Kishore Bhambhani
Kishore Bhambhani Jan 12, 2019

श्री गुरु गोविंद सिंह के बारे में जिनका 13.1.19 को जन्म दिन मनाया जाएगा गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म: 05 जनवरी 1666सिखों के दसवें गुरुथे। उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटकको उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें 'सर्वस्वदानी' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं। गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। उन्होंने सदा प्रेम, एकता, भाईचारे का संदेश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। गुरुजी की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है। इस बार सन् 2019 में 13जनवरी को गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म दिन मनाया जाएगा।

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Shri Radhe Krishna May 22, 2019

*जरुर पढे* *नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद, एक दिन अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ रेस्तरां में खाना खाने गए। खाने का आर्डर दिया और उसके आने का इंतजार करने लगे ।* *उसी समय मंडेला की सीट के सामने एक व्यक्ति भी अपने खाने का आने का इंतजार कर रहा था । मंडेला ने अपने सुरक्षाकर्मी को कहा, उसे भी अपनी टेबुल पर बुला लो। ऐसा ही हुआ, खाना आने के बाद सभी खाने लगे, वो आदमी भी साथ खाने लगा, पर उसके हाथ खाते समय काँप रहे थे। माथा पसीने से तर था। खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर होटल से निकल गया । उस आदमी के खाना खा के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था। खाते वक़्त उसके हाथ लगातार कांप रहे थे। वह भी कांप रहा था और पसीना भी आ रहा था। घबराया सा भी लग रहा था।* *मंडेला ने कहा नहीं ऐसा नहीं है। वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे रखा गया था। जब कभी मुझे यातनाएं दी जाती और मै कराहते हुये पानी मांगता तो ये गाली देता हुआ मेरे ऊपर पेशाब करता था ।* *मंडेला ने कहा , मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करूंगा। पर मेरा यह चरित्र नहीं है।* *मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है। यही धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता ही हमें विकास की ओर ले जाती है ।* Jay shree ram🙏🏽🙏🏽🙏🏽 -- Get Good Morning, Good Night, Shayari etc. messages on IndiaChat App https://wn78r.app.goo.gl/Uuzrj

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Raj May 22, 2019

. "अज्ञानता और लोभ का परिणाम" एक कुम्हार को मिट्टी खोदते हुए अचानक एक हीरा मिल गया। उसने उसे अपने गधे के गले में बांध दिया। एक दिन एक बनिए की नजर गधे के गले में बंधे उस हीरे पर पड़ गई। उसने कुम्हार से उसका मूल्य पूछा। कुम्हार ने कहा, सवा सेर गुड़। बनिए ने कुम्हार को सवा सेर गुड़ देकर वह हीरा खरीद लिया। बनिए ने भी उस हीरे को एक चमकीला पत्थर समझा था लेकिन अपनी तराजू की शोभा बढ़ाने के लिए उसकी डंडी से बाँध दिया। एक दिन एक जौहरी की नजर बनिए के उस तराजू पर पड़ गई। उसने बनिए से उसका दाम पूछा। बनिए ने कहा, पांच रुपए। जौहरी कंजूस व लालची था। हीरे का मूल्य केवल पांच रुपए सुनकर समझ गया कि बनिया इस कीमती हीरे को एक साधारण पत्थर का टुकड़ा समझ रहा है। वह उससे भाव-ताव करने लगा-पांच नहीं, चार रुपए ले लो। बनिये ने मना कर दिया क्योंकि उसने चार रुपए का सवा सेर गुड़ देकर खरीदा था। जौहरी ने सोचा कि इतनी जल्दी भी क्या है ? कल आकर फिर कहूँगा, यदि नहीं मानेगा तो पांच रुपए देकर खरीद लूँगा। संयोग से दो घंटे बाद एक दूसरा जौहरी कुछ जरूरी सामान खरीदने उसी बनिए की दुकान पर आया। तराजू पर बंधे हीरे को देखकर वह चौंक गया। उसने सामान खरीदने के बजाए उस चमकीले पत्थर का दाम पूछ लिया। बनिए के मुख से पांच रुपए सुनते ही उसने झट जेब से निकालकर उसे पांच रुपये थमाए और हीरा लेकर खुशी-खुशी चल पड़ा। दूसरे दिन वह पहले वाला जौहरी बनिए के पास आया। पांच रुपए थमाते हुए बोला- लाओ भाई दो वह पत्थर। बनिया बोला- वह तो कल ही एक दूसरा आदमी पांच रुपए में ले गया। यह सुनकर जौहरी ठगा सा महसूस करने लगा। अपना गम कम करने के लिए बनिए से बोला- "अरे मूर्ख ! वह साधारण पत्थर नहीं, एक लाख रुपए कीमत का हीरा था।" बनिया बोला, "मुझसे बड़े मूर्ख तो तुम हो। मेरी दृष्टि में तो वह साधारण पत्थर का टुकड़ा था, जिसकी कीमत मैंने चार रुपए मूल्य के सवा सेर गुड़ देकर चुकाई थी। पर तुम जानते हुए भी एक लाख की कीमत का वह पत्थर, पांच रुपए में भी नहीं खरीद सके।" मित्रों, हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है हमें हीरे रूपी सच्चे शुभ् चिन्तक मिलते हैं लेकिन अज्ञानतावश पहचान नहीं कर पाते और उसकी उपेक्षा कर बैठते हैं, जैसे इस कथा में कुम्हार और बनिए ने की। और कभी पहचान भी लेते हैं अपने अहंकार के चलते तुरन्त स्वीकार नहीं कर पाते और परिणाम पहले जौहरी की तरह हो जाता है और पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ हासिल नहीं हो पाता। "जय जय श्री राधे" *******************************************

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ramkumar verma May 22, 2019

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भोजन_करने_सम्बन्धी_24_जरुरी_नियम। (1). पांच अंगो ( दोनों हाथ , दोनों पैर , मुख को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे ! (2). गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है ! (3). प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है क्योंकि पाचन क्रिया की जठराग्नि सूर्योदय से 2 घंटे बादतक एवं सूर्यास्त से 2 -3 घंटे पहले तक प्रबल रहती है (4). पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए ! (5). दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है ! (6). पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है ! (7). शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे बर्तनों में भोजन नहीं करना चाहिए ! (8). मल मूत्र का वेग होने पर,कलह के माहौल में,अधिक शोर में,पीपल,वट वृक्ष के नीचे,भोजन नहीं करना चाहिए ! (9). परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए ! (10). खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के , उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो ईश्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए ! (11) . भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले 3 रोटियाँ अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये ! (12). ईष्या , भय , क्रोध, लोभ,रोग , दीन भाव,द्वेष भाव,के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है ! (13). आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए ! (14). खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करनाचाहिए ! (15). भोजन के समय मौन रहे ! 16). भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए ! (17). रात्री में भरपेट न खाए ! (18). गृहस्थ को 32 ग्रास से ज्यादा नही खाना चाहिए ! (19). सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन , अंत में कडुवा खाना चाहिए ! (20). सबसे पहले रस दार , बीच में गरिष्ठ ,अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे! (21). थोडा खाने वाले को आरोग्य , आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान और सौंदर्य प्राप्त होता है ! (22). जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए ! (23). कुत्ते का छुवा , रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन , अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे ! (24). कंजूस का, राजा का,वेश्या के हाथ का,शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए।

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Manmohan Singh May 21, 2019

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Sant Grover May 20, 2019

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Sant Grover May 20, 2019

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ramkumar verma May 22, 2019

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Shiva Gaur May 22, 2019

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