Deepika Bhansali
Deepika Bhansali Sep 16, 2020

https://youtu.be/WNndc14ymLI अधिक मास पुरुषोत्तम मास की दान सामग्री रोज क्या दान करें?

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shiv balak shukla Sep 23, 2020

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Deepika Bhansali Sep 22, 2020

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Deepika Bhansali Sep 21, 2020

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shiv balak shukla Sep 22, 2020

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- ४.१८ अध्याय ४ : दिव्य ज्ञान . . कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः | स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् || १८ || . . कर्मणि – कर्म में; अकर्म – अकर्म; यः – जो; पश्येत् – देखता है; अकर्मणि – अकर्म में; च – भी; कर्म – सकाम कर्म; यः – जो; सः – वह; बुद्धिमान् – बुद्धिमान् है; मनुष्येषु – मानव समाज में; सः – वह; युक्तः – दिव्य स्थिति को प्राप्त; कृत्स्न-कर्म-कृत् – सारे कर्मों में लगा रहकर भी | . . जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी दिव्य स्थिति में रहता है | . . तात्पर्य : कृष्णभावनामृत में कार्य करने वाला व्यक्ति स्वभावतः कर्म-बन्धन से मुक्त होता है | उसके सारे कर्म कृष्ण के लिए होते हैं, अतः कर्म के फल से उसे कोई लाभ या हानि नहीं होती | फलस्वरूप वह मानव समाज में बुद्धिमान् होता है, यद्यपि वह कृष्ण के लिए सभी तरह के कर्मों में लगा रहता है | अकर्म का अर्थ है – कर्म के फल के बिना | निर्विशेषवादी इस भय से सारे कर्म बन्द कर देता है, कि कर्मफल उसके आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बाधक न हो, किन्तु सगुणवादी अपनी इस स्थिति से भलीभाँति परिचित रहता है कि वह भगवान् का नित्य दास है | अतः वह अपने आपको कृष्णभावनामृत के कार्यों में तत्पर रखता है | चूँकि सारे कर्म कृष्ण के लिए किये जाते हैं, अतः इस सेवा के करने में उसे दिव्य सुख प्राप्त होता है | जो इस विधि में लगे रहते हैं वे व्यक्तिगत इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रहित होते हैं | कृष्ण के प्रति उसका नित्य दास्यभाव उसे सभी प्रकार के कर्मफल से मुक्त करता है | . प्रश्न १: एक कृष्णभावनाभावित व्यक्ति तथा एक निर्विशेषवादी की गतिविधियों में क्या अन्तर है ? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया इसे PlayStore से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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Ramesh Soni.33 Sep 20, 2020

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- ४.१७ अध्याय ४ : दिव्य ज्ञान . . कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः | अकर्मणश्र्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः || १७ || . . कर्मणः – कर्म का; हि – निश्चय ही; अपि – भी; बोद्धव्यम् – समझना चाहिए; बोद्धव्यम् – समझना चाहिए; च – भी; विकार्मणः – अकर्म का; बोद्धव्यम् – समझना चाहिए; गहना – अत्यन्त कठिन, दुर्गम; कर्मणः – कर्म की; गतिः – प्रवेश, गति | . . कर्म की बारीकियों को समझना अत्यन्त कठिन है | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह यह ठीक से जाने कि कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है | . . तात्पर्य : यदि कोई सचमुच ही भव-बन्धन से मुक्ति चाहता है तो उसे कर्म, अकर्म तथा विकर्म के अन्तर को समझना होगा | कर्म, अकर्म तथा विकर्म के विश्लेषण की आवश्यकता है, क्योंकि यह अत्यन्त गहन विषय है | कृष्णभावनामृत को तथा गुणों के अनुसार कर्म को समझने के लिए परमेश्र्वर के साथ सम्बन्ध को जानना होगा | दूसरे शब्दों में, जिसने यह भलीभाँति समझ लिया है, वह जानता है कि जीवात्मा भगवान् का नित्य दास है और फलस्वरूप उसे कृष्णभावनामृत में कार्य करना है | सम्पूर्ण भगवद्गीता का यही लक्ष्य है | इस भावनामृत के विरुद्ध सारे निष्कर्ष एवं परिणाम विकर्म या निषिद्ध कर्म हैं | इसे समझने के लिए मनुष्य को कृष्णभावनामृत के अधिकारियों की संगति करनी होती है और उनसे रहस्य को समझना होता है | यह साक्षात् भगवान् से समझने के समान है | अन्यथा बुद्धिमान् से बुद्धिमान् मनुष्य भी मोहग्रस्त हो जाएगा | . प्रश्न १ : सम्पूर्ण भगवद्गीता का क्या लक्ष्य है ? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया इसे PlayStore से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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shiv balak shukla Sep 21, 2020

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- ४.१६ अध्याय ४ : दिव्य ज्ञान . . किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेSश्रुभात् || १६ || . . किम्– क्या है; कर्म– कर्म; किम्– क्या है;अकर्म– अकर्म, निष्क्रियता; इति– इस प्रकार; कवयः– बुद्धिमान्; अपि– भी; अत्र– इस विषय में; मोहिताः– मोहग्रस्त रहते हैं; तत्– वह; ते– तुमको; कर्म– कर्म; प्रवक्ष्यामि– कहूँगा; यत्– जिसे; ज्ञात्वा– जानकर; मोक्ष्यसे– तुम्हारा उद्धार होगा; अशुभात्– अकल्याण से, अशुभ से | . . कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इसे निश्चित करने में बुद्धिमान् व्यक्ति भी मोहग्रस्त हो जाते हैं | अतएव मैं तुमको बताऊँगा कि कर्म क्या है, जिसे जानकर तुम सारे अशुभ से मुक्त हो सकोगे | . . तात्पर्य : कृष्णभावनामृत में जो कर्म किया जाय वह पूर्ववर्ती प्रामाणिक भक्तों के आदर्श के अनुसार करना चाहिए | इसका निर्देश १५वें श्लोक में किया गया है | ऐसा कर्म स्वतन्त्र क्यों नहीं होना चाहिए, इसकी व्याख्या अगले श्लोक में की गई है | . कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए मनुष्य को उन प्रामाणिक पुरुषों के नेतृत्व का अनुगमन करना होता है, जो गुरु-परम्परा में हों, जैसा कि इस अध्याय के प्रारम्भ में कहा जा चुका है | कृष्णभावनामृत पद्धति का उपदेश सर्वप्रथम सूर्यदेव को दिया गया, जिन्होनें इसे अपने पुत्र मनु से कहा, मनु ने इसे अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा और यह पद्धति तबसे इस पृथ्वी पर चली आ रही है | अतः परम्परा के पूर्ववर्ती अधिकारियों के पदचिन्हों का अनुसरण करना आवश्यक है | अन्यथा बुद्धिमान् से बुद्धिमान् मनुष्य भी कृष्णभावनामृत के आदर्श कर्म के विषय में मोहग्रस्त हो जाते हैं | इसीलिए भगवान् ने स्वयं ही अर्जुन को कृष्णभावनामृत का उपदेश देने का निश्चय किया | अर्जुन को साक्षात् भगवान् ने शिक्षा दी, अतः जो भी अर्जुन के पदचिन्हों पर चलेगा वह कभी मोहग्रस्त नहीं होगा | . कहा जाता है कि अपूर्ण प्रायोगिक ज्ञान के द्वारा धर्म-पथ का निर्णय नहीं किया जा सकता | वस्तुतः धर्म को केवल भगवान् ही निश्चित कर सकते हैं | धर्मं तु साक्षात्भगवत्प्रणीतम् (भागवत् ६.३.१९) | अपूर्ण चिन्तन द्वारा कोई किसी धार्मिक सिद्धान्त का निर्माण नहीं कर सकता | मनुष्य को चाहिए कि ब्रह्मा, शिव, नारद, मनु, चारों कुमार, कपिल, प्रह्लाद, भीष्म, शुकदेव गोस्वामी, यमराज , जनक तथा बलि महाराज जैसे महान अधिकारियों के पदचिन्हों का अनुसरण करे | केवल मानसिक चिन्तन द्वारा यह निर्धारित करना कठिन है कि धर्म या आत्म-साक्षात्कार क्या है | अतः भगवान् अपने भक्तों पर अहैतुकी कृपावश स्वयं ही अर्जुन को बता रहे हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है | केवल कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म ही मनुष्य को भवबन्धन से उबार सकता है | . प्रश्न १ : कृष्णभावनामृत में कर्म करने का सर्वश्रेष्ठ विधि क्या है ? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया इसे Play Store से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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