R.G.P.Bhardwaj
R.G.P.Bhardwaj Mar 26, 2020

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Raj Rani Bansal Mar 26, 2020

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kabir chaudhary Mar 27, 2020

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R.G.P.Bhardwaj Mar 25, 2020

नवरात्रि विशेष 〰🌼〰🌼〰 इन नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा का मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां,जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली का यह रहस्य वास्तव में ब्रह्माजी ने दिया था जिसे बारे में दुर्गाकवच में संदर्भ मिल जाता है। ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली हैं। शरीर की रक्षा के लिए कवच समान कार्य करती हैं। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है। १ प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़👉 नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है। पथया - जो हित करने वाली है। कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है। अमृता - अमृत के समान हेमवती - हिमालय पर होने वाली। चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है। श्रेयसी (यशदाता)- शिवा यानी कल्याण करने वाली। २ द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी👉 ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है। इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए। ३ तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर👉 नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है। यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए। ४ चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा👉 नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए। ५ पंचम स्कंदमाता यानि अलसी👉 नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है। "अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा। अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।। उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।" इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए। ६ षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया👉 नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है। इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए। ७ सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन👉 दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है। यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए। ८ अष्टम महागौरी यानि तुलसी👉 नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है। "तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी। अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि: तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् । मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।" इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए। ९ नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी👉 नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। सर्व मंगलम मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्रयम्ब्के गौरी नारायणी नमो स्तुते।। 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼

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Pt Vinod Pandey 🚩 Mar 25, 2020

🙏 "चैत्र नवरात्रि घटस्थापन शुभ मुहूर्त" 🚩 जय माता दी....नव 2077 प्रमादी नमक संवत्सर में चैत्र नवरात्रि के लिए घटस्‍थापना बुधवार,25 मार्च को होगी,इसके लिए सर्वोत्तम शुभ मुहूर्त सुबह 05:51 से लेकर 6 बजकर 53 एवं 08:30 से 10:26 मिनट तक है,हिन्दी पंचांग के मुताबिक भारतीय नववर्ष की शुरू भी चैत्र प्रतिपदा से होती है,इसके अलावा चैत्र महीने में ही नव संवत्सर की भी शुरुआत होती है,वहीं रामनवमी 02 अप्रैल को मनाई जाएगी.! प्रतिपदा तिथि का प्रारंभ 24 मार्च, मंगलवार को दोपहर 15 बजकर 58 मिनट से प्रारम्भ हो जाएगी, एवं बुद्धवार 25 मार्च सायंकालीन 15:51 तक रहेगी,घटस्थापना का मुहूर्त 25 मार्च,बुधवार प्रातः मीन लग्न 06 बजकर 21 मिनट से 07 बजकर 17 मिनट तक रहेगा.. या वृष लग्न 8:30 से 10:26 तक भारतीय शास्त्रानुसार नवरात्रि पूजन तथा कलश स्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्योदय के पश्चात 10 घड़ी तक अथवा अभिजीत मुहूर्त में करना चाहिए,25 मार्च को मुहूर्त- अभिजीत मुहूर्त समय अपराह्न 11.36 से 12.25तक रहेगा,कलश स्थापना के साथ ही नवरात्र आरम्भ हो जाती. -:"सर्वप्रथम श्री गणेश का पूजन":- प्रतिपदा तिथि के दिन नवरात्रे पूजा शुरु करने से पहले कलश स्थापना जिसे घट स्थापना के नाम से भी जाना जाता है.हिन्दू धर्म में देवी पूजन का विशेष महात्मय है.इसमें नौ दिनों तक व्रत-उपवास कर, नवें दिन दस वर्ष की कन्याओं का पूजन और उन्हें भोजन कराया जाता है...! इस दिन प्रात: सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त समय में घट स्थापना की जाती है.नवरात्रे के पहले दिन माता दुर्गा,श्री गणेश देव की पूजा की जाती है.इस दिन मिट्टी के बर्तन में रेत-मिट्टी डालकर जौ-गेहूं आदि बीज डालकर बोने के लिये रखे जाते है...! भक्त जन इस दिन व्रत-उपवास तथा यज्ञ आदि का संकल्प लेकर माता की पूजा प्रारम्भ करते है. नवरात्रे के पहले दिन माता के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है.जैसा की सर्वविदित है,माता शैलपुत्री, हिमालय राज जी पुत्री है,जिन्हें देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है.नवरात्रों में माता को प्रसन्न करने के लिये उपवास रखे जाते है. तथा रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है.इन नौ दिनों में रात्रि में जागरण करने से भी विशेष शुभ फल प्राप्त होते है...! -:"नवरात्रि और माता के नौ रुप":- नवरात्रो में माता के नौ रुपों कि पूजा की जाती है.नौ देवीयों के नाम इस प्रकार है. प्रथम-शैलपुत्री, दूसरी-ब्रह्मचारिणी,तीसरी-चन्द्रघंटा,चौथी-कुष्मांडा,पांचवी-स्कंधमाता,छठी-कात्यायिनी,सातवीं-कालरात्री, आठवीं-महागौरी,नवमीं-सिद्धिदात्री...! -:'घट स्थापना विधि":- चैत्र नवरात्रा का प्रारम्भ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है.कलश को हिन्दु विधानों में सुख समृद्धि का स्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है.कलश स्थापन के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है.भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगाजल से भूमि को लिपा जाता है.विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार की मिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है,अगर सात स्थान की मिट्टी नहीं उपलब्ध हो तो नदी से लायी गयी मिट्टी में गंगोट यानी गांगा नदी की मिट्टी मिलाकर इस पर कलश स्थापित किया जा सकता है...! कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी,सुपारी,मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है.इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है "जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी,दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते". इसी मंत्र जाप से साधक के परिवार को सुख,सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद प्राप्त होता है...! -:"कलश स्थापना के बाद करें देवी प्रतिमा स्थापित":- कलश स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करना देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय,देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है.चुंकि भगवान शंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है. अत: भगवान भोले नाथ की भी पूजा भी की जाती है. प्रथम पूजा के दिन "शैलपुत्री" के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत,रोली, चंदन से होती है. इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती होती है. आरती में "जग जननी जय जय" और "जय अम्बे गौरी" के गीत भक्त जन गाते हैं...! -:"शैलपुत्री":- दुर्गाजी का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री है, यह नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं. शारदीय नवरात्र का पहला दिन शैल पुत्री की पूजा की जाती है, पहला नवरात्र, प्रथमा तिथि,25 मार्च 2020 को होगा. पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है..! -:"ब्रह्मचारिणी":- नवदुर्गाओं में दुर्गा का द्वितीय रूप ब्रह्मचारिणी का है. दूसरा नवरात्र, द्वितीया तिथि 26 मार्च 2020, के दिन रहेगा. सफेद वस्त्र में लिपटी हुई, एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल धारण किए हुए हैं, तप का आचरण करने के कारण इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा जाता है...! -:"चंद्रघंटा":- माँ दुर्गा जी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है शक्ति के रूप में विराजमान, मस्तक पर चंद्रमा को धारण किए हुए है. देवी चंद्रघंटा को नवरात्र के तीसरे दिन पूजा जाता है. तीसरा नवरात्र, तृतीय तिथि, 27 मार्च 2020 के दिन रहेगा...! -:"कूष्माण्डा":- मां दुर्गा की चौथी शक्ति कूष्माण्डा है ब्रह्माण को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा कहा गया. चौथा नवरात्र , चतुर्थी तिथि, 28 मार्च 2020, के दिन रहेगा. मां कूष्मांडा अपने भक्तों को सभी संकट, रोग, शोक का नाश करके आयु, यश, बुद्धि प्रदान करती हैं...! -:"स्कंदमाता":- दुर्गा की पांचवीं शक्ति को स्कंदमाता कहा गया है, कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है. पांचवां नवरात्र , पंचमी तिथि , 29 मार्च 2020, के दिन को रहेगा...! -:"कात्यायनी":- दुर्गा के छटे स्वरूप का नाम कात्यायनी देवी है, महर्षि कात्यायन के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इन्हें कात्यायनी कहा गया है, छठा नवरात्रा, षष्ठी तिथि, 30 मार्च 2020, दिन को होगा. मां कात्यायनी की पूजा भक्ति करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है...! -:"कालरात्रि":- देवी दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि है मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में भयानक है, परंतु सदैव शुभ फल देने वाला होता है जिस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है. सातवां नवरात्र, सप्तमी तिथि ,31 मार्च 2020, को रहेगी...! -:"महागौरी":- मां दुर्गा की आठवीं शक्ति महागौरी हैं. इनकी शक्ति अमोघ और शीघ्र फलदायिनी है. कठोर तपस्या द्वारा इन्होंने पार्वती रूप में भगवान शिव को पाया. आठवां नवरात्र, अष्टमी तिथि, 1 अप्रैल 2020, दिन तक होगी. इनकी भक्ति से भक्त के समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं...! -:"सिद्धिदात्री":- देवी दुर्गा का नौवां रूप सिद्धियात्री है, नौवां नवरात्र, नवमी तिथि , 2 अप्रैल 2020, को रहेगी. सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली देवी सिद्धिदात्री भक्तों की हमेशा रक्षा करती हैं...!🙏🙏 #chaitranavratri #chaitranavratri2020 #navratri #jaimatadi #durga #gudipadwa #maadurga #durgamaa #devi #durgapuja #navratrispecial #hindu #maa

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R.G.P.Bhardwaj Mar 25, 2020

नवरा‍त्रि का महत्त्व 〰🌼🌼🌼〰 अगर रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता नवरात्रि का अर्थ होता है, नौ रातें। हिन्दू धर्मानुसार यह पर्व वर्ष में दो बार आता है। एक शरद माह की नवरात्रि और दूसरी बसंत माह की इस पर्व के दौरान तीन प्रमुख हिंदू देवियों- पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है। जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं। प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी। तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम्। पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः। नवरात्र शब्द से 'नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध' होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते। नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे। आप अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है। इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है। वैज्ञानिक आधार नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है। अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा सेसे नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। चूंकि यहां रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन, नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं। हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर ६ माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है। चैत्र और आश्विन नवरा‍त्रि ही मुख्य माने जाते हैं इनमें भी देवी भक्त आश्विन नवरा‍त्रि का बहुत महत्व है। इनको यथाक्रम वासंती और शारदीय नवरात्र कहते हैं। इनका आरंभ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होता है। ये प्रतिपदा 'सम्मुखी' शुभ होती है। दिन का महत्व: 〰〰〰〰〰 नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है। जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्रि से ही विक्रम संवत की शुरुआत होती है। इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है। इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है। इसमें मां की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है। पहले दिन मां के शैलपुत्री स्वरुप की उपासना की जाती है। इस दिन से कई लोग नौ दिनों या दो दिन का उपवास रखते हैं। पहले दिन की पूजा का विधान: 〰〰〰〰〰〰〰〰〰 इस दिन से नौ दिनों का या दो दिनों का व्रत रखा जाता है। जो लोग नौ दिनों का व्रत रखेंगे वो दशमी को पारायण करेंगे। जो पहली और अष्टमी को उपवास रखेंगे वो नवमी को पारायण करेंगे। इस दिन कलश की स्थापना करके अखंड ज्योति भी जला सकते हैं। प्रातः और सायंकाल दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और आरती भी करें। अगर सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते तो नवार्ण मंत्र का जाप करें। पूरे दस दिन खान-पान आचरण में सात्विकता रखें। मां को आक, मदार, दूब और तुलसी बिल्कुल न चढ़ाएं। बेला, चमेली, कमल और दूसरे पुष्प मां को चढ़ाए जा सकते हैं। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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