Mahesh Malhotra
Mahesh Malhotra Sep 16, 2020

Jai Shree Radhey Krishna Ji Shubh Dopahar

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कामेंट्स

Radha Bansal Sep 16, 2020
Jai shri karshna ji radhe Radheji 👌 👌 subh dophar bahiya ji God bless you

katha Darshan Sep 16, 2020
कथा दर्शन में हम आपके लिए धार्मिक कथाएं लाए हैं एक बार जरूर देखिए और कथा दर्शन को फॉलो करे आपका दिन शुभ और मंगलमय हो

RAJKUMAR RATHOD Sep 16, 2020
🌹🙏जय श्री गणेश 🙏🌹🙏शुभ रात्रि वंदन 🙏🌷🌷आपकी आँखों में सजे है जो भी सपने, और दिल में छुपी है जो भी अभिलाषाएं, गौरी पुत्र गणेश सभी साकार करे आप के लिए यही है हमारी शुभकामनायें.🌷🌷

Sunil Vohra Sep 23, 2020

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Asha Shrivastava Sep 22, 2020

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Neha Sharma Sep 21, 2020

जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷🌷 *शुभ संध्या नमन*🌷🌷🙏 *आज की कहानी में पढ़िए कि जरूरी नहीं आप में भगवतिक गुण साधन और कर्मकांड से ही प्राप्त होंगे , *निस्वार्थ कर्म, परोपकार और दूसरों को सुख देने की भावना भी किसी भक्ति से कम नहीं अतएव जो भी करें उसका उद्देश्य केवल भगवद प्रसन्नता हो तो अतिशीघ्र आप अपने स्वरूप मै स्थित हो जाएंगे अब सभी पढ़ें और केवल 1 शेयर जरुर करें *एक राजा बहुत बड़ा प्रजा पालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था . *यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात् भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था. *एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- “ महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?” *देव बोले- “राजन! यह हमारा बही खाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं.” *राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं ?” *देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया. *राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है.” *उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए. *कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. *इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी. *राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है ?” *देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं !” *राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग ? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे !! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है ? ” *देव महाराज ने बहीखाता खाता , और ये क्या , पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था। *राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ ? *देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. *जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. *ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है. परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं. *देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..” *अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ *राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. *अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..” *राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं। *तो मेरे प्यारे, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. *हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. *और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे . *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷🌷

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