ईश्वर अंश जीव अविनाशी =============== संसार का हर जीव ईश्वर का ही अंश है यहां हर जीव में ईश्वर का ही अंश व्याप्त है, लेकिन मनुष्य परमात्मा की वह अद्भुत रचना है जो अपनी क्षमताओं को जागृत करता हुआ अपने उस अंशी को प्राप्त कर सकता है इसके लिए परमात्मा ने उसे विशेष रूप से तैयार किया है। यदि कोई भी मनुष्य अपनी क्षमताओं को जाग्रत करता हुआ अपने अंतिम लक्ष्य तक जिसे ध्यान में रखकर परमात्मा ने उसे बनाया था उस लक्ष्य तक यदि कोई भी मनुष्य पहुंच जाता है तो उसके समान संसार में कोई नहीं देवता भी नहीं । परंतु उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रकृति के पांच तत्व को प्रकट करना अनिवार्य है इन्हीं पांच तत्वों के द्वारा जीव की उत्पत्ति होती है इन्हीं पांच तत्वों के द्वारा परमात्मा ने ईश्वर ने सृष्टि की रचना किया है इन्हीं पंच तत्वों के द्वारा समस्त ब्रह्मांड की रचना हुई है। इन पांच तत्वों को भली-भांति देखना समझना और इनके गुणों का पूर्ण रूप से ज्ञान होना और इन को जागृत करना जागृति तभी होगा जो स्वयं परमात्मा चाहते हैं, अन्यथा कोई भी इन पंच तत्वों को जागृत नहीं कर सकता है । जिसने भी इन पंच तत्वों को जाग्रत किया वह इस सृष्टि में कहीं भी कुछ भी करने की क्षमता रखता है और जिसके पास यह क्षमता या गई उसी को समर्थ गुरु कहा जाता है। जिसके अधीन समस्त ब्रह्मांड समस्त सृष्टि सृष्टि का हर परमाणु जिसके अधीन हो जाता है यह पांच तत्व पृथ्वी अग्नि जल वायु और आकाश यह पांचों तत्व जब सम मात्रा में एकाकार होते हैं वहां अपने आप परमात्मा का प्रकाश उत्पन्न हो जाता है जिसे हम जीव कहते हैं जब तक पांच तत्व सम मात्रा में एकाकार नहीं होते तब तक उसमें परमात्मा की वह शक्ति उत्पन्न नहीं होती इसलिए कहा गया है कि ---- "सियाराम मय सब जग जानी" सिया का अर्थ होता है---- प्रकृति यह सृष्टि। राम का अर्थ होता है--- पुरुष। यानि परमात्मा और प्रकृति के मिलन से जो जीव उत्पन्न हुआ उसमें प्रकृति भी और परमात्मा भी दोनों समभाव में एकाकार होते हैं दोनों ने अपने अस्तित्व को छोड़ा तो एक नया अस्तित्व उत्पन्न होता है। वह जीव है और हर जीव प्रकृति और पुरुष के मिलन से ही उत्पन्न होता है ठीक वही बात सांसारिक प्राणियों में भी लागू होती है । परमात्मा ने इसी प्रकृति और पुरुष के अनुसार इस संसार में सृष्टि के समस्त जीवो का निर्माण किया है। परमात्मा का गुण है--- सत। प्रकृति का गुण है-- तम। सत और तम के मिलन से जो नया जीव उत्पन्न हुआ उसे रज कहते हैं। जीव रजोगुणी है जीव के अंदर रजोगुण ही होता है क्योंकि परमात्मा ने अपना सत्य छोड़ दिया प्रकृति ने अपना तम छोड़ दिया दोनों को जहां मिला दिया वहां पर एक तीसरा गुण उत्पन्न हो गया वह रजोगुण है वही जीव आत्मा होती है । जिसके अंदर सत और तम दोनों विद्यमान होते हैं लेकिन दोनों के ऊपर रजोगुण हावी होता है जीव रजोगुण और तमोगुण में ही भ्रमित रहता है सत की तरफ जा नहीं पाता है या जाना ही नहीं चाहता है। रजोगुण और तमोगुण उसको इतना आकर्षित करते हैं कि वह सतोगुण की तरफ देखना भी पसंद नहीं करता है। यही मनुष्य की सबसे बड़ी कमी है रजोगुण और तमोगुण संसार के चमक दमक हानि लाभ में इतना प्रेरित हो जाता है कि वह सतोगुण की तरफ कभी ध्यान देना चाहता ही नहीं यही तमोगुण और रजोगुण मैं बस जाता है सतोगुण की तरफ कभी ध्यान नहीं दे पाता है और अपने अंतिम लक्ष्य का कभी उसे पता भी नहीं चलता है जिसके द्वारा वह अपना सारा जीवन व्यर्थ ही निकाल देता है । मनुष्य का पहला कर्तव्य होता है कि--- वह सत्य को जाने पहचाने और उस सत्य की खोज करें इसकी खोज करते करते एक दिन उसको परमपिता परमात्मा के स्थान का पता चलता है और वह उस स्थान तक पहुंचने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर देता है। जैसे पहले के समय में बहुत सारी कहानियां मिलती है कि बड़े-बड़े राजाओं महाराजाओं ने अपने समस्त राज पाठ का त्याग करके ईश्वर का ध्यान करने तप करने जंगल में चले जाते थे उस में ऐसा क्या आनंद है जिस आनंद को पाने के लिए वह अपना संसार का सारा राजपाट छोड़कर चला जाता था। आनंद का एक झलक मात्र मिल जाए तो उस आनंद के सामने संसार के सारे आलम फीके पड़ जाते हैं वहीं लक्ष्य हमारी जिंदगी का अंतिम लक्ष्य है और उसी लक्ष्य को प्राप्त करना हमारा उद्देश्य है यही हमारा परम कर्तव्य है। इस परम कर्तव्य से जो भटक गया उसको बार-बार शरीर धारण करके संसार में आना है और जब तक वह अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता तब तक उसको आते ही रहना है यह क्रिया निरंतर चलती रहेगी जब तक मनुष्य अपने अंतिम लक्ष्य तक या यूं कहें कि जीव जब तक अपने अंशी यानी ईश्वर तक पहुंच नहीं जाता है । तब तक जन्म मरण का बंधन निरंतर चलता रहता है शरीर बहुत बदलती है बहुत योनियों में भटकना पड़ता है। जब तक मनुष्य अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाता है तब तक जन्म मरण के बंधन से सांसारिक कष्टों से उसको कभी मुक्ति नहीं मिल सकती है । कहने का सिर्फ इतना अर्थ है जीवन में सब कुछ करते हुए उस ईश्वर का ध्यान करते रहें, कम से कम 10-20 मिनट हम रोज ईश्वर से प्रार्थना तो कर ही सकते हैं क्योंकि प्रायश्चित ऐसी अग्नि है जो जीव के बड़े से बड़े पापों को नष्ट कर देती है प्रायश्चित करना हमारे बस में है। ईश्वर को प्राप्त करना हमारे बस में है लेकिन उसके लिए हमको मार्ग नहीं मिलता है यदि हम प्रायश्चित करना आज से ही चालू कर देते हैं तो निश्चित रूप से ईश्वर किसी ना किसी रूप में हमारे सामने आकर हमको अपने सही स्थान का पता बताएगें वहां तक पहुंचने का सही रास्ता दिखलाएगें, इसलिए संसार का हर काम पूरा करिए हर सुख सुविधा का आनंद लेते हुए यह मत भूलिए हम उस परमपिता परमेश्वर के पुत्र हैं हम जब से अलग हुए हैं। आज तक हम कभी भी अपने उस पिता का दर्शन नहीं कर पाए हैं हमें तो पता नहीं है लेकिन उस पिता को तो सब पता है कि मेरा बच्चा कब से हम से अलग हुआ है और कब तक हमसे अलग रहेगा एक खोए हुए पुत्र के पिता से पूछिए कि उसके ऊपर क्या गुजरती है जिसका पुत्र गायब हो गया हो संसार में नहीं मिल रहा हो ऐसे पुत्र को अगर यदि कोई उसके पिता से मिलवा देता है संसार का सबसे बड़ा पुण्य का काम होता है इसलिए संसार का हर कार्य करते हुए संसार का हर सुख दुख हर सुख सुविधा का आनंद लेते हुए परमात्मा को हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए। परमात्मा हमें अपनी याद दिलाता है क्योंकि परमात्मा ही हमारे जीवात्मा में बैठा हुआ है हमको सुलाता है हमको जगाता है हमको सारे दुख सुख का अनुभव करवाता है। हमारे सारे कर्मों को करवा रहा है हमारी युवा चेतना जिसके द्वारा हमारा शरीर चलाएं मान है हमारी सारी इंद्रियां चलाएं मान है हमारी आंख कार्य कर रही है,हमारे हाथ पैर इत्यादि सारी की सारी इंद्रियां जिस चेतना के कारण चैतन्य है वही चेतना शक्ति परमात्मा है , उस परमात्मा के हम इतने नजदीक होते हुए अपने आपको परमात्मा से कितना दूर देखते हैं कितना दूर समझ रहे हैं यही हमारा अज्ञान है जिसने हमको परमात्मा से दूर कर रखा है । एक स्थान पर पढ़ा था उसमें लिखा था---- "सब में वही व्यापक एक समान। मेहंदी में जिस भांति है लाली अन्तर्ध्यान।।" इसका सीधा अर्थ यही होता है जिस प्रकार मेहदीं के पत्तों में लाली हमको दिखाई नहीं देती है उसी प्रकार से परमात्मा भी हमारे अंदर ही है लेकिन हमको दिखाई नहीं देता है समय आएगा जैसे मेहंदी को दिया जाता है पीसने के बाद उसका लाली अपने आप प्रकट हो जाती है । उसी प्रकार से परमात्मा भी हमारे अंदर है और समय आने पर वह अपने आप प्रकट हो जाता है मेहंदी के पत्तों को तोड लिए फायदा लिए कितने टुकड़े कर लिए पर उसमें कहीं लाली दिखती नहीं है ठीक उसी प्रकार से हमारे शरीर को भी कितने भी जगह से चीर डालिए कहीं भी परमात्मा युवा करंट शक्ति कहीं दिखाई नहीं देती है। लेकिन वह शक्ति कार्यान्वित है कार्य कर रही है हम सुनते हैं देखते हैं बोलते हैं समझते हैं हमारा मन कार्य कर रहा है हमारी बुद्धि कार्य कर रही है हमारा अहंकार कर रहा है हमारा विवेक कार्य कर रहा है हमारे सारी की सारी इंद्रियां कार्य कर रही है इसको जो कार्य करवाने की जो क्षमता जो इनकी जो शक्ति जो हंसी आ रही है। वह परमात्मा से आ रही है वही परमात्मा का अपना स्थान है उसी परमात्मा के उसी स्थान तक जाना है वही हमारा अंतिम लक्ष्य जहां पहुंचकर हमें परमात्मा के दर्शन होते हैं परमात्मा हमको अपनी गोद में बिठा लेता है। हम परमात्मा का आलिंगन करते हैं हमारी बुद्धि हमारा मन हमारा यहां सब परमात्मा से एकाकार हो जाता है यहां तक कि हम स्वयं अपने अंदर ही पद परमात्मा को देखने लगते हैं।

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भागवत कथा में बांस की स्थापना क्यों की जाती है? जब महात्मा गोकर्ण जी ने महाप्रेत धुंधुकारी के उद्धार के लिए श्रीमद् भागवत की कथा सुनायी थी, तक धुंधुकारी के बैठने के लिए कोई बांस की अलग से व्यवस्था नहीं की थी । बल्कि उसके बैठने के लिए एक सामान्य आसान ही बिछाया गया था । महात्मा गोकर्ण जी ने धुंधुकारी का आह्वान किया और कहा - "भैया धुंधुकारी ! आप जहाँ कहीं भी हों, आ करके इस आसान पर बैठ जाईये । यह भागवत जी की परम् पवित्र कथा विशेषकर तेरे लिए ही हो रही है । इसको सुनकर तुम इस प्रेत योनि से मुक्त हो जाओगे । अब धुंधुकारी का कोई शरीर तो था नहीं, जो आसन पर स्थिर रहकर भागवत जी की कथा सुन पाते । वह जब जब आसन पर बैठने लगता, हवा का कोई झोंका आता और उसे कहीं दूर उड़ाकर ले जाता । ऐसा उसके साथ बार-बार हुआ । वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाये कि मुझे हवा उड़ा ना पाए और मैं सात दिन तक एक स्थान पर बैठकर भागवत जी की मंगलमयी कथा सुन पाऊँ, जिससे मेरा उद्धार हो जाये और मेरी मुक्ति हो जाये । वह सोचने लगा कि मेरे तो अब माता-पिता भी नहीं हैं, जिनके भीतर प्रवेश करके या उनके माध्यम से मैं कथा सुन पाता । वो भी मेरे ही कारण मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं । मेरे परिवार का तो कोई सदस्य भी नहीं बचा, जिनके माध्यम से मैं भागवत जी की मोक्षदायिनी कथा सुन पाऊँ । अब तो सिर्फ मेरे सौतेले भाई महात्मा गोकर्ण ही बचे हैं । जिनका जन्म गऊ माता के गर्भ से हुआ है । लेकिन उनके अन्दर मैं कैसे प्रवेश कर सकता हूँ, क्योंकि वो तो पवित्र व्यास पीठ पर बैठकर मुझे परमात्मा की अमृतमयी कथा सुनाने के लिए उपस्थित हैं । वह धुंधुकारी महाप्रेत ऐसा विचार कर ही रहा था कि उसने देखा जहाँ व्यास मंच बना हुआ है, वहाँ बांस का एक बगीचा भी है और उसकी नजर एक सात पोरी के बांस पर पड़ी । यह सोचकर कि बांस में हवा का प्रकोप नहीं होगा, सो वह बांस के अन्दर प्रवेश कर गया और बांस की पहली पोरी में जाकर बैठ गया । पहले दिन की कथा के प्रभाव से बांस की पहली पोरी चटक गयी । धुंधुकारी दूसरी पोरी में जाकर बैठ गया । दूसरे दिन की कथा के प्रभाव से दूसरी पोरी चटक गयी । धुंधुकारी तीसरी पोरी में जाकर बैठ गया । ऐसे ही प्रतिदिन की कथा के प्रभाव से क्रमशः बांस की एक-एक पोरी चटकती चली गयी और जब अन्तिम सातवें दिन की कथा चल रही थी तो धुंधुकारी महाप्रेत भी अन्तिम सातवीं पोरी में ही बैठा हुआ था । अब जैसे ही अन्तिम सातवें दिन भागवत जी की कथा का पूर्ण विश्राम हुआ तो बांस बीच में से दो फाड़ हो गया और धुंधुकारी महाप्रेत देवताओं के समान शरीर धारण करके प्रकट हो गया । उसने हाथ जोड़कर बड़े ही विनय भाव से महात्मा गोकर्ण जी का धन्यवाद किया और कहा - "भैया जी ! मैं आपका शुक्रिया किन शब्दों में करुँ ? मेरे पास तो शब्द भी नहीं हैं । आपने जो परमात्मा की मंगलमयी पवित्र कथा सुनाई, देखो उस महाभयंकर महाप्रेत योनि से मैं मुक्त हो गया हूँ और मुझे अब देव योनि प्राप्त हो गयी है । आपको मेरा बारम्बार प्रणाम् तभी सबके देखते-देखते धुंधुकारी के लिए भगवान के धाम से सुन्दर विमान आया और धुंधुकारी विमान में बैठकर भगवान के धाम को चले गए । सही मायने में सात पोरी का बांस और कुछ नहीं, हमारा अपना शरीर ही है । हमारे शरीर में मुख्य सात चक्र हैं । मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहद चक्र,विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र । यदि किसी योग्य गुरु के सानिध्य में रहकर प्राणायाम का अभ्यास करते हुए मनोयोग से सात दिन की कथा सुनें तो उसको आत्म ज्ञान प्राप्त हो जाता है और उसकी कुण्डलिनी शक्ति पूर्णरुप से जागृत हो जाती है । इसमें कोई शक नहीं है । यह सात पोरी का बांस हमारा ही शरीर है।

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Rajesh joshi Jan 17, 2021

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शिव जटाजूट स्तुतिः ••••••••••••••••••••••••• स धूर्जटिजटाजूटो जायतां विजयाय वः। यत्रैककपलितभ्रान्तिं करोत्यद्यापि जाह्नवी।। जिस भगवान शंकर के जटाजूट में रहने वाली गंगाजी उनके जटाजूट में पके हुए बाल की भ्रांति आज भी पैदा कर रही हैं उन भगवान धूर्जटि का जटाजूट हम लोगों के विजय के लिए हो । चूडापीडकपालसंकुलगलन्मन्दाकिनीवारयो, विद्युत्प्रायललाटलोचनपुटज्योतिर्विमिश्रत्विषः। पान्तु त्वामकठोरकेतकशिखासंदिग्धमुग्धेन्दवो, भूतेशस्य भुजंगवल्लिवलयस्रङ्नद्धजूटा जटाः।। भगवान शिव के सिर की जटा भुजंग रुपी लताओं की वलय रुपी माला से बँधी हुई है । उससे शिरोभूषण एवं कपाल से व्याप्त मन्दाकिनी के जल की धारा निकल रही है । शिव के ललाट प्रदेश में स्थित नेत्र से बिजली की सी ज्योति छिटक रही है । उस अवस्था में सुन्दर चन्द्रमा में केतकी के छोटे से सुकोमल फूल का भ्रम हो जाता है । ऐसा भगवान शंकर का वह जटाजूट हम सबकी रक्षा करें। गङ्गावारिभिरुक्षिता फणिफणैरुत्पल्लवास्तच्छिखा- रत्नैः कोरकिताः सितांशुकलया स्मेरैकपुष्पश्रियः। आनन्दाश्रुपरिप्लुताक्षिहुतभुग्धूमैर्मिलद्दोहदा , नाल्पं कल्पलताः फलं ददतु वो$भीष्टं जटा धूर्जटेः।। धूर्जटि भगवान शंकर की जटा निरन्तर गंगाजल से अभिषिक्त हो रही है ,सापों के फणों के कारण जटा का अग्रभाग ऊपर उठे हुए पल्लवों की भांति प्रतीत हो रहा है, साँपो के फणों मे लगी हुई मणियों की ज्वाला जटाप्रदेश में विखरित हो रही है चन्द्रमा की किरणों के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो विकसित पुष्पों की छटा बिखरी हुई हो । आनन्दाश्रुओं से परिपूरित होने के कारण अग्नि रुपी नेत्र से निकलती हुई धूम्रशिखा के समान, कल्पलता सदृश समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली भगवान धूर्जटि (शिव)-- की जटा हम लोगों को समस्त अभीष्ट प्रदान करें।

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Manoj Kumar Aggarwal Jan 17, 2021

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Shyam Pandit Jan 15, 2021

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शिव जो धारण करते हैं, उनके व्यापक अर्थ हैं :-- ================================== जटाएं : ------- शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं। चंद्र :----- चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है। त्रिनेत्र : ---- शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं। सर्पहार : ---- सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है। त्रिशूल :------ शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है। डमरू : ----- शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है। मुंडमाला :---- शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है। छाल : ---- शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है। भस्म : ----- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है। वृषभ : ----- शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं। इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।

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anuradha mehra Jan 16, 2021

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mantu Sharma Jan 15, 2021

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Mohit Bhatnagar Jan 17, 2021

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