shivraj yadav
shivraj yadav Aug 22, 2017

sri suktam

https://youtu.be/qvCXINjFKvs

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Dinesh Singh Thakur Oct 27, 2020

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Shashi Dhuri Oct 27, 2020

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ravi ji Oct 27, 2020

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Shivsanker Shukla Oct 27, 2020

शुभ मंगलवार की शुभ संध्या में मंदिर परिवार के सभी आदरणीय भगवत प्रेमी भाई बहन आप सभी को संध्या की राम राम संध्या की पावन बेला में मेरे भाई बहन आइए हम आप सबनारी धर्म के महान आदर्श की उस मूर्ति का दर्शन लाभ प्राप्त करें जिनके नाम के स्मरण मात्र से हर भारतीय नारी उत्तम पतिव्रता की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करती है पति की कीर्ति सदा सदा के लिए संसार में उज्जवल रहे पति का नाम आदर्श के रूप में संसार में प्रतिष्ठित हो इसके लिए आप राज सुखों का त्याग करती हैं और बन की दुर्गम परिस्थितियों का सामना करती है भारतीय नारी के द्वारा युग युगांतर से यही होता रहा है कि उसके सुंदर आचरण के द्वारा दो कुलों की प्रतिष्ठा प्रकाशित होती है देवी मां सीता पति की आन बान शान के लिए कितनी बड़ी कुर्बानी दे रही हैं महान देवी के श्री चरणों में कोटि कोटि वंदन

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Shanti Pathak Oct 27, 2020

**जय श्री राम जी** **जय श्री हनुमानजी** **शुभ संध्या वंदन ** !! जय श्री राम !! !!सभी सुखी हों ,सभी निरोगी हों ,सब पर बरसे राम कृपा ,मंगलमय हो सबका जीवन ,घर घर बरसे राम कृपा ।। "राम" से बड़ा "राम" का नाम- अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात प्रभु "श्रीराम" ने एक विशाल सभा का आयोजन किया.. इस सभा मे सभी देवताओं... ऋषि-मुनियों.. यक्षों व राजाओं.. को आमंत्रित किया... सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर... एक राजन(राजा)ने भरी सभा में... ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया... विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने "श्रीराम" से कहा... "अगर सूर्यास्त से पूर्व आप उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो... आप मेरे श्राप के अधिकारी होगें...!" प्रभु "श्रीराम" असमंजस में पड़ गए... ऋषि विश्वामित्र को मना भी न कर सके... ! "श्रीराम" ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया... यह खबर सुनते ही राजा... हनुमान जी के शरण मे भागा... रास्ते मे माता अंजनी से मुलाकात हो गई... और बिना पूरी बात बताए... उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया... तब माता अंजनी ने हनुमान को राजन(राजा) की प्राण रक्षा का आदेश दिया... हनुमान ने "श्रीराम" की शपथ लेकर कहा, "कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा...!" परंतु जब राजन ने बताया कि प्रभु "श्रीराम" ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो... हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए... राजन के प्राण कैसे बचाए... माता का दिया वचन कैसे पूरा करें... तथा प्रभु "श्रीराम" को श्राप से कैसे बचाएं... ! धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी... हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर... "राम" नाम जपने के लिए कहा... जब राजन को खोजते हुए "श्रीराम" सरयू तट पर पहुंचे तो... उन्होंने देखा कि राजन "राम-राम" जप रहा है...! प्रभु "श्रीराम" ने सोचा, "ये तो "भक्त" है... मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं"। प्रभु "श्रीराम" राजभवन लौटकर विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही... विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे... जिस पर "श्रीराम" को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर आना पड़ा... अब "श्रीराम" के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गया कि... "राम" नाम जप रहे अपने ही "भक्त" का वध करें... "श्रीराम" मन ही मन सोच रहे थे कि... हनुमानजी उनके साथ होते तो कोई न कोई हल अवश्य निकालते... परंतु हनुमानजी तो अपने ही "आराध्य" के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक "धर्मयुद्ध" का संचालन कर रहे थे... हनुमानजी को यह ज्ञात था कि... "राम" नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता... स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम "राम" भी नहीं... ! "श्रीराम" ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला... तब हनुमानजी के कहने पर राजन "राम-राम" जपने लगा... "राम" जानते थे "राम" नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता... वो असहाय होकर राजमहल लौट गए... विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए... और "राम" को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा...! इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर... "जय जय सियाराम जय जय हनुमान"... गा रहा था .. प्रभु "श्रीराम" ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन... शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है... ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता... इस संकट को देखकर "श्रीराम" मूर्छित हो गए...! तब ऋषि व‌शिष्ठ ने विश्वामित्र को सलाह दी कि... "राम" को इस तरह संकट में न डालें... उन्होंने कहा कि "श्रीराम" चाह कर भी..."राम" नाम जपने वाले को नहीं मार सकते... क्योंकि जो शक्ति "राम" के नाम में है और खुद "राम" में नहीं है... संकट बढ़ता देख विश्वामित्र ने "राम" को संभाला... और अपने वचन से मुक्त कर दिया... मामला संभलते देखकर हनुमान प्रभु श्रीराम के पास आये ... और "श्रीराम" के चरणों मे आ गिरे... ! तब प्रभु "श्रीराम" ने कहा, "हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि... भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है.... सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है... !" इस प्रकार हनुमानजी ने "राम" नाम के सहारे "श्रीराम" को भी हरा दिया... धन्य है "राम" नाम और... धन्य धन्य है प्रभु "श्रीराम" के भक्त हनुमान.. ! "जिस सागर को बिना सेतु के..लांघ सके न राम.. कूद गए हनुमान जी उसी मे..लेकर प्रभु श्रीराम का नाम.. तो अंत में निकला ये परिणाम कि "राम से बड़ा राम का नाम" जय श्री राम सबको गिला है बहुत कम मिला है जरा सोचिए जितना आपको मिला है उतना कितनों को मिला है जय श्री राम 🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻

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