Prakash Singh Rathore
Prakash Singh Rathore Apr 17, 2021

।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।। महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.111 : संसार में खीरा की तरह रहो (साभार – सत्संग-सुधा सागर, 111) बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। प्यारे लोगो! जहाँ से अनहद सुनने का आरंभ होता है, वह नाम का घर है। कंज = कमल। कंजाकमल = ध्यान का आरंभ जहाँ से होता है। लीलागिरि = कौतुक का पहाड़। शब्द के ध्यान में जो ज्ञान बढ़ा, वह है नाम का प्रकाश अथवा जिस प्रकाश से नाम प्रकट होता है, वह ‘दीपक बारा नाम का’ है। बाती दीन्ही टार = सुरत को आगे बढ़ाया। तल्ली ताल तरंग बखानी = तल पर शब्दों की तरंगें उठती हैं। तल्‍ली = तल। इस सत्संग में कहा जाता है कि अपना उद्धार करो। इस संसार में पूर्णरूप से कोई सुखी नहीं होता है। यहाँ केवल कहलाने के लिए सुख है। दरअसल यह संसार सुख का स्थान नहीं है। इससे पार हो जाना चाहिए। जबतक आप देह में रहिएगा, तबतक संसार में रहना होगा। संसार का अर्थ केवल स्थूल जगत नहीं। जहाँ तक शरीर है, वहाँ तक संसार है। इस स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर है। साधारण मृत्यु में केवल स्थूल शरीर चला जाता है - मर जाता है। जीवात्मा मरता नहीं है। सूक्ष्म, कारण, महाकारण शरीर नहीं मरते हैं। इसके साथ जीवात्मा रहता है। भजन करने से ही इन बचे शरीरों को मार सकते हैं। जिस तरह स्थूल शरीर से जीवात्मा निकल जाता है, तो स्थूल शरीर मर जाता है; उसी तरह सूक्ष्म, कारण, महाकारण शरीर से जीवात्मा के निकल जाने पर इन शरीरों की मृत्यु होती है। किसी भी लोक में रहिए, किसी भी शरीर में रहिए, स्वर्गादि लोक में रहिए, ब्रह्म के लोक में रहिए; सभी जगह कष्ट-ही-कष्ट है। शिवलोक में शिव को भी कष्ट होता है। सभी लोकों में झगड़ा-तकरार, शापा-शापी होते हैं। गोलोक में भी ऐसा होता है। गर्ग-संहिता पढ़कर देखिए। कितनाहूँ सुन्दर-से-सुन्दर देहवाला हो, कितनाहूँ ऊँचा लोक हो, सबमें दुःख है। इसलिए अपने उद्धार के लिए सब शरीरों को छोड़ना होगा। जैसे कोई घर से बाहर जाना चाहे तो पहले घर-ही-घर चलना पड़ता है। उसी तरह शरीरों से निकलने के लिए शरीर-ही-शरीर निकलना होगा और सब शरीरों से निकलने पर परमात्मा की प्राप्ति होती है। अभी आपलोगों ने तुलसी साहब का पद ‘जीव का निबेरा’ सुना। उसमें अन्तमार्ग का वर्णन है। संसार में जो कुछ देखने में आता है, वह अपने अंदर भी देख सकते हैं। सब शरीरों को छोड़ने का अपने अंदर में ही यत्न होना चाहिए। परमात्मा के दर्शन का यत्न अपने शरीर में ही होना चाहिए। बाहर में जो दर्शन होता है, वह माया का दर्शन होता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है - गो गोचर जहँ लगि मन जाईं। सो सब माया जानहु भाई।। अपने अन्दर जो चलता है, तो उसको देव-रूपों का दर्शन होता है और अन्त में परमात्मा का भी दर्शन होता है। इसका यत्न है - अपने घर में रहो, सत्संग भजन करो और यह ख्याल रखो कि यह शरीर छोड़ना होगा। घर बढ़िया-बढ़िया हो, उसमें अपने आराम किया हो, तो उस सोने के महल में भी कोई नहीं रखता, जब इस शरीर से प्राण निकल जाता है। गुरु नानकदेवजी ने कहा है - एक घड़ी कोऊ नहिं राखत, घर तें देत निकार। इसमें आसक्त होने से ठीक नहीं। कोई भी संसार में सदा नहीं रह सकता। संत चरणदासजी की शिष्या सहजोबाई ने बड़ा अच्छा कहा है - चलना है रहना नहीं, चलना विश्वाबीस। सहजो तनिक सुहाग पर, कहा गुथावै शीश।। कोई कितनाहूँ प्यारा हो, सबको छोड़कर जाना होगा। इसलिए संसार में खीरा बनकर रहो। खीरा ऊपर से एक और भीतर से फटा हुआ होता है। इस तरह संसार में रहने से कल्याण होगा। न तो बाल-बच्चों को छोड़ो, न इनमें फँसो। फँसाव को छोड़कर अपने अन्दर साधन-भजन करो। जप करो और ध्यान करो। इसके लिए चाल-चलन अच्छी बनाओ। झूठ एकदम छोड़ दो। जो झूठ बोलेगा, उसी से सब पाप होगा। जो झूठ छोड़ देगा, उससे कोई पाप नहीं होगा। चोरी मत करो। व्यभिचार मत करो। नशा मत खाओ, पिओ। नशा खाने से मस्तिष्क ठीक नहीं रहता। भाँग, तम्बाकू, गाँजा सबको छोड़ दो। हिंसा मत करो जीवों को दुःख मत दो। मत्स्य-मांस मत खाओ। मत्स्य-मांस खाने से जलचर, थलचर, नभचर के जो स्वभाव हैं तासीर हैं, उस स्वभाव को, खानेवाले अपने अन्दर लेते हैं। अपने शरीर पर विचारिए और उन जानवरों के शरीर पर विचारिए। मनुष्य का शरीर तो देवताओं के शरीर से उत्तम है। फिर इतने पवित्र शरीर में अपवित्र मांस को देना ठीक नहीं। हिंसा दो तरह की होती हैं - एक वार्य और दूसरी अनिवार्य। वार्य हिंसा से बच सकते हैं। जिव्हा - स्वाद के लिए नाहक जीवों को मारना वार्य हिंसा है। इससे बचना चाहिए। कृषि कर्म में जो हिंसा होती है, वह अनिवार्य है। अनिवार्य हिंसा से कोई बच नहीं सकता। वार्य हिंसा से बचो। मांस-मछली नहीं खाने से सात्त्विक मन होगा। तब भजन बनेगा। यह प्रवचन खगड़िया जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर रामगंज में दिनांक 26.5.1955 ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। श्री सद्गुरु महाराज की जय

Audio - ।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।
महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.111 : संसार में खीरा की तरह रहो
(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 111)
बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।
प्यारे लोगो!
	जहाँ से अनहद सुनने का आरंभ होता है, वह नाम का घर है। कंज = कमल। कंजाकमल = ध्यान का आरंभ जहाँ से होता है। लीलागिरि = कौतुक का पहाड़। शब्द के ध्यान में जो ज्ञान बढ़ा, वह है नाम का प्रकाश अथवा जिस प्रकाश से नाम प्रकट होता है, वह ‘दीपक बारा नाम का’ है। बाती दीन्ही टार = सुरत को आगे बढ़ाया। तल्ली ताल तरंग बखानी = तल पर शब्दों की तरंगें उठती हैं। तल्‍ली = तल।
	इस सत्संग में कहा जाता है कि अपना उद्धार करो। इस संसार में पूर्णरूप से कोई सुखी नहीं होता है। यहाँ केवल कहलाने के लिए सुख है। दरअसल यह संसार सुख का स्थान नहीं है। इससे पार हो जाना चाहिए। जबतक आप देह में रहिएगा, तबतक संसार में रहना होगा। संसार का अर्थ केवल स्थूल जगत नहीं। जहाँ तक शरीर है, वहाँ तक संसार है। इस स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर है।
	साधारण मृत्यु में केवल स्थूल शरीर चला जाता है - मर जाता है। जीवात्मा मरता नहीं है। सूक्ष्म, कारण, महाकारण शरीर नहीं मरते हैं। इसके साथ जीवात्मा रहता है। भजन करने से ही इन बचे शरीरों को मार सकते हैं। जिस तरह स्थूल शरीर से जीवात्मा निकल जाता है, तो स्थूल शरीर मर जाता है; उसी तरह सूक्ष्म, कारण, महाकारण शरीर से जीवात्मा के निकल जाने पर इन शरीरों की मृत्यु होती है। किसी भी लोक में रहिए, किसी भी शरीर में रहिए, स्वर्गादि लोक में रहिए, ब्रह्म के लोक में रहिए; सभी जगह कष्ट-ही-कष्ट है। शिवलोक में शिव को भी कष्ट होता है। सभी लोकों में झगड़ा-तकरार, शापा-शापी होते हैं। गोलोक में भी ऐसा होता है। गर्ग-संहिता पढ़कर देखिए। कितनाहूँ सुन्दर-से-सुन्दर देहवाला हो, कितनाहूँ ऊँचा लोक हो, सबमें दुःख है। इसलिए अपने उद्धार के लिए सब शरीरों को छोड़ना होगा। जैसे कोई घर से बाहर जाना चाहे तो पहले घर-ही-घर चलना पड़ता है। उसी तरह शरीरों से निकलने के लिए शरीर-ही-शरीर निकलना होगा और सब शरीरों से निकलने पर परमात्मा की प्राप्ति होती है।
	अभी आपलोगों ने तुलसी साहब का पद ‘जीव का निबेरा’ सुना। उसमें अन्तमार्ग का वर्णन है। संसार में जो कुछ देखने में आता है, वह अपने अंदर भी देख सकते हैं। सब शरीरों को छोड़ने का अपने अंदर में ही यत्न होना चाहिए। परमात्मा के दर्शन का यत्न अपने शरीर में ही होना चाहिए। बाहर में जो दर्शन होता है, वह माया का दर्शन होता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है -
गो गोचर जहँ लगि मन जाईं। सो सब माया जानहु भाई।।
अपने अन्दर जो चलता है, तो उसको देव-रूपों का दर्शन होता है और अन्त में परमात्मा का भी दर्शन होता है। इसका यत्न है - अपने घर में रहो, सत्संग भजन करो और यह ख्याल रखो कि यह शरीर छोड़ना होगा। घर बढ़िया-बढ़िया हो, उसमें अपने आराम किया हो, तो उस सोने के महल में भी कोई नहीं रखता, जब इस शरीर से प्राण निकल जाता है। गुरु नानकदेवजी ने कहा है -
एक घड़ी कोऊ नहिं राखत, घर तें देत निकार।
इसमें आसक्त होने से ठीक नहीं। कोई भी संसार में सदा नहीं रह सकता। संत चरणदासजी की शिष्या सहजोबाई ने बड़ा अच्छा कहा है -
चलना है रहना नहीं, चलना विश्वाबीस। सहजो तनिक सुहाग पर, कहा गुथावै शीश।।
कोई कितनाहूँ प्यारा हो, सबको छोड़कर जाना होगा। इसलिए संसार में खीरा बनकर रहो। खीरा ऊपर से एक और भीतर से फटा हुआ होता है। इस तरह संसार में रहने से कल्याण होगा। न तो बाल-बच्चों को छोड़ो, न इनमें फँसो। फँसाव को छोड़कर अपने अन्दर साधन-भजन करो। जप करो और ध्यान करो। इसके लिए चाल-चलन अच्छी बनाओ।
	झूठ एकदम छोड़ दो। जो झूठ बोलेगा, उसी से सब पाप होगा। जो झूठ छोड़ देगा, उससे कोई पाप नहीं होगा। चोरी मत करो। व्यभिचार मत करो। नशा मत खाओ, पिओ। नशा खाने से मस्तिष्क ठीक नहीं रहता। भाँग, तम्बाकू, गाँजा सबको छोड़ दो। हिंसा मत करो जीवों को दुःख मत दो। मत्स्य-मांस मत खाओ। मत्स्य-मांस खाने से जलचर, थलचर, नभचर के जो स्वभाव हैं तासीर हैं, उस स्वभाव को, खानेवाले अपने अन्दर लेते हैं। अपने शरीर पर विचारिए और उन जानवरों के शरीर पर विचारिए। मनुष्य का शरीर तो देवताओं के शरीर से उत्तम है। फिर इतने पवित्र शरीर में अपवित्र मांस को देना ठीक नहीं।
	हिंसा दो तरह की होती हैं - एक वार्य और दूसरी अनिवार्य। वार्य हिंसा से बच सकते हैं। जिव्हा - स्वाद के लिए नाहक जीवों को मारना वार्य हिंसा है। इससे बचना चाहिए। कृषि कर्म में जो हिंसा होती है, वह अनिवार्य है। अनिवार्य हिंसा से कोई बच नहीं सकता। वार्य हिंसा से बचो। मांस-मछली नहीं खाने से सात्त्विक मन होगा। तब भजन बनेगा।
	यह प्रवचन खगड़िया जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर रामगंज में दिनांक 26.5.1955 ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था।
श्री सद्गुरु महाराज की जय

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Malti Singh Apr 17, 2021
जय माता दी 🙏 शुभ संध्या वंदन भाई जी 🙏 माता रानी आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें।🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿

Seema Sharma. Himachal (chd) Apr 17, 2021
*आपकी सोच ही आपको बड़ा बनाती है*...!! *यदि हम गुलाब की तरह खिलना चाहते है तो काँटों के साथ तालमेल बनाके रखने की कला तो सीखनी ही होगी*।🌷🌹🌷😊 बहुत बहुत धन्यवाद जी 😊 शुभ रात्रि जी 😊 जय माता दी 🙏😊🙏

Prakash Singh Rathore Apr 20, 2021
@maltisingh1 रोज का सत्संग सुन ने के लिए यहां क्लिक कीजिए..................... https://chat.whatsapp.com/KofJ4ysVtl03zKkS6LpDdL

Prakash Singh Rathore Apr 20, 2021
@seemasharma89 🙏🙏 जय श्री कृष्णा *ॐ नमः भगवतेय वासुदेवाय नमः* हर वक्त हरे कृष्णा ओर इस महामंत्र का जाप करते रहिऐ *108 *बार* हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे *राधे राधे जी* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Prakash Singh Rathore Apr 20, 2021
@sitaram384 🙏🙏 *।। जय श्री कृष्णा ।।*🙏🙏 🌹 *जन्माष्टमी के शुभ अवसर से* 🌹 प्रभु जी आप सभी को निवेदन है कि आप भी भगवद गीता का लाभ उठायें *मेरा आप से यही कहना है* की आप भी ये ग्रुप join कर लीजिए *Whatsapp के लिए* 👇👇👇👇👇👇👇 https://chat.whatsapp.com/IW1kuloS55s7yslN4ohwiN *Teligram के लिए* 👇👇👇👇👇👇 https://telegram.me/DailyBhagavadGita

Prakash Singh Rathore Apr 20, 2021
@maltisingh1 🙏🙏 जय श्री कृष्णा *ॐ नमः भगवतेय वासुदेवाय नमः* हर वक्त हरे कृष्णा ओर इस महामंत्र का जाप करते रहिऐ *108 *बार* हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे *राधे राधे जी* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Dharampal Singh35678 May 15, 2021

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🙏🌹Mahi🚩🙏 May 14, 2021

*ऑनलाइन क्लासेस में टीचर ने बच्चों को कोरोना पर निबंध लिखने को बोला।* *एक बच्चे को सबसे ज्यादा नम्बर मिले। उसका निबंध-* *आप भी पढ़िए व आनंद लीजिए-* कोरोना एक नया त्योहार है जो होली के बाद आता है। इसके आने पर बहुत सारे दिन की छुट्टियां हो जाती हैं। सब लोग थाली और ताली बजाकर और खूब सारे दिए जलाकर इस त्योहार की शुरुआत करते हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री सबसे पहले थाली बजाते है। स्कूल और ऑफिस सब बंद हो जाते हैं, सब लोग मिलकर घर पर रहते हैं। मम्मी रोज़ नये फ़ूड बनाकर फेसबुक पर डिस्प्ले करती हैं। पापा बर्तन और झाड़ू पोंछा करते हैं । कोरोना का त्योहार मास्क पहनकर और नमस्ते करके मनाया जाता है। उसके अलावा एक कड़वा काढ़ा पीना भी ज़रुरी होता है, इस त्योहार में नए कपडे़ नहीं पहने जाते। पापा कच्छा और बनियान पहनते हैं और मम्मी गाउन पहन कर ही इस त्योहार को सेलिब्रेट करती हैं। इस त्योहार में हाथों को दिन में 10/20 बार धोना पड़ता है, सेनिटाइजर किया जाता है। गर्म पानी का गारगिल और भाप भी लेना होता है बाकी त्योहारों में गले मिलना, हाथ मिलाकर सेलिब्रेट किये जाते हैं लेकिन इस त्योहार में एक दूसरे से दूरी बनाकर रखनी पड़ती है। बजाय खुशी के डर का माहौल रहता है। बाहर का खरीदा हर सामान साग-सब्जी को धोकर एवं सूखे सामान को एक दिन रखकर दूसरे दिन काम में लिया जाता है। इस त्योहार में हमें सावधानियां रखना सिखाया जाता है। इस त्योहार पर भक्तिकाल के कवियों ने इस प्रकार अपनी अभिव्यक्ति दी है- *रहीमदास* रहिमन घर से जब चलो, रखियो मास्क लगाय। न जाने किस वेश में मिले करोना आय।। *कबीरदास* कबीरा काढ़ा पीजिए, काली मिरिच मिलाय। रात दूध हल्दी पियो, सुबह पीजिए चाय।। *तुलसीदास* छोटा सेनिटाइजर, तुलसी रखिए जेब। न काहू सो मागिहो, न काहू को देब।। *सूरदास* सूरदास घर में रह्यो, ये है सबसे बेस्ट। जर, जुकाम, सर्दी लगे, तुरंत करालो टेस्ट।। *मलूकदास* बिस्तर पर लेटे रहो सुबह शाम दिन रात। एक तो रोग भयंकरा ऊपर से बरसात।। रहिमन वैक्सीन ढूंढ़िए, बिन वैक्सीन सब सून, वैक्सीन बिना ही बीत गए, अप्रैल मई और जून... कबीरा वैक्सीन ढूंढ़ लिया लिया एक लगवाय दूसरा डोज तब लगे जब अठाईस दिन हो जाय।। 😊 *खुश रहें, मस्त रहें* 😷

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