murlidhargoyal39
murlidhargoyal39 Dec 17, 2017

अग्निपुराण:-अध्याय(९)सुन्दरकाण्ड

अग्निपुराण:-अध्याय(९)सुन्दरकाण्ड
अग्निपुराण:-अध्याय(९)सुन्दरकाण्ड
अग्निपुराण:-अध्याय(९)सुन्दरकाण्ड
अग्निपुराण:-अध्याय(९)सुन्दरकाण्ड

अध्याय – ९
सुन्दरकाण्ड की संक्षिप्त कथा

नारदजी कहते हैं – सम्पाती की बात सुनकर हनुमान और अंगद आदि वानरों ने समुद्र की ओर देखा | फिर वे कहने लगे – ‘कौन समुद्र को लाँघकर समस्त वानरों को जीवन-दान देगा ? वानरों की जीवन-रक्षा और श्रीरामचंद्रजी के कार्य की प्रकृष्ट सिद्धि के लिये पवनकुमार हनुमानजी सौ योजन विस्तृत समुद्र को लाँघ गये | लाँघते समय अवलम्बन देने के लिये समुद्र से मैंनाक पर्वत उठा | हनुमानजी ने दृष्टिमात्र से उसका सत्कार किया | फिर [छायाग्राहिणी] सिंहीकाने सिर उठाया | [वह उन्हें अपना ग्रास बनाना चाहती थी, इसलिये] हनुमानजी ने उसे मार गिराया | समुद्र के पार जाकर उन्होंने लंकापुरी देखी | राक्षसों के घरों में खोज की; रावण के अंत:पुर में तथा कुम्भ, कुम्भकर्ण, विभीषण. इन्द्रजित तथा अन्य राक्षसों के गृहों में जा-जाकर तलाश की; मद्यपान के स्थानों आदि में भी चक्कर लगाया; किंतु कही भी सीता उनकी दृष्टि में नहीं पड़ीं | अब वे बड़ी चिंता में पड़े |

अंतमे जब अशोकवाटिका की ओर गये तो वहाँ शिंशपा-वृक्ष के नीचे सीताजी उन्हें बैठी दिखायी दीं | वहाँ राक्षसियाँ उनकी रखवाली कर रही थी | हनुमानजी ने शिंशपा-वृक्षपर चढकर देखा | रावण सीताजी से कह रहा था – ‘तू मेरी स्त्री हो जा’; किंतु वे स्पष्ट शब्दों में ‘ना’ कर रही थीं | वहाँ बैठी हुई राक्षसियाँ भी यही कहती थीं – ‘तू रावण की स्त्री हो जा |’ जब रावण चला गया तो हनुमानजी ने इसप्रकार कहना आरम्भ किया – ‘अयोध्या में दशरथ नामवाले एक राजा थे | उनके दो पुत्र राम और लक्ष्मण वनवास के लिये गये | वे दोनों भाई श्रेष्ठ पुरुष हैं | उनमें श्रीरामचंद्रजी की पत्नी जनककुमारी सीता तुम्हीं हो | रावण तुम्हें बलपूर्वक हर ले आया हैं | श्रीरामचंद्रजी इस समय वानरराज सुग्रीव के मित्र हो गये हैं | उन्होंने तुम्हारी खोज करने के लिये ही मुझे भेजा है | पहचान के लिये गुढ़ संदेश के साथ श्रीरामचंद्रजी ने अँगूठी दी है | उनकी दी हुई यह अँगूठी ले लो’ ||१ – ९||

सीताजी ने अँगूठी ले ली | उन्होंने वृक्षपर बैठे हुए हनुमानजी को देखा | फिर हनुमानजी वृक्ष से उतरकर उनके सामने आ बैठे, तब सीता ने उनसे कहा –‘यदि श्रीरघुनाथजी जीवित हैं तो वे मुझे यहाँ से ले क्यों नहीं जाते?’ इसप्रकार शंका करती हुई सीताजी से हनुमानजी ने इसप्रकार कहा –‘देवि सीते ! तुम यहाँ हो, यह बात श्रीरामचंद्रजी नहीं जानते | मुझसे यह समाचार जान लेने के पश्चात सेनासहित राक्षस रावण को मारकर वे तुम्हें अवश्य ले जायेंगे | तुम चिंता न करो | मुझे कोई अपनी पहचान दो |’ तब सीताजी ने हनुमानजी को अपनी चूड़ामणि उतारकर दे दी और कहा –‘भैया ! अब ऐसा उपाय करो, जिससे श्रीरघुनाथजी शीघ्र आकर मुझे यहाँ से ले चलें | उन्हें कौए की आँख नष्ट कर देनेवाली घटना का स्मरण दिलाना; [आज यही रहो] कल सबेरे चले जान; तुम मेरा शोक दूर करनेवाले हो | तुम्हारे आने से मेरा दुःख बहुत कम हो गया है |’ चूड़ामणि और काकवाली कथा को पहचान के रूप में लेकर हनुमानजी ने कहा – ‘कल्याणि ! तुम्हारे पतिदेव अब तुम्हें शीघ्र ही ले जायेंगे | आह्व यदि तुम्हें चलने की जल्दी हो, तो मेरी पीठपर बैठ जाओ | मैं आज ही तुम्हें श्रीराम और सुग्रीव के दर्शन कराऊँगा |’ सीता बोलीं – ‘नहीं, श्रीरघुनाथजी ही आकर मुझे ले जायें’ ||१०-१५||

तदनन्तर हनुमानजी ने रावण से मिलने की युक्ति सोच निकाली | उन्होंने रक्षकों को मारकर उस वाटिका को उजाड़ डाला | फिर दाँत और नख आदि आयुधों से वहाँ आये हुए रावण के समस्त सेवकों को मारकर सात मंत्रिकुमारों तथा रावणपुत्र अक्षयकुमार को भी यमलोक पहुँचा दिया | तत्पश्चात इन्द्रजित ने आकर उन्हें नागपाश से बाँध लिया और उन वानरवीर को रावण के पास ले जाकर उससे मिलाया | उससमय रावण ने पूछा- ‘तू कौन हैं ? तब हनुमानजी ने रावण को उत्तर दिया- ‘मैं श्रीरामचंद्रजी का दूत हूँ | तुम श्रीसीताजी को श्रीरघुनाथजी की सेवामें लौटा दो; अन्यथा लंकानिवासी समस्त राक्षसों के साथ तुम्हें श्रीराम के बाणों से घायल होकर निश्चय ही मरना पड़ेगा |’ यह सुनकर रावण हनुमानजी को मारने के लिये उद्यत हो गया; किंतु विभीषण ने उसे रोक दिया | तब रावण ने उनकी पूँछ में आग लगा दी | पूँछ जल उठी | यह देख पवनपुत्र हनुमानजी ने राक्षसों की पूरी लंका को जला डाला और सीताजी का पुन: दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया | फिर समुद्र के पार आकर अंगद आदि से कहा –‘मैंने सीताजी का दर्शन कर लिया है |’ तत्पश्चात अंगद आदि के साथ सुग्रीव के मधुवन में आकर, दधिमुख आदि रक्षकों को परास्त करके, मधुपान करने के अनन्तर वे सब लोग श्रीरामचंद्रजी के पास आये तो बोले- ‘सीताजी का दर्शन हो गया |’ श्रीरामचंद्रजी ने भी अत्यंत प्रसन्न होकर हनुमानजी से पूछा ||१६- २४ ||

श्रीरामचंद्रजी बोले – कपिवर ! तुम्हें सीता का दर्शन कैसे हुआ? उसने मेरे लिये क्या संदेश दिया है? मैं विरह की आग में जल रहा हूँ | तुम सीता की अमृतमयी कथा सुनाकर मेरा संताप शांत करो ||२५||

नारदजी कहते हैं – यह सुनकर हनुमानजी ने रघुनाथजी से कहा –‘भगवन ! मैं समुद्र लाँघकर लंका में गया था | वहाँ सीताजी का दर्शन करके, लंकापूरी को जलाकर यहाँ आ रहा हूँ | यह सीताजी की दी हुई चूड़ामणि लीजिये | आप शोक न करें; रावण का वध करने के पश्चात निश्चय ही आपको सीताजी की प्राप्ति होगी |’ श्रीरामचंद्रजी उस मणि को हाथ में लें, विरहसे व्याकुल होकर रोने लगे और बोले- ‘इस मणिको देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो मैंने सीता को ही देख लिया | अब मुझे सीता के पास ले चलो; मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकता |’ उससमय सुग्रीव आदि ने श्रीरामचंद्रजी को समझा-बुझाकर शांत किया | तदनन्तर श्रीरघुनाथजी समुद्र के तटपर गये | वहाँ उनसे विभीषण आकर मिले | विभीषण के भाई दुरात्मा रावण ने उनका तिरस्कार किया था | विभीषण इतना ही कहा था कि ‘भैया ! आप सीताको श्रीरामचंद्रजी की सेवामें समर्पित कर दीजिये |’ इसी अपराध के कारण उसें इन्हें ठुकरा दिया था | अब वे असहाय थे | श्रीरामचंद्रजी ने विभीषण को अपना मित्र बनाया और लंका के राजपदपर अभिषिक्त कर दिया | इसके बाद श्रीराम ने समुद्र से लंका जाने के लिए रास्ता माँगा | जब उसने मार्ग नहीं दिया तो उन्होंने बाणों से उसे बींध डाला | अब समुद्र भयभीत होकर श्रीरामचंद्रजी के पास आकर बोला – ‘भगवन ! नल के द्वारा मेरे ऊपर पुल बंधाकर आप लंका में जाइये | पूर्वकाल में आपहीने मुझे गहरा बनाया था |’ यह सुनकर श्रीरामचंद्रजी ने नल के द्वारा वृक्ष और शिलाखंडों से एक पुल बंधवाया और उसीसे वे वानरोंसहित समुद्र के पार गये | वहाँ सुवेल पर्वतपर पड़ाव डालकर वहींसे उन्होंने लंकापुरी का निरिक्षण किया ||२६-३३||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘रामायण-कथा के अन्तर्गत सुन्दरकाण्ड की कथा का वर्णन’ नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ||९||

Modak Dhoop Belpatra +179 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 110 शेयर

कामेंट्स

Sandeep Chatterjee Dec 17, 2017
जय अग्नि देव जय सिया राम ॐ नमः शिवाय

namuram Solanki Dec 17, 2017
जय जय श्री महाकाल जय श्री राम जय राम

KRT. Dec 17, 2017
जय श्री राम

Babbu Dixit Dec 17, 2017
जय श्री राम जय Hanuman

Ajnabi Dec 18, 2017
good morning jay shree Radhe krishna veeruda

Pranam Jyot Like +39 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 64 शेयर

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