मुरुगन (कार्तिकेय) मंदिर दर्शन, पलानी, तमिलनाडु।

पलानी दंडायुधपाणिस्वामी मंदिर,(#मुरूगन #मंदिर ) दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले में स्थित है। यह कोयंबटूर नगर से 100 कि.मी दक्षिण व डिंडीगुल नगर से 60 किमी पश्चिम में स्थित है। इस मंदिर के दर्शन के लिए प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख भक्त पहुँचते हैं। यह मंदिर पर्वत के ऊपर स्थित हैं यात्रियों को यहां पहुंचने के लिए 600 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं या वे रोप कार द्वारा यहां पहुंच सकते हैं।
मंदिर का निर्माण चेर वंश के चेरामन पेरूमल के द्वारा किया हुआ माना जाता है। पांड्य तथा चोलों द्वारा 8वीं से 13वीं सदी के मध्य मंदिरों को पुनरूद्धार व विस्तार किया गया था।
पलानी धंडायुथपनी मंदिर भारत के उन चंद मंदिरों में से एक है, जहां भगवान मुरूगन की कुमारम के रूप में पूजा की जाती है।

मंदिर का पता: Giri Veethi, Palani, Tamil Nadu 624601

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कामेंट्स

Kishore Bhambhani Aug 9, 2017
आपका धन्यवाद दर्शन करवाने का

Nand Kishore Aug 9, 2017
सुन्दर अति सुन्दर ।

rohini nirbhavane Aug 9, 2017
घर बैठे दर्शन किया. धन्यवाद

Adi Tiwari Aug 9, 2017
जाने का क्या रास्ता है निकट रेलवे स्टेशन कौन सा ह जय कार्तिक स्वामी की

udaydheeraj Aug 14, 2017
जय स्वामी कार्तिकेय जी

Lalit kumar Dec 3, 2019

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वृंदावन के वृक्ष को मर्म न जाने कोय कहते है कि जो वृदांवन में शरीर को त्यागता है. तो उन्हें अगला जन्म श्री वृदांवन में ही होता है. और अगर कोई मन में ये सोच ले, संकल्प कर ले कि हम वृदावंन जाएगे, और यदि रास्ते में ही मर जाए तो भी उसका अगला जन्म वृदांवन में ही होगा. केवल संकल्प मात्र से उसका जन्म श्री धाम में होता है. प्रसंग १ - ऐसा ही एक प्रसंग श्री धाम वृन्दावन है, तीन मित्र थे जो युवावस्था में थे तीनों बंग देश के थे. तीनों में बडी गहरी मित्रता थी, तीनो में से एक बहुत सम्पन्न परिवार का था पर उसका मन श्रीधाम वृदांवन में अटका था, एक बार संकल्प किया कि हम श्री धाम ही जाएगें और माता-पिता के सामने इच्छा रखी कि आगें का जीवन हम वहीं बिताएगें, वहीं पर भजन करेंगे. पर जब वो नहीं माना तो उसके माता-पिता ने कहा - ठीक है बेटा! जब तुम वृदांवन पहुँचोंगे तो प्रतिदिन तुम्हें एक पाव चावल मिल जाएगें जिसे तुम पाकर खा लेना और भजन करना. जब उसके दो मित्रो ने सुना तो बे बोले - कि अगर तुम जाओगे तो हम भी तुम्हारे साथ वृदांवन जाएगें. तो वो मित्र बोला - कि ठीक है पर तुम लोग क्या खाओगे? मेरे पिता ने तो ऐसी व्यवस्था कर दी है कि मुझे प्रतिदिन एक पाव चावल मिलेगा पर उससे हम तीनों नहीं खा पाएगें. तो उनमें से पहला मित्र बोला - कि तुम जो चावल बनाओगे उससे जों माड निकलेगा मै उससे जीवन यापन कर लूगाँ. दूसरे मित्र ने कहा - कि तुम जब चावल धोओगे तो उससे जो पानी निकलेगा तो उसे ही मै पी लूगाँ ऐसी उन दोंनों की वृदावंन के प्रति उत्कुण्ठा थी उन्हें अपने खाने-पीने रहने की कोई चिंता नहीं है. तो जब ऐसी इच्छा हो तो समझना साक्षात राधारानी जी की कृपा है.तीनेां अभी किशोर अवस्था में थे. तीनों वृदांवन जाने लगे तो मार्ग में बडा परिश्रम करना पडा और भूख-प्यास से तीनों की मृत्यु हो गई. और वो वृदांवन नहीं पहुँच पाए. अब जब बहुत दिनों हो गए तीनों की कोई खबर नहीं पहुँची तो घरवालों को बडी चिंता हुई कि उन तीनो में से किसी की भी खबर नहीं मिली. तो उन लडको के पिता ढूढते-ढूढते वृदांवन आए, पर उनका कोई पता नहीं चला क्योंकि तीनों रास्ते में ही मर चुके थे. तो किसी ने बताया कि आप ब्रजमोहन दास जी के पास जाओ वे बडे सिद्ध संत है. तो उनके पिता ब्रजमोहन दास जी के पास पहुँचे और बोले - कि महाराज ! हमारे पुत्र कुछ समय पहले वृदांवन के लिए घर से निकले थे पर अब तो उनकी कोई खबर नहीं है. ना वृदांवन में ही किसी को पता है. तो कुछ देर तक ब्रजमोहन दास जी चुप रहे और बोले - कि आप के तीनों बेटे यमुना जी के तट पर, परिक्रमा मार्ग में वृक्ष बनकर तपस्या कर रहे है . वैराग्य के अनुरूप उन तीनो को नया जन्म वृदांवन में मिला है. जब वे श्री धाम वृंदावन में आ रहे थे तभी रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई थी. और जो वृदावंन का संकल्प कर लेता है. उसका अगला जन्म चाहे पक्षु के रूप या पक्षी के या वृक्ष के रूप में वृदांवन में होता है . तो आपके तीनेां बेटे यमुना के किनारे वृक्ष है वहाँ परिक्रमा मार्ग में है. और ये भी बता दिया कि कौन-सा किसका बेटा है . बोले कि - जिसने ये कहा था कि मै चावल खाकर रहूगाँ वो “बबूल का पेड” है जिसने ये कहा था कि मै चावल का माड ही पी लूँगा वह “बेर का वृक्ष” है. जिसने ये कहा था कि चावल के धोने के बाद जो पानी बचेगा उसे ही पी लूँगा तो वो बालक “अश्वथ का वृक्ष” है. उन तीनो को ही वृदावंन में जन्म मिल गया उन तीनों का उददेश्य अभी भी चल रहा है. वो अभी भी तप कर रहे है . पर उनके पिता को यकीन नहीं हुआ तो ब्रजमोहन जी उनको यमुना के किनारे ले गए और कहा कि देखो ये बबूल का वृक्ष है ये बैर का और ये अश्वथ का. पर उनके पिता के दिल में सकंल्प की कमी थी तो उनको संत की बातों पर यकीन नहीं किया पर मुंह से कुछ नहीं बोले और उसी रात को वृदांवन मे ही सो गए, जब रात में सोए, तब तीनों के तीनों वृक्ष बने बेटे सपने में आए और कहा कि पिताजी जो सूरमा कुंज के संत है श्री ब्रजमोहन दास जी है . वो बड़े महापुरूष है उनकी दिव्य दृष्टि है उनकी बातों पर संदेह नहीं करना वे झूठ नहीं बोलने है और ये राधा जी की कृपा है कि हम तीनों वृदांवन में तप कर रहे है . तो अब उनको को विश्वास हो गया और ब्रजमोहन दास जी से क्षमा माँगने लगे कि आप हमें माफ कर दो हमें आपकी बात पर सदेंह हो गया था सपने की पूरी बात बता दी तो ब्रज मोहनदास जी ने कहा कि इस में आपकी कोई गलती नहीं है तीनों बडे़ प्रसन्न मन से अपने घर चले गए. प्रसंग २- एक संत ब्रजमोहनदास जी के पास आया करते थे श्री रामहरिदास जी, उन्हेंनें पूछा कि बाबा लोगों के मुंह से हमेशा सुनते आए कि “वृदांवन के वृक्ष को मर्म ना जाने केाय, डाल-डाल और पात-पात श्री राधे राधे होय” तो महाराज क्या वास्तव में ये बात सत्य है.कि वृदावंन का हर वृक्ष राधा-राधा नाम गाता है. तो ब्रजमोहनदास जी ने कहा - क्या तुम ये सुनना या अनुभव करना चाहते हो ? तो श्री रामहरिदास जी ने कहा - कि बाबा! कौन नहीं चाहेगा कि साक्षात अनुभव कर ले. और दर्शन भी हो जाए. आपकी कृपा हो जाए, तो हमें तो एक साथ तीनो मिल जायेगे. तो ब्रजमोहन दास जी ने दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी. और कहा - कि मन में संकल्प करो और देखो और सामने "तमाल का वृक्ष" खड़ा है उसे देखो, तो रामहरिदास जी ने अपने नेत्र खोले तो क्या देखते है कि उस तमाल के वृक्ष के हर पत्ते पर सुनहरे अक्षरों से राधे-राधे लिखा है उस वृक्ष पर लाखों तो पत्ते है. जहाँ जिस पत्ते पर नजर जाती है. उस पर राधे-राधे लिखा है, और जब पत्ते हिलते तो राधे-राधे की ध्वनि हर पत्ते से निकल रही है. तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और ब्रजमोहन दास जी के चरणों में गिर पडे और कहा कि बाबा आपकी और राधा जी की कृपा से मैने वृदांवन के वृक्ष का मर्म जान लिया इसको कोई नहीं जान सकता कि वृदांवन के वृक्ष क्या है? ये हम अपने शब्दों में बयान नहीं कर सकते ,ये तो केवल संत ही बता सकता है हम साधारण दृष्टि से देखते है . जहाँ पर हर डाल, हर पात पर, राधे श्याम बसते है . व्रज की महिमा को कहे, को वरने व्रज धाम, जहां बसत हर सास में श्री राधे और श्याम व्रज रज जाकू मिल गई, वा को चाह ना शेष, व्रज की चाहत में रहे, ब्रह्मा विष्णु महेश वृदांवन की महिमा केा कौन अपनी एक जुबान से गा सकता है स्वंय शेष जी अपने सहस्त्र मुखों से वृदांवन की महिमा का गुणगान नहीं कर सकते है . जहाँ ब्रज की रज में राधे श्याम बसते है. ब्रज की चाहत तो बह्रमा महेश विष्णु करते है . ब्रज के रस कु जो चखे, चखे ना दूसर स्वाद एक बार राधा कहे, तो रहे ना कुछ ओर याद जिनके रग-रग में बसे श्री राधे ओर श्याम ऐसे बृज्वासिन कु शत-शत नमन प्रणाम क्येांकि संत को वो वृदांवन दिखता है जो साक्षात गौलोक धाम का खंड है . हमें साधारण वृदांवन दिखता है. क्योकि हमारी दृष्टि मायिक है,हम संसार कि विषयों में डूबे हुए हैं, जब किसी संत कि कृपा होती है तभी वे किसी विरले भक्त हो वह दिव्य दृष्टि देते हैैं जिससे हम उस दिव्य वृंदावन को देख सकते है और अनुभव कर सकते है कि व्रज का हर पत्ता और हर डाल राधा रानी जी के गुणों का बखान करता है.

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