INDRESH KUMAR SHARMA
INDRESH KUMAR SHARMA Nov 25, 2020

🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🌷 🌷🌷🌷🌷👏👏🌷🌷🌷

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कामेंट्स

jai shree kirshna kirshna Nov 25, 2020
see all friends good night Jai shree krishna krishna 🙏🙏 ahemdabad Gujratसुप्रभात

R.Mohan Patidar Nov 25, 2020
jai shree Radhe krishna ji good night ji thanks you 🌹🌺

Meera gupta Nov 25, 2020
🙏🕉️ nmo bhagwate vasudevay namah 🙏💐🌹🐚🍀🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔👋

Subhash Singh Nov 25, 2020
🙏🌹 शुभ रात्रि वंदन जय श्री हरि विष्णु जय श्री कृष्णा राधे राधे अच्छी सोच और सच्ची भावना यही जिंदगी की सच्ची संपत्ति है जय श्री राम🌹🙏

🙏🌹Vanita Kale Nov 25, 2020
🙏 🌹 शुभ रात्रि वंदन मेरे आदरणीय भाई जी और मेरी प्यारी प्यारी बहना जी 🌹🙏🌹 तुलसी विवाह देवउठनी एकादशी देव दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं...!!🙏 तुलसी तुलसी सब कहे तुलसी बन की घास कृपा हुई शालिग्राम के पत्थर पर हरियाऐ..!!🙏 कार्तिक मास शुक्ल पक्ष देवउठनी एकादशी भगवान शालिग्राम माता तुलसी विवाह वर्षगांठ की ढेर सारी बधाई 👏🙏 आप सभी भक्तजनको.. हे प्रभु अपने जोड़े जैसा... सब की जोड़ी... सलामत रखना..👏🙏🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

madan pal 🌷🙏🏼 Nov 25, 2020
óm namoh bhagvate vasudev namh jii subh ratri Jiiii Laxmi Narayan Ki karpa AAP v aapka pariwar par bani rahe jiii 🌷🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Seema Sharma. Himachal (chd) Nov 25, 2020
💥 *विशेष - हर एकादशी को श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से घर में सुख शांति बनी रहती है lराम रामेति रामेति । रमे रामे मनोरमे ।। सहस्त्र नाम त तुल्यं । राम नाम वरानने ।।* शुभ रात्रि जी 🙏😊🌹🙏

Neha Sharma, Haryana Nov 25, 2020
🙏 प्रबोधनी एकादशी और तुलसी विवाह 🙏 🙏🌹की आपको और आपके परिवार को हार्दिक बधाई शुभकामनाएं ।🌹🙏 🙏🌹🌷 जय श्री राधेकृष्णा🌷🌹🙏 🙏🌹 शुभ रात्रि नमन🌹🙏

Seema soni Nov 25, 2020
good night ji Jai Shri Krishna ji 🙏🙏🌹🌹

P L Chouhan bwr Nov 25, 2020
Jai jai shree Gajanand Om namo vakratunday lambodhar Vikatnav Vinayak Ji Maharaj namohnamah

Sushil Kumar Sharma 🙏🙏🌹🌹 Nov 25, 2020
Good Night My Bhai ji 🙏🙏 Om Namo Bhagwate Vasudevay Namah 🙏🙏🌹💐🌹 Aapko Happy Dev Prabodhini Gyaras Our Tulsi Vivah Ki Hardik Shubhkamnaye ji 🙏🙏🌹💐🌷💐🌹🌹💐🌷🌷🌷💐🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹.

Jai Mata Di Jan 16, 2021

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Gopalchandra porwal Jan 16, 2021

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Neha Sharma, Haryana Jan 16, 2021

🌸*जय श्री राधेकृष्णा*🙏*शुभ रात्रि नमन*🌸 🌸🙏"एक संत की वसीयत"🙏🌸 *ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज गीताभवन, स्वर्गाश्रम में ग्रीष्म-ऋतु में प्रतिवर्ष पधारकर लोगों को सत्संग का लाभ देते रहे। अपनी जीवन--लीला के अन्तिम लगभग सवा चार वर्ष तक वे लगातार गीताभवन में ही रहे और १०० वर्ष से अधिक की आयु में भी निरन्तर सत्संग करवाते रहे। त्याग एवं वैराग्य को मूर्ति श्रीस्वामीजी महाराज की वसीयत साधकों के लिये आदर्श एवं अनुकरणीय है। ॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥ एक संत की वसीयत पोस्ट - 01 श्रीभगवान् की असीम, अहैतुकी कृपा से ही जीव को मानव शरीर मिलता है। इसको एकमात्र उद्देश्य केवल भगवत्प्राप्ति ही है। परंतु मनुष्य इस शरीर को प्राप्त करने के बाद अपने मूल उदेश्य को भूलकर शरीर के साथ दृढ़ता से तादात्म्य कर लेता है और इसके सुख को ही परम सुख मानने लगता है। शरीर को सत्ता और महत्ता देकर उसके साथ अपना सम्बन्ध मान लेने के कारण उसका शरीर से इतना मोह हो जाता है कि इसका नाम तक उसको प्रिय लगने लगता है। शरीर के सुखों में मान-बड़ाई का सुख सब से सूक्ष्म होता है। इसकी प्राप्ति के लिये वह झूठ, कपट, बेईमानी आदि दुर्गुण- दुराचार भी करने लग जाता है। शरीर के नाम में प्रियता होने से उसमें दूसरों से अपनी प्रशंसा, स्तुति की चाहना रहती है। वह यह चाहता है कि जीवनपर्यन्त मेरे को मान-बड़ाई मिले और मरने के बाद मेरे नाम की कीर्ति हो। वह यह भूल जाता है कि केवल लौकिक व्यवहार के लिये शरीर का रखा हुआ नाम शरीर के नष्ट होने के बाद कोई अस्तित्व नहीं रखता। इस दृष्टि से शरीर की पूजा, मान-आदर एवं नाम को बनाये रखने का भाव किसी महत्त्व का नहीं है। परंतु शरीर का मान-आदर एवं नाम की स्तुति प्रशंसा का भाव इतना व्यापक है कि मनुष्य अपने तथा अपने प्रियजनों के साथ तो ऐसा व्यवहार करते ही हैं, प्रत्युत जो भगवदाज्ञा, महापुरुषवचन तथा शास्त्रमर्यादा के अनुसार सो हृदय से अपने लक्ष्य (भगवत्प्राप्ति)-में लगे रहकर इन दोषो से दूर रहना चाहते हैं, उन साधकों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करने लग जाते हैं। अधिक क्या कहा जाय, उन साधकों का शरीर निष्प्राण होने पर भी उसकी स्मृति बनाये रखने के लिये वे उस शरीर को चित्र में आबद्ध करते हैं एवं उसको बहुत ही साज-सज्जा के साथ अन्तिम संस्कार-स्थल तक ले जाते हैं। विनाशी नाम को अविनाशी बनाने के प्रयास में वे उस संस्कार-स्थल पर छतरी, चबूतरा या मकान (स्मारक) आदि बना देते हैं। इसके सिवाय उनके शरीर से सम्बन्धित एकपक्षीय घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर उनको जीवनी, संस्मरण आदि के रूप में लिखते और प्रकाशित करवाते हैं। कहने को तो वे अपने-आपको उन साधकों का श्रद्धालु कहते हैं, पर काम वही करते हैं, जिसका वे साधक निषेध करते हैं। ----------:::×:::---------- क्रमशः.... *विपत्ति में सहायता* *सब जानेत प्रभु प्रभुता सोई। *तदपि कहे बिन रहा न कोई॥ *सं० १९५० की घटना है। वैशाख का महीना था, कुछ यात्री माहिष्मती से श्रीजगदीशजी जा रहे थे। मैं पहले से ही प्रवास में था। चोली महेश्वर से मैं भी इस दल के साथ हो गया, विद्यार्थी ब्रजलाल मेरे साथ था। हम लोग नर्मदा के तट पर घूमते हुए दक्षिण की ओर मध्यप्रदेश के सघन वन में चले गये। हमारे साथी बड़े सजन थे। पं० रामनारायणजी मुख्य पथ-प्रदर्शक थे सबका सामान ढोने के लिये एक मजदूर था। धोती, पुस्तक वगैरह आवश्यकीय वस्तुएँ हम लोगों के पास थीं। सायंकाल तक हम एक ऊँचे पर्वत की तलेटी में पहुँचे। वहाँ जंगल-विभाग की एक चौकी थी, उसमें दो मनुष्य रहते थे। सुहावना जंगल था, पास ही फलों से भरी सुन्दर हरित वृक्षश्रेणियाँ थीं और एक स्वच्छ जलाशय था। आज यहीं ठहर गये। स्नान, सन्ध्या और भोजनादि से निपटकर सोने के लिये वृक्षों के नीचे बिस्तर लगा लिये। वृक्षों की हरियाली थी, ठण्डी वायु बह रही थी, ब्रजवासी पं० सरयूशरणजी ने व्रजभाषा के दो एक मनोहर पद्म सुनाये और फिर बड़े प्रेमसे जगन्नाथाष्टक गाने लगे। मुझे भी उमंग आ गयी, मैं और व्रजलाल भी उनके साथ गाने में तन्मय हो गये। कुछ समय भगवत्-चर्चा में बीत गया। "चौकीदार बड़े भले आदमी थे। उन्होंने कहा कि 'कल आप लोगों को इस पहाड़ पर बीस मील चलना पड़ेगा। रास्ते में दूकान या गाँव नहीं है, न कहीं पानी ही मिलेगा, फिर गर्मी का मौसम है, अत: आप लोग सबेरे पाँच बजे नित्यकर्म, जलपान आदि करके अपने साथ जल लेकर यहाँ से रवाना हो जाइयेगा। भयंकर जंगल है, सावधानी से जाना पड़ेगा।' यह सुनकर सब चुपचाप हो सो गये। प्रात:काल सबने स्नानादि करके जल के लोटे भर लिये और जय जगदीश' कहकर यात्रा आरम्भ कर दी। "पर्वत पर पगडंडी गयी थी, दोनों ओर ढालू जगह थी। हम लोग दो-चार मील तो हँसी-मजाक में ही चढ़ गये। पर अब आठ बज चुके थे, कड़ी धूप नहीं थी, पर दोपहर की आने वाली धूप को सोचकर बलवान् साथी चुपचाप आगे बढ़ने लगे। साथियों की किसको खबर? सूर्य की प्रचण्ड किरणों से पर्वत के पत्थर तपने लगे थे, वृक्षों के भी पत्ते गिर रहे थे, कहीं शीतल छाया नहीं थी। गरम लू चल रही थी। सब पसीने से तर हो रहे थे। सबको अपनी लगी थी। मैं और व्रजलाल सबसे पीछे रह गये। साथी मीलों आगे निकल गये, इस समय हम लोग शायद दस मील बढ़े थे। "पैर आगे नहीं बढ़े, भारी हो गये। दोपहर का समय था। व्रजलाल घबड़ाकर एक पलास-गाछ के नीचे बैठ गया, वह मुझसे भी कोमल था। अब पुस्तक वगैरह को एक तरफ रख मैं भी वहीं बैठ गया। जल प्राय: आधा पी चुके थे। एक कदम आगे बढ़ना कठिन ही नहीं, दुष्कर-सा था। व्रजलाल थकावट से वहीं सो गया। उस विशाल वन में मैं अकेला जग रहा था। पर्वत पर कहीं योजनों लम्बी झील दिखलायी पड़ रही थी तो कहीं दावानल का घुआँ बड़े जोर से उठ रहा था। बीच-बीच में गुफाओं से गरजने को आवाज सुन में चौंक पड़ता था! हम दोनों के पास तीन सौ के करीब रुपये कमर में बँधे थे। मैं इस कठिन यात्रा का अनुभव कर चिन्तित-सा हो रहा था। भयंकर वन में न किसी पथिक के दर्शन, न कोई ढाढ़स देने वाला था, हम दो नये अनजान यात्री पड़े थे। अभी पाँच कोस रास्ता चलना था, जल लाने का कोई उपाय नहीं, हमारे पास थोड़ा-सा जल बचा था, भूख बड़े जोरों से लग रही थी। चारों ओर केवल वन और नीलाकाश दिखलायी पड़ता था। मेरी चिन्ता बढ़ रही थरी। इतने में सामने से उसी पगडंडी पर एक भयानक भील कुल्हाड़ी लिये आता दिखलायी पड़़ा। उसकी आँखें लाल थीं और चाल में बड़ी तड़क-भड़क थी। मैंने सोचा, जरूर यह डाकू है। व्रजलाल को धीरे से जगाया और कहा, 'यह देखो, लुटेरा आ गया, अब हम नहीं बचेंगे। व्रजलाल घबराकर काँपने लगा। मैं भी धैर्यच्युत हो गया था वह हमरे नजदीक अपनी पीठ पर की गठरी नीचे रखकर बैठ गया। *व्रजलाल ने कहा- 'भाई! हमारे पास जो है वह ले लो, पर हमें जानसे मत मारो।' यह सुनकर वह मुस्कराया और बोला- 'हमें थोड़ा पानी पिलाओ। मेरे होश उड़ गये, क्योंकि यह थोड़ा ही पानी ही हमारा जीवन था, पर भगवान् का भरोसाकर मैंने पानी पिला दिया। यही खैर थी कि दूसरे लोटे का पानी उसने नहीं माँगा। अब उसने अपनी गठरी खोली। उसमें केले थे। मुझे और व्रजलाल को आठ-आठ केले देकर उसने कहा- 'खा लो।' हम भूखे थे ही, उसकी यह प्यारी बोली सुन, भगवान् को अर्पणकर केले खा गये। तृप्ति के साथ ही आत्मा में शान्ति मालूम हुईं। फिर दूसरी बार उसने मुस्कराकर उतने ही केले हमें और दिये और कहा 'जब भूख लगे तो इन्हें खा लेना। डरो मत, वह देखो 'चीखलता' पास ही है, वहीं जल मिलेगा। तुम्हारे चार साथी आगे कुछ दूर पर बैठे हैं। उनमें पं० रामनारायण ने मुझे कहा है कि दो लड़के तुम्हें रास्ते में मिलेंगे, उन्हें जल्दी भेज देना, अतः जाओ, तुम्हारे साथी शीध्र ही मिल जायँगे।' मुझे उसकी दयालुता पर मुग्ध हो कुछ भी कहने का साहस नहीं हुआ वह हमें समझाकर चलता बना और थोड़ी दूर चलने के बाद फिर दिखलायी नहीं पड़ा। *अब हममें बल आ गया। निर्भय-से हो गये। कुछ विनोद की बातें भी होने लों। भूख-प्यास मिट गयी। झपाटे से चढ़ने लगे। लगभग एक बजे चले थे और पाँच बजे तक ऊपर चढ़ गये। वहाँ शिखर पर एक पुराना किला था और पास ही फला-फूला गूलर का वृक्ष था। वहाँ पहुँचते ही पेड़ पर कोलाहल सुनायी पड़ा। वे कह रहे थे- 'आओ भाई, आप लोग आ गये?' हम लोग बड़े हैरान थे कि इतनी देर कहाँ हो गयी?' बोली से व्रजलाल ने साथियों को पहचान लिया। वे गूलर खा रहे थे पं० रामनारायणजी ने कहा 'क्या करें, प्यास के भय से हम आगे चले आये। आप पीछे रह गये, क्षमा करें। भूखें होंगे, हम फल फेंकते हैं इन्हें खाइये, यहाँ से गाँव दो मील दूर है। अभी थोड़ा विश्राम करके चलेंगे। *ये बातें सुन ब्रजलाल ने हँसकर मुझसे कहा, 'देखो भाई, हमें अनजान भयानक जंगल में छोड़ ये यहाँ गूलर के फल खा रहे हैं और फिर जोर से कहा- 'पण्डितजी ! आप तो उपदेशक हैं फिर इन भुनगों से भरे गूलर के फलों को कैसे पावन कर रहे हैं ?' यह सुन पण्डितजी जरा लज्जित-से हो गये और बोले- 'भाई! भूखा क्या पाप नहीं करता? फिर भी हम फल को तोड़कर फूँक से भुनगों को उड़ा देते हैं और फिर खाते हैं, तुम भी भूखे हो, कुछ खा लो न?' व्रजलाल ने मुझको इशारा किया और दोनों ने केले की फली निकालकर दिखलायी कि हमारे पास तो ये हैं हम क्यों गूलर खाने जायें ? खूब केले खाये हैं, क्या आपको नहीं मिले ? *पं० रामनारायणजी नीचे उतर आये। साथी भी उनके पीछे-पीछे आ गये। आते ही उन्होंने पूछा- 'ये केले कहाँ मिले ? रास्ते में तो जंगल के सिवा और कुछ भी नहीं था।' मैंने कहा- 'आपने जिस मनुष्य से सन्देश कहला भेजा था, उसी ने आठ-आठ केले हमें खिलाये और उतने ही हमारे साथ बाँध दिये। वे र्क्खे हैं । मेरी बात सुन सब आश्चर्यचकित हो गये कहने लगे- 'जगदीश की शपथ, रास्ते में हमें कोई मनुष्य नहीं मिला और न हमने किसी से सन्देश कहलवाया। आप मजाक कर रहे हैं। *मैंने पं० रामनारायणजी का हाथ पकड़कर कहा- 'पण्डितजी ! क्या मैं आपसे मजाक कर सकता हूँ ? जगदीश-यात्रा में आपसे जो कुछ कहा है बिल्कुल सच है। सुनकर पं० सरयूशरणजी स्तब्ध-से हो गये! इस बात का सब पर प्रभाव पड़ा। सभी गहरे विचार में डूब गये। मैं तो अभी तक उसे जंगली पथिक समझ रहा था अब मेरा हृदय भी डावाँडोल होने लगा। रास्ते में साथियों से न मिलकर उसने उनकी संख्या और नाम कैसे बतला दिये ? प्रभु की अद्भुत लीला थी। "इसी समय पं० सरयूशरणजी ने रोते हुए केले माँगे, मैंने सोलहों केले उनके सामने रख दिये। सबने दो-दो केले उठा लिये, पं० सरयूशरणजी तो छिलके सहित खा गये। बाकी केले हमारे लिये बच गये। *मेरे हृदय में हिलोरें उठने लगे, हृदय भर आया। वियोग से रहा नहीं गया, मैं रो पड़ा और कहने लगा- 'वे दयासिन्धु केले खिलाने वाले कौन थे, जिन्होंने जल पीकर हमें ढाढस बँधाया, नयी शक्ति का सञ्चार कर इस पर्वत पर पहुँचा दिया। वे पतितपावन प्रभु कहाँ गये ? मैं बार-बार इसी प्रकार कहकर रोने लगा। पं० सरयूशरणजी ने मुझे हृदय से लगाकर कहा- 'वे दयासागर थे, घट-घट की जानने वाले अन्तर्यामी प्रभु थे। हम लोगों ने आप दोनों को अकेले छोड़कर जो अपराध किया है उसे क्षमा करो और अब कुछ न बोलो।' *मैं चुप हो गया। बाकी केले मित्रों में बँट गये। मैंने प्रेमवश एक रख लिया था। वह बहुत दिनों तक सूखता रहा, पर अब चालीस वर्ष तक कैसे रहता ? फिर भी उसका चूर्ण एक डब्बी में अब भी सुरक्षित पवित्र स्थान में रक्खा है। हमारे दुःख में सहायता पहुँचाने वाले ये कौन थे, यह तो प्रभु ही जानते हैं। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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Asha-Bakshi Jan 16, 2021

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Gopal Jalan Jan 16, 2021

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Gopal Jalan Jan 16, 2021

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