PDJOSHI
PDJOSHI Apr 9, 2021

Chankiy Niti

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Bhawna Pandit May 15, 2021

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Aneela Lath May 15, 2021

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🇮🇳🕉 *卐 सत्यराम सा 卐* 🕉🇮🇳 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🇮🇳🇮🇳🇮🇳.🇮🇳🇮🇳🇮🇳.🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *संत बाजिंद ग्रंथावली / दातव्य कौ अंग (११.६)* *साभार स्वर संगीत ~ @Giriraj Balodia* . *धर्म करत बाजिंद बेर क्यूँ कीजिये ।* *दुनिया बदलै दान बेग उठ दीजिये ॥* *भर भर डारौ बाथ नाथ के नाँव रे ।* *हरिहाँ, जड़ काटे फल होय* *कहत सब गाँव रे ॥२॥* *बाजिंद कहता है, धर्म-पुण्य करने में देरी क्यों करनी चाहिए ? अरे दुनिया पल-पल क्षण-क्षण बदलती है । अतः शीघ्रतापूर्वक उठकर=तैयार होकर यथासामर्थ्य दान दीजिये । जितना भी है, उसमें से बाथ भर-भर=अंजली भर-भर कर परमात्मा के नाम पर दान दो । अरे ! जड़ को काटने पर ही फल होता है, ऐसा सभी लोग कहते हैं ।* https://youtu.be/Pjm0da7Jc-k https://youtu.be/Pjm0da7Jc-k

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Aneela Lath May 15, 2021

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🇮🇳🕉 *卐 सत्यराम सा 卐* 🕉🇮🇳 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🇮🇳🇮🇳🇮🇳.🇮🇳🇮🇳🇮🇳.🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *संत बाजिंद ग्रंथावली / चेतावनी कौ अंग (१०.२१)* *साभार स्वर संगीत ~ @Giriraj Balodia* . *केते अर्जुन भीम जोध जसवंत से ।* *केते गिनैं असंख बली हनुमंत से ॥२॥* *जिनकी सुन सुन हांक महागिरि फाटते ।* *हरिहाँ, तिन घर खायौ काल* *जू इंद्रहि डाँटते ॥२१॥* *जिनकी गर्जना=आवाज सुनकर महागिरी भी फट पड़ते थे और जो इंद्र को भी रण क्षेत्र में ललकारने की क्षमता रखते थे तथा ललकारा करते थे, ऐसे यश भाजन कितने ही अर्जुन और भीम जैसे योद्धा, कितने ही अगणित हनुमान जैसे बलशाली जिनकी गिनती संभव नहीं, वे भी काल द्वारा खा लिए गये । काल के प्रहार से बच नहीं सके । फिर अन्यों की क्या बिसात ।* https://youtu.be/yJP2bz3LFQQ https://youtu.be/yJP2bz3LFQQ

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Kavita Yadav May 15, 2021

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Aneela Lath May 14, 2021

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🕉🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🕉 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🚩 *पावन अक्षय तृतिया की* 🚩 🌻 *हार्दिक शुभकामनाएं* 🌻 🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳 *स्वर, संगीत ~ @श्री दास जी* *सौजन्य : अखिल भारतीय श्रीदादू सेवक समाज* 🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉 . *सूक्ष्म सौंज अर्चा बन्दगी* *दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूदं ।* *तहँ बंदे की बंदगी, जहाँ रहै मौजूदं ॥२२१॥* टीका - हे जिज्ञासुओं ! "अरवाह" कहिए, जीवात्मा के नूरी = पवित्र दिल में "माबूदं" परमात्मा बसता है । अगर ऐसे पवित्र हृदय में भक्तजन परमात्मा का स्मरण करें, तो परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है ॥२२१॥ *वाल्मीक वन में हते, मानुष कई हजार ।* *उलट नाम दियो सप्त रिषि, जपत नूर भये पार ॥* दृष्टान्त - वाल्मीकि जाति से भील थे । लूटना खसोटना, हिंसा आदि कर्म किया करते थे । एक रोज उस रास्ते से कोई मुसाफिर नहीं आया । यह उदास होकर बैठे थे । विचार किया कि आज खाने - पीने का काम कैसे चलेगा ? शाम का समय होने को आया कि उस रास्ते से इनको सात पुरुष आते दिखलाई पड़े । "मारूँगा ।" "क्यों ? हमने क्या अपराध किया ?" वाल्मीकि बिना अपराध ही मारता हूँ और उनका सब कुछ छीन लेता हूँ । उससे अपने कुटुम्ब का पालन करता हूँ । सप्तर्षि बोले - ऐसे ही ले लो, मारो मत । वाल्मीकि - ऐसे किसी ब्राह्मण को दान करो । मैं तो खून निकाल कर लेता हूँ । ऋषि बोले - "कुछ दया कर, हम लोग तपस्वी हैं ।" संतों का दर्शन और उनके वचन सुनकर अन्तःकरण में इसके कुछ अच्छी भावना जाग्रत हुई । इसका सम्पूर्ण पाप जिंदगी भर का, इसको याद आने लगा और बोला - "मुझ पापी पर दया करो, जिससे मेरा उद्धार होवे । मुझे उपदेश देओ ।" सप्तऋषि ने अधिकारी जानकर, "राम" नाम का उपदेश कर दिया और बोले - "इसका जाप करना, इससे तेरा उद्धार हो जायेगा ।" वह राम नाम में स्थित होकर राम का नाम जपने का प्रयास किया, किन्तु मुख से राम का शब्द नहीं निकला, पाप आड़े आ गये - "पापी के मुख से राम नहीं निकले", तब राम का नाम उल्टा "मरा - मरा" निकला । उसके सूधे भाव से "मरा - मरा" नाम भी सूधा होकर "राम - राम" बन गया । *"दादू" मुख की ना गहै, हिरदै की हरि लेहि ।* *अन्तर सूधा एक सौं तो बोल्यां दोस न देहि ॥* चौपाई - *उल्टा नाम जपा जग जाना,* *वाल्मीकि भये ब्रह्म समाना ॥* *(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)* https://youtu.be/827_UH9KaZs https://youtu.be/827_UH9KaZs

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संत वाणी मृत्यु के समय क्या करे ? 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 मृत्यु के समय सबसे बड़ी सेवा है - किसी भी उपाय से मरणासन्न रोगी का मन संसार से हटा कर भगवान् में लगा देना | इसके लिए :- १.👉 उसके पास बैठ कर घर की, संसार की, कारोबार की, किन्ही में राग द्वेष हो तोह उनकी ममता के पदार्थो की तथा अपने दुःख की चर्चा बिलकुल न करे | २.👉 जब तक चेत रहे, भगवान् के स्वरुप की, लीला की तथा उनके तत्त्व के बात सुनाये, श्रीमद्भगवत गीता का {सातवे,नवे, बारहवे, चौदहवे, पन्द्रहवे अध्याय का विशेष रूप से} अर्थ सुनावे | भागवत के एकादश स्कंध,योगवाशिष्ट का वैराग्य प्रकरण, उपनिषदों के चुने हुए स्थलों का अर्थ सुनावे | नाम कीर्तन में रूचि हो तोह नाम कीर्तन करे या संतो भक्तों के पद सुनाये | जगत के प्राणी पदार्थो की , राग द्वेष उत्पन्न करने वाली बात, ममता मोह को जगाने वाली बात तथा बढ़ाने वाली चर्चा भूल कर भी न करे | ३.👉 रोगी को भगवान् के साकार रूप का प्रेमी हो तोह उसको अपने इष्ट - भगवान् राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, गणेश- किसी भी भगवत रूप का मनोहर चित्र सतत दिखाते रहे | निराकार निर्गुण का उपासक हो तोह उसे आत्मा या ब्रह्म के सच्चिदानंद अद्वेत तत्व के चर्चा सुनाये | ४👉 उस स्थान को पवित्र धूप धुए ,कपूर से सुगन्धित रखे , कपूर या घी के दीपक के शीतल परमोज्व्ल ज्योति उसे दिखावे | ५.👉 समर्थ हो और रूचि हो तोह उसके द्वारा उसके ईस्ट भगवत्स्वरूप की मूर्ती का पूजन करवावे | ६.👉 कोई भी अपवित्र वास्तु या दवा उसे न दे | चिकित्सको की राय हो तो भी उसे ब्रांडी (शराब) नशीली तथा जान्तव पदार्थो से बनी ऐलोपथी , होम्योपैथी दअवा बिलकुल न दे | जिन आयुर्वेदिक दवा में अपिवित्र तथा जान्तव चीजे पड़ी हो , उनको भी न दे | ने खान पान में अपवित्र तामसी तथा जान्तव पदार्थ दे | ७.👉 रोगी के क्षमता के अनुसार गंगाजल का अधिक से अधिक या कम पान करावे | उसमे तुलसी के पते अलग पीस कर छानकर मिला दे | यो तुलसी मिश्रित गंगाजल पिलाता रहे | ८👉 गले में रूचि के अनुसार तुलसी या रूद्राक्ष के माला पहना दे | मस्तक पर रूचि के अनुसार त्रिपुंड या उधृरपुंड तिलक का पवित्र चन्दन से - -गोपीचंदन आदि से कर दे | अपवित्र केसर का तिलक न करे | ९👉 रोगी के निकट राम रक्षा या मृत्युंजय स्रोत्र का पाठ करे | एकदम अंतिम समय में पवित्र 'नारायण' नाम की विपुल ध्वनि करे | १०.👉 रोगी को कस्ट का अनुभव न होता दीखे तोह गंगाजल या शुद्ध जल से उसे स्नान करा दे | कष्ट होता हो तोह न करावे | ११.👉 विशेष कस्ट न हो ताहो जमीं को धोकर उस पर गंगाजल ( हो तो ) के छींटे देकर भगवान्कानाम लिखकर गंगा की रज या व्रजरज दाल कर चारपाई से निचे सुला दे | १२.👉 मृत्यु के समय तथा मृत्यु के बाद भी 'नारायण' नाम की याअपने ईस्टभगवान् के तुमुल धवनि करे | जब तक अर्थी चली न जाये ,तब तक यथा शक्य कोई घरवाले रोये नहीं | १२.👉 उसके शव को दक्षिण की और पैर करके सुला दे | तदन्तर सुद्ध जल से स्नान करवाकर, नविन धुला हुआ वस्त्र पहनाकरजातिप्रथा के अनुसार शव यात्रा ले जाये ; पर पिंडदान का कार्य जानकार विद्वान के द्वारा अवस्य कराया जाये | शमशान में भी पिंडदान तथा अग्नि संस्कार का कार्य शास्त्र विधि के अनुसार किया जाये | रास्ते भर भगवन्नाम की ध्वनि, 'हरीबोल' 'नारायण-नारायण' के ध्वनि होती रहे | शमशान में भी भाग्वत चर्चा ही हो | ( संत-वाणी "नित्यलीलालीन श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसाद पोद्धार" पुस्तक- "दुःख में भगवतकृपा", गीताप्रेस गोरखपुर !) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Aneela Lath May 14, 2021

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🕉🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🕉 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🚩 *पावन अक्षय तृतिया की* 🚩 🌻 *हार्दिक शुभकामनाएं* 🌻 🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳 *स्वर, संगीत ~ @श्री दास जी* *सौजन्य : अखिल भारतीय श्रीदादू सेवक समाज* 🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉 . *दादू नूरी दिल अरवाह का, तहँ खालिक भरपूरं ।* *आली नूर अल्लाह का, खिदमतगार हजूरं ॥२२२॥* टीका - हे जिज्ञासुओं ! जीवात्मा के पवित्र हृदय में ही परमेश्वर ज्योति स्वरूप में स्थित है । इसलिए परमेश्वर के दर्शनों के लिए "खिदमतगार" कहिए, भक्ति करने वाले भक्तजन प्रति क्षण हजूरी में रहकर स्मरण करते हैं ॥२२२॥ *(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)* https://youtu.be/Si-Pi0Ot8rE https://youtu.be/Si-Pi0Ot8rE

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मूर्तिपूजा का इतिहास, जानिए? 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ मूर्तिपूजकों तथा मूर्तिभंजकों के संघर्षों से इतिहास भरा पड़ा है। प्रारंभ में मूर्तिपूजकों के धर्म ही थे। मूर्तिपूजकों के धर्म के अंतर्गत ही मूर्तिभंजकों की एक धारा भी प्राचीनकाल से चली आ रही थी। मूर्तियां तीन तरह के लोगों ने बनाईं- एक वे जो वास्तु और खगोल विज्ञान के जानकार थे, तो उन्होंने तारों और नक्षत्रों के मंदिर बनाए। ऐसे दुनियाभर में सात मंदिर थे। दूसरे वे, जो अपने पूर्वजों या प्रॉफेट के मरने के बाद उनकी याद में मूर्ति बनाते थे। तीसरे वे, जिन्होंने अपने-अपने देवता गढ़ लिए थे। हर कबीले का एक देवता होता था। कुलदेवता और कुलदेवी भी होती थी। शोधकर्ताओं के अनुसार अरब के मक्का में पहले मूर्तियां ही रखी होती थीं। वहां उस काल में बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह और महाराजा बलि सहित लगभग 360 मूर्तियां रखी हुई थीं। ऐसा माना जाता है हालांकि इसमें कितनी सचाई है यह हम नहीं जानते कि जाट और गुर्जर इतिहास अनुसार तुर्किस्तान पहले नागवंशियों का गढ़ था। यहां नागपूजा का प्रचलन था। भारत में वैसे तो मूर्तिपूजा का प्रचलन पूर्व आर्य काल (वैदिक काल) से ही रहा है। भगवान कृष्ण के काल में नाग, यक्ष, इन्द्र आदि की पूजा की जाती थी। वैदिक काल के पतन और अनीश्वरवादी धर्म के उत्थान के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ गया। वेद काल में न तो मंदिर थे और न ही मूर्ति, क्योंकि इसका इतिहास में कोई साक्ष्य नहीं मिलता। इन्द्र और वरुण आदि देवताओं की चर्चा जरूर होती है, लेकिन उनकी मूर्तियां थीं इसके भी साक्ष्य नहीं मिलते हैं। भगवान कृष्ण के काल में लोग इन्द्र नामक देवता से जरूर डरते थे। भगवान कृष्ण ने ही उक्त देवी-देवताओं के डर को लोगों के मन से निकाला था। इसके अलावा हड़प्पा काल में देवताओं (पशुपति-शिव) की मूर्ति का साक्ष्य मिला है, लेकिन निश्चित ही यह आर्य और अनार्य का मामला रहा होगा। प्राचीन अवैदिक मानव पहले आकाश, समुद्र, पहाड़, बादल, बारिश, तूफान, जल, अग्नि, वायु, नाग, सिंह आदि प्राकृतिक शक्तियों की शक्ति से परिचित था और वह जानता था कि यह मानव शक्ति से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है इसलिए वह इनकी प्रार्थना करता था। बाद में धीरे-धीरे इसमें बदलाव आने लगा। वह मानने लगा कि कोई एक ऐसी शक्ति है, जो इन सभी को संचालित करती है। वेदों में सभी तरह की प्राकृतिक शक्तियों का खुलासा कर उनके महत्व का गुणागान किया गया है। हालांकि वेदों का केंद्रीय दर्शन 'ब्रह्म' ही है। पूर्व वैदिक काल में वैदिक समाज जन इकट्ठा होकर एक ही वेदी पर खड़े रहकर ब्रह्म (ईश्वर) के प्रति अपना समर्पण भाव व्यक्त करते थे। वे यज्ञ द्वारा भी ईश्वर और प्रकृति तत्वों का आह्वान और प्रार्थना करते थे। बाद में धीरे-धीरे लोग वेदों का गलत अर्थ निकालने लगे। हिन्दू धर्म मूलत: अद्वैतवाद और एकेश्वरवाद का समर्थक है जिसका मूल ऋग्वेद, उपनिषद और गीता में मिलता है। अथर्ववेद की रचना के बाद हिन्दू समाज में दो फाड़ हो गई- ऋग-यजु और साम-अथर्व। इस तरह वेदों में ईश्वर उपासना के दो रूप प्रचलित हो गए- साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि ऋषि-मनीषियों ने दोनों उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया था। शिवलिंग की पूजा का प्रचलन अथर्व और पुराणों की देन है। शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन हिन्दू-जैन धर्म में बढ़ने लगा। बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां बनाई जाने लगीं। मान्यता के अनुसार महाभारत काल तक अर्थात द्वापर युग के अंत तक देवी और देवता धरती पर ही रहते थे और वे भक्तों के समक्ष कभी भी प्रकट हो जाते थे। तब उनके साक्षात रूप की पूजा या प्रार्थना होती थी। लेकिन कलयुग के प्रारंभ होने के बाद उनके विग्रह रूप की पूजा होने लगी। विग्रह रूप अर्थात शिवलिंग, शालिग्राम, जल, अग्नि, वायु, आकाश और वृक्ष रूप आदि की। अब सवाल यह उठता है कि हिन्दू धर्म के धर्मग्रंथ वेद, उपनिषद और गीता भी मूर्ति पूजा को नहीं मानते हैं तो हिन्दू क्यों मूर्ति या पत्थर की पूजा करते हैं और इस पूजा का प्रचलन आखिर कैसे, क्यूं और कब हुआ? भारत में जो लोग अनीश्वरवादी थे, वे निराकार ईश्‍वर को नहीं मानते थे। उन्होंने अपने प्रॉफेटों, पूर्वजों आदि की मूर्तियां बनाकर उन्हें पूजना आरंभ कर दिया। इन अनीश्वरवादियों में जैन, चार्वाक, न्यायवादी आदि धर्म के लोग थे। महावीर स्वामी और बुद्ध के जाने के बाद मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा और हजारों की संख्या में संपूर्ण देश में जैन और बौद्ध मंदिर बनने लगे। जिसमें बुद्ध और महावीर की मूर्तियां रखकर उनकी पूजा होने लगी। इन मंदिरों में हिन्दू भी बड़ी संख्या में जाने लगा जिसके चलते बाद में राम और कृष्ण के मंदिर बनाए जाने लगे और इस तरह भारत में मूर्ति आधारित मंदिरों का विस्तार हुआ। मूर्तिपूजा का पक्ष : मूर्तिपूजा के समर्थक कहते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने में मूर्तिपूजा रास्ते को सरल बनाती है। मन की एकाग्रता और चित्त को स्थिर करने में मूर्ति की पूजा से सहायता मिलती है। मूर्ति को आराध्य मानकर उसकी उपासना करने और फूल आदि अर्पित करने से मन में विश्वास और खुशी का अहसास होता है। इस विश्वास और खुशी के कारण ही मनोकामना की पूर्ति होती है। विश्वास और श्रद्धा ही जीवन में सफलता का आधार है। प्राचीन मंदिर ध्यान या प्रार्थना के लिए होते थे। उन मंदिरों के स्तंभों या दीवारों पर ही मूर्तियां आवेष्टित की जाती थीं। मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं होता था। यदि आप खजुराहो, कोणार्क या दक्षिण के प्राचीन मंदिरों की रचना देखेंगे तो जान जाएंगे कि ये मंदिर किस तरह के होते हैं। ध्यान या प्रार्थना करने वाली पूरी जमात जब खत्म हो गई है तो इन जैसे मंदिरों पर पूजा-पाठ का प्रचलन बढ़ा। पूजा-पाठ के प्रचलन से मध्यकाल के अंत में मनमाने मंदिर बने। मनमाने मंदिर से मनमानी पूजा-आरती आदि कर्मकांडों का जन्म हुआ, जो वेदसम्मत नहीं माने जा सकते। मूर्तिपूजा के पक्ष में हैं- 'जड़ (मूल) ही सबका आधार हुआ करती है। जड़ सेवा के बिना किसी का भी कार्य नहीं चलता। दूसरे की आत्मा की प्रसन्नतापूर्वक उसके आधारभूत जड़ शरीर एवं उसके अंगों की सेवा करनी पड़ती है। परमात्मा की उपासना के लिए भी उसके आश्रय स्वरूप जड़ प्रकृति की पूजा करनी पड़ती है। हम वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, प्रकाश आदि की उपासना में प्रचुर लाभ उठाते हैं, तब मूर्तिपूजा से क्यों घबराना चाहिए? उसके द्वारा तो आप अणु-अणु में व्याप्त चेतन (सच्चिदानंद) की पूजा कर रहे होते हैं। आप जिस बुद्धि को या मन को आधारभूत करके परमात्मा का अध्ययन कर रहे होते हैं, क्यों वे जड़ नहीं हैं? परमात्मा भी जड़ प्रकृति के बिना कुछ नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं रच सकता। तब सिद्ध हुआ कि जड़ और चेतन का परस्पर संबंध है। तब परमात्मा भी किसी मूर्ति के बिना उपास्य कैसे हो सकता है? वैसे तो पूरा विश्व ही मूर्तिपूजक है। पंचभूतों से निर्मित किसी आकार पर श्रद्धा स्थिर करना मूर्तिपूजा है। मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, पुस्तक, आकाश इत्यादि सभी मूर्तिपूजा के अंतर्गत हैं। कौन मूर्तिपूजक नहीं है? यह एक निर्विवाद सत्य है कि भारत में सबसे अधिक मूर्तियां हैं, मंदिर हैं; किंतु भारत मूर्तिपूजक नहीं है। ये मंदिर, मूर्तियां आध्यात्मिक देश भारत में अध्यात्म की शिशु कक्षाएं हैं। मारकंडेय पुराण में वर्णित कथानक ही देवी मृतिका मूर्ति पूजा का आधार है। परब्रह्म परमात्मा सर्वविश्व में निहित है। इसलिए मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा कर मूर्ति का प्रचलन अनादि काल से चला आ रहा है। वेदों की ऋचाओं में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश में निहित प्राण सत्ता में ईश्वरीय सत्ता की अभिव्यक्ति है। पौराणिक युग में इसे विग्रह के रूप में स्थापित कर पूजन प्रारंभ हुआ। मारकंडेय पुराण के अनुसार राजा और वैश्य जो महामोह से ग्रसित थे, देवी की मूर्ति बनाकर आराधना करने लगे। राजा को राज्य व वैश्य को ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस प्रकार वह देवी लौकिक व पारलौकि दोनों अभिष्टों को प्रदान करने वाली मानी गई। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️🌼

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