमि॒ष ए॑कवी॒रः श॒तं सेना॑ अजयत्सा॒कमिंद्रः॑।।" का अर्थ ------ " त्वरा से गति करके शत्रुओं का नाश करने वाला , भयंकर वृषभ की तरह, सामना करने वाले प्राणियोन को क्षुब्ध करके नाश करने वाला,मेघ की तरह गर्जना करने वाला , शत्रुओं आवाहन करने वाला,अति सावधान , अद्वितीय वीर, एकाकी पराक्रमी,देवराज इन्द्र शतशः सेनाओं पर विजय प्राप्त करता है।" चतुर्थाध्याय में ---- सप्तदश मन्त्र है जो मैत्रसूक्त के रुप में प्रसिद्ध है। इन मन्त्रों में भगवान सूर्य की स्तुति है----- " ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।" में भुवनभास्कर का मनोरम वर्णन है। यह अध्याय सूर्यनारायण का है । पंचमाध्याय में----- 66 मन्त्र है यह अध्याय प्रधान है , इसे शतरुद्रिय कहते हैं। "शतसंख्यात रुद्रदेवता अस्येति शतरुद्रियम्।" इन मन्त्रों में रुद्र के शतशः रुप वर्णित हैं। कैवल्योपनिषद मे कहा गया है कि---- "शतरुद्रिय का अध्ययन से मनुष्य अनेक पातकों से मुक्त होकर पवित्र होता है।" इसके देवता महारुद्र शिव हैं । षष्ठमाध्याय को---- महच्छिर के रुप में माना जाता है। प्रथम मन्त्र में सोम देवता का वर्णन है। प्रसिद्ध महामृत्युञ्जय मन्त्र " ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् || मंत्र का अर्थ हम त्रिनेत्र को पूजते हैं, जो सुगंधित हैं, हमारा पोषण करते हैं, जिस तरह फल, शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं। महा मृत्युंजय मन्त्र का अक्षरश: अर्थ------ त्र्यंबकम्---- त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक), तीनों कालों में हमारी रक्षा करने वाले भगवान को यजामहे----- हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय सुगंधिम ---- मीठी महक वाला, सुगन्धित (कर्मकारक) पुष्टिः---- एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता वर्धनम्----- वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली उर्वारुकम् ------ ककड़ी (कर्मकारक) इव---- जैसे, इस तरह बन्धनात्----- तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो सन्धि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है) मृत्योः------ मृत्यु से मुक्षीय----- हमें स्वतन्त्र करें, मुक्ति दें मा----- नहीं वंचित होएँ अमृतात् ---- अमरता, मोक्ष के आनन्द से इस महामन्त्र से लाभ निम्न है ---- धन प्राप्त होता है,जो आप सोच के जाप करते वह कार्य सफल होता परिवार मे सुख सम्रद्बि रहती है। इसी अध्याय में है। इसके देवता चन्द्रदेव हैँ । सप्तमाध्याय को----- जटा कहा जाता है । " उग्रश्चभीमश्च मन्त्र में" मरुत् देवता का वर्णन है। इसके देवता वायुदेव है । अष्टमाध्याय को----- चमकाध्याय कहा जाता है। इसमें 29 मन्त्र हैं । प्रत्येक मन्त्र मेँ "च "कार एवं "मे" का बाहुल्य होने से कदाचित "चमकाध्याय अभिधान" रखा गया है । इसके ऋषि "देव"स्वयं हैं तथा देवता अग्नि हैं। प्रत्येक मन्त्र के अन्त मे "यज्ञेन कल्पन्ताम्" पद आता है । रुद्री के उपसंहार में---- "ऋचं वाचं प्रपद्ये " इत्यादि 24 मन्त्र "शान्त्याध्याय" के रुप में। "स्वस्ति न इन्द्रो " इत्यादि 12 मन्त्र "स्वस्ति प्रार्थना" के रुप में प्रसिद्ध है।

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. गोपेश्वर महादेव एक बार शरद पूर्णिमा की शरत-उज्ज्वल चाँदनी में वंशीवट यमुना के किनारे श्याम सुंदर साक्षात मन्मथनाथ की वंशी बज उठी। श्रीकृष्ण ने छ: मास की एक रात्रि करके मन्मथ का मानमर्दन करने के लिए महारास किया था। मनमोहन की मीठी मुरली ने कैलाश पर विराजमान भगवान श्री शंकर को मोह लिया, समाधि भंग हो गयी। बाबा वृंदावन की ओर बावरे होकर चल पड़े। पार्वती जी भी मनाकर हार गयीं, किंतु त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्री आसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये। वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, "श्रेष्ठ जनों" श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता। श्री शिवजी बोले, "देवियों! हमें भी श्रीराधा-कृष्ण के दर्शनों की लालसा है, अत: आप ही लोग कोई उपाय बतलाइये, जिससे कि हम महाराज के दर्शन पा सकें?" ललिता नामक सखी बोली, यदि आप महारास देखना चाहते हैं तो गोपी बन जाइए। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण करके महारास में प्रवेश हुआ जा सकता है। फिर क्या था, भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो बाबा भोलेनाथ गोपी रूप हो गये। प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये। श्री शिवजी मोहिनी-वेष में मोहन की रासस्थली में गोपियों के मण्डल में मिलकर अतृप्त नेत्रों से विश्वमोहन की रूप-माधुरी का पान करने लगे। नटवर-वेषधारी, श्रीरासविहारी, रासेश्वरी, रसमयी श्रीराधाजी एवं गोपियों को नृत्य एवं रास करते हुए देख नटराज भोलेनाथ भी स्वयं ता-ता थैया कर नाच उठे। मोहन ने ऐसी मोहिनी वंशी बजायी कि सुधि-बुधि भूल गये भोलेनाथ। बनवारी से क्या कुछ छिपा है। मुस्कुरा उठे, पहचान लिया भोलेनाथ को। उन्होंने रासेश्वरी श्रीराधा व गोपियों को छोड़कर ब्रज-वनिताओं और लताओं के बीच में गोपी रूप धारी गौरीनाथ का हाथ पकड़ लिया और मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बड़े ही आदर-सत्कार से बोले, "आइये स्वागत है, महाराज गोपेश्वर। श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा, "राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है। तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, "भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले, "प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है। इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा "हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने `तथास्तु' कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को `श्रीगोपेश्वर महादेव' के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि ब्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी `गोपेश्वर महादेव' के रूप में विराजमान हैं और भक्तों को अपने दिव्य गोपी-वेष में दर्शन दे रहे हैं। गर्भगृह के बाहर पार्वतीजी, श्रीगणेश, श्रीनन्दी विराजमान हैं। आज भी संध्या के समय भगवान का गोपीवेश में दिव्य श्रृंगार होता है। ----------:::×:::---------- "हर हर महादेव" *******************************************

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 7 (भाग 3) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ नारायण से नर की बातचीत, च्यवन-प्रह्लाद का संवाद... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सूतजी कहते हैं इस प्रकार जब राजा जनमेजय ने सत्यवतीनन्दन विप्रवर व्यासजी से पूछा, तब उन्होंने सारी बातों का विशदरूप से वर्णन आरम्भ कर दिया। व्यासजी बोले-राजन्! जब भयंकर हिरण्यकशिपु की मृत्यु हो गयी, तब उसके पुत्र प्रह्लाद को राजगद्दी पर बैठाया गया। दानवराज प्रह्लाद देवताओं और ब्राह्मणों के सच्चे उपासक थे। उनके शासनकाल में भूमण्डल के सभी नरेशों द्वारा यज्ञों में श्रद्धापूर्वक देवताओं की उपासना होती थी। तपस्या करना, धर्म का प्रचार करना और तीर्थों में जाना— यही उस समय के ब्राह्मणों का कार्य था । वैश्य अपनी व्यापार-वृत्ति में संलग्न थे। शूद्रों द्वारा सबकी सेवा होती थी। उस अवसर पर भगवान् नृसिंह ने दैत्यराज प्रह्लाद को पाताल में रहने का आदेश दे रखा था। वहीं उनकी राजधानी थी। बड़ी तत्परता के साथ वे प्रजा का पालन कर रहे थे । एक समय की बात है— महान् तपस्वी भृगुनन्दन च्यवनजी स्नान करने के विचार से नर्मदा के तटपर, जो व्याहृतीश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है, गये। इतने में रेवा नामक महान् नदी पर उनकी दृष्टि पड़ गयी। वे उसके तटपर नीचे उतरने लगे, तबतक एक भयंकर विषधर सर्प ने उन्हें पकड़ लिया। मुनिवर च्यवन उसके प्रयास से पाताल में पहुँच गये। सर्प से पकड़े जाने पर उनके मन में आतंक छा गया। अतएव उन्होंने मन-ही-मन देवाधिदेव भगवान् विष्णु का स्मरण आरम्भ कर दिया। उन्होंने ज्यों ही कमललोचन भगवान् श्रीहरि का चिन्तन किया कि उस महान् विषधर सर्प का सारा विष समाप्त हो गया। तब अत्यन्त घबराये हुए एवं शंकाशील उस सर्पने च्यवन मुनि को छोड़ ये मुनि महान् तपस्वी हैं, दिया और सोचा- अतः कहीं कुपित होकर मुझे शाप न दे दें। नागकन्याएँ मुनिवर की पूजा करने में संलग्न हो गयीं। तदनन्तर च्यवनजी ने नागों और दानवों की विशाल पुरी में प्रवेश किया। एक बार की बात है भृगुनन्दन च्यवन उस श्रेष्ठ पुरी में घूम रहे थे। धर्मवत्सल दैत्यराज प्रह्लाद की उनपर दृष्टि पड़ गयी। देखकर उन्होंने मुनि की पूजा की और पूछा—'भगवन्! आप यहाँ पाताल में कैसे पधारे ? बताने की कृपा करें। इन्द्र हम दैत्यों से शत्रुता रखते हैं। हमारे राज्य का भेद लेने के लिये तो उन्होंने आपको यहाँ नहीं भेजा है ? द्विजवर ! आप सच्ची बात बतायें। च्यवन मुनि ने कहा- राजन्! मुझे इन्द्र से क्या प्रयोजन कि उनकी प्रेरणा से मैं यहाँ आऊँ और उनके दूत का काम करते हुए आपके नगर में प्रवेश करूँ। दैत्येन्द्र! आपको विदित होना चाहिये, मैं भृगु का धर्मात्मा पुत्र च्यवन हूँ। ज्ञानरूपी नेत्र मुझे सुलभ है। मैं इन्द्र का भेजा हुआ हूँ– इस विषय में आप किंचिन्मात्र भी संदेह न करें। राजेन्द्र! मैं स्नान करने के लिये नर्मदा के पावन तीर्थ में पहुँचा। नदी में पैठ रहा था, इतने में एक महान् सर्प ने मुझे पकड़ लिया। उस समय मेरे मन में भगवान् विष्णु की स्मृति जाग्रत् हो गयी। परिणामस्वरूप वह सर्प अपने भीषण विष से रहित हो गया। यों भगवान् विष्णु के चिन्तन के प्रभाव से उस सर्प से मेरा छुटकारा हो गया। राजेन्द्र ! फिर मैं यहाँ आ गया और आपके दर्शन की सुन्दर घड़ी सामने आ गयी। दैत्येन्द्र! आप भगवान् विष्णु के भक्त हैं। मेरे विषय में भी वैसी ही कल्पना कर लेनी चाहिये । क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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एक मधुर बाल लीला..... 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 बहुत ही आनंद आएगा पढ़े जरूर ठाकुर जी ने एक बार 🌶"ताता" मिर्ची खायी, फिर बडो मजा आयो ! ब्रजरानी यशोदा भोजन कराते-कराते थोड़ी सी छुंकि हुई मिर्च लेकर आ गई क्योंकि नन्द बाबा को बड़ी प्रिय थी। लाकर थाली में एक और रख दई, तो अब ठाकुरजी बोले की बाबा हम आज और कछु नहीं खानो , ये खवाओ🌶 ये कहा है ? हम ये खाएंगे , तो नन्द बाबा डराने लगे की नाय-नाय लाला ये तो 'ताता' है , तेरो मुँह जल जावेगो , तो लाला बोलौे नाय बाबा अब तो ये ही 🌶खानो है मोय ये बात सुन कें बाबा ने खूब ब्रजरानी यशोदा कूं डाँटो , कि मेहर तुम ये क्यों लैंके आई ? तुमकूं मालूम है ये बड़ो जिद्दी है , ये मानवै वारो नाय , फिर भी तुम लैंके आ गई !!! अब मैया ते गलती तौ है गई , और इतकूं ठाकुर जी मचल गए बोले अब बाकी भोजन पीछे होयगो, पहले ये ताता 🌶 ही खानी है मोय, पहले ये खवाओ । बाबा पकड़ रहेैं , रोक रहे हते , पर इतने में तौ लाला उछल कें थाली के निकट पहुंचे और अपने हाथ से उठाकर मिर्च🌶 खा गये| और खाते ही 'ताता' है गयी; लग गई मिर्च, करवे लग गये सी~सी | वास्तव में ताता भी नहीं " ता था थई " है गई । अब लाला चारों तरफ भगौ डोले, रोतौ फिरे, ऑखन मे आँसू भर गये , लाला की रोवाराट सुन कें सखा आ गये , अपने सखा की ये दशा देख कें हंसवे लगे, और बोलें ---- लै और खा ले मिर्च !!! भातई मिरचई ही खावेगो , और कछू नाय पायौ तोय खावेकूं | मगर तुरत ही सबरे सखा गंभीर है गये , और अपने प्रान प्यारे कन्हैया की 'ताता' कूं दूर करिवे कौ उपाय ढूंढवे लगे | इतकूं लाला ततईया को सों खायो भगौ डोले फिरे , सारे नन्द भवन में - बाबा मेरो मौह जर गयो , बाबा मेरो मौह जर गयो , मौह में आग पजर रही है😝😝अरि मईया मर गयौ , बाबा कछु करो कहतौ फिरौ डोलै !!!!और पीछे-पीछे ब्रजरानी यशोदा , नन्द बाबा भाग रहे है हाय-हाय हमारे लाला कूं मिर्च लग गई , हमारे कन्हैया कूं मिर्च लग गई । महाराज बडी मुश्किल ते लाला कूं पकड़ौ ; (या लीला कूं आप पढ़ो मत बल्कि अनुभव करौ कि आपके सामने घटित है रही , फिर आवेगौ असली आनन्द 😀😀😀) लाला कूं गोदी में लैकें नन्द बाबा रो रहे है, और कह रहे है कि अरि महर अब तनिक बूरौ-खांड कछू तौ लैकें आ , मेरे लाला के मुख ते लगा | और इतनो ही नाय बालकृष्ण के मुख में नन्द बाबा फूँक मार रहे है । बडी देर बाद लाला की पीडा शान्त भई , तब कहीं जा कैं नन्दालय में सुकून परौ | आप सोचो क्या ये सौभाग्य किसी को मिलेगा ? जैसे बच्चे को कुछ लग जाती है तो हम फूँक मारते है बेटा ठीक हे जाएगी वैसे ही बाल कृष्ण के मुख में बाबा नन्द फूँक मार रहे है । देवता जब ऊपर से ये दृश्य देखते है तो देवता रो पड़ते है और कहते है की प्यारे ऐसा सुख तो कभी स्वपन में भी हमको नहीं मिला जो इन ब्रजवासियो को मिल रहा है | और कामना कर रहे हैं कि आगे यदि जन्म देना तो इन ब्रजवासियो के घर का नौकर बना देना , यदि इनकी सेवा भी हमको मिल गई तो हम धन्य हो जाएंगे। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (सत्तत्तरवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय उल्का नवमी व्रत का विधान और फल...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब आप उल्का-नवमी-व्रत के विषय में सुनें। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को नदी में स्नानकर पितृदेवी की विधिपूर्वक अर्चना करे। अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि से भैरव-प्रिया चामुण्डादेवी की पूजा करे, तदनन्तर इस मन्त्र से हाथ जोड़कर स्तुति करे – महिषघ्नि महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि। द्रव्यमारोग्यविजयौ देहि देवि नमोऽस्तु ते॥ (उत्तरपर्व ६२ । ५) इसके बाद यथाशक्ति सात, पाँच या एक कुमारी को भोजन कराकर उन्हें नीला कञ्चक, आभूषण, वस्त्र एवं दक्षिणा आदि देकर संतुष्ट करे। श्रद्धा से भगवती प्रसन्न होती हैं। अनन्तर भूमिका अभ्युक्षण करे। तदनन्तर गोबर का चौका लगाकर आसन पर बैठ जाय । सामने पात्र रखकर, जो भी भोजन बना हो सारा परोस ले, फिर एक मुट्ठी तृण और सूखे पत्तों को अनि से प्रज्वलित कर जितने समय तक प्रकाश रहे उतने समय में ही भोजन सम्पन्न कर ले। अग्निनके शान्त होते ही भोजन करना बंद कर आचमन करे। चामुण्डा का हृदय में ध्यानकर प्रसन्नतापूर्वक घर का कार्य करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रतकर वर्ष के समाप्त होने पर कुमारी-पूजा करे तथा उन्हें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर उनसे क्षमा याचना करे । ब्राह्मण को सुवर्ण एवं गौ का दान करे। हे पार्थ! इस प्रकार जो पुरुष उल्का-नवमी का व्रत करता है, उसे शत्रु, अग्नि, राजा, चोर, भूत, प्रेत, पिशाच आदि का भय नहीं होता एवं युद्ध आदि में उसपर शस्त्रों का प्रहार नहीं लगता, देवी चामुण्डा उसकी सर्वत्र रक्षा करती हैं। इस उल्का-नवमी-व्रत को करने वाले पुरुष और स्त्री उल्का की तरह तेजस्वी हो जाते हैं। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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धर्मशास्त्र के विद्वानों ने रुद्राष्टाध्यायी के छः अंग निश्चित किए हैं---- प्रथमाध्याय का शिवसंकल्प सूक्त हृदय है। द्वितीयाध्याय का पुरुषसूक्त सिर एवं उत्तरनारायण सूक्त शिखा है। तृतीयाध्याय का अप्रतिरथसूक्त कवच है। चतुर्थाध्याय का मैत्रसूक्त नेत्र है। पञ्चमाध्याय का शतरुद्रियसूक्त अस्त्र कहलाता है। रुद्राष्टाध्यायी के प्रत्येक अध्याय में ----- प्रथमाध्याय का प्रथम मन्त्र--- "गणानां त्वा गणपति हवामहे " बहुत ही प्रसिद्ध है। यह मन्त्र ब्रह्मणस्पति के लिए भी प्रयुक्त होता है । द्वितीय एवं तृतीय मन्त्र में--- गायत्री आदि वैदिक छन्दों तथा छन्दों में प्रयुक्त चरणो का उल्लेख है । पाँचवे मन्त्र---- "यज्जाग्रतो से सुषारथि" पर्यन्त का मन्त्रसमूह शिवसंकल्पसूक्त कहलाता है। इन मन्त्रों का देवता "मन"है इन मन्त्रों में मन की विशेषताएँ वर्णित हैं। परम्परानुसार यह अध्याय गणेश जी का है । द्वितीयाध्याय में--- "सहस्रशीर्षा पुरुषः से यज्ञेन यज्ञम" तक 16 मन्त्र पुरुषसूक्त से हैं ,इनके नारायण ऋषि एवं विराट पुरुष देवता हैं । 17वें मन्त्र---- "अद्भ्यः सम्भृतः से श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च" ये छः मन्त्र उत्तरनारायणसूक्त रुप मे प्रसिद्ध हैं। द्वितीयाध्याय भगवान विष्णु का माना गया है । तृतीयाध्याय के देवता---- देवराज इन्द्र हैं तथा अप्रतिरथ सूक्त के रुप में प्रसिद्ध है। कुछ विद्वान---- "आशुः शिशानः से अमीषाज्चित्तम् "पर्यन्त द्वादश मन्त्रो को स्वीकारते है। कुछ विद्वान---- "अवसृष्टा से मर्माणि ते" पर्यन्त 5मन्त्रों का भी समावेश करते हैं । इन मन्त्रों के ऋषि अप्रतिरथ हैं। इन मन्त्रों द्वारा इन्द्र की उपासना द्वारा शत्रुओं स्पर्शाधको का नाश होता है । प्रथम मन्त्र------ "आ॒शुः शिशा॑नो वृष॒भो न भी॒मो घ॑नाघ॒नः क्षोभ॑णश्चर्षणी॒नां। सं॒क्रंद॑नोऽनिमि॒ष ए॑कवी॒रः श॒तं सेना॑ अजयत्सा॒कमिंद्रः॑।।" का अर्थ ------ " त्वरा से गति करके शत्रुओं का नाश करने वाला , भयंकर वृषभ की तरह, सामना करने वाले प्राणियोन को क्षुब्ध करके नाश करने वाला,मेघ की तरह गर्जना करने वाला , शत्रुओं आवाहन करने वाला,अति सावधान , अद्वितीय वीर, एकाकी पराक्रमी,देवराज इन्द्र शतशः सेनाओं पर विजय प्राप्त करता है।" चतुर्थाध्याय में ---- सप्तदश मन्त्र है जो मैत्रसूक्त के रुप में प्रसिद्ध है। इन मन्त्रों में भगवान सूर्य की स्तुति है----- " ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।" में भुवनभास्कर का मनोरम वर्णन है। यह अध्याय सूर्यनारायण का है । पंचमाध्याय में----- 66 मन्त्र है यह अध्याय प्रधान है , इसे शतरुद्रिय कहते हैं। "शतसंख्यात रुद्रदेवता अस्येति शतरुद्रियम्।" इन मन्त्रों में रुद्र के शतशः रुप वर्णित हैं। कैवल्योपनिषद मे कहा गया है कि---- "शतरुद्रिय का अध्ययन से मनुष्य अनेक पातकों से मुक्त होकर पवित्र होता है।" इसके देवता महारुद्र शिव हैं । षष्ठमाध्याय को---- महच्छिर के रुप में माना जाता है। प्रथम मन्त्र में सोम देवता का वर्णन है। प्रसिद्ध महामृत्युञ्जय मन्त्र " ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् | उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् || मंत्र का अर्थ हम त्रिनेत्र को पूजते हैं, जो सुगंधित हैं, हमारा पोषण करते हैं, जिस तरह फल, शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं। महा मृत्युंजय मन्त्र का अक्षरश: अर्थ------ त्र्यंबकम्---- त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक), तीनों कालों में हमारी रक्षा करने वाले भगवान को यजामहे----- हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय सुगंधिम ---- मीठी महक वाला, सुगन्धित (कर्मकारक) पुष्टिः---- एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता वर्धनम्----- वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली उर्वारुकम् ------ ककड़ी (कर्मकारक) इव---- जैसे, इस तरह बन्धनात्----- तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो सन्धि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है) मृत्योः------ मृत्यु से मुक्षीय----- हमें स्वतन्त्र करें, मुक्ति दें मा----- नहीं वंचित होएँ अमृतात् ---- अमरता, मोक्ष के आनन्द से इस महामन्त्र से लाभ निम्न है ---- धन प्राप्त होता है,जो आप सोच के जाप करते वह कार्य सफल होता परिवार मे सुख सम्रद्बि रहती है। इसी अध्याय में है। इसके देवता चन्द्रदेव हैँ । सप्तमाध्याय को----- जटा कहा जाता है । " उग्रश्चभीमश्च मन्त्र में" मरुत् देवता का वर्णन है। इसके देवता वायुदेव है । अष्टमाध्याय को----- चमकाध्याय कहा जाता है। इसमें 29 मन्त्र हैं । प्रत्येक मन्त्र मेँ "च "कार एवं "मे" का बाहुल्य होने से कदाचित "चमकाध्याय अभिधान" रखा गया है । इसके ऋषि "देव"स्वयं हैं तथा देवता अग्नि हैं। प्रत्येक मन्त्र के अन्त मे "यज्ञेन कल्पन्ताम्" पद आता है । रुद्री के उपसंहार में---- "ऋचं वाचं प्रपद्ये " इत्यादि 24 मन्त्र "शान्त्याध्याय" के रुप में। "स्वस्ति न इन्द्रो " इत्यादि 12 मन्त्र "स्वस्ति प्रार्थना" के रुप में प्रसिद्ध है।

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🚩श्री रामचरित मानस पाठ 🚩-रामायण संदेश (दिवस -७०) गतांक से आगे। भगवान शंकर माता पार्वती को भगवान के विभिन्न रुपों और अवतारों के विषय में बता रहे हैं। शिवजी जिस रावण-कुम्भकर्ण-विभीषण पूर्वजन्म कथा जिस कारण से भगवान श्रीराम का अवतार हुआ था, उसका वर्णन करने लगे॥ राजा प्रतापभानु का ब्रहाम्ण श्राप के कारण राजपाट चला गया और वह युद्ध में मारा गया। अगले जन्म में भानु प्रताप १० सिर वाला राक्षस रावण बना। जबकि उसका छोटा भाई अरिमर्दन कुंभकरण बना। वहीं उसका सेनापति धर्मरुचि सौतेला भाई विभीषण बना। गोस्वामी तुलसीदास जी रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार का वर्णन घटनाक्रम का व्याख्यान करते हुए लिखते हैं। भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम। धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥ भावार्थ:-(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिए धूल सुमेरु पर्वत के समान (भारी और कुचल डालने वाली), पिता यम के समान (कालरूप) और रस्सी साँप के समान (काट खाने वाली) हो जाती है॥ काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥ दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥ भावार्थ:-हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवार सहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था॥ भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥ सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥ भावार्थ:-अरिमर्दन नामक जो राजा का छोटा भाई था, वह बल का धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मंत्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावण का सौतेला छोटा भाई हुआ ॥ नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥ रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥ भावार्थ:-उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञान का भंडार था और जो राजा के पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए॥ कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥ कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥ भावार्थ:-वे सब अनेकों जाति के, मनमाना रूप धारण करने वाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसार भर को दुःख देने वाले हुए, उनका वर्णन नहीं हो सकता॥ उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप। तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥ भावार्थ:-यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषि के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणों के शाप के कारण वे सब पाप रूप हुए॥ कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥ गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥ भावार्थ:-तीनों भाइयों ने अनेकों प्रकार की बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। (उनका उग्र) तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गए और बोले- हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो॥ करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥ हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥ भावार्थ:-रावण ने विनय करके और चरण पकड़कर कहा- हे जगदीश्वर! सुनिए, वानर और मनुष्य- इन दो जातियों को छोड़कर हम और किसी के मारे न मरें। (यह वर दीजिए)॥ एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥ पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥ भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं कि-) मैंने और ब्रह्मा ने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुंभकर्ण के पास गए। उसे देखकर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ॥ जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥ सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥ भावार्थ:-जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जाएगा। (ऐसा विचारकर) ब्रह्माजी ने सरस्वती को प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। (जिससे) उसने छह महीने की नींद माँगी॥ गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु। तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥ भावार्थ:-फिर ब्रह्माजी विभीषण के पास गए और बोले- हे पुत्र! वर माँगो। उसने भगवान के चरणकमलों में निर्मल (निष्काम और अनन्य) प्रेम माँगा॥ तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥ मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥ भावार्थ:-उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गए और वे (तीनों भाई) हर्षित हेकर अपने घर लौट आए। मय दानव की मंदोदरी नाम की कन्या परम सुंदरी और स्त्रियों में शिरोमणि थी॥ सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥ हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥ भावार्थ:-मय ने उसे लाकर रावण को दिया। उसने जान लिया कि यह राक्षसों का राजा होगा। अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयों का विवाह कर दिया॥ गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥ सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा॥ भावार्थ:-समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। (महान मायावी और निपुण कारीगर) मय दानव ने उसको फिर से सजा दिया। उसमें मणियों से जड़े हुए सोने के अनगिनत महल थे॥ भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥ तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥ भावार्थ:-जैसी नागकुल के रहने की (पाताल लोक में) भोगावती पुरी है और इन्द्र के रहने की (स्वर्गलोक में) अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुंदर और बाँका वह दुर्ग था। जगत में उसका नाम लंका प्रसिद्ध हुआ॥ खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥ भावार्थ:-उसे चारों ओर से समुद्र की अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस (दुर्ग) के मणियों से जड़ा हुआ सोने का मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरी का वर्णन नहीं किया जा सकता॥ हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥ भावार्थ:-भगवान की प्रेरणा से जिस कल्प में जो राक्षसों का राजा (रावण) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुलित बलवान् अपनी सेना सहित उस पुरी में बसता है॥ रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥ अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥ भावार्थ:-(पहले) वहाँ बड़े-बड़े योद्धा राक्षस रहते थे। देवताओं ने उन सबको युद्द में मार डाला। अब इंद्र की प्रेरणा से वहाँ कुबेर के एक करोड़ रक्षक (यक्ष लोग) रहते हैं॥ दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥ देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥ भावार्थ:-रावण को कहीं ऐसी खबर मिली, तब उसने सेना सजाकर किले को जा घेरा। उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेना को देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गए॥ फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥ सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥ भावार्थ:-तब रावण ने घूम-फिरकर सारा नगर देखा। उसकी (स्थान संबंधी) चिन्ता मिट गई और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरी को स्वाभाविक ही सुंदर और (बाहर वालों के लिए) दुर्गम अनुमान करके रावण ने वहाँ अपनी राजधानी कायम की॥ जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हें॥ एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥ भावार्थ:-योग्यता के अनुसार घरों को बाँटकर रावण ने सब राक्षसों को सुखी किया। एक बार वह कुबेर पर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पक विमान को जीतकर ले आया॥ कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥ भावार्थ:-फिर उसने जाकर (एक बार) खिलवाड़ ही में कैलास पर्वत को उठा लिया और मानो अपनी भुजाओं का बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँ से चला आया॥ सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥ नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥ भावार्थ:-सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई- ये सब उसके नित्य नए (वैसे ही) बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है॥ अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥ करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥ भावार्थ:-अत्यन्त बलवान् कुम्भकर्ण सा उसका भाई था, जिसके जोड़ का योद्धा जगत में पैदा ही नहीं हुआ। वह मदिरा पीकर छह महीने सोया करता था। उसके जागते ही तीनों लोकों में तहलका मच जाता था॥ जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥ समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥ भावार्थ:-यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट (खाली) हो जाता। रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। (लंका में) उसके ऐसे असंख्य बलवान वीर थे॥ बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥ जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥ भावार्थ:- मेघनाद रावण का बड़ा लड़का था, जिसका जगत के योद्धाओं में पहला नंबर था। रण में कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। स्वर्ग में तो (उसके भय से) नित्य भगदड़ मची रहती थी॥ कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥ भावार्थ:-(इनके अतिरिक्त) दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत को जीत सकते थे॥ कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥ भावार्थ:-सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और (आसुरी) माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्न में भी नहीं था। एक बार सभा में बैठे हुए रावण ने अपने अगणित परिवार को देखा-॥ सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥ भावार्थ:-पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। (सारी) राक्षसों की जातियों को तो गिन ही कौन सकता था! अपनी सेना को देखकर स्वभाव से ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्व में सनी हुई वाणी बोला-॥ सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥ भावार्थ:-हे समस्त राक्षसों के दलों! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं। वे सामने आकर युद्ध नहीं करते। बलवान शत्रु को देखकर भाग जाते हैं॥ तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥ द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥ भावार्थ:-उनका मरण एक ही उपाय से हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ। अब उसे सुनो। (उनके बल को बढ़ाने वाले) ब्राह्मण भोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध- इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो॥ छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥ भावार्थ:-भूख से दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहज ही में आ मिलेंगे। तब उनको मैं मार डालूँगा अथवा भलीभाँति अपने अधीन करके (सर्वथा पराधीन करके) छोड़ दूँगा॥ मेघनाद कहूँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बयरु बढ़ावा॥ जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥ भावार्थ:-फिर उसने मेघनाद को बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और देवताओं के प्रति बैरभाव को उत्तेजना दी। (फिर कहा-) हे पुत्र ! जो देवता रण में धीर और बलवान् हैं और जिन्हें लड़ने का अभिमान है॥ तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँघी॥ एहि बिधि सबही अग्या दीन्हीं। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥ भावार्थ:-उन्हें युद्ध में जीतकर बाँध लाना। बेटे ने उठकर पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। इसी तरह उसने सबको आज्ञा दी और आप भी हाथ में गदा लेकर चल दिया॥ चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥ रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥ भावार्थ:-रावण के चलने से पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जना से देवरमणियों के गर्भ गिरने लगे। रावण को क्रोध सहित आते हुए सुनकर देवताओं ने सुमेरु पर्वत की गुफाएँ तकीं (भागकर सुमेरु की गुफाओं का आश्रय लिया)॥ दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥ पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥ भावार्थ:-दिक्पालों के सारे सुंदर लोकों को रावण ने सूना पाया। वह बार-बार भारी सिंहगर्जना करके देवताओं को ललकार-ललकारकर गालियाँ देता था॥ रन मद मत्त फिरइ गज धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥ रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥ भावार्थ:-रण के मद में मतवाला होकर वह अपनी जोड़ी का योद्धा खोजता हुआ जगत भर में दौड़ता फिरा, परन्तु उसे ऐसा योद्धा कहीं नहीं मिला। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम आदि सब अधिकारी,॥ किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥ ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥ भावार्थ:-किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग- सभी के पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया (किसी को भी उसने शांतिपूर्वक नहीं बैठने दिया)। ब्रह्माजी की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री-पुरुष थे, सभी रावण के अधीन हो गए॥ आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥ भावार्थ:-डर के मारे सभी उसकी आज्ञा का पालन करते थे और नित्य आकर नम्रतापूर्वक उसके चरणों में सिर नवाते थे॥ भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र। मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥ भावार्थ:-उसने भुजाओं के बल से सारे विश्व को वश में कर लिया, किसी को स्वतंत्र नहीं रहने दिया। (इस प्रकार) मंडलीक राजाओं का शिरोमणि (सार्वभौम सम्राट) रावण अपनी इच्छानुसार राज्य करने लगा॥ देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि। जीति बरीं निज बाहु बल बहु सुंदर बर नारि॥ भावार्थ:-देवता, यक्ष, गंधर्व, मनुष्य, किन्नर और नागों की कन्याओं तथा बहुत सी अन्य सुंदरी और उत्तम स्त्रियों को उसने अपनी भुजाओं के बल से जीतकर ब्याह लिया॥ इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥ प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥ भावार्थ:-मेघनाद से उसने जो कुछ कहा, उसे उसने (मेघनाद ने) मानो पहले से ही कर रखा था (अर्थात् रावण के कहने भर की देर थी, उसने आज्ञापालन में तनिक भी देर नहीं की।) जिनको (रावण ने मेघनाद से) पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें की उन्हें सुनो॥ देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥ करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥ भावार्थ:-सब राक्षसों के समूह देखने में बड़े भयानक, पापी और देवताओं को दुःख देने वाले थे। वे असुरों के समूह उपद्रव करते थे और माया से अनेकों प्रकार के रूप धरते थे॥ जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥ जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥ भावार्थ:-जिस प्रकार धर्म की जड़ कटे, वे वही सब वेदविरुद्ध काम करते थे। जिस-जिस स्थान में वे गो और ब्राह्मणों को पाते थे, उसी नगर, गाँव और पुरवे में आग लगा देते थे॥ सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥ नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहु सुनिअ न बेद पुराना॥ भावार्थ:-(उनके डर से) कहीं भी शुभ आचरण (ब्राह्मण भोजन, यज्ञ, श्राद्ध आदि) नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो स्वप्न में भी सुनने को नहीं मिलते थे॥ जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥ अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥ भावार्थ:-जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञ में (देवताओं के) भाग पाने की बात रावण कहीं कानों से सुन पाता, तो (उसी समय) स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानों में सुनने में नहीं आता था, जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरह से त्रास देता और देश से निकाल देता था। बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥ भावार्थ:-राक्षस लोग जो घोर अत्याचार करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हिंसा पर ही जिनकी प्रीति है, उनके पापों का क्या ठिकाना॥ पृथ्वी और देवतादि की करुण पुकार घटनाक्रम का वर्णन अगले अंक/लेख में.......। कथा सार- रावण के जन्म के विषय में भिन्न-भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण महाकाव्य,पद्मपुराण तथा श्रीमद्‍भागवत पुराण के अनुसार हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था अर्थात् उनके पुत्र विश्वश्रवा का पुत्र था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के कुबेर को जन्म देने पर सौतिया डाह वश कैकसी ने अशुभ समय में गर्भ धारण किया। इसी कारण से उसके गर्भ से रावण तथा कुंभकर्ण जैसे क्रूर स्वभाव वाले भयंकर राक्षस उत्पन्न हुए। तुलसीदास जी के रामचरितमानस में रावण का जन्म शाप के कारण हुआ है। वे नारद एवं प्रतापभानु की कथाओं को रावण के जन्म का कारण बताते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा मांगी। भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा। यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताललोक में पहुंचा दिया था। पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वधकर पृथ्वी को मुक्त कराया था। हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करने की वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। रावण को दशानन कहते हैं। उसका नाम दशानन उसके दशग्रीव नाम पर पड़ा। कहते हैं कि महातपस्वी रावण ने भगवान शंकर को एक-एक कर अपने दस सिर अर्जित किए थे। उस कठोर तपस्या के बल पर ही उसे दस सिर प्राप्त हुए, जिन्हें लंका युद्ध में भगवान राम ने अपने बाणों से एक-एक कर काटा था। रामचरित मानस के अनुसार के अनुसार, प्राचीन काल में कैकेय देश में प्रतापभानू नामक प्रतापी राजा शासन करता था। उसके भाई का नाम अरिमर्दन था। उसके मंत्री का नाम धर्मरुचि था जो उसे नेक कार्यों की सलाह देता था। युद्ध के दौरान उसने कई राजाओं को हराया और उनके राज्य पर कब्जा कर लिया। भानु प्रताप के राज में प्रजा बहुत खुश थी। एक दिन भानु प्रताप विंध्याचल के घने जंगलों में शिकार पर निकला। वहां उसे जानवर दिखाई दिया। जानवर का पीछा करते-करते वह जंगल के बहुत अंदर तक चला गया और भटक गया। जानवर का पीछा करते वक्त वह अकेला था। इस दौरान वह भूख-प्यास से व्याकुल होने लगा। जंगल में राजा अपने साथियों से बिछड़ गया। जब उसे प्यास लगी तो वह पानी की तलाश करने लगा। नजदीक ही उसे एक ऋषि की कुटिया दिखाई दी। वह कुटिया में गया। ऋषि ने उसकी आवभगत की, जलपान कराया। राजा उसकी बातों से बहुत खुश हुआ। उसने राजा को सलाह दी कि वह ब्राह्मणों के लिए भोज का आयोजन करे। राजा ने ऋषि से कहा कि आप इस आयोजन में बतौर पुरोहित शामिल हों। ऋषि ने यह प्रस्ताव मान लिया। यह ऋषि कोई और नहीं बल्कि सोमदत्त था जो उस राजा का राज्य हड़पना चाहता था। वह शूकर भी उसका मित्र था। जब भोज हुआ तो उसने ब्राह्मणों के भोजन में मांस मिला दिया। भोज प्रारंभ होने पर यह आकाशवाणी हुई कि इस भोजन में मांस मिला हुआ है, तो ब्राह्मणों ने राजा को शाप दिया कि वह राक्षस योनि में जन्म लेगा। अगले जन्म में वही राजा शापवश विश्रवा ऋषि के घर में रावण के रूप में पैदा हुआ। रावण की मां दैत्य कुल से थी। इस जन्म में श्रीराम के हाथों वध होने के कारण वह मुक्ति को प्राप्त हुआ। 🚩जय सियाराम 🚩 🚩जय श्री हरि 🚩 👌🌼👌🌼👌🌼👌🌼👌🌼👌🌼👌🌼👌🌼

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