🙏 Jai Shree Mata Rani 🙏 Good Morning Ji 🙏 Happy Friday 🙏 Have A Great Day 🙏 May Goddess Durga Ji Bless You 🙏

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कामेंट्स

Manoj Gupta AGRA Apr 9, 2021
jai shree radhe krishna ji 🙏🙏🌷🌸💐🌀 shubh prabhat vandan ji 🙏🙏🌷

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 9, 2021
जय माता दी शूभ प्रभात वंदन जी माता रानी जी की कृपा आप व आपके परिवार पर बनीं रहे जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼👏👏👏👏🌹🌹🌹🌹👌🏼👌🏼👌🏼

anju joshi Apr 9, 2021
🚩🔱 जय माता दी 🔱🚩 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शुभ शुक्रवार की आपको हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय भाई⭐🙏 माता रानी आपको सदैव खुश रखे। और आपकों सुख समृद्धि धन वैभव मान सम्मान से परिपूर्ण करें। जय श्री राधे कृष्णा 🌹🌹🙏👈

Sanjay Rastogi Apr 9, 2021
jai mata di mata Laxmi ji ki kripa sada bani Rahe subh prabhat vandan bhai ji

Devendra Tiwari Apr 9, 2021
🙏🌹Jai Mata Di 🌹🙏 🌹Jai Shree Radhe Krishna 🌹 Subh Prabhat Bandan ji 🙏🙏🙏

Renu Singh Apr 9, 2021
Jai Mata Di 🙏 Good Morning Bhai Ji Mata Rani Avam Bhole Nath ki kripa Aap aur Aàpke Pariwar pr Sadaiv Bni rhe Aàpka Din Mangalmay ho Bhai Ji 🙏🌹

🌹bk preeti 🌹 Apr 9, 2021
जिस दिन अपने आपको देह से परे जानोगे🙋‍♀️🌹🙏 अपने आपको नाम रूप से रहित जानोगे उस दिन परमात्मा को पा लोगे !🙏 जय माता दी ❤️🙏 माता रानी का असीम कृपा आप और आप के परिवार पे बना रहे आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो शुभ प्रभात वंदन जी 🙏 आने वाला हर एक पल खुशियों भरा हो जय जिनेंद्र राधे राधे जी🙏✍️✍️🍵🍫👈🙋‍♀️🌹🌹🙏🙏

BK WhatsApp STATUS Apr 12, 2021
जय माता सेरोवाली दुर्गा भवानी मां नमो नमः शुभ प्रभात स्नेह वंदन धन्यवाद 🌹🌹🙏🙏👌👌👍👍🕉️🌄

Amit Kumar May 15, 2021

जय-जय श्री राधे, सुनो रे राम कहानी, सुनो रे राम कहानी.....! सुनते ही अंखियों से आये पानी.....! सुन्दर राम कथा......! डॉक्टर शिखा शर्मा के संग..... सुनो प्यारे राम कहानी.....! राम भालु कपि कटक बटोरा। सेतु हेतु श्रम किन्ह न थोरा।। नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारू सुजन मनमाहीं।। गोस्वामी जी कहते हैं कि श्रीराम जी ने सीता जी को रावण के चंगुल से मुक्त करने के लिए जाने के क्रम में समुद्र पर सेतु बनाने के लिए वानर भालुओं की सेना ही बटोर लिए और इसके बाद भी बहुत परिश्रम किए तब जाकर सेतु बना। यद्यपि श्रीराम जी के कृपा से राजा बनने के बाद सुग्रीव ने अपने दूतों के माध्यम से सेना इकट्ठा की है लेकिन उसके मूल में श्रीराम इच्छा है अतः ... "राम भालु कपि कटक बटोरा"। "बटोरा" - गूढ़ भाव- बंदर भालु का इस तरह सदुपयोग परमात्मा ही कर सकते हैं। भला जो स्वयं के लिए एक जाड़ा गर्मी बरसात से बचने के लिए गृहादि साधन नहीं कर पाते वे सेतु निर्माण करेंगे? और वो भी कोई नदी नाले पर नहीं बल्कि अथाह समुद्र पर?? इसलिए तो दूतों के मुख से सेतु बंधन सुनकर रावण को विश्वास नहीं हो रहा था... "बांध्यो बननिधि...??? जब माता पार्वती जी ने शंकर जी से वानरी सेना की संख्या पूछीं तो शंकर जी कहते हैं... "सो मूरख जो करन चह लेखा"!!! सजीव, चर प्राणी, के संख्या ज्ञात करने के लिए उनमें स्थिरता, अनुशासन की आवश्यकता होती है लेकिन अत्यंत चंचल और असंख्य बंदरों की गिनती करने की कोशिश करने वाला मूर्ख ही होगा। लेकिन श्रीराम जी ऐसे "कपि चंचल सबहिं बिधि हीना" से भी समुद्र पर सेतु बनवा लिए। (नाम प्रसंग अर्थात नाम प्रधानता प्रसंग के कारण अधिक विस्तार उचित नहीं)। गोस्वामी जी कहते हैं कि इसे सुनकर कितने लोगों को आश्चर्य होगा कि जो स्वयं परमात्मा है उन्हें एक समुद्र पर सेतु बनाने के लिए वानरी सेना इकट्ठा करना पड़ा! उन्हें सेतु बनाने के लिए कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता हुई... "सेतु हेतु श्रम कीन्ह न थोरा" "न थोरा" अर्थात बहुत ज्यादा परिश्रम करना पड़ा !!! लेकिन श्रीराम जी न स्वयं पर्वत ला रहे थे, न पेड़ ला रहे थे, बल्कि सभी जानते हैं कि बंदर भालु ला रहे थे... "सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं"।। और नल नील सेतु निर्माण कर रहे थे... ...नल नीलहि "रचहिं ते सेतु बनाइ"!!! प्यारे भक्तों, यदि हम इस दृष्टिकोण से देखेंगे तो महलों में रहने वाले न स्वयं अपने महल को बनाते हैं ( मिस्त्री और मजदूर ही श्रम करते हैं) , और न कोई नेता गण ही, लेकिन उन्हें श्रेय मिलता है। क्योंकि श्रम की इतनी संकुचित परिभाषा नहीं है और इसके लिए श्रीराम जी ने जामवंत, विभीषण आदि से मंत्रणा की अर्थात् मंत्रीमंडल की बैठक हुई। फिर उन्होने समुद्र से सहयोग हेतु लगातार तीन दिन तक प्रायोपवेशन व्रत (अनशन) पर बैठना पड़ा... बिनय न मानत जलधि जड़ गए "तीन दिन"बीति। उन्होंने अंत में आग्णेयास्त्र का संधान करना चाहा, अतः हम ये कैसे कह सकते हैं कि श्रीराम जी ने सेतु बनाने के लिए परिश्रम नहीं किया??? श्रम केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि बौद्धिक भी होता है , अतः गोस्वामी जी के यह कथन बिल्कुल सत्य है कि श्रीराम जी ने ... "सेतु हेतु श्रम कीन्ह न थोरा".... सगुण साकार श्रीराम जी को समुद्र पर सेतु बनाने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ा। और अब गोस्वामी जी नाम महाराज की ओर दृष्टि करते हुए कहते हैं कि एक दृश्य समुद्र, जिसका क्षेत्रफल ज्ञात है... जो नाघइ "सत जोजन" सागर...। "सत जोजन" अर्थात सौ योजन चौड़ी समुद्र। उसे सभी नेत्र वाले देख सकते हैं, परंतु "भवसागर" एक ऐसा समुद्र है, जिसके प्रत्यक्षदर्शी हमें नहीं मिलते हैं , परंतु इसे अनुभव अवश्य करते हैं। भलसिंधु-भवसागर- "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्"। जन्म मरण के चक्र में फंसे रहना ही भवसागर में पड़े रहना है। "भव प्रवाह" संतत हम परे। अब प्रभ पाहि...।। नाम लेत भवसिंधु सुखाहीं- "नाम लेत"- बिना किसी परिश्रम के, बस सहज ही नाम स्मरण किया कि- "भवसिंधु सुखाहीं" - अर्थात जन्म मरण से मुक्ति मिल गई, आपको पता भी नहीं चलेगा कि हमने इतना परिश्रम किया था । गोस्वामी जी कहते हैं कि - हे सज्जन वृंद! आप जरा मन में विचार करें कि जो काम स्वयं सगुण साकार श्रीराम जी को करने के लिए (वानरी सेना को समुद्र पार करने के लिए) उतना परिश्रम करना पड़ा, तभी वानरी सेना पार हुई। उसमें भी समुद्री जीवों ने भी उन्हें पार करने में सहयोग किया .... बंध भई भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। "अपर जलचरन्हि उपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं"।। किन्तु नाम महाराज के अवलंबन लेने से भवसागर सूख जाता है अतः किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं होती है... नाम लेत भवसिंधु "सुखाहीं"। जब समुद्र सूख गया तो जलचर प्राणी के भय या सहयोग के प्रश्न ही नहीं है... इहां न बिषय कथा रस नाना। "करहु बिचारू सुजन मनमाहीं"- गोस्वामी जी सज्जनों से विचार करने के लिए कहते हैं अर्थात ये दुर्जन, दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों के वश की चीज नहीं है। "मनमाहीं" - आप सभी सज्जन वृंद अपने मन में विचार करें कि श्रीराम जी बड़े हैं या उनका नाम बड़ा है। "मनमाहीं" - प्रकट रुप से, स्पष्ट कह कर बड़ा छोटा कहने पर व्यर्थ के विवाद में नहीं पड़ना चाहिए, स्वयं अनुभव कर नाम महाराज के अवलंबन लें.. डॉक्टर शिखा शर्मा

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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳* *💐💐एहसान💐💐* एक बहेलिया था। एक बार जंगल में उसने चिड़िया फंसाने के लिए अपना जाल फैलाया। थोड़ी देर बाद ही एक उकाब उसके जाल में फंस गया। वह उसे घर लाया और उसके पंख काट दिए। अब उकाब उड़ नहीं सकता था, बस उछल उछलकर घर के आस-पास ही घूमता रहता। उस बहेलिए के घर के पास ही एक शिकारी रहता था। उकाब की यह हालत देखकर उससे सहन नहीं हुआ। वह बहेलिए के पास गया और कहा-"मित्र, जहां तक मुझे मालूम है, तुम्हारे पास एक उकाब है, जिसके तुमने पंख काट दिए हैं। उकाब तो शिकारी पक्षी है। छोटे-छोटे जानवर खा कर अपना भरण-पोषण करता है। इसके लिए उसका उड़ना जरूरी है। मगर उसके पंख काटकर तुमने उसे अपंग बना दिया है। फिर भी क्या तुम उसे मुझे बेच दोगे?" बहेलिए के लिए उकाब कोई काम का पक्षी तो था नहीं, अतः उसने उस शिकारी की बात मान ली और कुछ पैसों के बदले उकाब उसे दे दिया। शिकारी उकाब को अपने घर ले आया और उसकी दवा-दारू करने लगा। दो माह में उकाब के नए पंख निकल आए। वे पहले जैसे ही बड़े थे। अब वह उड़ सकता था। जब शिकारी को यह बात समझ में आ गई तो उसने उकाब को खुले आकाश में छोड़ दिया। उकाब ऊंचे आकाश में उड़ गया। शिकारी यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उकाब भी बहुत प्रसन्न था और शिकारी बहुत कृतज्ञ था। अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उकाब एक खरगोश मारकर शिकारी के पास लाया। एक लोमड़ी, जो यह सब देख रही थी, लोमड़ी उकाब से बोली-"मित्र! जो तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकता उसे प्रसन्न करने से क्या लाभ?" इसके उत्तर में उकाब ने कहा-"व्यक्ति को हर उस व्यक्ति का एहसान मानना चाहिए, जिसने उसकी सहायता की हो और ऐेसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो हानि पहुंचा सकते हों।" *कहानी से सीख :-* *व्यक्ति को सदा सहायता करने वाले का कृतज्ञ रहना चाहिए।* *सदैव प्रसन्न रहिये।* *जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।* 🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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Amar jeet mishra May 17, 2021

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