Santosh Kumar yadav
Santosh Kumar yadav Nov 11, 2017

Jai Shiv Shanker

Teeno Loko Ke Swami ko koti koti Pranam🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🐍

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दस महाविद्या रहस्य( सभी भक्तों को ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ का नमस्कार दोस्तों आज आपको एक ज्ञान से अवगत करा रहे हैं दस महाविद्या रहस्य तो आप जानकारी पाकर अवश्य ही लाभ प्राप्त करेंगे ऐसा विचार मन में है ओम नमः शिवाय जय श्री राम हर हर महादेव जय हो श्री सत्यनारायण जय माता की) जागत पालनकर्ता भगवान विष्णु के अन्तः कारण की शक्ति सर्व-स्वरूपा योगमाया-आदि शक्ति महामाया हैं तथा देवी ही प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से संपूर्ण ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति, स्थिति तथा लय की कारण भूता हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव की उत्पत्ति इन्हीं के अनुसार हुई हैं। सृष्टि के सुचारु सञ्चालन हेतु, भगवान विष्णु पालनहार, ब्रह्मा रचनाकार, तथा शिव संहारक पद, महामाया आद्या शक्ति द्वारा ही इन महा-देवों को प्राप्त हैं। क्रमशः तीनों महा देव तीन प्राकृतिक गुणों के कारक बने सत्व गुण, रजो गुण तथा तमो गुण, संपूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन इन्हीं गुणों के द्वारा ही होता हैं; परन्तु इन कार्यों की इच्छा शक्ति, आदि शक्ति की आधारभूत शक्ति हैं। त्रि-देवों के अनुसार ही इनकी जीवन संगिनी त्रि-देवियाँ भी इन कार्यों में संलग्न रहती हुई अपने-अपने स्वामी की शक्तियां हैं। त्रि-देवियाँ या महा-देवियाँ महा-लक्ष्मी, मह-सरस्वती तथा पार्वती-सती के रूप में, त्रि-देवों की जीवन संगिनी तथा सहायक हैं। महा-लक्ष्मी के रूप में ये भगवान विष्णु कि सात्विक शक्ति हैं, महा-सरस्वती के रूप में ये बब्रह्मा जी की राजसिक शक्ति हैं तथा पार्वती-सती के रूप में ये शिव के तामसी शक्ति हैं। साक्षात आदि शक्ति महामाया ही शिवा स्वरूपी शिव अर्धाग्ङिनी पार्वती एवं सती हैं और तामसी संहारक शक्ति होने के फल स्वरूप समय-समय पर भयंकर धारण करती हैं। परन्तु उनका भयंकर रूप, केवल दुष्टों हेतु ही भय उत्पन्न करने वाला तथा विनाशकारी हैं। देवी! सौम्य, सौम्य-उग्र तथा उग्र तीन रूपों में अवस्थित हैं तथा स्वभाव के अनुसार दो कुल में विभाजित हैं, काली कुल तथा श्री कुल। अपने कार्य तथा गुण के अनुसार देवी अनेकों अवतारों में प्रकट हुई, ऐसा नहीं हैं कि इनके सभी रूप भयानक हैं; सौम्य स्वरूप में देवी कोमल स्वभाव वाली हैं, सौम्य-उग्र स्वरूप में देवी कोमल और उग्र (सामान्य) स्वभाव वाली हैं तथा उग्र रूप में देवी अत्यंत भयानक हैं। महा-देवियाँ, दस महाविद्या, योगिनियाँ, डाकिनियाँ, पिसाचनियाँ, भैरवी इत्यादि महामाया आदि शक्ति के नाना अवतार हैं, सभी केवल गुण एवं स्वभाव से भिन्न-भिन्न हैं। काली कुल की देवियाँ प्रायः घोर भयानक स्वरूप तथा उग्र स्वभाव वाली होती हैं तथा इन का सम्बन्ध काले या गहरे रंग से होता हैं; इसके विपरीत श्री कुल के देवियाँ सौम्य तथा कोमल स्वभाव की तथा लाल रंग या हलके रंग से सम्बंधित होती हैं। काली कुल की की देवियों में महाकाली, तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी हैं, जो स्वभाव से उग्र हैं। (परन्तु, इनका स्वभाव दुष्टों के लिये ही भयानक हैं) श्री कुल की देवियों में महा-त्रिपुरसुंदरी, त्रिपुर-भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला हैं, देवी धूमावती को छोड़ कर सभी सुन्दर रूप तथा यौवन से संपन्न हैं। महाविद्यायों में प्रथम स्थान पर विद्यमान महाशक्ति महा-काली काली के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा कालिका पुराण के अनुसार, देवी काली के दो स्वरूप हैं, प्रथम 'आद्या शक्ति काली' तथा द्वितीय केवल पौराणिक 'काली या महा-काली'। दक्षिणा काली जो साक्षात् आद्या शक्ति ही हैं, अजन्मा तथा सर्वप्रथम शक्ति हैं, जिनसे पूर्व में इस चराचर जगत की उत्पत्ति हुई थी, देवी ही चराचर जगत की स्वामिनी हैं। द्वितीय 'देवी दुर्गा या शिव पत्नी सती, पार्वती' से सम्बंधित हैं तथा देवी के भिन्न-भिन्न अवतारों में से एक हैं, यह वही हैं जिनका प्रादुर्भाव मतंग मुनि के आश्रम में देवताओं द्वारा स्तुति करने पर अम्बिका के ललाट से हुआ था तथा जो तमोगुण की स्वामिनी हैं। परन्तु, वास्तविक रूप से देखा जाये तो दोनों शक्तियाँ एक ही हैं। दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डये पुराण के अंतर्गत एक भाग, आद्या शक्ति के विभिन्न अवतारों की शौर्य गाथा से सम्बंधित पौराणिक पाठ्य पुस्तक), के अनुसार एक समय समस्त त्रि-भुवन (स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी) शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्य भाइयों के अत्याचार से ग्रस्त थे। दोनों समस्त देवताओं के अधिकारों को छीनकर उसका स्वयं ही भोग करते थे, देवता स्वर्ग विहीन इधर-उधर भटकने वाले हो गए थे। समस्या के समाधान हेतु, सभी देवता एकत्र हो हिमालय में गए और देवी आद्या-शक्ति, की स्तुति, वंदना करने लगे। परिणामस्वरूप, 'कौशिकी' नाम की एक दिव्य नारी शक्ति जो कि भगवान शिव की पत्नी 'गौरी या पार्वती' में समाई हुई थी, लुप्त थी, समस्त देवताओं के सनमुख प्रकट हुई। शिव अर्धाग्ङिनी के देह से विभक्त हो, उदित होने वाली वह शक्ति घोर काले वर्ण की थी तथा काली नाम से विख्यात हुई। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा (जिन्होंने दुर्गमासुर दैत्य का वध किया था), ने शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महा राक्षसों को युद्ध में परास्त किया तथा तीनों लोकों को उन दोनों भाइयों के अत्याचार से मुक्त किया। चण्ड और मुंड नामक दैत्यों ने जब देवी दुर्गा से युद्ध करने का आवाहन किया, देवी उन दोनों से युद्ध करने हेतु उद्धत हुई। आक्रमण करते हुए देवी, क्रोध के वशीभूत हो अत्यंत उग्र तथा भयंकर डरावनी हो गई, उस समय उनकी सहायता हेतु उन्हीं के मस्तक से एक काले वर्ण वाली शक्ति का प्राकट्य हुआ, जो देखने में अत्यंत ही भयानक, घनघोर तथा डरावनी थी। वह काले वर्ण वाली देवी, 'महा-काली' ही थी, जिन का प्राकट्य देवी दुर्गा की युद्ध भूमि में सहायता हेतु हुई थी। चण्ड और मुंड के संग हजारों संख्या में वीर दैत्य, देवी दुर्गा तथा उनके सहचरियों से युद्ध कर रहे थे, उन महा-वीर दैत्यों में 'रक्तबीज' नाम के एक राक्षस ने भी भाग लिया था। युद्ध भूमि पर देवी ने रक्तबीज दैत्य पर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण किया, जिससे कारण उस दैत्य रक्तबीज के शरीर से रक्त का स्राव होने लगा। परन्तु, दैत्य के रक्त की टपकते हुए प्रत्येक बूंद से, युद्ध स्थल में उसी के सामान पराक्रमी तथा वीर दैत्य उत्पन्न होने लगे तथा वह और भी अधिक पराक्रमी तथा शक्तिशाली होने लगा। देवी दुर्गा की सहायतार्थ, देवी काली ने दैत्य रक्तबीज के प्रत्येक टपकते हुए रक्त बूंद को, जिह्वा लम्बी कर अपने मुंह पर लेना शुरू किया। परिणामस्वरूप, युद्ध क्षेत्र में दैत्य रक्तबीज शक्तिहीन होने लगा, अब उसके सहायता हेतु और किसी दैत्य का प्राकट्य नहीं हो रहा था, अंततः रक्तबीज सहित चण्ड और मुंड का वध कर देवी काली तथा दुर्गा ने तीनों लोकों को भय मुक्त किया। देवी, क्रोध-वश महा-विनाश करने लगी, इनके क्रोध को शांत करने हेतु, भगवान शिव युद्ध भूमि में लेट गए। देवी नग्नावस्था में थीं तथा इस अवस्था में नृत्य करते हुए, जब देवी का पैर शिव जी के ऊपर आ गया, उन्हें लगा की वे अपने पति के ऊपर खड़ी हैं तदनंतर, लज्जा वश देवी का क्रोध शांत हुआ तथा जिह्वा बहार निकल पड़ी। देवी महा-काली का भौतिक स्वरूप देवी का स्वरूप अत्यंत भयानक तथा डरावना हैं, विभिन्न ध्यान मंत्रों के अनुसार देवी का स्वरूप अत्यंत विकराल हैं। देवी, प्राण-शक्ति स्वरूप में शिव रूपी शव के ऊपर आरूढ़ हैं, जिसके कारण जीवित देह शक्ति सम्पन्न या प्राण युक्त हैं। देवी अपने भक्तों के विकार शून्य हृदय (जिसमें समस्त विकारों का दाह होता हैं) में निवास करती हैं, जिसका दार्शनिक अभिप्राय श्मशान से भी हैं। देवी श्मशान भूमि (जहाँ शव दाह होता हैं) वासी हैं। घोर काले वर्ण वाली देवी काली, अपने विकराल दन्त पंक्ति द्वारा मुंह से निकली हुए लपलपाती लाल रक्त वर्ण जैसी जिह्वा को दबाये हुए हैं, जो अत्यंत भयंकर प्रतीत हो रही हैं। दुष्ट दानवों का रक्त पान करने के परिणामस्वरूप इनकी जिह्वा लाल रक्त वर्ण की हैं। देवी का मुखमंडल तीन बड़ी-बड़ी भयंकर नेत्रों से युक्त हैं, जो सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के प्रतीक हैं। इनके ललाट पर अमृत के सामान चन्द्रमा स्थापित हैं, काले घनघोर बादलों के समान बिखरे केशों के कारण देवी अत्यंत भयंकर प्रतीत हो रहीं हैं। स्वभाव से ही दुष्ट असुरों के हाल ही में कटे हुए सरो या मस्तकों कि माला इन्होंने अपने गले में धारण कर रखी हैं तथा प्रत्येक सर से रुधिर (रक्त) धारा बह रही हैं। अपने दोनों बाएँ हाथों में इन्होंने खड़ग तथा दुष्ट मानव (असुर) का कटा हुआ सर धारण कर रखा हैं तथा बाएँ हाथों से यह सज्जनों को अभय तथा आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। देवी दिगम्बरी हैं, कही-कही देवी अपनी लज्जा निवारण हेतु युद्ध में मारे गए दानवों के कटे हुए हाथों की माला बनाकर करधनी के रूप में धारण करती हैं । अपने भैरव महा-काल या पति शिव के छाती में देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये खड़ी हैं, जैसे स्वयं काल का भी भक्षण करने हेतु उद्धत हो। देवी ने अपने कानों में मृत शिशु देह, कुंडल स्वरूप हैं धारण कर रखा हैं, इनके चारों ओर सियार कुत्ते दिखते हैं तथा रक्त की धर बहती हैं, हड्डियाँ बिखरी हुई हैं, देवी रुधिर (रक्त) प्रिय हैं। मुखतः देवी अपने दो स्वरूपों में विख्यात हैं, 'दक्षिणा काली' जो चार भुजाओं से युक्त हैं तथा 'महा-काली' के रूप में देवी की २० भजायें हैं। देवी की देह पतली तथा जहरीले दांत हैं, जोर से अट्टहास करती हैं जो शब्द बड़ी ही घनघोर प्रतीत होकर दुष्टों के हृदय को विदीर्ण कर देती हैं। देवी पागल महिला के स्वरूप में नृत्य करने के कारण, अत्यंत भयानक शारीरिक उपस्थिति प्रस्तुत करती हैं। कटे हुए राक्षसों के मस्तकों की माला पहनने, भूत तथा प्रेतों के साथ श्मशान भूमि में निवास करने के कारण, देवी अन्य सभी देवी देवताओं में भयंकर प्रतीत होती हैं। देवी का नाम 'काली' पड़ने का कारण कालिका पुराण के अनुसार, सभी देवता एक बार हिमालय में मतंग मुनि के आश्रम के पास गए और आद्या शक्ति या महामाया की स्तुति करने लगे। सभी देवताओं द्वारा की गई वंदना तथा स्तुति से देवी अत्यंत प्रसन्न हुई तथा एक काले रंग की विशाल पहाड़ जैसी स्वरूप वाली दिव्य स्त्री देखते ही देखते सभी देवताओं के सनमुख प्रकट हुई। वह स्त्री देखने में अमावस्या के अंधकार जैसी थी इस कारण उस शक्ति का नाम 'काली' पड़ा। वास्तव में देवी, शिव पत्नी पार्वती के देह से उत्पन्न हुई थीं, जिनका पूर्व में सर्वप्रथम घोर अन्धकार से उत्पत्ति होने के कारण आद्या काली नाम पड़ा था। मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी कालाष्टमी कहलाती हैं, इस दिन सामान्यतः महा-काली की पूजा, आराधना की जाती हैं या कहे तो पौराणिक काली की आराधना होती हैं, जो दुर्गा जी के नाना रूपों में से एक हैं। परन्तु तांत्रिक मतानुसार, दक्षिणा काली या आद्या काली की साधना कार्तिक अमावस्या या दीपावली के दिन होती हैं, शक्ति तथा शैव समुदाय इस दिन आद्या शक्ति काली के भिन्न-भिन्न स्वरूपों की आराधना करता हैं। जबकि वैष्णव समुदाय का अनुसरण करने वाले इस दिन, धन-दात्री महा लक्ष्मी की आराधना करते हैं। महा-काली से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य देवी काली की आराधना, पूजा इत्यादि भारत के पूर्वी प्रांत में अधिकतर लोकप्रिय हैं, देवी वहां समाज के प्रत्येक वर्ग द्वारा पूजिता हैं, विशेषतः जनजातीय, निम्न जाति तथा युद्ध कौशल से सम्बंधित समाज की देवी अधिष्ठात्री हैं। जहां-तहा देवी काली के मंदिर देखे जा सकते हैं, प्रत्येक श्मशान में देवी काली का मंदिर विद्यमान हैं तथा विशेष तिथियों में पूजा, अर्चना होती हैं। चांडाल जो की हिन्दू धर्म के अनुसार, श्मशान में शव के दाह का कार्य करते हैं एवं अन्य शूद्र जातियों की देवी अधिष्ठात्री हैं। डकैती जैसे अमानवीय कृत्य करने वाले भी देवी की विशेष पूजा करते हैं, सामान्यतः डकैत, डकैती करने हेतु प्रस्थान से पहले देवी काली की विशेष पूजा आराधना करते थे। देवी का सम्बन्ध क्रूर कृत्यों से भी हैं, परन्तु यह क्रूर कृत्य पूर्व तथा वर्तमान जन्म में अर्जित के दुष्ट कर्म के जातकों हेतु ही हैं। हिन्दू धर्म पुनर्जन्म के सिद्धांतों पर आधारित हैं, केवल मानव देह धरी या जातक को अपने नाना जन्मो के कुकर्मों के कारण कष्ट-दुःख तथा सुकर्मों के कारण सुख भोगना ही पड़ता हैं। पूर्वकाल में डकैत, देवी के निमित्त भव्य मंदिरों का निर्माण करवाते थे तथा विधिवत पूजा आराधना की संपूर्ण व्यवस्था करते थे। आज भी भारत वर्ष के विभिन्न प्रांतों में ऐसे मंदिर विद्यमान हैं, जहां डकैत देवी काली की आराधना, पूजा इत्यादि करते थे। हुगली जिले में डकैत काली-बाड़ी, जलपाईगुड़ी जिले की देवी चौधरानी (डकैत) काली बाड़ी इत्यादि, प्रमुख डकैत देवी मंदिर हैं। स्कन्द (कार्तिक) पुराण, के अनुसार 'देवी आद्या शक्ति काली' की उत्पत्ति आश्विन मास की कृष्णा चतुर्दशी तिथि मध्य रात्रि के घोर में अंधकार से हुई थीं। परिणामस्वरूप अगले दिन कार्तिक अमावस्या को उन की पूजा-आराधना तीनों लोकों में की जाती हैं, यह पर्व दीपावली या दीवाली नाम से विख्यात हैं तथा समस्त हिन्दू समाजों द्वारा मनाई जाती हैं। शक्ति तथा शैव समुदाय का अनुसरण करने वाले इस दिन देवी काली की पूजा करते हैं तथा वैष्णव समुदाय महा लक्ष्मी जी की, वास्तव में महा काली तथा महा लक्ष्मी दोनों एक ही हैं। भगवान विष्णु के अन्तः कारण की शक्ति या संहारक शक्ति 'मायामय या आदि शक्ति' ही हैं, महालक्ष्मी रूप में देवी उनकी पत्नी हैं तथा धन-सुख-वैभव की अधिष्ठात्री देवी हैं। अग्नि तथा गरुड़ पुराण के अनुसार महा-काली की साधना-आराधना, युद्ध में सफलता और शत्रुों पर विजय प्राप्त करने के हेतु की जाती हैं। दस महा-विद्याओं में देवी काली, उग्र तथा सौम्य रूप में विद्यमान हैं, देवी काली अपने अनेक अन्य नमो से प्रसिद्ध हैं, जो भिन्न-भिन्न स्वरूप तथा गुणों वाली हैं। देवी काली मुख्यतः आठ नमो से जानी जाती हैं और 'अष्ट काली', समूह का निर्माण करती हैं। १. चिंता मणि काली २. स्पर्श मणि काली ३. संतति प्रदा काली ४. सिद्धि काली ५. दक्षिणा काली ६. कामकला काली ७. हंस काली ८. गुह्य काली देवी काली 'दक्षिणा काली' नाम तथा स्वरूप से सर्व सदाहरण में सर्वाधिक पूजिता हैं देवी काली के दक्षिणा काली नाम पड़ने के विभिन्न कारण। · सर्वप्रथम 'दक्षिणा मूर्ति भैरव' ने इन की उपासना की, परिणामस्वरूप देवी, दक्षिणा काली के नाम से विख्यात हुई। · दक्षिण दिशा की ओर रहने वाले 'यम या धर्म राज, देवी का नाम सुनते ही भाग जाते है परिणामस्वरूप देवी, दक्षिणा काली के नाम से जानी जाती हैं। तात्पर्य है, मृत्यु के देवता यम-राज जिनका राज्य या यम लोक दक्षिण दिशा में विद्यमान है, मृत्यु पश्चात जीव-आत्मा यम दूतों द्वारा इन्हीं के लोक में लाई जाती हैं जहाँ जीव के कर्म-अनुसार उसे दण्डित किया जाता हैं तथा अगले जन्म का निर्धारण होता हैं। यम राज तथा उनके दूत, देवी काली के भक्तों से दूर रहते है, मृत्यु पश्चात यम दूत उन्हें यम लोक नहीं ले जाते हैं। · समस्त प्रकार के साधनाओं का सम्पूर्ण फल 'दक्षिणा' से ही प्राप्त होता हैं, जैसे गुरु दीक्षा तभी सफल हैं जब गुरु दक्षिणा दी गई हो। देवी काली, मनुष्य को अपने समस्त कर्मों का फल प्रदान करती हैं या सिद्धि प्रदान करती हैं, तभी देवी को दक्षिणा काली के नाम से भी जाना जाता हैं। · देवी काली वार प्रदान करने में अत्यंत चतुर हैं, यहाँ भी एक कारण हैं की उन्हें दक्षिणा काली कहा जाता हैं। · हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, पुरुष को ‘दक्षिण’ तथा स्त्री को ‘बामा’ कहा जाता हैं। वही बामा दक्षिण पर विजय पाकर मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं, कारणवश देवी अपने भैरव के ऊपर खड़ी हैं। देवी काली दो कुल, जो 'रक्त तथा कृष्ण' वर्ण में अधिष्ठित हैं, कृष्ण या काले स्वरूप वाली 'दक्षिणा' कुल से तथा रक्त या लाल वर्ण वाली 'सुंदरी' कुल से सम्बंधित हैं। मुख्यतः विध्वंसक प्रवृत्ति धारण करने वाले समस्त देवियाँ 'कृष्ण या दक्षिणा कुल' से सम्बंधित हैं। देवी काली का घनिष्ठ सम्बन्ध विध्वंसक प्रवृत्ति तथा तत्वों से हैं, जैसे देवी श्मशान वासी हैं, मानव शव-हड्डी इत्यादि मृत देह से सम्बंधित तत्त्वों से सम्बद्ध हैं। भूत-प्रेत इत्यादि प्रेत योनि को प्राप्त जीवों या विध्वंसक सूक्ष्म परा जीव, देवी के संगी साथी तथा सहचरी हैं। यहाँ देवी नियंत्रक भी हैं तथा स्वामी भी, समस्त भूत-प्रेत इत्यादि, इनकी आज्ञा का उलंघन कभी नहीं कर सकते। समस्त वेद इन्हीं देवी की भद्र काली रूप में स्तुति करते हैं, निष्काम या निःस्वार्थ भक्तों के माया रूपी पाश को ज्ञान रूपी तलवार से काट कर मुक्त करती हैं। देवी काली को सम्बोधित करने वाली नाना शब्दों का तात्पर्य (अर्थ) श्मशान वासिनी: तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी-देवता, मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, यह वह स्थान हैं, जहाँ पांच या पञ्च महा-भूत, चिद-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से, संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं या देह इन्हीं पांच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ, इन पांचो भूतों के मिश्रण से निर्मित देह अपने-अपने तत्व में विलीन हो जाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह हैं कि! आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। मानव देह कई प्रकार के विकारों या पाशों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय वह स्थान हैं जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं अतः देवी काली अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं। चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर शव दाह करना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके। देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके कारण ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं, देवी की कृपा लाभ से ही देह पर प्राण रहते हैं। करालवदना या घोररूपा : देवी काली का वर्ण घोर या अत्यंत श्याम वर्ण (काला) हैं तथा स्वरूप से भयंकर तथा डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल, यमराज देवी से भयभीत रहते हैं। पीनपयोधरा : देवी काली के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं। प्रकटितरदना : देवी काली की विकराल दन्त पंक्ति मुंह के बहार दिखाई देती हैं, उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं। बालावतंसा : देवी काली अपने कानों में बालक के शव रूपी अलंकार धारण करती हैं या कहे तो बच्चों के शव को देवी कानों के अलंकार रूप में धारण करती हैं। यहाँ देवी बालक स्वरूपी साधक को सर्वदा अपने समीप रखती हैं, बाल्य भाव देवी को प्राप्त करने का सर्व शक्तिशाली साधन हैं। मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आंधी आने वाली हो, जो प्रलय से सम्बंधित हैं। महाविद्यायों में द्वितीय स्थान पर विद्यमान, महाविद्या तारा देवी तारा के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में, चोलना नदी के तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में 'देवी तारा' प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि तारा-रात्रि कहलाती हैं। एक और देवी तारा के उत्पत्ति संदर्भ कथा 'तारा-रहस्य नमक तंत्र' ग्रन्थ से प्राप्त होता हैं; जो भगवान विष्णु के अवतार, श्री राम द्वारा लंका-पति दानव राज दशानन रावण का वध के समय से हैं। सर्वप्रथम स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी काली के मुख से सुनकर, शिव जी अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। शिव जी ने महाकाली से पूछा, आदि काल में अपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब आश्चर्य से युक्त आप का वह स्वरूप 'तारा' नाम से विख्यात हुआ। उस समय, समस्त देवताओं ने आप की स्तुति की थी तथा आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी, मुख से चंचल जिह्वा बहार कर आप भयंकर रुपवाली प्रतीत हो रही थी। आप का वह विकराल रूप देख सभी देवता भय से आतुर हो काँप रहे थे, आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर, उन्हें शांत करने के निमित्त ब्रह्मा जी आप के पास गए थे। समस्त देवताओं को ब्रह्मा जी के साथ देखकर देवी, लज्जित हो आप खड़ग से लज्जा निवारण की चेष्टा करने लगी। रावण वध के समय आप अपने रुद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु, आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था। इसी रूप में देवी 'लम्बोदरी' के नाम से विख्यात हुई। तारा-रहस्य तंत्र के अनुसार, भगवान राम केवल निमित्त मात्र ही थे, वास्तव में भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया। देवी उग्र तारा का भौतिक स्वरूप देवी तारा, प्रत्यालीढ़ मुद्रा (जैसे की एक वीर योद्धा, अपने दाहिने पैर आगे किये युद्ध लड़ने हेतु उद्धत हो) धारण कर, शव या चेतना रहित शिव के ऊपर पर आरूढ़ हैं। देवी के मस्तक पंच कपालों से सुसज्जित हैं, नव-यौवन संपन्न हैं, नील कमल के समान तीन नेत्रों से युक्त, उन्नत स्तन मंडल और नूतन मेघ के समान कांति वाली हैं। विकट दन्त पंक्ति तथा घोर अट्टहास करने के कारण देवी का स्वरूप अत्यंत उग्र प्रतीत होता हैं। देवी का स्वरूप बहुत डरावना और भयंकर हैं तथा वास्तविक रूप से देवी, चिता के ऊपर जल रही शव पर आरूढ़ हैं तथा इन्होंने अपना दाहिना पैर शव रूपी शिव के छाती पर रखा हैं। देवी घोर नील वर्ण की हैं, महा-शंख (मानव कपाल) की माला धारण किये हुए हैं, वह छोटे कद की हैं तथा कही-कही देवी अपनी लज्जा निवारण हेतु बाघाम्बर भी धारण करती हैं। देवी के आभूषण तथा पवित्र यज्ञोपवीत सर्प हैं, साथ ही रुद्राक्ष तथा हड्डियों की बानी हुई आभूषणों को धारण करती हैं। वह अपनी छोटी लपलपाती हुई जीभ मुंह से बाहर निकले हुए तथा अपने विकराल दन्त पंक्तियों से दबाये हुए हैं। देवी के शरीर से सर्प लिपटे हुए हैं, सिर के बाल चारों ओर उलझे-बिखरे हुए भयंकर प्रतीत होते हैं। देवी चार हाथों से युक्त हैं तथा नील कमल, खप्पर (मानव खोपड़ी से निर्मित कटोरी), कैंची और तलवार धारण करती हैं। देवी, ऐसे स्थान पर निवास करती हैं जहाँ सर्वदा ही चिता जलती रहती हैं तथा हड्डियाँ, खोपड़ी इत्यादि इधर-उधर बिखरी पड़ी हुई होती हैं, सियार, गीदड़, कुत्ते इत्यादि हिंसक जीव इनके चारों ओर देखे जाते हैं। देवी तारा अपने मुख्य तीन स्वरूप से विख्यात हैं, उग्र तारा, नील सरस्वती तथा एक-जटा प्रथम 'उग्र तारा', अपने उग्र तथा भयानक रूप हेतु जानी जाती हैं। देवी का यह स्वरूप अत्यंत उग्र तथा भयानक हैं, ज्वलंत चिता के ऊपर, शव रूपी शिव या चेतना हीन शिव के ऊपर, देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी हैं। देवी उग्र तारा, तमो गुण सम्पन्न हैं तथा अपने साधकों-भक्तों के कठिन से कठिन परिस्थितियों में पथ प्रदर्शित तथा छुटकारा पाने में सहायता करती हैं। द्वितीय 'नील सरस्वती, इस स्वरूप में देवी संपूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त ज्ञान कि ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर-उधर बिखरा हुआ पड़ा हैं, उन सब को एकत्रित करने पर जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं, वे ये देवी नील सरस्वती ही हैं। इस स्वरूप में देवी राजसिक या रजो गुण सम्पन्न हैं। देवी परम ज्ञानी हैं, अपने असाधारण ज्ञान के परिणाम स्वरूप, ज्वलंत चिता के शव को शिव स्वरूप में परिवर्तित करने में समर्थ हैं। एकजटा, यह देवी का तीसरे स्वरूप या नाम हैं, पिंगल जटा जुट वाली यह देवी सत्व गुण सम्पन्न हैं तथा अपने भक्त को मोक्ष प्रदान करती हैं मोक्ष दात्री हैं। ज्वलंत चिता में सर्वप्रथम देवी, उग्र तारा के रूप में खड़ी हैं, द्वितीय नील सरस्वती, शव को जीवित कर शिव बनाने में सक्षम हैं तथा तीसरे स्वरूप में देवी एकजटा जीवित शिव को अपने पिंगल जटा में धारण करती हैं या मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी अपने भक्तों को मृत्युपरांत, अपनी जटाओं में विराजित अक्षोभ्य शिव के साथ स्थान प्रदान करती हैं या कहे तो मोक्ष प्रदान करती हैं। देवी अन्य आठ स्वरूपों में 'अष्ट तारा' समूह का निर्माण करती है तथा विख्यात हैं, १. तारा २. उग्र तारा ३. महोग्र तारा ४. वज्र तारा ५. नील तारा ६. सरस्वती ७. कामेश्वरी ८. भद्र काली-चामुंडा सभी स्वरूप गुण तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न है तथा भक्तों की समस्त प्रकार के मनोकामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ, सक्षम हैं। देवी तारा से सम्बंधित अन्य तथ्य सर्वप्रथम वशिष्ठ मुनि ने देवी तारा कि आराधना की थी, परिणाम स्वरूप देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं। सर्वप्रथम मुनि-राज ने देवी तारा की उपासना वैदिक पद्धति से कि, परन्तु वे देवी की कृपा प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। अलौकिक शक्तियों से उन्हें ज्ञात हुआ की देवी की आराधना का क्रम चीन देश में रहने वाले भगवान बुद्ध को ज्ञात हैं, वे उन के पास जाये तथा साधना का सही क्रम, पद्धति जानकर देवी तारा की उपासना करें। तदनंतर वशिष्ठ मुनि ने चीन देश की यात्रा की तथा भगवान बुद्ध से आराधना का सही क्रम ज्ञात किया, जिसे चिनाचार पद्धति, वीर साधना या आगमोक्ता पद्धति (तंत्र) कहा गया। भगवान बुद्ध के आदेश अनुसार उन्होंने चिनाचार पद्धति से देवी की आराधना की तथा देवी कृपा लाभ करने में सफल हुए। (बंगाल प्रान्त के बीरभूम जिले में वह स्थान आज भी विद्यमान हैं, जहाँ मुनिराज ने देवी की आराधना की थी, जिसे जगत-जननी तारा माता के सिद्ध पीठ 'तारा पीठ' के नाम से जाना जाता हैं।) 'तारा' नाम के रहस्य से ज्ञात होता हैं, ये तारने वाली हैं, मोक्ष प्रदाता हैं। जीवन तथा मृत्यु के चक्र से तारने हेतु, यह नाम 'तारा' देवी के नाम-रहस्य को उजागर करता हैं। महाविद्याओं में देवी दूसरे स्थान पर विद्यमान हैं तथा देवी अपने भक्तों को ‘वाक्-शक्ति’ प्रदान करने तथा भयंकर विपत्तिओ से अपने भक्तों की रक्षा करने में समर्थ हैं। शत्रु नाश, भोग तथा मोक्ष, वाक् शक्ति प्राप्ति हेतु देवी कि साधना विशेष लाभकारी सिद्ध होती हैं। सामान्यतः तंत्रोक्त पद्धति से साधना करने पर ही देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध श्मशान भूमि से हैं, जो उनका निवास स्थान हैं। साथ ही श्मशान से सम्बंधित समस्त वस्तुओं-तत्वों जैसे मृत देह, हड्डी, चिता, चिता-भस्म, भूत, प्रेत, कंकाल, खोपड़ी, उल्लू, कुत्ता, लोमड़ी इत्यादि से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। गुण तथा स्वभाव से देवी तारा, महा-काली से युक्त हैं। देवी उग्र तारा, अपने भक्तों के जीवन में व्याप्त हर कठिन परिस्थितियों से रक्षा करती हैं। देवी के साधक नाना प्रकार के सिद्धियों के युक्त होते हैं, गद्ध-पद्ध-मयी वाणी साधक के मुख का कभी परित्याग नहीं करती हैं, त्रिलोक मोहन, सुवक्ता, विद्याधर, समस्त जगत को क्षुब्ध तथा हल-चल पैदा करने में साधक पूर्णतः समर्थ होता हैं। कुबेर के धन के समान धनवान, निश्चल भाव से लक्ष्मी वास तथा काव्य-आगम आदि शास्त्रों में शुक देव तथा देवगुरु बृहस्पति के तुल्य हो जाते हैं, मूर्ख हो या जड़ वह बृहस्पति के समान हो जाता हैं। साधक ब्रह्म-वेत्ता होने का सामर्थ्य रखता हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के की साम्यता को प्राप्त कर, समस्त पाशों से मुक्त हो ब्रह्मरूप मोक्ष पद को प्राप्त करते हैं। पशु भय वाले इस संसार से मुक्ति लाभ करता हैं या अष्ट पाशों (घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति) में बंधे हुए पशु आचरण से मुक्त हो, मोक्ष (तारिणी पद) को प्राप्त करने में समर्थ होता हैं। देवी काली तथा तारा में समानतायें देवी काली ही, नील वर्ण धारण करने के कारण 'तारा' नाम से जानी जाती हैं तथा दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। जैसे दोनों शिव रूपी शव पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये हुए आरूढ़ हैं, अंतर केवल देवी काली शव रूपी शिव पर आरूढ़ हैं तथा देवी तारा जलती हुई चिता पर आरूढ़ हैं। दोनो। दोनों का निवास स्थान श्मशान भूमि हैं, दोनों देवियों की जिह्वा मुंह से बाहर हैं तथा भयंकर दन्त-पंक्ति से दबाये हुए हैं, दोनों रक्त प्रिया हैं, भयानक तथा डरावने स्वरूप वाली हैं, भूत-प्रेतों से सम्बंधित हैं, दोनों देवियों का वर्ण गहरे रंग का हैं एक गहरे काले वर्ण की हैं तथा दूसरी गहरे नील वर्ण की। दोनों देवियाँ नग्न विचरण करने वाली हैं, कही-कही देवी काली कटे हुई हाथों की करधनी धारण करती हैं, नर मुंडो की माला धारण करती हैं वही देवी तारा व्यग्र चर्म धारण करती हैं तथा नर खप्परों की माला धारण करती हैं। दोनों की साधना तंत्रानुसार पंच-मकार विधि से की जाती हैं, सामान्यतः दोनों एक ही हैं इनमें बहुत काम भिन्नताएं दिखते हैं। दोनों देवियों का वर्णन शास्त्रानुसार शिव पत्नी के रूप में किया गया हैं तथा दोनों के नाम भी एक जैसे ही हैं जैसे, हर-वल्लभा, हर-प्रिया, हर-पत्नी इत्यादि, 'हर' भगवान शिव का एक नाम हैं। परन्तु देवी तारा ने, भगवान शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर, अपना स्तन दुग्ध पान कराया था। समुद्र मंथन के समय कालकूट विष का पान करने के परिणाम स्वरूप, भगवान शिव के शरीर में जलन होने लगी तथा वे तड़पने लगे, देवी ने उन के शारीरिक कष्ट को शांत करने हेतु अपने अमृतमय स्तन दुग्ध पान कराया। देवी काली के सामान ही देवी तारा का सम्बन्ध निम्न तत्वों से हैं। श्मशान वासिनी : तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही हैं, यह वह स्थान हैं जहाँ 'पंच या पञ्च महाभूत' या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं, समस्त जीव शरीर या देह इन्हीं पंच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ पञ्च भूत या तत्त्व के मिश्रण से निर्मित देह, अपने-अपने तत्त्व में विलीन हो जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारण-वश अपना निवास स्थान बनाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं, इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं, मानव देह कई प्रकार के विकारों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय भी वह स्थान हैं या कहें तो वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं। चिता : मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर जला देना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके। देवी का आसन : देवी शव रूपी शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं। करालवदना या घोररूपा : देवी काली, तारा घनघोर या अत्यंत काले वर्ण की हैं तथा स्वरूप से भयंकर और डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल या यम भी देवी से भय-भीत रहते हैं। पीनपयोधरा : देवी काली-तारा के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं। प्रकटितरदना : देवी काली-तारा के विकराल दन्त पंक्ति बहार निकले हुए हैं तथा उन दाँतो से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं। मुक्तकेशी : देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आँधी आने वाली हो। महाविद्यायों में तीसरी स्थान पर विद्यमान श्री विद्या महा त्रिपुरसुन्दरी श्री विद्या, महा त्रिपुरसुंदरी की प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी त्रिपुरसुंदरी के उत्पत्ति का रहस्य, सती वियोग के पश्चात भगवान शिव सर्वदा ध्यान मग्न रहते हुए हैं। उन्होंने अपने संपूर्ण कर्म का परित्याग कर दिया था, जिसके कारण तीनों लोकों के सञ्चालन में व्याधि उत्पन्न हो रही थी। उधर तारकासुर ब्रह्मा जी से वार प्राप्त किया कि "उसकी मृत्यु शिव के पुत्र द्वारा ही होगी।" वह एक प्रकार से अमर हो गया था, चूंकि सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में देह त्याग कर दिया था जिस कारण शिव जी संसार से विरक्त हो घोर ध्यान में चले गए थे। तारकासुर ने तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर, समस्त देवताओं को प्रताड़ित कर स्वर्ग से निकल दिया। वह समस्त भोगो को स्वयं ही भोगने लगा। समस्त देवताओं ने भगवान शिव को ध्यान से जगाने हेतु, कामदेव तथा उन की पत्नी रति देवी को कैलाश भेजा। सती हिमालय राज के यहाँ पुनर्जन्म ले चुकी थी तथा भगवान शिव को पति रूप में पाने के हेतु वे नित्य शिव के सनमुख जा उनकी साधना-सेवा करती थी। काम देव ने कुसुम सर नमक मोहिनी वाण से भगवान शिव पर प्रहार किया, परिणामस्वरूप शिव जी का ध्यान भंग हो गया। देखते ही देखते भगवान शिव के तीसरे नेत्र से उत्पन्न क्रोध अग्नि ने कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। काम देव की पत्नी रति द्वारा अत्यंत दारुण विलाप करने पर भगवान शिव ने काम देव को पुनः द्वापर युग में भगवान कृष्ण के पुत्र रूप में जन्म धारण करने का वरदान दिया तथा वहां से अंतर्ध्यान हो गए। सभी देवताओं तथा रति के जाने के पश्चात, भगवान शिव के एक गण द्वारा काम देव के भस्म से मूर्ति निर्मित की गई तथा उस निर्मित मूर्ति से एक पुरुष का प्राकट्य हुआ। उस प्राकट्य पुरुष ने भगवान शिव कि अति उत्तम स्तुति की, स्तुति से प्रसन्न हो भगवान शिव ने भांड (अच्छा)! भांड! कहा। तदनंतर, भगवान शिव द्वारा उस पुरुष का नाम भांड रखा गया तथा उसे ६० हजार वर्षों कर राज दे दिया। शिव के क्रोध से उत्पन्न होने के कारण भांड, तमो गुण सम्पन्न था तथा वह धीरे-धीरे तीनों लोकों पर भयंकर उत्पात मचाने लगा। देवराज इंद्र के राज्य के समान ही, भाण्डासुर ने स्वर्ग जैसे राज्य का निर्माण किया तथा राज करने लगा। तदनंतर, भाण्डासुर ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर, देवराज इन्द्र तथा स्वर्ग राज्य को चारों ओर से घेर लिया। भयभीत इंद्र, नारद मुनि के शरण में गए तथा इस समस्या के निवारण हेतु उपाय पूछा। देवर्षि नारद ने, आद्या शक्ति की यथा विधि अपने रक्त तथा मांस से आराधना करने का परामर्श दिया। देवराज इंद्र ने देवर्षि नारद द्वारा बताये हुए साधना पथ का अनुसरण कर देवी की आराधना की तथा देवी ने त्रिपुरसुंदरी स्वरूप से प्रकट हो भाण्डासुर वध कर देवराज पर कृपा की तथा समस्त देवताओं को भय मुक्त किया। कहा जाता हैं, कि भण्डासुर तथा देवी त्रिपुरसुंदरी ने अपने चार-चार अवतारी स्वरूपों को युद्ध लड़ने हेतु अवतरित किया। भाण्डासुर ने हिरण्यकश्यप दैत्य का अवतार धारण किया तथा देवी ललिता प्रह्लाद स्वरूप में प्रकट हो, हिरण्यकश्यप का वध किया। भाण्डासुर ने महिषासुर का अवतार धारण किया तथा देवी त्रिपुरा, दुर्गा अवतार धारण कर महिषासुर का वध किया। भाण्डासुर, रावण अवतार धारण कर, देवी के नखों द्वारा अवतार धारण करने वाले राम के हाथों मारा गया। देवी श्री विद्या त्रिपुरसुन्दरी का भौतिक स्वरूप महाविद्याओं में तीसरे स्थान पर विद्यमान महा शक्ति त्रिपुरसुंदरी, तीनों लोकों में सोलह वर्षीय युवती स्वरूप में सर्वाधिक मनोहर तथा सुन्दर रूप से सुशोभित हैं। देवी का शारीरिक वर्ण हजारों उदीयमान सूर्य के कांति कि भाँति है, देवी की चार भुजा तथा तीन नेत्र (त्रि-नेत्रा) हैं। अचेत पड़े हुए सदाशिव के नाभि से उद्भूत कमल के आसन पर देवी विराजमान है। देवी अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, धनुष तथा बाण से सुशोभित है। देवी पंचवक्त्र है अर्थात देवी के पांच मस्तक या मुख है, चारों दिशाओं में चार तथा ऊपर की ओर एक मुख हैं। देवी के मस्तक तत्पुरुष, सद्ध्योजात, वामदेव, अघोर तथा ईशान नमक पांच शिव स्वरूपों के प्रतीक हैं क्रमशः हरा, लाल, धूम्र, नील तथा पीत वर्ण वाली हैं। देवी दस भुजा वाली हैं तथा अभय, वज्र, शूल, पाश, खड़ग, अंकुश, टंक, नाग तथा अग्नि धारण की हुई हैं। देवी अनेक प्रकार के अमूल्य रत्नों से युक्त आभूषणों से सुशोभित हैं तथा देवी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण कर रखा हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा यम देवी के आसन को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। देवी श्री विद्या त्रिपुरसुंदरी से सम्बंधित अन्य तथ्य समस्त तंत्र और मंत्र देवी कि आराधना करते है तथा वेद भी इनकी महिमा करने में असमर्थ हैं। अपने भक्तों के सभी प्रार्थना स्वीकार कर देवी भक्त के प्रति समर्पित रहती है तथा भक्त पर प्रसन्न हो देवी सर्वस्व प्रदान करती हैं। देवी की साधना, आराधना नारी योनि रूप में भी की जाती है, देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध काम उत्तेजना से हैं, इस स्वरूप में देवी कामेश्वरी नाम से पूजित हैं। देवी काली की समान ही देवी त्रिपुरसुंदरी चेतना से सम्बंधित हैं। देवी त्रिपुरा, ब्रह्मा, शिव, रुद्र तथा विष्णु के शव पर आरूढ़ हैं, तात्पर्य, चेतना रहित देवताओं के देह पर देवी चेतना रूप से विराजमान हैं तथा ब्रह्मा, शिव, विष्णु, लक्ष्मी तथा सरस्वती द्वारा पूजिता हैं। कुछ शास्त्रों के अनुसार, देवी कमल के आसन पर भी विराजमान हैं, जो अचेत शिव के नाभि से निकलती हैं शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा यम, चेतना रहित शिव सहित देवी को अपने मस्तक पर धारण किये हुए हैं। यंत्रों में श्रेष्ठ श्री यन्त्र या श्री चक्र, साक्षात् देवी त्रिपुरा का ही स्वरूप हैं तथा श्री विद्या या श्री संप्रदाय, पंथ या कुल का निर्माण करती हैं। देवी त्रिपुरा आदि शक्ति हैं, कश्मीर, दक्षिण भारत तथा बंगाल में आदि काल से ही, श्री संप्रदाय विद्यमान हैं तथा देवी आराधना की जाती हैं, विशेषकर दक्षिण भारत में देवी श्री विद्या नाम से विख्यात हैं। मदुरै में विद्यमान मीनाक्षी मंदिर, कांचीपुरम में विद्यमान कामाक्षी मंदिर, दक्षिण भारत में हैं तथा यहाँ देवी श्री विद्या के रूप में पूजिता हैं। वाराणसी में विद्यमान राजराजेश्वरी मंदिर, देवी श्री विद्या से ही सम्बंधित हैं तथा आकर्षण सम्बंधित विद्याओं की प्राप्ति हेतु प्रसिद्ध हैं। देवी की उपासना श्री चक्र में होती है, श्री चक्र से सम्बंधित मुख्य शक्ति देवी त्रिपुरसुंदरी ही हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त अथवा परा शक्तियों, विद्याओं से हैं; तन्त्र की ये अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। तंत्र में वर्णित मरण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन इत्यादि प्रयोगों की देवी अधिष्ठात्री है। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध गुप्त अथवा परा शक्तियों, विद्याओं से हैं, तन्त्र की ये अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। समस्त प्रकार के तांत्रिक कर्म देवी की कृपा के बिना सफल नहीं होते हैं। आदि काल से ही देवी के योनि-पीठ कामाख्या में, समस्त तंत्र साधनाओं का विशेष विधान हैं। देवी आज भी वर्ष में एक बार देवी ऋतु वत्सल होती है जो ३ दिन का होता है, इस काल में असंख्य भक्त तथा साधु, सन्यासी देवी कृपा प्राप्त करने हेतु कामाख्या धाम आते हैं। देवी कि रक्त वस्त्र जो ऋतुस्रव के पश्चात प्राप्त होता है, प्रसाद के रूप में प्राप्त कर उसे अपनी सुरक्षा हेतु अपने पास रखते हैं। देवी त्रिपुर सुंदर, सुंदरी या श्री कुल की अधिष्ठात्री देवी हैं। महाविद्याओं में चतुर्थ स्थान पर विद्यमान देवी भुवनेश्वरी देवी भुवनेश्वरी के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा सृष्टि के प्रारम्भ में केवल स्वर्ग ही विद्यमान था, सूर्य केवल स्वर्ग लोक में ही दिखाई देता था तथा उनकी किरणें स्वर्ग लोक तक ही सीमित थी। समस्त ऋषियों तथा सोम देव ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (ग्रह, नक्षत्र इत्यादि) के निर्माण हेतु, सूर्य देव की आराधना की जिससे प्रसन्न हो सूर्य देव ने, देवी भुवनेश्वरी की प्रेरणा से संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। उस काल में देवी ही सर्व-शक्तिमान थी, देवी षोडशी ने सूर्य देव को वह शक्ति प्रदान तथा मार्गदर्शन किया, जिसके परिणामस्वरूप सूर्य देव ने संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की। देवी षोडशी की वह प्रेरणा उस समय से भुवनेश्वरी (सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी) नाम से प्रसिद्ध हुई। देवी का सम्बन्ध इस चराचर दृष्टि-गोचर समस्त ब्रह्माण्ड से हैं, इनके नाम दो शब्दों के मेल से बना हैं भुवन + ईश्वरी, जिसका अभिप्राय हैं समस्त भुवन की ईश्वरी। देवी भुवनेश्वरी का भौतिक स्वरूप देवी भुवनेश्वरी, अत्यंत कोमल एवं सरल स्वभाव सम्पन्न हैं। देवी भिन्न-भिन्न प्रकार के अमूल्य रत्नों से युक्त अलंकारों को धारण करती हैं, स्वर्ण आभा युक्त उदित सूर्य के किरणों के समान कांति वाली देवी, कमल के आसान पर विराजमान हैं तथा उगते सूर्य या सिंदूरी वर्ण से शोभिता हैं। देवी, तीन नेत्रों से युक्त त्रिनेत्रा हैं जो की! इच्छा, काम तथा प्रजनन शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। मंद-मंद मुस्कान वाली, अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्रमा धारण करने वाली देवी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती हैं। देवी के स्तन उभरे हुए तथा पूर्ण हैं, देवी चार भुजाओं से युक्त तथा पूर्ण शारीरिक गठन वाली हैं। देवी अपने दो भुजाओं में पाश तथा अंकुश धारण करती हैं तथा अन्य दो भुजाओं से वर तथा अभय मुद्रा प्रदर्शित करती हैं। देवी नाना प्रकार से मूल्यवान रत्नों से जडें हुए मुक्ता के आभूषण धारण कर बहुत ही शांत और सौम्य प्रतीत होता हैं। देवी भुवनेश्वरी से सम्बंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य देवी भुवनेश्वरी अपने अन्य नाना नमो से भी प्रसिद्ध हैं : १. मूल प्रकृति, देवी इस स्वरूप में स्वयं प्रकृति रूप में विद्यमान हैं, समस्त प्राकृतिक स्वरूप इन्हीं का रूप हैं। २. सर्वेश्वरी या सर्वेशी, देवी इस स्वरूप में, सम्पूर्ण चराचर जगत की ईश्वरी या विधाता हैं। ३. सर्वरूपा, देवी इस स्वरूप में, ब्रह्मांड के प्रत्येक तत्व में विद्यमान हैं। ४. विश्वरूपा, संपूर्ण विश्व का स्वरूप, इन्हीं देवी भुवनेश्वरी के रूप में स्थित हैं। ५. जगन-माता, सम्पूर्ण जगत, तीनों लोकों की देवी जन्म-दात्री हैं माता हैं। ६. जगत-धात्री, देवी इस रूप में सम्पूर्ण जगत को धारण तथा पालन पोषण करती हैं। देवी, 'पञ्च परमेश्वरी' नाम से विख्यात हैं। (मूल पांच तत्वों की ईश्वरी) 'देवी काली और भुवनेशी या भुवनेश्वरी' प्रकारांतर से अभेद हैं काली का लाल वर्ण स्वरूप ही भुवनेश्वरी हैं। दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचारों से संतृप्त हो, सभी देवता, ऋषि तथा ब्राह्मणों ने हिमालय पर जा, सर्वकारण स्वरूपा देवी भुवनेश्वरी की ही आराधना की थी। देवताओं, ऋषियों तथा ब्राह्मणों के आराधना-स्तुति से संतुष्ट हो देवी, अपने हाथों में बाण, कमल पुष्प तथा शाक-मूल धारण किये हुए प्रकट हुई थी। देवी ने अपने नेत्रों से सहस्रों अश्रु जल धारा प्रकट की तथा इस जल से सम्पूर्ण भू-मंडल के समस्त प्राणी तृप्त हुए। समुद्रों तथा नदियों में जल भर गया तथा समस्त वनस्पति सिंचित हुई। अपने हाथों में धारण की हुई, शाक-मूलों से इन्होंने सम्पूर्ण प्राणियों का पोषण किया, तभी से ये शाकम्भरी नाम से भी प्रसिद्ध हुई। इन्होंने ही दुर्गमासुर नामक दैत्य का वध कर समस्त जगत को भय मुक्त, इस कारण देवी दुर्गा नाम से प्रसिद्ध हुई, जो दुर्गम संकटों से अपने भक्तों को मुक्त करती हैं। भुवनेश्वरी अवतार धारण कर सम्पूर्ण जगत का निर्माण तथा सञ्चालन, तथा भगवान विष्णु, 'ब्रह्मा' तथा शिव को जल प्रलय के पश्चात अपना कार्य भर प्रदान करना। श्रीमद देवी-भागवत पुराण के अनुसार! राजा जनमेजय ने व्यास जी से 'ब्रह्मा', विष्णु, शंकर की आदि शक्ति, से सम्बन्ध तथा विश्व के उत्पत्ति के कारण हेतु प्रश्न पूछे जाने पर, व्यास जी द्वारा जो वर्णन प्रस्तुत किया गया वह निम्नलिखित हैं। एक बार व्यास जी के मन में जिज्ञासा जागृत हुई कि, "पृथ्वी या इस सम्पूर्ण चराचर जगत का सृष्टि कर्ता कौन हैं?" इस निमित्त उन्होंने नारद जी से प्रश्न किया। नारद जी ने व्यास जी से कहा की! "एक बार उनके मन भी ऐसे ही जिज्ञासा जागृत हुई थीं।" तदनंतर, नारद जी ब्रह्म लोक स्थित अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गए और उन्होंने उनसे पूछा!"ब्रह्मा, विष्णु और महेश, में किसके द्वारा इस चराचर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई हैं, सर्वश्रेष्ठ ईश्वर कौन हैं ?" ब्रह्मा जी ने नारद से कहा! प्राचीन काल में जल प्रलय पश्चात केवल पञ्च महा-भूतों की उत्पत्ति हुई, जिसके कारण वे (ब्रह्मा जी) कमल से आविर्भूत हुए। उस समय सूर्य, चन्द्र, पर्वत इत्यादि स्थूल जगत लुप्त था तथा चारों ओर केवल जल ही जल दिखाई देता था। ब्रह्मा जी कमल-कर्णिका पर ही आसन जमाये विचरने लगे। उन्हें यह ज्ञात नहीं था की इस महा सागर के जल से उनका प्रादुर्भाव कैसे हुआ तथा उनका निर्माण करने वाला तथा पालन करने वाला कौन हैं? एक बार, ब्रह्मा जी ने दृढ़ निश्चय किया की वे अपने कमल के आसन का मूल आधार देखेंगे, जिससे उन्हें मूल भूमि मिल जाएगी। तदनंतर, उन्होंने जल में उतर-कर पद्म के मूल को ढूंढने का प्रयास किया, परन्तु वे अपने कमल-आसन के मूल तक नहीं पहुँच पाये। तक्षण ही आकाशवाणी हुई की, तुम तपस्या करो! तदनंतर, ब्रह्मा जी ने कमल के आसन पर बैठ हजारों वर्ष तक तपस्या की। कुछ काल पश्चात पुनः आकाशवाणी हुई सृजन करो, परन्तु ब्रह्मा जी समझ नहीं पाये की क्या सृजन करें तथा कैसे करें! उनके द्वारा ऐसा विचार करते हुए, उनके सनमुख 'मधु तथा कैटभ' नाम के दो महा दैत्य उपस्थित हुए तथा वे दोनों उनसे युद्ध करना चाहते थे, जिसे देख ब्रह्मा जी भयभीत हो गए। ब्रह्मा जी अपने आसन कमल के नाल का आश्रय ले महासागर में उतरे, जहाँ उन्होंने एक अत्यंत सुन्दर एवं अद्भुत पुरुष को देखा, जो मेघ के समान श्याम वर्ण के थे तथा उन्होंने अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कर रखा था। शेष नाग की शय्या पर शयन करते हुए ब्रह्मा जी ने श्री हरि विष्णु को देखा। उन्हें देख ब्रह्मा जी के मन में जिज्ञासा जागृत हुई और वे सहायता हेतु आदि शक्ति देवी की स्तुति करने लगे, जिनकी तपस्या में वे सर्वदा निमग्न रहते थे। परिणामस्वरूप, निद्रा स्वरूपी भगवान विष्णु की योग माया शक्ति आदि शक्ति महामाया, उनके शरीर से उद्भूत हुई। वे देवी दिव्य अलंकार, आभूषण, वस्त्र इत्यादि धारण किये हुए थी तथा आकाश में जा विराजित हुई। तदनंतर, भगवान विष्णु ने निद्रा का त्याग किया तथा जागृत हुए, तत्पश्चात उन्होंने पाँच हजार वर्षों तक मधु-कैटभ नामक महा दैत्यों से युद्ध किया। बहुत अधिक समय तक युद्ध करते हुए भगवान विष्णु थक गए, वे अकेले ही युद्ध कर रहे थे, इसके विपरीत दोनों दैत्य भ्राता एक-एक कर युद्ध करते थे। अंततः उन्होंने अपने अन्तः कारण की शक्ति योगमाया आद्या शक्ति से सहायता हेतु प्रार्थना की, देवी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे उन दोनों दैत्यों को अपनी माया से मोहित कर देंगी। योगमाया आद्या शक्ति की माया से मोहित हो दैत्य भ्राता भगवान विष्णु से कहने लगे! "हम दोनों तुम्हारे वीरता पर बहुत प्रसन्न हैं, हमसे वर प्रार्थना करो!" भगवान विष्णु ने दैत्य भ्राताओं से कहा! "मैं केवल इतना ही चाहता हूँ की तुम दोनों अब मेरे हाथों से मारे जाओ।" दैत्य भ्राताओं ने देखा की चारों ओर केवल जल ही जल हैं तथा भगवान विष्णु से कहा! "हमारा वध ऐसे स्थान पर करो जहाँ न ही जल हो और न ही स्थल।" भगवान विष्णु ने दोनों दैत्यों को अपनी जंघा पर रख कर अपने चक्र से उनके मस्तक को देह से लग कर दिया। इस प्रकार उन्होंने मधु-कैटभ का वध किया, परन्तु वे केवल निमित्त मात्र ही थे, उस समय उनकी संहारक शक्ति से शंकर जी की उत्पत्ति हुई, जो संहार के प्रतीक हैं। तदनंतर, 'ब्रह्मा', विष्णु तथा शंकर द्वारा, देवी आदि शक्ति योगनिद्रा महामाया की स्तुति की गई, जिससे प्रसन्न होकर आदि शक्ति ने ब्रह्मा जी को सृजन, विष्णु को पालन तथा शंकर को संहार के दाईत्व निर्वाह करने की आज्ञा दी। तत्पश्चात, ब्रह्मा जी ने देवी आदि शक्ति से प्रश्न किया गया कि! "अभी चारों ओर केवल जल ही जल फैला हुआ हैं, पञ्च-तत्व, गुण, तन-मात्राएँ तथा इन्द्रियां, कुछ भी व्याप्त नहीं हैं तथापि तीनों देव शक्ति-हीन हैं।" देवी ने मुसकुराते हुए उस स्थान पर एक सुन्दर विमान को प्रस्तुत किया और तीनों देवताओं को विमान पर बैठ अद्भुत चमत्कार देखने का आग्रह किया गया, तीनों देवों के विमान पर आसीन होने के पश्चात, वह देवी-विमान आकाश में उड़ने लगा। मन के वेग के समान वह दिव्य तथा सुन्दर विमान उड़कर ऐसे स्थान पर पहुंचा जहाँ जल नहीं था, यह देख तीनों देवों को महान आश्चर्य हुआ। उस स्थान पर नर-नारी, वन-उपवन, पशु-पक्षी, भूमि-पर्वत, नदियाँ-झरने इत्यादि विद्यमान थे। उस नगर को देखकर तीनों महा-देवों को लगा की वे स्वर्ग में आ गए हैं। थोड़े ही समय पश्चात, वह विमान पुनः आकाश में उड़ गया तथा एक ऐसे स्थान पर गया, जहाँ! ऐरावत हाथी और मेनका आदि अप्सराओं के समूह नृत्य प्रदर्शित कर रही थी, सैकड़ों गन्धर्व, विद्याधर, यक्ष रमण कर रहे थे, वहाँ इंद्र भी अपनी पत्नी सची के साथ विद्यमान थे। वहाँ कुबेर, वरुण, यम, सूर्य, अग्नि इत्यादि अन्य देवताओं को देख तीनों को महान आश्चर्य हुआ। तदनंतर, तीनों देवताओं का विमान ब्रह्म-लोक की ओर बड़ा, वहाँ पर सभी देवताओं से वन्दित ब्रह्मा जी को विद्यमान देख, तीनों देव विस्मय में पर पड़ गए। विष्णु तथा शंकर ने ब्रह्मा से पूछा, यह ब्रह्मा कौन हैं ? ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया! "मैं इन्हें नहीं जनता हूँ, मैं स्वयं भ्रमित हूँ।" तदनंतर, वह विमान कैलाश पर्वत पर पहुंचा, वहां तीनों ने वृषभ पर आरूढ़, मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण किये हुए, पञ्च मुख तथा दस भुजाओं वाले शंकर जी को देखा। जो व्यग्र चर्म पहने हुए थे तथा गणेश और कार्तिक उनके अंग रक्षक रूप में विद्यमान थे, यह देख पुनः तीनों अत्यंत विस्मय में पड़ गये। तदनंतर उनका विमान कैलाश से भगवान विष्णु के वैकुण्ठ लोक में जा पहुंचा। पक्षी-राज गरुड़ के पीठ पर आरूढ़, श्याम वर्ण, चार भुजा वाले, दिव्य अलंकारों से अलंकृत भगवान विष्णु को देख सभी को महान आश्चर्य हुआ, सभी विस्मय में पड़ गए तथा एक दूसरे को देखने लगे। इसके बाद पुनः वह विमान वायु की गति से चलने लगा तथा एक सागर के तट पर पहुंचा। वहाँ का दृश्य अत्यंत मनोहर था तथा नाना प्रकार के पुष्प वाटिकाओं से सुसज्जित था, तीनों महा-देवों ने रत्नमालाओं एवं विभिन्न प्रकार के अमूल्य रत्नों से विभूषित, पलंग पर एक दिव्यांगना को बैठे हुए देखा। उन देवी ने रक्त-पुष्पों की माला तथा रक्ताम्बर धारण कर रखी थीं। वर, पाश, अंकुश और अभय मुद्रा धारण किये हुए, देवी भुवनेश्वरी, त्रि-देवो को सनमुख दृष्टि-गोचर हुई, जो सहस्रों उदित सूर्य के प्रकाश के समान कान्तिमयी थी। वास्तव में आदि शक्ति महामाया ही भुवनेश्वरी अवतार में, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सञ्चालन तथा निर्माण करती हैं। देवी समस्त प्रकार के श्रृंगार एवं भव्य परिधानों से सुसज्जित थी तथा उनके मुख मंडल पर मंद मुसकान शोभित हो रही थी। उन भगवती भुवनेश्वरी को देख त्रि-देव आश्चर्य चकित एवं स्तब्ध रह गए तथा सोचने लगे, यह देवी कौन हैं? ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश सोचने लगे कि! "न तो यह अप्सरा हैं, न ही गन्धर्वी और न ही देवांगना!" यह सोचते हुए वे तीनो संशय में पड़ गए। तब उन सुन्दर हास्वली हृल्लेखा देवी के सम्बन्ध में, भगवान विष्णु ने अपने अनुभव से शंकर तथा ब्रह्मा जी से कहा! "यह साक्षात् देवी जगदम्बा महामाया हैं साथ ही यह देवी हम तीनों तथा सम्पूर्ण चराचर जगत की कारण रूपा हैं। देवी, महाविद्या शाश्वत मूल प्रकृति रूपा हैं, सभी-की आदि स्वरूप ईश्वरी हैं तथा इन योग-माया महाशक्ति को योग मार्ग से ही जाना जा सकता हैं। मूल प्रकृति स्वरूपी भगवती महामाया परम-पुरुष के सहयोग से ब्रह्माण्ड की रचना कर, परमात्मा के सनमुख उसे उपस्थित करती हैं।" तदनंतर, तीनों देव भगवती भुवनेश्वरी की स्तुति करने के निमित्त उनके चरणों के निकट गए। जैसे ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकर, विमान से उतरकर देवी के सनमुख जाने लगे, देवी ने उन्हें स्त्री-रूप में परिणीत कर दिया तथा वे भी नाना प्रकार के आभूषणों से अलंकृत तथा वस्त्र धारण किये हुए थे। तदनंतर, तीनों देवी के सनमुख जा खड़े हो गए, उन्होंने देखा की असंख्य सुन्दर स्त्रियाँ देवी की सेवा में सेवारत थी। तीनों देवों ने देवी के चरण-कमल के नख में सम्पूर्ण स्थावर-जंगम ब्रह्माण्ड को देखा, समस्त देवता, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, समुद्र, पर्वत, नदियां, अप्सरायें, वसु, अश्विनी-कुमार, पशु-पक्षी, राक्षस गण इत्यादि सभी, देवी के नख में प्रदर्शित हो रहे थे। वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक, कैलाश, स्वर्ग, पृथ्वी इत्यादि समस्त लोक देवी के पद नख में विराजमान थे। तब त्रिदेव यह समझ गए की देवी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की जननी हैं। महाविद्याओं में पंचम स्थान पर विद्यमान देवी छिन्नमस्ता देवी छिन्नमस्ता के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा नारद-पंचरात्र के अनुसार, एक बार देवी पार्वती अपनी दो सखियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान हेतु गई। नदी में स्नान करते हुए, देवी पार्वती काम उत्तेजित हो गई तथा उत्तेजना के फलस्वरूप उनका शारीरिक वर्ण काला पड़ गया। उसी समय, देवी के संग स्नान हेतु आई दोनों सहचरी डाकिनी और वारिणी, जो जया तथा विजया नाम से भी जानी जाती हैं क्षुधा (भूख) ग्रस्त हुई और उन दोनों ने पार्वती देवी से भोजन प्रदान करने हेतु आग्रह किया। देवी पार्वती ने उन दोनों सहचरियों को धैर्य रखने के लिये कहा तथा पुनः कैलाश वापस जाकर भोजन देने का आश्वासन दिया। परन्तु, उनके दोनों सहचरियों को धैर्य नहीं था, वे दोनों तीव्र क्षुधा का अनुभव कर रहीं थीं तथा कहने लगी! "देवी आप तो संपूर्ण ब्रह्मांड की माँ हैं और एक माता अपने संतानों को केवल भोजन ही नहीं अपितु अपना सर्वस्व प्रदान कर देती हैं। संतान को पूर्ण अधिकार हैं कि वह अपनी माता से कुछ भी मांग सके, तभी हम बार-बार भोजन हेतु प्रार्थना कर रहे हैं। आप दया के लिए संपूर्ण जगत में विख्यात हैं, परिणामस्वरूप देवी को उन्हें भोजन प्रदान करना चाहिए।" सहचरियों द्वारा इस प्रकार दारुण प्रार्थना करने पर देवी पार्वती ने उनकी क्षुधा निवारण हेतु, अपने खड़ग से अपने मस्तक को काट दिया, तदनंतर, देवी के गले से रक्त की तीन धार निकली। एक धार से उन्होंने स्वयं रक्त पान किया तथा अन्य दो धाराएं अपनी सहचरियों को पान करने हेतु प्रदान किया। इस प्रकार देवी ने स्वयं अपना बलिदान देकर अपनी सहचरियों के क्षुधा का निवारण किया। देवी छिन्नमस्ता के उत्पत्ति से संबंधित एक और कथा प्राप्त होती हैं! जो समुद्र मंथन के समय से सम्बंधित हैं। एक बार देवताओं और राक्षसों ने अमृत तथा अन्य प्रकार के नाना रत्नों के प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन किया। देवताओं और राक्षसों दोनों नाना रत्न प्राप्त कर शक्तिशाली बनना चाहते थे, सभी रत्नों में अमृत ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रत्न था, जिसे प्राप्त कर अमरत्व प्राप्त करने हेतु, देव तथा दानव समुद्र मंथन कर रहे थे। समुद्र मंथन से कुल १८ प्रकार के रत्न प्राप्त हुए, देवताओं के वैध धन्वन्तरी, अमृत कलश के साथ अंत में प्रकट हुए। तदनंतर देवताओं और राक्षसों दोनों में अमृत कलश प्राप्त करने हेतु, भारी उत्पात हुआ अंततः देवताओं से दैत्य अमृत कलश लेने में सफल हुए। समस्या के निवारण हेतु भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार धारण किया। अपने नाम के स्वरूप ही देवी मोहिनी ने असुरों को मोहित कर लिया तथा असुर-राज बाली से अमृत कलश प्राप्त कर, देवताओं तथा दानवों को स्वयं अमृत पान करने हेतु तैयार कर लिया। मोहिनी अवतार में स्वयं आद्या शक्ति महामाया ही भगवान विष्णु से प्रकट हुई थी। देवी मोहिनी ने छल से सर्वप्रथम देवताओं को अमृत पान कराया तथा शेष स्वयं पान कर, अपने हाथों से अपने मस्तक को धर से अलग कर दिया, जिससे अब और कोई अमृत प्राप्त न कर सकें। देवी छिन्नमस्ता का भौतिक स्वरूप देवी छिन्नमस्ता बिखरे बालों युक्त नग्न हो, कामदेव तथा उनकी पत्नी रति देवी के ऊपर अत्यंत उग्र रूप धारण किये हुए, कमल के मध्य में खड़ी हैं। देवी का शारीरिक वर्ण पिला या लाल-पीले रंग का हैं तथा पूर्ण उभरे हुए स्तनों से युक्त देवी सोलह वर्ष कि कन्या के रूप में प्रतीत हो रही हैं। देवी ने मानव मुंडो की माला के साथ सर्पों तथा अन्य अमूल्य रत्नों से युक्त आभूषण धारण कर रखी हैं, देवी सर्प रूपी यज्ञोपवित धारण करती हैं। देवी, मस्तक पर अमूल्य रत्नों से युक्त मुकुट तथा अर्ध चन्द्र धारण करती हैं, तीन नेत्र से युक्त हैं। देवी छिन्नमस्ता के दाहिने हाथ में स्वयं का कटा हुआ मस्तक रखा हुआ हैं जो उन्होंने स्वयं अपने खड्ग से काटा हैं तथा बायें हाथ में वह खड़ग धारण करती हैं जिससे उन्होंने अपना मस्तक कटा हैं। देवी के कटे हुए गर्दन से रक्त की तीन धार निकल रही हैं, एक धार से देवी स्वयं रक्त पान कर रही हैं तथा अन्य दो धाराओं से देवी की सहचरी योगिनियाँ रक्त पान कर रही हैं। दोनों योगिनियों का नाम जया तथा विजया या डाकिनी तथा वारिणी हैं। देवी, स्वयं तथा दोनों सहचरी योगिनियों के संग सहर्ष रक्त पान कर रही हैं। देवी की दोनों सहचरियां भी नग्नावस्था में खड़ी हैं तथा अपने हाथों में खड़ग तथा मानव खप्पर धारण की हुई हैं। देवी की सहचरी डाकिनी तमो गुणी (विनाश की प्राकृतिक शक्त) एवं गहरे वर्ण युक्त तथा वारिणी की उपस्थिति लाल रंग तथा राजसिक गुण (उत्पत्ति से सम्बंधित प्राकृतिक शक्ति) युक्त हैं। देवी अपने दो सहचरियों के साथ अत्यंत भयानक, उग्र स्वरूप वाली प्रतीत होती हैं, क्रोध के कारण उपस्थित महा-विनाश की प्रतीक है! देवी छिन्नमस्ता। देवी छिन्नमस्ता से सम्बंधित अधिक तथ्य सामान्यतः हिंदू धर्म अनुसरण करने वाले देवी छिन्नमस्ता के भयावह तथा उग्र स्वरूप के कारण, स्वतंत्र रूप से या घरों में उनकी पूजा नहीं करते हैं। देवी के कुछ-एक मंदिरों में उनकी पूजा-आराधना की जाती हैं, देवी छिन्नमस्ता तंत्र क्रियाओं से सम्बंधित हैं तथा तांत्रिकों या योगियों द्वारा ही यथाविधि पूजित हैं। देवी की पूजा साधना में विधि का विशेष ध्यान रखा जाता हैं, देवी से सम्बंधित एक प्राचीन मंदिर रजरप्पा में हैं, जो भारत वर्ष के झारखंड राज्य के रामगढ़ जिले में अवस्थित हैं। देवी का स्वरूप अत्यंत ही गोपनीय हैं इसे केवल सिद्ध साधक ही जान सकता हैं। देवी की साधना रात्रि काल में होती हैं तथा देवी का सम्बन्ध तामसी गुण से हैं। देवी अपना मस्तक काट कर भी जीवित हैं, यह उनकी महान यौगिक (योग-साधना) उपलब्धि हैं। योग-सिद्धि ही मानवों को नाना प्रकार के अलौकिक, चमत्कारी तथा गोपनीय शक्तियों के साथ पूर्ण स्वस्थता प्रदान करती हैं। महाविद्याओ में छठवें स्थान पर विद्यमान त्रिपुर-भैरवी देवी महा हैं... क्रमश प्रस्तुतीकरण ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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