राकेश
राकेश Apr 18, 2019

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कामेंट्स

jatan Apr 18, 2019
🚩🚩🚩jai sadguru dev ji 🌹 🌹 🌹 jai shri hari narayan ji 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 suprabhat vanadhan ji 🙏 🍁🍀🌿🌾🌻🍭

🌷🌷🌷mukseh nagar🌷🌷🌷 Apr 18, 2019
कभी रुठना ना मुझसे तू श्याम सावरे.. मेरी ज़िंदगी है अब तेरे नाम सावरे....🙏 मेरे सांवरे सबेरा तेरे नाम से तेरे नाम से ही ज़िंदगी की शाम सांवरे....🙏 दिल तुमसे लगाना सीखा है तुमसे ही सीखा याराना....😥 जीवन को संवारा है तुमने बदले मे मैं दू क्या नज़राना.... मैंने दिल हारा ये भी तेरी प्रीत है, हां प्रीत है, मेरी हार मे भी श्याम मेरी जीत है, हां जीत है, बस दिल की यही है एक आरजू तुझे दिल का बना लू मेहमान सांवरे कभी रुठना मुझसे तू श्याम सावरे.....🙏

Zeel Bhatt Apr 18, 2019
Jai Shree Laxmi Narayan 🙏🙏🌷💐🌺🐾☀️

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १३.१७ . प्रश्न १ : परमात्मा के बिना विभाजन के एक रूप सभी जीवों में स्थिति को किस उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है ? . उत्तर १ : "भगवान् सबों के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं | तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि वे बँटे हुए हैं? नहीं | वास्तव में वे एक हैं | यहाँ पर सूर्य का उदाहरण दिया जाता है | सूर्य मध्याह्न समय अपने स्थान पर रहता है, लेकिन यदि कोई चारों ओर पाँच हजार मील की दूरी पर घुमे और पूछे कि सूर्य कहाँ है, तो सभी लोग यही कहेंगे कि वह उसके सर पर चमक रहा है | वैदिक साहित्य में यह उदाहरण यह दिखाने के लिए दिया गया है कि यद्यपि भगवान् अविभाजित हैं, लेकिन इस प्रकार स्थित हैं मानो विभाजित हों | यही नहीं, वैदिक साहित्य में यह भी कहा गया है कि अपनी सर्वशक्तिमता के द्वारा एक विष्णु सर्वत्र विद्यमान हैं, जिस तरह अनेक पुरुषों को एक ही सूर्य की प्रतीति अनेक स्थानों में होती है |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १३.१७, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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Satishbhargava1 May 19, 2019

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीत यथारूप १३.१८ अध्याय १३ :प्रकृति, पुरुष तथा चेतना . . ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते | ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || १८ || . . ज्योतिषाम् - समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में; अपि - भी; तत् - वह; ज्योतिः - प्रकाश का स्त्रोत; तमसः - अन्धकार; परम् - परे; उच्यते - कहलाता है; ज्ञानम् - ज्ञान; ज्ञेयम् - जानने योग्य; ज्ञान-गम्यम् - ज्ञान द्वारा पहुँचने योग्य; हृदि - हृदय में; सर्वस्य - सब; विष्ठितम् - स्थित | . . वे समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं | वे ज्ञान हैं, ज्ञेय हैं और ज्ञान के लक्ष्य हैं | वे सबके हृदय में स्थित हैं | . . तात्पर्य: परमात्मा या भगवान् ही सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों जैसी प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वैदिक साहित्य से हमें पता चलता है कि वैकुण्ठ राज्य में सूर्य या चन्द्रमा की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वहाँ पर परमेश्र्वर का तेज जो है | भौतिक जगत् में वह ब्रह्मज्योति या भगवान् का आध्यात्मिक तेज महत्तत्व अर्थात् भौतिक तत्त्वों से ढका रहता है | अतएव इस जगत् में हमें सूर्य, चन्द्र, बिजली आदि के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन आध्यात्मिक जगत् में ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती | वैदिक साहित्य में स्पष्ट है कि वे इस भौतिक जगत् में स्थित नहीं हैं, वे तो आध्यात्मिक जगत् (वैकुण्ठ लोक) में स्थित हैं, जो चिन्मय आकाश में बहुत ही दूरी पर है | इसकी भी पुष्टि वैदिक साहित्य से होती है | आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) | वे सूर्य की भाँति अत्यन्त तेजोमय हैं, लेकिन इस भौतिक जगत के अन्धकार से बहुत दूर हैं | . उनका ज्ञान दिव्य है | वैदिक साहित्य पुष्टि करता है कि ब्रह्म घनीभूत दिव्य ज्ञान है | जो वैकुण्ठलोक जाने का इच्छुक है, उसे परमेश्र्वर द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है, जो प्रत्येक हृदय में स्थित हैं | एक वैदिक मन्त्र है (श्र्वेताश्र्वतर-उपनिषद् ६.१८) - तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये| मुक्ति के इच्छुक मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् की शरण में जाय | जहाँ तक चरम ज्ञान के लक्ष्य का सम्बन्ध है, वैदिक साहित्य से भी पुष्टि होती है - तमेव विदित्वाति मृत्युमेति - उन्हें जान लेने के बाद ही जन्म तथा मृत्यु की परिधि को लाँघा जा सकता है (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) | . वे प्रत्येक हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं | परमेश्र्वर के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं, लेकिन जीवात्मा के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता | अतएव यह मानना ही पड़ेगा कि कार्य क्षेत्र को जानने वाले दो ज्ञाता हैं-एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा | पहले के हाथ-पैर केवल किसी एक स्थान तक सीमित (एकदेशीय) हैं, जबकि कृष्ण के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं | इसकी पुष्टि श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (३.१७) इस प्रकार हुई है - सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् | वह परमेश्र्वर या परमात्मा समस्त जीवों का स्वामी या प्रभु है, अतएव वह उन सबका चरम लक्ष्य है | अतएव इस बात से मना नहीं किया जा सकता कि परमात्मा तथा जीवात्मा सदैव भिन्न होते हैं | . प्रश्न १ : आध्यात्मिक जगत भौतिक जगत से किस प्रकार भिन्न है ? . प्रश्न २ : जीवात्मा तथा परमात्मा में क्या-क्या अन्तर है ?

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