Simpal Srivastava
Simpal Srivastava Jun 1, 2018

Papa Me Liye Park Hoti Jai Betiyana Jai Maa Santosi

Life of the women
Nice Line
See the video
Have a sweet day

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कामेंट्स

Asha Bakshi Mar 7, 2019
Nice video bhana 👌👌👌 Jai Shree Radhe Radhe Radhe Krishn jiii subh ratri sneh vanden jiii Aap ki har rat sukhd ho 🌻 💓 💞 🌻 🌹 🍀

🌹🙏❤️ मातृ दिवस ❤️🙏🌹 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 😃🌺🌲⛲शुभ रविवार⛲🌲🌺 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🌞🌲🚩ॐ सूर्य देवता नमः 🌞🌲🚩 🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞 🌅🌀🌻सुप्रभात🌻🌀🌅 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 🙏आपको सपरिवार मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं🙏 🌹आप और आपके पूरे परिवार पर ममता मयी मां और भगवान सूर्यदेव की आशीर्वाद हमेशा बनी रहे 🙏 🌀आपका दिन शुभ और मंगलमय हो 🌀 ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️ 💮वेदों में मिलती है मां की महिमा💮 ***************************** ❤️वेदों में'मां'कोअंबा','अम्बिका','दुर्गा','देवी','सरस्वती',' शक्ति','ज्योति','पृथ्वी' आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा 'मां' को 'माता', 'मात', 'मातृ', 'अम्मा', 'अम्मी', 'जननी', 'जन्मदात्री', 'जीवनदायिनी', 'जनयत्री', 'धात्री', 'प्रसू' आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। """"""""''""""""""""""""""""""""""""""""""""""""''''"""""""""""""""""""""""""""""" 🌹रामायण में श्रीराम अपने श्रीमुख से 'मां' को स्वर्ग से भी बढ़कर मानते हैं। वे कहते हैं- 🌹'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।' अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। 🔯महाभारत में जब यक्ष धर्मराज युधिष्ठर से सवाल करते हैं कि 'भूमि से भारी कौन?' तब युधिष्ठर जवाब देते हैं- 'माता गुरुतरा भूमेरू।' अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं। 🎎इसके साथ ही महाभारत महाकाव्य के रचियता महर्षि वेदव्यास ने 'मां' के बारे में लिखा है- 'नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।' अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है तैतरीय उपनिषद में 'मां' के बारे में इस प्रकार उल्लेख मिलता है- ❤️'मातृ देवो भवः।' अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है। 'शतपथ ब्राह्मण' की सूक्ति कुछ इस प्रकार है- 🌹अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।' अर्थात, जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा। 'मां' के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है- 'प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।' अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे। 🏵️ हितोपदेश- आपदामापन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् । मातृजङ्घा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥ 🥀 जब विपत्तियां आने को होती हैं, तो हितकारी भी उनमें कारण बन जाता है। बछड़े को बांधने में मां की जांघ ही खम्भे का काम करती है। 🏵️स्कन्द पुराण- नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।' महर्षि वेदव्यास ❤️ माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस दुनिया में कोई जीवनदाता नहीं❤️ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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Harcharan Pahwa May 9, 2020

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RANJAN ADHIKARI May 9, 2020

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b singh May 8, 2020

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Uma Sood May 10, 2020

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Swami Lokeshanand May 10, 2020

इधर भरतजी ननिहाल में हैं, उधर अयोध्या में सुमंत्र जी भगवान को वन पहुँचाकर वापिस लौटे। संध्या हो रही है, हल्का प्रकाश है, सुमंत्र जी नगर के बाहर ही रुक गए। जीवनधन लूट गया, अब क्या मुंह लेकर नगर में प्रवेश करूं? अयोध्यावासी बाट देखते होंगे। महाराज पूछेंगे तो क्या उत्तर दूंगा? अभी नगर में प्रवेश करना ठीक नहीं, रात्रि हो जाने पर ही चलूँगा। अयोध्या में आज पूर्ण अमावस हो गई है। रघुकुल का सूर्य दशरथजी अस्त होने को ही है, चन्द्र रामचन्द्रजी भी नहीं हैं, प्रकाश कैसे हो? सामान्यतः पूर्णिमा चौदह दिन बाद होती है, पर अब तो पूर्णिमा चौदह वर्ष बाद भगवान के आने पर ही होगी। दशरथजी कौशल्याजी के महल में हैं, जानते हैं कि राम लौटने वालों में से नहीं, पर शायद!!! उम्मीद की किरण अभी मरी नहीं। सुमंत्रजी आए, कौशल्याजी ने देखकर भी नहीं देखा, जो होना था हो चुका, अब देखना क्या रहा? दशरथजी की दृष्टि में एक प्रश्न है, उत्तर सुमंत्रजी की झुकी गर्दन ने दे दिया। महाराज पथरा गए। बोले- "कौशल्या देखो वे दोनों आ गए" -कौन आ गए महाराज ? कोई नहीं आया। -तुम देखती नहीं हो, वे आ रहे हैं। इतने में वशिष्ठजी भी पहुँच गए। -गुरुजी, कौशल्या तो अंधी हो गई है, आप तो देख रहे हैं, वे दोनों आ गए। -आप किन दो की बात कर रहे हैं, महाराज? -गुरुजी ये दोनों तपस्वी आ गए, मुझे लेने आए हैं, ये श्रवण के मातापिता आ गए। महाराज ने आँखें बंद की, लगे राम राम करने और वह शरीर शांत हो गया। विचार करें, ये चक्रवर्ती नरेश थे, इन्द्र इनके लिए आधा सिंहासन खाली करता था, इनके पास विद्वानों की सभा थी, बड़े बड़े कर्मकाण्डी थे। इनसे जीवन में एकबार कभी भूल हुई थी, इनके हाथों श्रवणकुमार मारा गया था, इतना समय बीत गया, उस कर्म के फल से बचने का कोई उपाय होता तो कर न लेते? यह जो आप दिन रात, उपाय उपाय करते, दरवाजे दरवाजे माथा पटकते फिरते हैं, आप समझते क्यों नहीं? आप को बुद्धि कब आएगी? अब विडियो देखें- दशरथ जी का देह त्याग https://youtu.be/qO3KqNYTVCU

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