Mahesh Bhargava
Mahesh Bhargava Apr 29, 2019

भगवान शिव जी का बहुत ही सुंदर व्हाट्सएप स्टेटस ओम नमः शिवाय🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🌿🍀🌿🌿🌿🌿🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 सुन्दर सुबह का मीठा मीठा नमस्कार..😊☺ ना कोई राह़ आसान चाहिए,,, ना ही हमें कोई पहचान चाहिए,,, एक चीज माँगते रोज भगवान से,,,दोस्तों व् रिस्तेदारो के चेहरे पे हर पल,,, प्यारी सी मुस्कान चाहिये !!! 🙏

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Sandhya Nagar Apr 29, 2019
जी जिन्होंने परमात्मा के प्रति प्रेम को जाना है उन्होंने यही जाना है कि वहां कोई भी नहीं है बस प्रेम है प्रेम ही है असल में परमात्मा के प्रति प्रेम सिर्फ प्रेम का निवेदन मात्र है किसी के प्रति नहीं है सिर्फ प्रेम का आविर्भाव मात्र है शुद्ध प्रेम की ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन मात्र है परम प्रेम तभी है जब प्रेमी की भी जरूरत न रह जाए। जब तक प्रेमी की जरूरत है,तब तक हमारा प्रेम परम प्रेम नहीं है, अशुद्ध है प्रेम तो रंग है रंग ही है सा त्वस्मिन् परम प्रेमरूपा॥२॥ अन्य किसी वस्तु के ऊपर नहीं, बल्कि एकमात्र परमेश्वर के ऊपर ऐकान्तिक प्रेम को भक्ति कहते हैं॥ मनुष्य-मनुष्य के बीच जितने प्रकार के प्रेम-सम्बन्ध होते है उन सबमें पति-पत्नी का प्रेम सबकी अपेक्षा गहन और गम्भीर होता है..... उसे साधारणतः प्रेम का नाम दिया जाता है..... किन्तु भगवान के प्रेम से उस प्रेम की तुलना ही नहीं हो सकती है..... इसी से भक्ति की संज्ञा का निर्देश करने के लिए देवर्षि ने उसके साथ ‘परम’ विशेषण का प्रयोग किया है और वह अनुभवगम्य है। वाक्यों के द्वारा उसके स्वरूप को ठीक-ठीक व्यंजित करना सम्भव नहीं है, इसी से प्रेम के साथ ‘रूप’ का प्रयोग कर समझाने की वे चेष्टा करते हैं। साधना का आश्रय लेने पर ईश्वर के अनुग्रह से साधक के हृदय में इस शुद्धाभक्ति का आविर्भाव होता है। प्रेम का अर्थ है ईश्वर से ऐसा प्रेम कि संसार विस्मृत हो जाय, फिर अपनी देह, जो इतनी प्रिय है, उसका भी विस्मरण हो जाय। प्रेम रज्जुस्वरूप है। प्रेम होने से भक्त के निकट ईश्वर बँध जाते हैं, और निकल कर भाग नहीं पाते। आत्मा की आत्मा अन्तर्यामी ही जीव की भक्ति के आस्पद हैं। नारद उनके विषय में केवल ‘अस्मिन’ - ‘इसमें’ कहकर ही सन्तुष्ट हो गये - कोई नाम या संज्ञा नहीं दी। वे साकार या निराकार हैं, सगुण या निर्गुण हैं, यह सब कुछ नहीं कहा। साधक की रुचि, संस्कार आदि के अनुसार प्रेमास्पद का स्वरूप उनके हृदय में स्वतः प्रकाशित होगा। प्रेम के साथ तीन वस्तुएँ हैं - (१) प्रेमी, (२) प्रेमास्पद और (३) प्रेम का बन्धन। प्रेमी और प्रेमास्पद के बीच अनुभूत सारे व्यवधानों के नष्ट होने पर - अभेद-ज्ञान में प्रेम की परिसमाप्ति होती है। भगवान के प्रति प्रेम दुर्लभ वस्तु है। पहले पत्नी की जिस प्रकार पति के प्रति निष्ठा होती है वैसी ही निष्ठा यदि ईश्वर के प्रति हो, तभी भक्ति होती है। श्रद्धा-भक्ति का होना बड़ा कठिन है। भक्ति में प्राण-मन ईश्वर में लीन हो जाते हैं। प्रेम होना बहुत दूर की बात है। ईश्वर में प्रेम होने पर बाहर की वस्तुएँ विस्मृत हो जाती हैं। अपनी देह, जो इतनी प्रिय वस्तु है, वह भी भूल जाती हैं। जिस-तिस तरह से भक्ति करने से ही ईश्वर को नहीं पाया जाता। प्रेमाभक्ति नहीं होने पर ईश्वर-प्राप्ति नहीं होती। प्रेमाभक्ति का एक अन्य नाम रागात्मिका भक्ति है। प्रेम या अनुराग नहीं होने पर भगवान की प्राप्ति नहीं होती। ईश्वर के ऊपर प्रीति नहीं होने पर उन्हें पाया नहीं जाता। संसारबुद्धि चली जाय और पूरी तरह प्रभु के ऊपर सोलहो आने मन हो, तभी उन्हें पाओगे। भक्ति के द्वारा ही उनका दर्शन होता है, किन्तु, पक्की भक्ति, प्रेमाभक्ति, रागानुगा भक्ति चाहिए। ऐसी भक्ति के होने पर ही उनके ऊपर प्रेम आता है, जैसा बच्चे का माँ के प्रति प्रेम होता है, स्त्री का पति के प्रति प्रेम होता है, वैसी ही भक्ति होने पर ईश्वर के प्रति प्रेम उपजता है। एक गीत में हैं ‘प्रभु, बिना प्रेम के यज्ञ-याग कर, क्या तुमको जाना जा सकता है?’ यही अनुराग, यही प्रेम, यही पक्की भक्ति, यही प्रीति यदि एक बार हो तो साकार-निराकार दोनों का ही साक्षात्कार होता है। इसी प्रेमाभक्ति की प्राप्ति के लिए साधना की आवश्यकता होती है। और एक प्रकार की भक्ति है। उसका नाम वैधी भक्ति है। इतने जप करने होंगे, उपवास करने होंगे, तीर्थों में जाना होगा, इतने उपचारों के साथ पूजा करनी होगी - यह सब वैधी भक्ति है। यह सब काफी करते-करते क्रम से रागानुगा भक्ति आती है। किन्तु, रागानुगा भक्ति जब तक नहीं होगी तब तक ईश्वर-लाभ नहीं होगा। उनके ऊपर प्रेम चाहिए। किन्तु किसी-किसी को रागनुगा भक्ति अपने-आप होती है। स्वतः सिद्ध। बचपन से ही होती है, बचपन से ही वह ईश्वर के लिए रोता है। जैसे प्रह्लाद भक्ति के द्वारा ही उनके दर्शन होते हैं, भाव-समाधि में रूप-दर्शन होता है और निर्विकल्प समाधि में अखण्ड सच्चिदानन्द का दर्शन होता है - तब अहंकार, नाम, रूप नहीं रहते। वह भक्ति आने पर माँ जैसे बच्चे को, बच्चा जैसे माँ को और स्त्री जैसे पति को प्रेम करती है, वैसा ही प्रेम आता है। इस प्रेम, इस रागानुगा भक्ति के आने पर स्त्री, पुत्र और आत्मीयजनों के ऊपर माया का वह आकर्षण नहीं रह पाता; केवल दया रहती है। संसार एक कर्मभूमि की तरह लगता है, जैसे विदेश हो। ईश्वर के प्रति प्रेम होने पर संसार की आसक्ति और विषय-बुद्धि पूरी तरह चली जाती है। प्रेमाभक्ति का लक्षण अपने-आप भक्ति होना, बिना संस्कार के नहीं होता। ज्ञान-भक्ति विचार के द्वारा भक्ति करने को कहते हैं। तीन बन्धुओं ने वन में जाते-जाते एक बाघ को देखा। एक व्यक्ति ने कहा - भाई, इस बार हमलोग मरे। दूसरे व्यक्ति ने कहा - ‘मरेंगे क्यों, हम लोग ईश्वर को पुकारें।’ तीसरे व्यक्ति ने कहा - ‘आओ, हमलोग इस पेड़ पर चढ़ जाते हैं, झूठ-मूठ भगवान को कष्ट देने की क्या जरूरत है?’ जिसने कहा, ‘इस बार हम लोग मरे’ वह यह नहीं जानता की ईश्वर ही हमलोगों की रक्षा करते हैं। जिसने कहा, ‘ईश्वर को पुकारें’ वह हुआ ज्ञानी। उसे यह बोध है कि वे ही सृष्टि, स्थिति, प्रलय, सब करते हैं। और जिसने कहा, ‘आओ, हमलोग इस पेड़ पर चढ़ जाते हैं, उन्हें कष्ट देकर क्या होगा’ - उसके भीतर प्रेम का अभ्युदय हुआ है। उसे कष्ट देना नहीं चाहता। जिसे प्रेम करता है, उसके पाँव में काँटा तक न चुभे, केवल यही उसकी इच्छा रहती है। इस प्रकार का भक्ति-लाभ उत्तम भक्त के भाग्य में घटित होता है। श्रीमद्भागवत में विभिन्न श्रेणियों के भक्तों का लक्षण इस प्रकार बताया गया है सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥ ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च। प्रेम मैत्री कृपोपेक्षा यः करोति स मध्यम॥ अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः॥ (भा. ११-२-४५-४७) सभी प्राणियों में जो अपना और भगवान का दर्शन करते हैं और सभी प्राणियों को ईश्वर के भीतर तथा अपने भीतर देखते हैं, वे उत्तम भक्त हैं। ईश्वर के प्रति जिनको प्रेम एवं भक्तों के साथ जिनका मैत्री भाव है, अज्ञानियों पर जिनकी कृपा रहती तथा ईश्वर-विद्वेषियों की जो उपेक्षा करते हैं - वे मध्यम भक्त हैं। जो श्रद्धापूर्वक प्रतिमा आदि में ईश्वर की उपासना करते, किन्तु भक्तों एवं अन्य प्राणियों की सेवा नहीं करते वे साधारण भक्त हैं। मध्यम और अधम अधिकारी के लिए साध्य भक्ति या गौणी भक्ति का विधान है। विनम्र निवेदन ...एक बार श्रीमद्भगवद्गीता अवश्य पढ़े अपने जीवन में । 🙏 *परम भगवान श्री कृष्ण सदैव आपकी स्मृति में रहें* *श्री कृष्ण शरणं मम* *ये महामंत्र नित्य जपें और खुश रहें। 😊* सदैव याद रखें और व्यवहार में आचरण करें। ईश्वर दर्शन अवश्य होंगे। *जय श्री कृष्ण*

Munesh Tyagi Apr 29, 2019
जय महाकालेश्वर शुभ संध्या जी

Pawan Saini Apr 29, 2019
ऊं नम शिवाय हर हर महादेव बाबा भोलेनाथ जी का आशीर्वाद आप और आपके परिवार पर सदैव बना रहे भाईजी ईश्वर आप और आपके परिवार को हमेशा खुश रखे भाई जी आप का हर एक पल मंगलमय हो शुभ संध्या स्नेह वंदन भाई जी

Dr.ratan Singh Apr 29, 2019
🌹🙏शुभसंध्या वन्दन जी🙏🌹 👏आप सभी पर काशी विश्वनाथ 🏵🍑जी की कृपा हमेसा बनी रहेऔर🌷 🌋सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🙏 ******************************* 🙏आपका सोमवार का संध्या शुभ💐 🍥अतिसुन्दर खूबसूरत शुभ और💠 👏 मंगलमय व्यतीत हो 💐 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🚩🌿हर हर महादेव🌿🚩

Mahesh Bhargava Apr 29, 2019
@drratansingh शुभ रात्रि जी जय श्री कृष्णा राधे राधे जी आपका हर पल मंगलमय हो

Mahesh Bhargava Apr 29, 2019
@shreeradhe शुभ रात्रि दीदी जय श्री कृष्णा राधे राधे दीदी

Mahesh Bhargava Apr 29, 2019
@shivani123 शुभ रात्रि जी की जय श्री कृष्णा राधे राधे दीदी आप हर पल मंगलमय हो

Madhu sharma Apr 29, 2019
🌹🌿Om Namah Shivay Har Har Mahadev 🌹🌿 jai sairam ji brother ji 🙏Baba bhole nath ji ki Asim kripa drashti sada hi Aap avam aap ki family par Har pal bani rhe Baba bhole bhandari Aap ki sabhi manokamnaye puran karein aap ke Har pal Ati Shubh avam mangalmay ho good night ji 🙏🙏🌹🌹🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

champalal m kadela Jan 26, 2020

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champalal m kadela Jan 26, 2020

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champalal m kadela Jan 26, 2020

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ravi joshi Jan 26, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 26, 2020

*ओम् नमः शिवाय*🥀🥀🙏*शुभ प्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 सत्यम, शिवम और सुंदरम का रहस्य ! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सत्यम, शिवम और सुंदरम के बारे में सभी ने सुना और पढ़ा होगा लेकिन अधिकतर लोग इसका अर्थ या इसका भावार्थ नहीं जानते होंगे। वे सत्य का अर्थ ईश्वर, शिवम का अर्थ भगवान शिव से और सुंदरम का अर्थ कला आदि सुंदरता से लगाते होंगे, लेकिन अब हम आपको बताएंगे कि आखिर में हिन्दू धर्म और दर्शन का इस बारे में मत क्या है। हालांकि वेद, उपनिषद और पुराणों में इस संबंध में अलग अलग मत मिलते हैं, लेकिन सभी उसके एक मूल अर्थ पर एकमत हैं। धर्म और दर्शन की धारणा इस संबंध में क्या हो सकती है यह भी बहुत गहन गंभीर मामला है। दर्शन में भी विचारधाएं भिन्न-भिन्न मिल जाएगी, लेकिन आखिर सत्य क्या है इस पर सभी के मत भिन्न हो सकते हैं। सत्यम👉 योग में यम का दूसरा अंग है सत्य। हिन्दू धर्म में ब्रह्म को ही सत्य माना गया है। जो ब्रह्म (परमेश्वर) को छोड़कर सबकुछ जाने का प्रयास करता है वह व्यक्ति जीवन पर्यन्त भ्रम में ही अपना जीवन गुजार देता है। यह ब्रह्म निराकार, निर्विकार और निर्गुण है। उसे जानने का विकल्प है स्वयं को जानना। अर्थात आत्मा ही सत्य है, जो अजर अमर, निर्विकार और निर्गुण है। शरीर में रहकर वह खुद को जन्मा हुआ मानती है जो कि एक भ्रम है। इस भ्रम को जानना ही सत्य है। 'सत (ईश्वर) एक ही है। कवि उसे इंद्र, वरुण व अग्नि आदि भिन्न नामों से पुकारते हैं।'-ऋग्वेद 'जो सर्वप्रथम ईश्वर को इहलोक और परलोक में अलग-अलग रूपों में देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात उसे बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में फँसना पड़ता है।'-कठोपनिषद-।।10।। सत्य का अलौकिक अर्थ👉 सत्य को समझना मुश्किल है, लेकिन उनके लिए नहीं जो धर्म और दर्शन को भलिभांति जानते हैं। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन यह सही नहीं है। सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। परमात्मा से परिपूर्ण यह जगत आत्माओं का जाल है। जीवन, संसार और मन यह सभी विरोधाभासी है। इसी विरोधाभास में ही छुपा है वह जो स्थितप्रज्ञ आत्मा और ईश्वर है। सत्य को समझने के लिए एक तार्किक और बोधपूर्ण दोनों ही बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। शास्त्रों में आत्मा, परमात्मा, प्रेम और धर्म को सत्य माना गया है। सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। सत्य के साथ रहने से मन हल्का और प्रसन्न चित्त रहता है। मन के हल्का और प्रसंन्न चित्त रहने से शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। सत्य की उपयोगिता और क्षमता को बहुत कम ही लोग समझ पाते हैं। सत्य बोलने से व्यक्ति को सद्गति मिलती है। गति का अर्थ सभी जानते हैं। ‘सत चित आनन्द’👉 सत् अर्थात मूल कण या तत्व, चित्त अर्थात आत्मा और आनंद अर्थात प्रकृति और आत्मा के मिलन से उत्पन्न अनुभूति और इसके विपरित शुद्ध आत्म अनुभव करना।... परामात्मा और आत्मा का होना ही सत्य है बाकी सभी उसी के होने से है। आत्मा सत (सत्य) चित (चित्त की एकाग्रता से) और आनन्द (परमानन्द की झलक मात्र) को अनुभव रूप महसूस करने लगती है। यानी आत्मा के सत्य में चित्त के लीन या लय हो जाने पर बनी आनन्द की स्थिति ही सच्चिदानन्द स्थिति होती है। सत्य का लौकिक अर्थ👉 सत्य को जानना कठिन है। ईश्वर ही सत्य है। सत्य बोलना भी सत्य है। सत्य बातों का समर्थन करना भी सत्य है। सत्य समझना, सुनना और सत्य आचरण करना कठिन जरूर है लेकिन अभ्यास से यह सरल हो जाता है। जो भी दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, लेकिन उसे समझना सत्य है अर्थात जो-जो असत्य है उसे जान लेना ही सत्य है। असत्य को जानकर ही व्यक्ति सत्य की सच्ची राह पर आ जाता है। जब व्यक्ति सत्य की राह से दूर रहता है तो वह अपने जीवन में संकट खड़े कर लेता है। असत्यभाषी व्यक्ति के मन में भ्रम और द्वंद्व रहता है, जिसके कारण मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। मानसिक रोगों का शरीर पर घातक असर पड़ता है। ऐसे में सत्य को समझने के लिए एक तार्किक बुद्धि की आवश्यकता होती है। तार्किक‍ बुद्धि आती है भ्रम और द्वंद्व के मिटने से। भ्रम और द्वंद्व मिटता है मन, वचन और कर्म से एक समान रहने से। सत्य का आमतौर पर अर्थ माना जाता है झूठ न बोलना, लेकिन सत् और तत् धातु से मिलकर बना है सत्य, जिसका अर्थ होता है यह और वह- अर्थात यह भी और वह भी, क्योंकि सत्य पूर्ण रूप से एकतरफा नहीं होता। रस्सी को देखकर सर्प मान लेना सत्य नहीं है, किंतु उसे देखकर जो प्रतीति और भय उत्पन हुआ, वह सत्य है। अर्थात रस्सी सर्प नहीं है, लेकिन भय का होना सत्य है। दरअसल हमने कोई झूठ नहीं देखा, लेकिन हम गफलत में एक झूठ को सत्य मान बैठे और उससे हमने स्वयं को रोगग्रस्त कर लिया। तो सत्य को समझने के लिए जरूरी है तार्किक बुद्धि, सत्य वचन बोलना और होशो-हवास में जीना। जीवन के दुख और सुख सत्य नहीं है, लेकिन उनकी प्रतीति होना सत्य है। उनकी प्रतीति अर्थात अनुभव भी तभी तक होता है जब तक कि आप दुख और सुख को सत्य मानकर जी रहे हैं। सत्य के लाभ👉 सत्य बोलने और हमेशा सत्य आचरण करते रहने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है। मन स्वस्थ और शक्तिशाली महसूस करता है। डिप्रेशन और टेंडन भरे जीवन से मुक्ति मिलती है। शरीर में किसी भी प्रकार के रोग से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है। सुख और दुख में व्यक्ति सम भाव रहकर निश्चिंत और खुशहाल जीवन को आमंत्रित कर लेता है। सभी तरह के रोग और शोक का निदान होता है। शिवम👉 शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं। शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। शिवम👉 शिवम का संबंध अक्सर लोग भगवान शंकर से जोड़ देते हैं, जबकि भगवान शंकर अलग हैं और शिव अलग। शिव निराकार, निर्गुण और अमूर्त सत्य है। निश्चित ही माता पार्वती के पति भी ध्यानी होकर उस परम सत्य में लीन होने के कारण शिव स्वरूप ही है, लेकिन शिव नहीं। शिव का अर्थ है शुभ। अर्थात सत्य होगा तो उससे जुड़ा शुभ भी होगा अन्यथा सत्य हो नहीं सकता। वह सत्य ही शुभ अर्थात भलिभांति अच्छा है। सर्वशक्तिमान आत्मा ही शिवम है। दो भोओं के बीच आत्मा लिंगरूप में विद्यमान है। सुंदरम् : - यह संपूर्ण प्रकृति सुंदरम कही गई है। इस दिखाई देने वाले जगत को प्रकृति का रूप कहा गया है। प्रकृति हमारे स्वभाव और गुण को प्रकट करती है। पंच कोष वाली यह प्रकृति आठ तत्वों में विभाजित है। त्रिगुणी प्रकृति👉 परम तत्व से प्रकृति में तीन गुणों की उत्पत्ति हुई सत्व, रज और तम। ये गुण सूक्ष्म तथा अतिंद्रिय हैं, इसलिए इनका प्रत्यक्ष नहीं होता। इन तीन गुणों के भी गुण हैं- प्रकाशत्व, चलत्व, लघुत्व, गुरुत्व आदि इन गुणों के भी गुण हैं, अत: स्पष्ट है कि यह गुण द्रव्यरूप हैं। द्रव्य अर्थात पदार्थ। पदार्थ अर्थात जो दिखाई दे रहा है और जिसे किसी भी प्रकार के सूक्ष्म यंत्र से देखा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है या अनुभूत किया जा सकता है। ये ब्रहांड या प्रकृति के निर्माणक तत्व हैं। प्रकृति से ही महत् उत्पन्न हुआ जिसमें उक्त गुणों की साम्यता और प्रधानता थी। सत्व शांत और स्थिर है। रज क्रियाशील है और तम विस्फोटक है। उस एक परमतत्व के प्रकृति तत्व में ही उक्त तीनों के टकराव से सृष्टि होती गई। सर्वप्रथम महत् उत्पन्न हुआ, जिसे बुद्धि कहते हैं। बुद्धि प्रकृति का अचेतन या सूक्ष्म तत्व है। महत् या बुद्ध‍ि से अहंकार। अहंकार के भी कई उप भाग है। यह व्यक्ति का तत्व है। व्यक्ति अर्थात जो व्यक्त हो रहा है सत्व, रज और तम में। सत्व से मनस, पाँच इंद्रियाँ, पाँच कार्मेंद्रियाँ जन्मीं। तम से पंचतन्मात्रा, पंचमहाभूत (आकाश, अग्न‍ि, वायु, जल और ग्रह-नक्षत्र) जन्मे। पंचकोष👉 जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस ही अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कहते हैं। दरअसल, आप एक शरीर में रहते हैं जो कि जड़ जगत का हिस्सा है। आपके शरीर के भीतर प्राणमय अर्थात प्राण है जो कि वायुतत्व से भरा है। यह तत्व आपके जिंदा रहने को संचालित करता है। यदि आप देखे और सुने गए अनुसार संचालित होते हैं तो आपम प्राणों में जीते हैं अर्थात आप एक प्राणी से ज्यादा कुछ नहीं। मनोमय का अर्थ आपके शरीर में प्राण के अलावा मन भी है जिसे चित्त कहते हैं। पांचों इंद्रियों का जिस पर प्रभाव पड़ता है और समझने की क्षमता भी रखता है। इस मन के अलावा आपके ‍भीतर विज्ञानमन अर्थात एक ऐसी बुद्धि भी है जो विश्लेषण और विभाजन करना जानती है। इसके गहरे होने से मन का लोप हो जाता है और व्यक्ति बोध में जीता है। इस बोध के गहरे होने जाने पर ही व्यक्ति खुद के स्वरूप अर्थात आनंदमय स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। अर्थात जो आत्मा पांचों इंद्रियों के बगैर खुद के होने के भलिभांति जानती है। आठ तत्व👉 अनंत-महत्-अंधकार-आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी। अनंत जिसे आत्मा कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। अत: हम एक सुंदर प्रकृति और जगत के घेरे से घिरे हुए हैं। इस घेरे से अलग होकर जो व्यक्ति खुद को प्राप्त कर लेता है वही सत्य को प्राप्त कर लेता है। संसार में तीन ही तत्व है सत्य, शिव और सुंदरम। ईश्वर, आत्मा और प्रकृति। इसे ही सत्य, चित्त और आनंद कहते हैं। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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