Namrata chhabra
Namrata chhabra Mar 3, 2021

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Ravi Kumar Taneja Mar 3, 2021
🌹🙏🌹जय श्री गणेशजी🌹🙏🌹आपका दिन आपका हर पल शुभ हो जी 🙏🌹🙏शुभ प्रभात वन्दन जी 🙏🌹🙏 ॐ गं गणपतये नमो नमः🙏🌹🙏 ॐ सिद्धिविनायक नमो नमः🙏🌹🙏

Jai Mata Di May 10, 2021

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.129 : पारमार्थिक सत्ता की विशेषता* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 129)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में लिखा है - *राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। अविगत अकथ अपार, नेति नेति नित निगम कह।। चिदानन्दमय देह तुम्हारी। विगत विकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा, कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।* राम का स्वरूप अर्थात्‌ आत्मभावरूप (पारमार्थिक सत्ता), उनका चिदानन्दमय रूप (व्यावहारिक सत्ता), और उनका नर रूप (प्रातिभासिक सत्ता); इन तीन प्रकारों में राम को जानना चाहिए। मेरे बोध में स्वरूप वा आत्मभाव में वह अनादि, अनंत, असीम, अपरिमित, ध्रुव और अव्यक्त है। उनका चिदानन्दरूप वा सच्चिदानंद रूप, कथित आत्मभाव से भरा हुआ, गतिशील, इन्द्रियातीत वा अव्यक्त विकारहीन तथा उसके दर्शन की योग्यता रखनेवाले अधिकारी भक्त से जाननेयोग्य है। तथा उसका नररूप उस आत्मभाव से पूर्ण चिदानन्दमय रूप से व्याप्त इन्द्रिय-गोचर वा व्यक्त है। सच्चिदानंद रूप परा प्रकृतिमय है और नररूप अपरा प्रकृतिमय है। ये दोनों रूप अप्राकृत नहीं हैं। अवश्य ही परा प्रकृतिमय रूप का पद अपरा प्रकृतिमय रूप से उच्च है और आत्मभाव में ही राम अप्राकृत भाव में है। चिदानन्दमय देह कभी नर शरीर नहीं हो सकता। लोहा अग्नि में तपते-तपते अग्नि रूप हो जाय, उसका काम भी आग का हो, कितु कुछ देर के बाद ठण्ढा होने पर लोहा ही कहा जाएगा। इसी प्रकार चिदानन्दरूप नररूप में होने के कारण वह जो कुछ भी हो किंतु फिर नररूप ही है - जैसे लोहा लोहा ही है। त्रिशूल और फाल के लोहे को अग्नि में देने से दोनों के दो आकार होते हैं, दोनों लाल हो जाते हैं, अग्नि के समान हो जाते हैं, किंतु वे लोहा हैं। परंतु अग्नि (गर्मी) का उस प्रकार का कोई रूप नहीं। इसी तरह *नररूप में चिदानन्दरूप नराकृतिवत्‌ परंतु उसका भी निराकार-सा आकार नहीं।* लोग कहते हैं - सूर्य अग्नि का गोला है और वह ठण्ढा होते-होते ठण्ढा हो जाएगा। हवा और अग्नि जिस-जिस रूप में होती हैं, वह उस-उस रूप में कहलाती हैं और उनसे बाहर भी हैं। उसी तरह *परमात्मा का चिदानन्दमय रूप सब के बाहर और सब के भीतर भी है।* *वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।। - कठोपनिषद्‌* परमात्मा के इसी चिदानन्दमय रूप के दर्शन से उपनिषद्‌ के इस वाक्य में कथित फल भक्त को होता है - *भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्समिन्दृष्टे परावरे।। - महोपनिषद्‌* अर्थात्‌ उस परे-से-परे (ब्रह्म) को देख लेने पर हृदय की ग्रन्थि टूट जाती है, सभी संशय छिन्‍न हो जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। कितना ही कोई चमत्कार दिखावे, कितना ही कोई वाक्य-जाल रच दे, किंतु मैं नहीं मान सकता कि कोई भी इन्द्रियगम्य रूप चिदानन्दमय हो सकता है। सुग्रीव और श्रीरामजी ने अग्नि की साक्षी देकर आपस में मित्रता की - श्रीसीताजी की खोज करने के लिए। सुग्रीव राजमद में डूब गया और लक्ष्मणजी जब वहाँ डराने-धमकाने के लिए गए तो सुग्रीव आकर कहने लगा – *माया बस सुर नर मुनि स्वामी। मैं पामर पशु कपि अति कामी।।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने इतना ही लिखा और बालमीकि रामायण के शब्दों में इसका चित्र खींचा हुआ है। चिदानन्द-रूप का दर्शन हो गया और अतिकामी बना ही रहा! यदि कहो कि उसका हृदय दुरुस्त नहीं था, तो दर्शन कैसे हुआ? यदि हृदय दुरुस्त नहीं था तो चिदानन्दमय-रूप के दर्शन से ठीक हो जाना चाहिए था। कबीर साहब की ही भाँति सत्य कहना पसन्द करता हूँ, जिस सत्य के लिए कबीर साहब ने कहा कि – *साँच कहूँ तो कोई न मानै झूठ कहा नहिं जाई हो।* परमात्म-स्वरूप को लोग तीन सत्ताओं में विभक्त करके वर्णन करते हैं - पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक। पारमार्थिक सत्ता सबसे उच्च है। यह न जड़ है, न चेतन है; जड़-चेतन से परे है। यह सच्चिदानन्द से भी परे है। व्यावहारिक सत्ता सच्चिदानन्द पद है, उसको सत्तलोक कहते हैं। प्रातिभासिक सत्ता को भ्रम कहा गया है। यथा – *रजत सीप महँ भास जिमि, यथा भानु कर वारि। यदि मृषा तिहु काल सो, भ्रम न सकइ कोउ टारि।। ऐसेहि जग हरि आश्रित रहई। यदपि असत्य देत दुख अहई।।* पारमार्थिक सत्ता का संतवाणी में ऐसा भी वर्णन किया गया है - *तापर अकह लोक है भाई। पुरुष अनामी तहाँ रहाई।।* *जो पहुँचे जानेगा वाही। कहन सुनन से न्यारा है।। - कबीर साहब* यहाँ तक आपको पहुँचना चाहिए। यहाँ तक आपको कैसे पहुँचना चाहिए, इसी का पता कबीर साहब के इस पद्य में कहा गया है - *गगन की ओट निशाना है। दहिने सूर चंद्रमा बायें, तिनके बीच छिपाना है।। तन की कमान सुरत का रोदा, शब्द बान ले ताना है। मारत बान बिंधा तन ही तन, सतगुरु का परवाना है।। मारयो बान घाव नहिं तन में, जिन लागा तिन जाना है। कहै कबीर सुनो भाई साधो, जिन जाना तिन माना है।।* चन्द्र और सूर्य के बीच में, चन्द्र बायें, सूर्य दायें को, इड़ा बायाँ, पिंगला दाहिना, दोनों के बीच निशाना आकाश की ओट में छिपा है। अंधकारमय आकाश पर्दा है। धूम धूलि से आच्छादित आकाश परदामय है। आकाश स्वच्छ हो और दृष्टि-शक्ति अच्छी हो तो दूर तक देख सकते हैं। आप किसी मैदान में खड़े हो जाइए तो आकाश पृथ्वी से मिला हुआ देखते हैं, जिसको क्षितिज कहते हैं। एक परिधि जैसा मालूम होता है, इससे विशेष आपकी दृष्टि नहीं जाती है। यदि उस परिधि के नजदीक जाकर देखिए तो फिर दूसरी परिधि दिखाई देगी। हाँ, तो आपका निशाना गगन की ओट में छिपा है। यह बाहर में निशाना नहीं हो सकता, अंदर में निशाना करना है। महर्षि रमण की वैष्णवी मुद्रा थी। शिवजी की शाम्भवी मुद्रा और भगवान विष्णु की वैष्णवी मुद्रा। इस क्रिया को कैसे किया जाय? तो कहा गया है कि *तन की कमान सुरत का रोदा, शब्द बान ले ताना है।* याद रहे कि तीर तो लिया और निशाना ठीक नहीं है, तब वह छिद नहीं सकता। *शब्दवेधी बाणवाले को बुद्धि-रूपी दृष्टि होती है।* यह किसी-किसी को होती है। पृथ्वीराज को यह बुद्धि-रूपी दृष्टि थी। वह शब्दवेधी बाण चलाना जानते थे। शरीर का धनुष और सुरत की डोरी बनाइए। धनुष के ऊपर बराबर डोरी चढ़ी नहीं रहती है। आवश्यकता होने पर धनुष पर डोरी चढ़ाई जाती है। धनुष के एक छोर पर सुरत की डोरी लगी है। इसके दूसरे छोर पर भी डोरी चढ़ानी है। धनुष पर से डोरी उतरी हुई है तो उससे क्या लाभ? भगवान बुद्ध को छह वर्षों की तपस्या करने पर उनको यह ज्ञात हुआ कि जिस सत्य ज्ञान की खोज में में चला था, वह नहीं मिला। भगवान बुद्ध सोच रहे थे कि जिसके लिए राजपाट छोड़कर चला वह नहीं मिला और अब वहाँ जाने पर राजपाट चला भी नहीं सकूँगा। करूँ तो मैं क्या करूँ? इसी विचार में वे बैठे थे। बैठे-बैठे उनको नींद आई और देखा कि इन्द्र एकतारा लिए आए हैं। उसमें तीन तार थे। एक तार बहुत ढीला रहने के कारण उससे जो आवाज निकलती थी, वह अच्छी नहीं लगती थी। दूसरा तार जो बहुत कसा था, उससे ठस यानी कड़ी और कठोर आवाज निकलती थी और जो मध्य का तीसरा तार था, वह यथोचित कसा था, उसकी आवाज बहुत मीठी थी। इतने में उनकी नींद टूट गई और उन्होंने समझा कि मैंने तार को बहुत कसा। *संसारी लोगों का तार बहुत ढीला होता है।* इसलिए उन्होंने मध्य का मार्ग अपनाया। *ढीले तार से कुछ होने का नहीं। यह विषयों की ओर जाता है।* विषयों की ओर विशेष वेग होना धनुष की डोरी ढीली होनी है। यह बुढ़ापा में भी ढीला रहता है। महात्मा गाँधीजी ने कहा है - *उपवासी होने से विषय मंद पड़ता है किंतु विषय-रस की स्मृति रह जाती है। वह तो परमात्म-साक्षात्कार करने पर छूट सकती है।* इसलिए अमा, प्रतिपदा या पूर्णिमा किसी दृष्टि से धनुष पर डोरी चढ़ाने का या तार कसने का अभ्यास करो। अमादृष्टि सबसे सरल है। यह तो इतना सरल और सुखद है कि ध्यान करते हुए लोग नींद में पड़ जाते हैं। तब जो कोई कहे कि आँख बंदकर ध्यान करने से नींद आती है, इसलिए आँख खोलकर करना चाहिए। तो मैं कहूँगा उनको मालूम नहीं है। *आँख खोलकर ध्यान करने से भी औंघी आती है।* संतों ने आँख बंदकर ध्यान करने कहा है - *आँख कान मुख बंद कराओ, अनहद झींगा शबद सुनाओ। दोनों तिल एक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है।।* *औंघी लगती है तो सम्हल-सम्हलकर ध्यान करो।* खाने-पीने का संयम करो। विशेष खाने से नींद आएगी, भजन नहीं बनेगा। ‘नाक तरूक पूरन करे, कौन कहै परसाद।’ संयम से खाना चाहिए इससे भजन ही नहीं होता, शरीर भी स्वस्थ रहता है। शब्द अभ्यास करे और शरीर के अन्दर-ही-अन्दर बिन्ध जाय। यह सतगुरु का परमाना है। *मारयो बान घाव नहिं तन में, जिन लागा तिन जाना है। कहै कबीर सुनो भाई साधो, जिन जाना तिन माना है।।* *चुम्बक सत्त शब्द है भाई, चुम्बक शब्द लोक ले जाई। लेइ निकारि होखै नहिं पीरा, सत्त शब्द जो बसे शरीरा।। - संत दरिया साहब, बिहारी* दूसरे शब्दों में आपलोगों ने सुना - *जब से अनहद घोर सुनी। इन्द्री थकित गलित मन हुआ, आशा सकल भुनी।। घूमत नैन शिथिल भई काया, अमल जो सुरत सनी। रोम रोम आनंद उपज करि, आलस सहज भनी।। मतवारे ज्यों शब्द समाये, अंतर भींज कनी। करम भरम के बंधन छूटे, दुविधा विपति हनी।। आपा बिसरि जक्त कूँ बिसरो, कित रहि पाँच जनी। लोक भोग सुधि रही न कोई, भूले ज्ञानि गुनी।। हो तहँ लीन चरण ही दासा, कहैं सुकदेव मुनी। ऐसा ध्यान भाग सूँ पैये, चढ़ि रहै शिखर अनी।।* मन नादानुसंधान के अभ्यास से काबू में आ जाता है। इसके लिए नादविन्दूपनिषद्‌ में बहुत उपमाएँ हैं। ‘घूमत नैन' - अंधकार से प्रकाश में, बाहर से भीतर में। ‘भूले ज्ञानि गुनी’ - मौलाना रूम, शम्स तबरेज के यहाँ गए और उनका हाथ चूमा। इस पर शम्स तबरेज ने उसे एक थप्पड़ लगाया। मौलाना रूम ने पूछा - हजरत! मुझसे क्‍या खता हुई? उन्होंने कहा - तेरे से बदबू आती है। मौलाना ने पूछा - वह कैसी बदबू है? उन्होंने कहा - *इल्मियत (विद्वता) की बदबू है।* पुनः मौलाना ने पूछा - क्या करूँ? उन्होंने कहा - कुँए में डाल। *ज्ञान का तर्क-वितर्क सभी छोड़कर भजन करो।* मुँह बन्द करो, मन बन्द करो, तब भजन ठीक-ठीक बनेगा। भजन करने का है, कहने-सुनने का नहीं। *बहिर्मुख से मुड़ना है, अन्तर्मुख होने से स्थूल इन्द्रियों का संग छूटता है।* जाग्रत से स्वप्न में जाने पर सभी बाहर की इन्द्रियाँ निश्चेष्ट हो जाती हैं। जगने पर कहते हैं कि अच्छी तरह सोया। यह अनुभव करनेवाला कौन है? कितना भी कोई नींद में हो, शरीर को कोई किसी तरह डुला दे, जग जाएगा। कुम्भकर्ण तक की नींद टूट जाती है। जब कुम्भकर्ण साधारण तरह से जगाने पर नहीं जगा, तब जैसे बैल से धान बगैरह दौनी करते हैं, वैसे ही कुम्भकर्ण की नाक में खूँट गाड़कर हाथी को चलाया गया, तब उसकी नींद टूटी। इसी तरह *दृष्टि की खूँटी गड़ जाय तो नींद नहीं आएगी।* इस संसार में जाग्रत अवस्था में रहने पर दूर-दूर तक देखते हैं। अच्छी जगह भी है और बुरी जगह भी है। उसी तरह तुरीयावस्था का मैदान दूर तक है और इसमें ऊँचे-ऊँचे स्थान भी हैं, बुरी जगहें भी हैं। *बुरी जगह वह है, जिसमें ऋद्धि-सिद्धि प्रेरित करके माया में गिराती है।* जो इसमें फँस गया, वह ऊपर नहीं उठ सकता। इसी को कबीर साहब ने कहा - *गंग जमुन के रेत पर, माली बाग लगाया हो। कच्ची कली इक तोड़िकै, मलिया पछिताया हो।।* गंग-जमुन = इंगला-पिंगला है, बाग लगाना = सुरत जमाना है और कच्ची कली तोड़नी = कुछ अभ्यास करके जो अपरिपक्व बल हुआ उसको खर्च कर देना है। तुरीयावस्था के आरंभ से ही कच्ची कली है। *ध्यान से ऊर्ध्वगति होती है।* किसी भी पदार्थ को चाहे वह कठिन हो, तरल हो, वाष्पीय हो, उसको समेटने से ऊर्ध्वगति होती है। मन ईथर से भी सूक्ष्म है। जो जितना सूक्ष्म होता है, सिमटाव होने पर उसकी उतनी ही विशेष ऊर्ध्वगति होती है। तुरीयावस्था में आधा मंजिल कोई पार कर जाय यानी त्रिकुटी में पहुँच जाय, त्रिकुटी उसको कहते हैं, जहाँ से प्रकृति के तीनों गुणों का कार्य आरंभ होता है। यह अन्दर की है, बाहर के भौओं के बीच की त्रिकुटी नहीं। यहाँ जो पहुँचता है, वह बहुत पवित्र होता है। जब साम्यावस्था-धारिणी मूल प्रकृति को पार करता है, वह बिल्कुल पवित्र हो जाता है। यहाँ ‘अहं ब्रह्मास्मि' रहता है। यह तुरीयावस्था है। पहले ही मंजिल में यदि कोई कुछ करके दिखलाने लगे, कुछ लेने लगे तो उसकी ऊर्ध्वगति कहाँ से हो सकती है। इसलिए भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य को फटकारा था। कहानी है कि किसी आदमी को सोने का एक कटोरा मिला। उसने उस कटोरे को, एक बाँस गाड़कर उसकी फुनगी पर बाँध दिया और कहा कि जो कोई अपना हाथ बढ़ाकर उस कटोरे को ले लेगा, वह कटोरा उसी का हो जाएगा। उस रास्ते से भगवान बुद्ध के एक शिष्य जा रहे थे, उनको यह बात मालूम हुई। उन्होंने अपने योगबल से हाथ बढ़ाकर उस कटोरे को ले लिया। जब यह बात भगवान बुद्ध को मालूम हुई तो उन्होंने अपने शिष्य को बहुत फटकारा और उस कटोरे को चूर-चूर कर फेंक दिया। ऐसी ही बातें तुलसी साहब के लिए भी है कि उनके शिष्य गिरधारी साहब ने किसी कारणवश लोगों पर अपनी सिद्धि-शक्ति का प्रयोग किया था और जब तुलसी साहब को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने अपने शिष्य गिरधारी साहब को बहुत फटकारा और कहा – *साधु-संत दूसरों की रक्षा करने के लिए होते हैं कि सिर फोड़ने के लिए! आज से तुम कभी मेरे सामने मत आओ।* तब से वे जीवन-पर्यन्त उनके सामने नहीं गए। यह इसलिए कि तुम अहंकार में नहीं फँसो। बाहर-बाहर चलने में, जो पदार्थ मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। इसलिए अपने अंदर चलो। अंदर में चलने से सिमटाव होगा, सिमटाव से ऊर्ध्वगति होगी। किंतु बिना विचारे तो संसार ही महारमणीय मालूम होता है। *अनविचार रमणीय महा संसार भयंकर भारी।* ध्यानाभ्यास में साधक तुरीयावस्था के आरंभ में ऋद्धि-सिद्धि में फँसता है। संत लोग इससे हटाते हैं। उसको अंदर में मदद मिलती है। दृष्टि स्थिर होने पर ब्रह्मज्योति देखने में आती है। 'देखे आँखी कोनो मते फिरे ना।' वह परमात्मा के तरह-तरह के प्रकाशों को पाता है-देखता है। गीता में है कि भगवान ने अर्जुन को विराट रूप दिखलाया, उसमें इतना प्रकाश था कि करोड़ों सूर्य का प्रकाश उसका मुकाबला नहीं कर सकता था। उस प्रकाश को उस रूप से हटा दीजिए तो क्या सुन्दरता रह जाती है? बिना तेज के रूप सुन्दर नहीं दिखता। *जिमि बिनु तेज न रूप गोसाईं।* असल तेज ही वह पदार्थ है जो अपनी ओर वा रूप की ओर आकर्षित करता है। सभी जीवित चेहरे में प्रकाश रहता है, मृतक शरीर के चेहरे में वह सौन्दर्य नहीं रहता। ब्रह्मतेज ही तेज है, किंतु बहुत लुभानेवाला है, यह अवलम्ब मिलता है। जिसको यह अवलम्ब मिलता है, वह उधर ही टन (खींच) जाता है, इधर नहीं आता है। दूसरा अवलम्ब शब्द का होता है। सृष्टि का स्थल या सूक्ष्म कोई भी मण्डल हो, बिना शब्द के नहीं है। वहाँ के शब्द को सुननेवाला वही होता है, जिसकी दृष्टि प्रकाश में पहुँच गई है, जहाँ जाओ कि सुन सको। वहाँ तक पहुँचने के लिए दृष्टियोग चाहिए। शब्द का सहारा इतना उत्तम है कि कहा नहीं जाता। शोक से मुरझाया हुआ आदमी है तो उसको ऐसे-ऐसे शब्द सुनाए जाये, जिससे वह मुरझाया हुआ नहीं रहे, वह प्रसन्‍न हो जाय। *शब्द में चार गुण हैं। ऊपर का शब्द नीचे दूर तक जाता है, नीचे का शब्द ऊपर दूर तक नहीं जाता है, अपने उद्गम स्थान पर खींचता है और अपने स्थान के गुण को लिए रहता है - उस शब्द को जो कोई सुनता है, वह गुण उसमें हो जाता है।* सिनेमा-नाटक आदि देखते हैं तो उसमें शोक का दृश्य देखने से शोकित और हर्ष के दृश्य को देखकर हर्षित होते हैं। आप जिस शब्द को पकड़ना चाहें, उसे पकड़िए, उसके केन्द्र पर पहुँचिएगा। जिस-जिस शब्द को पकड़ा जाएगा, वह-वह शब्द अपने केन्द्र में केन्द्रित करावेगा। *सच्चिदानन्द पद मण्डल के केन्द्र से जो शब्द आता है, वही रामनाम, ओम, आदिनाम है। उस शब्द से जो खींचा जाएगा, वह परधाम में पहुँचेगा। जिस विषय को विशेष सुनिए उस ओर आकर्षण होगा।* कौरव लोगों ने चाहा कि पांचो भाई पाण्डवों को किसी तरह अपने राज्य से बाहर करना चाहिए। कौरवों ने विचारा कि उनलोगों को काशी भजा जाय। किंतु स्पष्ट रूप में उनलोगों से यह बात करने में सभी सकुचाते थे। अंत में कौरवों ने अपने में यह परामर्श किया कि पाण्डव जब सभा में आवें, तब उनके सामने काशी की विशेषताओं का वर्णन करना चाहिए। सुनते-सुनते उन लोगों की इच्छा उस ओर झुकेगी और तब वे लोग स्वयं काशी चले जाएँगे। बात ऐसी ही हुई। वे पाँचो भाई जब-जब सभा में आते, कौरव गण तब-तब काशी की ही चर्चा करने लगते। फलतः काशी की विशेष चर्चा सुनते-सुनते अंत में युधिष्ठिर का मन उस ओर झुका ओर वे पाँचो भाई काशी चले गए। *जिस विषय को आप बहुत सुनिए, उधर मन फिर जाएगा। इसलिए हमारे बाबा साहब सत्संग करने के लिए बहुत प्रेरणा देते थे। भजन करते समय सब भूल जाइए। पवित्र मन रखकर ध्यान कीजिए। विषयी इस ओर बढ़ नहीं सकता।* उपनिषद्‌ में भी कहा है, जो पाप कर्मों से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशांत है, वह इसे आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है। *ना विरतो दुश्चरितान्नाशान्तो ना समाहितः। ना शान्त मानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्‌।। - कठोपनिषद्‌* गुरु नानकदेवजी ने कहा है - *सूचै भाड़ै साँचु समावै विरले सूचाचारी। तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुमारी।। ऐसी सेवकु सेवा करै, जिसका जिउ तिसु आगे धरै।।* यह भागवत की नवधा भक्ति में का ‘आत्मनिवेदनम्‌’ है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण आदि शरीरों से अपने को टपाकर रखो तभी आत्मनिवेदनम्‌ होगा। *शरीर से किसी के सामने साष्टांग गिरना यथार्थ में आत्मनिवेदनम्‌ नहीं है। जिसको सत्संग से भी प्रेम है, वह पशु योनि में नहीं जाएगा।* दृश्य-सृष्टि का आरंभ विन्दु से होता है। पहले विन्दु, फिर सब दृश्यों की रचना। दृश्य-जगत के शिखर पर तब चढ़ोगे, जब विन्दु ध्यान करोगे। यह विन्दु दृश्य जगत का बीज है और नाद अरूप-अदृश्य जगत का मूल बीज है। कम्पन और शब्द दोनों संग-संग रहते हैं। कम्पन से या शब्द से जिससे कहिए उससे सृष्टि हुई। यह शब्द ईश्वर का है। इसलिए बाइबिल में लिखा है कि *आदि में शब्द था और शब्द ईश्वर के संग था ...।* संतलोग भी शब्द से सृष्टि का होना मानते हैं। नाद ध्यान से अदृश्य सृष्टि के शिखर पर पहुँचते हैं और परमात्मा को प्राप्त करते हैं। यही विन्दु और नाद ध्यान की महिमा है। यह प्रवचन पूर्णियाँ जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर सिकलीगढ़ धरहरा में दिनांक 27.11.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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