Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏 *श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 177*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 18*🙏🌸 *इस अध्याय में वामन भगवान का प्रकट होकर राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार जब ब्रह्मा जी ने भगवान की शक्ति और लीला की स्तुति की, तब जन्म-मृत्यु रहित भगवान अदिति के सामने प्रकट हुए। भगवान के चार भुजाएँ थीं; उनमें वे शंख, गदा, कमल और चक्र धारण किये हुए थे। कमल के समान कोमल और बड़े-बड़े नेत्र थे। पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। विशुद्ध श्यामवर्ण का शरीर था। मकराकृति कुण्डलों की कान्ति से मुखकमल की शोभा और भी उल्लसित हो रही थी। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, हाथों में कंगन और भुजाओं में बाजूबंद, सिर पर किरीट, कमर में करधनी की लड़ियाँ और चरणों में सुन्दर नूपुर जगमगा रहे थे। *भगवान गले में अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठ में कौस्तुभ मणि सुशोभित थी। भगवान की अंग कान्ति से प्रजापति कश्यप जी के घर का अन्धकार नष्ट हो गया। उस समय दिशाएँ निर्मल हो गयीं। नदी और सरोवरों का जल स्वच्छ हो गया। प्रजा के हृदय में आनन्द की बाढ़ आ गयी। सब ऋतुएँ एक साथ अपना-अपना गुण प्रकट करने लगीं। स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, देवता, गौ, द्विज और पर्वत- इन सबके हृदय में हर्ष का संचार हो गया। परीक्षित! जिस समय भगवान ने जन्म ग्रहण किया, उस समय चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर थे। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की श्रवण नक्षत्र वाली द्वादशी थी। अभिजित् मुहूर्त में भगवान का जन्म हुआ था। सभी नक्षत्र और तारे भगवान के जन्म को मंगलमय सूचित कर रहे थे। *परीक्षित! जिस तिथि में भगवान का जन्म हुआ था, उसे ‘विजय द्वादशी’ कहते हैं। जन्म के समय सूर्य आकाश के मध्य भाग में स्थित थे। भगवान के अवतार के समय शंख, ढोल, मृदंग, डफ और नगाड़े आदि बाजे बजने लगे। इन तरह-तरह के बाजों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि होने लगी। अप्सराएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं। श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे। मुनि, देवता, मनु, पितर और अग्नि स्तुति करने लगे। सिद्ध, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्नर, चारण, यक्ष, राक्षस, पक्षी, मुख्य-मुख्य नागगण और देवताओं के अनुचर नाचने-गाने एवं भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे तथा उन लोगों ने अदिति के आश्रम को पुष्पों की वर्षा से ढक दिया। जब अदिति ने अपने गर्भ से प्रकट हुए परम पुरुष परमात्मा देखा, तो वह अत्यन्त आश्चर्यचकित और परमानन्दित हो गयी। प्रजापति कश्यप जी भी भगवान को अपनी योगमाया से शरीर धारण किये हुए देख विस्मित हो गये और कहने लगे ‘जय हो! जय हो। *परीक्षित! भगवान स्वयं अव्यक्त एवं चित्स्वरूप हैं। उन्होंने जो परम कान्तिमय आभूषण एवं आयुधों से युक्त वह शरीर ग्रहण किया था, उसी शरीर से, कश्यप और अदिति के देखते-देखते वामन ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया- ठीक वैसे ही, जैसे नट अपना वेष बदल ले। क्यों न हो, भगवान की लीला तो अद्भुत है ही। भगवान को वामन ब्रह्मचारी के रूप में देखकर महर्षियों को बड़ा आनन्द हुआ। उन लोगों ने कश्यप प्रजापति को आगे करके उनके जातकर्म आदि संस्कार करवाये। जब उनका उपनयन-संस्कार होने लगा, तब गायत्री के अधिष्ठातृ-देवता स्वयं सविता ने उन्हें गायत्री का उपदेश किया। देवगुरु बृहस्पति जी ने यज्ञोपवीत और कश्यप ने मेखला दी। *पृथ्वी ने कृष्णमृग का चर्म, वन के स्वामी चन्द्रमा ने दण्ड, माता अदिति ने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाश के अभिमानी देवता ने वामन वेषधारी भगवान् को छत्र दिया। *परीक्षित! अविनाशी प्रभु को ब्रह्मा जी ने कमण्डलु, सप्तर्षियों ने कुश और सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला समर्पित की। इस रीति से जब वामन भगवान का उपनयन-संस्कार हुआ, तब यक्षराज कुबेर ने उनको भिक्षा का पात्र और सतीशिरोमणि जगज्जननी स्वयं भगवती उमा ने भिक्षा दी। *इस प्रकार जब सब लोगों ने वटु वेषधारी भगवान का सम्मान किया, तब वे ब्रह्मर्षियों से भरी हुई सभा मे अपने ब्रह्मतेज के कारण अत्यन्त शोभायमान हुए। इसके बाद भगवान ने स्थापित और प्रज्ज्वलित अग्नि का कुशों से परिसमूहन और परिस्तरण करके पूजा की और समिधाओं से हवन किया। *परीक्षित! उसी समय भगवान् ने सुना कि सब प्रकार की सामग्रियों से सम्पन्न यशस्वी बलि भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार बहुत-से अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं, तब उन्होंने वहाँ के लिये यात्रा की। भगवान समस्त शक्तियों से युक्त हैं। उनके चलने के समय उनके भार से पृथ्वी पग-पग पर झुकने लगी। *नर्मदा नदी के उत्तर तट पर ‘भृगुकच्छ’ नाम का एक बड़ा सुन्दर स्थान है। वहीं बलि के भृगुवंशी ऋत्विज श्रेष्ठ यज्ञ का अनुष्ठान करा रहे थे। उन लोगों ने दूर से ही वामन भगवान को देखा, तो उन्हें ऐसा जान पड़ा, मानो साक्षात् सूर्य देव का उदय हो रहा हो। *परीक्षित! वामन भगवान् के तेज से ऋत्विज, यजमान और सदस्य-सब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखने के लिये सूर्य, अग्नि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं। भृगु के पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्यों के साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथ में छत्र, दण्ड और जल से भरा कमण्डलु लिये हुए वामन भगवान ने अश्वमेध यज्ञ के मण्डप में प्रवेश किया। *वे कमर में मूँज की मेखला और गले में यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगल में मृगचर्म था और सिर पर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मण के वेष में अपनी माया से ब्रह्मचारी बने हुए भगवान् ने जब उनके यज्ञ मण्डप में प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्यों के साथ उनके तेज से प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामन भगवान का स्वागत-सत्कार किया। *भगवान के लघु रूप के अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलि को बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामन भगवान को एक उत्तम आसन दिया। फिर स्वागत-वाणी से उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और संगरहित महापुरुषों को भी अत्यन्त मनोहर लगने वाले वामन भगवान की पूजा की। भगवान् के चरणकमलों का धोवन परममंगलमय है। उससे जीवों के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान शंकर ने अत्यन्त भक्तिभाव से उसे अपने सिर पर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्म के मर्मज्ञ राजा बलि को प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेम से उसे अपने मस्तक पर रखा। *बलि ने कहा- ब्राह्मणकुमार! आप भले पधारे। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? *आर्य! ऐसा जान पड़ता है कि बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों की तपस्या ही स्वयं मूर्तिमान होकर मेरे सामने आयी है। आज आप मेरे घर पधारे, इससे मेरे पितर तृप्त हो गये। आज मेरा वंश पवित्र हो गया। आज मेरा यह यज्ञ सफल हो गया। *ब्राह्मणकुमार! आपके पाँव पखारने से मेरे सारे पाप धुल गये और विधिपूर्वक यज्ञ करने से, अग्नि में आहुति डालने से जो फल मिलता, वह अनायास ही मिल गया। आपके इन नन्हे-नन्हे चरणों और इनके धोवन से पृथ्वी पवित्र हो गयी। ब्राह्मणकुमार! ऐसा जान पड़ता है कि आप कुछ चाहते हैं। परमपूज्य ब्रह्मचारी जी! आप जो चाहते हों- गाय, सोना, सामग्रियों से सुसज्जित घर, पवित्र अन्न, पीने की वस्तु, विवाह के लिये ब्राह्मण की कन्या, सम्पत्तियों से भरे हुए गाँव, घोड़े, हाथी, रथ-वह सब आप मुझसे माँग लीजिये। अवश्य ही वह सब मुझसे माँग लीजिये। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸
          🌸🙏 *श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸
 🌸🙏*पोस्ट - 177*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸
                    🌸🙏*अध्याय - 18*🙏🌸
*इस अध्याय में वामन भगवान का प्रकट होकर राजा बलि की यज्ञशाला में पधारना......

          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार जब ब्रह्मा जी ने भगवान की शक्ति और लीला की स्तुति की, तब जन्म-मृत्यु रहित भगवान अदिति के सामने प्रकट हुए। भगवान के चार भुजाएँ थीं; उनमें वे शंख, गदा, कमल और चक्र धारण किये हुए थे। कमल के समान कोमल और बड़े-बड़े नेत्र थे। पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। विशुद्ध श्यामवर्ण का शरीर था। मकराकृति कुण्डलों की कान्ति से मुखकमल की शोभा और भी उल्लसित हो रही थी। वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, हाथों में कंगन और भुजाओं में बाजूबंद, सिर पर किरीट, कमर में करधनी की लड़ियाँ और चरणों में सुन्दर नूपुर जगमगा रहे थे। 
          *भगवान गले में अपनी स्वरूपभूत वनमाला धारण किये हुए थे, जिसके चारों ओर झुंड-के-झुंड भौंरे गुंजार कर रहे थे। उनके कण्ठ में कौस्तुभ मणि सुशोभित थी। भगवान की अंग कान्ति से प्रजापति कश्यप जी के घर का अन्धकार नष्ट हो गया। उस समय दिशाएँ निर्मल हो गयीं। नदी और सरोवरों का जल स्वच्छ हो गया। प्रजा के हृदय में आनन्द की बाढ़ आ गयी। सब ऋतुएँ एक साथ अपना-अपना गुण प्रकट करने लगीं। स्वर्गलोक, अन्तरिक्ष, पृथ्वी, देवता, गौ, द्विज और पर्वत- इन सबके हृदय में हर्ष का संचार हो गया। परीक्षित! जिस समय भगवान ने जन्म ग्रहण किया, उस समय चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर थे। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की श्रवण नक्षत्र वाली द्वादशी थी। अभिजित् मुहूर्त में भगवान का जन्म हुआ था। सभी नक्षत्र और तारे भगवान के जन्म को मंगलमय सूचित कर रहे थे। 
          *परीक्षित! जिस तिथि में भगवान का जन्म हुआ था, उसे ‘विजय द्वादशी’ कहते हैं। जन्म के समय सूर्य आकाश के मध्य भाग में स्थित थे। भगवान के अवतार के समय शंख, ढोल, मृदंग, डफ और नगाड़े आदि बाजे बजने लगे। इन तरह-तरह के बाजों और तुरहियों की तुमुल ध्वनि होने लगी। अप्सराएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं। श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे। मुनि, देवता, मनु, पितर और अग्नि स्तुति करने लगे। सिद्ध, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्नर, चारण, यक्ष, राक्षस, पक्षी, मुख्य-मुख्य नागगण और देवताओं के अनुचर नाचने-गाने एवं भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे तथा उन लोगों ने अदिति के आश्रम को पुष्पों की वर्षा से ढक दिया। जब अदिति ने अपने गर्भ से प्रकट हुए परम पुरुष परमात्मा देखा, तो वह अत्यन्त आश्चर्यचकित और परमानन्दित हो गयी। प्रजापति कश्यप जी भी भगवान को अपनी योगमाया से शरीर धारण किये हुए देख विस्मित हो गये और कहने लगे ‘जय हो! जय हो। 
          *परीक्षित! भगवान स्वयं अव्यक्त एवं चित्स्वरूप हैं। उन्होंने जो परम कान्तिमय आभूषण एवं आयुधों से युक्त वह शरीर ग्रहण किया था, उसी शरीर से, कश्यप और अदिति के देखते-देखते वामन ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया- ठीक वैसे ही, जैसे नट अपना वेष बदल ले। क्यों न हो, भगवान की लीला तो अद्भुत है ही। भगवान को वामन ब्रह्मचारी के रूप में देखकर महर्षियों को बड़ा आनन्द हुआ। उन लोगों ने कश्यप प्रजापति को आगे करके उनके जातकर्म आदि संस्कार करवाये। जब उनका उपनयन-संस्कार होने लगा, तब गायत्री के अधिष्ठातृ-देवता स्वयं सविता ने उन्हें गायत्री का उपदेश किया। देवगुरु बृहस्पति जी ने यज्ञोपवीत और कश्यप ने मेखला दी।
          *पृथ्वी ने कृष्णमृग का चर्म, वन के स्वामी चन्द्रमा ने दण्ड, माता अदिति ने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाश के अभिमानी देवता ने वामन वेषधारी भगवान् को छत्र दिया।
          *परीक्षित! अविनाशी प्रभु को ब्रह्मा जी ने कमण्डलु, सप्तर्षियों ने कुश और सरस्वती ने रुद्राक्ष की माला समर्पित की। इस रीति से जब वामन भगवान का उपनयन-संस्कार हुआ, तब यक्षराज कुबेर ने उनको भिक्षा का पात्र और सतीशिरोमणि जगज्जननी स्वयं भगवती उमा ने भिक्षा दी।
          *इस प्रकार जब सब लोगों ने वटु वेषधारी भगवान का सम्मान किया, तब वे ब्रह्मर्षियों से भरी हुई सभा मे अपने ब्रह्मतेज के कारण अत्यन्त शोभायमान हुए। इसके बाद भगवान ने स्थापित और प्रज्ज्वलित अग्नि का कुशों से परिसमूहन और परिस्तरण करके पूजा की और समिधाओं से हवन किया।
          *परीक्षित! उसी समय भगवान् ने सुना कि सब प्रकार की सामग्रियों से सम्पन्न यशस्वी बलि भृगुवंशी ब्राह्मणों के आदेशानुसार बहुत-से अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं, तब उन्होंने वहाँ के लिये यात्रा की। भगवान समस्त शक्तियों से युक्त हैं। उनके चलने के समय उनके भार से पृथ्वी पग-पग पर झुकने लगी।
          *नर्मदा नदी के उत्तर तट पर ‘भृगुकच्छ’ नाम का एक बड़ा सुन्दर स्थान है। वहीं बलि के भृगुवंशी ऋत्विज श्रेष्ठ यज्ञ का अनुष्ठान करा रहे थे। उन लोगों ने दूर से ही वामन भगवान को देखा, तो उन्हें ऐसा जान पड़ा, मानो साक्षात् सूर्य देव का उदय हो रहा हो।
          *परीक्षित! वामन भगवान् के तेज से ऋत्विज, यजमान और सदस्य-सब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखने के लिये सूर्य, अग्नि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं। भृगु के पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्यों के साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथ में छत्र, दण्ड और जल से भरा कमण्डलु लिये हुए वामन भगवान ने अश्वमेध यज्ञ के मण्डप में प्रवेश किया।
          *वे कमर में मूँज की मेखला और गले में यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। बगल में मृगचर्म था और सिर पर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मण के वेष में अपनी माया से ब्रह्मचारी बने हुए भगवान् ने जब उनके यज्ञ मण्डप में प्रवेश किया, तब भृगुवंशी ब्राह्मण उन्हें देखकर अपने शिष्यों के साथ उनके तेज से प्रभावित एवं निष्प्रभ हो गये। वे सब-के-सब अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए और उन्होंने वामन भगवान का स्वागत-सत्कार किया।
          *भगवान के लघु रूप के अनुरूप सारे अंग छोटे-छोटे बड़े ही मनोरम एवं दर्शनीय थे। उन्हें देखकर बलि को बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने वामन भगवान को एक उत्तम आसन दिया। फिर स्वागत-वाणी से उनका अभिनन्दन करके पाँव पखारे और संगरहित महापुरुषों को भी अत्यन्त मनोहर लगने वाले वामन भगवान की पूजा की। भगवान् के चरणकमलों का धोवन परममंगलमय है। उससे जीवों के सारे पाप-ताप धुल जाते हैं। स्वयं देवाधिदेव चन्द्रमौलि भगवान शंकर ने अत्यन्त भक्तिभाव से उसे अपने सिर पर धारण किया था। आज वही चरणामृत धर्म के मर्मज्ञ राजा बलि को प्राप्त हुआ। उन्होंने बड़े प्रेम से उसे अपने मस्तक पर रखा।
          *बलि ने कहा- ब्राह्मणकुमार! आप भले पधारे। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?
          *आर्य! ऐसा जान पड़ता है कि बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों की तपस्या ही स्वयं मूर्तिमान होकर मेरे सामने आयी है। आज आप मेरे घर पधारे, इससे मेरे पितर तृप्त हो गये। आज मेरा वंश पवित्र हो गया। आज मेरा यह यज्ञ सफल हो गया।
          *ब्राह्मणकुमार! आपके पाँव पखारने से मेरे सारे पाप धुल गये और विधिपूर्वक यज्ञ करने से, अग्नि में आहुति डालने से जो फल मिलता, वह अनायास ही मिल गया। आपके इन नन्हे-नन्हे चरणों और इनके धोवन से पृथ्वी पवित्र हो गयी। ब्राह्मणकुमार! ऐसा जान पड़ता है कि आप कुछ चाहते हैं। परमपूज्य ब्रह्मचारी जी! आप जो चाहते हों- गाय, सोना, सामग्रियों से सुसज्जित घर, पवित्र अन्न, पीने की वस्तु, विवाह के लिये ब्राह्मण की कन्या, सम्पत्तियों से भरे हुए गाँव, घोड़े, हाथी, रथ-वह सब आप मुझसे माँग लीजिये। अवश्य ही वह सब मुझसे माँग लीजिये।
                             ~~~०~~~
                   *श्रीकृष्ण  गोविन्द  हरे मुरारे।
                   *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥
                           "जय जय श्री हरि"
                           🌸🌸🙏🌸🌸
********************************************

+106 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 18 शेयर

कामेंट्स

Ansouya M 🍁 Apr 15, 2021
जय श्री राधे कृष्ण 🙏🙏🕉 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🌹🙏🌹 शुभ संध्या प्यारी बहना स्नेह नमस्कार आप को जी 🌷🕉🌷 जय सिया राम 🌹🙏🌹

Ansouya M 🍁 Apr 15, 2021
नव रात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई आप को बहना परिवार सहित जी 🌷 सर्व मंगल मागल्ये शिवे सर्वाथ साघिके शरणये त्रयमबके गौरी नारायणी नमोस्तुते 🌷🌷🌷 शुभ संध्या प्यारी बहना जी 🌷🙏🌷🙏

Shivsanker Shukla Apr 15, 2021
नवरात्रि के तृतीय दिवस की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं मां चंद्रघंटा सपरिवार कृपा प्रेम बनाए रखें बहन जय माता दी

GOVIND CHOUHAN Apr 15, 2021
Jai Shree Radhe Radhe Jiii 🌹 Jai Shree Radhe Krishna Jiii 🌹 Subh Sandhiya Vandan Pranaam Jiii Didi 👏👏👏👏👏

Kamlesh Apr 15, 2021
जय श्री राधे राधे 🙏🙏

जितेन्द्र दुबे Apr 15, 2021
🚩🌹🥀जय श्री मंगलमूर्ति गणेशाय नमः 🌺🌹💐🚩🌹🌺 शुभ रात्रि वंदन🌺🌹 राम राम जी 🌺🚩🌹मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱 🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम नमो नारायण हरि ऊँ तत्सत परब्रह्म परमात्मा नमः ॐ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमो नमःऊँ माँ ब्रम्हचारिणी नमः🌺🚩 ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः🌺 ऊँ राम रामाय नमः 🌻🌹ऊँ सीतारामचंद्राय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः🌹🌺🌹 ॐ हं हनुमते नमः 🌻ॐ हं हनुमते नमः🌹🥀🌻🌺🌹ॐ शं शनिश्चराय नमः 🚩🌹🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩🌻 जय श्री राधे कृष्णा जी🌹 श्री जगत पिता परम परमात्मा श्री हरि विष्णु जी माता लक्ष्मी माता चंद्रघंटा की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे 🌹 आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩🌺हर हर महादेव🚩राम राम जी 🥀शुभ रात्रि स्नेह वंदन💐शुभ गुरुवार🌺 हर हर महादेव 🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩 जय माता दी जय श्री राम 🚩 🚩हर हर नर्मदे हर हर नर्मदे 🌺🙏🌻🙏🌻🥀🌹🚩🚩🚩

Ranveer soni Apr 15, 2021
🌹🌹जय श्री कृष्णा🌹🌹

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 15, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शूभ प्रभात वंदन जी आपका हर पल शूभ मंगल हों जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼👌🏼👌🏼👌🏼🌹🌹🌹🌷🌷🌷👏👏👏

Yogi Kashyap May 13, 2021

+40 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 98 शेयर
Renu Singh May 13, 2021

+839 प्रतिक्रिया 173 कॉमेंट्स • 1085 शेयर
muskan May 13, 2021

+272 प्रतिक्रिया 110 कॉमेंट्स • 85 शेयर

+83 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 350 शेयर
Mohinder Dhingra May 13, 2021

+14 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Jai Mata Di May 12, 2021

+154 प्रतिक्रिया 20 कॉमेंट्स • 102 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB