Garima Gahlot Rajput
Garima Gahlot Rajput Apr 12, 2021

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शाखाहार द ग्रेट 🌹👏🚩 खीरा शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। साथ ही यह बढ़े हुए यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। ऐसे में आप खीरे के जूस का सेवन कर सकते हैं। आज की अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण जो समस्याएं पहले बड़े-बुजुर्गों को हुआ करती थीं, वह अब युवाओं को होने लगी हैं। ऐसी ही एक समस्या है यूरिक एसिड की। शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा तब बढ़ती है, जब किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है। इसके कारण यूरिक एसिड हड्डियों के बीच में इक्ट्ठा होने लगता है, जिससे जोड़ों में दर्द, गठिया-बाय, गाउट, हाथों-पैरों की उंगलियों में दर्द, उठने-बैठने में तकलीफ जैसी शारिरिक परेशानियां होने लगती हैं। बता दें, खून में यूरिक एसिड बढ़ने के कारण इसके छोटे-छोटे टुकड़े जोड़ों, टेंडन, मांसपेशियों और टिश्यूज में क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगते हैं। केवल इतना ही नहीं यूरिक एसिड के मरीजों को किडनी फेलियर और हार्ट अटैक जैसी जानलेवा दिक्कतें हो सकती हैं। बता दें, शरीर में बढ़े हुए यूरिक एसिड की स्थिति को हाइपरयूरिसेमिया कहा जाता है। हालांकि, घरेलू उपायों के जरिए यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए आप घर में बनें ऐसे जूस का सेवन कर सकते हैं, जो यूरिक एसिड की मात्रा को कंट्रोल करने में कारगर हैं। -टमाटर का सूप: शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए विटामिन-सी युक्त चीजों का सेवन करना चाहिए। विटामिन-सी उन चीजों में होता है, जो खाने में खट्टी लगती हैं। ऐसे में आप टामाटर के सूप का सेवन कर सकते हैं। इसके लिए टमाटर का मिक्सी में जूस निकाल लें। फिर इसमें हल्का काला नमक डालकर नियमित तौर पर सेवन करें। -खीरे का जूस: खीरा शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। साथ ही यह बढ़े हुए यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। इसके लिए खीरे को काट लें फिर इसे मिक्सी में डालें। उसमें एक गिलास पानी और काला नमक मिलाएं। इस मिश्रण को पीसने के बाद जूस को पिएं। -धनिये का जूस: धनिये में कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री रैडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं। ऐसे में धनिये के जूस का सेवन करने से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। जय श्री गुरुदेव जय श्री गजानन जय श्री भोलेनाथ जय श्री पार्वती माता की 🌹 नमस्कार 🙏 शुभ प्रभात वंदन 👣 🌹 🌅👏🚩शुभ बुधवार ॐ गं गणपतये नमः 👏 मांस मच्छी मत खाओ शाखाहारी बनो धर्म का हर पल पालण करो धष्टपुष्ट बनो अपना सनातन धर्म ☸ बढायें रोग भगाओ जय हिंद जय भारत वंदेमातरम 💐 🚩 आप का हर पल शुभ रहे मस्त रहे सदा स्वस्थ रहे नमस्कार 🙏 आपको सादर प्रणाम 🌹 👏 🌿 🚩 जय श्री गजानन 🙏 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

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क्या रावण अंगद का पैर उठा सकता था? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ राम की सेना में सुग्रीव के साथ वानर राज बालि और अप्सरा तारा का पुत्र अंगद भी था। राम और रावण युद्ध के पूर्व भगवान श्रीराम ने अंगद को अपना दूत बनाकर लंका भेजा था। लेकिन वहां पर रावण ने अंगद का अपमान किया। अंगद ने तब अपनी शक्ति का परिचय देकर रावण को उपदेश दिया और पुन: राम के शिविर में लौट आए। अब सवाल यह उठता है कि अंगद में इतनी शक्ति कैसे आई की कोई भी असुर, राक्षस आदि उनका पैर हटाना तो दूर हिला भी नहीं पाए? दरअसल, हनुमान, जामवंत और अंगद तीनों ही प्राण विद्या में पारंगत थे। इस प्राण विद्या के बल पर ही वे जो चाहे कर सकते थे। अंगद जब रावण की सभा में गए तो उन्होंने इसी प्राण विद्या के बल पर अपना शरीर बलिष्ठ और पैरों को इतना दृढ़ कर लिया था कि उसे हिलाना किसी के भी बस की बात नहीं थी। यह प्राणा विद्या का ही कमाल था। श्रीराम द्वारा अंगद के पिता का वध करने बाद भी अंगद राम की सेना में कैसे? अंगद के पिता बालि का प्रभु श्रीराम ने वध कर दिया था। जब श्रीराम ने बालि को बाण मारा तो वह घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा था। इस अवस्था में जब पुत्र अंगद उसके पास आया तब बालि ने उसे ज्ञान की मुख्यत: तीन बातें बताई थीं। पहली देश काल और परिस्थितियों को समझो। दूसरी किसके साथ कब, कहां और कैसा व्यवहार करें, इसका सही निर्णय लेना चाहिए और तीसरी पसंद-नापसंद, सुख-दु:ख को सहन करना चाहिए और क्षमाभाव के साथ जीवन व्यतीत करना चाहिए। बालि ने अपने पुत्र अंगद से ये बातें ध्यान रखते हुए कहा कि अब से तुम सुग्रीव के साथ रहो। अंगद को ही क्यों भेजा दूत बनाकर? जब श्रीराम जी लंका पहुंच गए तब उन्होंने रावण के पास अपना दूत भेजने का विचार किया। सभा में सभी ने प्रस्ताव किया कि हनुमानजी को ही दूत बनाकर भेजना चाहिए। लेकिन राम जी ने यह कहा कि अगर रावण के पास फिर से हनुमान जी को भेजा गया तो यह संदेश जाएगा कि राम की सेना में अकेले हनुमान ही महावीर हैं। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को दूत बनाकर भेजा जाना चहिए जो हनुमान की तरह पराक्रमी और बुद्धिमान हो। ऐसे में प्रभु श्री राम की नजर अंगद पर जा टिकी। अंगद ने भी प्रभु श्री राम के द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्व को बखूबी संभाला। रावण की सभा में अंगद : युद्ध करने के पूर्व प्रभु श्रीराम ने अंगद को रावण की सभा में अपना दूत बनाकर सुलह करने के लिए भेजा था। प्रभु श्रीराम ने अंगद से कहा कि हे अंगद! रावण के द्वार जाओ। कुछ सुलह हो जाए, उनके और हमारे विचारों में एकता आ जाए, जाओ तुम उनको शिक्षा दो। जब अंगद रावण की सभा में पहुंचे तो वहां नाना प्रकार के वैज्ञानिक भी विराजमान थे, वण और उनके सभी पुत्र विराजमान थे। रावण ने कहा कि आओ! तुम्हारा आगमन कैसे हुआ? अंगद ने कहा कि प्रभु मैं इसलिए आया हूं कि राम और तुम्हारे दोनों के विचारों में एकता आ जाए। तुम्हारे यहां संस्कृति के प्रसार में अभाव आ गया है, अब मैं उस अभाव को शांत करने आया हूं। चरित्र की स्थापना करना राजा का कर्त्तव्य होता है, तुम्हारे राष्ट्र में चरित्र हीनता आ गई है, तुम्हारा राष्ट्र उत्तम प्रतीत नहीं हो रहा है इसलिए मैं आज यहां आया हूं। रावण ने कहा कि यह तो तुम्हारा विचार यथार्थ है परन्तु मेरे यहां क्या सूक्ष्मता है? अब अंगद बोले तुम्हारे यहां चरित्र की सूक्ष्मता है। राजा के राष्ट्र में जब चरित्र नहीं होता तो संस्कृति का विनाश हो जाता है। संस्कृति का विनाश नहीं होना चाहिए, संस्कृति का उत्थान करना है। संस्कृति यही कहती है कि मानव के आचार व्यव्हार को सुन्दर बनाया जाए, महत्ता में लाया जाए, एक दूसरे की पुत्री की रक्षा होनी चाहिए। वह राजा के राष्ट्र की पद्धति कहलाती है। रावण ने पूछा क्या मेरे राष्ट्र में विज्ञान नहीं? अंगद बोले कि हे रावण! तुम्हारे राष्ट्र में विज्ञान है परन्तु विज्ञान का क्या बनता है? एक मंगल की यात्रा कर रहा है परन्तु मंगल की यात्रा का क्या बनेगा, जब तुम्हारे राष्ट्र में अग्निकांड हो रहे हैं। हे रावण! तुम सूर्य मंडल की यात्रा कर रहे हो, उस सूर्य की यात्रा करने से क्या बनेगा, जब तुम्हारे राष्ट्र में एक कन्या का जीवन सुरक्षित नहीं। तुम्हारे राष्ट्र का क्या बनेगा? रावण ने कहा कि यह तुम क्या उच्चारण कर रहे हो, तुम अपने पिता की परंपरा शांत कर गए हो। अंगद ने कहा कदापि नहीं, में इसलिए आया हूं कि तुम्हारे राष्ट्र और अयोध्या दोनों का समन्वय हो जाए। इस पर रावण मौन हो गया। नरायान्तक बोले कि भगवन! इसको विचारा जाए, यह दूत है, यह क्या कहता है? अंगद बोले दिया भगवन! राम से तुम अपने विचारों का समन्वय कर लोगे तो राम माता सीता को लेकर चले जाएंगे। रावण ने कहा कि यह क्या उच्चारण कर रहा है? मैं धृष्ट नहीं हूं। अंगद बोले यही धृष्टता है संसार में, किसी दूसरे की कन्या को हरण करके लाना एक महान धृष्टता है। तुम्हारी यह धृष्टता है कि राजा होकर भी परस्त्रीगामी बन गए हो। जो राजा किसी स्त्री का अपमान करता है उस राजा के राष्ट्र में अग्निकाण्ड हो जाते हैं। तब अंगद ने अपना पैर जमा दिया रावण ने कहा कि यह कटु उच्चारण कर रहा है। अंगद ने कहा कि मैं तुम्हें प्राण की एक क्रिया निश्चित कर रहा हूं, यदि चरित्र की उज्ज्वलता है तो मेरा यह पग है इस पग को यदि कोई एक क्षण भी अपने स्थान से दूर कर देगा तो मैं उस समय में माता सीता को त्याग करके राम को अयोध्या ले जाऊंगा। अंगद ने प्राण की क्रिया की और उनका शरीर विशाल एवं बलिष्‍ठ बन गया। तब उन्होंने भूमि पर अपना पैर स्थिर कर दिया। राजसभा में कोई ऐसा बलिष्ठ नहीं था जो उसके पग को एक क्षण भर भी अपनी स्थिति से दूर कर सके। अंगद का पग जब एक क्षण भर दूर नहीं हुआ तो रावण उस समय स्वतः चला परन्तु रावण के आते ही उन्होंने कहा कि यह अधिराज है, अधिराजों से पग उठवाना सुन्दर नहीं है। उन्होंने अपने पग को अपनी स्थली में नियुक्त कर दिया और कहा कि हे रावण! तुम्हें मेरे चरणों को स्पर्श करना निरर्थक है। यदि तुम राम के चरणों को स्पर्श करो तो तुम्हारा कल्याण हो सकता है। रावण मौन होकर अपने स्थल पर विराजमान हो गया। सरल भाषा में अंत में रावण जब खुद अंगद के पांव उठाने आया तो अंगद ने कहा कि मेरे पांव क्यों पकड़ते हो पकड़ना है तो मेरे स्वामी राम के चरण पकड़ लो वह दयालु और शरणागतवत्सल हैं। उनकी शरण में जाओ तो प्राण बच जाएंगे अन्यथा युद्घ में बंधु-बांधवों समेत मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। यह सुनकर रावण ने अपनी इज्जत बचाने में ही अपनी भलाई समझी। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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बड़ा पापी कौन एक संत के दो शिष्य उनसे मिलने जा रहे थे। पूरे दिन का सफर था। चलते-चलते रास्ते में एक नदी पड़ी। उन्होंने देखा कि उस नदी में एक स्त्री डूब रही है। शिष्य के लिए स्त्री का स्पर्श वर्जित माना जाता है। ऐसी दशा में क्या हो? उन दोनों शिष्यों में से एक ने कहा- “हमें धर्म की मर्यादा का पालन करना चाहिए। स्त्री डूब रही है तो डूबे! हमें क्या!” लेकिन दूसरा शिष्य अत्यंत दयावान था। उसने कहा- “हमारे रहते कोई इस तरह मरे यह तो मैं सहन नहीं कर सकता।” इतना कहकर वह पानी में कूद पड़ा डूबती स्त्री को पकड़ लिया और कंधे का सहारा देकर किनारे पर ले आया। दूसरे शिष्य ने उसकी बड़ी भर्त्सना की, रास्ते भर वह कहता रहा कि- “मैं जाकर गुरु जी से कहूंगा कि आज इसने मर्यादा का उल्लंघन करके कितना बड़ा पाप किया है।” दोनों संत के सामने पहुंचे तो................ दूसरे शिष्य ने एक सांस में सारी बातें कह सुनाईं- “गुरुवर! मैंने इसको बहुतेरा रोका, पर यह माना ही नहीं। बड़ा भयंकर पाप किया है इसने।” संत ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी, फिर पूछा- “इस शिष्य को उस स्त्री को कंधे पर बाहर लाने में कितना समय लगा होगा? कम-से-कम पंद्रह मिनट तो लग ही गए होंगे। अच्छा! संत ने फिर पूछा- “इस घटना के बाद यहां आने में तुम लोगों को कितना समय लगा?” शिष्य ने हिसाब लगाकर उत्तर दिया- “यही कोई छ: घंटे!” संत ने कहा- “भले आदमी! इस बेचारे ने तो उस स्त्री की प्राण रक्षा के लिए उसे सिर्फ पंद्रह मिनट ही अपने कंधे पर रखा लेकिन तू तो उसे छ: घंटे से अपने मन में बिठाए हुए है, वह भी इसलिए कि मुझसे इसकी शिकायत कर सके। बोल दोनों में बड़ा पापी कौन है?” बेचारा शिष्य निरुत्तर हो गया। वह समझ गया कि पाप सिर्फ शरीर से ही नही मन से भी होता है, मनुष्य बड़ा पापी मन से होता है

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 07 राजा पुरुयशा को भगवान् का दर्शन, उनके द्वारा भगवत्स्तुति और भगवान् के वरदान से राजा की सायुज्य मुक्ति - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - श्रुतदेव कहते हैं- परमात्मा भगवान् नारायण चार भुजाओं से सुशोभित थे उन्होंने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। वे पीताम्बर धारण करके वनमाला से विभूषित थे। भगवती लक्ष्मी तथा एक पार्षद के साथ गरुड़ की पीठ पर विराजित थे। उनका दुःसह तेज देखकर राजा के नेत्र सहसा मुँद गये। उनके सब अंगों में रोमांच हो आया और नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। भगवद्दर्शन के आनन्द में उनका हृदय सर्वथा डूब गया। उन्होंने तत्काल आगे बढ़कर भगवान् को साप्टांग प्रणाम किया; फिर प्रेम-विह्वल नेत्रों से विश्वात्मदेव जगदीश्वर श्रीहरि को बहुत देर तक निहार कर उनके चरण धोये और उस जल को अपने मस्तक पर धारण किया। उन्हीं चरणों की धोवनरूपा श्रीगंगाजी ब्रह्माजी सहित तीनों लोकों को पवित्र करती हैं। तत्पश्चात् राजा ने महान् वैभव से, बहुमूल्य वस्त्र आभूषण और चन्दन से, हार, धूप, दीप तथा अमृत के समान नैवेद्य के निवेदन आदि से एवं अपने तन, मन, धन और आत्मा का समर्पण करके अद्वितीय पुराणपुरुष भगवान् विष्णु का पूजन किया पूजा के बाद इस प्रकार स्तुति की-'जो निर्गुण, निरंजन एवं प्रजापतियों के भी अधीश्वर हैं, ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता जिनकी वन्दना करते रहते हैं, उन परम पुरुष भगवान् श्रीहरि को मैं प्रणाम करता हूँ। शरणागतों की पापराशि का नाश करने वाले आपके चरणारविन्दों को परिपक्व योग वाले योगियों ने जो अपने हृदय में धारण किया है, यह उनके लिये बड़े सौभाग्य की बात है। बढ़ी हुई भक्ति के द्वारा अपने अन्त:करण तथा जीव भाव को भी आपके चरणों में ही चढ़ाकर वे योगीजन उन चरणों के चिन्तन मात्र से आपके धाम को प्राप्त हुए हैं। विचित्र कर्म करने वाले! आप स्वतन्त्र परमेश्वर को नमस्कार है। साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने वाले ! आप परमात्मा को प्रणाम है। प्रभो ! आपकी माया से मोहित होकर मैं स्त्री और धनरूपी विषयों में ही भटकता रहा हूँ, अनर्थ में ही मेरी अर्थदृष्टि हो गयी थी प्रभो ! विश्वमूर्ते ! जब जीव पर आप अनन्त शक्ति परमेश्वर की कृपा होती है, तभी उसे महापुरुषों का संग प्राप्त होता है, जिससे यह संसार समुद्र गोपद के समान हो जाता है। ईश्वर ! जब सत्संग मिलता है, तभी आप में मन तथा बुद्धि का अनुराग होता है। मेरा समस्त राज्य जो मुझसे छिन गया था, वह भी आपका मुझ पर महान् अनुग्रह हो हुआ था, ऐसा मैं मानता हूँ। मैं न तो राज्य चाहता हूँ, न पुत्र आदि की इच्छा रखता हूँ और न कोष की ही अभिलाषा करता हूँ। अपितु मुनियों के द्वारा ध्यान करने योग्य जो आपके आराधनीय चरणारविन्द हैं, उन्हीं का नित्य सेवन करना चाहता हूँ। देवेश्वर जगन्निवास! मुझ पर प्रसन्न होइये, जिससे आपके चरण कमलों की स्मृति बराबर बनी रहे। तथा स्त्री, पुत्र, खजाना एवं आत्मीय कहे जाने वाले सब पदार्थो में जो मेरी आसक्ति है, वह सदा के लिये दूर हो जाय। भगवन् ! मेरा मन सदा आपके चरणारविन्दों के चिन्तन में लगा रहे, मेरी वाणी आपकी दिव्य कथा के निरन्तर वर्णन में तत्पर हो, मेरे ये दोनों नेत्र आपके श्रीविग्रह के दर्शन में, कान कथा श्रवण में तथा रसना आपके भोग लगाये हुए प्रसाद के आस्वादन में प्रवृत्त हो। प्रभो ! मेरी नासिका आपके चरणकमलों की तथा आपके भक्तजनों के गन्ध-विलेपन आदि की सुगन्ध लेने में, दोनों हाथ आपके मन्दिर में झाडू देने आदि की सेवा में, दोनों पैर आपके तीर्थ और कथास्थान की यात्रा करने में तथा मस्तक निरन्तर आपको प्रणाम करने में संलग्न रहें। मेरी कामना आपकी उत्तम कथा में और बुद्धि अहर्निश आपका चिन्तन करने में तत्पर हो। मेरे घर पर पधारे हुए मुनियों द्वारा आपकी उत्तम कथा का वर्णन तथा आपकी महिमा का गान होता रहे और इसी में मेरे दिन बीतें, विष्णो! एक क्षण तथा आधे पल के लिये भी ऐसा प्रसंग न उपस्थित हो, जो आपकी चर्चा से रहित हो। हरे! मैं परमेष्ठी ब्रह्मा का पद, भूतल का चक्रवर्ती राज्य और मोक्ष भी नहीं चाहता, केवल आपके चरणों की निरन्तर सेवा चाहता हूँ, जिसके लिये लक्ष्मीजी तथा ब्रह्मा, शंकर आदि देवता भी सदा प्रार्थना किया करते हैं। राजा के इस प्रकार स्तुति करने पर कमलनयन भगवान् विष्णु ने प्रसन्न हो मेघ के समान गम्भीर वाणी में इस प्रकार कहा-'राजन् ! मैं जानता हूँ-तुम मेरे श्रेष्ठ भक्त हो, कामना रहित और निष्पाप हो। नरेश्वर ! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो और अन्त में तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करो। तुम्हारे द्वारा किये हुए इस स्तोत्र से इस पृथ्वी पर जो लोग स्तुति करेंगे, उनके ऊपर सन्तुष्ट हो मैं उन्हें भोग और मोक्ष प्रदान करूँगा। यह अक्षय तृतीया इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध होगी, जिसमें भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हुआ। जो मनुष्य इस तिथि को किसी भी बहाने से अथवा स्वभाव से ही स्नान, दान आदि क्रियाएँ करते हैं, वे मेरे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य पितरों के उद्देश्य से अक्षय तृतीया को श्राद्ध करते हैं, उनका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होता है। इस तिथि में थोड़ा-सा भी जो पुण्य किया जाता है, उसका फल अक्षय होता है। नृपश्रेष्ठ ! जो कुटुम्बी ब्राह्मण को गाय दान करता है, उसके हाथ में सब सम्पत्तियों की वर्षा करने वाली भुक्ति और मुक्ति भी आ जाती है। जो वैशाख मास में मेरा प्रिय करने वाले धर्मो का अनुष्ठान करता है उसके जन्म, मृत्यु, जरा, भय और पाप को मैं हर लेता हूँ। अनघ! यह वैशाख मास मेरे चरण-चिन्तन की ही भाँति ऐसे सहस्रों पापों को हर लेता है, जिनके लिये शास्त्रों में कोई प्रायश्चित्त नहीं मिलता है। राजा को यह वरदान देकर देवाधिदेव भगवान् जनार्दन सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजा पुरुयशा सदा भगवान् में ही मन लगाये हुए उन्हीं की सेवा में तत्पर रहकर इस पृथ्वी का पालन करने लगे। देवदुर्लभ समस्त मनोरथों का उपभोग करके अन्त में उन्होंने चक्रधारी भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लिया। जो इस उत्तम उपाख्यान को सुनते और सुनाते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो भगवान् विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************

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