भीमशंकर ज्योतिर्लिंग ।

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग ।
भीमशंकर ज्योतिर्लिंग ।

#ज्ञानवर्षा #मंदिर #महादेव
धर्म यात्रा

भीमशंकर #ज्योतिर्लिंग- कुंभकर्ण के पुत्र को मार कर यहां स्थापित हुए थे भगवान #शिव

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में भीमाशंकर का स्थान छठा है। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे से लगभग 110 किमी दूर सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के पीछे कुंभकर्ण के पुत्र भीम की एक कथा प्रसिद्ध है।

ऐसे हुई थी यहां ज्योतिर्लिंग की स्थापना

कहा जाता है कि कुंभकर्ण के एक पुत्र का नाम भीम था। कुंभकर्ण को कर्कटी नाम की एक महिला पर्वत पर मिली थी। उसे देखकर कुंभकर्ण उस पर मोहित हो गया और उससे विवाह कर लिया। विवाह के बाद कुंभकर्ण लंका लौट आया, लेकिन कर्कटी पर्वत पर ही रही। कुछ समय बाद कर्कटी को भीम नाम का पुत्र हुआ। जब श्रीराम ने कुंभकर्ण का वध कर दिया तो कर्कटी ने अपने पुत्र को देवताओं के छल से दूर रखने का फैसला किया।

बड़े होने पर जब भीम को अपने पिता की मृत्यु का कारण पता चला तो उसने देवताओं से बदला लेने का निश्चय कर लिया। भीम ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके उनसे बहुत ताकतवर होने का वरदान प्राप्त कर लिया। कामरूपेश्वप नाम के राजा भगवान शिव के भक्त थे। एक दिन भीम ने राजा को शिवलिंग की पूजा करते हुए देख लिया। भीम ने राजा को भगवान की पूजा छोड़ उसकी पूजा करने को कहा। राजा के बात न मानने पर भीम ने उन्हें बंदी बना लिया। राजा ने कारागार में ही शिवलिंग बना कर उनकी पूजा करने लगा। जब भीम ने यह देखा तो उसने अपनी तलवार से राजा के बनाए शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया। ऐसा करने पर शिवलिंग में से स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए। भगवान शिव और भीम के बीच घोर युद्ध हुआ, जिसमें भीम की मृत्यु हो गई। फिर देवताओं ने भगवान शिव से हमेशा के लिए उसी स्थान पर रहने की प्रार्थना की। देवताओं के कहने पर शिव लिंग के रूप में उसी स्थान पर स्थापित हो गए। इस स्थान पर भीम से युद्ध करने की वजह से इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमशंकर पड़ गया।

ऐसा है मंदिर का स्वरूप

भीमशंकर मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन यहां के कुछ भाग का निर्माण नया भी है। इस मंदिर के शिखर का निर्माण कई प्रकार के पत्थरों से किया गया है। यह मंदिर मुख्यतः नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर में कहीं-कहीं इंडो-आर्यन शैली भी देखी जा सकती है।

देवी पार्वती का मंदिर भी है यहां

भीमशंकर मंदिर से पहले ही शिखर पर देवी पार्वती का एक मंदिर है। इसे कमलजा मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि इसी स्थान पर देवी ने राक्षस त्रिपुरासुर से युद्ध में भगवान शिव की सहायता की थी। युद्ध के बाद भगवान ब्रह्मा ने देवी पार्वती की कमलों से पूजा की थी।

मंदिर के पास स्थित है कई कुंड

यहां के मुख्य मंदिर के पास मोक्ष कुंड, सर्वतीर्थ कुंड, ज्ञान कुंड, और कुषारण्य कुंड भी स्थित है। इनमें से मोक्ष नामक कुंड को महर्षि कौशिक से जुड़ा हुआ माना जाता है और कुशारण्य कुंड से भीम नदी का उद्गम माना जाता है।

कब जाएं

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग जाने के लिए साल का कोई भी समय चुना जा सकता है। महाशिवरात्रि के समय यहां पर विशेष मेला लगता है।

भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के आस-पास घूमने के स्थान

1. हनुमान तालाब- भीमशंकर मंदिर से कुछ दूरी पर हनुमान तालाब नामक स्थान है।
2. गुप्त भीमशंकर- भीमशंकर मंदिर से कुछ दूरी पर गुप्त भीमशंकर स्थित है।
3. कमलजा देवी- भीमशंकर मंदिर से पहले देवी पार्वती का कमलजा नामक एक मंदिर है।

+135 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 34 शेयर
white beauty Aug 3, 2020

+11 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
white beauty Aug 3, 2020

+12 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर

*क्या आप भी कल दिपक प्रज्वलित करेगे....?? *अगर हां तो जय श्री राम का उदघोष हो जाये...🚩🙏 *जय श्री राम जी...मेरी तैयारी तो हो गई...🙏🙏 👇👇👇👇🙏🙏🙏🚩🚩🚩👇👇👇👇 *जय श्री राम जी...🙏🚩🙏 *5-08-2020 को अयोध्या मैं प्रभु श्री राम का *घर बनने जा रहा है ईट लगाने नहीं जा सकते *लेकिन पाँच घी के दिपक तो अपने घर मैं *प्रज्वलित कर सकते है जय श्री राम जी..🙏🚩 🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩🙏🚩 *भगवान राम के संबंध में 12 रोचक तथ्‍य, आप भी जानिए इस रहस्य को.... 'राम' यह शब्द दिखने में जितना सुंदर है उससे कहीं महत्वपूर्ण है इसका उच्चारण। राम कहने मात्र से शरीर और मन में अलग ही तरह की प्रतिक्रिया होती है जो हमें आत्मिक शांति देती है। हिन्दू धर्म के चार आधार स्तंभों में से एक है प्रभु श्रीराम। भगवान श्री राम ने एक आदर्श चरित्र प्रस्तुत कर समाज को एक सूत्र में बांधा था। भारत की आत्मा है प्रभु श्रीराम। आओ जानते हैं उनके बारे में 12 रोचक तथ्‍य। 1.राम का जन्म- भगवान राम एक ऐतिहासिक महापुरुष थे और इसके पर्याप्त प्रमाण हैं। शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। उपरोक्त जन्म का समय राम की वंशपरंपरा और उनकी पीढ़ियों से भी सिद्ध होता है। अयोध्या के इतिहास और अयोध्या की वंशावली से भी यह सिद्ध होता है। 2.राम पर लिखे ग्रंथ- प्रभु श्रीराम पर वैसे को कई ग्रंथ लिखे गए लेकिन वाल्मीकि कृत रामायण ही प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। यह मूल संस्कृत में लिखा गया ग्रंथ है। तमिल भाषा में कम्बन रामायण, असम में असमी रामायण, उड़िया में विलंका रामायण, कन्नड़ में पंप रामायण, कश्मीर में कश्मीरी रामायण, बंगाली में रामायण पांचाली, मराठी में भावार्थ रामायण आदि भारतीय भाषाओं में प्राचीनकाल में ही रामायण लिखी गई। मुगलकाल में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अवधि भाषा में रामचरित मानस लिखी जो की हिन्दीभाषा और उससे जुड़े राज्यों में प्रचलित है। विदेशी में कंपूचिया की रामकेर्ति या रिआमकेर रामायण, लाओस फ्रलक-फ्रलाम (रामजातक), मलयेशिया की हिकायत सेरीराम, थाईलैंड की रामकियेन और नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण आदि प्रचलीत है। इसके अलावा भी अन्य कई देशों में वहां की भाषा में रामायण लिखी गई है। 3.गौतम बुद्ध के पूर्वज राम- वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे। उनमें से एक इक्ष्वाकु के कुल में रघु हुए। रघु के कल में राम हुए। राम के पुत्र कुश हुए कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए जो महाभारत के काल में कौरवों की ओर से लड़े थे। शल्य की 25वीं पीढ़ी में सिद्धार्थ हुए जो शाक्य पुत्र शुद्धोधन के बेटे थे। इन्हीं का नाम आगे चलकर गौतम बुद्ध हुआ। यह नेपाल के लुम्बिनी में रहते थे। सिद्धार्थ के बाद राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। जयपूर राजघरा की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे। 4.वनवासी और आदिवासियों के पूज्जनीय प्रभु श्रीराम- भगवान राम को 14 वर्ष को वनवास हुए था। उनमें से 12 वर्ष उन्होंने जंगल में रहकर ही काटे। 12वें वर्ष की समाप्त के दौरान सीता का हरण हो गया तो बाद के 2 वर्ष उन्होंने सीता को ढूंढने, वानर सेना का गठन करने और रावण से युद्ध करने में गुजारे। 14 वर्ष के दौरान उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किए जिसके चलते आज भी हमारे देश और देश के बाहर राम संस्कृति और धर्म को देखा जा सकता है। प्रभु श्रीराम ने वन में बहुत ही सादगीभरा तपस्वी का जीवन जिया। वे जहां भी जाते थे तो 3 लोगों के रहने के लिए एक झोपड़ी बनाते थे। वहीं भूमि पर सोते, रोज कंद-मूल लाकर खाते और प्रतिदिन साधना करते थे। उनके तन पर खुद के ही बनाए हुए वस्त्र होते थे। धनुष और बाण से वे जंगलों में राक्षसों और हिंसक पशुओं से सभी की रक्षा करते थे। इस दौरान उन्होंने देश के सभी संतों के आश्रमों को बर्बर लोगों के आतंक से बचाया। अत्रि को राक्षसों से मुक्ति दिलाने के बाद प्रभु श्रीराम दंडकारण्य क्षेत्र में चले गए, जहां आदिवासियों की बहुलता थी। यहां के आदिवासियों को बाणासुर के अत्याचार से मुक्त कराने के बाद प्रभु श्रीराम 10 वर्षों तक आदिवासियों के बीच ही रहे। उन्होंने वनवासी और आदिवासियों के अलावा निषाद, वानर, मतंग और रीछ समाज के लोगों को भी धर्म, कर्म और वेदों की शिक्षा दी। वन में रहकर उन्होंने वनवासी और आदिवासियों को धनुष एवं बाण बनाना सिखाया, तन पर कपड़े पहनना सिखाया, गुफाओं का उपयोग रहने के लिए कैसे करें, ये बताया और धर्म के मार्ग पर चलकर अपने री‍ति-रिवाज कैसे संपन्न करें, यह भी बताया। उन्होंने आदिवासियों के बीच परिवार की धारणा का भी विकास किया और एक-दूसरे का सम्मान करना भी सिखाया। उन्हीं के कारण हमारे देश में आदिवासियों के कबीले नहीं, समुदाय होते हैं। उन्हीं के कारण ही देशभर के आदिवासियों के रीति-रिवाजों में समानता पाई जाती है। भगवान श्रीराम ने ही सर्वप्रथम भारत की सभी जातियों और संप्रदायों को एक सूत्र में बांधने का कार्य अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान किया था। एक भारत का निर्माण कर उन्होंने सभी भारतीयों के साथ मिलकर अखंड भारत की स्थापना की थी। भारतीय राज्य तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल, कर्नाटक सहित नेपाल, लाओस, कंपूचिया, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, बाली, जावा, सुमात्रा और थाईलैंड आदि देशों की लोक-संस्कृति व ग्रंथों में आज भी राम इसीलिए जिंदा हैं। 5.शिवलिंग और सेतु बनवाया- 14 वर्ष के वनवास में से अंतिम 2 वर्ष प्रभु श्रीराम दंडकारण्य के वन से निकलकर सीता माता की खोज में देश के अन्य जंगलों में भ्रमण करने लगे और वहां उनका सामना देश की अन्य कई जातियों और वनवासियों से हुआ। उन्होंने कई जातियों को इकट्ठा करके एक सेना का गठन किया और वे लंकी ओर चल पड़े। श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया। महाकाव्‍य 'रामायण' के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है। इसके बाद प्रभु श्रीराम ने नल और नील के माध्यम से विश्व का पहला सेतु बनवाया था और वह भी समुद्र के ऊपर। आज उसे रामसेतु कहते हैं ज‍बकि राम ने इस सेतु का नाम नल सेतु रखा था। 6.रामायण के सबूत- जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। इन स्थानों में से प्रमुख के नाम है- सरयू और तमसा नदी के पास के स्थान, प्रयागराज के पास श्रृंगवेरपुर तीर्थ, सिंगरौर में गंगा पार कुरई गांव, प्रायागराज, चित्रकूट (मप्र), सतना (मप्र), दंडकारण्य के कई स्थान, पंचवटी नासिक, सर्वतीर्थ, पर्णशाला, तुंगभद्रा, शबरी का आश्रम, ऋष्यमूक पर्वत, कोडीकरई, रामेश्‍वरम, धनुषकोडी, रामसेतु और नुवारा एलिया पर्वत श्रृंखला। 7.रामायण के प्रमाण- श्रीवाल्मीकि ने रामायण की संरचना श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वर्ष 5075 ईपू के आसपास की होगी (1/4/1- 2)। श्रुति-स्मृति की प्रथा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचलित रहने के बाद वर्ष 1000 ईपू के आसपास इसको लिखित रूप दिया गया होगा। इस निष्कर्ष के बहुत से प्रमाण मिलते हैं। रामायण की कहानी के संदर्भ निम्नलिखित रूप में उपलब्ध हैं- कौटिल्य का अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईपू), बौ‍द्ध साहित्य में दशरथ जातक (तीसरी शताब्दी ईपू), कौशाम्बी में खुदाई में मिलीं टेराकोटा (पक्की मिट्‍टी) की मूर्तियां (दूसरी शताब्दी ईपू), नागार्जुनकोंडा (आंध्रप्रदेश) में खुदाई में मिले स्टोन पैनल (तीसरी शताब्दी), नचार खेड़ा (हरियाणा) में मिले टेराकोटा पैनल (चौथी शताब्दी), श्रीलंका के प्रसिद्ध कवि कुमार दास की काव्य रचना 'जानकी हरण' (सातवीं शताब्दी), आदि। 8.ऐसा था राम का काल- राम के काल में नदी में नाव और पोत चलते थे। इसी काल में कुछ लोगों के पास विमान भी होते थे जिसमें 4 से 6 लोग बैठकर यात्रा कर सकते थे। रामायण के अनुसार रावण के पास वायुयानों के साथ ही कई समुद्र जलपोत भी थे। रामायण काल में शतरंज खेला जाता था। इस खेल का आविष्कार लंका के राजा रावण की रानी मंदोदरी ने किया था। तब इसे चतुरंग कहा जाता था। यह भी कहा जाता है कि राम के काल में पतंग भी उड़ाई जाती थी। राम-रावण युद्ध केवल धनुष-बाण और गदा-भाला जैसे अस्‍त्रों तक सीमित नहीं था। कहते हैं कि युद्ध के दौरान राम सेना पर सद्धासुर ने ऐसा विकट अस्‍त्र छोड़ा जिससे सुवेल पर्वत की चोटी को सागर में गिराते हुए सीधे दक्षिण भारत के गिरि को भी समुद्र में गिरा दिया था। सद्धासुर का अंत करने के लिए बिजली के आविष्कारक मुनि अगस्‍त्‍य ने सद्धासुर के ऊपर ब्रह्मास्‍त्र छुड़वाया था जिससे सद्धासुर और अनेक सैनिक तो मारे ही गए, लंका के शिव मंदिर भी विस्‍फोट के साथ ढहकर समुद्र में गिर गए थे। इसी तरह उस काल में दूरबीन भी होता था। राम को अग्‍निवेश ने एक विशिष्‍ट कांच दिया था, जो संभवत: दूरबीन था। इसी दूरबीन से राम ने लंका के द्वार पर लगे 'दारूपंच अस्‍त्र' को देखा और प्रक्षेपास्‍त्र छोड़कर नष्‍ट कर दिया था। राम और रावण की सेनाओं के पास भुशुंडियां (बंदूकें) थीं। कुछ सैनिकों के पास स्‍वचालित भुशुंडियां भी थीं। गस्‍त्‍य ने राम के हितार्थ शंकर से 'अजगव धनुष' मांगा था। इस धनुष की व्‍याख्‍या करते हुए श्री शाही 'लंकेश्‍वर' में लिखते हैं- 'चाप' अभी बंदूक के घोड़े (ट्रिगर) के लिए उपयोग में लाया जाता है। चाप ट्रिगर का ही पर्यायवाची होकर अजगव धनुष है। पिनाक धनुष में ये सब अनेक पहियों वाली गाड़ी पर रखे रहते थे। तब चाप चढ़ाने अथवा घोड़ा (ट्रिगर) दबाने से भंयकर विस्‍फोट करते हुए शत्रुओं का विनाश करते थे। इसके अलावा दूरभाष की तरह उस युग में 'दूर नियंत्रण यंत्र' था जिसे 'मधुमक्‍खी' कहा जाता था। वि‍भीषण को लंका से निष्काषित कर दिया था, तब वह लंका से प्रयाण करते समय मधुमक्‍खी और दर्पण यंत्रों के अलावा अपने 4 विश्‍वसनीय मंत्री अनल, पनस, संपाती और प्रभाती को भी राम की शरण में ले गया था। राम के काल में सभी लोग बहुत ही नैतिक और सभ्य थे। सभी मर्यादा में रहकर जीवन यापन करते थे। अधिकतर लोगों को वेद का ज्ञान था। 9.रामायण काल के ये लोग आज भी जिंदा हैं- आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रामायण काल के तीन लोग आज भी जिंदा है। इका नाम है हनुमान, जामवंत और विभिषण। इनके काल के पूर्व के दो लोग भी आज तक जिंदा है। उनके नाम हैं- विरोचन पुत्र महाबली और जमदग्नि के पुत्र परशुराम। 10. श्रीराम की बहन- श्रीराम की दो बहनें भी थी एक शांता और दूसरी कुकबी। हम यहां आपको शांता के बारे में बताएंगे। दक्षिण भारत की रामायण के अनुसार श्रीराम की बहन का नाम शांता था, जो चारों भाइयों से बड़ी थीं। शांता राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थीं, लेकिन पैदा होने के कुछ वर्षों बाद कुछ कारणों से राजा दशरथ ने शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को दे दिया था। भगवान श्रीराम की बड़ी बहन का पालन-पोषण राजा रोमपद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने किया, जो महारानी कौशल्या की बहन अर्थात श्रीराम की मौसी थीं। 11.नहीं किया था राम ने सीता का परित्याग- पहले रामायण 6 कांडों की होती थी, उसमें उत्तरकांड नहीं होता था। फिर बौद्धकाल में उसमें राम और सीता के बारे में सच-झूठ लिखकर उत्तरकांड जोड़ दिया गया। उस काल से ही इस कांड पर विद्वानों ने घोर विरोध जताया था, लेकिन इस उत्तरकांड के चलते ही साहित्यकारों, कवियों और उपन्यासकारों को लिखने के लिए एक नया मसाला मिल गया और इस तरह प्रभु राम का इतिहास धीरे-धीरे मिश्रित होते गए। विपिन किशोर सिन्हा ने एक छोटी शोध पुस्तिका लिखी है जिसका नाम है- 'राम ने सीता-परित्याग कभी किया ही नहीं।' यह किताब संस्कृति शोध एवं प्रकाशन वाराणसी ने प्रकाशित की है। इस किताब में वे सारे तथ्‍य मौजूद हैं, जो यह बताते हैं कि राम ने कभी सीता का परित्याग नहीं किया। रामकथा पर सबसे प्रामाणिक शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के का स्पष्ट मत है कि 'वाल्मीकि रामायण का 'उत्तरकांड' मूल रामायण के बहुत बाद की पूर्णत: प्रक्षिप्त रचना है।' (रामकथा उत्पत्ति विकास- हिन्दी परिषद, हिन्दी विभाग प्रयाग विश्वविद्यालय, प्रथम संस्करण 1950) 12.राम की जल समाधि- श्रीराम द्वारा जल समाधि लेने की घटना को हिन्दू दलितों का धर्मान्तरण करने वाले आलोचकों ने आत्महत्या करना बताया। मध्यकाल में ऐसे बहुत से साधु हुए हैं जिन्होंने जिंदा रहते हुए सभी के सामने धीरे-धीरे देह छोड़ दी और फिर उनकी समाधि बनाई गई। राजस्थान के महान संत बाबा रामदेव (रामापीर) ने जिंदा समाधि ले ली थी, तो क्या हम यह कहें कि उन्होंने आत्महत्या कर ली? दरअसल, अयोध्या आगमन के बाद राम ने कई वर्षों तक अयोध्या का राजपाट संभाला और इसके बाद गुरु वशिष्ठ व ब्रह्मा ने उनको संसार से मुक्त हो जाने का आदेश दिया। एक घटना के बाद उन्होंने जल समाधि ले ली थी। सरयू नदी में श्रीराम ने जल समाधि ले ली थी। अश्विन पूर्णिमा के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अयोध्या से सटे फैजाबाद शहर के सरयू किनारे जल समाधि लेकर महाप्रयाण किया। श्रीराम ने सभी की उपस्थिति में ब्रह्म मुहूर्त में सरयू नदी की ओर प्रयाण किया उनके पीछे थे उनके परिवार के सदस्य भरत, शत्रुघ्न, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति। ॐ का उच्चारण करते हुए वे सरयू के जल में एक एक पग आगे बढ़ते गए और जल उनके हृदय और अधरों को छूता हुआ सिर के उपर चढ़ गया। 🚩🙏*जय श्री सियाराम*🙏🚩

+199 प्रतिक्रिया 37 कॉमेंट्स • 98 शेयर
Shikhaashu singh Aug 5, 2020

+59 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 87 शेयर
Dr.ratan Singh Aug 4, 2020

🎎श्रावण माह विशेष🎎 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🚩🔱ॐ नमः शिवाय 🔱🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 💐श्रावण मास माहात्म्य 💐 ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ ✍️ अध्याय= 21-22✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🎎श्रावण पूर्णिमा पर किये जाने वाले कृत्यों का संक्षिप्त वर्णन तथा रक्षा बंधन की कथा🎎 💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫💫 सनत्कुमार बोले – हे दयानिधे ! कृपा करके अब आप पौर्णमासी व्रत की विधि कहिए क्योंकि हे स्वामिन ! इसका माहात्म्य सुनने वालों की श्रवणेच्छा बढ़ती है. ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! इस श्रावण मास में पूर्णिमा तिथि को उत्सर्जन तथा उपाकर्म संपन्न होते हैं. पौष के पूर्णिमा तथा माघ की पूर्णिमा तिथि उत्सर्जन कृत्य के लिए होती है अथवा उत्सर्जनकृत्य हेतु पौष की प्रतिपदा अथवा माघ की प्रतिपदा तिथि विहित है अथवा रोहिणी नामक नक्षत्र उत्सर्जन कृत्य के लिए प्रशस्त होता है अथवा अन्य कालों में भी अपनी-अपनी शाखा के अनुसार उत्सर्जन तथा उपाकर्म – दोनों का साथ-साथ करना उचित माना गया है. अतः श्रावण मास की पूर्णिमा को उत्सर्जन कृत्य प्रशस्त होता है. साथ ही ऋग्वेदियों के लिए उपाकर्म हेतु श्रवण नक्षत्र होना चाहिए. चतुर्दशी, पूर्णिमा अथवा प्रतिपदा तिथि में जिस दिन श्रवण नक्षत्र हो उसी दिन ऋग्वेदियों को उपाकर्म करना चाहिए. यजुर्वेदियों का उपाकर्म पूर्णिमा में और सामवेदियों का उपाकर्म हस्त नक्षत्र में होना चाहिए. शुक्र तथा गुरु के अस्तकाल में भी सुखपूर्वक उपाकर्म करना चाहिए किन्तु इस काल में इसका प्रारम्भ पहले नहीं होना चाहिए ऐसा शास्त्रविदों का मानना है. ग्रहण तथा संक्रांति के दूषित काल के अनन्तर ही इसे करना चाहिए. हस्त नक्षत्र युक्त पंचमी तिथि में अथवा भाद्रपद पूर्णिमा तिथि में उपाकर्म करें. अपने-अपने गुह्यसूत्र के अनुसार उत्सर्जन तथा उपाकर्म करें. अधिकमास आने पर इसे शुद्धमास में करना चाहिए. ये दोनों कर्म आवश्यक हैं. अतः प्रत्येक वर्ष इन्हे नियमपूर्वक करना चाहिए. उपाकर्म की समाप्ति पर द्विजातियों के विद्यमान रहने पर स्त्रियों को सभा में सभादीप निवेदन करना चाहिए. उस दीपक को आचार्य ग्रहण करे या किसी अन्य ब्राह्मण को प्रदान कर दें. दीप की विधि इस प्रकार है – सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबे के पात्र में सेर भर गेहूँ भर कर गेहूँ के आटे का दीपक बनाकर उसमें उस दीपक को जलाएं. वह दीपक घी से अथवा तेल से भरा हो और तीन बत्तियों से युक्त हो. दक्षिणा तथा ताम्बूल सहित उस दीपक को ब्राह्मण को अर्पण कर दें. दीपक की तथा विप्र की विधिवत पूजा करके निम्न मन्त्र बोले – सदक्षिणः सताम्बूलः सभादीपोयमुत्तमः | अर्पितो देवदेवस्य मम सन्तु मनोरथाः || दक्षिणा तथा ताम्बूल से युक्त यह उत्तम सभादीप मैंने देवदेव को निवेदित किया है, मेरे मनोरथ अब पूर्ण हो. सभादीप प्रदान करने से पुत्र-पौत्र आदि से युक्त कुल उज्जवलता को प्राप्त होता है और यश के साथ निरंतर बढ़ता है. इसे करने वाली स्त्री दूसरे जन्म में देवांगनाओं के समान रूप प्राप्त करती है. वह स्त्री सौभाग्यवती हो जाती है और अपने पति की अत्यधिक प्रिय पात्र होती है. इस प्रकार पांच वर्ष तक इसे करने के पश्चात उद्यापन करना चाहिए और अपने सामर्थ्य के अनुसार भक्तिपूर्वक दक्षिणा देनी चाहिए. हे सनत्कुमार यह मैंने आपसे सभादीप का शुभ माहात्म्य कह दिया. उसी रात्रि में श्रवणा कर्म का करना बताया गया है. उसके बाद वहीँ पर सर्पबलि की जाती है. अपना-अपना गृह्यसूत्र देखकर ये दोनों ही कृत्य करने चाहिए. हयग्रीव का अवतार उसी तिथि में कहा गया है अतः इस तिथि पर हयग्रीव जयंती का महोत्सव मनाना चाहिए. उनकी उपासना करने वालों के लिए यह उत्सव नित्य करना बताया गया है. श्रावण पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र में भगवान् श्रीहरि हयग्रीव के रूप में प्रकट हुए और सर्वप्रथम उन्होंने सभी पापों का नाश करने वाले सामवेद का गान किया. इन्होने सिंधु और वितस्ता नदियों के संगम स्थान में श्रवण नक्षत्र में जन्म लिया था. अतः श्रावणी के दिन वहाँ स्नान करना सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाला होता है. उस दिन वहाँ श्राङ्गधनुष, चक्र तथा गदा धारण करने वाले विष्णु की विधिवत पूजा करें. इसके बाद सामगान का श्रवण करें. ब्राह्मणों की हर प्रकार से पूजा करें और अपने बंधु-बांधवों के साथ वहाँ क्रीड़ा करे तथा भोजन करें. स्त्रियों को चाहिए कि उत्तम पति प्राप्त करने के उद्देश्य से जलक्रीड़ा करें. उस दिन अपने-अपने देश में तथा घर में इस महोत्सव को मनाना चाहिए तथा हयग्रीव की पूजा करनी चाहिए और उनके मन्त्र का जप करना चाहिए. यह मन्त्र इस प्रकार से है – आदि में “प्रणव” तथा उसके बाद “नमः” शब्द लगाकर बाद में “भगवते धर्माय” जोड़कर उसके भी बाद “आत्मविशोधन” शब्द की चतुर्थी विभक्ति – आत्मविशोधनाय – लगानी चाहिए. पुनः अंत में “नमः” शब्द प्रयुक्त करने से अठारह अक्षरों वाला – ॐ नमो भगवते धर्माय आत्मविशोधनाय नमः – मन्त्र बनता है. यह मन्त्र सभी सिद्धियाँ प्रदान करने वाला और छह प्रयोगों को सिद्ध करने वाला है. इस मन्त्र का पुरश्चरण अठारह लाख अथवा अठारह हजार जप का है. कलियुग में इसका पुरश्चरण इससे भी चार गुना जप से होना चाहिए. इस प्रकार करने पर हयग्रीव प्रसन्न होकर उत्तम वांछित फल प्रदान करते हैं. इसी पूर्णिमा के दिन रक्षा बंधन मनाया जाता है. जो सभी रोगों को दूर करने वाला तथा सभी अशुभों का नाश करने वाला है. हे मुनिश्रेष्ठ ! इसी प्रसंग में एक प्राचीन इतिहास सुनिए – इंद्र की विजय प्राप्ति के लिए इंद्राणी ने जो किया था उसे मैं बता रहा हूँ. पूर्वकाल में बारह वर्षों तक देवासुर संग्राम होता रहा तब इंद्र को थका हुआ देखकर देवी इंद्राणी ने उन सुरेंद्र से कहा – हे देव ! आज चतुर्दशी का दिन है, प्रातः होने पर सब ठीक हो जाएगा. मैं रक्षा बंधन अनुष्ठान करुँगी उससे आप अजेय हो जाएंगे और तब ऐसा कहकर इंद्राणी ने पूर्णमासी के दिन मंगल कार्य संपन्न करके इंद्र के दाहिने हाथ में आनंददायक रक्षा बाँध दी. उसके बाद ब्राह्मणों के द्वारा स्वस्त्ययन किए गए तथा रक्षा बंधन से युक्त इंद्र ने दानव सेना पर आक्रमण किया और क्षण भर में उसे जीत लिया. इस प्रकार विजयी होकर इंद्र तीनों लोकों में पुनः प्रतापवान हो गए. हे मुनीश्वर ! मैंने आपसे रक्षा बंधन के इस प्रभाव का वर्णन कर दिया जो कि विजय प्रदान करने वाला, सुख देने वाला और पुत्र, आरोग्य तथा धन प्रदान करने वाला है. सनत्कुमार बोले – हे देवश्रेष्ठ ! यह रक्षाबंधन किस विधि से, किस तिथि में तथा कब किया जाता है? हे देव ! कृपा करके इसे बताये. हे भगवन ! जैसे-जैसे आप अद्भुत बातें बताते जा रहे है वैसे-वैसे अनेक अर्थों से युक्त कथाओं को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं हो रही है. ईश्वर बोले – बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि श्रावण का महीना आने पर पूर्णिमा तिथि को सूर्योदय के समय श्रुति-स्मृति के विधान से स्नान करें. इसके बाद संध्या, जप आदि करके देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करने के बाद सुवर्णमय पात्र में बनाई गई, सुवर्ण सूत्रों से बंधी हुई, मुक्ता आदि से विभूषित, विचित्र तथा स्वच्छ रेशमी तंतुओं से निर्मित, विचित्र ग्रंथियों से सुशोभित, पदगुच्छों से अलंकृत और सर्षप तथा अक्षतों से गर्भित एक अत्यंत मनोहर रक्षा अथवा राखी बनाये. इसके बाद कलश स्थापन करके उसके ऊपर पूर्ण पात्र रखे और पुनः उस पर रक्षा को स्थापित कर दे. उसके बाद रम्य आसान पर बैठकर सुहृज्जनों के साथ वारांगनाओं के नृत्यगान आदि तथा क्रीड़ा-मंगल कृत्य में संलग्न रहे. इसके बाद यह मन्त्र पढ़कर पुरोहित रक्षाबंधन करे – “येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः | तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल||” जिस बंधन से महान बल से संपन्न दानवों के पति राजा बलि बांधे गए थे, उसी से मैं आपको बांधता हूँ, हे रक्षे ! चलायमान मत होओ, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा अन्य मनुष्यों को चाहिए कि यत्नपूर्वक ब्राह्मणों की पूजा करके रक्षाबंधन करें. जो इस विधि से रक्षाबंधन करता है, वह सभी दोषों से रहित होकर वर्ष पर्यन्त सुखी रहता है. विधान को जानने वाला जो मनुष्य शुद्ध श्रावण मास में इस रक्षाबंधन अनुष्ठान को करता है वह पुत्रों, पुत्रों तथा सुहृज्जनों के सहित एक वर्ष भर अत्यंत सुख से रहता है. उत्तम व्रत करने वालों को चाहिए कि भद्रा में रक्षाबंधन न करें क्योंकि भद्रा में बाँधी गई रक्षा विपरीत फल देने वाली होती है. || इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “उपाकर्मोत्सर्जनश्रवणाकर्म-सर्पबलिसभादीप हयग्रीव जयंती रक्षा बंधन विधि कथन” नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ || 💐💐💐💐🇮🇪💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 ✍️ अध्याय= 22 ✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🎎श्रावण मास में किए जाने वाले 🎎 🌹संकष्ट हरण व्रत का विधान🌹 ========================= ✍️ईश्वर बोले – हे मुनिश्रेष्ठ ! श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन सभी वांछित फल प्रदान करने वाला संकष्टहरण नामक व्रत करना चाहिए. सनत्कुमार बोले – किस विधि से यह व्रत किया जाता है, इस व्रत में क्या करना चाहिए, किस देवता का पूजन करना चाहिए और इसका उद्यापन कब करना चाहिए? उसके विषय में मुझे विस्तारपूर्वक बताइए. ईश्वर बोले – चतुर्थी के दिन प्रातः उठकर दंतधावन करके इस संकष्टहरण नामक शुभ व्रत को करने के लिए यह संकल्प ग्रहण करना चाहिए – हे देवेश ! आज मैं चन्द्रमा के उदय होने तक निराहार रहूँगा और रात्रि में आपकी पूजा करके भोजन करूँगा, संकट से मेरा उद्धार कीजिए. हे ब्रह्मपुत्र ! इस प्रकार संकल्प करके शुभ काले तिलों से युक्त जल से स्नान करके समस्त आह्निक कृत्य संपन्न करने के बाद गणपति की पूजा करनी चाहिए. बुद्धिमान को चाहिए की तीन माशे अथवा उसके आधे परिमाण अथवा एक माशे सुवर्ण से अथवा अपनी शक्ति के अनुसार सुवर्ण की प्रतिमा बनाए. सुवर्ण के अभाव में चांदी अथवा तांबे की ही प्रतिमा सुखपूर्वक बनाए. यदि निर्धन हो तो वह मिटटी की ही शुभ प्रतिमा बना ले किन्तु इसमें वित्त शाठ्य ना करें क्योंकि ऐसा करने पर कार्य नष्ट हो जाता है. रम्य अष्टदल कमल पर जल से पूर्ण तथा वस्त्रयुक्त कलश स्थापित करें और उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर उसमें वैदिक तथा तांत्रिक मन्त्रों द्वारा सोलहों उपचारों से देवता की पूजा करें. हे विप्र ! तिलयुक्त दस उत्तम मोदक बनाएं, उनमें से पाँच मोदक देवता को अर्पित करें और पाँच मोदक ब्राह्मण को प्रदान करें. भक्ति भाव से उस विप्र की देवता की भाँति पूजा करें और यथाशक्ति दक्षिणा देकर यह प्रार्थना करे – हे विप्रवरी ! आपको नमस्कार है. हे देव ! मैं आपको फल तथा दक्षिणा से युक्त पाँच मोदक प्रदान करता हूँ. हे द्विजश्रेष्ठ ! मेरी विपत्ति को दूर करने के लिए इसे ग्रहण कीजिए. हे विप्ररूप गणेश्वर ! मेरे द्वारा जो भी न्यून, अधिक अथवा द्रव्यहीन कृत्य किया गया हो, वह सब पूर्णता को प्राप्त हो. इसके बाद स्वादिष्ट अन्न से ब्राह्मणों को प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराएं. उसके बाद चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करे, उसका मन्त्र प्रारम्भ से सुनिए – हे क्षीरसागर से प्रादुर्भूत ! हे सुधारूप ! हे निशाकर ! हे गणेश की प्रीति को बढ़ाने वाले ! मेरे द्वारा दिए गए अर्घ्य को ग्रहण कीजिए. इस विधान के करने पर गणेश्वर प्रसन्न होते हैं और वांछित फल प्रदान करते हैं, अतः इस व्रत को अवश्य करना चाहिए. इस व्रत का अनुष्ठान करने से विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है, धन चाहने वाला धन पा जाता है, पुत्र की अभिलाषा रखने वाला पुत्र प्राप्त करता है, मोक्ष चाहने वाला उत्तम गति प्राप्त करता है, कार्य की सिद्धि चाहने वाले का कार्य सिद्ध हो जाता है और रोगी रोग से मुक्त हो जाता है. विपत्तियों में पड़े हुए, व्याकुल चित्तवाले, चिंता से ग्रस्त मनवाले तथा जिन्हे अपने सुहृज्जनों का वियोग हो गया हो – उन मनुष्यों का दुःख दूर हो जाता है. यह व्रत मनुष्यों के सभी कष्टों का निवारण करने वाला, उन्हें सभी अभीष्ट फल प्रदान करने वाला, पुत्र-पौत्र आदि देने वाला तथा सभी प्रकार की संपत्ति प्रदान कराने वाला है. हे सनत्कुमार ! अब मैं पूजन तथा जप के मंत्रो को आपसे कहता हूँ – “प्रणव” के पश्चात “नमः” शब्द लगाकर बाद में “हेरम्ब”, “मदमोदित” तथा “सङ्कष्टस्य निवारण” – इन शब्दों का चतुर्थ्यन्त जोड़कर पुनः अंत में “स्वाहा” प्रयुक्त करके इस इक्कीस वर्ण वाले मन्त्र – ॐ नमो हेरम्बाय मदमोदिताय संकष्टस्य निवारणाय स्वाहा – को बोलना चाहिए. बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इंद्र आदि लोकपालों की सभी दिशाओं में पूजा करें. अब मैं मोदकों की दूसरी विधि आपको बताता हूँ – पके हुए मूँग तथा तिलों से युक्त घी में पकाए गए तथा गरी के छोटे-छोटे टुकड़ों से मिश्रित मोदक गणेश जी को अर्पित करें. उसके बाद दूर्वा के अंकुर लेकर इन नाम पदों से पृथक-पृथक गणेश जी की पूजा करें. उन नामों को मुझसे सुनिए – हे गणाधिप ! हे उमापुत्र ! हे अघनाशन ! हे एकदन्त ! हे इभवक्त्र ! हे मूषकवाहन ! हे विनायक ! हे ईशपुत्र ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! हे विघ्नराज ! हे स्कन्द्गुरो ! हे सर्वसंकष्टनाशन ! हे लम्बोदर ! हे गणाध्यक्ष ! हे गौर्यांगमलसम्भव ! हे धूमकेतो ! हे भालचंद्र ! हे सिन्दूरासुरमर्दन ! हे विद्यानिधान ! हे विकत ! हे शूर्पकर्ण ! आपको नमस्कार है. इस प्रकार इन इक्कीस नामों से गणेश जी की पूजा करें. उसके बाद भक्ति से नम्र होकर प्रसन्नबुद्धि से गणेश देवता से इस प्रकार प्रार्थना करें – हे विघ्नराज ! आपको नमस्कार है. हे उमापुत्र ! हे अघनाशन ! जिस उद्देश्य से मैंने यथाशक्ति आज आपका पूजन किया है, उससे प्रसन्न होकर शीघ्र ही मेरे हृदयस्थित मनोरथों को पूर्ण कीजिए. हे प्रभो ! मेरे समक्ष उपस्थित विविध प्रकार के समस्त विघ्नों का नाश कीजिए, मैं यहां सभी कार्य आपकी ही कृपा से करता हूँ, मेरे शत्रुओं की बुद्धि का नाश कीजिए तथा मित्रों की उन्नति कीजिए. इसके बाद एक सौ आठ आहुति देकर होम करें. उसके बाद व्रत की संपूर्णता के लिए मोदकों का वायन प्रदान करें. उस समय यह कहें – गणेश जी की प्रसन्नता के लिए मैं सात लड्डुओं तथा सात मोदकों का वायन फल सहित ब्राह्मण को प्रदान करता हूँ. तदनन्तर हे सत्तम ! पुण्यदायिनी कथा सुनकर इस मन्त्र के द्वारा पाँच बार प्रयत्नपूर्वक चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करें – 🌷क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिगोत्रसमुद्भव | गृहाणारघ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितः शशिन || क्षीरसागर से उत्पन्न तथा अत्रिगोत्र में उत्पन्न हे चंद्र ! रोहिणी सहित आप मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्य को स्वीकार कीजिए. उसके बाद अपने अपराध के लिए देवता से क्षमा प्रार्थना करें और अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा ब्राह्मणों को जो अर्पित किया हो उसके अवशिष्ट भोजन को स्वयं ग्रहण करें. मौन होकर सात ग्रास ग्रहण करें और अशक्त हो तो इच्छानुसार भोजन करें. इसी प्रकार तीन मास अथवा चार मास तक विधानपूर्वक इस व्रत को करें. उसके बाद बुद्धिमान को चाहिए कि पाँचवें महीने में उद्यापन करे. उद्यापन के लिए बुद्धिमान को अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वर्णमयी गणेश-प्रतिमा बनानी चाहिए. उसके बाद उस भक्ति संपन्न मनुष्य को पूर्वोक्त विधान से चन्दन, सुगन्धित द्रव्य तथा अनेक प्रकार के सुन्दर पुष्पों से पूजा करनी चाहिए और एकाग्रचित्त होकर नारिकेल फल से अर्घ्य प्रदान करना चाहिए. पायस से युक्त सूप में फल रखकर और उसे लाल वस्त्र से लपेटकर यह वायन भक्त ब्राह्मण को प्रदान करें. साथ ही स्वर्ण की गणपति की प्रतिमा भी दक्षिणा सहित उन्हें दें. व्रत की पूर्णता के लिए एक आढ़क टिल का दान करें, उसके बाद “विघ्नेश प्रसन्न हों” ऐसा कहकर देवता से क्षमा प्रार्थना करें. इस प्रकार उद्यापन करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है और मनोवांछित सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं. हे सत्तम ! पूर्व कल्प में स्कंदकुमार के चले जाने पर पार्वती ने मेरी आज्ञा से चार महीने तक इस व्रत को किया था तब पाँचवें महीने में पार्वती ने कार्तिकेय को प्राप्त किया था. समुद्र पान के समय अगस्त्य जी ने इस व्रत को किया था और तीन माह में विघ्नेश्वर की कृपा से उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर ली. हे विपेन्द्र ! राजा नल के लिए दमयंती ने छह महीने तक इस व्रत को किया था तब नल को खोजती हुई दमयंती को वे मिल गए थे. जब चित्रलेखा अनिरुद्ध को बाणासुर के नगर में ले गई थी तब “वह कहाँ गया और उसे कौन ले गया” – यह सोचकर प्रदुम्न व्याकुल हो गए. उस समय प्रदुम्न को पुत्र शोक से पीड़ित देखकर रुक्मिणी ने प्रेम पूर्वक उससे कहा – हे पुत्र ! मैंने जो व्रत अपने घर में किया था उसे मैं बताती हूँ इसे ध्यानपूर्वक सुनो. बहुत समय पहले जब राक्षस तुम्हे उठा ले गया था तब तुम्हारे वियोगजन्य दुःख के कारण मेरा ह्रदय विदीर्ण हो गया था. मैं सोचती थी कि मैं अपने पुत्र का अति सुन्दर मुख कब देखूंगी. उस समय अन्य स्त्रियों के पुत्रों को देखकर मेरा ह्रदय विदीर्ण हो जाता था कि कहीं अवस्था साम्य से यह मेरा ही पुत्र तो नहीं. इसी चिंता में व्याकुल हुए मेरे अनेक वर्ष व्यतीत हो गए. तब दैवयोग से लोमश मुनि मेरे घर आ गए. उन्होंने सभी चिंताओं को दूर करने वाला संकष्टचतुर्थी का व्रत मुझे विधिपूर्वक बताया और मैंने चार महीने तक इसे किया. उसी के प्रभाव से तुम शंबरासुर को युद्ध में मारकर आ गए थे. अतः हे पुत्र ! इस व्रत की विधि जानकर तुम भी इसे करो, उससे तुम्हे अपने पुत्र का पता चल जाएगा. हे विप्र ! प्रदुम्न ने यह व्रत करके गणेश जी को प्रसन्न किया तब नारद जी से उन्होंने सूना कि अनिरुद्ध बाणासुर के नगर में है. इसके बाद बाणासुर के नगर में जाकर उससे अत्यंत भीषण युद्ध करके और संग्राम में शिव सहित बाणासुर को जीत कर पुत्रवधू सहित अनिरुद्ध को प्रदुम्न घर लाये थे. हे मुने ! इसी प्रकार अन्य देवताओं तथा असुरों ने भी विघ्नेश की प्रसन्नता के लिए यह व्रत किया था. हे सनत्कुमार ! इस व्रत के समान सभी सिद्धियाँ देने वाला इस लोक में कोई भी व्रत, तप, दान और तीर्थ नहीं है. बहुत कहने से क्या लाभ? इसके तुल्य कार्यसिद्धि करने वाला दूसरा कुछ भी नहीं है. अभक्त, नास्तिक तथा शठ को इस व्रत का उपदेश नहीं करना चाहिए अपितु पुत्र, शिष्य, श्रद्धालु तथा सज्जन को इसका उपदेश करना चाहिए. हे विप्रर्षे ! हे धर्मिष्ठ ! हे विधिनंदन ! तुम मेरे प्रिय हो तथा लोकोपकार करने वाले हो, अतः मैंने तुम्हारे लिए इस व्रत का उपदेश किया है. || इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “चतुर्थीव्रत कथन” नामक बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ || 🚩🔱 हर हर महादेव 🔱🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

+367 प्रतिक्रिया 101 कॉमेंट्स • 4 शेयर

+49 प्रतिक्रिया 9 कॉमेंट्स • 54 शेयर

+54 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 53 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB