!! भगवान विष्णू जी की आरती !!

!! भगवान विष्णू जी की आरती !!

#विष्णु जी की #आरती
त्रिदेवों में भगवान विष्णु का स्थान पालनकर्ता का है। भगवान विष्णु की आराधना कर भक्त अपने स्वस्थ जीवन और खुशहाल परिवार की कामना करते हैं।

 आरती

जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, छन में दूर करे॥ जय जगदीश हरे

जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका।
सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका॥ जय जगदीश हरे

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ जय जगदीश हरे

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ जय जगदीश हरे

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मुरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ जय जगदीश हरे

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती॥ जय जगदीश हरे

दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पडा तेरे॥ जय जगदीश हरे

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढाओ, संतन की सेवा॥ जय जगदीश हरे

जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
मायातीत, महेश्वर मन-वच-बुद्धि परे॥ जय जगदीश हरे

आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी।
अतुल, अनन्त, अनामय, अमित, शक्ति-राशि॥ जय जगदीश हरे

अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी।
सत-चित-सुखमय, सुन्दर शिव सत्ताधारी॥ जय जगदीश हरे

विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा।
विश्व चराचर तुम ही, तुम ही विश्वभूपा॥ जय जगदीश हरे

माता-पिता-पितामह-स्वामि-सुहृद्-भर्ता।
विश्वोत्पादक पालक रक्षक संहर्ता॥ जय जगदीश हरे

साक्षी, शरण, सखा, प्रिय प्रियतम, पूर्ण प्रभो।
केवल-काल कलानिधि, कालातीत, विभो॥ जय जगदीश हरे

राम-कृष्ण करुणामय, प्रेमामृत-सागर।
मन-मोहन मुरलीधर नित-नव नटनागर॥ जय जगदीश हरे

सब विधि-हीन, मलिन-मति, हम अति पातकि-जन।
प्रभुपद-विमुख अभागी, कलि-कलुषित तन मन॥ जय जगदीश हरे

आश्रय-दान दयार्णव! हम सबको दीजै।
पाप-ताप हर हरि! सब, निज-जन कर लीजै॥ जय जगदीश हरे

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white beauty Sep 17, 2020

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Narayan Tiwari Sep 18, 2020

पुरूषोत्तम मास धर्म एवं सेवा का मास हैं.!🚩 """"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" मलमास में लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों प्राची,सरस्वती और वैतरणी के अलावा गर्म जलकुंडों,ब्रह्मकुंड,सप्तधारा,न्यासकुंड, मार्कंडेय कुंड,गंगा-यमुना कुंड,काशीधारा कुंड,अनंतऋषि कुंड,सूर्य-कुंड,राम-लक्ष्मण कुंड,सीता कुंड,गौरी कुंड में स्नान कर भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर में आराधना करते हैं। मलमास में प्रभु श्रीराम नाम का लेखन अधिक संख्या में करने का विधान हैं! इस मास में श्रीरामायण जी , श्रीमद्भभागवतगीता या कोई भी धर्म ग्रंथ पढ़ने से पुण्य मिलता हैं! मलमास को दान पुण्य एवं धर्म का मास माना जाता हैं..! || ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय ||🚩श्री हरि 🙏 || ऊँ रामचन्द्राय नमः🚩जय श्री राम ||🙏

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🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 ❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗ 💙💙💙💙💙 💙 पुरुषोत्तम अधिक मास के महिने की प्रथम संध्या का आप सभी आदरणीयो को सस्नेह वंदन 💙 ❤ आपकी संध्या भक्ति मय रहें 💙💙💙💙💙 ❤❤❤❤❤ 🔱 जय माता दी 🔱 ❤ 💛 ‼ जय श्री हरि विष्णु ‼ ❤❤❤❤❤ 💛💛💛💛💛 🏹 जय श्री राम 🏹 💛 💜 जय श्री राधे कृष्ण 💛💛💛💛💛 💜💜💜💜💜 ❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗ 🔥🔥🔥🔥🔥💝🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 🌷✍... मत्स्य से कल्कि अवतार तक :- विष्णुजी के दस अवतारों की सीख मन शांत रखें और अधर्म से दूर रहें, अधिकमास में श्रीहरि की पूजा और कथा सुनने की है परंपरा जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान विष्णु अवतार लेते हैं आज 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक अधिकमास रहेगा। इसे पुरुषोत्तम मास और मलमास भी कहते हैं। भगवान विष्णु ने इस माह को अपना श्रेष्ठ नाम पुरुषोत्तम दिया है। इसी वजह से अधिकमास में विष्णुजी की पूजा करने और उनके दस अवतारों की कथा सुनने की परंपरा है। विष्णुजी के अवतारों की सीख यह है कि बुराई का अंत जरूर होता है। हमें हर स्थिति में मन शांत रखना चाहिए और अधर्म से बचना चाहिए। हमेशा सकारात्मक रहें। तभी जीवन में सुख-शांति मिल सकती है। हर बार अधिकमास में जगह-जगह भागवत कथाओं का आयोजन होता है, लेकिन इस साल कोरोना महामारी की वजह से इस तरह के धार्मिक आयोजन नहीं हो पाएंगे। ऐसी स्थिति में अपने घर पर ही ग्रंथों को पढ़ सकते हैं, टीवी पर, सोशल मीडिया पर संतों की कथाएं सुन सकते हैं। अधिकमास में ध्यान करने की भी परंपरा है। यहां जानिए भगवान विष्णुजी के दस अवतारों से जुड़ी खास बातें... 1. मत्स्य अवतार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया पर भगवान विष्णु के पहले अवतार मत्स्य की जयंती मनाई जाती है। मत्स्य पुराण के अनुसार विष्णुजी ने पुष्पभद्रा नदी किनारे मत्स्य अवतार लिया था। प्राचीन समय में असुर हयग्रीव का आतंक बढ़ गया था और पूरी पृथ्वी जल मग्न हो गई थी। तब मछली के रूप में श्रीहरि का पहला मत्स्य अवतार हुआ। मत्स्य स्वरूप में हयग्रीव का वध किया और जल प्रलय से पृथ्वी के सभी जीवों की रक्षा की थी। 2. कूर्म अवतार हर साल वैशाख माह की पूर्णिमा पर कूर्म जयंती मनाई जाती है। ये भगवान विणु का दूसरा अवतार माना गया है। इस अवतार के संबंध में कथा प्रचलित है कि प्राचीन समय में जब समुद्र मंथन हुआ, तब विष्णुजी ने कछुए का रूप लेकर अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को ग्रहण किया था। देवताओं और दानवों ने वासुकि नाग को रस्सी की तरह मंदराचल की नेती बनाया और समुद्र को मथा था। इस मंथन में हलाहल विष निकला, जिसे शिवजी ने ग्रहण किया था। इसके बाद 14 रत्न निकले। अमृत कलश निकला। 3. वराह अवतार भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर वराह जयंती मनाई जाती है। वराह यानी शुकर। इस अवतार का मुख शुकर का था, लेकिन शरीर इंसानों की तरह था। दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था। तब ब्रह्माजी की नाक से विष्णुजी वराह स्वरूप में अवतरित हुए। वराहदेव समुद्र में गए और अपने दांतों पर पृथ्वी रखकर बाहर ले आए। इसके बाद उन्होंने हिरण्याक्ष का वध किया। हिरण्याक्ष नाम में हिरण्य का अर्थ स्वर्ण और अक्ष का अर्थ है आंखें। जिसकी आंखें दूसरे के धन पर लगी रहती हैं, वही हिरण्याक्ष होता है। 4. नृसिंह अवतार नृसिंह अवतार प्राचीन समय में वैशाख माह में शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि हुआ था। इस अवतार के संबंध में भक्त प्रहलाद की कथा प्रचलित है। प्रहलाद को असुर हिरण्यकशिपु से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने एक खंबे से नृसिंह अवतार लिया था। इनका आधा शरीर शेर का और आधा शरीर इंसान का था। प्रहलाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था, लेकिन वह विष्णुजी का परम भक्त था। इस कारण हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद को मारने के लिए कई बार प्रयास किए। लेकिन, हर बार विष्णुजी ने उसकी रक्षा की। भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध किया। 5. वामन अवतार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर वामन प्रकोटत्सव मनाया जाता है। ये अवतार सतयुग में हुआ था। उस समय असुर राजा बलि ने देवताओं को पराजित करके स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। तब विष्णुजी ने देवमाता अदिति के गर्भ से वामन रूप में अवतार लिया। इसके बाद एक दिन राजा बलि यज्ञ कर रहा था, तब वामनदेव राजा बलि के पास गए और तीन पग धरती दान में मांगी। शुक्राचार्य के मना करने के बाद भी राजा बलि ने वामनदेव को तीन पग धरती दान में देने का वचन दे दिया। वामन ने विशाल रूप धारण किया और एक पग में धरती, दूसरे पग में स्वर्गलोक नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने वामन को खुद सिर पर पग रखने को कहा। वामन भगवान ने जैसे ही बलि के सिर पर पैर रखा, वह पाताल लोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे पाताललोक का स्वामी बना दिया और सभी देवताओं को उनका स्वर्ग फिर से मिल गया। 6. परशुराम अवतार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर भगवान विष्णु के अवतार परशुराम का जन्म हुआ था। परशुराम चिरंजीवी माने गए हैं। परशुराम ने हैहयवंशी क्षत्रियों के आतंक खत्म किया, राजा सहस्त्रार्जुन का वध किया था। परशुराम का जिक्र त्रेतायुग की रामायण और द्वापरयुग की महाभारत में भी है। 7. श्रीराम अवतार चैत्र माह के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि पर श्रीराम प्रकटोत्सव मनाया जाता है। त्रेता युग में राजा दशरथ के यहां भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में जन्म लिया था। श्रीराम ने रावण के साथ ही उस समय के सभी अधर्मी असुरों का वध किया। धर्म और मर्यादा की स्थापना की थी। इसीलिए इन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भी कहा जाता है। 8. श्रीकृष्ण अवतार द्वापर युग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। उस समय श्रीकृष्ण ने कंस और उसके सभी साथी असुरों का वध किया। दुर्योधन के साथ ही पूरे कौरव वंश के आतंक को खत्म करने में पांडवों का मार्गदर्शन किया। 9. बुद्ध अवतार भगवान बुद्ध को विष्णुजी का नवां अवतार माना गया है। गौतम बुद्ध का जन्म 2564 साल पहले लुंबिनी में हुआ था। लुंबिनी नेपाल में स्थित है। हर साल वैशाख मास की पूर्णिमा बुद्ध जयंती मनाई जाती है। बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने समाज को अहिंसा और करुणा का संदेश दिया था। 10. कल्कि अवतार भगवान विष्णु का दसवां अवतार कल्कि अभी प्रकट नहीं हुआ है। मान्यता है कि कलियुग करीब 4 लाख 32 हजार साल का है। अभी कलियुग के करीब 5 हजार साल ही हुए हैं। कलियुग के अंत में जब धरती पर अधर्म बहुत बढ़ जाएगा। धर्म लगभग खत्म होने लगेगा, उस समय धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु कल्कि के रूप में अवतार लेंगे। सभी अधर्मियों को खत्म करेंगे और फिर से धर्म की स्थापना करेंगे।

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sunita Sharma Sep 18, 2020

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Ramesh Soni.33 Sep 18, 2020

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❤❤❤❤ ❤ श्रीमद्भगवद्‌गीता हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है। महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है। भगवत गीता में एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की बहुत सुन्दर ढंग से चर्चा हुई है। अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्॥ अर्थात :- महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही है। पहली :- परोपकार करना पुण्य होता है दूसरी :- पाप का अर्थ होता है दूसरों को दु:ख देना। 💝💝 ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः 💝💝 🔱⚜🔱❗🏹जय श्री राम 🏹❗🔱⚜🔱 ❤❤❤❤ ❤ आप सभी आदरणीयो को सस्नेह वंदन जी ❤ 💛💛💛💛 ❤❤❤❤ 💛 पुरुषोत्तम अधिक मास इस मास के दरम्यान हमारे धर्म के अनुसार श्रीमदभागवत गीता का अमृत पान करने का बहुत महत्व है कल प्रस्तुत हुए अध्याय 10 के श्र्लोक 10 - 1 से 10 - 7 से आगे के अध्याय 10 के 10 - 8 से 10 - 14 तक को प्रस्तुत कर रहे है संस्कृत एवं हिन्दी अनुवाद सहित आप सभी से निवेदन है कि कुछ समय निकालकर अवश्य पढें 💛 💛💛💛💛 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 ❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗❗ 🧡 फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का वर्णन 🧡 अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ ॥10.8॥ भावार्थ :- मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं॥ ॥10.8॥ मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌ । कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥ ॥10.9॥ भावार्थ :- निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं॥ ॥10.9॥ तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ ॥10.10॥ भावार्थ :- उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥ ॥10.10॥ तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ॥10.11॥ भावार्थ :- हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ॥ ॥10.11॥ अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति तथा विभूति और योगशक्ति को कहने के लिए प्रार्थना अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌ । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌ ॥ ॥10.12॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥ ॥10.13॥ भावार्थ :- अर्जुन बोले- आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं॥ ॥10.12-10.13॥ सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥ ॥10.14॥ भावार्थ :- हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्‌! आपके लीलामय (गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में इसका विस्तार देखना चाहिए) स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही॥ ॥10.14॥

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Asha Arora Sep 18, 2020

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Ravi Kumar Taneja Sep 18, 2020

🦚🦚🦚 Good Morning🦚🦚🦚 *सत्संग-सरिता* ||🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷|| *जब हम भजन करने बैठते हैं या करते हैं तो कुछ बुरी आदतें या बुरे विचार मन में आते हैं ...!!* 🔥 *ऐसा क्यों होता है ...??*🌼 *ऐसा इसलिये है :* *जो संस्कार और बुरी आदतें हमारे करोडों जन्म-जन्मातरों से पडे हुए हैं वो सब की सब कुछ ही दिनों में नहीं छूट सकती। उदाहरण के लिये जैसे पाइप से पानी चालू करने पर, उसमे से वही पानी बाहर निकलेगा जो उसमें पहले से भरा होगा। अब चाहे वह पानी गर्म हो, गंदा हो, कचरे वाला हो या साफ हो। ऐसे ही भजन स्मरण करते समय पाप बाहर निकलते दिखते हैं। वो आते नही, जाते हुए दिखते हैं। उन्हें आते हुए भूल से भी न समझें भजन करते समय पाप थोक में निकलते हैं हमें इनको न देखते हुए नाम स्मरण (भजन) में लगे रहना चाहिए। जिससे धीरे-धीरे हमारा अंतःकरण शुद्ध हो ही जायेगा। भगवान को पुकारो, तो! वह तो हमारे पुकारे जाने का इंतजार ही कर रहे हैं। देर बस हमारी ही ओर से हो रही है। पुकारो तो वो कण-कण में है। सबकी सुनते ही है।* *इस जीवन का अहोभाग्य है पुष्टिमार्ग में "श्री वल्लभ प्रभु" कृपा से हम अंगीकृत हुए है | इस जीवन को हमें यथार्थ बनाना है | ध्यान रहे ; समय कम है , हिरे की खदान पर जाकर हम कंकड़ और पथ्थर इकठ्ठे करने में लग चुके है | होंश में रहना जरुरी है और हमारे जीवन का मकसद बार बार दोहराते रहना है ताकि हमें विस्मरण न हो जाये और हम *प्रभु* *नाम स्मरण, सत्संग और टहल में लगे रहे |* *जो सुन्दर गीत गाता है वो चांदी जैसा होता है, जो सुन्दर विचार करता है वो सोने जैसा होता है, जो सत्संग मैं बैठता है वो हीरे जैसे होता है और जो सत्संग मैं आकर *श्री वल्लभ प्रभु* *के विचार को अपने जीवन में ढालता है वो मेरे *प्रभु* *के "चरणरज" का अधिकारी होता है।* 🌹🌹🌹*नैन खुले तो दर्शन हो,* *होठ खुले तो कीर्तन हो,* *याद रखु श्री नाथ तेरे नाम को,* *मन भटके तो सुमिरन हो,* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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Neha Sharma Sep 18, 2020

. 🌷🙏🏻*पुरुषोत्तम मास माहात्म्य*🙏🏻🌷 🌷*अध्याय - 05*🌷 *नारद जी बोले, 'हे महाभाग! हे तपोनिधे! इस प्रकार अधिमास के वचनों को सुनकर हरि ने चरणों के आगे पड़े हुए अधिमास से क्या कहा?' *श्रीनारायण बोले, 'हे पाप रहित! हे नारद! जो हरि ने मलमास के प्रति कहा वह हम कहते हैं सुनो! हे मुनिश्रेष्ठ! आप जो सत्कथा हमसे पूछते हैं आप धन्य हैं।' *श्रीकृष्ण बोले, 'हे अर्जुन! बैकुण्ठ का वृत्तान्त हम तुम्हारे सम्मुख कहते हैं, सुनो! मलमास के मूर्छित हो जाने पर हरि के नेत्र से संकेत पाये हुए गरुड़ मूर्छित मलमास को पंख से हवा करने लगे। हवा लगने पर अधिमास उठ कर फिर बोला हे विभो! यह मुझको नहीं रुचता है। *अधिमास बोला, 'हे जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले! हे विष्णो! हे जगत्पते! मेरी रक्षा करो! रक्षा करो! हे नाथ! मुझ शरण आये की आज कैसे उपेक्षा कर रहे हैं।' *इस प्रकार कहकर काँपते हुए घड़ी-घड़ी विलाप करते हुए अधिमास से, बैकुण्ठ में रहने वाले हृषीकेश हरि, बोले। *श्रीविष्णु बोले, 'उठो-उठो तुम्हारा कल्याण हो, हे वत्स! विषाद मत करो। हे निरीश्वर! तुम्हारा दुःख मुझको दूर होता नहीं ज्ञात होता है।' *ऐसा कहकर प्रभु मन में सोचकर क्षणभर में उपाय निश्चय करके पुनः अधिमास से मधुसूदन बोले। *श्रीविष्णु बोले, 'हे वत्स! योगियों को भी जो दुर्लभ गोलोक है वहाँ मेरे साथ चलो जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम, ईश्वर रहते हैं। *गोपियों के समुदाय के मध्य में स्थित, दो भुजा वाले, मुरली को धारण किए हुए नवीन मेघ के समान श्याम, लाल कमल के सदृश नेत्र वाले, शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अति सुन्दर मुख वाले, करोड़ों कामदेव के लावण्य की मनोहर लीला के धाम, पीताम्बर धारण किये हुए, माला पहिने, वनमाला से विभूषित, उत्तम रत्ना भरण धारण किये हुए, प्रेम के भूषण, भक्तों के ऊपर दया करने वाले, चन्दन चर्चित सर्वांग, कस्तूरी और केशर से युक्त, वक्षस्थल में श्रीवत्स चिन्ह से शोभित, कौस्तुक मणि से विराजित, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रत्नों के सार से रचित किरीट वाले, कुण्डलों से प्रकाशमान, रत्नोंल के सिंहासन पर बैठे हुए, पार्षदों से घिरे हुए जो हैं, वही पुराण पुरुषोत्तम परब्रह्म हैं। वे सर्वतन्त्रर स्वतन्त्रउ हैं, ब्रह्माण्ड के बीज, सबके आधार, परे से भी परे, निस्पृह, निर्विकार, परिपूर्णतम, प्रभु, माया से परे, सर्वशक्तिसम्पन्न, गुणरहित, नित्यशरीरी। ऐसे प्रभु जिस गोलोक में रहते हैं वहाँ हम दोनों चलते हैं वहाँ श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारा दुःख दूर करेंगे।' *श्रीनारायण बोले, 'ऐसा कहकर अधिमास का हाथ पकड़ कर हरि, गोलोक को गये। हे मुने! जहाँ पहले के प्रलय के समय में वे अज्ञानरूप महा अन्धकार को दूर करने वाले, ज्ञानरूप मार्ग को दिखाने वाले केवल ज्योतिः स्वरूप थे। जो ज्योति करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाली, नित्य, असंख्य और विश्वप की कारण थी तथा उन स्वेच्छामय विभुकी ही वह अतिरेक की चरम सीमा को प्राप्त थी। जिस ज्योति के अन्दर ही मनोहर तीन लोक विराजित हैं। हे मुने! उसके ऊपर अविनाशी ब्रह्म की तरह गोलोक विराजित है। *तीन करोड़ योजन का चौतरफा जिसका विस्तार है और मण्डलाकार जिसकी आकृति है, लहलहाता हुआ साक्षात् मूर्तिमान तेज का स्वरूप है, जिसकी भूमि रत्नमय है। योगियों द्वारा स्वप्न में भी जो अदृश्य है, परन्तु जो विष्णु के भक्तों से गम्य और दृश्य है। ईश्वर ने योग द्वारा जिसे धारण कर रखा है ऐसा उत्तम लोक अन्तरिक्ष में स्थित है। *आधि, व्याधि, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भय आदि से रहित है, श्रेष्ठ रत्नों से भूषित असंख्य मकार्नो से शोभित है। उस गोलोक के नीचे पचास करोड़ योजन के विस्तार के भीतर दाहिने बैकुण्ठ और बाँयें उसी के समान मनोहर शिवलोक स्थित है। एक करोड़ योजन विस्तार के मण्डल का बैकुण्ठ, शोभित है, वहाँ सुन्दर पीताम्बरधारी वैष्णव रहते हैं। *उस बैकुण्ठ के रहने वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए लक्ष्मी के सहित चतुर्भुज हैं। उस बैकुण्ठ में रहने वाली स्त्रियाँ, बजते हुए नूपुर और करधनी धारण की हैं, सब लक्ष्मी के समान रूपवती हैं। *गोलोक के बाँयें तरफ जो शिवलोक है उसका करोड़ योजन विस्तार है और वह प्रलयशून्य है सृष्टि में पार्षदों से युक्त रहता है। बड़े भाग्यवान्‌ शंकर के गण जहाँ निवास करते हैं, शिवलोक में रहने वाले सब लोग सर्वांग भस्म धारण किये, नाग का यज्ञोपवीत पहने रहते हैं। अर्धचन्द्र जिनके मस्तक में शोभित है, त्रिशूल और पट्टिशधारी, सब गंगा को धारण किये वीर हैं और सबके सब शंकर के समान जयशाली हैं। *गोलोक के अन्दर अति सुन्दर एक ज्योति है। वह ज्योति परम आनन्द को देने वाली और बराबर परमानन्द का कारण है। योगी लोग बराबर योग द्वारा ज्ञानचक्षु से आनन्द जनक, निराकार और पर से भी पर उसी ज्योति का ध्यान करते हैं। उस ज्योति के अन्दर अत्यन्त सुन्दर एक रूप है जो कि नीलकमल के पत्तों के समान श्याम, लाल कमल के समान नेत्र वाले करोड़ों शरत्पूर्णिमा के चन्द्र के समान शोभायमान मुख वाले, करोड़ों कामदेव के समान सौन्दर्य की, लीला का सुन्दर धाम दो भुजा वाले, मुरली हाथ में लिए, मन्दहास्य युक्त, पीताम्बर धारण किए, श्रीवत्स चिह्न से शोभित वक्षःस्थल वाले, कौस्तुभमणि से सुशोभित, करोड़ों उत्तम रत्नों से जटित चमचमाते किरीट और कुण्डलों को धारण किये, रत्नों के सिंहासन पर विराजमान्‌, वनमाला से सुशोभित। वही श्रीकृष्ण नाम वाले पूर्ण परब्रह्म हैं। अपनी इच्छा से ही संसार को नचाने वाले, सबके मूल कारण, सबके आधार, पर से भी परे छोटी अवस्था वाले, निरन्तर गोपवेष को धारण किये हुए, करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की शोभा से संयुक्त, भक्तों के ऊपर दया करने वाले निःस्पृह, विकार रहित, परिपूर्णतम, स्वामी रासमण्डप के बीच में बैठे हुए, शान्त स्वरूप, रास के स्वामी, मंगलस्वरूप, मंगल करने के योग्य, समस्त मंगलों के मंगल, परमानन्द के राजा, सत्यरूप, कभी भी नाश न होने वाले विकार रहित, समस्त सिद्धों के स्वामी, सम्पूर्ण सिद्धि के स्वरूप, अशेष सिद्धियों के दाता, माया से रहित, ईश्वनर, गुणरहित, नित्यशरीरी, आदिपुरुष, अव्यक्त, अनेक हैं नाम जिनके, अनेकों द्वारा स्तुति किए जाने वाले, नित्य, स्वतन्त्र, अद्वितीय, शान्त स्वरूप, भक्तों को शान्ति देने में परायण ऐसे परमात्मा के स्वरूप को शान्तिप्रिय, शान्त और शान्ति परायण जो विष्णुभक्त हैं वे ध्यान करते हैं। इस प्रकार के स्वरूप वाले भगवान्‌ कहे जाने वाले, वही एक आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र हैं।' *श्रीनारायण बोले, 'ऐसा कहकर भगवान्, सत्त्व स्वरूप विष्णु अधिमास को साथ लेकर शीघ्र ही परब्रह्मयुक्त गोलोक में पहुँचे।' *सूतजी बोले, 'ऐसा कहकर सत्क्रिया को ग्रहण किये हुए नारायण मुनि के चुप हो जाने पर आनन्द सागर पुरुषोत्तम से विविध प्रकार की नयी कथाओं को सुनने की इच्छा रखने वाले नारद मुनि उत्कण्ठा पूर्वक बोले।' *इति श्रीबृहन्नारदीय पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ ----------:::×:::---------- *जय जय श्री राधेकृष्णा* 🌷🌷🙏🏻🌷🙏🏻🌷🌷 *******************************************

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Neha Sharma Sep 18, 2020

. 🌷🙏🏻*पुरुषोत्तम मास माहात्म्य*🌷🙏🏻 🌷*अध्याय - 05*🌷 *नारद जी बोले, 'हे महाभाग! हे तपोनिधे! इस प्रकार अधिमास के वचनों को सुनकर हरि ने चरणों के आगे पड़े हुए अधिमास से क्या कहा?' *श्रीनारायण बोले, 'हे पाप रहित! हे नारद! जो हरि ने मलमास के प्रति कहा वह हम कहते हैं सुनो! हे मुनिश्रेष्ठ! आप जो सत्कथा हमसे पूछते हैं आप धन्य हैं।' *श्रीकृष्ण बोले, 'हे अर्जुन! बैकुण्ठ का वृत्तान्त हम तुम्हारे सम्मुख कहते हैं, सुनो! मलमास के मूर्छित हो जाने पर हरि के नेत्र से संकेत पाये हुए गरुड़ मूर्छित मलमास को पंख से हवा करने लगे। हवा लगने पर अधिमास उठ कर फिर बोला हे विभो! यह मुझको नहीं रुचता है। *अधिमास बोला, 'हे जगत्‌ को उत्पन्न करने वाले! हे विष्णो! हे जगत्पते! मेरी रक्षा करो! रक्षा करो! हे नाथ! मुझ शरण आये की आज कैसे उपेक्षा कर रहे हैं।' *इस प्रकार कहकर काँपते हुए घड़ी-घड़ी विलाप करते हुए अधिमास से, बैकुण्ठ में रहने वाले हृषीकेश हरि, बोले। *श्रीविष्णु बोले, 'उठो-उठो तुम्हारा कल्याण हो, हे वत्स! विषाद मत करो। हे निरीश्वर! तुम्हारा दुःख मुझको दूर होता नहीं ज्ञात होता है।' *ऐसा कहकर प्रभु मन में सोचकर क्षणभर में उपाय निश्चय करके पुनः अधिमास से मधुसूदन बोले। *श्रीविष्णु बोले, 'हे वत्स! योगियों को भी जो दुर्लभ गोलोक है वहाँ मेरे साथ चलो जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम, ईश्वर रहते हैं। *गोपियों के समुदाय के मध्य में स्थित, दो भुजा वाले, मुरली को धारण किए हुए नवीन मेघ के समान श्याम, लाल कमल के सदृश नेत्र वाले, शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान अति सुन्दर मुख वाले, करोड़ों कामदेव के लावण्य की मनोहर लीला के धाम, पीताम्बर धारण किये हुए, माला पहिने, वनमाला से विभूषित, उत्तम रत्ना भरण धारण किये हुए, प्रेम के भूषण, भक्तों के ऊपर दया करने वाले, चन्दन चर्चित सर्वांग, कस्तूरी और केशर से युक्त, वक्षस्थल में श्रीवत्स चिन्ह से शोभित, कौस्तुक मणि से विराजित, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ रत्नों के सार से रचित किरीट वाले, कुण्डलों से प्रकाशमान, रत्नोंल के सिंहासन पर बैठे हुए, पार्षदों से घिरे हुए जो हैं, वही पुराण पुरुषोत्तम परब्रह्म हैं। वे सर्वतन्त्रर स्वतन्त्रउ हैं, ब्रह्माण्ड के बीज, सबके आधार, परे से भी परे, निस्पृह, निर्विकार, परिपूर्णतम, प्रभु, माया से परे, सर्वशक्तिसम्पन्न, गुणरहित, नित्यशरीरी। ऐसे प्रभु जिस गोलोक में रहते हैं वहाँ हम दोनों चलते हैं वहाँ श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारा दुःख दूर करेंगे।' *श्रीनारायण बोले, 'ऐसा कहकर अधिमास का हाथ पकड़ कर हरि, गोलोक को गये। हे मुने! जहाँ पहले के प्रलय के समय में वे अज्ञानरूप महा अन्धकार को दूर करने वाले, ज्ञानरूप मार्ग को दिखाने वाले केवल ज्योतिः स्वरूप थे। जो ज्योति करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाली, नित्य, असंख्य और विश्वप की कारण थी तथा उन स्वेच्छामय विभुकी ही वह अतिरेक की चरम सीमा को प्राप्त थी। जिस ज्योति के अन्दर ही मनोहर तीन लोक विराजित हैं। हे मुने! उसके ऊपर अविनाशी ब्रह्म की तरह गोलोक विराजित है। *तीन करोड़ योजन का चौतरफा जिसका विस्तार है और मण्डलाकार जिसकी आकृति है, लहलहाता हुआ साक्षात् मूर्तिमान तेज का स्वरूप है, जिसकी भूमि रत्नमय है। योगियों द्वारा स्वप्न में भी जो अदृश्य है, परन्तु जो विष्णु के भक्तों से गम्य और दृश्य है। ईश्वर ने योग द्वारा जिसे धारण कर रखा है ऐसा उत्तम लोक अन्तरिक्ष में स्थित है। *आधि, व्याधि, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भय आदि से रहित है, श्रेष्ठ रत्नों से भूषित असंख्य मकार्नो से शोभित है। उस गोलोक के नीचे पचास करोड़ योजन के विस्तार के भीतर दाहिने बैकुण्ठ और बाँयें उसी के समान मनोहर शिवलोक स्थित है। एक करोड़ योजन विस्तार के मण्डल का बैकुण्ठ, शोभित है, वहाँ सुन्दर पीताम्बरधारी वैष्णव रहते हैं। *उस बैकुण्ठ के रहने वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुए लक्ष्मी के सहित चतुर्भुज हैं। उस बैकुण्ठ में रहने वाली स्त्रियाँ, बजते हुए नूपुर और करधनी धारण की हैं, सब लक्ष्मी के समान रूपवती हैं। *गोलोक के बाँयें तरफ जो शिवलोक है उसका करोड़ योजन विस्तार है और वह प्रलयशून्य है सृष्टि में पार्षदों से युक्त रहता है। बड़े भाग्यवान्‌ शंकर के गण जहाँ निवास करते हैं, शिवलोक में रहने वाले सब लोग सर्वांग भस्म धारण किये, नाग का यज्ञोपवीत पहने रहते हैं। अर्धचन्द्र जिनके मस्तक में शोभित है, त्रिशूल और पट्टिशधारी, सब गंगा को धारण किये वीर हैं और सबके सब शंकर के समान जयशाली हैं। *गोलोक के अन्दर अति सुन्दर एक ज्योति है। वह ज्योति परम आनन्द को देने वाली और बराबर परमानन्द का कारण है। योगी लोग बराबर योग द्वारा ज्ञानचक्षु से आनन्द जनक, निराकार और पर से भी पर उसी ज्योति का ध्यान करते हैं। उस ज्योति के अन्दर अत्यन्त सुन्दर एक रूप है जो कि नीलकमल के पत्तों के समान श्याम, लाल कमल के समान नेत्र वाले करोड़ों शरत्पूर्णिमा के चन्द्र के समान शोभायमान मुख वाले, करोड़ों कामदेव के समान सौन्दर्य की, लीला का सुन्दर धाम दो भुजा वाले, मुरली हाथ में लिए, मन्दहास्य युक्त, पीताम्बर धारण किए, श्रीवत्स चिह्न से शोभित वक्षःस्थल वाले, कौस्तुभमणि से सुशोभित, करोड़ों उत्तम रत्नों से जटित चमचमाते किरीट और कुण्डलों को धारण किये, रत्नों के सिंहासन पर विराजमान्‌, वनमाला से सुशोभित। वही श्रीकृष्ण नाम वाले पूर्ण परब्रह्म हैं। अपनी इच्छा से ही संसार को नचाने वाले, सबके मूल कारण, सबके आधार, पर से भी परे छोटी अवस्था वाले, निरन्तर गोपवेष को धारण किये हुए, करोड़ों पूर्ण चन्द्रों की शोभा से संयुक्त, भक्तों के ऊपर दया करने वाले निःस्पृह, विकार रहित, परिपूर्णतम, स्वामी रासमण्डप के बीच में बैठे हुए, शान्त स्वरूप, रास के स्वामी, मंगलस्वरूप, मंगल करने के योग्य, समस्त मंगलों के मंगल, परमानन्द के राजा, सत्यरूप, कभी भी नाश न होने वाले विकार रहित, समस्त सिद्धों के स्वामी, सम्पूर्ण सिद्धि के स्वरूप, अशेष सिद्धियों के दाता, माया से रहित, ईश्वनर, गुणरहित, नित्यशरीरी, आदिपुरुष, अव्यक्त, अनेक हैं नाम जिनके, अनेकों द्वारा स्तुति किए जाने वाले, नित्य, स्वतन्त्र, अद्वितीय, शान्त स्वरूप, भक्तों को शान्ति देने में परायण ऐसे परमात्मा के स्वरूप को शान्तिप्रिय, शान्त और शान्ति परायण जो विष्णुभक्त हैं वे ध्यान करते हैं। इस प्रकार के स्वरूप वाले भगवान्‌ कहे जाने वाले, वही एक आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र हैं।' *श्रीनारायण बोले, 'ऐसा कहकर भगवान्, सत्त्व स्वरूप विष्णु अधिमास को साथ लेकर शीघ्र ही परब्रह्मयुक्त गोलोक में पहुँचे।' *सूतजी बोले, 'ऐसा कहकर सत्क्रिया को ग्रहण किये हुए नारायण मुनि के चुप हो जाने पर आनन्द सागर पुरुषोत्तम से विविध प्रकार की नयी कथाओं को सुनने की इच्छा रखने वाले नारद मुनि उत्कण्ठा पूर्वक बोले।' *इति श्रीबृहन्नारदीय पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा* 🌷🌷🙏🏻🌷🙏🏻🌷🌷 *******************************************

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