जीवन दर्शन प्रवचन

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Jugal Bhoi Aug 9, 2020

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.109 : अन्तर्मुख होना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 109)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! मनुष्यों के वास्ते संतों का क्या प्रचार है, इसी का उपदेश इस सत्संग से हुआ करता है। संतों ने दृढ़ता से कहा है कि *केवल सांसारिक वस्तुओं से कोई तृप्त नहीं हो सकता। जहाँ तृप्ति नहीं, वहाँ सुख कहाँ!* ऐसी तृप्ति कि जिसमें फिर भोगेच्छा न रह जाय। ऐसा सुख जिसके बाद दुःख नहीं और शान्ति ऐसी जिसके बाद अशान्ति नहीं। संतों ने कहा कि *विषयों से बहुत विशेष परमात्मा है।* विषयों को पहचानते हो तो उसको ग्रहण करते हो। इन्द्रियों से जो ग्रहण हो, वह विषय है। पंच ज्ञानेन्द्रयों के पंच विषय - रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द हैं। *इन्हीं में लोग सुख, शान्ति और तृप्ति खोजते हैं। इनसे किसी को सुख, शान्ति और तृप्ति नहीं हुई है।* संतों ने कहा है कि इनसे परे की वस्तु को खोजो। इन्द्रियों से विषयों को ग्रहण कर लोग सुखी, शान्त और तृप्त होना चाहते हैं; किंतु इन्द्रियों के ग्रहण होने योग्य पदार्थों में ऐसा नहीं हो सकता। इसमें सुख-भ्रम है। *साधारण लोग उसी को सुख कहते हैं, जो मन-इन्द्रियों को सुहाता है। और जो मन इन्द्रियों को नहीं सुहाता, उन्हें वे दुःख कहते हैं।* इसलिए ऐसा पदार्थ खोजो, जो पंच विषयों से परे है अर्थात्‌ जिसको कोई इन्द्रियाँ पहचान नहीं सकतीं। ऐसा सुख जिसके बाद दुःख नहीं, सूरदासजी ने कहा है - *परम स्वाद सबही जू निरन्तर, अमित तोष उपजावै।* ऐसी सन्तुष्टि हो, जिसका अन्त न हो। यह सुख-संतोष परमात्म-प्राप्ति में है। इसलिए उस परमात्मा की खोज करो। ज्ञान यही कहता है कि वह कहाँ नहीं है? वह स्थान ही नहीं जहाँ परमात्मा न हो। वह देश-काल में व्यापक है और उनसे बाहर भी है। अर्थात्‌ परमात्मा सबके अंदर-अंदर रहते हुए सबसे बाहर भी है। इन्द्रियों के ज्ञान में नहीं आने के कारण उसको लोग बाहर में नहीं प्राप्त कर सकते। बाहर के पदार्थों को ग्रहण करने के लिए इन्द्रियाँ हैं और इन्द्रियों के ज्ञान से ईश्वर परे है, फिर भला बाहर में उसको कोई इन्द्रियों से कैसे ग्रहण कर सकते हैं? संतों ने कहा है और अपने को भी प्रत्यक्ष ज्ञात होता है कि *बाहर से उलट, सिमट कर अन्दर में रहने से इन्द्रियों से छूटना होता है।* जाग्रत में इन्द्रियों के साथ काम होता है - विषयों का ग्रहण होता है। स्वप्न में स्थूल इन्द्रियों का संग छूटता है। उस समय बाहर का कोई ज्ञान नहीं रहता। संतों ने जिसको सुरत कहा है, वही स्वप्न में अन्तर्मुखी हो जाती है - सिमट जाती है। सिमटने से वह इन्द्रियों के घाटों में नहीं रहती, जगने पर वह इन्द्रियों के घाटों पर आ जाती है, फिर संसार का ज्ञान होता है। इससे जानने में आता है कि *अंदर में जाने से विषयों से और इन्द्रियों से छूटना होता है। इसलिए यत्न जानकर अपने अंतर में प्रवेश करो।* यह शरीर देखने में साढ़े तीन हाथ का है, परंतु यह समुद्र से भी विशेष गहरा है। *कबीर काया समुँद है, अंत न पावै कोय। मिरतक होइ के जो रहै, मानिक लावै सोय।। मैं मरजीवा समुँद का, डुबकी मारी एक। मुट्ठी लाया ज्ञान की, जामें वस्तु अनेक।। - संत कबीर साहब* *अंतर्मुख होना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। यह सबसे बड़ा पुरुषार्थ इसलिए है कि बाहर विषयों से अभ्यासी की आसक्ति छूटती है। जैसे-जैसे विषयों से छूटता है, वैसे-वैसे वह परमात्मा की ओर बढ़ता है।* ब्रह्मज्योति को प्राप्त कर ब्रह्म को पाता है और सारी तृष्णाओं से मुक्त हो जाता है। सभी संतों ने यही कहा और यदि संतवाणियों के पहले की बात जानना चाहते हैं, तो उपनिषदों को पढ़िए, उसमें भी यही बात है। उपनिषद्‌ का सार गीता है, यह भी अंतर्मुख होने के लिए ही सिखाती है। *ईश्वर की खोज अपने अंदर करो। जबतक इस ज्ञान को कोई नहीं जानता है, तबतक वह सोया रहता है।* जैसे कोई स्वप्न में अनेक काम करे, तौभी बाहर में - जाग्रत में जो काम होना चाहिए, एक भी नहीं होता। उसी तरह लोग, जो माया-मोह में - विषयों में पड़े हैं, वे सोए हुए हैं। इसलिए कबीर साहब कहते हैं - *परमातम गुरु निकट विराजैं जागु जागु मन मेरे।* जाग्रत में जहाँ जीव रहता है, स्वप्न में उस जगह नहीं रहता - दूसरी जगह चला जाता है। स्थान बदल जाता है, तो ज्ञान भी बदल जाता है। वहाँ से तीसरी जगह पर जाता है, तो वह बेहोश होकर रहता है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति; तीनों अवस्थाओं में वह संसार में ही रहता है। यद्यपि वह सुषुप्ति में कुछ नहीं जानता है, फिर भी स्वप्न और जाग्रत में जानता और करता है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति - इन तीनों अवस्थाओं में सुरत के जाने का और इन तीनों अवस्थाओं के होने का कारण, सुरत का अंतर्मुख होना है। जाग्रत के स्थान से नीचे स्वप्न का और उससे नीचे सुषुप्ति का स्थान है। *जब जाग्रत स्थान के ऊपर हो जाय, तब परमात्मा की ओर होना होता है। इसका ज्ञान और युक्ति किसी जानकार से जानना चाहिए। यदि जान भी लिया और उसका अभ्यास नहीं किया, तो उससे जो लाभ होना चाहिए वह नहीं होता।* इसलिए कबीर साहब जो जगने कहते हैं, उसका अभ्यास करना चाहिए। दरिया साहब (बिहारी) कहते हैं - *‘माया मुख जागे सभै, सो सूता कर जान। दरिया जागे ब्रह्म दिसि, सो जागा परमान।।‘* *‘जानिले जानिले सत्त पहचानिले, सुरति साँची बसै दीद दाना। खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै, पलक परवीन दिव दृष्टि ताना।।' - संत तुलसी साहब* और गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं - *मोह निसा सब सोवनिहारा। देखिय सपन अनेक प्रकारा।। एहि जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच वियोगी।।* योगीजन जगते हैं - योगी शरीर से बाहर नहीं जाते हैं, अपने अंदर सिमटते हैं, जैसे कछुआ अपने सब अवयवों को खोखड़े में समेट लेता है; उसी तरह *जो अपने शरीर में इन्द्रियों के घाटों से चेतन को समेट लेता है, तब जगता है। जो इस तरह नहीं जगता, उसको ईश्वर-दर्शन नहीं होता। जो उपर्युक्त तरह से जगता है, वह शरीर और इन्द्रिय-ज्ञान में नहीं रहता और वही आत्म-दर्शन, परमात्म-दर्शन करता है। इसी को संतों के ख्याल में भक्ति करना कहते हैं।* भक्ति के मोटे-मोटे कार्यों से परमात्मा के पास जाने का जितना सिमटाव होना चाहिए, उतना सिमटाव तो नहीं होता, किंतु उससे उस सिमटाव के साधन करने के योग्य बनता है; जिससे कि अंतर में विशेष प्रवेश कर सके। *संतजन मोटी उपासना में ही भक्ति को खत्म करने नहीं कहते और न बिल्कुल मोटी उपासना छोड़ने ही कहते हैं।* वे मोटी उपासना करने के लिए भी कहते हैं और उसके बाद की भी उपासना करने के लिए कहते हैं। सत्संग से इसका ज्ञान लेना चाहिए। पापों से छूटना चाहिए। साधन-भजन करनेवाले को प्रत्यक्ष ज्ञात होता है कि मैं करता हूँ तो कुछ मिलता है। संतों ने ऐसा नहीं कहा कि आज तुम करो और मरने पर पाओगे। बल्कि कहा कि *तुम अपने जीवन में ही प्राप्त करके देख लो कि यह परमात्मा है।* *इसके लिए पवित्र बनना होगा। पापों में लगा हुआ आदमी विषयों में लसका हुआ रहता है, उससे ईश्वर का भजन नहीं हो सकता।* यह प्रवचन भागलपुर के मिरजानहाट में श्रीआनंदीलाल साह के द्वारा आयोजित सत्संग में दिनांक 27.3.1955 ई० के सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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Savita Vaidwan Aug 7, 2020

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.108 : काम करते हुए भी भजन करो* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 108)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! शरीर में जीवात्मा का निवास है, इसीलिए शरीर जीवित मालूम होता है। *शरीर जड़ है अर्थात्‌ ज्ञानहीन पदार्थ है और जीवात्मा-चेतन अर्थात्‌ ज्ञानमय पदार्थ है।* दोनों का संग ऐसा है कि साधारणतः: इसको कोई भिन्न नहीं कर सकता। शरीर में रहने का जीवन थोड़ा है और शरीर छोड़ने के बाद का जीवन अनंत है। क्योंकि *जीवात्मा अविनाशी है। अनंत जीवन बहुत जीवन है*, एक शरीर का जीवन बहुत कम है। अवश्य ही वर्तमान शरीर के बाद के जीवन में स्थूल शरीर अनेक हो सकते हैं - शरीर बहुत हो सकते हैं। उन जन्म-मरणशील जीवन को जोड़ो तो बहुत हैं। इस शरीर से छूटने पर केवल जीवात्मा नहीं रहता। वह तीन जड़ शरीरों के अंदर रहता है। बारम्बार जनमने-मरने में केवल स्थूल शरीर छूटता है और तीन शरीर रह जाते हैं। इन तीनों शरीरों में रहने का जीवन बहुत है। इन्हीं शरीरों में रहते हुए स्वर्गादि परलोक का भोग होता है। वहाँ के भोग के समाप्त होने पर फिर कर्मानुसार किसी के यहाँ जन्म लेता है। लेकिन यह चक्र कबतक चलता रहेगा, कोई ठिकाना नहीं। इतना ठिकाना है कि *जबतक शरीर और संसार से छुटकारा नहीं हो जाय - मुक्ति नहीं प्राप्त कर ले, तबतक लगा रहेगा। सबसे उत्तम जीवन यही है कि किसी शरीर में नहीं रहना।* किसी शरीर में रहना, पुण्य के अनुकूल स्वर्गादि में रहो फिर वहाँ से नीचे गिरो, यह जीवन कोई अच्छा जीवन नहीं है। हमलोग वर्तमान शरीर में हैं, इसमें कितने दिन रहेंगे, ठिकाना नहीं। उस अनंत जीवन के समक्ष यह जीवन अत्यन्त स्वल्प है। लोग दुःख में एक सेकेण्ड के लिए लिए रहना नहीं चाहते। *सुख की ओर दौड़ता हुआ, दुःख से भागता हुआ यह जीव चलता है। किंतु जो सुख यह चाहता है, वह कहीं नहीं मिलता।* साधु-सन्त लोग कहते हैं कि थोड़े-से जीवन के लिए तुम दौड़े-दौड़े फिरते हो और डरते हो कि आज यह काम नहीं किया जाएगा तो यह हानि होगी। डर के मारे ठीक-ठीक नौकरी, वाणिज्य-व्यापार, खेती आदि करते रहते हो। ऐसा नहीं करो तो कोई हर्ज नहीं। बहुत धनी आदमी भी धन को सम्हालने और बढ़ाने में रहता है। धन के सम्हालने और बढ़ाने में भी कष्ट होता है। गरीब आदमी देखता है कि आज खाने के लिए है कल के लिए यत्न नहीं करो तो क्या खाओगे? उससे विशेष जो कृषक हैं, सोचते हैं कि इस साल के लिए खाने को है, आगे वर्ष क्या खाएँगे, इस डर के मारे खेती करते हैं। तो एक शरीर के जीवन के लिए डरते हो और काम करते हो। और इसके लिए नहीं डरते कि इस शरीर के जीवन के बाद का जो जीवन है उससे क्या होगा? चाहिए कि ऐसा काम करो कि शरीर छोड़ने के बाद भी तुम सुखी रहो। इसके लिए क्या करना होगा? *ईश्वर का नाम जपो।* इसी को कबीर साहब ने कहा है – *निधड़क बैठा नाम बिनु, चेति न करै पुकार। यह तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार।।* यदि समझ लो तो फिर आज कल के लिए बहाना नहीं करो कि आज नहीं कल करूँगा। क्योंकि गुरु नानकदेवजी ने कहा है – *नहँ बालक नहँ यौवने, नहिं बिरधी कछु बंध। वह औसर नहिं जानिये, जब आय पड़े जम फंद।।* *अनंत जीवन में दुःखी न होओ, इसके लिए ईश्वर का नाम-भजन करो। आजकल करते हुए समय बर्बाद मत करो।* बल्कि – *काल करै सो आज कर, आज करै से अब्ब। पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब।।* भर दिन, भर रात बैठकर भजन नहीं करने कहा जाता। *समय बांध-बांधकर भजन करो। काम करते हुए भी भजन करो और काम छोड़-छोड़कर भी भजन करो।* ब्राह्ममुहुर्त्त में मुँह-हाथ धोकर, निरालस होकर भजन करो। दिन में स्नान के बाद भजन किया करो। *तन काम में मन राम में’ हमारे यहाँ प्रसिद्ध है, इसको काम में लाओ।* फिर सायंकाल भी बैठकर भजन करो। रात में सोते समय भजन करते हुए सोओ, तो खराब स्वप्न नहीं होगा। नाम-भजन को लोग जानते हैं कि गुरु ने जो मंत्र दिया है, वही नाम-भजन है। वह नाम-भजन है किंतु और भी नाम-भजन है। जो शब्द लोग बोल सकते हैं, सुन सकते हैं, वह वर्णात्मक नाम-भजन है। ध्वन्यात्मक नाम-भजन भी होता है। वह ध्वनि तुम्हारे अंदर है। उस ब्रह्म ध्वनि में जो अपने मन को लगाता है, तो वह शब्द से खींचकर ब्रह्म तक पहुँचा देता है। *नाम का जप और नाम का ध्यान भी होता है। वर्णात्मक नाम का जप होता है। जिसकी युक्ति गुरु बताते हैं और ध्वन्यात्मक नाम का ध्यान होता है। इसकी भी युक्ति गुरु बताते हैं।* इस साधन के लिए भला चरित्र से रहना होगा। जिसका चरित्र भला नहीं है, जो सदाचार का अवलम्ब नहीं लेता है, वह विषयों में - भोगों में बँधा रहता है। जब वह भजन करने लगता है तो उसका मन गिर-गिर जाता है। इसलिए *अपने को पवित्र आचरण में रखो।* *जाकी जिभ्या बंध नहीं, हिरदे नाहीं साँच। ताके संग न चालिये, घाले बटिया काँच।।* जिभ्या पर खाने और बोलने का बंधन रखो। झूठ और कड़वा बोलना खराब है। झूठ बोलना सब *पापों की जड़ है। कड़वा बोलना आपस में फूट पैदा करता है। इसलिए सत्य बोलो और नम्र होकर रहो।* *साधू सोई सराहिये, साँची कहे बनाय। कै टूटै कै फिर जुरै, कहे बिन भरम न जाय।।* जो साँच बोलते हैं और कड़वा बोलते हैं तो उसको भी लोग सहन नहीं कर सकते। *जो भोजन तुम्हारी बुद्धि को नीचा करे, शरीर में रोग पैदा करे, वह मत खाओ।* इसके लिए संतों ने कहा - *मांस मछरिया खात है, सुरा पान से हेत। सो नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी की खेत।। यह कूकर को खान है, मानुष देह क्‍यों खाय। मुख में आमिख मेलता, नरक पड़े सो जाय।।* मांस, मछली तथा नशा आदि खाने-पीने से पाशविक वृत्ति रहती है। इसमें राजस-तामस वृत्ति रहती है। सात्तिक वृत्ति से भजन होता है। *इस प्रकार के भोजन से सात्त्विक बुद्धि दमन हो जाती है और राजस-तामस की प्रधानता हो जाती है। जिससे भजन में चंचलता और आलस आता रहता है।* जो भोजन शीघ्र नहीं पचे, वह भोजन भी मत करो। क्योंकि यह भी भजन नहीं होने देता। जितने नशे हैं, यहाँ तक कि तम्बाकू तक लेने योग्य नहीं। इसलिए कबीर साहब ने कहा – *भाँग तम्बाकू छूतरा, अफयूँ और शराब। कह कबीर इनको तजै, तब पावे दीदार।।* तम्बाकू को लोग साधारण समझते हैं, किंतु यह भी बहुत बुरी नशा है। नशाओं से, कुभोजन से, कड॒वी बात से और असत्य भाषण से बचो। इन्द्रियों में संयम रखो और भजन करो तो भजन बनेगा। केवल भाँग, तम्बाकू ही नशा नहीं है, बल्कि - *मद तो बहुतक भाँति का, ताहि न जाने कोय। तन मद मन मद जाति मद, माया मद सब लोय।। विद्या मद और गुनहु मद, राजमद्द उनमद्द। इतने मद को रद्द करें, तब पावे अनहद्द।।* इन सब नशाओं को भी छोड़ना चाहिए। यही संतों का उपदेश है। *जो संतों के उपदेश के अनुकूल रहते हैं, वे पवित्र हैं। जो संतों के उपदेश के अनुकूल नहीं चलते, वे किसी कारण पवित्र क्यों न कहे जाएँ, किंतु अपवित्र हैं। यथार्थ में हृदय पवित्र होना चाहिए।* शरीर पवित्रता के लिए क्या बात है? शिवजी के रूप को देखिए, अमंगल वेष रहने से अपवित्र नहीं है। हृदय की पवित्रता चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नान नहीं करे, पवित्रता से नहीं रहे, शारीरिक पवित्रता भी चाहिए। *झूठ सब पापों का झोरा है। सत्य बोलनेवाले का झूठ का झोरा जल जाता है।* जो सत्य बोलता है, उससे कोई पाप नहीं हो सकता है। साँच बोलने की जिसकी प्रतिज्ञा रहेगी, वह चोरी नहीं करेगा, कोई पाप नहीं करेगा। चोरी करने से झूठ बोलकर छिपाता है। सत्य बोलो तो चोरी भी छूट जाएगी। हिंसा मत करो। हिंसा करोगे तो क्या होगा? संत कबीर साहब ने कहा - *कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जो मान हमार। जाका गर तू काटिहौं, सो फिर काट तोहार।।* कर्मफल किसी को नहीं छोड़ता। श्रीराम-सीता वन गए। वे गंगा नदी के किनारे ठहरे। पत्तों के बिछौना पर श्रीसीता-राम लेटे थे और लक्ष्मण पहरा दे रहे थे। वहाँ गुहनिषाद भी बैठा और कहा कि कैकेयी ने इनको बहुत दुःख दिया। तब लक्ष्मणजी ने कहा कि - *काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सुनु भ्राता।।* युधिष्ठिर को थोड़ा-सा झूठ बोलने का फल भी मिला ही। यद्यपि वह भगवान के समक्ष और उनकी प्रेरणा से बोला था। भगवान श्रीकृष्ण को भी व्याधा ने तीर से मारा। यह भी कर्मफल ही था। इसलिए हिंसा से बचो। व्यभिचार मत करो। पर पुरुषगामिनी स्त्री व्यभिचारिणी है और परस्त्रीगामी पुरुष व्यभिचारी है। इन पंच पापों से बचो। एक ईश्वर पर विश्वास करो, उनका पूरा भरोसा करो। उनकी प्राप्ति पहले अपने अंदर होगी। उनकी प्राप्ति पहले अपने अंदर होगी, फिर सर्वत्र। *ध्यान करो, सत्संग करो और गुरु की सेवा करो। पहले कहे पंच निषेध कर्मों को नहीं करो और पीछे कहे पंच विधि कर्मों को करो।* यही ‘विधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रविनन्दिनी बरनी।।' है। इस तरह अपने जीवन को बिताने पर मुक्ति मिलेगी। मुक्ति होने से स्वयं मालूम होगा कि मुक्ति मेरी हो गई। जैसे भोजन करने से स्वयं मालूम होता है कि पेट भर गया। जो जीवन-मुक्ति प्राप्त कर लेता है, मरने पर उसे विदेह-मुक्ति हो जाती है। *यदि मुक्ति नहीं हुई तो भगवान श्रीकृष्ण के कहे अनुकूल बहुत वर्षों तक स्वर्गादि का भोग करके इस संसार में किसी पवित्र श्रीमान्‌ के घर में जन्म लेगा। अथवा योगियों के कुल में ही जन्म लेगा। इस प्रकार का जन्म इस लोक में बहुत दुर्लभ है। फिर वह पूर्व जन्म के संस्कार से प्रेरित होकर साधन-भजन करेगा और अनेक जन्मों के बाद मुक्ति को प्राप्त कर लेगा।* यह कभी नहीं भूलना चाहिए, सदा याद रखना चाहिए कि *सदाचार के धरातल पर भजन-रूप मकान बनता है।* यह प्रवचन रविदास सत्संगियों के संतमत सत्संग मंदिर, सिकन्दरपुर, भागलपुर में दिनांक 18.3.1955 ई० के सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.104 : नारदजी को बैकुण्ठ में मोह* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 104)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! महात्मा बुद्ध से लेकर अब तक इस कलि काल में बहुत से साधु-संत हुए हैं। *उन लोगों ने जो कुछ शिक्षा दी है, लोगों ने उसे ग्रंथों में रख दिया है।* हाल के संतों ने अपने से लिख भी दिया है। संत दरिया साहब, भगवान बुद्ध, महावीर तीर्थंकर आदि ने अपने से लिखा नहीं, केवल कह दिया। बुद्ध, महावीर के बाद तुलसी साहब भी कुछ पढ़े-लखे थे, किंतु उन्होंने लिखा नहीं। लोगों ने वचनों को सुनकर ग्रंथाकार किया। इसी तरह प्राचीन काल में ऋषि-मुनि हुए। उन्होंने भी लिखा नहीं, कहा। लोगों ने उसका संग्रह किया, वही उपनिषद्‌ है। उपनिषद्‌ वेद का ज्ञान मानी जाती है। *उसमें कर्म और कर्मफल का वर्णन किया गया है, कर्म की विधियों का वर्णन किया गया है, जिससे इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति लिखी है।* उपासना काण्ड में भी दोनों लोकों के सुखों से हटने के लिए कहा और कहा कि ये दोनों बन्धन हैं। दोनों में से किसी में रहो तो आवागमन में पड़े रहोगे। *दोनों के सुख क्षणभंगुर हैं, तृप्तिदायक नहीं हैं। जिसमें पूर्ण सुख-शान्ति मिलेगी, वह विषय सुख नहीं है अर्थात्‌ इन्द्रियों से पाने योग्य नहीं है।* अर्थात्‌ इन्द्रियों और विषयों के संयोग से जो सुख होता है, वह तृप्तिदायक नहीं। संतों ने कहा कि इहलोक और परलोक दोनों का सुख अनित्य है। *इससे परे का सुख नित्यानंद है। यह आत्मा से ग्रहण होने योग्य है। नित्यानंद वह है, जो सदा रह जाय। अनित्यानंद वह है, जो कुछ काल रहे, फिर नहीं रहे।* इहलोक और परलोक - दोनों से चित्त हटा रहे, यही उपनिषद्‌ और संतवाणियों में है – *एहि तन कर फल विषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अन्त दुखदाई।।* यह चौपाई भी यही बात कहती है। 'उस नित्यानंद के लिए कहाँ ठहराव होगा?’ यदि यह पूछा जाय तो उत्तर होगा - किसी देश में नहीं, देश-काल के परे। किसी आधार पर आधेय बनकर रहना किसी लोक-लोकांतर में रहना है। *आधेय बनकर रहना नित्यानन्द नहीं है।* वह अपना आधार आप है। शरीरों से अलग हटा हुआ है, केवल आत्मस्वरूप में रहता है। उसके रहने के लिए स्थान की आवश्यकता नहीं है। वहाँ स्थान नहीं है तो काल भी नहीं। वह देश-काल से अतीत पद है। *उसमें आरूढ़ होने के लिए - पहुँचने के लिए संतों ने उपदेश दिया है। संतवाणी का निचोड़ यह है। इसके लिए मनुष्य पहले अपने को जाने।* लोग ऐसा ख्याल करते हैं कि जैसे धरती पर रहना है, वैसे ही अन्य लोकों में जाकर सुख से रहना होगा। परन्तु इससे विशेष बात वह है, जिसको मैने आपलोगों से कहा। *चाहिए कि इसके लिए इच्छा उत्पन्न करे और इसको सोचे।* मनुष्य अपने को नहीं जानता है, अपने शरीर को अपने तईं कहता है, तो गलत कहता है। शरीर मर जाता है, यह प्रत्यक्ष देखता है। फिर ख्याल होता है कि शरीर में रहनेवाला कहीं चला गया है। इसलिए वैदिक धर्म में हमलोगों के यहाँ जो पुराण में प्रचार है, उससे श्राद्ध-क्रिया करते हैं। शरीर मर गया, शरीर में रहनेवाला कहीं चला गया, उसकी शान्ति के लिए, सुख के लिए श्राद्ध-क्रिया करते हैं। *श्राद्ध क्रिया यह ज्ञान देती है कि शरीर में रहनेवाला कोई था, वह चला गया।* उसके लिए श्राद्ध-क्रिया होती है। इस श्राद्ध-क्रिया से शरीर और शरीरी का ज्ञान होता है। यह पूरा ज्ञान तो नहीं है; किंतु आरम्भ का ज्ञान अवश्य है। जिस शरीर को लोग जला आते हैं, उसमें भी शरीर है। फिर उसमें भी शरीर है। एवम्‌ प्रकार से चार जड़-शरीर हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण। मुंशी माखनलाल चले गए या और कोई कितने गए; किंतु क्या केवल आत्मा गयी? नहीं। स्थूल शरीर छोड़कर गयी और सूक्ष्म शरीर को साथ लेकर चली गयी। ऊपर का स्थूल शरीर छूट गया तो ऊपर में सूक्ष्म शरीर रहा। यह शरीर का पूरा ज्ञान है। *इन सब शरीरों के बाद एक शरीर और है, जिसको ‘चिदानन्दमय देह तुम्हारी' कहते हैं। यह चेतन शरीर है। चेतन से भी परे स्वरूप आत्मा का है।* जैसे स्थूल शरीर में होने पर स्थूल जगत में रहना होता है, इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर के लिए सूक्ष्म जगत होना चाहिए। इसी सूक्ष्म जगत में स्वर्ग-वैकुण्ठादि हैं। कितने लोग स्वर्गादि को नहीं मानते हैं। उस सूक्ष्म लोक और स्वर्गादि में यहाँ के सुख से विशेष सुख और विशेष दिनों तक रहना होता है। *किंतु न यहाँ दुःख छोड़ता है और न वहाँ दुःख छोड़ता है। माया-मोह न यहाँ छोड़ता है और न वहाँ।* नारदजी वैकुण्ठ गए। वहाँ उनका मोह और बढ़ गया। गोलोक से श्रीदामाजी कंस के पास राक्षस बनकर आए। वहाँ विषय-सुख है और माया का पसार है। माया में जो होना चाहिए, सो होता है। इसलिए *'स्वर्गठ स्वल्प अंत दुखदाई' - भगवान श्रीराम ने कहा। संतों ने ज्ञान, योग और भक्ति; तीनों को मिलाकर चलने को कहा। घी, मीठा और अन्न तीनों मिलाकर सुन्दर मिठाई होती है। इसी तरह ज्ञान, योग ओर भक्ति; तीनों को मिलाकर संतों ने उपदेश दिया है।* यह प्रवचन भागलपुर जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर एकचारी में दिनांक 2.3.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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