💐गुरू नानक 💐

💐गुरू नानक 💐

"गुरुनानक जी की सीख - ईमानदारी से जीना चाहिए"
दोस्तों, गुरु नानक देव जी सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के पहले गुरु थे। जब गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति हुई तब वे चार उदासियों पर निकले और एक बार भ्रमण के दौरान वे सैदपुर पहुंचे। सारे शहर में ये बात फैल गई कि एक परम दिव्य महापुरुष पधारे हैं। शहर का मुखिया मालिक भागो ज़ुल्म और बेईमानी से धनी बना था। वो गरीब किसानों से बहुत ज़्यादा लगान वसूलता था। कई बार उनकी फसल भी हड़प लेता था। जिससे कई गरीब किसान परिवार भूखे मरने पर मजबूर थे। जब मलिक भागो को नानक देव जी के आने का पता चला, तो वो उन्हें अपने महल में ठहराना चाहता था, लेकिन गुरु जी ने एक गरीब के छोटे से घर को ठहरने के लिए चुना।
उस आदमी का नाम भाई लालो था। भाई लालो बहुत खुश हुआ और वो बड़े आदर-सत्कार से गुरुजी की सेवा करने लगा। नानक देव जी बड़े प्रेम से उसकी रूखी-सूखी रोटी खाते थे। जब मलिक भागो को ये पता चला तो उसने एक बड़ा आयोजन किया। उसने इलाके के सभी जाने माने लोगों के साथ गुरु नानक जी को भी उसमें निमंत्रित किया। गुरुजी ने उसका निमंत्रण ठुकरा दिया। ये सुनकर, मलिक को बहुत गुस्सा आया और उसने गुरुजी को अपने यहां लाने का हुक्म दिया। मलिक के आदमी, नानक देव जी को उसके महल ले कर आए तो मलिक बोला, गुरुजी मैंने आपके ठहरने का बहुत बढ़िया इंतजाम किया था। कई सारे स्वादिष्ट व्यंजन भी बनवाए थे, फिर भी आप उस गरीब भाई लालो की सूखी रोटी खा रहे हो, क्यों? गुरुजी ने उत्तर दिया, मैं तुम्हारा भोजन नहीं खा सकता, क्योंकि तुमने गलत तरीके से गरीबों का खून चूस कर ये रोटी कमाई है। जबकि लालो की सूखी रोटी उसकी ईमानदारी और मेहनत की कमाई है। गुरुजी की ये बात सुनकर, मलिक भागो आगबबूला हो गया और गुरुजी से इसका सबूत देने को कहा। गुरुजी ने लालो के घर से रोटी का एक टुकड़ा मंगवाया।
फिर शहर के लोगों के भारी जमावड़े के सामने, गुरुजी ने एक हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी और दूसरे हाथ में मलिक भागो की चुपड़ी रोटी उठाई। दोनों रोटियों को ज़ोर से हाथों में दबाया तो लालो की रोटी से दूध और मलिक भागो की रोटी से खून टपकने लगा। भरी सभा में, मलिक भागो अपने दुष्कर्मों का सबूत देख, पूरी तरह से हिल गया और नानक देव जी के चरणो में गिर गया। गुरु जी ने उसे भ्रष्टाचार से कमाई हुई सारी धन-दौलत गरीबों में बांटने को कहा और आगे से ईमानदार बनने को कहा। मलिक भागो ने वैसा ही किया। इस प्रकार, गुरुजी के आशीर्वाद से, मलिक भागो का एक तरह से पुनर्जन्म हुआ और वो ईमानदार बन गया।
शिक्षा : दोस्तों इस कहानी से हमे ये शिक्षा मिलती है की हमे हमेशा सच्चाई और इमनदारी से मेहनत करके पैसा कमाना चाहिए। क्योंकी बुरे कर्मो का फल बुरा ही होता है।
🚩जय श्री राम🚩

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कामेंट्स

Maya Rathore Nov 4, 2017
बोले सो निहाल , सत श्री अकाल🙏

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जानिये ॐ का रहस्य ~~~~~~~~~~~~~ मन पर नियन्त्रण करके शब्दों का उच्चारण करने की क्रिया को मन्त्र कहते है। मन्त्र विज्ञान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे मन व तन पर पड़ता है। मन्त्र का जाप एक मानसिक क्रिया है। कहा जाता है कि जैसा रहेगा मन वैसा रहेगा तन। यानि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ्य है तो हमारा शरीर भी स्वस्थ्य रहेगा। मन को स्वस्थ्य रखने के लिए मन्त्र का जाप करना आवश्यक है। ओम् तीन अक्षरों से बना है। अ, उ और म से निर्मित यह शब्द सर्व शक्तिमान है। जीवन जीने की शक्ति और संसार की चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस देने वाले ओम् के उच्चारण करने मात्र से विभिन्न प्रकार की समस्याओं व व्याधियों का नाश होता है। सृष्टि के आरंभ में एक ध्वनि गूंजी ओम और पूरे ब्रह्माण्ड में इसकी गूंज फैल गयी। पुराणों में ऐसी कथा मिलती है कि इसी शब्द से भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा प्रकट हुए। इसलिए ओम को सभी मंत्रों का बीज मंत्र और ध्वनियों एवं शब्दों की जननी कहा जाता है। इस मंत्र के विषय में कहा जाता है कि, ओम शब्द के नियमित उच्चारण मात्र से शरीर में मौजूद आत्मा जागृत हो जाती है और रोग एवं तनाव से मुक्ति मिलती है। इसलिए धर्म गुरू ओम का जप करने की सलाह देते हैं। जबकि वास्तुविदों का मानना है कि ओम के प्रयोग से घर में मौजूद वास्तु दोषों को भी दूर किया जा सकता है। ओम मंत्र को ब्रह्माण्ड का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ओम में त्रिदेवों का वास होता है इसलिए सभी मंत्रों से पहले इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है जैसे ओम नमो भगवते वासुदेव, ओम नमः शिवाय। आध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि नियमित ओम मंत्र का जप किया जाए तो व्यक्ति का तन मन शुद्घ रहता है और मानसिक शांति मिलती है। ओम मंत्र के जप से मनुष्य ईश्वर के करीब पहुंचता है और मुक्ति पाने का अधिकारी बन जाता है। : वैदिक साहित्य इस बात पर एकमत है कि ओ३म् ईश्वर का मुख्य नाम है. योग दर्शन में यह स्पष्ट है. यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है. जैसे “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है. “उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म, सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है। “म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और पालन करने वाला है. ये तो बहुत थोड़े से उदाहरण हैं जो ओ३म् के प्रत्येक अक्षर से समझे जा सकते हैं. वास्तव में अनंत ईश्वर के अनगिनत नाम केवल इस ओ३म् शब्द में ही आ सकते हैं, और किसी में नहीं. १. अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनावरहित हो जाता है। २. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं! ३. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है। ४. यह हृदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है। ५. इससे पाचन शक्ति तेज होती है। ६. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है। ७. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं। ८. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है. रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी। ९ कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है. इत्यादि! ॐ के उच्चारण का रहस्य? ॐ है एक मात्र मंत्र, यही है आत्मा का संगीत ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है। ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है। तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम। साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना। *त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक : ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। *बीमारी दूर भगाएँ : तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। *उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं। *इसके लाभ : इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। *शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव : प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक'पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरहआल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है। कम से कम 108 बार ओम् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव रहित हो जाता है। कुछ ही दिनों पश्चात शरीर में एक नई उर्जा का संचरण होने लगता है। । ओम् का उच्चारण करने से प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियन्त्रण स्थापित होता है। जिसके कारण हमें प्राकृतिक उर्जा मिलती रहती है। ओम् का उच्चारण करने से परिस्थितियों का पूर्वानुमान होने लगता है। ओम् का उच्चारण करने से आपके व्यवहार में शालीनता आयेगी जिससे आपके शत्रु भी मित्र बन जाते है। ओम् का उच्चारण करने से आपके मन में निराशा के भाव उत्पन्न नहीं होते है। आत्म हत्या जैसे विचार भी मन में नहीं आते है। जो बच्चे पढ़ाई में मन नहीं लगाते है या फिर उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है। उन्हें यदि नियमित ओम् का उच्चारण कराया जाये तो उनकी स्मरण शक्ति भी अच्छी हो जायेगी और पढ़ाई में मन भी लगने लगेगा। ~~~~~~~~~~~~~~~~

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*🚩🙏 महाशिवरात्री विशेष 11 मार्च 2021 गुरुवार* पुजा विधी महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधि विधान से साधना , पुजा एवं महामृत्युंजय मंत्र का जप करके हम अपने जीवन के कष्ट दुख एवं परेशानी को दूर कर सकते हैं । नजदीक के शिव मंदिर या घर में करें पुजा जो व्यक्ति विधि विधान से पूजा नहीं कर सकते हैं वे अपने घर में छोटा मिट्टी , पारद या स्फटिक शिवलिंग स्थापित करके सामान्य पूजन करके रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का ज्यादा से ज्यादा जप कर सकते हैं । महामृत्युंजय मंत्र का जप प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में हमेशा करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से जीवन में कष्ट , रोग इत्यादि परेशानी दूर होती है तथा जो भी क्रूर ग्रह जन्म कुंडली में परेशान करते हैं इन से होने वाली परेशानी भी दूर होती है । महामृत्युञ्जय मन्त्र - ॥ ॐ ह्रौं जुं सः त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् सः जुं ह्रौं ॐ ॥ साधना प्रारंभ करने से पहले पूजा स्थान में पूजन करने से संबंधित सामग्री अक्षत, अष्टगंध , जल , दूध , दही , शक्कर , घी , शहद , पुष्प , बिल्वपत्र , प्रसाद इत्यादि रख ले । सफेद धारण करें कंबल को मोड़ के लगभग दो-तीन इंच का बैठने के लिए आसन बनाएं एवं ।। पवित्रीकरण बायें हाथ में जल लेकर उसे दाये हाथ से ढक कर मंत्र पढे एवं मंत्र पढ़ने के बाद इस जल को दाहिने हाथ से अपने सम्पूर्ण शरीर पर छिड़क ले ॥ ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥ आचमन मन , वाणि एवं हृदय की शुद्धि के लिए आचमनी द्वारा जल लेकर तीन बार मंत्र के उच्चारण के साथ पिए ( ॐ केशवया नमः , ॐ नारायणाय नमः , ॐ माधवाय नमः ) ॐ हृषीकेशाय नमः ( इस मंत्र को बोलकर हाथ धो ले ) शिखा बंधन शिखा पर दाहिना हाथ रखकर दैवी शक्ति की स्थापना करें ॥ चिद्रुपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते , तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥ न्यास संपूर्ण शरीर को साधना के लिये पुष्ट एवं सबल बनाने के लिए प्रत्येक मन्त्र के साथ संबन्धित अंग को दाहिने हाथ से स्पर्श करें ॐ वाङ्ग में आस्येस्तु - मुख को ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु - नासिका के छिद्रों को ॐ चक्षुर्में तेजोस्तु - दोनो नेत्रों को ॐ कर्णयोमें श्रोत्रंमस्तु – दोनो कानो को ॐ बह्वोर्मे बलमस्तु - दोनो बाजुओं को ॐ ऊवोर्में ओजोस्तु - दोनों जंघाओ को ॐ अरिष्टानि मे अङ्गानि सन्तु –- सम्पूर्ण शरीर को आसन पूजन अब अपने आसन के नीचे चन्दन से त्रिकोण बनाकर उसपर अक्षत , पुष्प समर्पित करें एवं मन्त्र बोलते हुए हाथ जोडकर प्रार्थना करें ॥ ॐ पृथ्वि त्वया धृतालोका देवि त्वं विष्णुना धृता , त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥ दिग् बन्धन बायें हाथ में जल या चावल लेकर दाहिने हाथ से चारों दिशाओ में छिड़कें ॥ ॐ अपसर्पन्तु ये भूता ये भूताःभूमि संस्थिताः , ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया , अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम् , सर्वे षामविरोधेन पूजाकर्म समारम्भे ॥ गणेश स्मरण सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः , लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः धुम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः , द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा , संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते श्री गुरु ध्यान अस्थि चर्म युक्त देह को हिं गुरु नहीं कहते अपितु इस देह में जो ज्ञान समाहित है उसे गुरु कहते हैं , इस ज्ञान की प्राप्ति के लिये उन्होने जो तप और त्याग किया है , हम उन्हें नमन करते हैं , गुरु हीं हमें दैहिक , भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का ज्ञान देतें हैं इसलिये शास्त्रों में गुरु का महत्व सभी देवताओं से ऊँचा माना गया है , ईश्वर से भी पहले गुरु का ध्यान एवं पूजन करना शास्त्र सम्मत कही गई है। अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ध्यान मूलं गुरोर्मूर्तिः पूजा मूलं गुरोः पदं मन्त्र मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलं गुरोः कृपा ॥ श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः प्रार्थनां समर्पयामि , श्री गुरुं मम हृदये आवाहयामि मम हृदये कमलमध्ये स्थापयामि नमः ॥ भगवान शिव जी का ध्यान - ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्जवलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः ध्यानार्थे बिल्वपत्रं समर्पयामि आवाहन – ॥ आगच्छन्तु सुरश्रेष्ठा भवन्त्वत्र स्थिराः समे यावत् पूजां करिष्यामि तावत् तिष्ठन्तु सन्निधौ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि । आसन – ॥ अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , आसनार्थे बिवपत्राणि समर्पयामि । स्नान ॥ मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः पाद्यं , अर्ध्यं , आचमनीयं च स्नानं समर्पयामि , पुनः आचमनीयं जलं समर्पयामि । (पांच आचमनि जल प्लेटे मे चदायें ) दुग्धस्नान ॥ काम्धेनुसमुभ्दूतं सर्वेषां जीवनं परम् पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानाय गृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , पयः स्नानं समर्पयामि , पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । दधिस्नान ॥ पयसस्तु समुभ्दूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , दधि स्नानं समर्पयामि , दधि स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । घृतस्नान ॥ नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम् घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , घृतस्नानं समर्पयामि , घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । मधुस्नान ॥ पुष्परेणुसमुत्पन्नं सुस्वादु मधुरं मधु तेजःपुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , मधुस्नानं समर्पयामि , मधुस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । शर्करास्नान ॥ इक्षुसारसमुभ्दूतां शर्करां पुष्टिदां शुभाम् मलापहारिकां दिव्यां स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , शर्करास्नानं समर्पयामि , शर्करास्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नान ॥ पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम् पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि , पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । गन्धोदकस्नान ॥ मलयाचलसम्भूतचन्दनेन विमिश्रितम् इदं गन्धोकस्नानं कुङ्कुमाक्तं नु गृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , गन्धोदकस्नानं समर्पयामि , गन्धोदकस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नान ॥ शुद्धं यत् सलिलं दिव्यं गङ्गाजलसमं स्मृतम् समर्पितं मया भक्त्या शुद्धस्नानाय गृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । अभिषेक शुद्ध जल एवं दुध से अभिषेक करे यदि आप पढ़ सकते हैं तो ( रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करें ( पांचवे अध्याय के 16 मंत्र ) या ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ मंत्र बोलकर दूध एवं जल मिलकर उससे अभिषेक करें । ॐ उमामहेश्वराभ्यां नम: अभिषेकं समर्पयामि । शांति पाठ – ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शांति: पृथिवी शान्तिराप: शांतिरोषधय: शांति: । वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा: शांतिर्ब्रह्मा शांति: सर्व (गूं) शांति: शांतिरेव शांति: सा मा शांतिरेधि । वस्त्र ॥ सर्वभुषादिके सौम्ये लोके लज्जानिवारणे , मयोपपादिते तुभ्यं गृह्यतां वसिसे शुभे ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि , आचमनीयं जलं समर्पयामि । यज्ञोपवीत ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवितेनोपनह्यामि । नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् । उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , यज्ञोपवीतं समर्पयामि , यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । चन्दन ॥ ॐ श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरं , विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , चन्दनं समर्पयामि । अक्षत ॥ अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः , मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , अक्षतान् समर्पयामि । पुष्प माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः , मयाऽऽ ह्रतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यतां ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , पुष्पं समर्पयामि । बिल्वपत्र ॥ त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , बिल्वपत्रं समर्पयामि दुर्वा ॥ दूर्वाङ्कुरान सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान् आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि धूप ॥ वनस्पति रसोद् भूतो गन्धाढयो सुमनोहरः , आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , धूपं आघ्रापयामि । दीप ॥ साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया , दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , दीपं दर्शयामि । नैवैद्य ॥ शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च , आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवैद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , नैवैद्यं निवेदयामि नानाऋतुफलानि च समर्पयामि , आचमनीयं जलं समर्पयामि । ताम्बूल ॥ पूगीफलं महद्दिव्यम् नागवल्लीदलैर्युतम् एलालवङ्ग संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , ताम्बूलं समर्पयामि । दक्षिण ॥ हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , कृतायाः पूजायाः सद् गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । आरती ॥ कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् , आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदो भव ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , आरार्तिकं समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलि ॥ नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद् भवानि च पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहान परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , मन्त्रपुष्पाञ्जलिम् समर्पयामि । प्रदक्षिणा ॥ यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च , तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , प्रदक्षिणां समर्पयामि । नमस्कार ॥ नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , नमस्कारान समर्पयामि । अब रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जप अपनी सुविधानुसार करें । जप समर्पण ( दाहिने हाथ में जल लेकर मंत्र बोलें एवं जमीन पर छोड़ दें ) ॥ ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं , सिद्धिर्भवतु मं देव त्वत् प्रसादान्महेश्वर ॥ क्षमा याचना मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ,यत्युजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् , पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम , तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष मां परमेश्वर ( इन मन्त्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण कर अपनी विवस्ता एवं त्रुटियों के लिये क्षमा – याचना करें ) ना तो मैं आवाहन करना जानता हूँ , ना विसर्जन करना जानता हूँ और ना पूजा करना हीं जानता हूँ । हे परमात्मा क्षमा करें । हे परमात्मा मैंने जो मंत्रहीन , क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है , वह सब आपकी दया से पूर्ण हो । ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु 🚩👏🌺🌷🌻🙏🌻🌷🌺

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सनातन संस्कार 🔸🔸🔹🔸🔸 यह ज्ञान अपनों बच्चों को जरूर बतायें सभी को अवश्य शेयर करे! 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 10 कर्तव्य👉 1.संध्यावंदन, 2.व्रत, 3.तीर्थ, 4.उत्सव, 5.दान, 6.सेवा 7.संस्कार, 8.यज्ञ, 9.वेदपाठ, 10.धर्म प्रचार।...क्या आप इन सभी के बारे में विस्तार से जानते हैं और क्या आप इन सभी का अच्छे से पालन करते हैं? 10 सिद्धांत👉 1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है, 3.पुनर्जन्म होता है, 4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है, 5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है, 6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है, 7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है, 8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है, 9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है, 10.दान ही पुण्य है। महत्वपूर्ण 10 कार्य👉 1.प्रायश्चित करना, 2.उपनयन, दीक्षा देना-लेना, 3.श्राद्धकर्म, 4.बिना सिले सफेद वस्त्र पहनकर परिक्रमा करना, 5.शौच और शुद्धि, 6.जप-माला फेरना, 7.व्रत रखना, 8.दान-पुण्य करना, 9.धूप, दीप या गुग्गल जलाना, 10.कुलदेवता की पूजा। 10 उत्सव👉 नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल-ओणम, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि। इनके बारे में विस्तार से जानकारी हासिल करें। 10 पूजा👉 गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, दशामाता पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा। ये कुछ महत्वपूर्ण पूजाएं है जो हिन्दू करता है। हालांकि इनके पिछे का इतिहास जानना भी जरूरी है। 10 पवित्र पेय👉 1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस और 10.नीम रस। आप इनमें से कितने रस का समय समय पर सेवन करते हैं? ये सभी रस अमृत समान ही है। 10 पूजा के फूल👉 1.आंकड़ा, 2.गेंदा, 3.पारिजात, 4.चंपा, 5.कमल, 6.गुलाब, 7.चमेली, 8.गुड़हल, 9.कनेर, और 10.रजनीगंधा। प्रत्येक देवी या देवता को अलग अलग फूल चढ़ाए जाते हैं लेकिन आजकल लोग सभी देवी-देवता को गेंदे या गुलाम के फूल चढ़ाकर ही इतिश्री कर लेते हैं जो कि गलत है। 10 धार्मिक स्थल👉 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं हैं। क्या आप इन सभी के बारे में विस्तार से जानने हैं? नहीं जानते हैं तो जानना का प्रयास करना चाहिए। 10 महाविद्या👉 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला। बहुत कम लोग जानते हैं कि ये 10 देवियां कौन हैं। नवदुर्गा के अलावा इन 10 देवियों के बारे में विस्तार से जानने के बाद ही इनकी पूजा या प्रार्थना करना चाहिए। बहुत से हिन्दू सभी को शिव की पत्नीं मानकरपूजते हैं जोकि अनुचित है। 10 धार्मिक सुगंध👉 गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली। समय समय पर इनका इस्तेमाल करना बहुत शुभ, शांतिदायक और समृद्धिदायक होता है। 10 यम-नियम👉 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान। ये 10 ऐसे यम और नियम है जिनके बारे में प्रत्येक हिन्दू को जानना चाहिए यह सिर्फ योग के नियम ही नहीं है ये वेद और पुराणों के यम-नियम हैं। क्यों जरूरी है? क्योंकि इनके बारे में आप विस्तार से जानकर अच्छे से जीवन यापन कर सकेंगे। इनको जानने मात्र से ही आधे संताप मिट जाते हैं 10 बाल पुस्तकें👉 1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह। अपने बच्चों को ये पुस्तकें जरूर पढ़ाए। इनको पढ़कर उनमें समझदारी का विकास होगा और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। 10 ध्वनियां 👉 1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग। घंटी बजाने से जिस प्रकार घर और मंदिर में एक आध्यात्मि वातावरण निर्मित होता है उसी प्रकार सभी ध्वनियों का अलग अलग महत्व है। 10 दिशाएं 👉 दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं। इन दिशाओं के प्रभाव और महत्व को जानकरी ही घर का वास्तु निर्मित किया जाता है। इन सभी दिशाओं के एक एक द्वारपाल भी होते हैं जिन्हें दिग्पाल कहते हैं। 10 दिग्पाल 👉 10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत। 10 देवीय आत्मा👉 1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर। इन सभी के बारे में विस्तार से जानना चाहिए। 10 देवीय वस्तुएं 👉 1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और 10.संजीवनी बूटी। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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विश्व 🌎का ऐसा मंदिर जहां महादेव महिला के रुप मे विराजे हैं मथुरा और वंदावन का नाम आते ही लोगों के मन में श्री कृष्णा का नाम जुबान पर आता है. लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे मंदिर के बारे में जो वृंदावन में स्थित हैं और वो श्री कृष्ण का नहीं बल्कि महादेव का मंदिर है. जहां उन्हें महिलाओं की तरह सोलह श्रृंगार किया जाता है. कहा जाता है कि ये विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां महादेव महिला के रूप में विराजे हैं. दूर-दूर से भक्त यहां महादेव के गोपी रूप के दर्शन करने आते हैं. इन्हें गोपेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है. गोपेश्वर महादेव मंदिर वृंदावन के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है.कहा जाता है कि यहां मौजूद शिवलिंग की स्थापना भगवान श्री कृष्ण के पोते वज्रनाभ ने की थी. ये है पौराणिक कथा- कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ महारास किया था. इस मनोहर दृश्य का साक्षी हर देवी देवता बनना चाहता था. महादेव जो भगवान विष्णु को अपना आराध्य मानते हैं, वे उनके महारास को देखने के लिए पृथ्वी लोक में आए तो उन्हें गोपियों ने शामिल नहीं होने दिया. उन्होंने कहा कि इस महारास में सिर्फ महिलाएं ही शामिल हो सकती हैं. इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें सुझाव दिया कि वो गोपी के रूप में महारास में शामिल हों और इसके लिए यमुना जी की मदद लें. यमुना जी ने महादेव के आग्रह पर उनका गोपी के रूप में श्रृंगार किया. इसके बाद महादेव गोपी रूप में महारास में शामिल हुए. इसके बाद इस रूप में कृष्ण भगवान ने उन्हें पहचान लिया और महारास के बाद स्वयं अपने आराध्य महादेव की पूजा की और उनसे इस रूप में ब्रज में रहने का आग्रह किया. तब राधारानी ने कहा कि महादेव के गोपी के रूप को गोपेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा. तब से लेकर आज तक गोपेश्वर महादेव के मंदिर में उनका महिला की तरह सोलह श्रंगार किया जाता है, इसके बाद ही पूजा अर्चना होती है. महाशिवरात्रि के दिन इस मंदिर में भक्तों की खासी भीड़ जुटती है. उन्होंने कहा कि इस महारास में सिर्फ महिलाएं ही शामिल हो सकती हैं. इसके बाद माता पार्वती ने उन्हें सुझाव दिया कि वो गोपी के रूप में महारास में शामिल हों और इसके लिए यमुना जी की मदद लें. यमुना जी ने महादेव के आग्रह पर उनका गोपी के रूप में श्रृंगार किया. इसके बाद महादेव गोपी रूप में महारास में शामिल हुए. ॐ नम:शिवाय ॐ गं गणपतये नमः 👏 जय श्री माता पार्वती की जय श्री कृष्ण राधे राधे 🙏 🌹👏🚩शुभ 🌅 शुभ बुधवार ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री गणेश जी जय श्री राम 🌹 👏 🚩

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Anita Sharma Mar 1, 2021

. "गीता का सच्चा अर्थ" चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। उन्होंने एक स्थान पर देखा कि सरोवर के किनारे एक ब्राह्मण स्नान करके बैठा है और गीता का पाठ कर रहा है। वह पाठ करने में इतना तल्लीन है कि उसे अपने शरीर का भी पता नहीं है। उसके नेत्रों से आँसू की धारा बह रही है। महाप्रभु चुपचाप जाकर उस ब्राह्मण के पीछे खड़े हो गए। पाठ समाप्त करके जब ब्राह्मण पुस्तक बन्द की तो महाप्रभु सम्मुख आकर पूछा, 'ब्राह्मण देवता ! लगता है कि आप संस्कृत नहीं जानते, क्योंकि श्लोकों का उच्चारण शुद्ध नहीं हो रहा था। परन्तु गीता का ऐसा कौन-सा अर्थ आप समझते हैं जिसके आनन्द में आप इतने विभोर हो रहे थे ?' अपने सम्मुख एक तेजोमय भव्य महापुरुष को देखकर ब्राह्मण ने भूमि में लेटकर दण्डवत किया। वह दोनों हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक बोला, 'भगवन ! में संस्कृत क्या जानूँ और गीता के अर्थ का मुझे क्या पता ? मुझे पाठ करना आता ही नहीं मैं तो जब इस ग्रंथ को पढ़ने बैठता हूँ, तब मुझे लगता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों और बड़ी भारी सेना सजी खड़ी है। दोनों सेनाओं के बीच में एक रथ खड़ा है। रथ पर अर्जुन दोनों हाथ जोड़े बैठा है, और रथ के आगे घोड़ों की रास पकड़े भगवान श्रीकृष्ण बैठे हैं। भगवान मुख पीछे घुमाकर अर्जुन से कुछ कह रहे हैं, मुझे यह स्पष्ट दिखता है। भगवान और अर्जुन की ओर देख-देखकर मुझे प्रेम से रुलाई आ रही है। गीता और उसके श्लोक तो माध्यम हैं। असल सत्य भाषा नहीं, भक्ति है और इस भक्ति में मैं जितना गहरा उतरता जाता हूँ मेरा आनन्द बढ़ता जाता है।' 'भैया ! तुम्हीं ने गीता का सच्चा अर्थ जाना है और गीता का ठीक पाठ करना तुम्हें ही आता है।' यह कहकर महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को अपने हाथों से उठाकर हृदय से लगा लिया।

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